Wednesday, June 10, 2026

नागार्जुनक संस्कृत आ बंगला कविता

तारानंद वियोगी



 सब गोटे जनैत छी जे अपन मातृभाषा मैथिली आ कार्यभाषा हिन्दीक अतिरिक्त यात्री, नागार्जुनक नाम सँ संस्कृत आ बंगला मे सेहो कविता लिखलनि। बंगला मे तँ हुनक काव्य-लेखन आयुक चारिम चरण मे जा क' भेलनि, ठीक ओहिना जखन सत्तर पार केलाक बाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर एक नव काज हाथ मे लेने रहथि--चित्रकला। ठीक ओहिना सत्तर पार नागार्जुन बंगला मे कविता लिखब आरम्भ केलनि। बीस-बाइस बरखक अवस्था मे यात्री पहिल बेर कलकत्ता गेल छला आ तखनहि सँ बंगला पर हुनकर पूर्ण अधिकारे टा नहि भ' गेल छलनि, अपितु भारतक महानगर सब मे कलकत्ते छल जे हुनका बहुत पसंद रहनि आ बारंबार, हरेक छोट-पैघ अवसर पर ओ कलकत्ता जाइत रहला, आ कैक बेर तँ एहनो भेलै जे ओ बिनु काजोक बहुत-बहुत दिन धरि कलकत्ता मे बनल रहला। ओहि ठामक समाज हुनका दृष्टि मे खास अप्पन समाज छल, जतय उदारता सेहो रहै, बहुलता सेहो, आ खुलापन सेहो। ओ अपन इंटरव्यू सब मे बेर-बेर बंगाली समाज, कलकत्ताक सामाजिक पर्यावरणक बहुत प्रशंसा कयने छथि। जखन हुनका पुछल गेलनि जे बंगला मे कविता लिखब अहाँ किए शुरू केलहुँ, तँ विना कोनो विशेष कारण बतेने ओ एतबे टा उतारा देलखिन जे बंगला हमरा प्रिय अछि, तें लिखलहुँ। रवीन्द्रनाथक प्रसंग सँ बूझल जा सकैत अछि जे अपन समयक हरेक महान कविक जीवन मे एकटा समय अबैत छैक जखन ओ पटरी बदलैत अछि,  विविधरंगी जीवनक सम्मान मे, अपन अभिव्यक्तिक लेल कोनो नव मार्ग पकड़ैत छथि।

             ई तँ भेल बंगला मे लेखनक प्रसंग। मुदा, संस्कृत मे ओ कहिया कविता लिखलनि? स्वयं नागार्जुन जेना बतौने छथि, 1926 मे जखन यात्री मात्र पन्द्रह बर्खक छला, हुनका जीवन मे तीन टा एहन घटना घटलनि जे तरौनी गामक वैद्यनाथ मिश्र कें विश्वविश्रुत यात्री नागार्जुन बनबाक मार्ग पर ठेलि देलकनि। पहिल घटना तँ ई भेल जे अपन परोपट्टा मे एक यैह टा विद्यार्थी छला जे प्रथमा परीक्षा मे पास भेल छला। एहि सँ सौंसे इलाका मे हुनकर नाम पसरि गेलनि। प्राय: एकरे फलस्वरूप दोसर घटना भेल जे सुलतानगंज मे शिक्षकक नोकरी केनिहार अनूकका, अर्थात पं. अनिरुद्ध मिश्र ओहि साल गर्मी-छुट्टी मे गाम एलाह आ एहि बालकक यश सुनि भेंट केलनि तँ बालकक प्रतिभा कें चीन्हि अपने दिस सँ प्रस्ताव केलखिन जे हम तोरा कविता लिखब सिखा दैत छियह। एहि काज मे वैद्यनाथक मोन तते रमलनि जे छुट्टी बितैत-बितैत दर्जन भरि सँ बेसी छन्द पर हुनकर पकड़ भ' गेल छलनि। एहि कविता-लेखनक परंपरित नाम होइत छलैक--समस्या-पूर्ति। कविताक एक चरण, जकरा समस्या कहल जाइक, गुरु दैत छलखिन, आ बांकी तीन चरण शिष्य कें पूरा करबाक रहैत छलैक। अनिवार्य शर्त ई छल जे प्रथम चरण जाहि छन्द मे, आ जाहि भाव-दशाक होइत छलैक, अगिला तीन चरण कें सेहो ठीक-ठीक ओही छन्द आ ओही भाव-दशा पर केन्द्रित हेबाक रहैत छल। मुदा, एहि काव्य-रचनाक भाषा की होइत छल? आवश्यक रूप सँ भाषा संस्कृत होइत छलैक। ओ समय छल जखन मिथिला मे कविता लिखबाक मतलब संस्कृत कविता होइत रहै, ओही मे यश छलैक आ अर्थ-प्राप्तिक जँ कोनो संभावना होइक तँ सेहो ओही मे रहैक। पन्द्रह बरखक अवस्था सँ वैद्यनाथ जे काव्य-लेखन शुरू केलनि, से संस्कृते मे छल।

                     1926 मे घटित तेसर जे घटना छल, से रहय वैद्यनाथक गाम छुटब। तरौनी सँ गोनौली ओ मध्यमा करय गेल छला। गोनौली मे तीन वर्ष धरि लगातार रहि क' मध्यमा परीक्षा पास करब संभव नहि भेलनि तँ तेसर वर्षक पढ़ाइ पचगछिया जा क' पूरा केलनि। ओहि ठाम जाहि सद्गृहस्थ-- पं. बाबूजी झा, ज्योतिषीक ओतय हुनका आश्रय भेटलनि, ओहि पंडित जीक एक बालक छला तारिणीश झा, जे आगू चलि क' संस्कृतक यशस्वी अध्यापक भेला आ पचासो संस्कृत ग्रन्थक टीका लिखलनि, ओहि समय प्रथमाक विद्यार्थी छला। वैद्यनाथ कें इहो दायित्व रहनि जे ओ तारिणीश कें पढ़ाबथि आ मार्गदर्शन करथि। पं. तारिणीश झा अपन संस्मरण मे लिखैत छथि-- 'वैद्यनाथ जी बहुत तेजगर आ भद्र विद्यार्थी रहथि। ओ हमरो पढ़ा देल करथि। होनहार विरवान के होत चीकने पात-- एहि लोकोक्तिक अनुसार वैद्यनाथ जी मे काव्य-प्रतिभा प्रस्फुटित होअए लागल। ओ संस्कृत मे श्लोक तथा मैथिली मे कविता लिखथि। हमरा तँ ओते ज्ञान नहि छल, लेकिन लोकक मुँहें हुनक प्रशंसा सुनि पढ़ै मे परिश्रम कर' लगलौं। प्रथम श्रेणी मे प्रथमा पास केलौं। ओहो सम्पूर्ण मध्यमा पास केलनि। तकर बाद ओ अपन गाम गेलाह।' (प्रवासी, यात्री स्मृति विशेषांक, संपादक- नीरजा रेणु, मिथिला सांस्कृतिक संगम, प्रयाग/नवंबर, 2000)

               एहि उद्धरणक उद्देश्य केवल एतबे सूचित करब अछि जे मध्यमा तेसर खंड पूर्ण होइत-होइत वैद्यनाथ संस्कृत मे सैकड़ो श्लोक बना चुकल रहथि। तहिना, जखन लंका मे ओ बौद्धशास्त्रक अध्ययन करैत छला, ओहि समय सिंहली लिपि मे हुनकर एक संस्कृत काव्य-पुस्तिका 'धर्मालोकशतकम्' छपबाक सूचना कैक स्रोत सँ प्राप्त होइत अछि। ई पुस्तिका कतहु प्राप्त नहि भेल अछि, आ तहिना विद्यार्थी-जीवन मे जे सैकड़ो छन्द ओ लिखने रहथि, सेहो सब कतहु नहि भेटल अछि। समकालीन संस्कृत काव्यक क्षेत्र मे हुनक कतेक प्रतिष्ठा रहनि, तकर अनुमान एहि सँ कयल जा सकैए जे उज्जैनक सुप्रतिष्ठित कालिदास समारोहक कवि-सम्मेलन सत्रक अध्यक्षता नागार्जुन करैत छला। हुनकर परवर्ती संस्कृत कविता सब जे पत्र-पत्रिका मे छपल तकर टीका आ भाषानुवाद डाॅ. राममूर्ति त्रिपाठी, डाॅ. राधावल्लभ त्रिपाठी-सन प्रतिष्ठित आलोचक लोकनि कयने छथि।

              आइ हमरा लोकनि कें नागार्जुनक मात्र अठारह गोट संस्कृत कविता हुनकर रचनावलीक तेसर खंड मे प्राप्त होइत अछि। ई कविता सब 1971 सँ 1995 के बीच लिखल गेल अछि। स्पष्ट अछि जे 1971 सँ पहिनेक हुनकर संस्कृत कविता कें ताकि निकालबा मे एखन धरि हमरा लोकनि सफल नहि भेल छी।

                हिन्दी आ मैथिली, दुनू कें मिला दी, तखन यात्री कविक जे स्वरूप बनैत छैक, हुनकर संस्कृत वा बंगला कविता ताहि सँ भिन्न नहि छैक। संस्कृत मे लिखैत बहुतो रास बात ओ कवि-परम्परा सँ लेलनि। मुदा, ओहि मे अपन जे नवीन क्षितिजक विस्तार केलनि, से विशेष अछि। अपन कविता 'वाग्विभूति:' मे ओ अपन कविताक स्वभाव पर गप करैत लिखलनि अछि-- जे 'विक्षोभक उफानवाली हमर कविता जे कि निरंतर मंथन सँ आर अधिक घनीभूत भेल अछि, आ जे कि आक्रोश (जन-आक्रोश) सँ जनमल अछि; आ जे जड़ता कें तोड़ि निन्न कें उड़ा देनिहारि अछि—ओहि छन्दमयी वाणीक शक्ति हमरा मुख पर प्रखरता सँ चमकय। एकरहि स्वाद सँ मुग्ध भ' क' हमर ई मन-रूपी घोड़ा, बिना कोनो भटकावक आ बिना कोनो दीनताक, एहि समुच्चा पृथ्वी पर—समुद्रक छोर सँ ल' क' सेतुबंध धरि—निरंतर निर्भीक भ' क' दौड़ैत रहय।'

           हमरा लोकनि अवगत छी जे सन् 1971 मे यात्री तीन सप्ताह लेल सोवियत संघ गेल छला। ओतय ओ क्रेमलिनक प्रासाद, जे कि आब एक विख्यात संग्रहालय थिक, मे अवस्थित शवाधानी मे राखल लेनिनक दर्शन करय गेलाह। लेनिन महानक साक्षात दर्शन सँ जे भाव हुनका मन मे आयल, तकर अभिव्यक्ति लेल ओ संस्कृत मे 'लेनिन स्तोत्रम्' लिखलनि। ओहि कविता मे पांती अबैत छैक--

स्वच्छस्फटिक मंजूषा सा मयाप्यवलोकिता। 

धन्योस्मि कृतकृत्योस्मि सुफले मम चक्षुषी।।

बहुमूल्याश्मखचिता शवाधानी तवाद्भुता।

विराजते गुफागर्भे क्रेमलिन-प्रासाद प्रांगणे।।

(ओहि स्वच्छ स्फटिक (कांच)क मंजूषा (बक्सा) कें आइ हमहू अपना आँखियें देखलहुँ। आइ हम धन्य भ' गेलहुँ, हमर जीवन कृतार्थ भ' गेल आ हमर आँखि सुफल भ' गेल।

​बहुमूल्य रत्न सब सँ जड़ित अहाँक ई अद्भुत शवाधानी (ताबूत), क्रेमलिनक भव्य प्रासादक प्रांगण मे एक सुरक्षित गुफाक गर्भ मे सुशोभित भ' रहल अछि।)

             एहि कविता मे जे लेनिनक प्रति नागार्जुनक श्रद्धा अभिव्यक्त भेल अछि, तकर कारण सेहो भारतीय परम्परा मे उपलब्ध अछि। कविता मे एक ठाम ओ कहैत छथि-- 'मुनीनां तं मुनिश्रेष्ठं कार्ल मार्क्सम् नाम्यहम्'-- कार्ल मार्क्स एक श्रेष्ठ मुनि छला। भारतीयता मे अनेक मुनि अनेक सिद्धान्तक भेल छथि। एहन नहि जे भारतीयता कोनो एक खासे परम्पराक मुनिक प्रति श्रद्धा रखैत हो। स्वयं कविगुरु रवीन्द्रनाथ ई प्रश्न उठौने छथि जे 'की दोसर परम्पराक मुनि अथवा आचार्य हमरा लेल कम आदरणीय छथि?' तात्पर्य जे नहि, समान रूप सँ आदरणीय छथि। लेनिनक विशेषता यैह जे ओ हुनकर प्रथम शिष्य भेलखिन जे हुनकर स्वप्नक संसार कें साक्षात धरती पर उतारि क' देखा देलनि। लेनिन आ जार के संग जे युद्ध भेल छल, ओकर वर्णन देखब तँ लागत जे एक पैघ कवि कोना परम्परा सँ कोनो कवि-प्रसिद्धि कें उठबैत अछि, आ ओहि मे एक नव अर्थ, नवीन छटा भरि दैत छैक। कवि-प्रसिद्धि मे ई पांती राम-रावण-युद्धक विषय मे कहल जाइत अछि। मुदा, नागार्जुन कहैत छथि--

गगनं गगनाकारं सागर: सागरोपम:।

जार-लेनिनयोर्युद्धं जार-लेनिनयोरिव।।

          एहि कविता मे एक श्लोक एहन अछि जाहि मे एकर लिखबाक औचित्य बताओल गेल अछि। स्तोत्र तँ देवता सब पर लिखल जाइछ, लेनिन एहन कोन काज केलनि जे हुनकर योगदान कें देव-तुल्य मानल जाय? श्लोक अछि--

दरिद्रा लुंठिता भीता ध्वस्तप्रज्ञा निरक्षरा:।

त्वयानुशिष्टा ते सर्वे स्वयं शासकतां गता:।।

           एतय जतेक विशेषण सब आयल छै, सब साधारण जनताक लेल। दरिद्र, लुंठित मने शोषित, भयभीत मने सत्ता तर मे पिचायल, निरक्षर। एहि ठाम एकटा आर विशेषण छै-- ध्वस्तप्रज्ञ। एहि शब्द पर कृपया ध्यान दी। प्रज्ञा कहल जाइत छै एहन बुद्धि कें जकरा मे हित आ अहित, सद् आ असद्-- एहि सभ तत्वक निर्णय करबा मे समर्थ हो। अपना सभक परम्परा मे एक शब्द अबैत छैक-- स्थितप्रज्ञ। गीता मे एकर बड़ महिमा बखान कयल गेल छै। ठीक-ठीक एहने महत्वक एक दोसर शब्द, जे स्थितप्रज्ञक ठीक विपरीत ध्रुवान्तक दशा बतबैत अछि, नागार्जुन क्वाइन केलनि अछि-- ध्वस्तप्रज्ञ। मने जकर प्रज्ञा पूर्णत: ध्वस्त भ' चुकल हो। अपना देशक साधारण जन कें देखि लिअ', एहि परिस्थितिक अनुमान क' लेब। यैह दशा तँ जारकालीन रूसोक रहै। लेनिनक महानता एहि बात मे छनि जे एहन-एहन दीन जनक नेतृत्व एहि तरहें केलनि जे ओ सब ने केवल अपन दीन दशा सँ मुक्ति पौलक, अपितु 'स्वयं शासकतां गता:'-- अपना देशक राजपाट स्वयं चलेबा मे समर्थ भ' गेल।

              अन्तिम कविता ओ अपन अनुज पीढ़ीक मैथिली रचनाकार पं. गोविन्द झा पर लिखने रहथि। छव श्लोक मे निबद्ध एहि कविताक चारि श्लोक में पं. गोविन्द झाक गुण-वर्णन भेल छै। हरेक श्लोकक चारिम चरण मे अबैत छैक-- 'गोविन्दाय नमो नम:।' मने एहन गुण सब सँ जे भूषित छथि, ओहि पं. गोविन्द कें हम प्रणाम करैत छियनि। मुदा, एहि कविताक पांचम आ छठम श्लोक एहन छैक जे सम्पूर्ण नागार्जुन-साहित्य मे दुर्लभ छैक। जे लोकनि यात्रीक बारे मे जनैत हेता, ओ इहो बात अवश्ये जनैत हेता जे ओ कहियो अपना आप कें गंभिरता सँ नहि लेलनि। बहुतो ठाम तँ हुनका अपन मजाक अपने उड़बैत देखि सकैत छी। एहू अर्थ मे हुनका अपना युगक कबीर कहल गेलनि जे कबीरदासे जकाँ यात्री सेहो अपन आलोचना अपने क' सकैत रहथि। एहि पांचम श्लोक मे एकर‌ पहिल बेर एकर उनटा भेल अछि जे गंभीरतापूर्वक ओ अपन यथार्थ परिचय देने छथि। एहि श्लोकक चारिम चरण छै-- 'यात्रीनाम्ना प्रथितं यस्य यश: को न जानाति।' मतलब छै जे एहि कविताक रचना जनक-नंदिनी सीताक जन्मस्थान मिथिला मे उत्पन्न वैद्यनाथ नामक व्यक्ति कयने छथि, यात्री नामें जिनकर यश कें के नहि जनैत छथि! बात तँ सही छैक। सुकवि भीमनाथ झा यात्री पर लिखल अपन एक कविता मे कहनहु छथि जे यात्री कें युग-प्रवर्तक वा युग-नायक कहब घोर अनुचित, किएक तँ हरेक युग मे तँ क्यो ने क्यो होइते छथि जिनका अपना युगक नायक कहल जेतनि। मुदा, यात्री तँ एहन छला जे 'युग-युग धरि नहि जोति जकर कम हैत कनेको/ अही युगक युगपुरुष कोना ओ? भने कहय क्यो।'

                जाहि प्रमुख विषय सब पर नागार्जुनक संस्कृत कविता सब छनि, ओहि मे कश्मीरक शोभा पर 'चिनार-स्मृति:', 'चश्माशाही', 'शीते वितस्ता' आदि कविता अद्भुत दृश्यावली सँ भरल अछि। ठीक ओही समय ओ कश्मीरे मे 'हैमी पार्वती' कविता लिखलनि। तहिना एक कविता डल झील पर सेहो। हुनकर एक कविता मिजोरम पर छनि, एक अमेरिकी मुद्रा डाॅलर पर। मध्यप्रदेशक सुप्रसिद्ध भारतभवन पर जे कविता लिखने छथि, से परम मारुख व्यंग्य सँ भरल अछि। हुनकर एक कविता जँ 'गुरुकृपा' छनि तँ एक कविता मे विद्याक देवी सरस्वतीक प्रार्थना कयने छथि, मुदा की मँगलनि अछि माता सरस्वती सँ? हुनके शब्द मे सुनू-- 'लुनातु जनमानसाद् विमतितन्तुजालावली:'-- आमजनक मन पर विभ्रम के जे मोट-मोट जाली पड़ल छै, ओकरा हटाउ, जाहि सँ लोक चीन्हि सकय जे ओकरा संग कोन-कोन तरहक छलावा कयल जा रहल छै, कोना ओकरा सब कें अपने मे ओझरा क' टुकड़ा-टुकड़ा क' देल गेलैए, जाहि सँ लोक असलियत मे बूझि पाबय जे के अपन अछि, के शत्रु थिक।

           हम सब जनैत छी जे नागार्जुन कें एहन लोक सब बहुत प्रिय रहथिन जे परंपरित लीक कें छोड़ि क' चललाह, आ एक नव पथक संधान केलखिन। हिन्दी मे एहन हुनकर बहुतो कविता छनि। एहने एकटा कविता संस्कृत मे ओ महामुनि अगस्त्य पर लिखलनि अछि। कविता अछि--

लक्ष्मी: प्रतीक्षते विष्णुं

वहिरागन्तुमुद्यतम्।

सागरं चुलके कृत्वा

सुखं शेते महामुनि:।।

          कविताक पृष्ठभूमि देखल जाय। प्रसिद्ध मिथक अछि जे महामुनि अगस्त्य समुद्र कें एक्के चुरू मे पीबि गेल छला। जखन पीबि गेला तकर बाद की भेलै? समुद्रक जीवजन्तु सभक तँ जे भेलै से भेलै। मुदा भगवान विष्णुक की भेलनि? ओहो तँ समुद्रे मे वास लेने छथि। कविता मे एलैए जे समुद्र सुखलाक बाद लक्ष्मी विष्णु कें उठेबाक बहुत प्रयास केलखिन, मुदा घोर आलसी विष्णु उठबाक नाम नहि लेथि। अन्त: असगरे लक्ष्मी कें समुद्र सँ बहराबय पड़लनि, आ समुद्र कात मे ठाढ़ि लक्ष्मी आब विष्णुक बाहर निकलबाक प्रतीक्षा क' रहल छथि। आ, ओमहर ओ जे महामुनि छथि, से समुद्र पीबि क' निचैन भ' सूति रहला अछि।

             पौराणिक साहित्यक दृष्टियें एहि कविता मे किछुओ अनर्गल नहि छैक। पुराणकार सब जे विष्णुक चरित्र-चित्रण कयने छथिन, ताहि सँ ई कविता पूरा मेल खाइत छैक। बचल बात विद्रोही अभिव्यक्तिक, तँ हम मध्यकालीन मिथिला(लगभग एक हजार वर्ष पहिने) मे लिखल एक श्लोक एतय उद्धृत करय चाहब जे श्रीधरक 'सदुक्ति-कर्णामृत' मे अज्ञात कविक रचनाक रूप मे प्रकाशित अछि। श्लोक अछि--

लक्ष्मीपयोधरोत्संग कुंकुमायतो हरे:।

बलिरेष स येनास्य भिक्षापात्रीकृत: कर:।।

(विष्णुक जे हाथ, केवल आ केवल लक्ष्मीक स्तन पर टहल मारबाक अभ्यस्त छल, आ जे कुमकुमक लाली सँ सदति लाल बनल रहैत छल, बलिहारी हो ओहि राजा बलिक, जे एहि हाथ कें भिक्षापात्र जकाँ पसारबाक लेल बाध्य क' देलकनि।)

               एतय दूटा कविताक चर्चा विशेष रूप सँ करय चाहब। पहिल तँ 'देशदशकम्।' जेना कि शीर्षके सँ स्पष्ट अछि, अपन देश भारतक गौरव-गरिमाक एहि मे वर्णन कयल गेल अछि। 'देश'क सम्बन्ध मे नागार्जुनक विशिष्ट मान्यता रहनि जे जकरा देश कहल जाइत अछि, से वस्तुत: एक अमूर्त भौगोलिक इकाइ होइत अछि। देशक मूर्त रूप तँ बनैछ ओहि जगह सब सँ, ओहि लोक सब सँ जकरा संपर्क मे व्यक्ति अबैत अछि, जे अन्न-फल कन्द-मूल खा क' पुष्ट होइत अछि। यात्री तँ साफ कहथि जे 'भारत आ कि बिहार हमरा लेल अमूर्त अछि। मूर्त तँ अछि केवल ओ स्थान जतय हम निवास करै छी।' मानल जे एक सुनिश्चित चौहद्दी मे अवस्थित क्षेतर हमर देश थिक, मुदा ओकर अभिव्यक्ति तँ व्यक्तिक चेतना मे बसल मूर्तिये सँ होइछ। एहि दृष्टियें देखी तँ देशदशकम् एकटा अद्भुत कविता अछि। देशक शिरा मने नस की थिक, गिरा मने वाणी की थिक, देशक हसिति मने हँसी की थिक आदि-आदि सभक वर्णन सँ कविता शुरू होइछ--

नाना नदी-नद-शतानि शिरा यदीया

नाना विहंग-विरुतानि गिरा यदीया।

कश्मीर-कूर्म-सुषमा हसितिर्यदीया 

तत् पादयो: प्रणतिरस्त्वियं मदीया।।

        आ, बीच मे एकटा श्लोक अबैत छैक--

गोधूम-शालि-यव-मुग्द-तिलादिपुष्टा

मध्विक्षु-गव्य-मसृणा सुखिता स्वतन्त्रा।

क्षीरोदकीभवदनेक-विभाग-युक्ता

तिष्ठेत् सदा मनसि मे प्रतिमा त्वदीया।।

( हे देश! हमरा मोन मे विराजमान अहाँक प्रतिमा सदा आबाद रहय, जे गहूम, चाउर, जौ, मूँग, तिल आदि खाद्यान्नक भोग सँ हमरा पुष्ट कयने अछि, मधु, कुसियार, दूध, दही, घी आदि वस्तु सभ, जकरा सँ नहि जानि कतेको तरहक पक्वान्न तैयार होइत अछि, ताहि सभक सेवन हमरा सुख आ स्वतन्त्रताक चेतना प्रदान केलक अछि। हे देश! हमरा मोन मे बसल अहाँक प्रतिमा सदा आबाद रहय।)

               यात्री नागार्जुनक काव्य रचना-प्रक्रिया सँ अवगत हेबाक लेल  हम एतय एक आर संस्कृत कविताक उल्लेख करब। 'हिंसा-महिमा' शीर्षक कविता हुनकर एक सुप्रसिद्ध कविता छनि। ई कविता ओ 1976 मे आपातकालक दौरान लिखने छला। हुनकर राजनीतिक एक रूप अहाँ 'लेनिन-स्तोत्रम्' मे देखि चुकल छी। ओ राजनीति जनापेक्षी, जनमुखी राजनीति छल। हिन्दी, मैथिली आ बंगला मे एहि प्रकारक विधेय राजनीति पर हुनकर बहुत कविता छनि। मुदा, राजनीतिक एक दोसरो रूप होइत छैक, जतय दूर दूर धरि जनताक हित के कोन्नहु चिन्ता नहि रहैछ। भ्रष्टाचार अपन नग्न रूप मे उपस्थित रहैछ। अपन मनमानी तानाशाही चलेबाक लेल कानूने बदलि देल जाइछ आ नव कानून तैयार क' लेल जाइत अछि। संविधान, लोकतन्त्र आदि सभक कोनो मोजर नहि रहि जाइछ। विरोध केला पर पुलिस-प्रताड़ना होइछ, आ मनमाना ढंग सँ जेल पठा देल जाइछ। ई सबटा घटना होइत ई देश पहिल बेर आपातकाले मे देखने छल। नागार्जुन सन कवि चुप तँ रहिए नहि सकैत छला, ओ इन्दिरा गाँधीक विरुद्ध बहुतो कविता लिखलनि, से तीनू भाषा मे। विरोध तँ नेहरूक सेहो ओ इन्दिरो सँ बेसी केलनि। तखन एक बात जरूर भेल जे नेहरूक निधनक बाद ओ हुनका क्षमा क' देलनि। मुदा, इन्दिराक हत्या हुनकर अपने सुरक्षा-गार्ड द्वारा कते भयानक ढंग सँ कयल गेलनि, मुदा नागार्जुन मौन रहला।

                  इन्दिरा गाँधीक विरुद्ध जे हिन्दी कविता सब ओ लिखने रहथि, सम्पूर्ण क्रान्तिक आन्दोलनक दौर मे ओ कविता सब नारा आ गीत बनि गेल छल। इन्दिरा कें ओ हिटलरक नानी कहैत रहला। आपातकाल सँ बहुत पहिनहि ओ इन्दिराक मनसूबा कें बूझि गेल छला। 1973 मे ओ ई कविता लिखने रहथि-- 'ठौर-ठौर पर भीख माँगती बुढ़िया भारत-माता/ पता नहीं भारत पुत्री से क्या है उसका नाता/  नये राष्ट्र की नव दुर्गा है नये खून की प्यासी/ नौ मन जले कपूर रात-दिन फिर भी वही उदासी।'  'इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको/ सत्ता की मस्ती में भूल गयी बाप को'-- ई 1974क लिखल कविता थिक। 1975 मे जखन रेलमंत्री ललित नारायण मिश्रक हत्या भेलनि, नागार्जुन कविता लिखि क' इन्दिरा कें एकर जिम्मेदार बतबैत 'डायन' कहलनि। 1976 मे आपातकालक दौरान नागारजुन लिखलनि-- 'डर के मारे न्यायपालिका काँप गयी है/ वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गयी है/ देश बड़ा है, लोकतंत्र है सिक्का खोटा/ तुम्हीं बड़ी हो, संविधान है तुमसे छोटा।' कमाल ई जे तखन ओ मीसाक अन्तर्गत जेल मे बंद रहथि।

संस्कृत मे जे एहन कविता छनि, सैह थिक 'हिंसा-महिमा'। फेर मोन पाड़ि दी जे ओहि समय ओ बक्सर जेल मे बंद रहथि। 

          कविता एहि श्लोक सँ शुरू होइत छैक-- 'हिंसे देवि नमस्तुभ्यं महाकाल-सहोदरे। शत साहस्रिका जिह्वा नाद्यापि तव तृप्यते।।' हिंसा देवी कें एतय ओ महाकालक सहोदरा बतबैत कहै छथिन जे अहाँक सैकड़ो हजारो जिह्वा नागरिक लोकनिक एतेक खून पीलाक बादो एखनहु तृप्त नहि भेल अछि। व्यंग्यक गहराइ देखल जाय जे एहि देवी कें ओ ई कहि क' प्रणाम केलनि अछि जे आइ तँ साक्षात जमराज सेहो ओही टा लोकक प्राण लेबाक लेल मजबूर भ' गेल छथि, जकरा अहाँ सूँघि क' थुकड़ि दैत छियैक-- 'भुक्ति-मुक्ति-प्रदे मात: सद्य: शोणितकांक्षिणी/ यमस्तु हरते प्राणान् त्वैवाघ्राय थूत्कृतान्।।' आइ तँ ई स्थिति अछि भने क्यो भुक्ति (संपन्नता/ भोग) चाहथि वा मुक्ति (मृत्यु), अहाँक शरण मे गेले विना कोनहु दोसर उपाय नहि छैक।

              ई कविता नागार्जुन 10 मार्च 1976 कें लिखलनि। कविताक विषय रहैक तानाशाही मे नागरिक-प्रताडना के अतिशयता कें देखायब। से बात कविता मे आबि गेल रहैक। मुदा, जे क्यो यात्री जीक काव्य-रचनाप्रक्रिया सँ अवगत छथि, हुनका नीक जकाँ बूझल हेतनि जे कविता लिखि चुकलाक बादो नागार्जुन पर सृजनात्मक आवेग बहुत समय धरि बनल रहैत छलनि, कैक कैक घंटा धरि। एहि कविताक रचना-प्रक्रिया कें देखी तँ पबैत छी जे ई आवेग कैक कैक दिन धरि सेहो बनल रहि सकैत छल। 11 मार्च कें एहि कविता मे एक श्लोक ओ आर जोड़लनि। ओहि मे ओ हिंसा देवीक असल वंशवृक्ष जोड़लनि। मनुष्यता पर नागार्जुन कें बहुत सघन विश्वास रहनि। तें, तानाशाहक कृत्य कें देखि क' हुनकर स्पष्ट मत रहनि जे एहन दारुण वस्तु मनुष्य तँ के कहय जे जैविक पर्यन्त तँ किन्नहु नहि भ' सकैत अछि। कविता मे ओ देलनि जे एहि हिंसा देवीक माता विषमता आ पिता लोभ छथिन। भाइ छथिन क्रोध। एक बहिन सेहो छथिन अहिंसा, जिनका सँ हुनका कहियो नहि पटलनि।

                मुदा, एतबा लिखलाक बादो नागार्जुनक आवेग पूर्ण नहि भेलनि। मोन मे रहल हेतनि जे आखिर एकर उपाय की? यात्रीक कविताक स्वभाव रहनि जे प्राय: हरेक कविताक एक निष्पत्ति-विन्दु होइन। ओहि ठाम पहुँचिये क' हुनकर कविता पूर्ण होइत छलनि। अन्तत: 15 मार्च कें एहि मे एक श्लोक ओ आर जोड़लनि-- 'कर्णाज्जलं जलेनैव कंटकेनैव कंटकम्।/ हिंसयैव हि हिंसापि तदौपम्येन नश्यति।' (कान मे पानि चलि जाय तँ आर अधिक पानि द' क' ओकरा निकाल जाइछ। पयर मे काँट गड़ि जाय तँ दोसर काँट अर्थात सुइया ल' क' ओकरा बाहर कयल जाइछ। ठीक, तहिना हिंसाक प्रतिकार बराबर-बराबर के हिंसा अर्थात प्रतिहिंसे सँ कयल जा सकैत अछि। तखने ओ नष्ट होयत।)

            सोचबाक बात तँ अवश्य छैक। जँ एक तानाशाहक हिंसा सँ पूरा देश तबाह अछि, देश मे जँ सय करोड़ नागरिक अछि तँ ई आखिर कोना भ' सकैए जे सय करोड़ रहितहु ओ सर्वथा निरुपाय हो। एहि ठाम देखबाक एक बात अछि जे कान मे पानि जेतै जे धार-पोखरि मे नहाइत अछि। पयर मे काँट ओकरे गड़तै जे श्रमजीवी थिक। नहि तँ जे एयरकंडीशन मे रहैत सुसज्जित बाथरूम मे नहाइत अछि, ब्रांडेड कम्पनीक जूता पहिरैत अछि, ओकरा तँ ने कान मे पानि जेतै ने पयर मे काँट गड़तै! मुदा गौर कयल जाय, एहन लोक तँ हिंसा देवीक प्रश्रयप्राप्त हेबाक प्रयत्न करता, एहन लोक कें भला प्रतिहिंसा सँ कोन मतलब? ओ तँ जन हेता अथवा जनकवि जिनकर प्रतिज्ञा हेतनि-- ' प्रतिहिंसा ही स्थायिभाव है मेरे कवि का।' भारतीय ज्ञान-परंपरा दिस ताकी तँ हिंसाक विरुद्ध प्रतिहिंसाक नीति कें स्वीकार्य मानल गेल अछि। जेना एहि नीति-वचन कें देखी-- 'कृते प्रतिकृतं कुर्याद् हिंसितं प्रति हिंसितम्।/ न तत्र दोषं पश्यामि शठे शाठ्यं समाचरेत्।।'


बंगला कविता


नागार्जुन फरबरी 1978 सँ सितंबर 1979 धरि, कुल एक साल छव महिना बंगला मे कविता लिखलनि। कहल जाय जे एतबा दिन धरि हुनका पर बंगला मे लिखबाक आवेग बनल रहनि। कविता-लेखनक सम्बन्ध मे हुनकर कहब रहनि जे कोन भाषा मे कविता लिखै छी, ई निर्भर करैत अछि ओहि जगह जतय हम रहै छी, ओ लोक सब जिनकर सम्पर्क-सामीप्य बनल रहैत अछि, ओ भोजन जे ओहि भाषा-संस्कृतिक पहचान थिक, आदि आदि। मुदा, हुनकर बंगला कविता सब कें देखी तँ ई बात कतहु बेसी प्रसंगिक बुझाइत छैक जे जखन कोनो भाषाक आवेग कवि पर लगातार बनल रहय तँ ओ जगह, लोक, रहन-सहन आदि छुटनहु कविता लिखल जा सकैत अछि। हुनकर बंगला कविता सब अधिकतर हुनकर बंगाल-प्रवासक दौरान लिखल गेल, मुदा ओही समय मे जखन ओ दिल्ली गेला तँ तखनहु बनल रहलनि आ पटना एलाह तखनहु। महाप्रकाश अपन एक संस्मरण मे लिखलनि अछि जे एही आवेगक दौरान जखन एक बेर सुकान्तक संग यात्रीक भेंट करय गेल छला तँ ओ कोना जबर्दस्ती हुनका बैसा क' अपन बंगला कविता सुनेने रहनि। जबर्दस्ती एहि दुआरे जे महाप्रकाश कें बंगलाक ज्ञान नहि, तें सम्प्रेषण बाधित। मुदा, यात्री पर आवेग सवार, तें।

नागार्जुनक 41 गोट बंगला कविताक द्विभाषी (नागरी मे अंतरित मूल बंगला एवं ओकर हिन्दी अनुवाद) संस्करण 'मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा' नाम सँ 1997 मे शोभाकान्तक संपादन मे वाणी प्रकाशन सँ प्रकाशित भेल। बंगला सँ हिन्दी मे अनुवादक प्रथम ड्राफ्ट तैयार कयने छलि युवा कवयित्री मौसमी बनर्जी। कवि उज्ज्वल सेन एहि ड्राफ्ट कें संपादित कयने रहथि आ अन्तिम स्वरूप देने छला प्रख्यात कवि आ यात्रीक शिष्य सोमदेव।  41 गोट कविता एहि संग्रह मे संकलित छनि, मुदा ठोस रूप सँ ई निर्णय नहि कयल जा सकैए जे ओ एतबे कविता लिखने छला। तहिना, सितंबर 1979क बाद ओ बंगला मे कविता लिखलनि की नहि लिखलनि, सेहो निश्चयपूर्वक नहि कहल जा सकैत अछि, कारण हुनका बारे मे ई कथन कहावत जकाँ प्रसिद्ध रहय जे 'बाबा कविता बोते और खोते चलते हैं।' तें, ऊपर जे तथ्य लिखल गेल वा आगाँ जे लिखल जायत से हुनकर उपलब्ध आ संकलित कविताक आधार पर। 

           नागार्जुनक बंगला कविता सब कें देखी तँ स्पष्ट होइत छैक जे स्वर आ मिजाज मे ई हिन्दी आ मैथिली कविताक बीच मे कतहु अछि। कतेको ठाम जँ ओ हिन्दी कविता सँ मेल खाइत छैक तँ किछु ठाम मैथिली कविता सँ। विक्षोभ रसक प्रवाह ओहिना छै, व्यंग्य सेहो तेहने धरगर। अपनो मजाक अपने उड़ेबाक स्वभाव सेहो तेहने। हँ, ई जरूर देखाइत अछि जे बंगला मे कौतुक तत्व किछु बढ़ल छनि। तहिना, ठेठ बंगाली गृहस्थ-सन, बुजुर्ग-सन देखार पड़बाक आयास किछु जरूर छै। एहि आयास कें बनावटी सेहो नहि कहल जा सकैछ, कारण ई सब तत्व सब दिन हुनका व्यक्तित्व मे बनल रहलनि। अपन कविता सब ओ बंगला कवि लोकनिक गोष्ठी मे खूब सुनाबथि, आ बंगलाक पत्रिका सब मे ई प्रकाशित सेहो होइक। मौसमी बनर्जी अपन एक लेख मे उल्लेख कयने छथि जे 'बंगलाक पत्र-पत्रका मे हुनक रचना प्रकाशित भेलनि तँ एक विख्यात साप्ताहिक पत्रका मे क्यो लिखने रहथि जे पड़ोसी अरण्य सँ एक लकड़बग्घा घुसि आयल अछि।' संभव छै जे एहन लिखबाक कारण सेहो स्वयं नागार्जुनक कविते मे मौजूद छलनि। हुनर एकटा कविता छनि-- 'आमारा कृतार्थ होयेछि'। एहि मे छै जे बाहर 'अझोर वृष्टीर दापोट' मनेअविराम वर्षाक झड़ी लागल छै आ भीतर कोठली मे चारि गोटे छथि, तीन गोटे सूतल आ एक मने कवि जागल। जागल छथि असगरे कवि, मुदा कहै छथि-- 'जेगे आछि शुधु आमरा दुइ प्राणी' मने जागल छी अपना सब दुइये प्राणी? ई दोसर के छी? ई दोसर छी-- 'आमार बन्धु बिड़ाल' (कविक मित्र बिलाड़)। कवि अपन कविता लेल भाव-तरंग पकड़बा मे लागल छथि आ हुनकर बन्धु बिलाड़ मूसक शिकार। देखिते देखैत एक 'मस्तान मूषिक' पकड़ा जाइत छनि ओम्हर बिलाड़ बन्धु कें, आ एम्हर कवि कें भाव-तरंग। प्रसन्न भ' क' कहै छथि-- 'शाबास रे शाब्बाश, आमार दुलाल/ आमार बन्धु  बिड़ाल!/ तोर एइ बाहादुरी के.../ आमारा कृतार्थ होयेछि/ समाने-समाने....' 

                 कविक दृष्टि देखल जाय जे बिलाड़ कें अपन कविता मे अपना समान नागरिकता देने छथिन। आ एतबे नहि, इहो कहै छथिन जे दुनू गोटे समाने रूप सँ कृतार्थ भेलहुँ। हिनका भाव-तरंग पकड़ा गेलनि आ हुनका बन्धु कें मस्त मूषक। यैह कवि कहियो जमुना-कात मे अपन बच्चा सब कें दूध पियबैत मादा सुग्गर कें देखि क' कहने रहथिन-- 'यह भी मादरे हिन्द की बेटी है।'

               जाहि कविताक शीर्षक 'आमि मिलिटारिर बुड़ो घोड़ा' पर संग्रहक नामकरण कयल गेलैए, सेहो एकटा घोड़ा पर लिखल गेल छै। घोड़ेक मुँहें कहै छथिन जे हम मिलिट्रीक बूढ़ घोड़ा छी। रिटायर्ड भेला पर एकटा चतुर ताँगाबला हमरा नीलामी मे किनलक अछि। आब तँ बुझले बात छै जे हमरा आँखि मे रंगीन खोलसा लगा देत, आ कहैत रहत-- सामने चल बेटा, सामने चल। बस, एतबे टा कविता छै। अद्भुत बात ई छै जे ई बुढ़ा घोड़ा स्वयं नागार्जुन अपना कें कहलनि अछि। एहि दृष्टि सँ देखने ई सत्य उद्घाटित होइत छैक जे बुढ़ारी स्थगन के पर्यायवाची नहि थिक। एहि तरहें अपना आप कें देखबाक हिम्मत सामान्य कवि लग होयब असंभव छैक।

            तहिना, एकटा कौतुक के कविता छै जे रामायण आदि धार्मिक कथाक बारे मे छै। कविता देखल जाय-- 'आस्तो बड़ो बोका छिलो हनुमान रामदास/ ये युगेर अभियन्ता नल-नील घामदास/ ध्वस्तो होलो दसमुख लंकापति कामदास/ एटाइ बले गेलेन आदिकवि नामदास।' कविता मे कोनो गड़बड़ बात कहने होथि, सेहो नहि। बुझू तँ चारिये पाँती मे पूरा रामायण कहि गेलखिन। हनुमान कें बुड़बक कहलखिन, तकर प्रमाण तँ यैह जे सुग्रीव-विभीषण सन लोक हनुमानक उद्यम सँ राजा बनि गेला जखन कि हनुमान अपना लेल की मँगलनि? बस, रामदास। व्यावहारिकता सँ हीन एहन लोक कें बंगला मे 'बोका मानुस' कहले जाइत छैक। तहिना, हरेक पांतिक अन्त मे जे 'दास' सब आयल अछि, एक्को टा निरर्थक नहि छैक। वाल्मीकि कें नामदास कहलखिन, तकरा पाछू वैह रत्नाकर बला मिथक छै। एहि ठाम काव्यभाषा मे जे छटा छै, वैह असल बात थिक। स्वाभाविक छै जे बंगला काव्य-परंपरा मे ई एकटा दुर्लभ सन चीज रहल हेतै।

                बंगला मे नागार्जुनक किछु एहन कविता छनि जे बस, ओतहि टा अछि। ओहि भाव-दशाक पुनरावृत्ति कतहु भेले नहि छैक। जेना, अपन यायावरी स्वभावक बारे मे एकटा अद्भुत कविता छै 'अघोषित भारे'। हिन्दी मे जे एकर अनुवाद कयल गेलैए-- अघोषित भरा-भरा-- से हमरा संतुष्ट नहि करैत अछि। लगैत अछि जे नहि, बंगालक संस्कृति मे जे एकर एन-मेन अर्थ छै, से नहि आबि पेलैए। कविता मे छै जे कविक मोन हुनका शरीर सँ, एतय धरि जे चेतना सँ भागि जाइत अछि। अघोषित रूप सँ। बिनु किछु कहने। कहिया घुरत तकरो कोनो ठेकान नहि छै। एम्हर कवि कें मन विना अखरै छनि। होइ छन जे टेलीग्राम द' बजबियनि जल्दी। 1978 के कविता छी। इंटरनेट कि मोबाइल के तँ के कहय, लैंडलाइन टेलीफोन सेहो शहरक सरकारी अधिकारी आ ऐश्वर्यवान महाजने टा धरि पहुँचि सकल रहय। एना मे जल्दी खबर करबाक एक्केटा उपाय रहै--टेलीग्राम करब। ओ डाकधर सँ होइत छल। साधारण डाकघरो मे नहि, जे डाकघरक संग तारघर सेहो हुअय, जे शहरे धरि सीमित रहय। कवि कें अहलदिली होइ छनि तार द' बजबियै। कविता असल मे अइ ठाम छै जे ओ होयत कतय? ओकर जतय-जतय हैब संभावित छै, तकर सूची मे कविता छै। एक तँ ई निश्चय छै जे ओ जतय हैत ततय असकरे। निभृत एकान्त मे, एकदम असकरुआ। भ' सकैए जे ओ एखन सह्याद्रिक उपत्यका मे निर्मित कोनो सर्किट हाउस मे हो, इहो संभव जे सिक्किम के कोनो लामा मठ मे बौद्ध-संगति मे हो। तहिना इहो संभव जे ओ बस्तर के जंगल मे माड़िया जनजातिक कोनो गृहस्थक ओतय ओकर 'कुटीर-परिसर' मे मेहमानबाजी क' रहल हो! कतय हेतै? जतय हेतै, ततय कि तारघर उपलब्ध हेतै? बेसी उम्मीद नहिये हेतै। मन कें एक स्वरूप देबाक कोशिश मे उपमा करै छथिन-- एकटा एक बिलाड़, जे घर के स्वाद तँ पाबि जरूर गेल अछि, मुदा पोस नहि मानने अछि। जखन जंगल जाइए तँ घर कें पूरा बिसरिये जाइत अछि। कोनो यायावर कें उमर भेने आ कि परिस्थितिवश अपन यायावरी कें विलंबित करय पड़ैत अछि तँ ओकर मन कोन अवस्था मे चलि जाइए, तकरा विषय मे ई कविता छै। गहन अछि। एते भीतर सँ कविता बहार करब बहुत गहन छै। आ तै पर सँ शैली सेहो ओहने! देखल जाउ बिलाड़क लीला-- 'पोष न माना आधा पालतु/ बिडालेर मोतोन/ उधाओ होये जाए/ की कोरे ओके टेलीग्राम कोरबो/ सब जायगाये तारघर जे नेइ।' (पोस नहि मानल बिलाड़ जकाँ फिरार भ' जाइए ओ/ की करी, ओकरा टेलीग्रामो जे करबै तँ सब ठाम तारघरो तँ नहि छै!)

                एकटा आर कविता छनि। 'भावना प्रवण यायावर'

 भेलै एहन मुसाफिर, जकर किछु खोज होइ, ओहि खोज लेल ओकर भावना उमड़ि रहल छै, ओहि खोज मे ओ भटकि रहल अछि। ओकरा कहनाहार क्यो नहि छै। क्यो नहि छै एहन आत्मीय, जे ओकरा बुझा-सुझा क' रोकि लियय! ओ यायावर स्वयं कवि होथि तैयो, अन्योक्ति मे कहल गेलैए। दुनियादारीक हिसाब सँ अपसोच कहि सकै छियै, से भ' रहल छनि। एकटा बुढ़ा छथि जे कलकत्ता मे भरिदिन कतहु सँ कतहु जाइते अबैत रहै छथि। कवि कें लगै छनि कोनो दिन ई बुढ़ा एहिना अचानक ट्रामलाइनक कात मे मरल पड़ला पाओल जेतै! कहू तँ भला, ई उमर छियै बौएबाक? लगैए ओकर कोनो परिवार नहि अछि। क्यो आत्मीय नहि छै जे समझा सकय-- 'दादू, बयस हयेछे एखन आपनार/   क्षेत्रन्यास निन/ अभ्येस करून विराम प्रत्ययेर/ धारण करून चरम परितोषेर भाव/ केउ न इ मने होच्छे ओर/ एमन आत्मीय।' (दादू, अहाँक आब उमेर भेल/ अहाँ क्षेत्रन्यास लि'/ अभ्यास करू आब विराम प्रत्यय के/ धारण करू चरम परितोष भाव/ क्यो नहि छै कहनाहार एहन/ ओकर आत्मीय।' प्रत्यक्ष बुझाइत अछि ट्राम मे लटकल-फटकल यात्रा करैत स्वयं ओ अपना कें देखने हेता!

           एहने एक आर कविता छै-- 'आचमका होलो भाग्योदय'। अचानक भाग्योदय भेलनि। संग्रहक पहिल कविता यैह थिक। असल मे भेल ई छै जे कोनो दिन भिनसरे, मल्का-ए-तरन्नुम नूरजहाँ हुनका पकड़ि लेलकनि। रेडियो पाकिस्तान पर सुनलनि ओहि सुकण्ठीक स्वरलहरी, जकर बोल रहै-- कजरारी अँखियों में निंदिया न आए/ जिया घबराए/ पिया नहि नहि आए/ कजरारी अँखियाँ में...।'  सही संगीत कें जँ सही वक्त पर आ समतूल दशा मे सुनल जाय तँ ओ तँ परम आनंद सँ भरि दैत छैक। से भेलनि ई जे समुच्चा दिन ओ धुन, ओ बोल मोन पड़ैत रहलनि, गुँजैत रहलनि कर्ण-कुहर में। यैह काल्हि के बात छियै, काल्हि ने तँ परसू के, बंगला मे कहल जेतै- 'काल नाकि परशु।' संगीत सुनबाक अनुभव के कविता नागार्जुन-साहित्य मे कतहु आन ठाम किनसाइते हेतै। नूरजहाँ के गीत सुनला सँ कविक भाग्योदय भेलनि, नूरजहाँ वा कि कोनो आन गायकक सम्मान मे एहि सँ बेसी की कहल जा सकै छै? ई तँ श्रव्य माध्यमक बात भेल। एकटा कविता लिखने छथि गन्ध माध्यम पर। शीर्षक छै रथ। वर्णन छै जे कोनो मित्रक गाड़ी मे बैसलाह अछि। आरामदेह तँ ओ गाड़ी रहबे करै, खुशबूदार सेहो रहै। ओहि गन्धक बारे मे कवि कहै छथि-- 'एके बारे गन्ध मादन/ एके बारे ऋष्य मूक/ ऐर भेतर प्रविष्ट ह ओबा मात्र/ लुप्त होलो आमार गन्ध-चेतना।' खुशबूदार जगहक बारे मे कवि कें दुइयेटा अनुभव छनि-- गन्धमादन पर्वत के, आ ऋष्यमूक पर्वत के, जे प्राकृतक रूप सँ खुशबूदार अछि। एहि गाड़ी दुन्नू एक्कहि संग उपस्थित। चरम सुगन्धक अनुभव के अवस्था कोन  अवस्था होइछै? कवि कहै छथि, ओहि आदमीक गन्ध-चेतना लुप्त भ' जाइ छै। गन्धक बारे मे बहुत कवि लिखने हेता, सुन्दर गाड़ी मे बैसबाक अनुभव सेहो बहुत गोटे लिखने हेता। मुदा यात्री कविक ई शानदार संशय एतय देखियौ जे हुनका होइ छनि-- आब कोन उपाय केने हमर गन्ध-चेतना वापस आयत?-- 'कि कोरे फिरे पाबो/ पुनराय आमार घ्राण शक्ति?:

                    एहन आनंदित अवस्थाक चित्रण बला आरो कविता सब हुनका लग छनि। एकटा कविता छनि-- आदिपर्व। ई एहि संग्रहक अन्तिम कविता छियैक। एकर कोनो सम्बन्ध महाभारत सँ नहि छैक। असल मे आदिपर्वक व्यवहार बंगला मे शुभारंभ के अर्थ मे कयल जाइ छै। एहि कविता मे बतौलनि अछि जे एकटा अति महत्वपूर्ण पाबनि ओ कोना मनायब शुरू केलनि। पाबनि छियै-- अन्तर्राष्ट्रीय शिशु वर्ष।  वर्ष 1979 कें यूएनओ आन्तर्राष्ट्रीय शिशु वर्ष घोषित कयने रहय। ओही साल ई कविता लिखल गेल रहै जे एहि सालक शुरुआत कवि कोना केलनि। कविता देखी-- 'आमि आब्दार जानिये/ आके उद्यत कोर्लुम/ ओर किन्तु तबुओ खूब संकोच/ अगल्या आमार दाड़िते/ करपल्लव बुलिये निलो/ आमि सन्तर्पणे/ ओर चूमू खेलुम/ एटाइ छिले आन्तर्जातिक शिशु वर्षेर/ आदिपर्व।' कोनो बच्चा लग गेला। ओकरा सँ दोस्ती केलनि। ओ बड़ संकोची। मुदा इहो खूब तजुर्बा बला। आखिर एहि हद धरि दोस्ती क इये लेलनि जे बच्चावहिनकर दाढ़ी कें सोहरौलनि आ कवि ओकरा चूमि लेलनि। चूमि लेबाक लेल बंगला मे कहल गेल छै-- चूमू खेलुम। आ, एहि तरहें शुरू केलहुँ वर्षक आरंभ।

            जेना बिलाड़ पर कविता छनि, तहिना एकटा कविता भेड़ाक बच्चा पर छनि। इहो अद्भुत कविता छै। ऊनक वस्त्र बनबैबला कंपनी धारीवाल के ट्रेडमार्क मे एक भेड़ा-बच्चाक चित्र लेल गेलैए। यैह बच्चा अपन दुख बतबैत अछि एतय। शीर्षक छै-- 'शिङ-टिङ नेइ' मने सिंग-तिंग नै अछि हमरा। कविता मे ओ बच्चा कहै छै जे हमरा सिंग-तिंग नहि अछि।माय हमरा असकरे छोड़ि गेल, ओकर स्तनक दूध पीबाक हमरा अवसर नहि भेटल, हमर सहोदर क्यो आब जीवित नहि बचल छै। हम असकरे विज्ञापन बनि क' घूमि-फीरि रहल छी। कृतार्थ कयने अछि हमरा धारीवाल कंपनी, हमरा सिंग-तिंग नहि अछि। इहो विषय कविता लिखबाक भ' सकैए, आ एहि पर एहन लिखलो जा सकैए जे विवेकीजन कें सदा स्पन्दित करतनि, सामान्य कविक बुतें एहन सोचलो नहि जासकैत अछि। एहन-एहन विषय पर लिखबा लेल नागार्जुने सनक कवि चाही। एकटा कविता छनि-- काव्य-शिशु। देखल जाय-- 'भूमिष्ठ हलो/ आमार काव्य-शिशु/ निशूति रात्रे/ केउकि शुनेछे ओर क्रन्दन/ केउकि शुनेछे ओर आर्तनाद/ आमि निजेई एइ नबजात केर धात्री/ आमि निजेई एइ नबजात केर जननी/ भिमिष्ठ हयेछे/ आमार काव्य-शिशु/ निशूति रात्रे।' सुतली राति मे हमर कावय-शिशु धरती पर आयल, मने जन्म लेलक? क्यो सुनलियै ओकर क्रन्दन, ओकर आर्तनाद? हम अपने ओकर धात्री छियै, हम अपने ओकर जननी। सुतली राति मे जन्म लेलक अछि हमर काव्य-शिशु। एनमेन बच्चाक जन्म सन कविताक जन्म होइ छै, सामान्यत: एहि अनुभव कें कवियो लोकनि नोटिस नहि क' पाबै छथि।

             काव्यानुभवक बारे मे बंगला मे हुनका लग आरो कविता छनि। एकटा तँ 'कवि' शीर्षक सँ छै जे बहुत प्रसिद्ध भेलै। कविताक जे पहिल लाइन छै, से तँ बूझल जाय नागार्जुनक परिचिति सन बनि गेल। कविता देखी, बस छव पांती के छै-- 'सारा जीवन असुखे जाबे!/ कोथाओ कि तुइ आराम पाबे!/ बेलाल्ला होए कोरबि धोरा-फेरा/ उल्यक्तो कोरे थाकबेन पण्डितेरा/ थोकबे कि हाथे टाका कोड़ि/ प्रज्ञाइ हबे तोर गलाए दोड़ि।' धोरा-फेरा मने भटकब, बेलल्ला भ' भटकब। उल्यक्तो कोरे-- परेशान करैत रहै छथि पण्डित लोकनि, ज्ञानक ठिकेदार लोकनि। टाका कोड़ि मने पैसा कौड़ी। समुच्चा जीवन असुख मे जायत, आ प्रज्ञा जे कविक छै वैह ओकर गरा के फँसरी हेतै। कविता लिखनहार लोकनि, यदि हुनका लग आर्थिक सुरक्षाक कोनो स्रोत नहि हो, ओकर जीवन कते दारुण होइ छै। समाज मे ओकर की स्थान छै? कोन-कोन विपदा सँ ओ सदा ग्रस्त रहैए। कविता लिखनाइ असल मे माथ पर कफन बान्हि लेब सनक काज छियै। 

                 प्रज्ञा कोना आदमी कें हरान करै छै, से तँ देखबे केलहुँ। असल मे प्रज्ञा करै छै ई जे समय के जे मुश्किल बात सब छै, राजनीति पर, समाज पर, अर्थव्यवस्था पर-- इ सब ओकरा नजरि पर आबैत रहै छै, आ एक सजग नागरिक होइ के नाते ओकरा जरूरी बुझाइ छै जे लोक यदि संशय मे पड़ि क' गलत जगह समर्थन द' रहल छै-- तँ संशय के ओहि सब स्थिति कें सामने आनि क' एकटा सजग पक्ष के पैरवीकार ओ बनैत अछि। यात्री कविक विशेषता रहलनि जे एहि प्रज्ञा के प्रयोग ओ कहियो नहि छोड़लनि, एकर भरपूर उपयोग केलनि। यैह कारण अछि जे हुनका लग राजनीतिक कविता बेसी छैक।

               एकटा कविता छनि-- विद्यासागर। जाहिर बात छै, कविता ईश्वरचन्द विद्यासागरक विषय मे अछि। यानी बंगला नवजारगरण के पुरोधा पुरुष। कलकत्ता मे विद्यागरक नाम पर सरकारी काॅलेज छै। ओकर परिसर मे विद्यासागरक मूर्ति सेहो स्थापित छनि। से मूर्ति सब आनो-आन जगह पर सेहो छनि। घटना ई भेल छै जे क्यो ओहि मूर्तिक गरदनि तोड़ि देलक। के केलनि ई काज? नक्सलबाड़ीक दौर मे नक्सलवादी सब केलनि। 1971-72 के घटना थिक। करबाक समझ ई जे सारा नवजागरणवाद फरजी थिक। नक्सल आन्दोलनक बारे मे ई जरूर मोन रखबाक चाही जे बंगाली जनताक बीच ओकर लोकप्रियता आ समर्थन रहैक।  ई जे घटना घटल, विद्यासागरक गरदनि तोड़बाक, ई बंगाली समाज कें बहुत खराब लगलै। एतहि सँ ओहि ठामक समाज मे नक्सलवादक समर्थन मे ह्रास भ' गेलै। बाद मे नक्सल चिन्तक लोकनि द्वारा स्वीकार कयल गेल जे हुनका लोकनिक ई समझ गलत छलनि। मुदा, विद्यासागरक मूड़ी मोचारबाक ई घटना एक बेर भेल हो, से नहि। बारंबार भेल अछि। एक बेर तँ हालक विधानसभा चुनाव 2019 मे भेल जे हिन्दुत्वक राजनीति बला कार्यकर्ताक द्वारा विद्यासागरक गरदनि तोड़ल गेल। एकर कारण दोसर छल। कारण ई छल जे विद्यासागर जे नवजागरण बला काज सब केलनि से हिन्दुत्वक लेल गलत रहैक। नागार्जुनक ई कविता 1978क छियनि, जाहि मे कहल गेल अछि जे दस वर्षक बाद एक बेर फेर विद्यासागरक मूर्तिक 'मुंडोच्छेद' कयल गेल, से केनिहार के छल? 'के छिलो ओ?/ के छिलो ओरा/ आन्धारे सेरे कुकृत्य?/ चम्पोट दिलो तस्कोरेर मतोन।' के रहय, कै गोटे सँ रहय ओ सब, जे अन्हार मे कुकृत्य क' क' तस्कर जकाँ पड़ा गेल? कवि विद्यासगरे कें पुछै छथिन अहाँ ओकर सभक की बिगाड़ने रहियै? दू दू बेर एहन कुकृत्य क' क' नुका रहल 'तोरुणदेर अग्रोणी नवयुगेर शेरा'-- की यैह सब छल तरुण लोकनिक अग्रणी, नवयुगक शेर? अपसोच करै छथि कवि जे एहि घटना पर ने सिद्धार्थ (पूर्व मुख्यमंत्री) किछु बजला, ने ज्योति (तत्कालीन मु.मं.)। एतय धरि जे अग्रणी बंगालक मीडिया सेहो एहि मुद्दा कें नहि उठौलक-- चाहे आनंद बाजार पत्रका, ने युगान्तर, ने स्टेट्समेन-- क्यो किछु नहि बाजल। 'केऊ न बोले कोभु/ आर जे के बोलबे/ कतो बार आबार आलादा हबे मुण्डु तोमार।' क्यो नहि बाजल। बाजबो करत के जे के बेर अहाँक सिर अहाँक धड़ सँ अलग कयल जाइत रहत!

          विद्यासागरक मूड़ी तँ खैर पाथरक रहनि। एहि संग्रह मे एकटा कविता एहनो छै जाहि जीवित गाँधीक कपार फोड़बाक बात गर्वपूर्वक उल्लेख कयल गेलैए। कविताक शीर्षक थिक-- 'ओरा कपाल भेंगे छिलो'। कविता देखल जाय-- ''गान्धिर कपाल भेंगे छिलो/ आमार बाबार बाबा/ हरिजनदेर संगे निये/ बामभोलाक मन्दिर गर्भे/ ढुकते याच्छिलो ओइ बुड़ो/ कि ये आस्पर्द्धा तरवन ओर--/ ओके बलतो ओरा/ बापू एवं महात्मा गान्धि/ आमार बाबार बाबा ओरा कपाल भेंगे छिलो/ लाठि मेरे...' हमर बाबूक बाबू गांधिक कपार फोड़ि देने रहथि। ओइ बुढ़ाक ढीठपना देखियौ जे हरिजन सब कें संग लेने बमभोला मंदिरक गर्भगृह मे ढुकल जाइत रहै। लोक सब ओकरा बापू आ महात्मा गाँधी कहै छै, मुदा हमर बाबा लाठी मारि क' ओकर कपार फोड़ि देने रहथिन। एहि कविता पर हम किछु कही, ताहि सँ नीक तँ ई अपने कहि रहल अछि।

             एकटा कविता छै नेता पर-- 'सुगन्धित मुर्खेर सारहीन प्रलाप'। ध्यान देल जाय, मूर्ख कें एतय सुगन्धित कहल गेलैए। एहन एहन विशेषण क्वाइन करब यात्री कवियेक वशक बात छल। सुगन्धित एहि दुआरे जे ओ मंत्री छल। ओहू मे शिक्षा विभागक। शिक्षाक दुर्दशाक बारे मे कविता मे अलग सँ किछु नहि कहल गेलैए, कारण तकर प्रयोजन की? जखन शिक्षा मंत्रिये एहन! भेल ई छै जे कोनो विद्यालयक वार्षिकोत्सव मे कवि गेल छथि। ओतय मंत्री जी आयल छथि। हुनकर भाषण चलि रहल छै। कवि भाषण सुनलनि अछि। कहै छथि-- 'आमादेर एमन दुर्विपाक/ जे ओर आजे-बाजे कथा/ सुनते होलो लागातार/ पनेरो मिनिट पर्यन्तो/ एकजन सुगन्धितो मुर्खेर/ विशृंखलितो प्रलाप...' कविता मे इहो साफ लिखलनि अछि जे एहन दुर्भाग्य कें सहबा लेल ओ किए बाध्य भेला? विद्यालयक कल्याण-कामना मे। नाना प्रकारक कथावाचक बाबा सभक आइ जे चलती छै, तकरो आदिपर्व मानू तहिये भेल रहैक। एकटा कविता छनि-- 'सबाइ बलतो ओके सन्त महाराज।' ओकरा सब सन्त महाराज कहै छै। मुदा, ओ तस्करी मे पकड़ायल अछि एयर पोर्ट पर-- 'सारा दिन ओके थाकते होलो/ सिक्युरिटिर आओताए...'। धार्मिक पाखंड पर कविता छनि-- 'बोकामिर एइ यज्ञ'-- बेवकूफीक ई यज्ञ। यज्ञ वैह, त्रिकाल अखंड पाठ, लाउडस्पीकर लगा क'। देशक भविष्य कें ल' क' कवि कें बहुत चिन्ता छनि जे जँ ई यज्ञ एहन अछि तँ कहियो एकर उद्यापन तँ सेहो हेतै! ओ कते भयानक हेतै-- एइ ब्रतेर/ कोनो उद्यापन/ भविष्यत् काले/ एक बारेइ अभाबनीय।' भविष्य मे जे एकर उद्यापन हेतै, से तँ अकल्पनीय अछि।

            आर बहुतो रास कविता छनि जे बखत पर मोन पड़बा जोग भेलनि अछि। जेएनयू कैम्पस पर दूटा कविता बंगला मे छै। एकटा मे तँ ई आकांक्षा व्यक्त करैत देखना जाइत छथि जे केहन सुंदर होइतै जे तिब्बती अध्ययन विभाग मे हमहू अपन एडमिशन करा लितहुँ। एकटा छनि 'पलातक शिशिरेर द्विरागमन।' पलातक भेलै भगौड़ा, घसकि जाइ बला। भेल ई छै जे मध्य फागुन मे निशीथ राति मे तेहन पानि पड़लैए जे बीतल जाड़ एक बेर फेर सँ आबि गेल अछि। भोर मे लोक सब सँ दू तरहक प्रतिक्रिया सुनबा लेल भेटै छनि। किछु लोक तँ कहै छथि-- 'निशुति राते कोरे छेन करुणामय भगवान/ कांचनेर वर्षा।' राति मे करुणामय कांचन के वर्षा केलनि। मुदा, दोसर ठाम भविष्यक चिन्ता छै। मोन राखी, डाकक वचन मिथिले मे नहि, बंगालो मे ओतबे प्रसिद्ध छै। कोन समय की भेने की फल, आदि विवेचन ओहि मे भेटै छै। 'सकाले सकाल एरा बोलबे/ विषण्ण कण्ठे, अवनमित भ्रू-पाते/ एबार महामारी हबेइ हबे।' उदास कंठ सँ, नजरि झुका क' कता-- एहि बेर तँ महामारी हबेइ हबे, मने हेब्बे टा करतै! एकटा कविता छनि-- 'थाकतो उद्यत।' एहि मे एकटा एहन कर्मठ लोकक चित्र छै, जकर हाथ लकबाक मारल निष्क्रिय भ' गेल अछि। ओ अपन हाथक, अतीतक करतब बतबैत अछि। ई हाथ प्रतिपल उद्यत रहै छल, सब काज लेल। स्वजनक स्नेह आ सेवा सँ ल' क' गुरुजनक निर्देश पूरा करबा धरि। भरल भादो भागिरथी मे नाना कलाकारी मे ई हाथ रहै छल उद्यत। कोनो चीज जखन नहि रहै छै, तखन ओकर स्मृति, आ सेहो जीता जिनगी, सुनायब कते मार्मिक होइ छै, एहि कविता सँ बूझल जा सकैए।

                 मौसमी बनर्जी, जे कि अपन विद्यार्थी जीवन मे यात्रीक निकटस्थ रहथि, हुनका सूचनानुसार अस्सी टाक करीब हुनकर बंगला कविता छनि, जाहि मे सँ आधा तँ एखन धरि कतहु अयबे नहि कयल अछि। रचानावलीक तेसर खंड मे कुल पचास टा कविता मात्र संकलित छैक।मौसमी लिखैत छथि-- 'महाकवि विद्यापतिक पश्चात यात्री नागार्जुन मिथिला सँ बंगला साहित्य मे विख्यात आ उल्लेखित रहलाह। हिन्दी साहित्यक एहि महासूर्यक रश्मि बंगला साहित्य कें सेहो आलोकित कयलक अछि-- ई परम सौभाग्य आ गौरवक बात थिक हमरा सभक लेल।'

             

               



               

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