तारानंद वियोगी
ई बात पहिनहु कहल जा चुकल अछि जे हिन्दी मे जतबा महत्व नागार्जुनक कविता कें देल जाइत अछि, ताहि सँ कनेको कम हुनकर उपन्यास कें नहि। तकरा पाछाँ मुख्य कारण अछि जे जाहि परिवेश, कथ्य आ पात्र कें नागार्जुन अपन उपन्यासक विषय बनौलनि, से हुनका सँ पूर्व तँ नहिये छल, हुनका बादो बहुत अर्थ मे, ओहि दिशा मे कम काज भेल आ ओ ओ विषय अति महत्वपूर्ण बनल रहल। हिन्दी आलोचक लोकनि एहि बात कें दृष्टिपथ पर रखलनि जे प्रेमचन्दक परम्पराक वास्तविक विकास नागार्जुनेक उपन्यास मे आबि क' भेल। हिन्दीक निस्सन भारतीय उपन्यास जकरा कहल जा सकय, तेहन रचना हिन्दी मे प्रेमचन्दे केलनि, आगू जकर विकास नागार्जुनक बाद फणीश्वरनाथ रेणु केलनि। आलोचक विजय बहादुर सिंह लिखलनि अछि-- 'यह सच है कि कविताएँ उन्होंने काफी संख्या में लिखी हैं और उनके विभिन्न कलात्मक स्तर भी हमें वहाँ देखने को मिलते हैं, किन्तु उनके उपन्यासों का महत्व इससे कम नहीं हो जाता। समाज-सजग लेखक होने के नाते उनके ये उपन्यास हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन के महत्वपूर्ण दस्तावेज कहे जा सकते हैं।'
नागार्जुनक उपन्यासक प्रमुख महत्व अछि जे प्रेमचन्दक बाद भारतीय गाम सब मे जे देखनगर परिवर्तन घटित भेल, तकरा मुख्यत: नागार्जुनक उपन्यास मे देखल जा सकैत अछि। प्रेमचन्दक उपन्यास सब मे विभिन्न प्रकारक दुर्दशा सब व्याप्त छल। ओतय श्रमशील वर्गक स्थिति बहुत शोषण सँ भरल छल। दुख मात्र दुख, निरुपायता, शोषण सहैत जनता अपन संकल्प कें जियौने मात्र रहैत अछि, ततबे बहुत। ओतय व्यवस्थाक भीषण अटूट आतंक अछि। एहन कोनो उपायो नहि देखाइत अछि जे होरी-हल्कू-घीसू-माधव के जीवन मे कहियो राजनीतिक जागरूकता एतैक। अयबो करतै की नहि, तकरो भरोस नहि। नागार्जुनक गाम आजादीक बादक गाम थिक। ओतय संघर्ष कें हमसब संगठित होइत आ मोकाबला करैत देखैत छी। नागार्जुनक गाम मे अखबार अबैत अछि। संगठन आ पार्टीक गतिविधि चलैत अछि। एहन जुझारू नायक सभक प्रादुर्भाव होइत अछि, जकर जीवनक उद्देश्य शोषण, अत्याचार, असमानता आदिक स्थायी निदान ताकब छैक। दोसर प्रमुख बात छैक जे आत्मदीप्त-संघर्षशील स्त्री सभक आगमन पहिल बे नागार्जुनेक उपन्यास मे देखाइत अछि। समस्त प्रकारक अन्याय आ अत्याचार कें मौन भाव सँ स्वीकार करबाक बदला ई स्त्री लोकनि विद्रोह करैत छथि आ अपना हक पर अड़ब जनैत छथि। तेसर प्रमुख बात छैक जे आजादीक बाद हिन्दीपट्टी मे तमाम प्रकारक जे गतिविधि आ हबगब शुरू भेल, तकर सुसंगत अंकन हमरा सब कें नागार्जुनक उपन्यास सब मे देखबा लेल भेटैत अछि। एहि तरहें असल अर्थ मे जकरा हिन्दीक भारतीय उपन्यास कहल जा सकैत हो, से प्रथमत: नागार्जुनेक उपन्यास सब छियनि।
नागार्जुनक उपन्यास सब आजादी-बादक जनापेक्षा के सन्दर्भ मे लिखल गेल अछि। ओ ने केवल राजनीतिक रूप सँ सजग लेखक छथि, अपितु हुनकर अपन दृष्टि आ समझ सेहो छनि। किछु आलोचक एहू बात दिस संकेत कयने छथि जे नागार्जुन उपन्यासक बहन्नें खास-खास समयक राजनीतिक इतिहास अपन पाठकक समक्ष प्रस्तुत केलनि अछि। आइ जतय भारतक राजनीति अछि, मानू तकर समुच्चा पृष्ठभूमि सँ ओ लेखक लोकनिक नब पीढ़ी कें अवगत करबैत छथि, भारत मे राजनीतिक चेतनाक विकास कोना-कोना होइत समकाल धरि आयल अछि, तकरा अंकित करब मानू हुनकर लक्ष्य छलनि। यैह ओ जगह थिक जतय ओ नवयुगक व्याखाकारक रूप मे प्रकट होइत अछि। भारतक जातीय दृष्टि कें अतीत सँ मुक्त क' क' ओ भविष्यक संग जोड़बाक काज करैत छथि।
पहिनहु चर्चा भ' चुकल अछि जे उपन्यास सभक बदौलत नागार्जुन कें हिन्दीक पहिल आंचलिक उपन्यासकार मानल गेलनि, मुदा स्वयं नागार्जुन एहि बात सँ सहमत नहि छला। तकर कारण अछि। उदाहरणक लेल फणीश्वरनाथ रेणु आ नागार्जुनक, जे कि एक्कहि भूभाग कें अपन उपन्यासक विषय बना रहल रहथि, बीचक अन्तर कें देखल जा सकैत अछि। हमसब अवगत छी जे रेणु अपना कें आंचलिक उपन्यासकारक रूप मे देखल जायब पसंद करैत छला। हुनकर उपन्यास सब कें देखने सँ एक ई बात उद्घाटित होइत अछि जे ओ आंचलिकता कें स्थापित करबाक लेल कतेको ठाम स्वयं अपन रचनात्मक क्षति केलनि अछि। उदाहरणक लेल रेणुक पात्र सब कें देखल जा सकैत अछि, जे आंचलिक रूमानियत के परिधिक भीतर रहैत आर्थिक संघर्ष कें कमजोर करैत अछि। एम्हर नागार्जुन कें देखी तँ पबैत छी जे ओ एक्कहि भूभागक वस्तु रहितो आंचलिकताक सीमा कें तोड़ैत छथि आ हुनकर किसान-मजूर ग्रामीणजन आर्थिक आ सामाजिक असमानता सभक विरुद्ध वैचारिक आ व्यावहारिक रूप सँ वर्ग-संघर्ष कें संभव बनबैत छथि। वीरेन्द्र मोहनक शब्द मे कही तँ 'यह दो जीवन-दृष्टियों का अन्तर है, जिसके कारण रेणु आंचलिकता से आगे नहीं बढ़ पाते हैं और नागार्जुन उसी जमीन से समाजवादी चेतना के रचनाकार हो जाते हैं।' वस्तुत: नागार्जुनक मूल दृष्टि आंचलिकता कें बढ़ावा देबाक बदला ग्रामीण जीवनक ओहि जरूरी डिटेल्स कें जुटायब रहैत छनि जकरा भीतर भयंकर सामाजिक रोग सब-- जातीय अहंकार, पुरुषक स्वच्छन्दता आ स्त्रीक प्रति अन्यायपूर्ण जीवन-दृष्टि, विधवाक नारकीय जीवन, उच्चवर्गक प्रच्छन्न भ्रष्टाचार-- आदिक वास्तविक चित्र हमरा सब कें भेटि सकय।
हिन्दी मे नागार्जुन कुल एगारह टा उपन्यास लिखलनि-- रतिनाथ की चाची (1948), बलचनमा (1952), नयी पौध (1953), बाबा बटेसरनाथ (1956), वरुण के बेटे (1956-57), दुखमोचन (1956), कुंभीपाक (1960), हीरक जयन्ती (1962), उग्रतारा (1963), जमनिया का बाबा (1967), गरीबदास (1979)। नागार्जुनक सम्पर्कित लोक सब कें बुझल छनि जे जतबा, मने एगारह उपन्यास ओ लिखलनि, ताहि सँ कतहु बेसी संख्या एहन उपन्यास सभक अछि, जकर एक-एक अध्याय के खाका हुनका मस्तिष्क मे बनल रहनि, आ एकर कथानक सभक खिस्सा ओ कतेको लोक सब कें सुना चुकल रहथि। एकर किछु विवरण 'युगों का यात्री' मे देखल जा सकैत अछि। मुदा, दिनोदिन कविता आ साहित्य विषयक हुनकर एक्टीविज्म अधिकाधिक बढ़ैत गेलनि आ हुनका ओ शान्त-सुस्थिर माहौल नहि भेटलनि, जाहि मे ओहि उपन्यास सब कें लिखल जा सकय। हुनकर उपन्यास-लेखनक दौर 1946 सँ 1967 धरि रहलनि। हुनकर स्वभाव रहनि जे जाहि कोनो उपन्यास कें लिखब शुरू करथि, तकरा निरंतरता मे 30-40 दिन मे लिखि जाथि। हुनकर दुइये टा उपन्यास एहन छनि जकरा दीर्घ अवधि मे पूरा करबाक लेल हुनका बारंबार आसन जमाबय पड़लनि-- बलचनमा आ कुंभीपाक। बलचनमाक वर्तमान पाठ पूरा करबाक बाद एकर दोसर खंड लिखबाक विचार हुनका मोन मे छलनि, जे कि नहि लिखल जा सकल। अंतिम उपन्यास 'गरीबदास' ओ एनसीआरटी के अनुरोध पर 1979 मे लिखलनि, जकर उपयोग प्राय: टेक्स्टबुक के रूप मे कयल जेबाक रहैक। ओकर प्रकाशन जखन बहुत दिन धरि एनसीआरटी नहि केलक तँ अन्तत: 'सारिका'क जनवरी 1990क अंक मे ओ प्रकाशित भेल आ बाद मे पुस्तकाकार छपल। एहि सँ पूर्व 1971 मे ओ एक उपन्यास लिखब शुरू केलनि। एकर एक अंश 'ज्योत्स्ना' पत्रिकाक रजत जयन्ती अंक (1975) मे 'प्लास्टिक के लाल ग्लास' शीर्षक सँ छपल। एहि उपन्यासक नाम सेहो हुनका दिमाग मे घुमड़ि रहल छल-- अग्निगर्भ अथवा अग्निपुष्प। एकर एक आर अंश 'साक्षात्कार'(1987) मे प्रकाशित भेल। मुदा अन्तत: ई उपन्यास पूरा नहिये भ' सकल आ अधूरा अप्रकाशित उपन्यासक रूप मे एकर 72 पृष्ठ नागार्जुन रचनावलीक पांचम खंड मे प्रकाशित भेल।
नागार्जुनक पहिल हिन्दी उपन्यास 'रतिनाथ की चाची' 1948 मे प्रकाशित भेल। ओ वैह दौर छल जखन जैनेन्द्र कुमारक तीन उपन्यास-- सुखदा, विवर्त आ व्यतीत-- छपल, आ एही समय मे उपेन्द्रनाथ अश्कक दू गतगर उपन्यास-- गिरती दीवारें आ गर्म राख-- सेहो प्रकाशित भेल। एहि दौरक आन प्रसिद्ध उपन्यासकार सभक जे उपन्यास सब छल, ओहि मे यशपालक 'मनुष्य के रूप', भगवतीचरण वर्माक 'आखिरी दाँव' आ अज्ञेयक 'नदी के द्वीप' शामिल रहल। नामवर सिंहक अनुसार 'इन कृतियों में ऐसा कुछ न था, जो स्वाधीनता-प्राप्ति के ठीक बाद के मिजाज के मेल में होता।' एही क्रम मे नामवर किछु 'अपेक्षाकृत नव लेखक'क चर्चा करैत छथि 'जिनमें ज्यादा ताजगी थी, जैसे कवि नागार्जुन का 'रतिनाथ की चाची' और 'बलचनमा'। 'रतिनाथ की चाची' की चर्चा कुछ कारणों से कम हुई, पर मेरी दृष्टि में आज भी वह नागार्जुन का सबसे अच्छा उपन्यास है।' (कहना न होगा)। गौर करबाक बात ई छै जे जैनेन्द्र-अज्ञेय आदिक उपन्यास मनोलोकवादी कथा-परम्परा मे अबैत अछि, जकरा प्रेमचन्दक कथा-परम्परा सँ कोनो सम्बन्ध नहि छल, जखन कि नागार्जुन एहि परम्पराक स्पष्ट विकास-दृष्टिक संग प्रवेश कयने रहथि। कमाल बात ई छै जे तत्कालीन आलोचक लोकनि एहि दुनू उपन्यासक प्रति अपन अन्यमनस्कता प्रदर्शित केलनि। हुनकर उपन्यास सब पर विचार करैत सुरेश सलिल लिखने छथि जे 'बावजूद इस आलोचकीय उदासीनता के , यदि नागार्जुन , कविता और उपन्यास, दोनों रचना शीर्ष-व्यक्तित्व बनकर उभरे, तो अपनी प्रतिभा, जिजीविषा और संघर्षशील जनता की आकांक्षाओं की गहरी प्रतीति के बल पर। एक बड़े साहित्यकार के रूप में वह जो कुछ हैं, उसमें आलोचकों की कोई भूमिका नहीं है।'
'रतिनाथ की चाची' मैथिल समाजक सामन्ती संरचना, निर्दय आ अविवेकी पुरुष-प्रधानता, प्रगतिहीन यथास्थितिवादिताक दूटूक समाजशास्त्रीय औपन्यासिक दस्तावेज थिक। एहि उपन्यास कें बहुत हद धरि नागार्जुनक आत्मकथात्मक उपन्यास मानल गेल अछि, कारण रतिनाथ आ ओकर पिता, काकी आदिक लगभग ओहने भूमिका हुनका आरंभिक जीवन मे पाओल जाइछ, जेहन कि एहि उपन्यास मे वर्णित अछि। कथाक केन्द्र मे वैधव्य सँ अभिशप्त एक स्त्री अछि, जकर नाम तँ छैक गौरी, मुदा ओ रतिनाथक काकी अथवा उमानाथक मायक रूप मे जानल जाइत अछि। गौरीक बाद केन्द्र मे अछि रतिनाथ, जे मातृसुख सँ वंचित, अपन क्रूर, निर्मम, लम्पट आ उत्तरदायित्व-विहीन पिताक संरक्षण मे पलि-बढ़ि रहल अछि। गौरी रतिनाथ कें अपन पुत्रो सँ बढ़ि क' मानैत अछि, आ रतिनाथ सेहो अपन काकी कें माय सँ बढ़ि क' मानैत अछि। रतिनाथक लम्पट पिताक काम-लोलुपताक शिकार गौरी बनैत अछि आ गर्भवती भ' जाइछ। अपन नैहरक मदति सँ अवैध गर्भ सँ गौरी कें मुक्ति तँ भेटि जाइत अछि, मुदा ओकर दुखक निस्तार नहि छैक। अपन औरस पुत्र उमानाथक द्वारा अपमानित आ प्रताड़ित गौरीक जखन निधन होइत छैक, हुनका मुखाग्नि देबाक जिम्मा रतिनाथ पर अबैत छैक, कारण उमानाथ जानि-बूझि कें माय कें मरैत छोड़ने छल। ध्यान देबाक बात छै जे पारो कें मुखाग्नि बिरजू देने छल, आ काकी रतिनाथ कें। एहि दुनूक भूमिका मे स्वयं उपन्यासकार छला। उपन्यासक अन्त मे अबैत छैक जे काकीक अन्तिम भस्मावशेष मणिकर्णिका मे विसर्जित क' क' जखन रतिनाथ घुरि रहल होइत अछि, आँखिक देखल ओ दृश्य ओकरा मर्माहत करैत रहैत अछि-- 'अमावस की उस रात को वह कौन था चाची? एक घनी और अँधेरी छाया तुम्हारे बिस्तरे पर बढ़ आई, वह क्या थी चाची?' दम्मो फूफीक महिला परिषद्क बैसार मे रतिनाथ कें पूरा भय छल जे कहीं काकी ओकरा बापक नाम नहि बकि दैक। मुदा, उपन्यासक अन्तिम पांती छैक-- ' शक्ति और शालीनता की प्रतिमे, तुमने क्यों उस धूर्त का नाम नहीं बतला दिया?'
नागार्जुनक अधिकांश उपन्यासक भूमि मिथिला थिक, मुदा महत्व एहि बातक छैक जे तर्कशील सामाजिक चेतना शुरुहे सँ हुनका संग लागल रहल अछि आ ओकर उत्तरोत्तर विकास होइत गेल अछि। सामाजिक यथार्थक अनेक संस्पर्श हुनकर सौंसे उपन्यास सब मे अबैत रहल अछि जे एक तँ दुर्लभ अछि, दोसर एहि दाबीक निषेध करैत अछि जे मिथिला सुरंग मे बन्न एक अन्हार संसार छल जतय ज्योति-सुमति-प्रगतिक कोनो लक्षण नहि छल।
स्त्रीक प्रति कयल जाइत अन्याय कें चेतनता-पूर्वक नागार्जुन अपन आनो उपन्यास मे उठौलनि। 'उग्रतारा'क उगनी सेहो विधवा ब्राह्मण युवती थिक, जकर सनेह-सूत्र गामेक एक अविवाहित राजपूत युवक कामेश्वर सिंह संग जुड़ि जाइत अछि। दकियानूसी गामक परिवेश एहन नहि छैक जे दुनू परिणय-सूत्र मे बन्हि सकय। गामक एक प्रगतिशील सोचवाली उदारहृदया भौजीक सहायता सँ ओ दुनू शहर भागि जाइत अछि। आयुक काँचपन आ अनुभव- हीनताक कारण दुनू ओतय पुलिसक पकड़ मे आबि जाइछ। कामेश्वर पर ई आरोप लगा क' जे ओ पाकिस्तानक जासूस थिक, डेढ़ बरसक लेल ओकरा जेल पठा देल जाइछ। एम्हर उगनी पर घर सँ भागबाक आरोप मे छव मासक सजाइ होइ छै। उगनीक देह पर पुलिस बला सब लुब्ध छैक। पुलिस बला सभक समीकरण ई छैक जे 'जल्दी छूटेगी तो जल्दी इस्तेमाल करेंगे।' ओम्हर जेल मे भभीखन सिंह नामक हवलदारक नजरि उगनी पर जमि जाइत अछि। भभीकन पचपन बरखक अछि मुदा अविवाहित अछि। जहिना उगनी जेल सँ छुटैत अछि, भभीखन अपना घर मे ओकरा राखि लैत अछि आ किछु दिन मे ओ गर्भवती भ' जाइत अछि। ओम्हर कामेश्वर जखन जेल सँ छुटैत अछि तँ उगनीक खोज मे लगैत अछि आ बहुत प्रयासक बाद अन्त: सफल होइत अछि। उगनी ओकरा साफ कहैत अछि जे ओकरा पेट मे चारि मासक गर्भ छै आ आब ओ कामेश्वरक काजक योग्य नहि रहल। मुदा कामेश्वर दृढप्रतिज्ञ अछि जे ओ ओकरा लैये जा क' रहत। उगनीक एहि कालक अन्तर्द्वन्द्व कें नागार्जुन पूरे सजग चेतनाक संग उभारने छथि। आखिरकार होइत छैक जे दुनू ओतय सँ भागि जाइछ। उपन्यासक अन्त मे उगनी भभीखन कें एक अत्यन्त मार्मिक पत्र लिखैत अछि-- 'आदरणीय सिपाही जी, मेरे अपराधों को आप कभी माफ नहीं करेंगे, यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ।...आपकी संतान समय पर बाहर आएगी। असाढ़ में उसका जन्म जरूर होगा, आप रत्ती भर भी चिंता न करें। मैं अपना सबकुछ जिसे सौंप दिया था, उसी के साथ गाँव से निकली थी... वही मुझे आपके क्वार्टर से निकाल लाया है। उस आदमी का दिल बहुत बड़ा है। पराये गर्भ को ढोनेवाली अपनी प्रेमिका को फिर से, बिना किसी हिचक के, उसने स्वीकार किया है। उसने मुझसे शादी कर ली है। वह इतना उदार है कि आपका बच्चा आसानी से आप तक पहुँचा देगा।... बड़ा होगा तो मैं खुद ही उसे आपके पास भेजूँगी, अपने पिता से मिल आएगा। स्कूल-काॅलेज में पढ़ेगा। पिता की जगह आपका ही नाम दर्ज करवाया जाएगा....'
नागार्जुनक स्त्री-विमर्श 'पारो' आ 'रतिनाथ की चाची' सँ होइत 'उग्रतारा' धरि पहुँचल अछि। पारो आ गौरी भारतीयता वा कहू मैथिलत्वक रूढ़िगत विडम्बना थिक, जतय सँ आगू बढ़ैत नागार्जुन उगनीक संग स्त्री-अस्मिता आ उदात्त मातृ-भावनाक रूप प्रस्तुत करैत अछि। जे बिरजू ओहि समय पारोक परम्परा-द्रोही बात सूनि जीह कूचि लैत छल, वैह आब कामेश्वर बनि क' अपन प्रेमिका, भने ओ पराया गर्भ किए ने ऊघि रहल हो, राय रणपाल जकाँ ओकरा अपनबैत अछि, राम जकाँ वनवास नहि दैत अछि। एहि उपन्यासक संरचनात्मक पक्ष सेहो बहुत मजगूत अछि, जेना पारंपरिक लोक प्रेम-गाथा 'सारंगा सदाबृज' के शैली मे आगू बढ़ैत अछि।
नागार्जुनक उपन्यास सभक ई विशेषता छनि जे जाहि समयक कथानक ओ उठबैत छथि, ओ पूरा समय अपन चतुर्दिक परिप्रेक्ष्य मे उभरैत अछि आ नागार्जुनक दृष्टि-संस्पर्श पूरेपूरी ओकरा भेटैत जाइत अछि। जेना रतिनाथ की चाची मे संस्कृत पाठशाला सभक तत्कालीन वातावरण, काशीवास केनिहारि विधवा सभक प्रकृतवादी यथार्थ आदि बहुत प्रामाणिकता-पूर्वक अबैत अछि, तहिना उग्रतारा मे भूदान, न्याय-संहिता, पुलिस महकमाक अन्दरूनी चित्र आदि विस्तारपूर्वक अबैत अछि।
हुनकर एक सुंदर उपन्यास 'जमनिया का बाबा' छनि जे ओ चम्पारण मे रहि क' किसान आन्दोलनक राजनीति करबाक समयक एक घटना, एक अनुभवक आधार पर लिखने छथि। एहि उपन्यासक एक स्त्री-पात्र अछि इमरतिया, जकर चरित्र बेबाक बनि क' ओहि मे उभरल अछि। कदाचित यैह कारण छल जे अधा्याय सब कें आगू-पाछू क' क' यैह उपन्यास 'इमरतिया'क नाम सँ सेहो प्रकाशित भेल। बिहार-उत्तर प्रदेशक सीमा पर अछि जमनिया। जमीन्दारी-उन्मूलनक आन्दोलन चलि रहलैए आ जमीन्दार-सामन्त लोकनि अपन-अपन नाजायज जमीन पर स्वामित्व बनौने रखबाक लेल नव सँ नव तकनीक अजमा रहल अछि। जमनियाक जमीन्दार, महाजन आ महंत लोकनि विशाल भूखण्ड पर कब्जा बनौने रखबाक लेल एक नकली साधू कें आश्रम ठाढ़ करबा, प्रचार-प्रसार करबा क' महान तीर्थ हेबाक हल्ला पसरबा दैत छैक। सीमा पर अवस्थित दुनू राज्यक कैक जिलाक धर्मभीरु जनताक बीच ई प्रसिद्धि पसरि जाइत छैक जे जे मनोकामना कतहु सँ नहि पूर भेल, तकरा जमनियाक बाबाक पाँच डंटा मे हर हाल मे ठीक हुअय पड़ैत छैक। जमनिया मे बराबर भक्त सभक मेला लागल रहैत छैक। वास्तविकता ई छैक जे हरेक प्रकारक अवैध धंधा ओहि आश्रम सँ संचालित होइत छैक। ओहि ठाम एहन पूजा-विधान छैक जाहि मे नरवलि समेत देल जाइत छैक। उपन्यास मे किछु चेतनाशील साधू द्वारा समस्त अवैध धंधाक पोल खोलल जाइत अछि, बबाजी गिरफ्तार होइत अछि, तँ रहस्योद्घाटन ई होइत छैक जे ओ असल मे एक मुस्लिम हत्यारा थिक जे सजाइ सँ बचबाक लेल साधूक बाना धारण क' क' एहि ठामक महंत आ महाजन सभक इष्ट पूर्ति क' रहल छल। ओकरा सजाइ होइत छैक आ ओहि जमीन पर आन्दोलनकारी युवा लोकनि चन्द्रशेखर आजाद प्रशिक्षण विद्यालय खोलि लैत अछि।
एहि उपन्यास मे स्पष्ट कयल गेल छैक जे आइ मठाधीश आ महंत सब जमीन्दार आ महाजनक शह पर एहन माहौल बना लेलक अछि जे आम जनता ओकर क्रूर शोषणक तर मे सकपंज भेल अछि। ईश्वर आ धर्म एकरा सभक लेल एक भीषण अस्त्र छियै, जे आमजनक शोषण कें सरल बनबैत अछि। मानवताक खून चूसनिहार एहि ढोंगी सभक हथियार थिक धर्म आ ईश्वर। धर्म एक औजार थिक शोषण कें सदा बनौने रखबाक लेल आ निर्बल कें सदा पददलित करैत रहबाक लेल। धर्म ओकरे दबबैत अछि जे गरीब अछि। शास्त्रकार लोकनि कें गरीब बकरियेक बच्चा बलि लेल भेटलै, बाघ वा भालुक बलिदानक क्यो कल्पनो नहि क' सकल। नागार्जुनक मर्मबेधी दृष्टि देखि लैत अछि जे धार्मिक उत्सव सब केवल बहन्ना थिक, एकर सभक असली उद्देश्य थिक व्यावसायिकता। मठ के समस्त गतिविधि केवल मुनाफाखोरीक लेल कयल जाइछ। एहि मठक प्रधान बाबा अपन बेस नमहर जटा, जकर रखरखाव मे जानि नहि कतेको टिन नारियल तेल खर्च भ' गेल हेतै, के महिमा बखानैत एक ठाम कहैत अछि-- 'क्या मेरी जटाओं का ही जादू नहीं था कि भगौती ने अपनी चारों लड़कियों की शादी में लाखों रुपये खर्च किये? लालता ने अपने बेटों को डाक्टर और इंजीनियर कैसे बनाया? सेठ बिर्धीचंद की तोंद तिगुनी किस तरह हुई? ठाकुर शिवपूजन सिंह ने ट्रैक्टर कहाँ से खरीदा? रामजनम और सुखदेव की क्या हैसियत थी दस वर्ष पहले?' फेर ओ हिन्दू जनताक गुणगान मे कहैत अछि-- 'हिन्दू जाति सचमुच गाय होती है। बार-बार दुहते जाओ, बूँद-बूँद निचोड़ लो। फिर भी लात नहीं मारेगी, सींग नहीं चलाएगी।' एक दोसर प्रसंग मे वैह बबाजी हिन्दू जातिक श्रेणी-विभाजन करैत कहै छै-- 'मैंने बहुत सोच-समझकर जमनिया को अपना अड्डा बनाया। पहली बात तो यह थी कि मुझे पिछड़ी जातियों से बहुत प्रेम है। साधुओं का जितना आदर वे करती हैं, उतना कोई और नहीं करता। ऊँची जातियों के बड़े लोग मूर्ख साधुओं का मखौल उड़ाते हैं। भेष और रंग के पीछे वे ज्ञान की परख करते हैं।... जमनिया के इर्द-गिर्द लाखों की तादाद में गरीब और अनपढ़ लोग फैले हैं।'
एहि मठक दुराचार के एकटा भुक्तभोगी थिक इमरितिया, जकरा साधू बना क' 'इमरितीदास महाराज' बना देल गेल अछि। ओकरा सुविधा सब केवल एहि द्वारे भेटल छै जे अपन देह, अपन इज्जत, अपन सर्वस्व ओ मठक साधू सब लेल अर्पित करैत रहैत अछि। एतय धरि जे ओकरे समान स्त्री सभक बच्चाक नरबलि देल जाइत रहलैक अछि।
ई उपन्यास अपन विषयक संग केहन आलोचनात्मक विवेक रखने अछि, तकर अवलोकन लेल एक दृश्य देखल जाय। संन्यासी मस्तराम जेल मे अछि। जेलक सिपाही रामसुभग सुकुल कहियो काल अखबार उठा अनैत अछि। अपनो पढ़ैत अछि आ कोनो कोनो समाचार मस्तरामो कें सुनबैत अछि। एक दिनक अखबार मे छपल रहै जे बिहारक मुंगेर जिला मे हजारो हरिजन इसाई भ' गेल। विस्तार मे खबर रहै जे अकालक संकटक चलते अन्न बेत्रेक ओकरा सभक हाल बहुत खराब भ' गेल रहै। इसाइ लोकनि ओकरा सभक हर संभव सहायता केलनि आ अन्तत: ओ लोक सब अपन-अपन जीवन ईसा मसीह कें अर्पित क' देलक। ई समाचार सुनि क' मस्तरामक मन-मस्तिष्क मे जेना आगि लागि गेलैक। ओकरा सब सँ पहिने मोन पड़लै जेलक भंगी सब, जे पैखाना उठा क' ल' जाइत अछि। ओ व्याकुल भ' गेल जे ओकरा समझाबी-- जँ तू सब काल्हि इसाइ भ' जाइ छह, तँ तोहर सभक भाग्य जागि जेतह, गोत्र ऊपर उठि जेतह, तोहर बच्चा सब काॅन्वेन्ट मे, मुफ्त मे पढ़ि क' डाॅक्टर-इंजीनियर बनतह। फेर ककरो हिम्मति नहि हेतै जे भंगी-मेहतर बला काज करबा लेल तोरा बाध्य करतह। मस्तरामक सोच ओकरे भाषा मे-- 'कहते हैं, इस देश में मुसलमान आए तो छोटी हैसियत के हजारों हिन्दुओं ने इस्लाम कबूल कर लिया। इस तरह उन्हें बड़ी जातिवाले हिन्दुओं की घरेलू गुलामी से छुटकारा मिला। हमने यह कभी नहीं सुना कि मुसलमान या ईसाई कहीं हिन्दू बने हों।.... मुसलमान और ईसाई क्यों हिन्दू बनने लगे? इन्हें क्या मिलेगा हिन्दू बनने से? क्या है हिन्दुओं के पास जो वे इनको देंगे?... है तो बहुत कुछ। काफी कुछ है हिन्दुओं के पास। करोड़ों, अरबों की संपदा एक-एक सेठ के पास है, लेकिन गरीब और पिछड़े हुए हिन्दू, जंगलों और पहाड़ी इलाकों में मुट्ठी भर अनाज के लिए तड़प-तड़पकर मर जाएँगे, महासेठ का दिल नहीं पिघलेगा।'
'कुम्भीपाक' भारतीय मिथक मे सब सँ भयानक नरक थिक। उपन्यासक नामकरणे सँ स्पष्ट छैक जे ई नरक कतहु अन्तय नहि, एही देशक शहर सब, जेना पटना मे मौजूद छै। एहि उपन्यासक विशेषता छैक जे एकर कोनो सुगठित कथानक नहि छैक, वस्तुत: ई पुरुषवर्चस्वी सभ्यता मे समाजक अर्द्धांश कें नरक दिस ठेलि देबाक आ ओतहि बनौने रखबाक लेल गढ़ल यांत्रिकी कें देखबैत अछि। ओकर पीड़ा कें, ओहि पीड़ा सभक कारणक तह धरि जेबाक प्रयत्न कें एहि ठाम देखल जा सकैछ। बिहार सन के प्रदेश, जतय सही तरह सँ आधुनिकताक प्रवेशो धरि नहि भेलैक अछि, अधकचरल आधुनिकता संग कोना अपन नरक कें अपना संग उघने चलैत अछि, ई तकरो कथा थिक। दुर्लभ बात ई छैक जे स्त्री कें सर्वाधिक सुरक्षा देनिहार विख्यात 'विवाह-संस्था' पर नागार्जुन एक विराट प्रश्नचिह्न ठाढ़ क' दैत छथिन। समाजशास्त्री लोकनि एहि बात कें पकड़लनि अछि जे भारतीय स्त्री मे परिवार बसेबाक अमिट लिलसा होइत छैक, गृहस्थी जमेबाक लोभ होइत अछि। आ अन्तत: एही लिलसा आ लोभ कें हथियार बना क' पुरुषवर्ग ओकर अनुचित उपयोग करैत रहल अछि। दोसर, एक एहू बात कें नागार्जुन रेखांकित करैत छथि जे निम्नवर्गीय स्त्री सभक परिस्थिति उच्चवर्गीय स्त्री सब सँ अपेक्षाकृत नीक अछि। तकर मूल कारण अछि जे अर्थोपार्जन आ सामाजिक सम्मिलन, दुनू मे स्त्री-पुरुष बराबर-बराबर के साझीदार रहैत अछि। आर्थिक दृष्टियें आत्मनिर्भरताक कारण ई स्त्री लोकनि स्वाभाविक रूप सँ आत्मविश्वास सँ दीप्त होइत छथि। श्रमशील जीवनक परिप्रेक्ष्य मे नागार्जुन एहि मतक छथि जे निम्नवर्गीय स्त्रीक आदर्श उच्चवर्गीय स्त्री कें सेहो अपनेबाक चाही।
'कुम्भीपाक'क मूलकथा चम्पा आ भुवन, दू युवतीक कथा थिक, मुदा एहि मे नरक-वास भोगनिहार अनेक लोक, स्त्री-पुरुष आबि क' शामिल होइत गेल अछि। भुवन कें एहि कुम्भीपाक सँ मुक्ति दियाबै वाली स्त्री निर्मला थिकी। निर्मला एक एहन स्त्री पात्र थिक, जकरा सँ उपन्यासकार बहुत आस लगेने छथि वैह निर्मला इन्दिरा कें बनारस पठबौने छली, रंजना लग। ई इन्दिरा (असल मे भुवन) के थिक, तकर विस्तृत परिचय नागार्जुन एहि रूप मे दैत छथि-- 'इन्दिरा नाम है, उम्र है उन्नीस की। जिला मुंगेर की किसी मशहूर बस्ती में पैदा हुई, घराना ऊँची नाकवालों का। पन्द्रह की उम्र में शादी हुई। दूल्हा पायलट था।, उसी वर्ष हवाई दुर्घटना में जान गँवा दी। इन्दिरा का फिर वही हाल हुआ, घुटी तबीयत के युवकों और आदर्शहीन अधेड़ों के बीच एक तरुण विधवा का जो हाल होता है।... गर्भ चार महीने का हुआ। एक अत्याचारी रिश्तेदार डाॅक्टरी इलाज के बहाने इन्दिरा को आसनसोल ले गया और धर्मशाला में अकेली छोड़कर खिसक आया। तब से दो वर्ष इन्दिरा के कैसे कटे हैं, यह बात धरती जानती होगी कि आसमान जानता होगा... हम-आप तो अन्दाज भी नहीं लगा सकते हैं भैया!'
दुनू उपन्यास कें अनुक्रम मे देखी तँ स्पष्ट होइत छैक जे 'रतिनाथ की चाची' जतय एक अभिशप्त स्त्रीक करुण कथा बनि क' रहि जाइत अछि, ओतहि 'उग्रतारा' एक अस्तित्व-सम्पन्न स्त्रीक आत्मविश्वास सँ दीप्त चेहरा थिक। जखन कि दुनू एक्कहि समान परिस्थितिक उपज छल, दुनू विधवा ब्राह्मणी, दुनू एक्कहि समान कामान्ध पुरुषक अनाचार के शिकार। उगनीक स्वभाव मे एहन एक आगि छैक विधवाक परंपरित छवि कें ओ नापसंद करैत अछि आ व्यावहारिक बनि क' समस्त संकटक सामना करैत अपन अनुकूल जीवन प्राप्त करबा मे सफल होइत अछि।
'कुम्भीपाक' सेहो नागार्जुनक एक प्रसिद्ध उपन्यास छनि जकरा केन्द्र मे स्त्री अछि। अन्तर ई अछि जे ओ दुनू उपन्यास जतय ग्रामीण परिवेश मे स्त्रीक दशा-दिशाक पड़ताल करैत ओतहि 'कुम्भीपाक' मे शहर अबैत अछि। कथा मूलत: पटना नगरका थिक जकर अन्त कलकत्ता जा क' भेलैक अछि। दुनू परिवेश कें तुलनात्मक रूप सँ देखी तँ पायब जे स्त्रीक प्राणवायुक लेल गाम मे जतय श्वासो धरि सहज उपलब्ध नहि छैक ओतहि शहर मे प्रदूषिते सही, मुदा श्वास धरि उपलब्ध छैक जरूर। ई उपन्यास स्त्री-विमर्शक एक पैघ विस्तार कें पकड़ैत अछि जतय वेश्या समेत कें स्त्री-रूप मे देखल जयबाक संदेश छैक। एहि उपन्यासक नायिका चम्पा, जे परिस्थितिवश वेश्या बनबा लेल बाध्य होइत अछि, नीक जकाँ बुझैत अछि जे नीक घरक पुतोहु हुअय कि बस्तीक बदनाम वेश्या, दुन्नू समान रूप सँ पुरुषक बनाओल फाँस मे फँसि क' समान रूप सँ घुटनक शिकार अछि। उपन्यास मे एकठाम जखन कुन्ती, चम्पा कें पुछैत छैक जे की हमसब कोनो नीक घरक पुतोहु नहि भ' सकैत रही? जरूर भ' सकैत रही। हमरा सब कें गर्त मे धकेललक के? पुरुखे ने? आ, पुछैत छैक जे की तों अपना जीवन सँ खुश छह? उतारा मे चम्पा कहैत अछि-- 'नहीं, खुश नहीं हूँ। कोई भी औरत खुश नहीं है। अच्छे घर की बहुओं से जाकर पूछो, वे भी खुश नहीं हैं। हाँ, हमारी घुटन और किस्म की है तो उनकी घुटन और किस्म की।' एहि उपन्यासक विशेषता अछि जे वेश्या कें स्त्री-विमर्श अनिवार्य हिस्सा मानैत अछि, जखन कि आम तौर पर ई स्वीकार्य नहि मानल जाइत रहल अछि। जे अन्तर छैक, से मात्र घुटनक प्रकारता-भेद मात्र छैक।
एहन स्त्री सभक असरा लेल विधवाश्रम, अनाथाश्रम वा सेवा-सदन किसिमक संस्था की करैए, तकरो पोल विस्तारपूर्वक खोलल गेल अछि। ई संस्था सब आब वास्तविकता मे स्त्री-देहक विक्रय-केन्द्र मात्र बनि क' रहि गेल अछि। मुदा, निर्मला-सन स्त्रीक कनेके सहारा पाबि क' वैह इन्दिरा जे बनारस रहैत आब आत्मदीप्ति सँ भरपूर भ' गेल अछि, तकर एक ठाम विवरण आयल अछि-- 'अब इन्दिरा ही कौन-सी लड़की रह गयी! वह तो लड़कों के कान काटती है, सबेरे आज तैरने लगी तो गंगा में कितनी दूर निकल गयी।...बैडमिन्टन भी अच्छा खेलने लगी है... हमने तय कर लिया है, इन्दिरा बी.ए. करके ही पूरब की तरफ किसी शहर में पैर रखेगी।'
एहि ठाम नागार्जुनक उपन्यास 'वरुण के बेटे' पर एक नजरि द' देब उचित होयत। ई उपन्यास गोढ़ि-मलाह लोकनिक समस्या पर लिखल गेल अछि। गोढ़िक रोजगार किसानी के अन्तर्गत अबैत अछि की नहि, एकर कोनो स्पष्ट उत्तर तहिया धरि नहि छल। पहिल बेर नागार्जुन गोढ़ि कें किसान मानैत जलकरक लेल ओकर संघर्ष कें किसान-आन्दोलनक परिप्रेक्ष्य मे देखैत छथि। मत्स्यजीवी सहयोग समिति अथवा मछुआ संघ के परिकल्पना एहि उपन्यास मे कयल गेल छैक। जमीन्दार जलकर सब कें आन लोक संग बन्दोबस्त करैत अछि तँ मलाह लोकनि विद्रोह पर उतारू भ' क' बड़का आन्दोलन ठाढ़ करैत अछि आ अन्तत: मछुआ संघक परिकल्पना कें साकार करैत जलकर सब ओही लोक सब लग बनल रहैत अछि, जकर आजीविके टा नहि, जीवन-मरणक संगी थिक। एहि उपन्यास मे मधुरी नामक नायिका छथि। मधुरीक सासुर मे पति आ ससुर ओकरा बहुत प्रताड़ित करैत छल, तँ ओहि विवाह कें बहिष्कृत करैत ओ नैहर घुरि अबैत अछि। मधुरी पढ़ल-लिखल नहि अछि मुदा बहुत चेतनाशील स्त्री अछि। फेर सँ ओही सासुर घुरबाक प्रसंग मे ओकर फैसला अछि-- 'अब वह कभी उस नशाखोर बुड्ढे (ससुर) की लात-बात बर्दाश्त करने नहीं जाएगी।...फिर से शादी कर लेगी।... किसी दिलेर-नेकचलन और मेहनतकश जवान से... और, बगैर मर्द के कोई औरत अकेली जिन्दगी नहीं गुजार सकती है क्या?' मने, विवाह-संस्था प्रश्नवाचकता सँ घेरायल।
गौर करबाक बात छै जे बड़का लोकक समाज मे स्त्री बन्धन जते कठोर अछि, श्रमशील वर्गक स्त्री अपेक्षाकृत विवाहक मामला मे अधिक स्वतन्त्र अछि। नागार्जुन एकरा ओहिना आदर्श मानैत छथि जेना स्वयं श्रमशील होयब, श्रमशील परिवारक संस्कृतिक संग जीयब कें मानैत छथि। गोढ़ि लोकनिक संघर्ष मे ओ अपन अपार साहस आ प्रतिबद्धताक संग जुड़ैत अछि। उपन्यासक एक नवयुवक आन्दोलनकारी पात्र मंगल थिक, जकरा संग सहज रूप सँ ओकरा प्रेम होइत छैक। उमर मे ओ मधुरी सँ छोट अछि, मुदा तकरा मधुरी विवाहक लेल ओकर अयोग्यता नहि मानैत अछि। अन्तत: समाज सेहो ओकर संग दैत छैक आ दुनूक विवाह सम्पन्न होइत अछि। विवाह-संस्था कें जहाँ धरि प्रश्नांकित करबाक प्रश्न अछि, हुनकर आनो उपन्यास मे एकर सूत्र भेटैत अछि। 'हीरक जयन्ती' नागार्जुनक एक प्रसिद्ध व्यंग्य उपन्यास छनि, जाहि मे राजनेता आ ओकर दलाल लोकनिक अन्दरूनी भ्रष्ट प्रवृत्ति सब कें देखार कयल गेल अछि। एकर एक पात्र थिक-- ललनजी। हुनका सात बेटी छनि। तीन तँ विवाह योग्य। ओ अपन बेटीक ब्याह ल' क' चिन्तित आ उद्यमी रहैत छथि, मुदा हुनकर पत्नी लेल चिन्ताक विषय बेटीक पढ़ाइ अछि, ब्याह नहि। दुनूक बीच गपसप जखन एहि प्रसंग पर पहुँचल जे एकटाक ब्याह क' ली तँ ललनजी बजला-- 'बाकी क्या क्वाँरी रहेंगी?' पत्नीक जवाब-- 'वाह, क्वाँरी क्यों रहेंगी? पढ़-लिखके काम करेंगी, आप, अपना दूल्हा खोज लेंगी। कम पढ़ी-लिखी लड़कियाँ भी दस तरह के धन्धे कर सकती हैं, वे भी बूढ़े माँ-बाप को पाल सकती हैं।' स्पष्ट रूप सँ ई परंपरित रूप सँ स्त्री कें सर्व-सुरक्षा-प्रदायिनी संस्थाक रूप मे स्थापित विवाह-संस्था पर एक विराट प्रश्न अछि, जकरा नागार्जुनक आनो अनेक रचना मे, हुनकर इन्टरव्यू सब मे देखल जा सकैत अछि।
'हीरक जयन्ती' मे बिहार सरकारक एक मंत्री बाबू नरपत नारायण सिंहक हीरक-जयन्तीक विशाल आयोजनक सरंजामक विस्तृत विवरण आयल अछि, जे अत्यन्त रोचक अछि। ककरो हीरक-जयन्ती पचहत्तरिम वर्ष मे माओल जाइत छैक। मंत्रीजी एखन एकहत्तर के छथि। एखने आयोजन करबा लेबाक विशेष कारण ई छै जे के कहय, पचहत्तर धरि ओ मंत्री-पद पर बनल रहता कि नहि। एहि उपन्यासक एक बुद्धिजीवी पात्र छथि कवि मृगांक, वैह समुच्चा आयोजनक परिकल्पक छथि। समारोह कें मूर्त रूप देबाक लेल एक आयोजन समितिक गठन होइछ। समिति मे पन्द्रह सदस्य छथि, ताहि सब गोटेक परिचय विस्तार सँ देल गेल अछि। देश कें गर्त दिस घीचि ल' जेबा मे जाहि पुरान पापी, महाभ्रष्ट सब के भूमिका छनि, ई पन्द्रहो गोटे तकर सभक प्रतिनिधित्व करैत अछि। एहि मे सँ क्यो राजा उपाधिधारी भूतपूर्व जमीन्दार छथि तँ क्यो अरबोअरब पूजीक कारबार सम्हारै बला व्यापारी। क्यो जमीन्दार छथि, क्यो एम.पी.-एम एल ए -एम एलसी आदि घाघ लुटेरा, मठक धनाढ्य शोषक महंत सेहो छथि जे ई पद अपन साक्षात गुरुक हत्या क' क' प्राप्त केलनि अछि। कहबे केलहुँ जे बुद्धिजीवी वर्ग तँ आगुए आगू छथि। बांकी मारवाड़ी सेठ, पत्रकार, अध्यापक आदि छथि। समीकरण एहन छै जे स्त्री, शूद्र, दलित, सवर्ण सबहक प्रतिनिधित्व छैक। ने ककरो अभाव, ने ककरो खगता। एही लोक सब मे सँ किछु अभिनंदन-ग्रन्थ उपसमिति मे छथि तँ क्यो अर्थसंग्रह-उपसमिति मे। उपन्यासक जे अध्याय सभक नामकरण छैक, सेहो रोचक-- उद्योग-पर्व, परिचय-पत्रिका, समारोह-समिति की बैठकें, पिछला दिन, पिछली रात, आठ बजे दिन, बारह बजे, पाँच बजे शाम, दस बजे दिन, तीन बजे रात आदि-आदि। ओहि दिन विशाल तामझामक संग नेताजीक हीरक जयन्ती मनाओल। अगिला दिनक अखबार एहि शुभ समाचार आ सुन्दर-सुन्दर फोटो सँ भरल रहय। मुदा, ओही राति तीन बजे एकटा आरो घटना भेल जे नेताजीक छब्बीस वर्षक बेटी, अपन माँक गहना आ पाँच हजार नगद ल' अपन प्रेमी-संग फिरार भ' गेल। एक पत्र ओ छोड़ि गेल, जाहि मे लिखल छल जे एहि कोठी मे ई हमर आखिरी राति थिक, आब सदाक लेल हम अहाँ सँ बिछुड़ि रहल छी। ओहि स्त्रीक दारण कथा ओकर शब्द मे सुनल जाय-- '... महिला मंगल समाज तो खैर आपका अपना शिशु है। दसियों युवतियों ने आपकी छत्रछाया में वैधव्य के अभिशाप से छुटकारा पाया है। लेकिन मैं? मेरी तरफ आपने कभी ध्यान दिया? ... अठारह की उम्र में मेरी शादी हुई। शादी के छ: महीने बाद ही हवाई दुर्घटना में उनका देहान्त हो गया। इन्टर के बाद आपने मेरी पढ़ाई छुड़ा दी। एक बूढ़े पंडितजी रखे गये जिनसे मुझे गीता, रामायण, उपनिषद्, वेदान्त आदि पढ़ना पड़ता था... गत वर्ष तक आखिर मुझे माँ की ममता प्राप्त थी। पिछले दिनों मेरी नकेल आपने चाचीजी को थमा दी। माँ वह माधवी की हो सकती है, मेरे लिए तो वह चुड़ैल से बदतर है।... इन्टर का एक मेरा साथी बंब ई में रहता है। हम बीच-बीच में मिलते रहे हैं। एक मिल में वह टेक्निकल एक्स्पर्ट है, छ: सौ पाता है।... आपकी हीरक जयन्ती हुई, मेरी यह ताम्र-जयन्ती ही सही!'
समुच्चा उपन्यास हीरक जयन्ती के तामझाम सँ जुड़ल अछि। एक यशलोभी, चतुर आ विलासी मंत्रीक ठीक हीरक जयन्तीक दिन, पिताक पोलपट्टी खोलैत मंत्रीक आत्मदीप्त बेटी घर छोड़ि प्रेमी लग चलि गेल आ एकरा ओ अपन ताम्र जयन्ती कहलक, यैह ओहि वर्गक प्रति तीक्ष्ण व्यंग्य थिक। ताहि पर सँ मृगांक सन के कवि-बुद्धिजीवी कोना आ की की क' क' अपन नाम चमका रहल अछि, मंजुमुखी सन स्त्री कथीक बल पर राजनीति मे जगह बना रहल अछि, आदि आदि।
नागार्जुनक 'दुखमोचन' उपन्यास, जहिया ई प्रकाशित भेल, तहिया सँ आइयो धरि कतहु ने कतहु, कोनो ने कोनो कोर्स मे लागल रहल अछि। एहि उपन्यासक प्रसारण तेरह एपिसोड मे 1956 मे आकाशवाणीक इलाहाबाद आ लखनऊ केन्द्र सँ भेल, तें देखबै जे एहि मे तेरहे टा अध्याय छैक। एहि उपन्यासक सम्बन्ध मे नागार्जुन बहुत रोचक दू टा खिस्सा सुनबै छला, जे कि बाद मे अनेक ठाम लिखलो भेटैत अछि। पहिल खिस्सा। नागार्जुन ओहि समय इलाहाबाद मे रहै छला। आकाशवाणी इलाहाबाद मे ओहि समय यशस्वी कवि भारतभूषण अग्रवाल अधिकारी छला। अग्रवाल जी बेर-बेर नागार्जुन कें टोकारा देथि जे आकाशवाणी सँ प्रसारणक लेल एकटा उपन्यास लिखियौ। नागार्जुन एकरा मजाक बुझथि आ सीरियसली नहि लेथि। अग्रवाल जी मुदा सीरियस रहथि। एक बेर फेर जखन तगेदा केलखिन तँ नागार्जुन उतारा देलकनि--'मेरा उपन्यास प्रसारित करने से तुम्हारी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।' नहला पर दहला मारैत अग्रवाल जी जवाब देलकनि जे ' प्रतिबद्ध लेखकों को आकाशवाणी के अधिकारी इसीलिए तो गरियाते हैं कि वैसे तो वह आग उगलते रहेंगे लेकिन संचारमाध्यमों में मौका दो तो साफ मुकर जाएँगे।' खैर, हुनकर एहन तगेदा पर ओ लिखलनि तँ जरूर, मुदा लिखबाक समयक अपन मन:स्थिति बतबैत स्वयं कहने छथि जे 'उसे लिखते समय मेरे मन पर भारतभूषण की नौकरी जाने का खतरा बराबर बना रहा, इसलिए उपन्यास का स्वर वैसा नहीं हो पाया।'
दोसर खिस्सा जे सुनबै छलखिन से एहि उपन्यास के प्रकाशन(1957) के बादक। पटना मे ओहि साल एकटा पैघ सम्मेलन भेल रहै-- मुखिया-सरपंच सम्मेलन। एहन-एहन आयोजन मे नागार्जुन जरूर पहुँचथि। से भेलै ई जे एहि उपन्यासक एकटा पाठक, जे ओहि सम्मेलन मे कोनो हैसियत सँ आयल छला, नागार्जुन कें घेरि लेलकनि। पाठकक जे कहब छल, से स्वयं नागार्जुनक शब्द मे सुनल जाय-- 'आपकी लेखनी के प्रति हमारे मन में बहुत श्रद्धा है। आपकी हर किताब हम ढ़ूँढ़-ढ़ूँढ़कर पढ़ते हैं। आते ही 'दुखमोचन' हमने खरीदी और पढ़ी। आप तो आग उगलनेवाले लेखक हैं, लेकिन यह किताब तो एकदम ठण्डी है। हमारा श्रम, समय और धन सब बरबाद हुआ। लीजिये यह रद्दी किताब और लौटाइये हमारा पैसा।' नागार्जुन तँ सकदम्म रहि गेला। ओ मरदे किताबो अपना संगहि अनने छल। ओकर तामस कें देखैत नागार्जुन किछु सफाइ नहि देब उचित बुझलनि आ चुपचाप जेबी सँ पाइ निकाललनि। पाइ तँ ओ बेचारा पाठक नहि लेलक मुदा ओही तामस मे कहलकनि-- 'कान पकड़िये कि दुबारा फिर कभी ऐसी रद्दी किताब नहीं लिखेंगे।'
मूल बात ई रहै जे नागार्जुन यथास्थिति कें तोड़बाक आ आमूलचूल व्यवस्था-परिवर्तनक हिमायती रहथि। ओ समय छल जखन स्वतंत्रता-संग्रामक आदर्श जीवित आ जीवन्त छल। स्वतंत्रताक बाद जे आम जनजीवन मे परिवर्तन भ' रहल छल, ओ अपर्याप्त छल। ओ अपर्याप्त किए छल? व्यवस्था सँ लोक जते उम्मीद करैत रहय, से सब ओतेक जल्दी आ ओतेक मात्रा-गुण मे जमीन पर नहि उतरि रहल छल। व्यवस्था सँ उम्मीद रहै, मुदा देशवासी जनता सँ तँ सेहो उम्मीद रहै कि ने! एना थोड़े हेतै जे एक्केक कयने सब किछु राताराती बदलि जेतै? स्वयं नागार्जुन लिखने छथि जे 'राजनीतिज्ञों के मत्थे सारा दोष मढ़कर यदि हम निश्चिन्त हो जाएँ तो यह अविवेक की पराकाष्ठा होगी।' ई उपन्यास नागार्जुनक आन उपन्यास सँ एहि रूप मे भिन्न छल जे एहि मे जनताक दायित्वक बात कयल गेल छै। आजादीक बाद जँ अनेक नीक चीज समाज मे घटित भेलै तँ दोसर दिस अधलाह चीज सब सेहो जड़ि जमायब शुरू क' देने छल। गुटबाजी, भ्रष्टाचार, स्वार्थ-लिप्सा, अनैतिकता-- ई सब अवगुण पहिनहु सँ भने छल होयत, मुदा स्वतंत्रता-संग्रामक आदर्श एहि सब चीज कें बहुत हद धरि सीमित केलक। नेता सभक देखादेखी ई सब अवगुण फेर सँ समाज कें ग्रसित करय लागल। एहि स्थिति मे प्रेम, सौहार्द्र, त्याग, ईमानदारी, भाइचारा-- आदिक ह्रास स्वाभाविक रहै। एहि उपन्यासक नायक दुखमोचन एहि सब गुण सँ भरल अछि। कथा जें कि मिथिलाक टभका कोइली गामक थिक, अन्धविश्वास आ पुरातन रूढ़िग्रस्तता सेहो एक समस्या बनि क' आयल अछि। समाज मे नवीन चेतना जगेबाक लेल दुखमोचन स्वयं कें मानू समर्पित क' देने छैक। गाम मे बाढ़ि अबैत अछि अथवा अगिलग्गी होइत छैक तँ पीड़ितक सर्वाधिक सहायक दुखमोचने होइत अछि। गाम मे पक्की सड़क निर्माणक ओकर स्वप्न साकार होइत छैक, तहिना शिक्षा आ चिकित्साक प्रबन्ध। बेगरतूत रामसागरक माय मरैत छैक तँ अन्त्येष्टिक संपूर्ण इंतजाम ओ करैत अछि, टेकनाथक बान्हल बरद मरैत छैक तँ तकरो वैह सम्हारैत अछि। कुल मिला क' देखी तँ उजड़ल गाम कें जेना एक आदर्श ग्रामक स्थिति धरि दुखमोचन, अपन सहयोगी सभक संग पहुँचेलक तँ उपन्यासक रुझान ई छै जे आइ एहि देश, एहि समाज कें केहन नेतृत्वक आवश्यकता छैक। देशक हित-साधन लेल व्यक्ति-रूप मे क्यो कोना आ केहन अवदान द' सकैत अछि, सेहो एकर एक मुख्य पक्ष थिक।
एहि उपन्यास कें हुनक एक पाठक रद्दी उपन्यास कहलकनि। कमाल ई जे ई बात स्वयं नागार्जुन बता रहल छथि। एहि ठाम हमरा प्रशस्त व्यंग्य देखाइत अछि। हमसब जनैत छी जे स्वयं वामपंथी रहितो वामपंथ सँ हुनकर शिकाइत सब दिन रहलनि। एक कारण एहि ठाम देखि सकै छी। पाठक मुखिया-सरपंच सम्मेलन मे आयल रहथि, तँ साफे मतलब अछि जे ओ एक राजनीतिक कार्यकर्ता छल। राजनीति करब एक धंधा थिक, दुखमोचनक रस्ता एहि लोकक रस्ता सँ बिलकुल अलग छै। राजनीतिक कार्यकर्ता सब सँ जे हुनकर शिकाइत रहनि, तकर संकेत एहि ठाम एलैए-- स्वयं निर्माणक काज मे उतरि जायब से नहि, ओ काज व्यवस्था करय तकरा लेल राजनीतिक दबाव बनायब, मात्र एतबे टा लक्ष्य। भारतभूषण अग्रवालक बात ओ मानि गेला, एकर एक मतलब इहो थिक जे जीवन मात्र दबाव बनेबाक लेल नहि छै, ओकर अपनो उपादेयता छै। ओ निर्माण क' सकैए। विना कोनो स्वार्थक, ओ सरकारी योजना सभक लाभ अपना गाम तक घीचि अनबा मे सक्षम होइत अछि। श्रमदान होइ छै, से अलग। एहि सब लेल संघर्ष करय पड़ै छै, संगोर सेहो बनबय पड़ैत छै, मुदा लक्ष्य मात्र जनहित। दुखमोचनक चरित्र पाठकक चरित्र सँ सर्वथा भिन्न छै। आकाशवाणीक बहन्ना पाबि नागार्जुन अपन चिन्तनक एहू अदृश्य क्षितिज कें उद्घाटित करबाक सुअवसर मानि क' उपयोग केलनि।
विचार क' क' देखी तँ पायब जे अपन उपन्यास सब मे नागार्जुन मुख्यत: दू समस्या कें उठौलनि-- स्त्रीक स्वाधीनता आ किसानक जीवन-संघर्ष। एक दिस रतिनाथ की चाची, उग्रतारा, कुम्भीपाक आदि स्त्री-प्रश्न पर केन्द्रित अछि, तँ दोसर दिस बलचनमा, बाबा बटेसरनाथ, वरुण के बेटे आदि किसान-प्रश्न पर केन्द्रित अछि। राजनीति आ अर्थतंत्र, एहन वस्तु रहल जे समस्त ठाम हुनका संग चलैत रहलनि। तहिना, गाम। गामक भीतर नागार्जुनक जड़ि कते गँहीर स्तर धरि पहुँचल छल आ ओकर कते प्रेम, कते हियाब सँग ओ जीबैत छथि आ उपन्यास सब मे बेर-बेर रचैत छथि। एकटा मुख्य विशेषता हुनका मे छनि गामक प्रति नागार्जुनक प्रेम भावुक सहानुभूति नहि थिक अपितु शोषणक विरुद्ध प्रकट जनचेतना संग ओ सदति जुड़ल रहला अछि। अपन उपन्यास सब मे ओ ग्रामीण चरित्र सभक भीतरी तह धरि जाइत छथि, से जेना रतिनाथ की चाची आदि मे संभ्रान्त ग्रामीण होथि कि वरुण के बेटे मे निम्नवर्गीय ग्रामीण। बलचनमा मे देखैत छी जे दुनू समाजक हित कोना आपस मे टकराइत अछि। बलचनमा मे निम्नवर्गीय ग्रामीण चरित्रक स्तब्ध क' देबैबला आत्मकथा तँ दोसर दिस वरुण के बेटे मे गोढ़ि-मलाहक दैन्य, विवशता आ जीवन-संघर्ष। बाबा बटेसरनाथ एक बूढ़ बड़क गाछ थिक जे अपन आँखिक देखल सय बर्खक इतिहास कथा मे खोलैत अछि। ई कथा एक गाछक कथाक बहन्नें सय बर्खक गामक इतिहास बता जाइत अछि, आ कने व्यापकता सँ देखी तँ सौंसे देशक सय बर्खक इतिहास। ग्रामवासी लोकनिक दुख-दर्द, शोषण आ उत्पीड़नक वृत्तान्त लोमहर्षक अछि। आ, जेना कि पहिनहु संकेत केलहुँ, हीरक जयन्ती हुनक उपन्यास-लेखनक तेसर प्रकार थिक जतय ओ राजनीतिक खुक्खपन के बहुत तह धरि जा क' दू टूक व्यंग्य-विश्लेषण केलनि अछि।
नागार्जुनक उपन्यास सब कें किछु लोक कम्युनिस्ट लेखकक वैचारिक ढाँचा बला उपन्यासक कोटि मे रखै छथि। तकरा पाछाँ तर्क देल जाइत छैक जे हुनका लेखन मे सदति संघर्षक ठोस परिणति पर हुनका अटल विश्वास रहै छनि। विना कोनो संशय आ विफलता के घटना आ चरित्र कें ओहि निष्पत्ति धरि ओ आराम सँ पहुँचा दैत छथिन जतय हुनका पहुँचबाक रहैत छनि। वास्तविकता ई थिक जे अनेक कम्युनिस्ट उपन्यासकार जकाँ कम्युनिज्म नागार्जुन मे कतहु आरोपित कयल जाइत नहि देखाइत अछि। ओ आरोपित अछियो नहि। एक निछच्छ किसान ग्रामीण सन के मन राखनिहार नागार्जुन अपन पात्र आ परिवेश सँगें तेना क' एकात्म छथि जे हुनका मे अलग सँ कोनो वैचारिक आग्रह भ इयो सकैत छनि, से मानब कठिन अछि। नागार्जुनक उपन्यास सभक कमी कहल जाय वा सीमा, ओ विस्तार मे जाइ सँ हरदम कतराइत छथि। तें, हुनकर कलाक विशेषता छनि जे गैप भरपूर छोड़ै छथिन, पूरा हद धरि अपन पाठकक संग लोकतांत्रिक हेबाक करैत छथि।
दोसर दिस, किछु आलोचक एहू बात कें लक्ष्य केलनि अछि जे विचार सँ भने ओ कम्युनिस्ट होथु, मुदा हुनकर कृति सब मे हुनकर निकटता समाजवादी सभक प्रति बेसी स्पष्ट देखाइत छैक। हुनकर एक प्रमुख उपन्यास बलचनमा मे राधे बाबू, शर्मा जी आ डाॅ. रहमान आदि समाजवादी लोकनि छला। स्वयं व्यक्ति-रूप मे नागार्जुन सेहो किसान आन्दोलनक एक उपज छथि, आ हमरा लोकनि कें मोन राखैक चाही जे स्वतंत्रता-पूर्वक किसान आन्दोलन समाजवादिये लोकनिक नेतृत्व मे चलल छल। तें, स्पष्ट रूप सँ नागार्जुनक झुकाव समाजवादी विचारधारा दिस छल। किसान-मजूर हो कि नोकरीपेशा कामगार, सदा देखल गेल जे नागार्जुनक संवेदना शोषित-पीड़ित जनक प्रति रहलनि। चाहे कोन्नो राजनीतिक दल हो, जे जनताक हित मे काज करत, नागार्जुन ओही दलक संग भ' जेना। एहना मे कैक आलोचक इहो कहैत छथि जे कबीर सँ नागार्जुन केवल तिक्ख व्यंग्ये टा नहि लेलनि, एहू अर्थ मे हुनका कबीरक उत्तराधिकारी मानल जाइत छनि जे ओ जाति नहि पुछैत छथि, काज देखैत छथि। राजनेता आ व्यवसायी वर्ग, एहि दूनूक प्रति नागार्जुन सदा सख्त देखल जाइत छथि, कारण दमन आ शोषण के चक्रक मूलाधार यैह लोकनि छथि। असल मे, नागार्जुनक उपन्यास सब नवीन भारतक स्वातंत्र्योत्तर अपेक्षा सभक सन्दर्भ मे लिखल गेल अछि।
राजनीतिक दृष्टि सँ नागार्जुन ने मात्र पूर्ण सजग रचनाकार छनि,अपितु जनमुखी राजनीतिक हुनकर अपन समझ, अपन धारणा सेहो छनि। प्रतिबद्ध हेबाक अर्थ हुनका नजरि मे, कोनो राजनीतिक विचारधारा अथवा दलगत राजनीति सँ नहि, शोषित-पीड़ित जनताक दिस पक्षधरता सँ अछि। उदाहरणक लेल बाबा बटेसरनाथ कें देखल जा सकैए। स्वप्नकथाक माध्यम सँ जाहि ग्रामीण परिवेशक चित्रण ओ एहि उपन्यास मे केलनि अछि, से आजादीक आसपासक समय थिक। एहि मे जे राजनीतिक परिवेश हमरा सब कें भेटैत अछि से गाँधीवादी, समाजवादी, मार्क्सवादी आ क्रान्तिकारी-- समस्त गतिविधिक गहमागहमी अछि। तखन, एतबा जरूर अछि जे एकर प्रतिनिधि पात्र गाँधी आ मार्क्सक क्रमिक विस-सोपान कें द्योतित करैत अछि। एहि ठाम एक प्रश्न इहो उठाओल जा सकैत अछि जे की उपन्यासकारक काज इतिहासक विकास-सोपान कें दरसायब थिक? उत्तर अछि नहि। तखन प्रश्न अछि जे नागार्जुनक अभिप्राय की छनि? ओ असल मे, नितान्त आजुक समकालीन राजनीतिक चेतना कें अभिव्यक्त केलनि अछि। इतिहासक विकास-क्रम मे ओ मात्र एहि दुआरे गेला अछि जाहि सँ आजुक पीढ़ी, आजुक जनपक्षधर राजनीतिक चेतनाक पृष्ठभूमि कें ठीक-ठीक बुझि सकय। यैह ओ विन्दु थिक जतय नागार्जुन नवयुगक व्याख्याकारक रूप मे प्रकट होइत छथि। ओ साफ कहैत छथि जे हमरा सभक सतयुग तँ आब आबैबला अछि। एहि तरहें ओ देशक जातीय स्मृति कें अतीतमुखी हेबाक बदला भविष्यमुखी हेबा पर जोर दैत छथि। बाबा बटेसरनाथक माध्यम सँ युगव्यापी राष्ट्रीय संघर्षक कथा कहल गेल अछि। प्रेमचंदक परंपराक सम्बन्ध मे स्मरण करी तँ देखै छी जे स्वयं प्रेमचन्देक शिष्य जैनेन्द्र हुनकर परंपरा कें अतीतक वस्तु मानि अपन विषय-परिवेश बदलि लेलनि। हुनकर परंपराक वास्तविक विकास जतय देखाइत अछि, ओ नागार्जुन छथि। स्मरण रहय जे स्वयं नागार्जुनो प्रेमचन्दक संपर्क-सामीप्य मे रहल छला।
नागार्जुनक उपन्यास सब मे परिवर्तनक एक बेहद गंभीर नीयत सब ठाम हमरा सब कें देखार पड़ैत अछि। मनुक्ख जँ इतिहासक उपजा थिक तँ इतिहास-निर्माता सेहो थिक। केवल परिस्थिये टा मनुक्ख कें बदलैत हो से नहि, अपितु मनुक्ख सेहो परिस्थिति कें बदलबाक शक्ति रखैत अछि। ई परिवर्तन जँ एक दिस वस्तु-जगतक लेल सत्य अछि, तँ ततबे सत्य अंतरंग जगतक परिवर्तनक बारे मे कहल जा सकैत अछि। नैतिक साहस आ ईमन्दारी सन के अंतरंग शक्तिक विना ई समस्त परिवर्तन अपूर्ण आ एकांगी रहत। आलोचक विजयबहादुर सिंह लिखने छथि-- 'नागार्जुन अधूरी दुनिया के लेखक नहीं हैं अत: न तो वे कोरे आदर्शवादी (कल्पनावादी) हैं, और न ही कोरे यथार्थवादी। उनके उपन्यास किसी निश्चित राजनीतिक या सामाजिक चिन्ता से जन्म लेते हैं और किसी स्पष्ट इशारे के साथ खत्म होते हैं। गोर्की के शब्दों में कहें तो उनकी कला-साधना पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच लड़ा गया एक धर्मयुद्ध है-- 'It is a battle for and against.'
जहाँधरि नागार्जुनक कथा-शैलीक प्रश्न अछि, ई अपन अलगे आभा लेने सगरे प्रकट होइत अछि। कोनो बात कें लिखता, ओ चाहे कोनो घटनाक बारे मे हो कि चरित्रक बारे मे, एहि तरहें लिखता जे पाठकक आगू ओकर चित्र ठाढ़ क' देता। मिथिलाक कण-कण हुनकर समस्त रचनाशीलता मे अनुस्यूत अछि। तें, अक्सरहाँ कोनो प्रसंग पाबि क' धान हो कि आम, कि किछु आर, ओकर तरह-तरहक प्रकार आ वैशिष्ट्यक विवरण देबय लगता। ई सब हुनकर प्रत्यक्ष अनुभव, फर्स्टहैंड एक्सपीरिएंसक कारण होइत छल। हुनकर उपन्यासक विशेषता अछि शुरू सँ आखिर धरि, कथा अपन सहज प्रवाह मे मंथर गतियें बढ़ैत अपन प्रभाव कायम करैत अछि आ पाठक कें बान्हि लैत अछि। जें कि हुनकर मान्यता छलनि जे उपन्यास ततबे अल्प मोलक हेबाक चाही जे सर्व साधारण पाठक ओकरा कीनि सकय, आ तेहने भाषा-शैली मे लिखल जेबाक चाही जे मिडिल पास पाठक धरि ओ सबटा बात हू-ब-हू पहँचि जाय। हुनकर कला कलाक लेल नहि छल, जीवनक लेल। ओहि अन्तिम आदमीक जीवन धरि, जकर न्याय के लड़ाइ नागार्जुन जीवन भरि लड़ैत रहला।


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