Wednesday, September 14, 2022

'गुलो'क अन्तर्कथा आ सुभाष चन्द्र यादव

 


तारानंद वियोगी



          सब गोटे जनैत छी जे 1948 मे जखन यात्री जी सं हुनकर प्रकाशक, मने हिन्दी-प्रकाशक, उपन्यास लिखबाक अनुरोध कयने रहनि, तं यात्री जी जिद पकड़ि लेने रहथि जे ओ उपन्यास तं लिखता जरूर मुदा मैथिली मे लिखता। प्रकाशको हुनकर गद्यकला पर तेहन मुग्ध जे मानि गेल छला आ एहि तरहें आयल रहय 'पारो'। मैथिली मे हेबाक बादो ओकर सबटा प्रति छबे मास मे बिकि गेल रहै से तं एक बात, पैघ बात ई जे मैथिली उपन्यासक नियति कें ई उपन्यास बदलि क' राखि देलक रहय। एकर बाद एक हिन्दी तं दोसर मैथिली, एही हिसाब सं हुनकर किताब सब अबैत रहल। मुदा, हमरा कहबाक अछि जे यात्री जी मैथिली मे उपन्यास लिखब छोड़ि किएक देलथि? कहिया छोड़लथि? कोन एहन घटना भेलै जे हिन्दी मे तं हुनकर उपन्यास अबैत रहल मुदा मैथिली मे उपन्यास लिखब ओ बंद क' देलथि।

          एहि प्रसंगक सीधा सम्बन्ध सुभाष चन्द्र यादव लिखित उपन्यास 'गुलो'क संग अछि।

          'नवतुरिया' आ 'बलचनमा' एहन उपन्यास रहै जकरा यात्री जी मैथिली आ हिन्दी मे अलग-अलग लिखने रहथि। 1952 सं 1955 धरि ओ प्रमुखत: एही काज मे लागल रहल छला। हिन्दी मे 'बलचनमा' छपि गेलाक बादो ओ मैथिली 'बलचनमा'क आभा मे डूबल रहला। ई हुनकर स्वप्न आ सेहन्ताक मिथिला रहय। अपन समुच्चा अस्मिता मे जे आदर्श ओ अपन जुझारू जीवन सं अर्जित कयने रहथि, जे मैथिली हुनका प्राण मे सुवास जकां विराजित छली, ई से छल। अन्तत: जखन ई उपन्यास हुनका परिकल्पनाक एनमेन मुताबिक कागज पर उतरि अयलै, 15 फरबरी 1955 कें ओ हरिनारायण मिश्र कें लिखलनि: 'हौ हरि, मैथिली बलचनमा हिन्दी बला सं नि:सन्देह सुंदर भ' गेलैक अछि। अनावश्यक विस्तार आ बन्धुरतो एतय नहि छैक। ओकर धड़कन कैक गुना अइ मे बढ़ि गेलैक अछि, की कहियह!'

          मुदा, दुर्भाग्य देखू जे ई उपन्यास छपबाक लेल यात्री जी एकटा मैथिली संस्था-- मिथिला सांस्कृतिक परिषद्, कलकत्ता-- कें देलखिन, जखन कि हुनका लग तहियो प्रकाशकक कोनो कमी नहि रहनि। मैथिली-संस्था सब, से चाहे सोसाइटी हुअय कि सरकारी, आइ पैंसठ बरखक बादो, कोनो ब्राह्मणजातीय-संगठन सं अलग किछु किनसाइते होइत अछि, भने नाम संग संस्कृति जोड़ल रहय कि चेतना। तहिया केहन परिस्थिति रहल हेतै तकर अनुमान सहजे क' सकै छी। जखन कि 'बलचनमा' की छल? एक शूद्रक संघर्षक कथा छल। एतबे नहि ने। ओ बलचनमेक भाषा मे लिखलो गेल छल, जकर नाम यात्री जी देने रहथिन-- 'शूद्र मैथिली'। आब कहू, ई चीज कतहु मैथिली संस्था छापय? ओ सब यात्री जीक खेखनी तं करै छला एहि लेल जे बड़ पैघ लेखक छी तं किछु मैथिली संस्थो पर दया करियौ। ई के जनै छल जे ओ शूद्र मैथिली मे लिखि क' पठा देता?

           12 बरस धरि जखन संस्था 'बलचनमा' कें नहि छापलक तखन यात्री जी उग्र भेला। मुदा ताधरि पांडुलिपि पूर्णत: नष्ट भ' चुकल रहै। यात्री जीक अपन देशव्यापी प्रतिष्ठा रहनि, तें संस्था पर दवाबो चारूभर सं बनि गेलै। हिन्दी बलचनमा ताधरि हिन्दीक प्रथम श्रेणीक उपन्यास-रूप मे मान्यता प्राप्त क' लेने रहय। लाचार संस्था कोनो अज्ञात अछरकटुआ सं एकर अनुवाद करौलक आ अन्तत: 1967 मे प्रकाशित क' देलक। मूल कृति मुदा विलुप्ते भ' गेलै। मोहन भारद्वाजक मानब छलनि जे अइ किताब पर जे 'मूल लेखक नागार्जुन' छपल रहै, से संस्थाबला सभक खचरपनी छल, मुदा हमर मानब अछि जे खचरपनी नहि, ई हुनका लोकनिक ईमानदारी रहनि। सत्य कें ओ लोकनि लिखित रूप मे स्वीकार क' लेने रहथि। अस्तु, यात्री जीक यैह आखिरी उपन्यास साबित भेलनि जे कि अपन मूल स्वरूप मे छपियो नहि सकल छल।

          ब्राह्मण लोकनि 'शूद्र' कहैत अयलनि अछि मुदा शूद्र लोकनि अपना कें अदौ सं 'पचपनिया' कहै छथि। पचपनिया अर्थात पचपन जाति, जकर वास्तविक अर्थ थिक बहूतो जातिक समुदाय। एही पचपनिया मैथिली मे 'गुलो' छपल अछि।

          एहि तरहें, साठि वर्ष पहिने यात्री सन महामना लेखकक हारल एक अभियान कें हमरा लोकनि सुभाष चन्द्र यादवक एहि उपन्यास मे आकार लैत देखैत छी। एकरा कोनो छोट घटना, जेना थोकक हिसाबें मैथिली मे किताब बहराइत अछि, कोना मानल जा सकैत अछि? जें कि सुभाष सन के विरल सिद्धहस्त लेखक के लिखल ई रचना थिक, (तखनहि तं यात्री-प्रसंग संग एहि ठाम तुलनीय मानलो गेल अछि,) केवल भाषे धरि बात नहि रहल। कलाक एक एहन दुर्लभ नमूना मैथिली उपन्यास कें हासिल भेलैक जाहि पर बहुत युग धरि गर्व कयल जा सकैए। 

          यात्री जी सन पैघ लेखक बुते जे काज 1955 मे करब पार नहि लागल छलनि से काज 2015 मे सुभाष क' सकला, एकर एक अर्थ इहो भ' सकैत अछि जे अइ साठि बरस मे मिथिला समाज बदलि गेल। कतबा बदलल? कोनहु भाषाक सृजेता लोकनि तं तहिना समाजक शीर्ष होइत छथिन जेना गाछ मे फुलायल फूल। ओ परिष्कृत परिशोधित होइत छथि आ अपन जीवनक एक उल्लेख्य भाग अपना कें डिकास्ट आ डिक्लास्ड करै मे लगबै छथिन। तें हुनका लोकनिक व्यवहार सं अहां सकल समाजक स्थितिक सही-सही मापन प्राप्त नहि क' सकै छी, एतय धरि कि मैथिली संस्थाक संचालक लोकनिक वा पुरस्कार वा लाभ-लोभ (अर्थ अछि चारू प्रकारक लाभ-- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सं लिखनिहार लेखको धरिक स्वास्थ्यक सही पता नहि पाबि सकै छी। 

          असल मे, सुभाष अपन उपन्यास 2014 मे पूरा क' लेने रहथि आ 'मिथिलादर्शन'क अक्टूबर-नवंबर 2014क अंक मे ई प्रकाशितो भ' गेल रहैक। अइ बीच मे दूटा मुख्य घटना घटलैक। एक तं ई जे उपन्यास पूरा कयलाक बहुत समय बादो धरि सुभाष अपन रचनात्मक आवेग सं बाहर नहि निकलि पाबि रहल छला। पैघ रचनाक सृजनोत्तर आवेगो पैघ होइत छैक। एही निकलबाक प्रयत्न मे ओ 'पचपनिया मैथिली' नामक अपन लेख लिखि लेलनि। ई लेख प्रकाशित होयबा सं पहिनहि एकर एक अंश सोशल मीडिया पर प्रकाशित कयल गेल छल। बिखिन्न-बिखिन्न प्रतिक्रियाक धर्रोहि लागि गेल। बाद मे ई संपूर्ण लेख 'पूर्वोत्तर मैथिल'क अंक मे प्रकाशित भेल। संपादकीय विमतिक प्रायोजना-स्वरूप कही कि स्वाभाविक धर्मरक्षा-स्वरूप, पैघ-पैघ प्रतिक्रियाक धर्रोहि ओतहु लागि गेल। अइ सब सं असलियत बूझल जा सकैत छल जे सकल समाज कतबा बदलल अछि आ कि केहन बदलल अछि। 

          दोसर घटना ई भेल जे 2015क भूकंपक समय मे कथानायक गुलो मंडल के देहान्त भ' गेलनि। सुभाष आ केदार गुलो मंडलक संग कोना जुड़ल छला, तकर प्रसंग केदार काननक एक लेख मे आयल छैक। गुलोक मरब सुभाषक लेल एक पैघ घटना छल आ ई अनेक तरहें हुनका प्रभावित केलकनि। एक प्रभाव तं छल जे एहि बातक प्रकरण उपन्यास मे आनब हुनका जरूरी क' देलकनि। समापित आ प्रसारित उपन्यासक गीरह फेर सं खोलल गेल, किछु तहिना जेना सारा मे गाड़ल गुलोक लहास कें फेर सं खोदि क' निकालल गेल छल। किसुन संकल्पलोक सं जे 'गुलो' छपल अछि, ताहि मे ई समुच्चा अंश अछि जखन कि 'मिथिलादर्शन'क पाठ मे ई नहि अछि। किनको लागि सकै छनि जे एहि अंश कें जोड़ब उपन्यासकलाक हिसाबें गैरजरूरी छल, जखन कि कोनो दोसर गोटे कें जरूरियो लागि सकैत छनि। असल मे अपन कथानायकक संग उपन्यासकारक संलिप्तता आ तादात्म्य कोन रूपक छनि, ई प्रश्न ताहि पर निर्भर करैत अछि। वाजिबे थिक जे एकर संपूर्ण अधिकार सुभाष कें छलनि जकर यथेप्सित उपयोग ओ क' सकैत रहथि।

          मैथिली साहित्य मे सुभाषक महत्व पर विचार करैत प्रसिद्ध आलोचक कुलानंद मिश्र कहियो लिखने छला-- 'मैथिली कथाक क्षेत्र मे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक बादे आरंभ भेल।' बुधियार कें इशारा काफी बला अंदाज मे अपन बात कहैत कुलानंद जी ओतय साफ नहि कयने रहथि जे ई 'एकटा निश्चित सीमा' की छल आ सुभाष कोन तरहें एकर 'अतिक्रमण' केलखिन। आब हमसब इतिहासक एहि पार आबि क' देखैत छी तं बूझि सकैत छी। 'मैथिली-साहित्य' जकरा हमसब कहै छी, विश्वास करू ओ विशुद्ध 'ब्राह्मण-साहित्य' नहि थिक जेना कि किछु लोक अपन लेखन सं आ अधिकतर अपन रणनीतिक(?) व्यवहार सं साबित करैत रहैत छथिन। ई जं कहबै जे तमाम विविधताक बादो मैथिली साहित्य अन्तत: जीवन-जगत कें देखबाक एक ब्राह्मण-दृष्टि मात्र थिक, सेहो कहब उचित नहि। जं किनको लगैत होइन जे नहि, यैह उचित थिक तं हुनका मैथिली लिखब छोड़ि क' कठिन प्रयत्नपूर्वक अपना कें कुसंस्कारमुक्त हेबाक साधना करबाक चाही।

         

Friday, September 2, 2022

राजकमल चौधरी का हिन्दी और मैथिली लेखन


 ।।राजकमल चौधरी का हिन्दी और मैथिली लेखन।।

तारानंद वियोगी से सुजीत वत्स का संवाद


सुजीत वत्स-- राजकमल चौधरी के अधिकृत विद्बानों में से आप एक हैं।साथ ही आपने उनकी मैथिली कविताओं के साथ -साथ हिंदी कविताओं का भी सूक्ष्म अध्ययन किया है। आपसे मेरा पहला प्रश्न है कि आप राजकमल की हिन्दी कविताओं और मैथिली कविताओं के संवेदनात्मक स्वरूप में क्या अन्तर महसूस करते हैं।


तारानंद वियोगी-- राजकमल ने जब मैथिली में कविताएं लिखनी शुरू कीं, उनका स्वर और शैली बिलकुल पारंपरिक थे। युवापीढ़ी के साथ जो नया उत्साह और नया तेवर आता है, वही केवल था और वह दुनिया को बदल डालना चाहते थे।

    पर जब उनकी आरंभिक हिन्दी कविताओं को देखें तो तो वहां भी हमें यही चीजें देखने को मिलती हैं।

    फर्क आगे जाकर पड़ा जब उनकी मैथिली कविताएं ग्रामीण सौन्दर्यबोध में पगी देखने को आईं और हिन्दी कविताएं नागरबोध में। शाक्ततंत्र का उन्हें अच्छा ज्ञान था, जो दोनों ही भाषाओं की कविताओं में जगह जगह पूरे फैलाव के साथ आए हैं। दूसरे यह कि मैथिली की काव्यपरंपराओं में यहां की सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप ही कई वर्जनाओं को पूज्यभाव से देखा जाता था। इन्हें राजकमल ने निर्दयतापूर्वक तोड़ा। इसलिए उनकी मैथिली कविताओं ने मिथिला के काव्य परिदृश्य में काफी हाहाकार मचाया। हिन्दी के काव्यपरिदृश्य के लिए यह चीज उस तरह नई नहीं थीं। यहां उन्होंने दूसरी कई चीजें तलाश लीं। 

    राजकमल का कवितावाचक एक बौद्धिक युवा है। यह मैथिली के लिए नई चीज थी। यात्री का कवितावाचक ग्रामीण किसान था। हिन्दी में बौद्धिक कवितावाचक का प्रवेश काफी पहले हो चुका था।

   भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जो महान आदर्श थे, उसने दूर तक राजकमल के कविव्यक्तित्व को प्रभावित किया था। लेकिन, उन आदर्शों के टूटने बिखरने की धमक राजकमल की तमाम कविताओं में पाई जाती है। इसलिए उनका जो कवितावाचक है, वहां एक टूटन भी है और दिशाहारापन भी, भले ही वह दुनिया को बदल डालने की मंशा रखता है। राजनीति उनकी कविताओं का एक जरूरी एंगल है। यह अलग बात है कि उनमें विचारधारागत स्पष्टता का अभाव है। यह हमें उनकी हिन्दी कविताओं में ज्यादा साफ दिखता है। अपनी मैथिली कविताओं में वह एक उप राष्ट्रीयता भी रखते पाये जाते दीखते हैं, जो कि उनका मैथिलत्व है।



सुजीत वत्स-कवि के साथ-साथ राजकमल को एक कथाकार के रूप भी जाना जाता है।एक कवि या फिर एक कथाकार दोनों  में से  किस विधा में  उनकी रचनाएँ ज्यादा  सशक्त है?


तारानंद वियोगी-- हिन्दी और मैथिली दोनों ही भाषाओं में काफी लोग ऐसे हैं जो राजकमल को एक कथाकार के रूप में ही ज्यादा सफल मानते हैं। यह मानने के अपने कारण भी हैं। याद रखने की बात है कि कहानी में सिद्धता के अपने अलग मानदंड हैं, और वे कविता से अलग हैं। कोई अच्छा कवि हो तो केवल इसी से यह तय नहीं हो जाता कि कहानीकार भी वह अच्छा होगा। कहना चाहिए कि राजकमल ने इन दोनों ही विधाओं में अलग-अलग सिद्धि प्राप्त की।

      अपनी जिस आवेगभरी भाषा के लिए वह जाने जाते हैं, वह गद्य और कविता दोनों में ही अपना कमाल दिखाती है। सामाजिक सरोकार उनकी कहानियों में ज्यादा स्पष्ट हैं। सामंतवाद का विरोध भी, और लैंगिक गैरबराबरी के खिलाफ गुस्सा भी। कहानियों के विषय उन्होंने ऐसे चुने जो समकालीन साहित्य की एक बड़ी रिक्ति भरते थे, और पाठक को एक नये संसार के सामने ला खड़ा करते थे। एक ऐसा संसार, जिसके बारे में या तो बहुत कम जानता होता था, या फिर इस तरह कभी सोचा तक नहीं होता था। 

      राजकमल की कही वह बात मुझे नहीं भूलती कि इतने लोगों ने कहानियां लिख लीं और लिख रहे हैं कि नया या मौलिक कथानक तो हमें अब मिलने से रहा। अब तो शैली ही एक बच गयी है जो हमें अपने समकालीनों में अलग दिखा सकेगी। अपनी आवेगमय भाषा में शैली का उन्होंने ऐसा चमत्कार रचा कि उन लोगों की बात को यूं ही उड़ा देना आसान नहीं है, जो राजकमल को कहानीकार के रूप में ज्यादा सफल पाते हैं।



सुजीत वत्स-राजकमल ने अपनी हिन्दी कविताओं में मिथकों का बहुत ही अधिक प्रयोग किया है।क्या मैथिली कविताओं में भी उन्होंने मिथकों का प्रयोग  उसी अनुपात में प्रयोग  किया है?एक प्रखर प्रतिरोधी कवि की कविताओं में मिथकों का इतना अधिक प्रयोग कविता की सम्पेषणीयता में बाधा तो नहीं है??


तारानंद वियोगी- हां, ये सही है कि अपनी कविताओं में मिथकों का प्रयोग उन्हें प्रिय था। और, यह हिन्दी और मैथिली दोनों ही भाषाओं की कविताओं में समान रूप से किया गया है। ब्राह्मणशास्त्रीय प्राचीन मिथक उन्हें प्रिय थे। इनका उपयोग अक्सर वह अपनी अभिव्यक्ति को धार देने के लिए करते। यह उनके कथ्य को अतिरेक में ले जाता था। अतिरेक में होना उनकी अपनी विशेषता थी और इसके लिए तरह तरह के प्रयोग करते रहते। कई बार तो बस चौंकाने या सामनेवाले को आक्रान्त कर जाने के लिए मिथकों को घसीट लाते। लेकिन, अध्येताओं ने पाया है, और गौर करें तो हम भी देख सकते हैं कि कि ये मिथक उनकी आत्मा की बेचैनी और मन की दुराशंकाओं की सटीक व्याख्या कर जाते थे। उनकी एक मैथिली कविता 'महावन' में आए पुराने पाकड़ वृक्ष की धोधर में बैठे पुरातन गिद्ध के रंग को कविता में देखने के बाद मणिपद्म ने यह आशंका व्यक्त की थी कि इस कवि की मृत्यु अब सन्निकट है। और आश्चर्यजनक रूप से यह आशंका सच साबित हुई थी। मतलब यह कि जो भी प्रयोग वह करते उसमें उनका आत्म गहरे तक निमज्जित रहता था।

Saturday, July 16, 2022

स्वतंत्रता संग्राम आ मैथिलीक संत साहित्य

 


तारानंद वियोगी

भारतीय स्वतंत्रता संग्रामक आदिस्रोत 1857क महाविद्रोह थिक। हम सब अवगत छी जे भारतक अनेको राजा-रजवाड़ा एहि संग्राम मे अंग्रेज (कंपनी) सरकारक विरुद्ध विद्रोह कयने छला। दिल्लीक बादशाह बहादुर शाह जफर तं एकर नायके रहथि। रानी लक्ष्मीबाइक कथा सब गोटे जनैत छी। इहो बात सब गोटे जनैत छी जे मिथिलाक महाराजा एहि विद्रोह मे अंग्रेजक पक्ष मे ठाढ़ छला। पक्षे टा मे नहि, विद्रोह कें दबेबाक लेल जे कंपनी सरकार कें मदति चाहियैक छल, हाथी-घोड़ा-सैनिक-हथियार-नगदी सब किछु सं अंग्रेजक सहायता कयने छला। मने भारतक एहि पहिल स्वतंत्रता-संग्राम मे मिथिला शामिल नहि छल। मुदा, की ई बात कहब सही हेतै? किन्नहु नहि। राजा आ प्रजा मे अंतर होइ छै, एहि ठाम तं शोषक आ शोषितक अंतर सेहो छल। साधारण प्रजाक लेल शोषकक एक रंग जं 'गोरा' छल तं दोसर रंग 'काला', जकरा आम भाषा मे अंग्रेज सब 'यू बस्टर्ड ब्लैक इंडियन' कहैक। मुदा, मिथिलाक महाराजोक तं यैह रंग छलनि।
             तिरहुत के इलाका मे जे एहि महाविद्रोहक असर रहलैक तकर दस्तावेजी विवरण आब 358 पृष्ठ मे प्रकाशित छैक। (गदर इन तिरहुत: ए डाक्यूमेन्टेशन, लेखक अशोक अंशुमान/श्रीकान्त, 2009) प्रसिद्ध मैथिल इतिहासकार डा. विजय कुमार ठाकुर अपन लेख 'तिरहुत मे 1857क आन्दोलन एवं तकर वर्गीय आधार: एक विश्लेषण' मे लिखैत छथि-- 'एहि विद्रोही व्यक्ति सब (जाहि मे सं अधिकांश कें फांसी वा कालापानीक सजाइ भेटलैक) मे सब सं धनवान जे व्यक्ति छला तिनका लग 150 टाका 4 आना मूल्यक संपत्ति छलैक। एहि सं ई स्पष्ट भ' जाइत छैक जे ई सब विद्रोही लोकनि समाजक कमजोर आर्थिक वर्गक सदस्य छलाह। एहि संदर्भ मे ई ध्यान रखबाक योग्य तथ्य अछि जे एहि क्षेत्रक सामन्त एवं राजा लोकनि ब्रिटिश शासनक तरबा चटैत रहलाह एवं 1857क स्वतंत्रता संग्राम कें दबेबा मे ब्रिटिश सरकार कें पूर्ण मददि देलथिन। एहि सं स्पष्ट भ' जाइत अछि जे एहि आन्दोलनक जड़ि समाजक निम्न आर्थिक वर्ग सं जुड़ल छलैक, नहि कि राजा-महाराजा एवं सामन्त सं। 1857क भारतीय स्वतंत्रताक प्रथम संग्रामक ध्वनि तिरहुत मे सेहो सुनल गेल जकर आधार छल कमजोर वर्ग एवं एकर दुश्मन छल तत्कालीन ब्रिटिशक पिछलगुआ सामन्त एवं महाराज लोकनि।' (मैथिली अकादमी पत्रिका, जनवरी-दिसंबर 2007)
             हमरा लोकनि कें ई नहि बिसरबाक चाही जे जकरा हम सब मैथिली साहित्य कहैत छिएक, तकर स्पष्टत: दूटा धारा अछि। एक तं ओ जकरा पंडित, इतिहासकार आ आलोचक लोकनि मैथिली साहित्य मध्य स्थान देलखिन, जकरा इतिहासबद्ध कयल गेल। दोसर इतिहास-वंचित धारा, जे मिथिलाक जन बीच तं पूरे पल्लवित-पुष्पित होइत रहल मुदा विद्वान लोकनिक आंखि ओहि दिस सं सदा मुनायल रहलनि। नव युगक जे अंखिगर मैथिली अध्येता लोकनि छथि तिनका लोकनिक अस्सल पुरुषार्थ एही इतिहास-वंचित जनसाहित्य कें उद्घाटित करब थिक।
             एकटा दृष्टान्त रखला सं बात बेसी फड़िच्छ होयत। ऐतिहासिक स्रोत सं हम सब अवगत छी जे जखन ब्रिटिश सरकार विद्रोह कें दबेबा मे सफल भ' गेल, तं विद्रोही सभक ऊपर जे बदला लेबाक कार्रवाइ शुरू भेल ताहि मे फिरंगी सेनाक द्वारा बीस लाख भारतीय प्रजाक हत्या कयल गेल छल। फिरंगी सेना द्वारा बदला लेबाक ई कार्रवाइ कोना कयल जाइत छल? चिह्नित गाम वा चिह्नित समूह पर अचानक सिपाही सभक धावा होइक आ जे पकड़ल जाय तकरा मारि दैक वा जिंदा पकड़ा गेल तं गामक कोनो उंचगर गाछ ताकि क' खुलेआम फांसी लगा दैक जाहि सं अंग्रेजक अकबाल जुग-जुग धरि बरकरार रहय, प्रजा भय मानय। जं हम कही जे मैथिली मे किछु कविता एहनो उपलब्ध छै जाहि मे एहि कार्रवाइक आंखिक देखल वर्णन कयल गेलैए तं अहां आश्चर्य सं भरि सकै छी।
             लक्ष्मीनाथ गोसांइ परसरमा गामक निवासी रहथि। हुनके गाम लग एक गाम अछि बैरो। ओहि गामक निवासी रहथि रंगलाल दास। दुनू समकालीन रहथि। दुनू वैष्णव संत रहथि। अंतर यैह रहल जे गोसांइ जी ब्राह्मण रहथि जखन कि दास जी यादव। तें मैथिली साहित्यक इतिहास मे लक्ष्मीनाथ गोसांइक बारे मे तं हम सब खूब पढ़ै छी मुदा बेसी लोक एहने हेता जे रंगलाल दासक नाम पहिले बेर सुनैत हेथिन। जखन कि एहि दुनू गोटेक बीच नीक संपर्क रहनि जकर साक्ष्य दुनू गोटेक रचनावली मे भेटैत अछि। 1857क विद्रोह ई दुनू गोटे देखने तं रहबे करथि, अपना-अपना तरहें एहि मे अपन योगदान सेहो देने रहथि। गोसांइ जीक प्रसंग आगू कहब, पहिने रंगलाल दास।
             एहन प्रतीत होइत अछि जे ब्रिटिश सिपाही सभक बदलाक टारगेट संत लोकनिक समूह बनैत छल। किएक बनैत छल होयत? जाहिर बात अछि जे ओ सब सरकारक किछु बिगाड़ने हेता। की बिगाड़ने हेथिन? संतक शक्ये कतेक? मुदा नहि। ओहि समय मे मिथिलाक जते संत लोकनि छला, सभक अपन-अपन भजनमंडली होइत छलनि। गोसांइ जीक अपन मंडली छलनि आ रंगलाल दासक सेहो। सरकारक खुफिया सूत्र ई कहैत छल जे जतय-जतय ई लोकनि भ्रमण करथि, ब्रिटिशक विरुद्ध विद्रोह लेल जनसमूह कें भड़कबैत छला। सब गोटे अवगत छी जे गोसांइ जीक एक शिष्य क्रिश्चियन जौन स्वयं ब्रिटिश छला। एहन कोनो कनेक्शन रंगलाल कें नहि छलनि। रंगलाल दासक भजनमंडली पर जे ब्रिटिश सिपाही सभक हमला भेल छल, ताहि बारे मे ओ एक मार्मिक गीत लिखने छथि। प्राय: ओ हुनकर अंतिमे रचना होयत। ओहि गीत मे पांती अबैत छैक--'हाय रे अल्ला, किदन भेला मीयां कहां दन गेला/ मनु सुतिहार पच्छिम गेला, फोचाइ गेला उत्तर को/ तबला सारंगी ढनमन भेला, ठीठर पड़ला अनमन मे/ जे जे आए फिरि फिरि जावे, जग मे रहिहें कोइ नांही/ सब शिष्य मिलि एकमत होइहें, रंगलाल सुमरहु मन मांही।' (रंगमाला भजनावली/ संपादक जगदीश यादव, 1972) रंगलाल दासक जीवनावधि 1802-1858 बताओल जाइत अछि। एहन प्रतीत होइत अछि जे अंग्रेज सिपाही सभक हमला मे स्वयं रंगलाल आ हुनकर शिष्य ठीठर पकड़ल गेला, आ शहीद भेला। गुमनाम शहीद। बीस लाख मे सं क्यो एक।
             एहि पांती सं एक बात इहो स्पष्ट होइत अछि जे वैष्णव संप्रदायक हिन्दू भक्त रंगलाल दासक एक प्रमुख शिष्य मुसलमान रहथिन। आइ ई बात विचित्र लागि सकैत अछि, मुदा स्मरण रखबाक चाही जे इतिहासबद्ध संतकवि लक्ष्मीनाथ गोसांइक चारि प्रमुख शिष्य सब मे सं एक मोहम्मद गौस खां सेहो मुसलमाने छला। ई प्रसंग अनेक किताब सब मे लिखल भेटत। सत्य यैह छल। समाज एहिना संग-संग मिलि क' जिबैत छल। मुसलमानक अवतारी पुरुष मीरा साहेब, बालापीर आदिक मैथिली गाथा अछि आ हिनका सभक पूजा हिन्दुओक घर मे होइत अछि, आइयो। भारतीय स्वतंत्रता-संग्रामक जे सब सं पैघ आदर्श छल से यैह हिन्दू-मुस्लिम एकता छल। 1858 सं ल' क' 1947 धरि अंग्रेज शासक कोना एहि एकता कें तोड़बाक प्रयास करैत रहल आ अंतत: सफल भेल, तकर कथा आधुनिक भारतक इतिहास सब मे भरल पड़ल अछि।
             आर्य समाजक संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वतीक सम्बन्ध मे ई बात जगजाहिर अछि जे गदर के समय मे ओ लगातार तीन वर्ष धरि भूमिगत रहि क' अवधक इलाका मे किसान सभक बीच विद्रोहक बीज वपन करैत रहला। आगू जं ओ बचल रहला तं तकर कारण हुनकर मौन आ कार्य-परिवर्तन छलनि। ठीक यैह बात हमरा लोकनि लक्ष्मीनाथ गोसांइक संग देखैत छी। ऐतिहासिक दृष्टि अपना क' वास्तविक जीवनी जकरा कहल जाय से तं मिथिला मे लिखले नहि गेल। समुच्चा जीवन-प्रसंग कें मिथक, किंबदन्ती, दन्तकथा आ चमत्कारकथा सं भरि देल गेल। आब तं ओ समय तते दूर आ तिमिराच्छन्न भ' गेल अछि अछि जे वास्तविक तथ्य धरि पहुंचब असंभव भ' गेल अछि। लक्ष्मीनाथक रचना सब कें देखी तं ई बात स्वत: स्पष्ट छैक जे ब्रिटिश शासन-व्यवस्थाक ओ आलोचक रहथि। अपन एक पद मे ओ अंग्रेज शासक लेल 'पामर' शब्दक प्रयोग केलनि अछि-- 'पामर राज करत एहि पुर पर।' तहिना, अंग्रेजक पिछलगुआ जमींदार सभक विरुद्ध हुनकर अनेको पद मे निंदात्मक कथन कयल गेल अछि।
             'लक्ष्मीनाथ गीतावली'क संपादक पं. छेदी झा द्विजवर अपन भूमिका मे गोसांइ जीक चमत्कारकथा सभक भरपूर वर्णन करितो ई बात लिखबा सं अपना कें नहि रोकि सकला जे गोसांइ जी कें जहलक सजाइ भेल छलनि। यद्यपि कि ओ एहि घटना कें नेपाल मे घटित भेल बतबैत छथि, मुदा इहो बात संग-संग लिखैत छथि जे भारत मे ओहि समय मे महाविद्रोह मचल छल। गोसांइ जीक जेल जायब आ जेल सं छूटब आइ महा चमत्कारिक कथा जकां सुनाओल जाइत अछि। मुदा, एहि बातक अनुमान करब कठिन नहि जे ओ विद्रोहे भड़कबैत पकड़ल गेल छल हेता आ अपन अंग्रेज शिष्य जौन साहेबक प्रयास सं जमानत पर छूटल हेता।
             1857क स्मृति कोना मिथिलाक जन-समाज मे विविध रूप लय जीवित रहल तकर एक प्रसंग राम प्रकाश शर्मा अपन पुस्तक 'मिथिला का इतिहास' मे लिखने छथि। लिखलनि अछि जे समस्तीपुर जिलाक बालक लोकनि कबड्डी खेलैत काल एखनो एहि पदक प्रयोग करैत छथि। एक दल अंग्रेज बनैत अछि। ओ दल पद पढ़ैत अछि-- 'अमर सिंह के कमर टूटलनि, कुंवर सिंह कें बांहि/ पुछियनु ग' दलभंजन सिंह सं आब लड़ता कि नांहि।' बालक सभक दोसर दल राष्ट्रभक्त विद्रोही बनैत अछि। ओ उतारा दैत अछि-- 'हाथी बेचब, घोड़ा बेचब, सिपाही कें खुआयब/ लड़ब नै तं करब की, नाम की हंसायब?' तहिना, इतिहासकार डा. रत्नेश्वर मिश्र अपन पुस्तक मे पूर्णियां जिला मे प्रचलित एक कबड्डी-फकड़ाक चर्च कयने छथि। ओहि मे अबैत छैक-- 'चल कबड्डी आरा/ सुलतानगंज को मारा।' रत्नेश्वर बाबू एहि फकड़ाक सम्बन्ध विद्रोही लोकनिक द्वारा सुलतानगंज(भागलपुर) मे अंग्रेज सैनिक पर विजय प्राप्त करबाक संग जोड़ैत बाबू कुंवर सिंहक सहायता लेल आरा दिस प्रस्थान करबाक आह्वान संग जोड़लनि अछि। एहि सं हम सब बूझि सकै छी जे एहि ठामक प्रजाक स्टैन्ड राजा-महाराजाक स्टैन्ड सं कोना भिन्न छल।
             चन्दा झा कें मैथिलीक आधुनिक साहित्यक प्रवर्तक कहल जाइत छनि। स्वतंत्रता संग्रामक संदर्भ लैत जं देखी तं चन्दा झा अपना युगक असगर कवि छला जे एहू विषय पर लिखबाक साहस केलनि। हुनकर प्रसिद्ध पद सब गोटे जनैत छी जे
             न्यायक भवन कचहरी नाम
             सब अन्याय भरल तेहि ठाम
             सत्य वचन बिरले जन भाख
             सब मन धनक हरण अभिलाख
                     ई अंग्रेजक न्यायव्यवस्थाक यथातथ्य वर्णन अछि, जखन कि संभ्रान्त लोकक नजरि मे अंग्रेज एक न्यायप्रिय जाति होइ छल। ओ लिखलनि- 'गैया जगतक मैया हे भोला, कटय कसैया हाथ/ हाकिम भेल निरदैया हे भोला, कतय लगायब माथ?' ई हाकिम लोकनि अंग्रेज सरकारक अमला छला, जे भ्रष्टाचार मे आ बदला लेबाक कार्रवाइ मे आकंठ मग्न छला। मुदा इहो मोन रखबाक चाही जे हुनकर एहन कविता सब हुनकर पोथा मे बन्न रहल आ हुनका जिबैत जी प्रकाशित नहि भेल छल। अपन हिन्दी कविता मे तं ओ एहू सं आगू धरि बढ़ला, मुदा ओहो सब आइयो धरि अप्रकाशित अछि। हुनकर सीमा छलनि जे ओ दरभंगाराजक चाकर छला आ दरभंगाराज अंग्रेज सरकारक। मैथिलीक मुख्यधाराक काव्यपरिदृश्य मे हमरा लोकनि सब सं आगू धरि छेदी झा द्विजवर कें जाइत देखैत छियनि जे 1923 मे 'कोइली दूती' प्रकाशित करौने छला।  तकर दंडस्वरूप अंग्रेज सरकार जे हुनकर दशा केलकनि से एक भिन्न प्रसंग थिक, मुदा सब सहैतो सब सं आगू धरि बढ़ला वैह। 'कोइली दूती' मे हरिपुर इलाका, जतय अंग्रेज कोठीपति सभक बास छल, के वर्णन करैत द्विजवर लिखै छथि--
             उजर उजर बक बसइछ बड़ बद
             लगहि दछिन खलपति हे कोइलिया।
             तकरा सड़क पर धरब चरण नहि
             नहि तं होयत दुरगति हे कोइलिया।।
                        बीच मे मोन पाड़ि दी, ई 1923 ईस्वीक लिखल पांती छी जखन खास-खास स्थलक लेल कानून रहैक जे इंडियन्स एंड डाग्स आर नाट एलाउड। एम्हर खून खौलैत छनि एहि युवा कविक--
             कियो तिय करथि प्रसव नहि वीरपुत्र
             ओहि देश ओहि पुर प्रान्त हे कोइलिया।
             जनिका सं ओहि खलपतिक हृदयमद
             होइन्ह सकलविधि शान्त हे कोइलिया।।
                       द्विजवर कें हम सब सं आगू बढ़ल कवि एहि लेल कहैत छियनि जे अंग्रेजक बारे मे जे रेखा चंदा झा घीचि देलनि-- विचारो बाबू, राजा है अंगरेज/ चलो ऐन ओ न्याय-धरम से, करो मिजाज न तेज/ कितना अन्यायी को दीन्हों कालापानी भेज/ रक्षा-दक्षा पुलिस खड़ी है, सदा रखो परहेज।' -- यैह मानू मिथिलाक संभ्रान्त कवि-समाजक सीमारेखा भ' गेल। मैथिल महासभाक नीति-निर्देशक सिद्धान्त सब मे पहिले नंबर पर छल-- राजभक्ति। एहि राजभक्ति कें बनौने रखैत तत्कालीन मैथिल कवि लोकनि भरि-भरि मोन अपन देशक महानताक गीत गबैत रहला। देश, जकर दूटा अर्थ छल-- पहिल तं मिथिला, दोसर किछु गोटे लेल भारत।
                       आब एक बेर फेर हमरा लोकनि मैथिलीक संतसाहित्य दिस उनटि क' ताकी। किछु गनल-चुनल महात्मा कें भने मैथिली साहित्यक इतिहास मे शामिल क' लेल गेल हो, मुदा कुल्लम राय यैह बनैत अछि जे कर्मकांडी रंग मे रंगल मैथिली लग वैष्णवभक्तिक लेल कोनो स्थापित निकष नहि छलैक। एकर कारण सब पर चर्चा करी तं विषयान्तर होयत। ताहि सं नीक जे संतसाहित्य मे जे स्वतंत्रताक छटपटाहटि व्यक्त भेलैक अछि, तकर किछु आर रंग सब देखाबी। 1857क महाविद्रोहक समय एक आर संतकवि मैथिली मे लिखि रहल छला। मधुरा गामक निवासी रामसिनेही दासक जीवनकाल 1819-1906 छनि। हुनकर अनेको रचना मे अंग्रेजी दासताक प्रति वैह उत्कट घृणा, वैह प्रबल विद्रोह देखाब दैत अछि जकर एक रूप हम सब द्विजवर जीक आरंभिक रचना मे पबैत छी।
                       रामसिनेही दासक एहि गीत कें देखल जाय जाहि मे ने केवल ब्रिटिश राजक अनीति-अत्याचारक वर्णन भेल अछि अपितु दरभंगा महराज पर सेहो शानदार कटाक्ष कयल गेल अछि--
        सीतापति रामचंद्र कोसल रघुराई।।
        विप्र वेद धेनु संत दुखित सकल जीव जंत
        मैथिल नृप ज्ञानवंत विपति-घटा छाई।।
        ब्रिटिश राज करत पाप जनगण बीच बढ्यो दाप
        आबि आब हरहु ताप सत्वर सुखदाई।।
        सबल सुअन भयो मंद देश को दय फटक फंद
        मुंह कान करयो बंद गोरा कटकाई।।
        कहत रामसिनेही दास मारहु खल श्रीनिवास
        हरहु त्रास एक आस चरण केर सांई।।
                     ध्यान राखल जाय जे यैह ओ समय छल जखन मिथिला मे आ मैथिली साहित्य मे रामभक्तिक प्रचलन आरंभ भेल छल। मोहन भारद्वाज अपन एक लेख मे ओहि परिस्थिति सभक व्यापक अध्ययन प्रस्तुत कयने छथि। जमींदार लोकनि तं अपन शोषणमूलक सत्ता कें अनामति रखबाक लेल ठाकुरवाड़ीक स्थापना कयने रहथि, मुदा संत लोकनि रामभक्ति कें अपन सर्वस्व किएक बनाओल? अंग्रेजक अन्यायी शासन अभेद्य आ अच्छेद्य छल। के एकर अंत करितथि? संत लोकनिक तं अपन सीमा होइत छनि। हुनका सब सं स्फुरणा आ प्रेरणा ग्रहण क' सोच तं बदलत समाजक, क्रान्ति तं करता युवा लोकनि, मुदा अपने ओ तं सबटा निवेदन भगवान रामे सं करथिन। अहां देखि सकैत छी जे मैथिली साहित्यक ऐतिहासिक विकास कें रेखांकित करबाक लेल ई कविता कतेक बेसी महत्वपूर्ण अछि। मुदा, बहुत खेद होयत ई देखि क' जे एकर चर्चा कतहु नहि, कोनो संकलन मे ई शामिल नहि, एतय धरि जे स्वतंत्रते पर एकाग्र कवितासंग्रह 'स्वातंत्र्य-स्वर' (संपादक चंद्रनाथ मिश्र अमर) मे सेहो नहि।
                     अपन एक दोसर कविता मे रामसिनेही कहैत छथि--
         राम कहैत रहू, राम कहैत रहू, राम कहैत रहू भाई
         गोरा म्लेच्छ विधर्मी बढ़लै, चहुंदिस खल समुदाई।
         एहि कलिकाल और किछु साधन चलतै नै चतुराई
         निशिवासर सीतावर सुमिरहु रावणारि रघुराई।।
                      राम कें जे एतय रावणारि कहल गेल छनि, हम  ध्यान दियाब' चाहब जे रामक यैह रूप मैथिली मे रामभक्ति-साहित्यक प्रादुर्भाव के प्रस्थानविंदु थिक। गीतक अंतिम पांती मे तं ओ साफ कहै छथि-- 'से शासन बिनसाबथि श्रीपति अपनहि आबि सहाई।'
                      एक एहन तिमिराच्छन्न समाज मे, जतय राजा स्वयं अन्यायी-अत्याचारीक वशवर्ती बनल हो, आ संभ्रान्त समाज अंग्रेजक यशगान करैत अपन मिथिला देश कें महान घोषित करबा मे अपस्यांत हो, मिथिलाक संत लोकनिक द्वारा अंग्रेजी शासनक कटु निन्दा करब, आ ओकर विनाश लेल आह्वान करब एक पैघ बात थिक। ई विषय जें कि साहित्येतिहास मे उपेक्षित रहल अछि, तें नव-नव दृष्टिक अध्येता लोकनि कें एहि दिस प्रवृत्त हेबाक चाहियनि।

Tuesday, July 12, 2022

ओ तीनू कथा (मुक्ति, फुलपरासवाली आ रंगीन परदाक संग-संग अध्ययन)

 


तारानंद वियोगी


मैथिली कथा-साहित्य मे आधुनिकताक आलोड़न-विलोड़न मे एहि तीनू कथाक युगान्तरकारी प्रभाव अछि-- ललितक कथा 'मुक्ति', राजकमल चौधरीक कथा 'फुलपरासवाली' आ लिली रेक कथा 'रंगीन परदा'। मुक्ति आ फुलपरासवाली वैदेही मे 1955 मे छपल, जखन कि ठीक अगिला साल ओही पत्रिका मे लिली रेक 'रंगीन परदा' प्रकाशित भेल। 'मुक्ति' जं सेर बनि क' आयल छल तं 'रंगीन परदा' सेर पर सवा सेर साबित भेल। सबतरि हाहाकार मचि गेल छल। मैथिली कथा मे स्त्री तं शुरुहे सं आबि रहल छली, व्यक्तित्ववान स्त्रीक सेहो आगमन भ' चुकल छल। मुदा आधुनिक स्त्री-विमर्शक जाहि नैरेटिव ल' क' लिली रे आयल छली ओ अभूतपूर्व रहय। एहि संभाव्य हाहाकारक पक्का अंदेशा स्वयं लिली रे कें सेहो छलनि आ तें एकर प्रकाशन ओ कल्पना शरणक छद्मनाम सं करौने रहथि। कथा एते प्रभावशाली रहय जे ओहि युगक सभक सब सिद्ध-प्रसिद्ध प्रयोगवादी लेखक लोकनि एहि अज्ञात नामधारी लेखिका कें पत्र लिखि संवर्द्धना केलखिन। ई सब पत्र आब प्रकाशित अछि।

              ललितक कथा मुक्ति मूलत: स्त्रीक यौन-आकांक्षा(Libido)क कथा थिक। सब माने मे नीक व्यक्तित्व, उत्तम कुलशील, सम्यक संस्कार वाली स्त्री शेफाली एहि कथाक नायिका थिकी। पूर्णयौवना, मुदा जनमरोगी पति हुनकर यौनाकांक्षा कें पूरा करबा मे असमर्थ। तथापि पति-पत्नीक बीच स्नेह, सद्भाव आ विश्वास उत्तम। मुदा, अवसर भेटला पर शेफाली एकटा बदनाम आ असंस्कृत रसिक, जे कि मामूली दरबान थिक, ओकरा संग पड़ा जाइत अछि। भागबाक काल ओ जे अपन पति कें पत्र लिखैत अछि, से ई-- 'स्वामी, एखन तं सरिपहुं छोड़ि क' जा रहल छी... मुदा जं कहियो लौटक आकुलता हएत तं प्राय: अहां कें अपना लेल फूजल पाएब।-शेफाली।'

              एकटा बात एतय साफ क' दी जे 'मुक्ति' स्त्रीविमर्शक कथा नहि थिक, जेना कि बहुतो गोटे मानैत रहलाह अछि। कोनो रचना कें स्त्रीविमर्शक रचना हेबाक लेल न्यूनतम शर्त थिक जे ओ स्त्री-दृष्टिक पक्षकार हो। एहि कथा मे तं एकर साफ उनटा अछि। ई पुरुष-दृष्टि सं लिखल गेल, स्त्री-पुरुष-सम्बन्धक परिप्रेक्ष्य मे पुरुष कें उदार आ वफादार आ स्त्री कें स्वार्थी आ बेवफा साबित करैत कथा थिक। कथावाचक जे छथि से स्वयं एक लोलुप पुरुष थिका जिनका मनोलोक कें बेर-बेर यैह बात मथैत रहैत छैक जे शेफाली कें जं परपुरुषे चाहिऐक छलै तं ओ एते लो प्रोफाइलक ओहि चौबे दरबान कें किएक चुनलक, हाइ प्रोफाइल बला एहि कथावाचक महोदय कें ने किएक अवसर देलक। ई तं केवल स्त्री जनैत अछि जे जे चीज ओकरा चाहिऐक से कोन पुरुष लग भेटि सकैत अछि। जं ई कथा स्त्री-दृष्टि सं लिखल जाइत तं एहि प्रश्नक उत्तर एहि मे जरूर भेटैत, एहि तरहें महाप्रश्न बनि क' ई बात सौंसे कथा बीच घुरियाइत नहि रहैत जे आखिर वैह 'असभ्य' चौबे किएक शेफाली कें पसंद छलनि?

              असल मे एहि कथाक महत्व दोसर कारण सं अछि। हम सब अवगत छी जे फ्रायड आ मार्क्स, एहि दुनू दार्शनिक महापुरुषक सिद्धान्तक मैथिली साहित्य मे आगमन छठम दशक मे भेल। एहिठाम प्रसंगवश इहो कहि दी जे बीसम शताब्दीक विश्व कें आमूलचूल बदलि देनिहार चारि महापुरुष-- मार्क्स, फ्रायड, गांधी आ आइंस्टीन-- मे सं फ्रायड एक महत्वपूर्ण व्यक्ति छला जिनका आधुनिक मनोविज्ञानक जनक कहल जाइत छनि। हुनके एक सिद्धान्त छनि--लिबिडो अर्थात यौनेच्छा। फ्रायड देखौलनि अछि जे यौनेच्छा एक अनिवार्य जैविक आवश्यकता थिक जे ओना तं सामाजिक सांस्कृतिक आर्थिक आदि स्थिति पर अवश्य निर्भर करैत अछि मुदा ई स्वयं मे तते बलशाली ऊर्जा होइछ जे सभ्यता-संस्कृति आदिक डंटा सं एकर निवारण कदापि संभव नहि भ' सकैत अछि। फ्रायड यद्यपि अपन व्याख्या मे एकरो संभावना देखौलनि जे ई यौनेच्छा दमित (suppressed) सेहो भ' सकैत अछि आ उदात्तीकृत (sublimated) सेहो। मुदा, से भिन्न वस्तु होइछ आ एहि कथाक प्रसंग मे तकर कोनो सोह नहि छैक। लिबिडो कोन तरहें काज करैत अछि आ सबटा संस्कृति-सभ्यता कें पल भरि मे मटियामेट कोना क' दैत अछि, 'मुक्ति' मे तकर खिस्सा आयल अछि। मिथिलाक संस्कृति मे 'नीच' पुरुष संग यौन-सम्बन्ध बनौनिहारि अथवा ओकरा संग उढ़रि जाइ वाली स्त्री शेफाली कोनो पहिल स्त्री नहि छलीह। एहि ठाम तं एकटा उक्तिकविता (फकड़ा) प्रसिद्ध रहल अछि, जकर महत्वपूर्वक उल्लेख काञ्चीनाथ झा किरण कयने छथि जे 'बाबूक धियापुता बाधबोन बौआय/ बौआसिनक धियापुता मचिया बैसि अगराय।' मैथिल संस्कृतिक थाह नहि रखनिहार लोक कें ई कविता सुनि क' नहि समझ मे अयतनि जे बाबू आ बौआसिन जखन पति-पत्नी थिका तं दुनूक संतान तं एक्के भेलै, तखन ओकर भवितव्य अलग-अलग किए बताओल गेल छै! यैह लिबिडोक कमाल थिक। बाबू जं अपन यौनतृप्ति खवासिन सं पबैत छथि तं बौआसिन सेहो सुविधापूर्वक अपना काजक योग्य खवास ताकि लैत अछि। एहना मे तं स्वाभाविक जे बाबूक धियापुता कें खवासिन जन्म देत आ ओकर भवितव्य खवासक स्थिति सं प्रभावित रहतैक, तहिना खवासक संतान कें बौआसिन जन्म देती आ ओ मचिया बैसल अगरायत। गौर करी, 'मुक्ति' कथा मे सेहो एक प्रमुख पात्र कुंजी खवास छथि, मुदा ओ बूढ़ छथि, बीसो बाबू कें कोरा कांख खेलेने छथि, एतय धरि जे बीसो बाबू कें हुनके टा डर होइत छनि, हुनकर कहल ओ नहि टारि सकै छथि। एहि सब कारण सं लिबिडोक परिदृश्य सं ओ बाहर छथि।

              एहिठाम डाकक एक वचन मोन पड़ैत अछि-- 'उढ़री बहु ले जे नर रोबय/ धोकड़ी मारि भूमि पर सोबय/ बाट चलैत ताकय नहि घूरि/ कहय डाक ई तीनू बूड़ि।' जानि नहि, कै शताब्दी सं ई कविता मिथिला मे प्रचलित छै। उढ़री बहु लेल नहि कनबाक चाही। कथानायक बीसो बाबू नहि कनैत छथि। बरु प्रसन्न होइ छथि जे अस्पताल मे भरती भ' क' इलाज करेबाक बंधन सं आब मुक्त भेला। मुदा, ओ जे शेफाली विदा कालक पत्र मे अंतिम वाक्य लिखने छली, 'जं कहियो लौटक आकुलता भेल तं अहां कें प्राय: अपना लेल फूजल पायब', आश्चर्यजनक छै जे ओ अपन पति कें बिलकुल ठीक चिन्हने छली। स्त्री अधिकतर पुरुष कें ठीके चिन्हैत अछि, पुरुषे बीच बाट मे अपन पंथ बदलि लैत अछि, तकर साक्ष्य विद्यापतिक स्त्री-विषयक गीत सब मे भरल अछि। बीसो बाबू इलाज छोड़ि देता आ कुपथ्य करता तं छव मासक बाद जीवित बचल रहता की नहि, कहब मुश्किल। मुदा, ओ कथावाचक कें, विदा होइत काल कहै छथिन-- 'आलूक दम्म जं खेबाक हो हुनका(शेफालीक) हाथें, तं छव मासक पश्चात दरसन दी। गाम हमर स्टेशनक भिड़ले अछि।' माने एहू मरदे कें बूझल छै जे ओहन बुद्धिशालिनी कें चौबे छव मास सं बेसी छेकि क' नहि राखि सकत। बरु इहो बात निस्तुकी छै जे शेफाली जं घुरि क' अयती तं ई बीसो बाबू राजा राम जकां ओकरा सीता-वनवास नहि देथिन, नैका बनिजारा जकां सप्रेम अपनेथिन। बीसो बाबूक व्यक्तित्व औदार्य आ औदात्य सं भरल अछि। जानि नहि किए, स्त्रीक लिबिडो कें जगजगार करबाक हेतु ललित कें पुरुषक व्यक्तित्व कें एते ऊंच उठायब जरूरी लगलनि! संभव जे सर्वथा नव आ विद्रोही विचार कें हाहाकार मचा दैबला तरीका सं व्यक्त करबाक लेल हुनका ई चीज जरूरी लागल होइन। जेना उजरा बैकग्राउन्ड पर करिया रंग बेस फबैत छैक।

              मुदा, यैह चीज राजकमल चौधरी कें नापसंद भेलनि। राजकमल घोर प्रतिक्रिया मे आबि गेला आ एकर प्रतिकार करैत ओ जे कथा लिखलनि, सैह 'फुलपरासवाली' छल। 'फुलपरासवाली' मे बात आयल छैक जे नहि, पुरुष महान नहि भ' सकैत अछि, खास क' क' स्त्री-पुरुष-सम्बन्धक मामला मे तं किन्नहु नहि। कहबाक लेल भने पुरुष पंडित-पुत्र हो, जेना कि एहि कथाक नायक अछियो, मुदा थोड़बे अवसर आ सुविधा भेने ओ पतित, अति पतित भ' जाइत अछि, जेना कि एहि कथा मे भेल अछि। एहि कथा मे राजकमलक कहब छलनि जे महान स्त्री होइत अछि, जेना कि फुलपरासवाली भौजी छली। रिक्शाचालक बिलट भाइ दारूक निशां मे अपन साथी रिक्शावला कें छूरा भोंकि दैछ, पुलिस ओकरा पकड़ि लैत छैक आ सात वर्षक सजाइ मे ओ जेल चलि जाइत अछि। भौजी पटना नगर मे एसगर बचि गेली अछि आ कथावाचकक घर मे रहै छथि। मुदा, बात तं होइ छल लिबिडो के। लिबिडो एहि मे कतय छै? असल मे कथावाचक अपन स्त्री संगे रहै छथि। हुनका स्त्री कें फुलपरासवाली संगें बहुत मेल। मुदा, थोड़ दिन बितैत-बितैत होइत ई छै जे फुलपरासवाली कथावाचकक प्रति आकृष्ट हुअय लगैत अछि। हरदम नजरि मे बनलि रहय, हरदम हिनका मुग्ध कयने रही, ताहि तरहक ओकर चेष्टा रहैत छैक। कथावाचक एहि बात कें गमि जाइत अछि आ एहि मे ओकरा कोनो हरजो नहि बुझना जाइछ जे हुनकर परवरिश ई करथि आ तकरा बदला मे ओ यौनसुख प्रदान करथि। ओ अपन डेग आगू बढ़बैत एक दिन ओकरा गंगाकातक एकान्ती मे ल' जाइत अछि। मने सब तय-तसफिया भइये जाय। ओतय जे होइत छैक, से सबटा आशाक विपरीत। ओ कहैत अछि-- 'अहांक भाइक लेल सात बरख की सात युग हम प्रतीक्षा मे बिता देब।' तखन ओ सब की छल? एकसर राति मे परपुरुषक निकट एबाक कामना? ओ कहैत अछि-- 'ओ सब क्षणिक दुर्बलता छल।' आखिर होइत ई छैक जे भौजी पटना नगर छोड़ि क' देहातक अपन गाम घुरि जेबाक निर्णय करै छथि। कथाक अंत मे राजकमलक निष्कर्ष छनि-- 'जाबत फुलपरासवाली जीबैत छथि, बीसो बाबूक स्त्री शेफालीक जन्म नहि भ' सकैत अछि। जं शेफाली कें जन्मेबाक हो तं मिथिलाक गाम-गाम मे प्रतीक्षाक नोर खसबैत असंख्य फुलपरासवालीक हत्या कर' पड़त।'

              राजकमलक एहि कथा मे तर्कसंगतिक स्पष्ट अभाव देखना जायत। ओ एहि ठाम पवित्र मैथिल संस्कृतिक संरक्षक बनल तहिना देखाइ दैत छथि जेना अपन लोकप्रिय कथा 'ललका पाग' मे। असल मे, ई बात हम 'जीवन क्या जिया' मे लिखनहु छी जे राजकमलक पक्ष-निर्धारणक ओ अनस्थिरताक दौर छल आ तें जे राजकमल अन्तत: अपन स्त्री-दृष्टिक लेल विख्यात छथि, ई दुनू कथा(फुलपरासवाली आ ललकापाग) तकर प्रतिकूल अछि। कहल जाय जे हुनकर संपूर्ण लेखनक बीच ई दुनू कथा हुनकर 'विचलन' थिक। एना किएक भेल, तकर कारण छल जे ठीक ओही समय मे ओ मैथिली मे कथा लिखब शुरू कयने छला। सब भाषाक साहित्य-लेखनक अपन-अपन आभामंडल होइ छै जाहि सं बाहर ओकर लेखक नहि जा पबैत अछि, वा जं तकर विस्तार कइयो सकय तं से परिपक्व भेलाक बादे होइत छैक। नवागन्तुक कथाकार कें ई कथा लिखैत एहि मलाल सं भरल देखल जा सकैत अछि जे ई सब अनर्गल चीज जं होइतो हो तं से मिथिलाक बाहरे भ' सकैत अछि।

              कथाकारक मनोलोक कें बुझबाक चेष्टा करी तं लिबिडो के जं ओ विरोध करै छथि तं आखिर समर्थन कथीक करै छथि? लिबिडो तं, फ्रायडक अनुसार, तते प्रबल ऊर्जा छैक जे ओकर विरोध करबाक कोनो अर्थे नहि बनैत अछि। सुरुहे मे कहने रही जे फ्रायड दूटा स्थिति बतौने रहथि--सप्रेशन आ सब्लिमेशन, जाहि मे लिबिडो परिवर्तित भ' सकैत अछि। सब्लिमेशन तं तते ऊंच बात भेलै जे तकर कल्पनो एतय अनर्गल होयत। तखन तं सप्रेशन, काम-ऊर्जाक दमन। स्त्री कें भूत लगतैक, ओकरा पर देवी सवार हेतै, ओ हिस्टीरियाग्रस्त होयत, बताहि होयत, ओ आत्महत्या करत। जं से नहि तं बेर-बेर बलात्कारक शिकार बनैत रहत। मिथिलाक संस्कृति पवित्र अछि। एतय ई सब चलि सकैत अछि, मुदा मुक्ति मे जेना ललित देखौलनि, से नहि भ' सकैत अछि। राजकमल तं साफ लिखलनि अछि जे मुक्ति पढ़ि क' ओ तते आवेग मे आबि गेला जे वैदेहीक अंक(जाहि मे मुक्ति छपल छल) हुनका हाथ सं छूटि नीचां सिमटी पर खसि पड़ल। ई आम मैथिल संभ्रान्त संस्कृतिक आग्रह छल जकर राजकमल प्रतिनिधित्व क' रहल छला।

              लिली रेक कथा 'रंगीन परदा' एहि दुनू कथा सं सर्वथा भिन्न अछि। ई मैथिली कथाक इतिहास मे, स्त्री-विमर्श पर सुस्पष्ट रूप सं लिखल पहिल कथा छल। स्त्रीक दृष्टि ओकर अपन दृष्टि होइत छैक जे सदति पुरुष-दृष्टिक पिछलगुए बनि क' चलय तकर गारंटी नहि रहैत छैक। ओकर अपन व्यक्तित्व होइछ आ से कतेको बेर पितृसत्ता सं टकराइत छैक। स्त्रीक देह ओकर अप्पन संपति छिऐक, ओहि पर पुरुषक दावेदारी सदा सं संभ्रान्त संस्कृति मानैत आयल अछि। स्त्री चाहय तं एहि दावेदारी कें चकनाचूर क' सकैत अछि। स्त्रीक संसार जे होइत छैक से पुरुषक संसार सं भिन्न होइत छैक। हमर एक कविता मे ई पंक्ति अबैत छैक-- 'स्त्रीक एक दुनिया ओकरा भीतर/ एक दुनिया ओकरा बाहर/ भीतर किसिम-किसिम के फूल फुलबाड़ी/ बाहर एक-एक डेग संकट सं भारी।' ई स्त्रीक कंडीशनिंग पर निर्भर करैत छैक जे एहि दुनू दुनियाक बीच संतुलन बना क' ओ कोना चलैत अछि। 'रंगीन परदा' मे एहि सब कथू कें हमरा लोकनि ठाम-ठाम रूपायित भेल देखि सकै छी।

              'रंगीन परदा' मे स्त्री-अनुभूतिक जे प्रामाणिकता छैक से आन कथा सं एकरा अलग करैत अछि। निपट किशोरावस्था मे जे पुरुष मालती कें संसार मे सर्वश्रेष्ठ लागल रहैक से मोहनजी छला। प्रेम ककरा कहैत छैक, तकर मालती कें किछु नहि पता, मुदा मोहनजीक सामने आबितहि सुधि-बुधि हेरा जाइन, जखन कि हुनकर विवाह आन वर संग तय भ' गेल छलनि। मोहनजी बेचारे कें सेहो ई कन्या तहिना मन मोहने। पहिल बेर जे चुंबन लेने छलनि, तकर वर्णन देखल जाय-- 'मालती कठपुतरी जकां ओही दिस देख' लगलीह। पूर्ण प्रस्फुटित कमलक फूल। हृदय-पराग उभरि आयल छलैक--भरल मधु सं लबालब। ओकर प्रत्येक पुष्पक पत्र-दल जेना कोनो सैनिक, रक्ताभ श्वेत वस्त्र मे मधु कें भ्रमर सं बचेबा लेल प्रस्तुत रहैक। चतुर भ्रमर उपरहि सं ओहि मे पैसि गेल।... वैह देखू भ्रमर! जनैत छी, भ्रमर कमल पर किएक आयल अछि?... मालती मूक भेल नकारात्मक भाव सं मूड़ी झुलौलनि।... किएक तं कमल सुन्दर छैक--अहीं जकां।... ई कहैत-कहैत मोहनजी मालतीक अधर पर अपन अधर राखि देलनि। मालतीक सौंसे देह झनझना उठलनि। जड़ता नष्ट भ' गेलनि आ ई नवीन चेतना सं हुनक सर्वांग कांपि उठल। ओ एक झटका मे मोहनजी सं अपन हाथ छोड़ा हवेली दिस भगलीह।'

              मनोभावक सूक्ष्मतापूर्वक अवलोकन आ तकरा तरह-तरहें व्यक्त करबाक कला तं एतय स्पष्टे अछि। संगहि मोहनजीक प्रगल्भता आ मालतीक पवित्रकुमारि-जन्य यौन-अबोधता सेहो स्पष्ट अछि। ओहि दिन जखन मोहनजी कहने रहनि जे अहां हमरा सं बियाह क' लिअ' आ एतहि रहि जाउ, तं एहि बातक की जवाब भ' सकैए, कोनो जवाब भैयो सकैत अछि कि नहि, मालतीक समझ मे किछु नहि आयल छलनि। 

              मोहनजी सामंत घरक राजकुमार थिका आ मालती एक गरीब भलमानुसक बेटी, जकर कौलिक सम्बन्ध तं जरूर एहि राजपरिवार मे छैक, मुदा सुंदरता आ उठैत यौवन छोड़ि क' मालती लग आरो किछुओ नहि छैक जे बराबरीक बात सोचल जा सकय। मिथिलाक सामंत लोकनि केहन होइ छला, से एहि कथा मे सगरो देखि सकै छी। ओ भ्रमर होइ छथि जिनका नव-नव कमल-पुष्प बराबर चाहियनि। मोहनजी कें भला कोन कमी कमल-पुष्पक? मुदा, एहि कन्या मे किछु एहन वस्तु छैक जे जनम अवधि ओ एकर आकर्षण सं मुक्त नहि भ' पबैत छथि।

              बरसो बरस बादक बात थिक जे मालती विवाह तं कहिया ने भेलनि, आब हुनकर बेटी बारह बरखक भ' गेलि अछि आ पति ओकर विवाह लेल चिंतित रहय लगला अछि। एम्हर मोहनजीक पत्नी मरि जाइत छनि। एखन हुनकर उमेर तीस बरख छनि। सौन्दर्यक नव-नव आमद होइत रहय तकरा लेल पत्नी सभक मरैत रहब सेहो सामंत-परिवार लेल एकटा जरूरी चीज होइत रहैक। आब होइत ई छैक जे पत्नीक मृत्युक छबे मासक भीतर मोहनजीक नव विवाहक चर्चा अछि आ मालतीक पति पूरा जप-तप सं जोर लगौने छथि जे हुनकर बेटी मोहिनी संग मोहनजीक विवाह भ' जाइन। एहना स्थिति मे मालती की करै छथि। हुनका आंखिक आगू जेना पूरा भविष्य नाचि जाइत छनि।

              ओ अपन असम्मति व्यक्त करै छथि-- 'हमरा बुझैत मोहिनी ओइ वर लेल बड़ बच्चा छथिन।' मुदा नहि। पति लग हुनकर एक नहि चललनि। लिली रे कहैत छथि जे अपन सम्पूर्ण वैवाहिक जीवन मे ई प्रथमे अवसर छल जखन मालती अपन पतिक मत कें काटबाक प्रयास कयने रहथि। स्त्री-मनक इहो एक यथार्थ थिक जे बिसरल अध्याय कें ओ बिसरले रहय देबाक प्रयास करैत अछि। मोहनजीक स्थिति ओम्हर ई अछि जे केवल आ केवल मालती लेल, मालतीक संग यौन-सुखक लेल ओ ई विवाह करब गछैत छथि।

              एखने हम कहने रही जे स्त्रीक दूटा दुनिया होइत छैक। जखन पतिक आगू मालतीक एक नहि चललनि, मालतीक दुनिया बदल' लगैत छनि। लिली रेक कथा-भाषा देखी-- '...फुलबाड़ीक सुखायल दूबि मे जेना फेर सं प्राण आबि गेल हो। पोखरिक जल मे नहुं-नहुं कंपन होब' लगलैक। पादप झूमि उठल जेना अपन अंग मे भास्करक भय सं नुकायल लता कें झकझोरैत कहैत हो-- उठ, आब फेर समर्थ हो, फेर फुलाह आ फेर परिमल बिखारह। मेघ आबि गेलैक अछि। मेघक संकेत पबितहिं पिंजड़ा मे बंद मयूर नाचि उठल। पानि मे हंस कलरव करय लागल। हवा अपन ऊष्णता त्यागि शीतल भ' गेल। आकाशमंडल पर मंद-मंद मेघ छापि रहल छलैक आ ओकर स्वागतक हेतु समस्त वन पुलक भरि झूमि रहल छल।' 

             एतय लिली रेक लाजवाब प्रतीकात्मक भाषा छनि। सब सं कमाल अछि ई देखब जे वैध यौन-सम्बन्ध आ अवैध यौन-सम्बन्धक एतय कोनो ओझरी नहि छैक। ओझरी की, चिंतना तक नहि छैक जे कोनो सम्बन्ध कदाचित अवैधो भ' सकैत अछि! जी हं, स्त्रीक दुनियाक यथार्थ यैह छिऐक। स्त्री एही तरहें सोचैत अछि। 'अवैध सम्बन्ध' नामक अवधारणा पितृसत्ताक अवदान थिक।

             एहि कथा मे हत्या होइत अछि। सेहो कोनो आनक नहि, स्वयं मालतीक पति के। कथाक आरंभे एहि घटना सं भेलैक अछि। मुदा, गौर करी तं पायब जे हत्या असल मे मोहनजीक हेबाक छलनि। महाकान्त(मालतीक पति) तेना क' हुनकर नरेठी चांपि देने रहनि जे आंखि तं उनटिये गेल रहनि, किछु सेकंड मे आब प्राणान्ते टा होयब बांकी छल। मुदा, ठीक ओही काल मे ओहिठाम मालती पहुंचली आ ई भीषण दृश्य देखि क' ओ कुहरि उठली--आह। महाकान्तक ध्यान मालती दिस चलि गेलनि, हाथक पकड़ ढील भेलनि, आ एतबे मे मोहनजी हुनकर नरेठी धेलनि आ प्राणान्त। कहल जा सकैत अछि जे पितृसत्ताक न्यायानुसार ई अधिकार महाकान्त कें छलनि, मुदा मालतीक कुहरब पितृसत्ताक स्पष्ट खिलाफ अछि, आ तते प्रभावी जे परिणाम कें उनटा देबा धरि मे समर्थ अछि। ई स्त्री-मनक न्याय-प्रक्रिया, निर्णय-प्रक्रिया थिक, जकर धार आगू हमरा लोकनि स्वयं मोहनोजीक ऊपर चलैत देखैत छी।

             पुरुष, स्त्रीक मन मोहबाक, लगातार मोहने रखबाक अनेक कला जनैत अछि। इहो पितृसत्तेक देन थिक। मुदा स्त्री जे कोनो पुरुषक प्रति अनुरक्त होइ अछि, आ अनुरक्त बनल रहैत अछि, एहि मे प्रधान भूमिका पुरुषक मोहन-कलाक नहि होइछ। प्रधान भूमिका स्वयं स्त्रीक निर्णय-प्रक्रियाक रहैत अछि। वैध-अवैधक सीमा के पार, कोन पुरुषक संग स्त्री कें यौन-सम्बन्ध बना क' रखबाक छैक, ई निर्णय स्त्रीक हाथ मे रहैत अछि। तें अहां देखबै, एहि कथाक अंत मे जखन मालतीक आंखि परहक रंगीन परदा हटैत अछि, ओ मोहनजी कें कोन तरहें नकारि दैत छथि। ने हुनका आब पाइ चाही ने  रुतबा, मिथ्या पुरुषत्वक आश्रय सेहो नहि। ओ ओहि आदमीक भीतरक लंपट कें चीन्हि गेली अछि। चिन्हबा मे देरी भेलनि, मुदा चीन्हि लेलाक बाद निर्णय लेबा मे नहि। मोहिनी मालतीक सब सं जेठे टा नहि, सब सं प्रिय संतान सेहो रहनि। मोहनजी सन खेलाड़ लोकक पत्नीक मरैत रहब जरूरी तें मोहिनी सेहो एक दिन मरि गेली। मरबा काल अपन माय मालती लेल ओकर अंतिम अस्फुट शब्द रहैक--पतित। एहि शब्द सं मालती कांपि उठली मुदा मोहनजी लेल धनि सन। आब ओ अगिला विवाह करता, मुदा मालती कें नहि छोड़थिन, छेकि क' रखने रहता। 

             असली समस्या एतहि छैक। पुरुष अपने नहि ठमकय चाहैत अछि मुदा उमेद करैत अछि जे स्त्री ओकरा लेल ठमकल रहती। ऊपर जे हम कविता-पंक्ति उद्धृत कयने रही, ओहि कविता मे आगू ई पांती अबैत छैक-- 'हौ बाबू जोगीलाल, तोरा जकां एक दुनियां नै हेतै ओकर/ जे ओकरा ले' ठमकि क' चलत, से हेतै ओकर।' मोहनजी मालतीक नहि भ' सकैत छथि। ओ कोन्नहु स्त्रीक नहि भ' सकैत छथि। प्रेमक महान ऊर्जा सं बसल ई पृथ्वी प्रेमक अभव मे आइ नरक भेल अछि। एहि मे पुरुषजातिक प्रधान भूमिका छैक, ई कथा से कहैत अछि। 

             मोहनजीक पसारल रंगीन परदाक फांस सं जखन मालती बहरेली, अपन चारू-पांचो संतान सभक प्रति एहि पछिला तमाम वर्षक भीतर जे हुनकर बदलल मनोवृत्ति रहलनि, तकरा बारे मे लिली रे लिखैत छथि-- 'मालती कें भान भेलनि जे जहिया सं मोहिनीक विवाह भेल छलनि, तहिये सं ओ कहियो एहि प्रकारें बिल्टू कें दुलार नहि कयने होथि। यद्यपि हुनकर व्यवहार मे कहियो कोनो परिवर्तन नहि आयल छलनि, तथापि भीतर मे जेना ओ सब सं दूर भ' गेल होथि। अपन सब सं प्रिय संतान मोहिनी सं तं सब सं अधिक। ओ बिल्टू कें आओर सटा लेलथिन, हृदय मे जेना किछु बरकि रहल छलनि आ से आंखिक मार्गें बाहर भेल जाइत छलनि। बरकैत-बरकैत जेना सब किछु बाहर भ' गेलनि। कनैत-कनैत आंखि बहरा गेलनि। मुदा हृदय मे एक प्रकारक हल्लुकपना व्याप्त भ' गेलनि जेना बहुत दिनक जमा कादो बहरा गेल होइन।' 

             एक हिसाबें देखी तं तथ्य आ सामर्थ्य मे भिन्न-भिन्न होइतो एहि तीनू कथा मे समानता छैक जे तीनू स्त्रीक आंखि पर टांगल रंगीन परदाक कथा थिक। एकटाक परदा तुरन्ते हटि जाइत छैक। दोसरक छव मास मे हटैत छैक। तेसर कें अनेक वर्ष लागि जाइछ आ अनेक घटनावलीक झंझावात सं गुजरय पड़ैत छैक। मुदा असल बात ई थिक जे परदा हटलाक बाद तीनू स्त्री पहुंचैत कतय अछि? पितृसत्तेक शरणागत होइछ कि ओकर दुनियो किछु बदलैत छैक? आत्मदीप्त स्त्रीक आगमन हमसब जतय होइत देखैत छी से कथा लिली रेक छनि।

             'रंगीन परदा' वैदेहीक कथाविशेषांक 1956 मे छपल छल। एहि कथा कें मैथिली मे लिखि सकबाक साहस आ प्रेरणा लिली रे कें 'पारो' सं भेटल हेतनि, से तं स्पष्ट होइत अछि मुदा स्वयं संभ्रान्त परिवारक हेबाक कारण वा एहि कारणें जे एकर कथानक ओ निकट सम्बन्धी लोकनिक जीवन-प्रसंग सं लेने हेती, एकरा ओ छद्मनाम सं प्रकाशित करौलनि। आगू लिली रेक कथा-कलाक बहुत विकास भेलनि, तकर साक्ष्य हुनकर रचनावली थिक। मुदा दू कारण सं हुनकर एहि आरंभिके कथाक अत्यधिक महत्व, आधुनिक कथा-साहित्यक इतिहास मे अछि। एक तं हुनकर वातावरण-निर्माण, जे लघु गातक परंपरित मैथिली कथा लेल एक नव बात छल। दोसर, यथार्थवादी कथा-भाषा, जकर विकासक श्रेय तं आम तौर पर ललित कें देल जाइत रहलनि अछि, मुदा एकर आरंभ कर' वाली लेखिका लिली रे छली।

Monday, May 16, 2022

इन्टरव्यू:: विद्यापति कें सही-सही देखि सकय, ताहि आंखिक एखनो प्रतीक्षे अछि


 तारानंद वियोगीक संग किसलय कृष्णक संवाद


साहित्य लेखन मे अहाँक आगमन कहिया आ कोना भेल ?


ता न वि-- अपन गामक संस्कृत स्कूल मे प्राय: पूर्व मध्यमाक विद्यार्थी रहल होयब, जखन काव्यलेखन दिस हमर प्रवृत्ति भेल। सरड़ा गामक पं. इन्दुनाथ ठाकुर हमर गुरु रहथि जे मैथिली लेखन लेल हमरा प्रेरित केलनि। हाइ स्कूलेक विद्यार्थी छलहुं जखन मिथिला मिहिर मे हमर कविता, लेख आ कथा पहिल बेर छपल।

           लेखनक दुनिया मे हमर प्रवेश किताबक दुनिया सं, किताब पढ़ैत भेल। ओही उमेर मे हम हजारो किताब पढ़ि गेल रही। हम कतहु लिखनहु छी जे राजकमल जीक पित्ती मांगनि चौधरी-सन अजूबा पढ़ाकू बुजुर्ग संग हमर दोस्ताना छल। हजार पेजक किताब पढ़बा मे हुनका मुश्किल सं तीन घंटा लागनि। हुनके दुआरे राजकमलक पुश्तैनी सरस्वती पुस्तकालय मे हमर प्रवेश भेल छल। एहन पढ़ाकू सब आरो हमरा गाम मे कैक गोटे रहथि। ओइ दिन मे ट्यूशन सं जे हम कमाबी लगभग सबटा पाइ किताब किनबा मे उड़ा दिऐक। तें हिनका लोकनि संग हमर सम्बन्ध बराबरी पर छल। ओ नव किताब हमरा पढ़य देथि तं हमहूं नव-नव किताब हुनका सब कें देबाक स्थिति मे रहै छलहुं।

           एहू समय सं पहिनेक बात छी जे हम सब बमपार्टी नाम सं एक कीर्तन-मंडली तारास्थान मे कायम केने रही। अनेक गीतकारक गीत सब गाबियनि। ताही बीच हमरा एक दिन पता लागल जे हमरे गौआं थिका कपिल जी, मने कपिलेश्वर मिश्र, जिनकर लिखल गीत हम सब गाबै छी। ओ हमरा सं तीन-चारि साल सीनियर छला। हुनका सं भेंट करय गेलहुं तं बहुत आश्चर्य लागल छल आ भेल जे जं ई लिखि सकै छथि तं हमहू लिखि सकै छी। ओहि समयक बहुतो रास हमर गीत एहन अछि जकर साहित्य मे कोनो हिसाब नै छै मुदा हमरा इलाका मे एकरा एखनो अहां गाओल जाइत सुनि सकै छी।


मैथिली साहित्य मे कोन लेखक/कविक रचना सँ प्रभावित भेलहुँ अहाँ ?


ता न वि-- मैथिली पढ़बा दिस हमर प्रवृत्ति कने बाद मे जा क' भेल। मधुप जीक झांकार, योगा बाबूक नाटक मुनिक मतिभ्रम, श्यामसुंदर झाक उपन्यास दाम्पत्य-सौरभ, रमानाथ बाबूक उदयनकथा, बलदेव मिश्रक रामायणशिक्षा-- ई सब किताब हमरा कोर्स मे छल। प्राय: तखने हमरा समझ मे इहो बात आबि गेल छल जे अपना समयक सर्वश्रेष्ठ कृति सब जे होइए तकरा कोर्स सं बाहरे रहबाक रहै छै। तें, मोन पड़ैए--यात्री जीक कविता जखन हम पहिल बेर पढ़ने रही, पन्द्रह-सोलह के रहल होयब तहिया, एकटा अननुभूत काव्य-संसार मानू हमर प्रतीक्षा मे छल, जकर द्वार एहि घटनाक संगहि हमरा लेल अनावृत्त भ' गेल छल। एहन किछु कविता सीताराम झा लग मे सेहो भेटल छल, द्विजवर जीक कोइलीदूती मे सेहो। मुदा, राजकमल कें जखन पढ़लियनि तकरा बाद तं हम वैह नै रहि गेल रही जे पहिने, मने तरुणावस्था मे रही।


एकदिसि बिहार सरकारक व्यस्ततम सेवा आ दोसर दिसि साहित्य सृजन ! समयक संतुलन कोना बनबैत छी ?


ता न वि-- हम अपना जीवन मे जे किछु प्राप्त क' सकलहुं किसलय, शपथपूर्वक कहै छी जे ई सब साहित्यक बदौलत छल। मोन पड़ैए, बीपीएससी मे चयनक बाद जखन एक पत्रकार हमरा पुछने रहथि जे एकर श्रेय ककरा दै छियै आ हम कहने रहियै जे कविता कें, तं बेचारे कें लागल रहनि जे कविता नामक कोनो महिला हेती। जखन कि ई असल मे एके साधै सब सधे के उदाहरण मात्र छल।हम अपन जीवन साहित्य कें देलियै, बांकी जीवनक सब जरूरति साहित्य पूरा केलक। साहित्य छोड़ि क' आन कोनो महत्वाकांक्षा कहियो नै रहल, तें समयक संतुलन बनेबाक समस्ये कहियो पैदा नै भेल। काजक बेर मे काज आ बांकी समय मे लिखापढ़ी, एहि क्रम मे कहियो गंभीर व्यवधान आएल हो, से कहियो नै भेल। हं तखन, अइ मे सब सं पैघ योगदान जं ककरो कहबै तं से हमर परिवार छल। अहां कें आश्चर्य लागत, आन-आन लोकक गार्जियन जतय अइ बातक लेल अक्सरहां दुखी होइ छथि, हमर कविता-लेखन सं हमर पिता अपना कें गौरवान्वित महसूस करथि। मिहिरक कोनो अंक मे हमर किछु छपय तं तकरा बरसो बरस बाद धरि पिताक सिरमा तर मे ओ अंक सब राखल देखल जा सकै छल। पिताक बाद यैह स्थान हमर पत्नी ल' लेलनि।


मैथिली साहित्य मे बेर बेर ब्राह्मण - गैर ब्राह्मणक प्रश्न उठैत अछि । आरोप इहो लगैत अछि, जे एकटा क्षेत्र विशेषक सवर्ण साहित्यकार लोकनि मैथिली केँ हथिया कय रखने अछि । अहाँक अनुभव एहि सन्दर्भ मे की कहैत अछि ?


ता न वि-- हमर जे अनुभव अछि से अहांक बातक समर्थन करैत अछि। कथनी आ करनी मे फरक कें सब सभ्यता मे खराब बात मानल गेल अछि। मुदा, अपना ओतय बुझू जे यैह चीज संस्कारवान हेबाक प्रमाण होइत छैक। मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, ई बात ब्राह्मणे लोकनि स्थापित केने रहथि। मने मैथिल महासभा मे मैथिली कें ग्रसि क'। गोप महासभा जखन दावा केलकै जे भाइ, मैथिली तं हमरो सभक भाषा छी, ताहि मोताबिक तं हमरो सब कें महासभाक सदस्यता भेटबाक चाही। अपना सभक इतिहास कते गंदा अछि, तकर की चर्चा करी! मानक मैथिलीक फंदा ऊपर सं लादल अछि। आइ अहां मठोमाठ लोकनिक मुंहें सुनब, मैथिली तं सबहक भाषा छियै। मुदा, ई मात्र हुनकर कथनी छी। करनी जखन देखबै तखन असलियत पता लागत। अंगिका-बज्जिका आन्दोलन असल मे की छी? एही हथियेबाक विरुद्ध स्वाभिमानक संघर्ष छी। एहन घटनाक्रम आगू अहां और देखबै जं हथियेबाक ई हुंठ षड्यंत्र बंद नै भेल। एकरा बंद हेबाक कोनो लक्षण अइ दुआरे हमरा नै देखाइए जे आइ जते जे क्यो मैथिलीक ठिकेदार सब छथि, किनको मे ने तं भाषा आ भूमिक प्रति कोनो भविष्यदृष्टि छनि, ने मैथिल संस्कृति के वास्तविक समझ। अपन कथनी मे जे सब सं पैघ मातृभक्त क' क' बांहि फड़कबैत देखल जेता, करनीक विश्लेषण करब तं संभव जे हुनके सब सं पैघ मातृहन्ताक स्थान पर राखय पड़य।

             


की अहाँ केँ नहि लगैत अछि जे विद्यापतिक लेखन खाँटी मैथिली लोकभाषा मे भेलन्हि, जे एखनहुँ समाजक एकटा पैघ हिस्सा मे प्रयुक्त होइत अछि , मुदा विद्यापतिक बाद ओ लोकभाषा केँ रचनाकार लोकनि संस्कृतनिष्ठ करैत गेलाह आ एकटा सीमित क्षेत्र आ वर्ग मे प्रयुक्त शैली केँ मानक घोषित करैत शेष मिथिला पर लादि देल गेल ?


ता न वि-- हरेक भाषिक भूगोलक अपन-अपन जातीय कविता होइ छै किसलय। ई चीज खाली लैटिन कि चीनी, तमिल कि बंगले के हेतै, से नहि। ई चीज मिथिला के सेहो हेतै। दुर्भाग्यक बात छी जे आइ धरि ने कोनो इतिहासकार के ध्यान अइ दिस गेलनि ने आलोचक के। फल भेल जे मिथिलाक जातीय कविता रूप सब कें नौजवान कवि सब की बुझितथि जे ओ आन-आन देशीय जेना जापानक जातीय कविता(जेना हाइकू) कें बुझबा मे अपस्यांत रहला। कते बात तं उनटे बुझैत रहला। जेना, छंद मैथिली कविताक जातीय वस्तु नहि थिक विजातीय वस्तु थिक। एकर बदला जातीय वस्तु लय छी। मुदा पंडी जी लोकनि उनटे बतौता। विद्यापतिक कविता लय मे छनि, छंदक हिसाबें देखबनि तं हजार गलती भेटत। मुदा, ताहि सं की?

           विद्यापति पहिल व्यक्तिकवि छला जे मिथिलाक जातीय कविता कें लिखबा योग्य भाषा मे ग्रथित केलनि। स्वाभाविक छल जे हुनकर कविता मे कथनशैली, शब्दावली, अभिव्यक्ति-भंगिमा सब कथू ठेठ मैथिल छल। जातीय साहित्यक स्वभाव होइ छै जे रचना तं कालान्तर मे बचल रहि जाइत अछि मुदा रचनाकार तिरोहित भ' जाइत अछि। सैह विद्यापतियोक संग भेलनि। हुनकर भणिता तं तते सर्वव्यापी भेल जे सैकड़ो कवि हजारो पद भनहि विद्यापति लगा क' लिखलनि। मुदा, विद्यापति स्वयं आदमी सं मिथक मे परिवर्तित भ' गेला। उगना आ गंगा आदिक किंबदन्ती एकर प्रमाण छी। अहां देखबै जे 1860, जकरा इतिहासकार लोकनि आधुनिक युगक आरंभ मानैत छथि, अबैत-अबैत विद्यापतिक व्यक्तित्वक जाबन्तो परिचिति मिथिलाक बुद्धिजीवी लोकनि कें विस्मृत भ' चुकल छलनि। तकर प्रमाण अहां बिहारीलाल फितरत के इतिहास-पुस्तक 'आइना-ए-तिरहुत' (1881) मे पाबि सकै छी जतय हुनका बड़ भारी नैयायिक बताओल गेलनि अछि आ एही ख्याति सं बिसफी गाम दान मे पबैत देखाओल गेल अछि। वास्तविकता ई अछि जे विद्यापति न्याय पढ़लनि वा लिखलनि तकर कतहु कोनो साक्ष्य नै अछि, स्वयं पं. गोविन्द झा सं पूछि लियनु। दोसर दिस अहां देखबै जे रमानाथ बाबू आदिक सब सं बेसी उद्यम अइ बातक लेल भेलनि जे विद्यापतिक व्यक्तित्व ठाढ़ कयल जाय। ई की छल? 'लोक' के संपति कें छीनि क' शास्त्रीयताक कठघरा मे बंद करबाक मानक प्रयास छल।

           स्थिति ई अछि जे जकरा ओ लोकनि 'मानक मैथिली' कहै छथि, स्वयं विद्यापतिये ओइ मे अंटि नै पबै छथि, हुनकर कोनो ने कोनो अंग ओइ सांचा सं बाहर भ' जाइत छनि। किछु विद्वान तं एहनो धृष्टता कइये चुकल छथि जे विद्यापतिक प्रयोग कें अशुद्ध मानि क' ओकर शुद्धीकरण धरि क' चुकलाहे। हम पुछै छी, मानक क्षेत्रक कोन ब्राह्मण पुरुष अपन स्त्री सं अइ भाषा मे गप करै छथि जे 'तोहें जे कहै छह गौरा नाचय, हम कोना नाचब हे'? आ कि पंचग्रामक कोन स्त्री कुदृष्टिक विरोध करैत एना कहि सकै छथि जे 'जञो दिठियौलए, ई मति तोर/ पुनु हेरसि हो खापड़ि मोर'। मोन राखू, चोट भने पनही सं पिटला पर बेसी लगैत हो, मुदा स्त्री-हाथक खापड़ि जं चानि पर पड़ि जाय तं पुरुषसत्ताक मानमर्दन बेसी ठीक ढंग सं होइ छै। खापड़ि कोन स्त्रीक अस्त्र छिऐक, मोन पाड़ि लिय'।

           की कहू, विद्यापति पर तं पचीस हजार पेज सं ऊपरक सामग्री विद्वान लोकनि लिखि चुकला अछि, मुदा विद्यापति कें सही-सही देखि सकय, ताहि आंखि के एखनो प्रतीक्षे अछि। आ एहि बेचारी मैथिलीक तं ई दशा भेल जे जकरा सिद्ध लोकनि, गैरब्राह्मण कलाकार लोकनि संस्कृतक प्रतिरोध मे आविष्कृत केने छला तकर पर्यवसान संस्कृतक पिछलगुआ भ' क' भ' रहल अछि। पंडित कवि लोकनि तं साफ-साफ लिखने छथि-- भाषा-सौन्दर्यक गति न आन। पिछलगुआ बनने बिना मैथिलीक कोनो आन गति नै छै।


मैथिली साहित्यक वर्तमान परिदृश्य केँ कोन रुपेँ देखैत छी, खासकय सोशल मिडिया माध्यमें धर्रोहि लागि रहल रचना संसार केँ ?


ता न वि-- कहबी छै जे अज्ञानी के हजार अपराध माफ रहैत अछि। जं क्यो मैथिली मे लिखैत छथि तं हुनका लेल सब सं जरूरी अछि जे हुनका लग मिथिलाक अपन एक विस्तृत समझ हेबाक चाही। दोसर जे मैथिली साहित्यक परंपरा, पृष्ठभूमि आ विशिष्ट लेखन सं घनिष्ठता हेबाक चाही। सोशल मीडिया कें अइ अर्थ मे तं हम बहुत उपयोगी मानै छी जे अभिव्यक्ति कें लोकतांत्रिक बनेलक अछि। मुदा, प्रश्न अछि जे अहां लग बात की अछि, ओ बात समाज आ साहित्यक लेल मूल्यवान कते अछि? आइ धरि जे मैथिली लेखक लोकनि लेखन क' चुकल छथि, ताहि मे अहां नवीन की क' रहल छी?

           मुदा दुखक बात ई अछि जे मैथिलीक माहौल एते गंदा बना देल गेलैए जे अइ सब बात कें सोचब आउटडेटेड भ' गेल छै। कचड़े लिखने सं जं किनको यश, सम्मान आ पुरस्कार भेटैत हुअय, तं अहां कहू जे के अभागल हेता जे एते तैयारीक संग साधनापूर्वक मैथिली लिखबा लेल उद्यम करता?


कथा, कविता, समीक्षा आ इतिहास मे समानांतर अहाँक कलम चलैत रहल अछि । सभ सँ प्रिय विधा कोन थिक ?


ता न वि-- हम अपना कें मूलत: कवि मानै छी। बांकी समस्त लेखन कें अहां हमर कवि-कर्मक विस्तार मानि सकै छी।


साहित्य अकादमी आ आन छोट पैघ पुरस्कार प्रक्रिया केँ कोन रुप मे देखैत छी ?


ता न वि-- मैथिलीक स्थिति कें देखैत बात करी तं श्रेष्ठ लेखन आ पुरस्कार दुनू बिलकुल अलग-अलग विपरीत ध्रुवक चीज छी, आ अधिकतर एक दोसरक विरोधी दिशा मे चलैत अछि। दस बरस पहिने कहियो एहनो भ' जाइ जे श्रेष्ठ कृति कें सेहो पुरस्कार भेटि गेल करैक। आइ तं सपनो मे अहां एकर कल्पना नै क' सकै छी। एकर कारण थिक दोषपूर्ण चयन-प्रक्रिया जकरा जानि-बूझि क' अपनाओल जाइत अछि। असल मे पुरस्कार जकरा हाथ मे रहै छै से अपने तं सृजनात्मक होइत अछि नहि, तें लेखनक गुणावगुण कें परखबाक कोनो दृष्टियो ओकरा मे नै होइछ। एकर स्थान पर ओ तुच्छ मनोवृत्ति सब सं संचालित होइछ आ पुरस्कार एक व्यवसाय मे बदलि जाइछ जकर जं बहुतो गंहिकी होइ छथि तं उखाड़-पछाड़ के ओकर अपन स्वतंत्र राजनीति होइ छै। 

            अकादमी आ संस्था सभक पुरस्कारक संग जं ई संकट छै तं दोसर दिस व्यक्तिगत प्रयास सं जे पुरस्कार संचालित होइत अछि तकरो स्थिति अहां ठीक नहि कहि सकै छियै। हुनका सब लग श्रेष्ठ लेखन कें खोजि सकबाक ने हुनर रहै छनि ने इच्छाशक्ति, तें अधिकतर अहां देखबै जे एहन पुरस्कार सब मैथिलीक श्रेष्ठ लेखनक विकास मे अपन कोनो योगदान नै रचि पबैत अछि। यात्री जी बड़ बढ़ियां कहथिन जे पुरस्कार की छी? गोबरक चोत छी। गाय कें की पता जे घरबे कोनो कर्मक छथि कि नहि, ओ तं धप सं अपन चोत खसा देत, सैह हाल अइ पुरस्कार सभक अछि। नीक बात ई थिक जे एहि दुष्चक्र कें तोड़बाक कोशिश सेहो भ' रहल छै। लक्ष्मी-हरि उपन्यास सम्मान कें अहां एकर दृष्टान्तक रूप मे देखि सकै छी।


मैथिली मे पाठकीयताक संकटक की कारण देखैत छी ?


ता न वि-- दशको सं ई सर्वसम्मत बात मानल जाइत अछि जे भारत मे साहित्यक सब सं बेसी पाठक बिहार मे बसै छथि आ बिहार मे मिथिला-क्षेत्र एहि मे सर्वोपरि अछि। मुदा, दुखक बात जे ई मैथिल पाठक लोकनि आन-आन भाषाक साहित्यक हाथें बन्हकी लागल छथि। उन्नत स्तरक जे साहित्यिक पाठक छथि, एक तं हुनका मैथिली पढ़ब ओरियाइत नै छनि, दोसर घटिया लेखनक दबाव मैथिली पर तेहन भारी छै जे एक किताब उनटा गेलाक बाद फेर हुनकर प्रवृत्ति मैथिली पढ़बा दिस हेतनि तकर कोनो संभावना नै बचैत अछि। दोसर दिस, मैथिली मे लेखन केनिहार लोकनि अपने सेहो तते बापुत छथि जे पाठकीयताक दुर्बलता दूर क' सकै छथि। मुदा, जे अपने मैथिलीक लेखक छथिहे से एकर पाठको किए हेता? आ जे स्वयं शिक्षके छथि मैथिलीक, हुनका फेर सं मैथिली पढ़बाक कोन काज? एहनो स्थिति मे मुदा आशाक किरण छथि ओ पाठकवर्ग, जे अपन अस्मिताक खोजवश मैथिली पढ़बा सं जुड़ला अछि। उन्नत बौद्धिक स्तरक यैह पाठकवर्ग भविष्य थिका, मुदा हुनका टारगेट क' लिखैत अहां कें कम्मे मैथिली लेखक भेटता।


नवागन्तुक रचनाकार सभ लेल की कहय चाहबनि ?


ता न वि-- एकटा खिस्सा सुनबय चाहबनि। गुलशन नंदा कें एक बेर तेख चढ़लनि जे एहन पोपुलर राइटर छथि ओ, लाखो पाठक छनि, दर्जनो फिल्म छनि मुदा साहित्यकार वर्ग मे हुनकर कोनो गिनतिये नहि छनि। हिन्दीक वरिष्ठ लेखक सब सं भेंट क' क' ओ अलख जगेबाक प्रयास मे लगला। दिनकर जी तं हुनका सं गप्पो करब स्वीकार नै केलखिन, डांटि क' भगा देलखिन। मुदा, हजारीप्रसाद द्विवेदी लग गेला तं नीक स्वागत भेलनि। पुछलखिन-- हम एते लिखने छी, मुदा हमरा क्यो साहित्यकार मानिते नहि छथि, जखन कि अहां कें लोक बड़ पैघ लेखक मानै छथि। एना किएक? हजारी बाबू कहलखिन-- असली कारण तं प्राय: हमरो नै बूझल अछि तखन भ' सकैए जे यैह कारण हो जे अहां बेसी लिखने छी जखन कि हम बेसी पढ़ने छी।

               दोसर बात हम कहबनि, जं वास्तव मे साहित्य-क्षेत्र मे किछु पैघ करबाक होइन तं पुरस्कारक बदला मे निन्दा आ विरोध के उम्मीद राखि क' चलथि। हरेक जड़ समाज जाग्रत-जीवन्त लोकक विरोधे करैत आएल अछि। तकर उदाहरण मिथिला समाज मे सेहो कोनो कम नै छैक। काल्हियो, आइयो।

               कोनो लेखक अपन चरम सार्थकता कखन प्राप्त करैत अछि? तखन, जं हुनकर लिखलाहा सं ओइ भाषाक रकबा पैघ हुअय, ओकर सामर्थ्य बढ़य, ओकरा मे नवीन क्षमता उत्पन्न हुअय। स्वाभाविक बात छै जे जखन अहां कें बुझल रहत जे मैथिलीक लेखक लोकनि कोना-कोना मैथिलीक सामर्थ्य बढ़ौलनि अछि, तखने अहां लग ओ बात उद्घाटित होयत जे ओ कोन वस्तु छै जकरा आइयो धरि क्यो नै क' सकला, आ अहां तकरे करबाक लेल कलम उठेने छी। नवागन्तुक लोकनि कें एहि तरहें सोचबाक चाहियनि।


मैथिली पत्रकारिताक वर्तमान स्वरूप केहेन हेबाक चाही ? दैनिक 'मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश'क प्रकाशन पर किछु कहबैक ?


ता न वि-- लोकल आ ग्लोबल के समाहार बैसबैत कोना सत्यक संग भेल जा सकैत अछि, सैह आइ पत्रकारिताक सब सं पैघ चैलेंज छैक। मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश ठीक दिशा मे अपन यात्रा क' रहल अछि। एक सुझाव जे हम देबय चाहबनि, एहि मारुख समय मे सकारात्मक होयब तं जरूर कठिन छै लेकिन संपादक लोकनि ख्याल राखथु जे कोनो दिनका अखबार अपन सकल प्रभाव मे अपना पाठक कें कहीं आरो बेसी अवसादग्रस्त तं नै करैत अछि!


सम्प्रति कोन विषय वस्तु पर लेखन चलि रहल अछि ?


ता न वि-- एखन हम अपन पुस्तक 'मैथिली कविताक हजार वर्ष' कें अंतिम रूप देबा मे लागल छी। ई किताब अंतिका प्रकाशन सं दू खंड मे आबि रहल अछि। एकरा संग हम अपन पहिल उपन्यासक तैयारी मे सेहो लागल छी। ई महान शास्त्रीय गायक पंडित मांगनलाल प्रसिद्ध मांगनि खवासक बारे मे अछि जे विद्यापति गीत कें चलन मे अनबाक लेल ओ कतेक भारी संघर्ष केलनि आ कतेक विरोधक हुनका सामना करय पड़लनि। बीसम शताब्दीक लगभग आरंभिक पचास वर्षक मिथिलाक गति-कुगति एहि मे आओत।


अपन व्यस्ततम समय मे सँ समय देबाक लेल आभार आ आइ जन्मदिनक अवसर पर मैपुप्र परिवार दिस सँ आत्मीय शुभकामना


ता न वि-- सादर आभार।


Tuesday, April 12, 2022

रेणु और नागार्जुन :: तारानंद वियोगी

 

रेणु और नागार्जुन

तारानंद वियोगी

रेणु की वह तस्वीर आपने जरूर देखी होगी, औराही हिंगना वाली, जिसमें वह खेत की गीली पांक में अपने साथियों के साथ धान रोपने उतरे हैं। कुल जमा सात लोग हैं। सबके हाथों में धान का बिचड़ा है और कुछ नया करने का रोमांच भी। खुद रेणु ने अपनी लुंगी समेटकर बाकायदा ढेका बांध लिया है लेकिन दो-एक लोग ऐसे हैं जो विना कपड़ों की परवाह किये पांक में घुस पड़े हैं और अब कपड़ा गंदा होने के द्वन्द्व से जूझ रहे हैं। रेणु के हाथों में बिचड़ा है और नजर नीचे धरती की ओर। अब वे रोपाई शुरू करने ही वाले हैं। इस बीच फोटो सेशन चल रहा है। लेकिन, इन सात लोगों में एक ऐसा है, जो धरती में झुक चुका है, ठीक उसी तरह जैसे कोई भी खेतिहर धान रोपने के वक्त झुकता है। उस आदमी का चेहरा दिखाई नहीं पड़ता। उसे फोटो सेशन की जैसे कोई परवाह ही नहीं है। आधी धोती उसने पहन रखी है, आधे का ढट्ठा ओढ़कर सिर तक को ढंक लिया है। उसकी निगाह जमीन पर है और उसने रोपाई शुरू कर दी है। तस्वीर में उसके दायें हाथ की उंगलियां बिचड़े की जड़ों के साथ गीली पांक के वक्षस्थल में घुसी दिखाई देती है। आदमी बुजुर्ग है लेकिन रोपनी का पुराना उस्ताद मालूम होता है। यह आदमी कौन है? यह नागार्जुन हैं। औराही हिंगना में,  रेणु के खेत में धान रोप रहे हैं। तारीख है 29 जुलाई 1973। वह रेणु के गांव आए हैं जहां अभी रोपनी का सीजन चल रहा है। रेणु इस तरह के हर सीजन में गांव पहुंचते थे। अक्सर तो कुछ सहमना साहित्यिक भी बटुर आते थे। यहां, यह अनुमान किया जा सकता है कि इस आइडिया के जनक भी नागार्जुन ही रहे हों कि चलें, आज हम सब भी धान रोपते हैं। रेणु ने इसे एक और नया आयाम दे दिया है। फोटोग्राफर से इसकी तस्वीर उतरवा ली है और बात अब हम सब लोगों तक पहुंच गयी है।
           उस रात नागार्जुन ने एक कविता भी लिखी। वह रेणु के गांव के बारे में है और खुद रेणु के बारे में। शीर्षक दिया है--मैला आंचल। कविता देखें--
पंक-पृथुल कर-चरण हुए चंदन अनुलेपित
सबकी छवियां अंकित, सबके स्वर हैं टेपित
एक दूसरे की काया पर पांक थोपते
औराही के खेतों में हम धान रोपते
मूल गंध की मदिर हवा में मगन हुए हैं
मां के उर पर, शिशु-सम हुलसित मगन हुए हैं
सोनामाटी महक रही है रोम-रोम से
श्वेत कुसुम झरते हैं तुम पर नील व्योम से
कृषकपुत्र मैं, तुम तो खुद दर्दी किसान हो
मुरलीधर के सात सुरों की सरस तान हो
धन्य जादुई मैला आंचल, धन्य-धन्य तुम
सहज सलोने तुम अपूर्व, अनुपम, अनन्य तुम।
          इस मौके पर सबके स्वर भी टेपित हुए थे, इसकी सूचना इसी कविता से मिलती है। शायद उसे सुनने का मौका हमें अब कभी नहीं मिल सकेगा। लगता है, उस संगत में रेणु ने कोई अनोखा गीत गाया होगा, जो नागार्जुन को बहुत पसंद आया होगा। इसकी खबर हमें नागार्जुन की उस उक्ति से मिलती है जहां वह उन्हें 'मुरलीधर के सात सुरों की सरस तान' बताते हैं। हर जाननेवाला जानता है कि रेणु बहुत मधुर गाते थे और लोकगीतों, गाथाओं का एक बड़ा भंडार उनके ओठों पर बसता था। सारंगा सदाबृज और लोरिकायन की तो लगभग समूची गाथा उन्हें याद थी। नागार्जुन ने रेणु को यहां 'दर्दी किसान' बताया है लेकिन यह भी कम दर्दीला नहीं है क्योंकि उन्होंने अपने आपको सिर्फ 'कृषकपुत्र' बतलाया है, यानी कि वह, जिससे दर्दी किसान होने का सौभाग्य एक पीढ़ी पहले छीन लिया गया। औराही उन्हें बहुत पसंद आया है। वहां वह 'मूल गंध' है, जिसमें धरती का प्यार उसकी उत्पादकता बनकर प्रकट हुआ करता है।‌ वहां की माटी सोनामाटी है। रेणु की खासियत है कि यह सोनामाटी उनके रोम-रोम से महक रही है। रेणु ने जो अपने उपन्यास का नाम 'मैला आंचल' दिया था, उसके पीछे एक गहरा व्यंग्य था। उस उपन्यास को बड़ा बनाने में जिन चीजों का योग है, उसमें से कुछ इस नाम का भी है जिसके पीछे व्यंग्य की अचूक गहराई है। वह बात ठीक वहीं से, इस कविता में भी उतर आई है। नागार्जुन इसे सिम्पली 'जादुई' बताते हैं। रेणु, जो नागार्जुन को 'बड़े भाई' या 'भैयाजी' कहते थे, के लिए उनके मन में कितना प्रेम, कितनी वत्सलता थी, इसका पता भी इस कविता से बढ़िया चलता है। वे कहते हैं कि इस धरती के नील व्योम से रेणु के ऊपर श्वेत कुसुम झरते हैं। यश का रंग श्वेत बताया गया है। फिर फिर वह कहते हैं-- सहज सलोने तुम अपूर्व, अनुपम, अनन्य तुम। यहां प्रयोग किया गया एक-एक विशेषण विशेष है, जिसका पता हमें नागार्जुन के उस लेख से चलता है जो बाद में उन्होंने रेणु के निधन के बाद उनपर लिखा था।
          रेणु और नागार्जुन का सम्बन्ध बहुत पुराना था। दोनों मिथिला समाज से आते थे। दोनों धरती से जुड़े, धरती के धनी। दोनों का जुड़ाव आमजन से एक-जैसा। लोकवृत्तियों और लोकविधाओं में दोनों का ही मन एक जैसा रमा हुआ। दोनों संघर्षधर्मा, सत्ताधारी पार्टी के आलोचक। दोनों की अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं थीं, जिनके बगैर सामाजिक सरोकार अधूरा पड़ता था। मध्यकाल से ही यह परंपरा चली आई है कि इस भूमि से जो भी कोई बड़ा साहित्यकार हुआ, उसने अपनी मातृभाषा में भी कुछ-न-कुछ जरूर लिखा। रेणु ने भी मैथिली में लिखा लेकिन नागार्जुन ने ज्यादा लिखा। लगभग जीवन भर उनकी संलग्नता अपनी भूमि और भाषा से बनी रही।  रेणु की संलग्नता और भी गहरी थी, यह और है कि उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम अलग-अलग थे। जैसे वह दर्दी किसान थे, वैसा ही मर्मी इंसान भी। उनका यह मर्म अनेक आयामों में प्रकट होता था। नागार्जुन ने अपने लेख में दिया है-- 'रेणु के यहां न तो कथ्य-सामग्री का टोटा था और न शैलियों के नमूनों का अकाल। सामाजिक घनिष्ठता रेणु को कभी गुफानिबद्ध नहीं होने देती थी। वह जहां कहीं भी रहे, लोग उन्हें घेरे रहते थे। फारबिसगंज, पटना, इलाहाबाद, कलकत्ता, मैंने रेणु को जहां कहीं देखा और जब कभी, निर्जन एकान्त में शायद ही देखा होगा।'
          विद्यापति के यहां 'सुपुरुष' का बड़ा माहात्म्य है। इसे ही कहीं वह सुजन कहते हैं तो कहीं सज्जन। उनकी एक मशहूर काव्यपंक्ति है-- 'सज्जन जन सं नेह कठिन थिक।' इस एक पंक्ति ने मिथिला के पुराने पंडितों को पिछले सौ वर्षों में कितना परेशान किया पूछिये मत। आजतक उनकी समझ में न आया कि सज्जन जन से नेह कठिन क्यों होगा, वह तो और आसान, और भी विधेय होना चाहिए। बात यहां तक चली गयी कि धृष्ट लोगों ने विद्यापति की पंक्ति संशोधित कर दी। अपने संकलनों में पाठ दिया--सज्जन जन सं नेह उचित थिक। 'कठिन' को 'उचित' बनाकर मानो उन्होंने टंटा ही खत्म कर दिया कि कठिन है या कि कठिन नहीं है। लेकिन इसका मर्म रेणु जैसे लोग जान सकते थे। नागार्जुन ने लिखा है-- 'लोकगीत, लोकलय, लोककला आदि जितने भी तत्व लोकजीवन को समग्रता प्रदान करते हैं, उन सभी का समन्वित प्रतीक थे फणीश्वरनाथ रेणु।' रेणु के यहां हम सुपुरुष, सुजन, सज्जन को मूर्त रूप में देख सकते हैं। आप 'तीसरी कसम' के हीरामन को याद कीजिए और गौर फरमाइए कि उसपर प्यार तो पूरा उमड़ आता है, उस नायिका का भी उमड़ आया था, लेकिन उस प्यार के साथ बने रहना, उसे निभा ले जाना कितना कठिन है! कहते है, लोग तो जन्म लेते और मरते रहते हैं, लेकिन 'लोक' अमर होता है। नागार्जुन फिर कहते हैं-- 'बावनदास से लेकर अगिनखोर तक जाने कितने कैरेक्टर रेणु ने पाठकों‌ के सामने रखे हैं। उनमें से एक-एक को बड़ी बारीकी से तरासा गया है। ढेर-के-ढेर प्राणवंत शब्दचित्र हमें गुदगुदाते भी हैं और ग्रामजीवन की आंतरिक विसंगतियों की तरफ भी हमारा ध्यान खींचते चलते हैं। छोटी-छोटी खुशियां, तुनकमिजाजी के छोटे-छोटे क्षण, राग-द्वेष के उलझे हुए धागों की छोटी-बड़ी गुत्थियां, रूप-रस-गंध-स्पर्श और नाद के छिटफुट चमत्कार-- और जाने क्या-क्या व्यंजनाएं छलकी पड़ती हैं रेणु की कथाकृतियों से।'
          रेणु से नागार्जुन का सम्बन्ध बहुत ही पुराना और आत्मीय था। दोनों का जब भी मिलना होता, दोनों मैथिली में ही बात करते थे। पत्राचार की भाषा भी मैथिली ही हुआ करती थी, जैसा कि रेणु रचनावली में संकलित पत्र से भी स्पष्ट है। अद्भुत है वह पत्र, जिसके शब्द-शब्द से रेणु की आंतरिकता झांकती है। पत्र 18.12.1954(या1955) का है। अभी-अभी 'मैला आंचल' छपा है।  रेणु गांव में हैं। आज उन्होंने किसी गुदरिया (गोरखनाथी) संन्यासी से राजा भरथरी की गाथा सुनी है। जरूर साधू ने बहुत ही मधुर, मार्मिक गाया होगा। रेणु ने नोट कर लिया है। गाथा का एक लंबा अंश वह नागार्जुन को, पत्र में लिखते हैं, जो बड़ा ही अनूठा है। वहां साधू बनने के बारह बरस बाद राजा भरथरी के अपने नगर पधारने का वर्णन है, सिद्ध जोगी बनकर। लगता है, अपने पिछले पत्र में नागार्जुन ने प्रश्न किया हो कि 'राजा भरथरी, यानी कि रेणु आजकल चुप क्यों हैं?' कहते हैं-- 'जेहि दिन नग्र पधारयो राजा भरथरी/ मंजरल बगियन में आम/ फुलबा जे फूले कचनार राजा/ लाली उड़े आसमान/ लाल लाल सेमली के बाग फूले/ धरती धरेला धेयान।' यानी कि गांव के पर्यावरण ने इस तरह राजा भरथरी को बांध लिया है कि चुप हो जाने के सिवा रास्ता नहीं बचा।
           फिर, गांव-घर की बातें बताते हैं। पहली बात तो यही कि गांव आते रहना इसलिए भी जरूरी है कि चीजों को, विरासत को नष्ट होने से बचाया जा सके। फिर उन्हें उस नौजवान लड़के की बात याद आती है जिसने रेणु को चैलेंज किया था कि गांव में आपका मन लगेगा? लड़के को जवाब उन्होंने क्या दिया था, सो बताते हैं। गरदन में मिट्टी का घड़ा बांधकर कूप में पैठ गये हैं, अब यहीं रहेंगे। फिर बताने लगते हैं कि गांव के जंगल का एक सियार पागल हो गया है, लोग लाठी साथ रखकर ही घर से बाहर निकलते हैं। रेणु के पास अपनी लाठी नहीं है। किसी से मांगा तो उसने कह दिया कि अब तो आप अपनी लाठी बनाइये, आप गांव में रहने आए हैं। फिर उन्हें अपने पिता की याद आ गयी जो तरह-तरह की लाठियां रखने के शौकीन थे। बांस के जंगल में घुसकर सही लाठीवाले बांस की पहचान भी एक महीन कला है। रेणु बताते हैं कि सिर्फ मन लायक लाठियां पाने के लिए पिता ने कैसे-कैसे लोगों से दोस्ती गांठ रखी थी। नागार्जुन ने पिछले पत्र में उन्हें सुझाव दिया था कि रेणु को वहां बंदूक का लाइसेन्स ले लेना चाहिए। रेणु को यह जरूरी नहीं लगा है, बताते हैं कि 'विश्वकोश का चोर अबतक गांव नहीं पहुंचा है', और शिकार के प्रयोजन की जहां तक बात है, गुलेल चलाने की उनकी 'पेराकटिस' इतनी जबर्दस्त है कि उसके आगे बंदूक फेल है। फिर वह उन्हें उस खंडकाव्य का प्लाट बताने लगते है-- 'दो पीर: एक नदी' जिसे लिखने का विचार उनके मन में चल रहा है। दो पीर-- ग्रामदेवता जीन पीर और ग्रामरक्षक चेथरिया पीर। नदी दुलारी दाय। नदी का गुण गाने लगते हैं कि इस इलाके के बाबू लोगों की जो बबुआनी है, वह इसी दुलारी दाय के प्रताप से है। कोशी जब इस इलाके से गयीं, उनकी पांच बहनें थीं, सबको वह बांझ बनाती गयीं, सबसे छोटी बहन इस दुलारी पर उसकी बहुत करुणा थी, इसीलिए यह बची रह गयी। अपने भैयाजी से आशीर्वाद मांगते हैं कि वह इस खंडकाव्य को पूरा कर सकें और वह शुभ भी बन पाये, सुंदर भी। फिर यह सूचना दी है कि मैथिली मासिक 'वैदेही' पिछले कुछ समय से उनके ग्रामीण पुस्तकालय में आना बंद हो गयी है, मतलब इसकी शिकायत प्रकाशक को कर दें और राय मांगते हैं कि 'आर्यावर्त' का ग्राहक उन्हें बनना चाहिए या नहीं! पत्र के अंत में लतिका जी से मिलकर हाल-समाचार कह देने का अनुरोध है और यह भी कि उन्हें भरोसा दे दिया जाए कि उनकी हिदायतों के मुताबिक ही वह गांव का जीवन जी रहे हैं। लेकिन, सबसे अंत मे यह है कि 'हम जे मैथिली मे पांती लिखैक धृष्टता कय रहल छी-- से तकर की हैत?' इसका क्या होगा! इन दोनों लोगों के बीच की आत्मीयता और सामीप्य-भावना को आप इस एक पत्र से समझ सकते हैं।
           सोचकर देखें तो यह आत्मीयता कोई आसान बात नहीं थी। नागार्जुन का पहला उपन्यास 'पारो' 1946 में छपकर आ गया था। था तो यह मैथिली में लेकिन इसने यह किया था कि नागार्जुन बिहार के उभरते हुए संभावनाशील उपन्यासकार के रूप में गिने जाने लगे थे। 1948 में छपे 'रतिनाथ की चाची' ने उन्हें स्थापित उपन्यासकार की पंक्ति में ला दिया था। लेकिन, 'बलचनमा'(1952) के बाद तो प्रथम श्रेणी के हिन्दी उपन्यासकारों में उनका शुमार होने लगा था। इसमें प्रेमचंद की परंपरा का स्पष्ट विकास देखा गया था। 'आंचलिक' शब्द भी उपन्यास के विशेषण में तभी पहली बार प्रयुक्त हुआ था और नागार्जुन हिन्दी के पहले आंचलिक उपन्यासकार माने गये थे। इसके बाद आया था 'मैला आंचल'। शुरुआती दिनों में तो कई संशय थे चतुर्दिक, लेकिन बहुत जल्द ही यह हिन्दी के चुने हुए सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में शामिल कर लिया गया। 'मैला आंचल' की सफलता निश्चय ही 'बलचनमा' से बढ़कर थी।
           इसमें संदेह नहीं कि इस तरह की स्थितियों में लेखकों की आपसी प्रतिस्पर्द्धा उनके बीच कटुता का सम्बन्ध बनाती है, और कई लोगों ने इस प्रतिस्पर्द्धा को उभारनेवाली बातें माहौल में चलाईं भी थीं, लेकिन नागार्जुन ने इसे कभी भाव नहीं दिया। खुद रेणु ने भी नहीं। 1955 में ही रेणु ने यह कहा-- 'सही माने में प्रेमचंद की परंपरा को फिर से 'बलचनमा' ने ही अपनाया। नागार्जुन जी पर बहुत भरोसा है मुझे। मेरी स्थिति उस छोटे भाई-सी है, जो अपने बड़े भाई के बल पर बड़ी-बड़ी बातें करता है।'
           हिन्दी संसार भले नागार्जुन को प्रथम आंचलिक उपन्यासकार कहकर चिह्नित करे, उन्होंने हमेशा इससे इनकार किया। जिन बातों को लेकर उनके उपन्यास लिखे गये थे, उन्हें आंचलिक कहकर कोटिबद्ध किया जाना उन्हें कभी सही नहीं लगा। जबकि रेणु की स्थिति बिलकुल अलग थी। वह खुद भी अपने लेखन को 'आंचलिक' कहते और औरों से भी इस कारण प्राप्त होनेवाली विशेष कोटि उन्हें पसंद आती थी। नागार्जुन कहीं बेहतर समझ रहे थे कि वह क्या कर रहे हैं, और इससे इतर रेणु के काम का महत्व क्या है, इसलिए 'मैला आंचल' के आने से उनका उपन्यास-लेखन किसी भी तरह प्रभावित नहीं हुआ। एक के बाद एक उनके उपन्यास आते रहे, और वे कमोबेश उसी मिजाज के भी बने रहे। आगे जब उनका उपन्यास लिखना छूटा भी तो इसके कारण व्यक्तिगत थे, उनकी यात्राओं और जनाकीर्णता ने उन्हें आगे इस तरह एकाग्र ही नहीं होने दिया जो ऐसे गद्यलेखन के लिए जरूरी होता है। दूसरे, भारतीय उपन्यास की समझ शुरू से ही उनपर तारी थी, यानी कि हिन्दी में लिखा गया भारतीय उपन्यास, जिससे भारत के यथार्थ को समझा जा सकता हो। इसलिए, समान भूमि, भाषा, और कथा-परिवेश के बावजूद दोनों लेखकों की परस्पर प्रीति अंत तक बनी रही।
           रेणु के लेखन को नागार्जुन ने, स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद जो हमारी कथाकृतियों में ढेर सारे परिवर्तन आने लगे थे, उस संदर्भ के साथ जोड़कर देखा है। वहां वह कहते हैं कि चिंतन में तो ताजगी के नये-नये आभास प्रकट हुए ही, शब्द-शिल्प की नयी-नयी छवियां भी तेजी से उभरने लगीं थीं, उनमें ताजगी और अनूठापन अधिकाधिक उजागर होने लगा था। कथाकार रेणु को इनमें सबसे प्रतिभाशाली वह इस आधार पर मानते हैं कि उनकी बुनावट नितांत घनी थी, और ढेर सारे दुर्लभ और बहुरंगी छवियों को मिलाकर वह एक ताजा और अनूठी बात कह जाते थे। उन्होंने लिखा है-- 'ऐसा उत्कट मेधावी युवक यदि कलकत्ता जैसे महानगर में पैदा हुआ होता और यदि वैसा ही सांस्कृतिक परिवेश, तकनीकी उपलब्धियों का वही माहौल इस विलक्षण व्यक्ति को हासिल हुआ रहता तो अनूठी कथाकृतियों के रचयिता होने के साथ-साथ सत्यजित राय की तरह फिल्मनिर्माण की दिशा में भी यह व्यक्ति कीर्तिमान स्थापित कर दिखाता। रेणु की कथाकृतियों में ऐसे बीसियों पात्र भरे पड़े हैं।'
           लेकिन, सब सपाट-ही-सपाट हो, ऐसा भी नहीं था। दोनों के मतान्तर भी कम नहीं थे। रेणु के प्राण भले औराही की गीली पांक में बसते हों, या चाहे उनका मन सबसे ज्यादा ठेठ ग्रामीण समाजियों की संगत में लगता हो, वह जब अपने व्यक्तिगत जीवन में लौटते तो अपने दैहिक 'स्व' के प्रति बहुत सजग हो जाते थे। यह उनके पहनावा-ओढ़ावा से लेकर उनके रहन-सहन तक में दिखता था। यह  उनकी अपनी तरह की संभ्रान्तता थी। लंबे बाल के शौकीन थे।  लंबे बाल की परवाह रखने की अपनी सजगता के बारे में उन्होंने एक जगह कहा है-- 'लोग पौधों की देखभाल करते हैं, बालों की देखभाल मेरी हॊबी है।' अपनी इस स्व सजगता से रेणु को फायदा था कि यह उन्हें कलाओं के उच्च और संभ्रान्त वर्ग में स्वीकार्य बनाती थी। यह अपने आप में एक बड़ा फायदा था, लेकिन नागार्जुन को यह सिरे से नापसंद था। 'आईने के सामने' में उन्होंने अपने हुलिये का मजाक उड़ाते वक्त रेणु को भी लपेट लिया है-- 'ओ आंचलिक कथाकार,  तुम्हारी आंखें सचमुच फूटी हुई हैं क्या? अपने अन्य आंचलिक अनुजों से इतना तो तुम्हें सीख ही लेना था कि रहन-सहन का अल्ट्रामाडर्न तरीका क्या होता है।' रेणु की अपनी जीवन-शैली थी, बचपन की निर्मित थी जिसमें कोइराला परिवार और औराही हिंगना की बराबर बराबर की साझेदारी थी। वह एक किसान थे, जबकि नागार्जुन कृषकपुत्र। यहां व्यवस्था थी, वहां विद्रोह था। रेणु दर्दी किसान थे, यह उनका विशेष गुण था। मगर थे किसान।
           रेणु को भी नागार्जुन से आपत्तियां कम न थीं। सबसे बड़ी आपत्ति तो उनके मुद्दे बदलते रहने पर थी। 1967 में बिहार की संविद सरकार ने उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाने का ऐलान किया। इसका बहुत जोरदार विरोध हुआ। रेणु ने इस घटना-क्रम की रिपोर्टिंग 'दिनमान' में की थी। स्वयं रेणु की रिपोर्ट में साक्ष्य है कि यह गैरजरूरी था, और केवल एक मुस्लिम नेता को संतुष्ट करने के लिए किया गया था। मामला लेकिन उर्दू का था, इसलिए हिन्दी का कोई लेखक इसके विरोध में नहीं आया। लेकिन नागार्जुन कूद आए। यह उनकी अपनी राजनीतिक समझ थी, जो जनता से मिलती थी। अब जबकि दूसरी राजभाषा बनाने के बाद सच में उर्दू भाषा-साहित्य को क्या फायदा हुआ यह हमारे सामने है, हम समझ सकते हैं कि सच में इस पचड़े में पड़ने का वह समय नहीं था। समाजवादियों के हाथ में सत्ता आई थी। बड़े-बड़े लक्ष्य थे बचे के बचे। रेणु ने तुलसी जयन्ती के दिनवाली गांधी मैदान की सभा की रिपोर्टिंग की है-- 'मंच पर साहित्य सम्मेलन‌ के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा बैठे हैं-- डा. लक्ष्मी नारायण सुधांशु(कांग्रेस), ठाकुर प्रसाद(जनसंघ) और... और... नागार्जुन।.... प्रस्ताव प्रस्तुत किया नागार्जुन जी ने। प्रस्ताव पढ़ते समय उनकी वाणी बौद्ध-भिक्षु जैसी ही थी। मगर जब प्रस्ताव पर बोलने लगे तो 'नागा बाबा' हो गये।' रेणु की आपत्ति अपनी जगह जायज थी।
           आगे वह भी समय रहा जब दोनों ने साथ-साथ राजनीति की। वह संपूर्ण क्रान्ति का दौर था। उसमें भी कोई प्रगतिशील लेखक नहीं गया था। बड़े लेखकों में यही दो थे। नुक्कड़ कविता का तभी आविष्कार हुआ था, जिसने परिवर्तन में गजब भूमिका अदा की। उसके हिट कवि नागार्जुन थे। रेणु हर गोष्ठी में रहते, लेकिन कविता नहीं पढ़ते। उनकी भूमिका दूसरी होती थी। गोष्ठी जब खत्म होने लगती, रेणु और रामवचन राय गमछा फैलाकर श्रोताओं में घूम जाते। जो पैसे आते, उनमें से लाउडस्पीकर आदि का किराया वगैरह देकर जो बचता उसे जरूरतमंद कवियों में बांट दिया जाता। एक जरूरतमंद नागार्जुन भी हुआ ही करते थे। फिर वह दौर आया, जब आपातकाल के दौरान बक्सर जेल में बंद नागार्जुन भयंकर बीमार पड़ गये। उनके बचने की उम्मीद न रही। तो, रेणु ही थे जिन्होंने लेखकों का प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन तैयार कराया था कि उन्हें जेल से मुक्त किया जाए। उन्हें जरूरत भर लेखकों के दस्तखत नहीं मिल सके, और नागार्जुन की जेल-मुक्ति के लिए दूसरे प्रयास करने पड़े, यह अलग बात है।
           अब, मजे की बात यह भी है कि रेणु ने उर्दू प्रकरण वाली अपनी रिपोर्ट में जिन नागार्जुन पर यह भाषण देने के लिए कि 'उर्दू का विरोध करना अगर 'जनसंघी' होना है तो मैं एक सौ जनसंघी होने को तैयार हूं', बड़ी खिंचाई की थी, उन्हीं नागार्जुन को 'संपूर्ण क्रान्ति' वाले जेल-जीवन में जब यह अहसास हो गया कि अपनी वैधता प्राप्त करने के लिए इस आन्दोलन को आर एस एस ने दबे पांव हाइजैक कर लिया है, तो वह वहां से निकल आए, लेकिन रेणु की अपनी राजनीतिक समझ थी कि वह अंत-अंत तक वहीं बने रहे। लेकिन, जो कि सच्चाई भी थी, रेणु का जब निधन हुआ, नागार्जुन ने अपने स्मृति-लेख में लिखा-- 'प्रशासकीय तानाशाही के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनेवालों में रेणु अगली कतार में भी आगे ही खड़े रहे।'
           और, जहां तक रेणु की संभ्रान्तता और जनांदोलनी तेवर के बीच तारतम्य का प्रश्न है, गोपेश्वर सिंह के लिखे एक संस्मरण का प्रसंग याद आता है। एक दिन कभी पटना के फुटपाथ किनारे के मजदूर होटल में आराम से बैठकर नागार्जुन रोटी-सब्जी खा रहे थे। गोपेश्वर जी ने देखा तो हैरत में पड़ गये। अभी हाल में रेणु का निधन हुआ था। वह चारों ओर चर्चा में बने हुए थे। गोपेश्वर जी ने नागार्जुन से पूछा-- 'बाबा, फणीश्वरनाथ रेणु यहां रोटी खाते या नहीं?' नागार्जुन ने तपाक से जवाब दिया-- 'नहीं। रेणु यहां रोटी नहीं खाते, लेकिन वे इन लोगों के लिए गोली जरूर खा लेते!'


Friday, April 8, 2022

की मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी? :: तारानंद वियोगी


 की मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी?


तारानंद वियोगी



कोनो भाषा ककर होइ छै, तकरा बुझबाक दूटा पैमाना भ' सकैत अछि। एक जे ओ कोन समूह छै जकर जीवनक समूचा अभिव्यक्तिक माध्यम वैह टा भाषा छै। मने ओइ भाषा कें छोड़ि क' दोसर भाषा बाजब ओकरा नै अबै छै। दोसर भाषा बाजै बला लोकक भाव भने संगतिवश ओ बूझियो जाय मुदा जखन उतारा देत तं अपने भाषा मे। एखनो गामघर मे हमसब एहन घनेरो लोक कें देखि सकै छियै, जखन कि कटु वास्तविकता ई अछि जे आइ समुच्चा मिथिला द्विभाषी(मैथिली आ हिन्दी) समुदाय मे परिणत भ' चुकल अछि।

           अइ पैमानाक आधार पर देखी तं मैथिली कोनो एक जातिक भाषा भइये नै सकैत अछि। भाषा नामक वस्तु कोनो एक जातिक अथवा एक धर्मक वा एक संप्रदायक किन्नहु नै भ' सकैत अछि। आइ काल्हिक विद्वानक बात तं छोड़ू, चौदहम शताब्दीक हमर महाकवि विद्यापतियो अइ सत्य सं वाकिफ रहथि जे भाषा कोनो जाति, धर्म, संप्रदाय सं बहुत ऊपरक वस्तु होइत अछि। मनुष्य सं मनुष्य कें जोड़बाक जे ताकत भाषा मे छै से जाति-धर्म-संप्रदाय मे नै भ' सकैत अछि। ई सत्य थिक मुदा सत्य कें देखबाक आंखि सब कें होइते हो, से कोनो युग मे नै रहल अछि। आजुक समय मे तं सत्यक जे दुर्दशा छै से सब गोटे देखिये रहल छी।

           तें, मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, ई बात सिरे सं गलत अछि। अइ कथन मे सत्यक लवलेशो मात्रा नै छै।

           दोसर पैमानाक बात करी। कोनो भाषा ककर छी, एकर निर्णय के आधार ई भ' सकैत अछि जे कोन समूहक धर्मक भाषा, धार्मिक अनुष्ठानक भाषा मैथिली छी। धर्मे किऐ? अइ दुआरे जे मनुष्य जकरा पवित्रतम बुझैत अछि तकरे अपन धार्मिक कृत्य संग जोड़ैत अछि। अपन समाज बीच देखू तं पता लागत जे बहुतो एहन जाति मिथिला मे बसैत अछि जकर धर्मक भाषा मैथिली छियै। अहां कोनो यादव के ओतय आयोजित धर्मराज-पूजा मे शामिल होउ। देखबै जे भजन आ मंत्र तं मैथिली मे रहिते छै, जखन भगताक भाव मे साक्षात धर्मराज वा कि कोनो आन देवता प्रकट होइ छथिन तं ओ देवता सेहो मैथिलिये बजैत छथिन। तहिना अहां डोम के ओतय देखियौ, मुसहर के ओतय देखियौ, धार्मिक कृत्य सहित हिनका लोकनिक देवता समेत के भाषा अहां कें मैथिली भेटत। अइ पैमानाक मोताबिक तं मैथिली हिनके सभक भाषा छी। अइ पैमानाक मोताबिक तं मैथिली आर भने कोन्नो जाति के भाषा हुअय, ई ब्राह्मणक भाषा नै छी, कारण ब्राह्मण लोकनि के धार्मिक कृत्यक भाषा तं आइयो संस्कृत छियनि।

           मुदा, सत्य एते सपाट हो सेहो बात नै अछि। आइ हम सब ब्राह्मणो लोकनि के घर मे गोसाउनिक पीड़ी पुजाइत देखै छी। ई पीड़ी की छी? ई छी चैत्य। सुदूर इतिहास मे जा क' देखब तं पता लागत जे विदेहक आर्य लोकनि चैत्यपूजक नै छला। वैशालीक लिच्छवि लोकनि चैत्यपूजक रहथि जे बुद्धक समर्थक छला। मिथिलाक पचपनिया समाज चैत्यपूजक छला जे सेहो बुद्धक समर्थक रहथि। पचपनिया लोकनिक घर मे जं पीड़ी(चैत्य) होइ छै तं से बुझबा योग्य होइत अछि। मुदा, ब्राह्मण लोकनिक घर मे पीड़ी कोना होइत छनि? महापंडित लोकनि कें जं एकर रहस्य पुछबनि तं 'लोकाचार' के नाम लेता। कते आश्चर्यक बात छी जे अखिल भारत मे धर्मतत्वक निर्णायक मिथिला  के अपन घरे मे 'लोकाचार' शास्त्राचार कें पराजित क' देने अछि। आइये नै, शताब्दियो सं। असल मे कट्टरपंथ आ उदारवादक उठा-पटक सब युग मे सदा सं चलैत आयल अछि। पंडित जी अपने तं संस्कृत कें गसिया क' धयनहि रहला मुदा पंडिताइन अपन घर अपना जूति सं चलबय लगली। लिच्छवि आ विदेहक परंपरा मिलि क' एक भ' गेल। ब्राह्मणक घर मे धर्मराज पूजित भेला, जे एक निर्गुण देवता थिका आ जिनकर पूजापद्धति बौद्ध लोकनिक पूजापद्धतिक जीवित अवशेष छियनि। आब धर्मराजक पूजाविधान तं मैथिलिये मे हो। चौदह देवान मे एक मीरा साहेब छथिन, ओ मुसलमान छथि, मुदा हमरा-अहांक घर मे ओ शताब्दियो सं पूजित छथि। हुनकर गाथाक भाषा मैथिली अछि। मैथिल संस्कृति कें अइ तरहें देखबाक चाही।

            दोसर दिस, मैथिली भाषा मे लिखित प्राचीनतम साहित्य जे उपलब्ध अछि से ब्राह्मणेतर वर्गक शूद्र, अतिशूद्र, महाशूद्र लोकनिक रचना छियनि। स्वयं महाकवि विद्यापति जाहि प्रकारक भाखा-रचना कें अपन आदर्श बनौलनि, से मूलत: शूद्र लोकनिक आविष्कार रहनि। ब्राह्मण लोकनि तं भाखा-रचना सं घृणा करै छला आ अइ दुआरे विद्यापतियो सं घृणे करैत रहथि, हुनकर उपेक्षा करैत रहला। आइ जे हमरा लोकनि विद्यापतिक एते चला-चलती देखै छी, मोन रखबाक चाही जे से अही डेढ़ सौ बरसक देन थिक।

           अइ सब तरहें तं ई कथन बेबुनियाद ठहरैत अछि जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा थिक। मुदा, तखन प्रश्न ई अछि जे ई बात बेर-बेर उठैत किए अछि? की एकरा पाछू कोनो इतिहास अछि? जी हं, इतिहास अछि आ से बहुत शर्मिन्दगी भरल इतिहास अछि।

           बीसम शताब्दीक पहिल दशक बिहार मे जातीय अस्मिताक उदयक समय छल। हमरा जेना कि मोन पड़ैत अछि, मैथिल महासभाक स्थापनाक आगुए पाछू गोप महासभाक स्थापना भेल छल। गोपे महासभा जकां मैथिल महासभा सेहो पूर्णत: एक जातीय संगठन छल। तखन एकर नाम ब्राह्मण महासभा किए ने भेलै? ब्राह्मण महासभा अलग सं एक स्वतंत्र संस्था छल। कायस्थ महासभा सेहो जखन अलग सं छल, आ इहो मोन रखबाक चाही जे तहिया कायस्थक गणना शूद्र वर्ण मे होइत छल। एहना मे कोनो जातीय महासभा दू गैरबराबर जाति कें शामिल क' क' जखन नै बनल छल तं एहन अजीबोगरीब संगठन मैथिले महासभा किए भेल जकर सदस्यताक लेल केवल आ केवल मैथिल ब्राह्मण आ कर्णकायस्थ योग्य मानल गेला? एहि पाछू जे राजनीति छल से स्पष्टत: राजभक्त लोकनिक कवच तैयार करब छल। दरभंगा राजक शोषणकारी व्यवस्था जगजाहिर अछि, आ स्वयं महाराजे एहि संस्थाक निर्माण करेने छला, वैह सर्वेसर्वा रहथि। इतिहास कहैत अछि जे 'मैथिल' शब्द अही ठाम अपन मिथिला-बोध सं भटकि गेल। असल मे कहल जाय तं अपन शोषणकारी सत्ता कें अनामति रखबाक हेतु समर्थक तैयार करबाक लेल एकरा पूरा रणनीतिपूर्वक मिथिला-बोध सं भटका देल गेलै।

           अइ संपूर्ण घटनाक्रम मे सब सं दुर्भाग्यपूर्ण ई भेल जे मैथिल महासभा 'अप्पन' भाषाक रूप मे मैथिली कें जोड़ि लेलक। मिथिला मे बसनिहार सब जातिक भाषा मैथिली छल, मुदा आब ई केवल दू जातिक भाषा बनय जा रहल छल। हमरा लोकनि कें आभारी हेबाक चाही गोप महासभाक ओहि महामना पूर्वज लोकनिक प्रति, जे लिखित रूप मे तहिया(1910 मे) ई घोषणा केलनि जे मैथिली तं हमरो अभक भाषा छी। आ, अही बात कें आधार बना क' ओ लोकनि दावा केलनि जे मैथिली जें कि हुनको सभक भाषा छियनि तें हुनको लोकनि कें मैथिल मानल जाय आ मैथिल महासभाक सदस्यता देल जाय। घृणा आ अवज्ञापूर्वक मैथिल महासभा अइ मांग कें अस्वीकार केलक। एकरे प्रतिक्रिया मे गोप सभा संगठित भेल छल आ लिखित घोषणा कयल गेल जे मैथिली हुनका सभक भाषा नै छियनि। जाधरि राजतंत्र आबाद रहल, तकर बादो कैक बरस धरि मैथिल महासभा जिंदा रहल। ओकर प्राय: हरेक अधिवेशन मे क्यो ने क्यो उदारवादी पंडित ई प्रस्ताव राखैत रहला जे मिथिला मे बसनिहार सब जाति कें मैथिल मानि लेल जाय, हुनकर भाषा मैथिली कबूल क' लेल जाय, मुदा नहि। मैथिल महासभा मरि जायब पसंद केलक मुदा ककरो आन के दावेदारी गछब स्वीकार नै केलक। मैथिली राजाक भाषा भ' क' रहि गेल, प्रजाक भाषा नहि बनि सकल। मैथिली शोषकक भाषा बनल, शोषितक नै। मैथिली राजभक्ति आ जी-हजूरीक भाषा बनल, संघर्ष आ विरोधक नहि। जं आगू चलि क' मैथिली साहित्य मे ई सब युगीन गुण पैदा क' क' एकर सामर्थ्य-वृद्धिक प्रयास कयलो गेल तं राजसंस्कारित मठाधीश लोकनिक द्वारा एहन प्रयास सब कें हतोत्साह कयल गेल, ओकर उपेक्षा कयल गेल।

           अहां कहि सकै छी जे अइ इतिहासक चर्चा करब बेमतलब के गाड़ल मुरदा कें उखाड़ब थिक। मुदा दुर्भाग्य सं अहांक ई कहब सही नै भ' सकत। एखन हाले (बस पछिला मास) मे हम सब देखने छी जे मैथिली अखबार मे दरभंगा राजक शोषणकारी व्यवस्थाक चर्चा भेला पर कोना 'मैथिल' भाइ लोकनि के खून खौलि उठल रहल रहनि। देश भने आजाद हो, संविधान भने लागू हो, मुदा 'मैथिल' लोकनि के आदर्श आइयो दरभंगे महराज छथिन। हुनकर शोषण पर लिखबाक हो तं अहां अंग्रेजी मे जा क' लिखू, हिन्दी मे जा क' लिखू, मुदा क्यो जल मे रहि क' मगर सं बैर करता, से चलै बला नहि अछि। आब कहू जे मैथिली ककर भाषा छी?

           सही बात छै जे दरभंगा नरेश ब्राह्मण रहथि, ब्राह्मणक उपकारार्थ बहुतो काज केलनि, ओ हुनका लोकनिक माथक मुकुट छथिन, हुनका लोकनिक शाश्वत स्मृति मे खचित छथिन। मुदा, बात अइ ठाम ब्राह्मणक नै, मैथिलीक भ' रहल अछि। हुनका लोकनिक शाश्वत स्मृति मे जं महराज खचित छथिन, तं की अहां सोचै छी जे यादव लोकनि कें, पचपनिया लोकनि कें कोनो स्मृति नै होइ छै? ओइ घृणा आ अवज्ञा कें ओ लोकनि बिसरि जेता आ अहांक स्मृति बला जयजयकार सबतरि निर्द्वन्द्व पसरि जायत? ताहू मे अइ स्थिति मे जखन कि बोलचाल मे मैथिली हुनके छियनि, धार्मिक कृत्य मे मैथिली हुनके छियनि, साहित्य-रचनाक आदि प्रेरणा हुनके पूर्वजक देन छियनि।

           मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, ई बात स्वयं ब्राह्मण लोकनि स्थापित केने छला। हुनकर उत्तराधिकारी लोकनि अपन रचना सं, अपन विचार सं, अपन निर्णय आ रणनीति सं, अपन वर्चस्व आ मनमानापन सं साबित करैत रहला अछि जे कि आइयो यथावत जारी अछि। यैह बिहार विधान सभा थिक जतय कहियो स्व. बी. पी. मंडल बाजल छला जे 'मैथिली हमारी माता नहीं, विमाता है।' विमाता सेहो तं अंतत: माते होइ छै। मुदा,ओ दोसर युग रहै। आइ समय बदलि चुकल अछि। संस्कार आ सुविधा दुनू परिवर्तित भ' गेल अछि। तें, अइ तरहक बात जं कतहु सुनी जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी तं हमरा लोकनि कें आत्मावलोकन आ आत्मालोचन करबाक चाही, ई नै जे एकरा 'सुनियोजित षड्यंत्र' कहि क' अपना वर्गक छुद्र मनोवृत्ति बला ठिकेदार 'विद्वान' सभक मनमानी कें नैतिक समर्थन प्रदान करय लागी। अइ मुद्दा पर नितान्त होश मे आबि क' सोचबाक बेगरता छै। 

(मिथिला आवाज, पाक्षिक सं साभार)