Tuesday, December 28, 2021

एम्हर जे पढ़लहुं-2 दकचल समय पर रेख/कृष्णमोहन झा मोहन


दकचल समय पर कविक घीचल रेख

                            तारानंद वियोगी


 'ग्लोबल गाम सं अबैत हकार'क कवि कृष्णमोहन झा 'मोहन'क दोसर कविता-संग्रह बहराएल अछि। एहि संग्रहक ओ नाम रखलनि अछि-- दकचल समय पर रेख। संग्रह देखि पहिल तं ख्याल यैह आएल जे चारि-पांच साल पहिने जे हकार आएल छल तकरा स्वीकार क' लेल गेल। आ एतबी दिन मे हालत ई बनलै जे तमाम समय दकचा गेल अछि। मुदा, ई कवि हारि मानय बला जीव नहि छथि। एहि आशयक एकाधिक कविता एहि संग्रहो मे संगृहीत छै जतय ओ कहै छथि जे हारल नहि छी, वा कि संघर्षे हमर उत्कर्ष थिक। तें दकचलो समय पर अपन रेख घीचब हुनका जरूरी लगलनि अछि।

            मोहन जीक कविताक कैक गोट विशेषता सब अछि जे पहिलो संग्रह मे देखार पड़ल छल आ एहू मे देखाइत अछि। अपना कविताक लेल बिम्ब कि प्रतीक कि विडंबना ओ समकाल सं उठबैत छथि, आ एना करैत वाजिबे कविरूढ़ि सं बाहर निकलबाक चेष्टा रहैत छनि। तहिना, अप्पन अनुभव हुनका लेल सर्वाधिक मूल्यवान रहलनि अछि, आ एहि कारणें ओ समकालीन कविता कें कैकटा नब मोहाबरा प्रदान करबाक यश प्राप्त केलनि अछि। हुनक काव्यभाषा सुरुहे सं वर्णनात्मक रहलनि अछि, मुदा खूबी ई छनि जे कैक गोट दुर्लभ चित्र घीचि पबैत छथि जे पाठक कें बहुत दिन धरि मोन रहि जाइत अछि।

            अपन दकचल समयक पहचान लेल हम एहि संग्रह कें पढ़ैत छी। अपन काव्यलेखन-कर्म कें परिभाषित करैत एक ठाम लिखलनि अछि--'समयक मुंह पर साटल विज्ञापन सब कें ओदारि रहल छी।' वाजिबे। विज्ञापनक खगते एही लेल पड़ैत छैक जे कोनो झूठ प्रचारित करबाक रहै छै। बड़का-बड़का होर्डिंग सब जहां-तहां चमचमाइत देखायत, सब क्यो देखैत छी। मुदा कविक अनुभव की छनि? एक ठाम कहै छथि-- 'ओकरा होर्डिंगक छाह सं हमर चिनबार अन्हार होइत जा रहल अछि।' चिनबारक अन्हार होयब की थिक? अपन परंपराक, अपन मूल्यक ध्वस्त होयब। आम आदमीक पराभव मे कविक पराभव निहित छैक। विज्ञापन मे इजोत छैक जखन कि वास्तव मे अछि अन्हार। इजोतक एते विज्ञापन होइत देखि एकर असार-पसार पर कठोर व्यंग्य करैत छथि-- 'अन्हार गरीबक गंजी जकां गुदरी-गुदरी भ' गेल अछि।' एक ठाम विकल्पहीन लोक-समाजक दुर्दशा पर कहै छथि-- 'झूठ-सांचक जंगल मे औनाइत लोक पांगल गाछ जकां विकल्पहीन, मात्र छिप्पी परहक चतरल हरियरी कें अपन विकास मानि रहल अछि।' औनाइत लोक, ओहू मे झूठ-सांचक जंगल मे, ओकर नियतिये आर की भ' सकैत अछि? एक कविता मे कहै छथि-- 'बड़ कठिनाह लगै अछि एहि समय कें फटकब, झूठ-सांच कें झटकब-ओसायब, बिछब-बेरायब।'

            झूठ-सांचक ऐश्वर्यक प्रताप आ परिणाम अनेक कविता मे आएल छैक। एक ठाम कहै छथि-- 'एकरे सभक अट्टालिका पर ओंगठल अकास मे उड़िया रहल छै तूरक फाहा जकां समयक विश्वास, उधेसल सरोकार, आ जिनगी अपनहि गामक गाछी जकां डराओन, त कखनहु आन गामक पोखरि जकां भयाओन होइत जा रहल अछि।' मुदा मुश्किल ई छै जे समयक जे रूप कवि कें देखार पड़ै छनि, हुनकर समाज एकरा देखि पयबा मे असमर्थ अछि। किए? एक ठाम सेहो बतबै छथि-- 'समयक फरेब मे घुरमुड़िआएल जिनगी, सेहन्ताक कोनो खोप मे सुस्ता रहल अछि।' देश नहि, समाज नहि, मनुष्यता नहि, एकमात्र सत्य बचि गेल अछि निहित स्वार्थ, स्वार्थ सधि रहल अछि तं सब ठीक अछि आ अपने ओ सुस्ता रहल अछि, जहिया एकरा सिर पड़तै तहिया देखल जेतै। जकरा सिर पड़ि चुकलैए, एहि संग्रह मे तकरो प्रसंग कविता अछि-- 'अगिलग्गीबला घरक खाम्ह छलाह, जकरा पर फेर कहियो बड़ेरी नहि चढ़लै।'

            एकटा कविता छनि 'सींघबला लोक'। ओकर आरंभ एना केने छथि-- 'जखन-जखन कोनो धूर्त महानताक माथ पर देखैत छी हम प्रतिष्ठाक पाग, हमर चोखाएल घाओ फेर सं पिजुआ जाइत अछि, आ भीतर-भीतर फिनगय लगैत अछि।' केहन भयावह एकाकीपन छै विवेकी लोकक? 'धूर्त महानता' प्रतिष्ठित अछि तं विवेक के कोन काज? क्यो जं संवाद करितो अछि तं की संवाद करैत अछि? आ तकर परिणाम की बहराइत छैक? एक ठाम लिखलनि अछि-- 'ओहि अपरतीब समय मे जखन देमय लगै छल कियो भाग्यवादी उपदेश, कमठौनीक खियाएल खुरपी सं कोनो ने कोनो बीट कटि जाइत छल।' भयावहताक अनुमान करू। बीटक विकास लेल कमठौनी कयल जाइ छै। मुदा, वैह बीट ओही खुरपी सं मारल चलि जाइत अछि। एहना मे के ककरा सं संवाद करौ? मोहन जीक कविता सं पता लगैत अछि, एहि दकचल समय के जते संताप मिथिला पर पड़लैए, से अतत्तह भयानक अछि।

            'समय सं संवाद' कविता मे समयक चिन्हास बतबै छथि-- 'जेना कुरुक्षेत्र मे फेर सं शुरू भ' गेल हो महाभारत, जेना सिकंदर आबि गेल हो भारत विजय करै, जेना जलियांबाला बाग मे तड़तड़ा रहल हो अंग्रेजक बंदूक।' एक दोसर कविता मे कहै छथि-- 'जेना धर्म सं मनुष्यता कें कोनो सम्बन्ध नहि।' कवि पर जे एहि समयक प्रभाव प्रतिक्षेपित होइ छै, हुनकर बिम्बक टटकापन देखल जाय-- 'गोबर औंसल अंडी जकां, आ कि पाथर राखल पथारक खेरही जकां, हमर चानि चनचनाब' लगैत अछि।' यात्रीजी कहैत रहथिन, कवि जखन बहुत अधिक सीदित होइत अछि तं ओकर कविता श्राप मे परिणत भ' जाइछ। मोहन जीक श्राप देखू-- 'नोरक ई बुन्न सम्हारि क' राखि लिय', भविष्य मे काज देत सम्बन्धक दर्द पीबा लेल।'

            दकचल समयक आरो बहुत रास चिन्हास एहि संग्रह मे अनेक ठाम आएल अछि। एकठाम कहै छथि-- 'आइ चेहरा देखि क' आदमी कें आदमी कहब मोसकिल अछि।' तहिना, 'आइ घर शहर मे अछि, आ कि शहर घर मे, कहब मोसकिल अछि।' एक ठाम शहर कें परिभाषित करैत कहैत छथि-- 'शहर माने होइत छै सपनाक व्यापार।' शहर आ गाम के बीचक जे सम्बन्धशास्त्र छै, देशव्यापी तालाबंदीक स्मरण करैत छथि-- 'कतेको गोटे देशक भूगोल आ इतिहासक काते-कात, चलैत चलि जा रहल छल गाम।' जहां धरि कविक अपन स्थितिक प्रश्न अछि, एक कविता मे कहै छथि-- 'एहि बाजारू सुख-सपना सं जखन कखनहु भक खुजैत अछि, हम अपने भीतर बनैत मरुभूमि देखि डेरा जाइत छी, भविष्यक अंदेसा मे हेरा जाइत छी।'

            जहां धरि मोहन जीक काव्ययात्रा मे पड़ाव आ विकासक प्रश्न अछि, कवर-फ्लैप पर छपल कृष्णमोहन झाक एहि कथन सं हम अपना कें पूरा सहमत पबैत छी जे 'दोसर संग्रह हिनक पहिल संग्रहक विस्तार आ पूरक प्रतीत होइत अछि।'

            कवर पर वंदना तोमर के चित्र छापल गेल अछि, जे एक कलाकृतिक रूप मे अपन खास पहिचान बना पाबि रहल अछि। दकचल समय पर रेख घीचब सेहो कते मननीय आ सौन्दर्यपूर्ण भ' सकैत अछि, तकरा एतय देखल जा सकैत अछि। कवि, चित्रकार आ प्रकाशक तीनू कें बधाइ छनि।

            

Sunday, December 12, 2021

माछ मनुक्खक बीतल गाम राजकमल चौधरी



"माछ मनुक्खक बीतल गाम"

(भवानन्द मामा , लालजी, आ गुलो, 

–एहि तीन व्यक्तिक हेतु)

 *राजकमल चौधरी* 


प्रत्येक शब्दक एकटा विशेष अर्थ अछि, जेना एकटा सुतल गाम, आ मिझायल घूर पर सुतल कुकूर ....

कविता ककरा कही ? 

आ प्रेम ??

अन्हार पानिक अन्हार तल मे छह छह करैत दू-टा माछ (दुनू रोहू ?) 

ककरा ताकि रहल अपस्यांत ?

प्रत्येक शब्दक एकटा विशेष प्रयोजन अछि, जेना 

एकटा पाकल आम , एकटा टूटल मचान पर .....

      एकटा टूटल मचान ।

               (दू) 

अन्हार पानिक अन्हार तल मे छह छह करैत .....

हम (अर्थात हम्मर विशेष अर्थ )

एक युग सँ एक युगान्त धरि , 

ताकि रहल छलहुँ 

एकटा नीलमणि माछ

अर्थात एकटा माछ आ एकटा नीलमणि निन्न  आ इजोत 

दुन्नू हमरा ओहि वयस मे आँजर पाँजर छल ।

धेमुड़ा-नदीक धार हमरा बड्ड प्रिय ;

नाहयाबक,

 छेपी नाह सँ बाँसक छीप जकाँ 

कूदि जयबाक ,

सेहन्ता पूर नहि भेल

मुदा आँगन मे रोहू माछ आयल, त' सभसँ पहिने –

हमरे बाटी मे परसल गेल ,

तेल मे डूबल, लाल  भेल , गाभिन माछ 

पहिल अमाओट आ अचार 

धेमुरा नदीक पानि मे नचैत रहलीह कोसिका ;

घड़ी- घन्ट झनकैत रहल 

तारास्थान मे ;

भोर-साँझ शतरंजक पिहकारी सँ दलान,

घोक तरक मुस्कीक आँगन 

सह सह करैत ;

पावनि-तिहार आन-गाम-वाली गबैत छथि तिरहुत त हमरा चारूकात आम्रवन , 

मंजरिक मातल सुगन्ध सँ बताह 

ई प्रान ।

तारा स्थान मे घड़ी-घंट झनकैत रहल ,

आ हम तकैत रहलहुँ 

एकटा नीलमणि माछ 

– तिरहुत गीत मे 

अन्हार पानि मे ।

             (तीन)

श्री हरिमोहन झा कहिया लिखने छलाह "कन्यादान " ?

मुदा अप्पन अल्पवयसक ओहि निर्मम 

चपलता मे ,

कतेक बेर हमरा बुच्ची दाई सँ 

ममता आ अनुराग होइत छल ओहिना, अकारण ,

होइत छल –

पुरईनिक पात मे डूबल एहि पोखरिक भखराल घाट पर बैसल 

रहि जाई ―

राति भरि 

राति राति भरि ।

(चारि)

पृथ्वीक अंतिम देवता छलाह राजा सातवाहन ......

हम फुदन  चौधरीक पौत्र 

बुधवारे -मूल महिसी ग्रामक सन्तान 

पृथ्वीक अंतिम मनुक्ख रहि गेल छी ।

अंतिम देवता छलाह सातवाहन 

हमर वाहन थिक 

― हमर अर्थ ।

(पाँच)

आन कविता मे ई कहब आवश्यक नहि अछि, जे हम अपन अर्थ 

ताकि रहल छी अन्हार पानि मे ।

निन्न आ इजोत एखनहुँ 

आन कोनो सार्थकता सँ बेसि प्रिय  छथि 

हमरा हेतु ।

......हमर ओ महिसी-गाम बीति गेल अछि ;

हाट बाजार मे बिका गेल अछि 

एकटा नीलमणि माछ, 

कोसिका धेमुड़ा केँ  विखदन्त कारी डराडोरि मे नाथि देलक जनक्रोध,

छेपी नाह सँ कूदि जयबाक,

बड़ी काल धरि 

डूबल रहि जयबाक सेहन्ता नहि पूरल ।

मुदा,

एखनहुँ कोनो अधविसरल नाम 

हमर देह मे ,

हमरे आँखि मे ― 

'रोहू माछ जकाँ 

छह छह करैत अछि 

अन्हार अछि 

पानि " 

राजकमल चौधरी 

21 10 65 

      (एहिअप्रकाशित कविताक स्रोत-- डा. गंगेश गुंजन)

Saturday, December 11, 2021

एम्हर जे पढ़लहुं-1 जनम जुआ मति हारहु हो/हरिदास

 

धोखे काहे बिगाड़हु हो

तारानंद वियोगी


मैथिली मे अइ किताबक प्रकाशन एक घटना थिक, जकर असर बहुत दिन धरि कायम देखल जेतै। से बहुतो कारण सं। पाठक एकरा पढ़ता तं अपनहु बुझता, मुदा किछु बात एतय हमहू कहै छी।
        विधाक दृष्टियें देखी तं ई आत्मकथा, वा एकर संक्षिप्तता कें देखैत से कहब पसंद नै हो तं, संस्मरण विधाक किताब छी। मुदा एकर अस्सल महत्व एकर ऐतिहासिकता मे छै। सब गोटे जनै छी जे इतिहासक मामला मे मिथिला बड़ अभागल रहल अछि। जै बात सब कें सार्वजनिक रूपें जनाएल जेबाक चाही, तै बात सब कें एतय सब दिन झांपि-तोपि क' राखल गेल। मिथिलाक वास्तविक इतिहास सब दिन मौखिक रहल जे पीढ़ीक संग विलुप्त होइत चलि गेल। तखन इतिहासक नाम पर लिखल गेल कथी? मुकुंद झा बक्शी 'मिथिला भाषामय इतिहास' लिखलनि। 'मय' के अर्थ एतय 'मे' बुझबाक चाही। मने मैथिली भाषा मे मिथिलाक इतिहास। ई की छल? महामहोपाध्याय जी खंडबला वंशक कथा लिखने छला, एखन हाल मे अइ दुर्लभ किताब कें 'खंडबला राजवंश'क नाम सं प्रकाशितो कयल गेल अछि। मानू तं किताबक अशुद्ध नाम कें एकैसम सदी मे आबि क' शुद्ध क' देल गेलैए। एक राजवंशक इतिहास भेल मिथिलाक इतिहास। बाद मे जखन तकनीकी इतिहास-ज्ञान बला लोक सभक प्रवेश अइ क्षेत्र मे भेल तं ओ लोकनि खंडबलाक संग ओइनवार आ कर्णाट राजवंश कें सेहो जोड़ि लेलनि। एतद्धि रामायणम्। मिथिलाक जन-इतिहास लिखबाक बात तं बहुत दूरक गप भेलै, महाराजी सीमा सं बाहर जे प्रभावशालियो लोकनि छला, जेना महंथ लोकनि, आन-आन जमींदार लोकनि, नगरसेठ लोकनि, संत आ फकीर लोकनि, कते कहल जाय, हिनका सभक कोनो इतिहास नहि आएल। ई किताब यद्यपि साहित्यक किताब छी, ओहू मे आत्मकथा विधाक, तें एक व्यक्ति, ओकर समुदाय, ओकर अनुभव-व्याप्ति धरि स्वभावतया सीमित अछि। मुदा, एकर लेखकक जीवनक व्याप्तिये तते पैघ छनि जे एतय हम सब आधुनिक मिथिलाक जिबैत-जागैत. इतिहास-लीला देखि सकैत छी। ओइ किताब सब जकां ई मुरदा नै अछि जीवन्त अछि, तकर कारण ई जे मानवीय अनुभूतिक तप्पत-तप्पत ऊष्मा एतय सब ठाम छिड़ियाएल भेटत। दोसर जे तरुणावस्थे सं विशिष्ट वर्गक परवरिश मे पलनिहार एकर लेखक प्रयत्नपूर्वक विशिष्टताक चोला के बंधन कें तोड़ि मुक्त भेला आ साधारण गृहस्थ जन जकां अपन जीवन-पद्धति स्वयं अपना सं चुनलनि, विशिष्ट आ तें एकाकी जीवन कें जनसंकुल बनेलनि, तें अइ मे मिथिलाक जीव-जगतक बहुतो रास मौलिक तत्व आबि क' शामिल भ' गेल अछि। बहुतो एहन विषय अछि जकरा बारे मे हमरा लोकनि सुनिते टा रही, जेना जोगी-मुनीक पवित्र बाना मे राक्षस कोना रहैत अछि, कोना कोशीक मृत्यु-तांडव गामक गाम कें जनशून्य क' दैक, कोना जखन अपन रक्तसम्बन्धी जान मारबा लेल सबतरि जाल पसारि देने रहै छै तं छोट-छोट पराया लोक, आन जातिक, आन धर्मक लोक, प्राणरक्षक बनि क' ठाढ़ होइ छै। आदि-आदि।
        अइ किताबक लेखक हरि दास छथि। दास मने चमार नहि, ब्राह्मण, नीक कुल-मूलबला मैथिल ब्राह्मण। यद्यपि कि अइ किताबो मे प्रसंग आएल अछि जे घोर जातिवादी मैथिल ब्राह्मण हाकिम हरि दास जी कें कोना चमारे बुझने छला आ बरखो दिन धरि हुनकर कमाएल रोजी कें लसका क' रखने छला। बाद मे जखन बुझबा मे अयलनि जे चमार नै ब्राह्मण थिका तं मिनटो मे कोना भुगतान भ' गेलनि। मैथिल ब्राह्मण टाइटिल मे दास देखि क' हमरा गोविन्द दास मोन पड़ि जाइत छथि, मैथिलीक महान कवि गोविन्द दास। सोलहम शताब्दी मे बेचारे न्यायदर्शन पढ़य मिथिला सं बंगाल गेल छला। ओ समय छल जखन चैतन्य महाप्रभुक रागानुगा वैष्णवभक्ति अपन चरम जनप्रियताक दौर मे छल। गोविन्द दास वैष्णव भ' गेला आ ओम्हरे, बंगाल मे, कृष्णभक्ति मे लीन, राधाकृष्णक गीत लिखैत-गबैत अपन जिनगी गुदस्त क' देलनि। ओ समय छल जखन सौंसे बंगालक वैष्णव-संप्रदाय मैथिली लिखै छल जकरा ब्रजबुलि कहल जाइ। आधुनिक युग मे कोना मैथिल विद्वान लोकनि कें गोविन्द दासक पता लगलनि, आ ब्राह्मण हेबाक कारण कोना चक्रचालि रचि क' हुनका मे मैथिलत्व आरोपित कयल गेल, तकर बहुत लंबा खिस्सा अछि। मुइल महापुरुषक दुखो तं अनंत होइ छै, भला ओ कथू मे कोना इनकार करै लेल आबि सकितथि? एम्हर हम सब युग-युग सं देखैत आएल छी जे मैथिल लोकनि वैष्णवक अकारण शत्रु होइत छथि, से जगजानित तथ्य थिक। अकारण शत्रुता किएक, ताहि बारे मे इतिहासकार उपेन्द्र ठाकुर लिखने छथि जे वैष्णव धर्म मे वर्णाश्रमक शिथिलता छैक, जखन कि मैथिल लोकनि संकुचित मनोवृत्तिक छला। 'मैथिल समाजक एक शक्तिशाली वर्ग जे अपना कें धर्मक ठेकेदार बुझै छला, एकर कट्टर विरोधी रहथि, कारण वैष्णव मतक लोकप्रियताक परिणाम होइत--ओहि विशेष सुविधाप्राप्त वर्गक विनाश।'(मिथिलाक सारस्वत साधना)
        उपेन्द्र ठाकुरक अइ कथन मे भूतकालिक क्रियाक प्रयोग भेल अछि। पूर्व मे एहन छल, तं की वर्तमान किछु भिन्न भ' गेल अछि? एकैसम शताब्दीक बसात किछुओ मिथिला कें लगलैक अछि? जी नहि, ई घृणा आरो बढ़िये गेल अछि। जं विश्वास नै हो तं 2013 ई. मे छपल मायानंद मिश्रक इतिहास मे गोविन्द दास बला अध्याय देखि लेल जाय। ब्राह्मणे हेबाक दुआरे एक जबाना मे वैष्णव गोविन्द मिथिला मे स्वीकार कयल गेल छला, मुदा हुनक दुखक नहि ओर। मायानंद मिश्र हुनका आर तं छोड़ू, एक भक्तकवि धरि मानबा सं इनकार क' गेला आ पूर्णत: तहिना एक सुच्चा शृंगारिक कवि मानलनि, जेना हिन्दी मे केशव दास। विचारल जाय, कोनो भक्तकवि जे अपन भक्ति मे लीन भ' ने केवल अपन जीवन-सर्वस्व समर्पित क' देने हो, अपन गाम-घर, देस-कोस, अपन वंश-परंपरा धरि कें तिलांजलि द' देने हो, तकरा जं काल्हि भक्तकविये हेबा सं इनकार क' देल जाय, मात्र अइ आधार पर जे हुनकर भक्ति मे वर्णाश्रमक शिथिलता अछि, तं ई केहन भयंकर अन्याय कहल जायत! मुदा, आगू कहिया हुनका संग एतय, मिथिला मे की हेतनि, के कहि सकैत अछि? मिथिला की थिक? एक अगम्य जंगल थिक जकर जयगान तं खूब गाओल जा सकैए मुदा जंगली जीव सं इतर प्राणीक सहज जीवन एतय जारी नै रहि सकैत अछि।
        ई किताब मुदा, बाहरक मैथिलक आंखि सं नहि, भीतर विद्यमान मैथिलक आंखि सं देखल वैष्णवक कथा थिक। हरि दास जी स्वयं दीक्षित वैष्णव रहथि आ मिथिलाक वैष्णव बानाक भितरिया वृत्तान्त लिखलनि अछि। समुच्चा वृत्तान्तो नहि, वृत्तान्तक मात्र एक भाग। संयोग देखू जे अहू किताब मे एकटा गोविन्द दास छथि। चनौरागंज मठक महंथ राधाचरण दासक ओहो तहिना खास अपन भातिज छथिन जेना लेखक हरि दास छलखिन। हरि दास के सुपात्रता सं प्रभावित भ' महंथ हुनका अपन उत्ताधिकारी, मने करोड़ो टाकाक जमीन्दारी के वारिश चुनने छला, मुदा जेना कि एकटा इमानदार लोकक संग होइत छै, ओ अपन आत्माक आवाज सुनैत अछि, धन-वित्तक लालच मे अपन आत्मा कें नै मारि सकैत अछि, सैह हरि दासक संग भेलै। बैरागी जीवन हुनका संतुष्ट नै क' सकल आ ओ विद्रोह क' क' गृहस्थ भ' गेला, विवाह क' लेलनि, यद्यपि कि प्रेमविवाह टाइप के कोनो रोमांस ओतय नहि रहैक। महंथ हुनका निकालि तं देबे केलखिन, हुनकर जानी दुश्मन भ' गेला। आ, हरि दासक स्थान पर जाहि दोसर व्यक्ति कें उत्तराधिकारी चुनल गेल, ओ गोविन्द दास छला।
        महंथ राधाचरणक बारे मे हरि दास बतबै छथि--'आठ वर्षक अवस्था मे ओ तपस्वीक व्रत धारण केने छला आ मुंजक मेखला, सर्वांग भस्मलेप आ धुनीक सेवन कर' लागल छला। वैशाखक तपैत दुपहरिया मे ओ चौरासी धुनी रमबैत छला। वृंदावन मे कठोर चतुर्मासक व्रत करैत छला। एहन महान तपस्वी कें कहियो धनक कमी नइ भेलनि। ओ डालमिया जैन एयरवेजक शेयरधारक मे सं छला। आगां चलि क' चनौरागंजक मठाधीश जमीन्दार सेहो ओ बनि गेला। दरभंगाक लक्ष्मीसागर महावीर मंदिरक सेहो ओ मालिक भेला। एहि प्रकारें देखी तं ओ भाग्यक सिकंदर रहला। लक्ष्मी हुनका आगां-पाछां डोलैत रहलि। मुदा ई हमरा समझ सं बाहरक बात थिक जे एहि महान योगी-बैरागी कें संपत्ति सं एते व्यामोह किएक भ' गेलनि?' ठीके ई समझ सं बाहरक बात थिक जे एक तपस्वियो जखन जमीन्दार बनैत अछि तं ओकरा असले जमीन्दार जकां रैयत कें गरीब, बदहाल, रोगग्रस्त विपन्न देखबाक हिंस्र हिस्सक लगैत छैक। लक्ष्मी कें ओ अपन वंशक भीतर बान्हि क' राखय चाहैत अछि। अन्याय आ अनीति ओकरा लेल नीति आ न्याय होइ छै। अइ किताब मे खंडबलाक राजतंत्रोक चित्र आएल अछि आ आनो आन जमीन्दारक।  खंडबला जमींदारी-व्यस्थाक एक चित्र देखल जाय, जे 1940 ई.क कोशी-विभीषिकाक संदर्भ मे आएल छैक--'अंग्रेजी सत्ता कोशीक विभीषिका सं अपन ध्यान हटा लेने छल। गोरा-सरकार कोशी क्षेत्रक जनता कें अपन भाग्यक भरोसें मरैक लेल छोड़ि देने छल। लाखक लाख लोक मरैत रहल आ सरकार निसभेर भेल सूतल रहल। (किछु गोटे कें एतय कोरोना सेकंड फेजक मृ्त्युलीलाक दृश्य मोन पड़ि सकै छनि।) आ सैह रवैया दरभंगा राजघरानाक सेहो छल।  दरभंगा महाराजेक जमीन्दारी मे कोशी क्षेत्र अबैत छल। जमीन्दार सब अपन प्रजा पर भीषण अत्याचार करैत छल। बलजोरी जमीन्दारी टैक्स असूलैत छल। समय पर टैक्स नहि देबय बला लोक कें जरैत दुपहरिया मे सूर्य दिस मुंह क' क' दूटा इट्टा पर ठाढ़  क' देल जाइत रहै। दरभंगा महाराज सेहो कोशी क्षेत्रक उपेक्षा मे कोनो कोताही नइ छोड़लनि। राजा अपन प्रजाक सुधि नइ लेलक।‌ ओ पंडितक सभा मे 'धौत-परीक्षा'क संचालन करैत रहला। भोग-विलास मे डूबल रहला। अंग्रेज सरकारक हुनका आशीर्वाद प्राप्त छलनि। उच्च वर्ण दरभंगा महाराजक अपन रहलनि, एहि सं इतर लोकक कोनो टा सुधि नहि लेल गेल। शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार मे कोनो रुचि नहि लेल गेल। दरभंगा नरेशक उद्देश्य रहल अंग्रेजक खोसामद। बाद मे ओ कांग्रस सं सेहो जुड़ला मुदा उद्देश्य मात्र अपन रियासत बचेबाक छल, जनकल्याण आ देशप्रेमक कोनो भावना नहि। ताहि समय कोशीक डरें जं क्यो पलायन क' जाइत रहय, तकर डीह-खेत कें दरभंगा राज द्वारा नीलाम क' देल जाइत रहै आ ओकरे राजक अमला-खसला ओकरा खरीद लैत छल।' आइ जे हम सब अपना समाज मे पैघ-पैघ खान्दानी भूधारी सब कें देखैत छी, तकर रहस्य अइ सब ठाम अछि। प्रश्न अछि जे ई सब बात इतिहास मे किए नै आएल, साहित्ये मे किए आएल? अइ सं अकादमिक तबकाक सामंती संबद्धता आ आबद्धताक अनुमान कयल जा सकैत अछि। दोसर, जे आधुनिक साहित्य स्वयं मे एक स्वतंत्र आ स्वायत्त अनुशासन थिक, आ सदा इतिहास वा समाजशास्त्रक पिछलग्गू बनल रहबाक लेल विवश नै अछि। लेखक मे तकर बोध टा हेबाक चाही। से बोध हरि दास जी मे पूरा छनि, जखन कि ओ कोनो पेशेवर लेखक टाइप लोक नै छथि।
        अइ किताब मे, वैष्णव महंथ जमीन्दारक अत्याचार आख्यानक केन्द्र मे अछि जकर सामना हरि दास जी कें प्राय: सौंसे जीवन करय पड़लनि। बैरागियोक जखन पतन होइ छै तं आने लोक जकां कोनो भ' क' रुकि नइ जाइ छै, निरंतर होइत रहैत अछि। स्वयं ओइ महंथक अंत अंतत: कोना भेलनि, अइ किताब मे तकरो खिस्सा आएल अछि। मुदा, तै सं पहिने, जखन महंथ कें लगै छनि जे हुनकर संपत्तिक ठीक-ठीक रखबार हुनकर भातिज नै, भगिनी आ भगिनजमाइ भ' सकै छथि, तं ओइ बेचारे गोविन्द दास कें कोना कुटिल रूपें कलंकित क' क' बैला देल गेल, तकरो प्रसंग आएलअछि। इहो गोविन्द ओही गोविन्द जकां खेहारल गेला। लोक भने बाहरक होथि कि घरक, मिथिला मे गोविन्दक पराभवे पराभव। लंबा संघर्षक बाद, जखन साधारण देखाइत असाधारण योद्धा हरि दास महंथक सब दाव-पेंच कें निष्फल क' दैत छथि आ महंथ समझौता करै लेल विवश होइ छथि, तं हम सब देखै छी, हरि दासक एक शर्त इहो रहै छनि जे गोविन्द दास कें उत्तराधिकारी बहाल कयल जाय।
        प्रसंगवश चनौरागंज मठक स्थापनाक इतिहास के चर्चा सेहो अइ किताब मे आएल अछि। हरि दास जी लिखै छथि-- 'चनौरागंजक मठ विष्णुस्वामी संप्रदायक थिक। ई करीब 200 वर्ष पुरान मठ अछि। पश्चिम बंगालक मुर्शिदाबाद सं आयल कोनो घुमन्तू संत एत' आबि क' एकटा कुटी बनेलनि। एत' दरभंगा महाराजक खवासक हवेली छल। खवास शक्तिशाली छला। हुनकर दरबज्जा पर कतेको हाथी बान्हल रहैत छल। हवेलीक आगां‌ खरिहान छल। ओ संत ओइ खरिहान मे कुटी बना लेलनि आ समय पाबि क' राधाकृष्णक स्थापना क' देलनि। खवास गलैत गेला आ साधू मोटाइत गेला। यैह कुटी एक दिन बड़का मठ बनि गेल। आगां चलि क' ई मठ एकटा बड़का जमीन्दार सेहो बनल।' हम जे ऐतिहासिक महत्व बला बात ऊपर कहलहुं, हरि दास जीक एक-एक विवरण मे कोना इतिहासक आशय आ संकेत भरल छनि, से बुझबाक लेल अइ विवरण कें देखि सकै छी। धन कोना अबैत छल आ कोना चलि जाइत छल, तै बात कें अइठां स्पष्ट देखल जा सकैए। जे राजवंश एते अविवेकी छल जे एकटा खवास(वीरू खवास)क स्वातंत्र्य-चेष्टा सं कुपित भ' क' संपूर्ण मिथिला मे बसनिहार ओइ जाति(कुर्मी)क समुच्चा आबादीक संपत्ति जब्त क' देसनिकाला द' सकै छल, तकरे एक खवास केहन मोटाएल अछि, से एतय देखल जा सकैए। मुदा, ई रहस्य अछि आ रहस्ये बनल रहत जे खवासक भितरिया कनेक्शन महाराज संग की आ केहन रहल हेतनि। तें गुणी आ मर्मज्ञ मांगनलाल खवास धरि सेहो संपत्तिक किछु ढेला गुड़कि जैतय, तकर कल्पना करब अरण्यरोदने करब हैत। मिथिला मे वैष्णव मठक प्रवेशक एक आर ऐतिहासिक सूत्र सेहो एतय हमरा लोकनि कें भेटैत अछि जे पचपनियां लोकनि हुनका शरण देने छलखिन।
        अइ किताबक संग एकटा मजेदार बात इहो छै जे एकर नामकरण कबीरक एक मैथिली पदांश ल' क' कयल गेल अछि-- जनम जुआ मति हारहु। मिथिला मे कबीरक सैकड़ो मठ अछि। हुनकर हजार मैथिली पद चारि सय बरस सं मिथिला मे प्रचलन मे बनल अछि। एक जबाना मे आचार्य सुभद्र झा शोधपूर्वक ई प्रमाणित कयने रहथि जे कबीरक पैदाइश मिथिलाक छलनि। मुदा अइ तमाम सं दूर, ब्राह्मण-समाज मे कबीर कहियो उद्धृत कयल जाइ योग्य संत मे सं नै रहला। उनटे लक्ष्मीनाथ गोसांइयो सनक सिद्ध महात्मा घृणापूर्वक कबीर कें गरियबैत पाओल जाइत छथि। कारण आर किछु नइ, कबीरक ब्राह्मणेतर वैष्णव होयब आ वर्णव्यवस्थाक विरोधी होयब। मुदा, हरि दास जी माथ परहक मुकुट जकां कबीरक पद कें धारण कयने छथि। मनुखक जन्म आत्मपरिष्कारक लेल भेल छै, ओकरा समस्त भ्रम सं बाहर निकलबाक चाही, अइ दुर्लभ अवसर के पूरा उपयोग करबाक चाही, आ यत्नपूर्वक लागल रहबाक चाही जे ओ जुआ हारि क' नइ विदा हुअय, पुरुखार्थ कइये क' गुजरय-- 'मानुस जनम सुधारहु साधो, धोखे काहे बिगाड़हु हो/ अइसन समय बहुरि नहि पइहह, जनम जुआ मति हारहु हो।' कबीर पिंड आ ब्रह्माण्ड कें एकरूप मानैत छला, तें हुनका लेल ई कोना संभव भ' सकै छल जे जाति, धर्म, संप्रदाय आदिक आधार पर एक मनुख सं दोसर मनुख भिन्न हैत, तकरा स्वीकार करितथि! मिथिला मे बहुसंख्यक समाज एहन बसैत अछि जकरा वर्चस्ववादी लोकनि जन्मक आधार पर छोट मानैत छथि। अइ मे सत्यता तं भइये कोना सकैत अछि कारण ई प्रकृति आ अध्यात्म दुनू नियमक हिसाबें मिथ्या मान्यता थिक, मुदा अही बल पर बीस प्रतिशत लोक अस्सी प्रतिशत जन पर अपन दबौट कायम कयने रहल अछि। अइ तरहें देखी तं कोनो कुलीन लोकक जीवन मे कबीरक शामिल होयबे अपना आप मे एक क्रान्तिकारी कदम थिक। ई क्रान्तिकारिता हरि दास जी मे पदे-पदे हमरा लोकनि देखि सकैत। एतय अखिल मानवताक प्रति प्रेम आ संरक्षणक भाव छै। परंपरित चलन पर नहि, अपन जीवनानुभवक आधार पर दुनियादारीक पक्ष-निर्धारण कयल गेलैए। सांच कें सांच कहबाक दमखम छै, कारण आंतरिक निर्भयता अही तरहें लोक मे आबियो सकै छै। जेना मुसलमानेक मामला कें ली, तं मुसलमानक प्रति कतहु पड़ोसी-सम्मत, मनुष्यता-सम्मत नेहछोह छै तं कतहु इहो छै जे अवसर पड़ला पर मुस्तकीम कि रजी अहमद सेहो कोना एक ब्राह्मणे जकां हुनका संग धोखाबाजी केलकनि।
        मृत्यु, रोग आ दुश्मनी-- ई तीनू विषय कहल जाय तं अइ किताबक केन्द्रीय विषय थिक। कहल जाय तं ई विषये सब अइ बात पर प्रकाश देबाक लेल काफी अछि जे सामंती शासन आ समाज दुनिया कें कते कुरूप बना देलकै अछि। घरहंज के चरम सीमा धरि अकालमृत्युक प्रत्यक्ष कारण भने कोशी देखाइत हो, एकर असल कारण तं जमीन्दारी आ सरोकारविहीन सरकारे अछि। मिथिलाक जन-इतिहासक बानगी देखल जाय--'ताहि जबाना मे जमीन्दार सब नइ चाहैत छला जे हुनकर रैयत-रिआया स्वस्थ रहय, पढ़य-लिखय आ धनवान बनय। तें जखन कोनो बालक शरीर सं स्वस्थ रहय, पढ़य मे तेज निकलि जाइ तं ई जमीन्दार सब ओहि बालकक अभिभावक पर जोर द' क' पन्द्रह-सोलह वर्षक अवस्था मे ओकर विवाह करबा दैत छल जाहि सं नून-तेल मे उलझि क' ओकर शिक्षा चौपट भ' जाइ छलै। जं ककरो लग दूटा पैसा जमा भ' जाय तं ओकरा मर-मुकदमा मे फंसा देल जाइत छल। एवंप्रकारें अपन एकछत्र राज कायम रखैत छल ई जमीन्दार सब।' अइ मे संत-असंत के कोनो फरक नइ छल, बस ओकरा जमीन्दार अथवा ओकर आदमी, ओकर दलाल टा हेबाक जरूरी रहय। अखनहु मिथिलाक वर्चस्वी समाज, जे कि ओइ जमीन्दार लोकनि कें अपन आदर्श मानैत छथि, अही सब साधनक प्रयोग यथासाध्य खुलेआम करैत छथि, सफल नहियो होथि तं कोशिश जरूर सैह रहैत छनि। अइ किताब मे अइ तरहक ऐतिहासिक चरित्र सब अनेको ठाम आएल अछि जकरा आधार बना क' आइयो हम सब अपन गौआं, पड़ोसिया के नीयत के ठीक-ठीक पहचान क' सकै छी। आ, मैथिल समाजक समुचित वर्गीकरण क' सकै छी।
        मृत्युक सामुदायिक हाहाकार संग अइ किताबक शुरुआत होइत छै, अइ दुआरे जे स्वयं लेखकक स्मृति मे जे हुनकर नेनपन छनि से अही हाहाकार सं भरल अछि। 1940क कोशीक मृत्युलीलाक चर्चा ऊपर भ' चुकल अछि। ओतहि सं लेखकक जीवन शुरू होइत छनि आ ई किताब सेहो ओतहि सं शुरू होइत अछि। लेखकक माय कोना मुइलीह आ अंत्येष्टि क' क' घुरल ससुर सेहो लगले कोना मुइला जे सुनगले चिता पर हुनको संस्कार कयल गेलनि, आदि। ओ अनाथ बालक जखन वृन्दावन पहुंचल, छव-सात बर्षक उमर रहल हेतै। ओहि ठाम हुनकर परवरिश भेलनि, शिक्षा-दीक्षा भेलनि, मने हरि दास नामकरण सेहो। वृन्दावनक स्मरण करैत लिखैत छथि-- 'जखन हम वृन्दावन आएल रही हमर उम्र लगभग छव-सात वर्ष छल आ हम एतक भाषा नहि बुझैत छलहुं। स्कूल मे हम अपना कें अलग-थलग महसूस करैत छलहुं। शिक्षकक बात सेहो नहि बुझैत छलहुं। मुदा साल बितैत-बितैत हम ब्रजभाषा नीक जकां बूझ' आ बाज' लागल रही।' एहि क्रम मे हुनका वृन्दावनक जे सब चीज मोन पड़ै छनि, स्कूलक ओ रिफ्यूजी सिन्धी(भारत-विभाजन सं विस्थापित) सहपाठी जे हुनकर दबात सं मोसि बहार क' लैत छलनि, आ मोहल्लाक ओ माली परिवार जिनका ओतय बकरीक दूध पिबै छला आ रोज स्कूल जाइ सं पहिने आंखि मे काजर लगबबैत छला। भूमिका भाग मे श्रीधरम लिखलनि अछि, साठि वर्ष सं बेसी समय बितलाक बाद जखन हरि दास जी 2016 मे वृन्दावन गेल छला, नेनपनक अइ अनूप शहर मे ओ जरूर दू-तीन दिन रुकब पसंद करता से अनुमान छल, मुदा दुइये-तीन घंटा बितैत-बितैत पुत्र कें कहलखिन-- 'हौ, हमर वृन्दावन तं हेरा गेल। एहि पर बनियांक कब्जा भ' गेल छह। चलह, हमरा नहि रुकबाक अछि।' संयोग देखू जे ओहि वर्ष ओ दिवंगत भेला।
        मिथिला एहन अभागल भूमि हेबाक लेल अभिशप्त अछि जतय कुलीन लोकनिक समुदाय मे कुटिल, कामी, पाखंडी आदि लोक तं थोकक हिसाब सं भेटता मुदा स्वतंत्रचेता मनुख भेटब दुर्लभ छथि। जे अपन आत्माक पुकार पर, केवल अइ लेल जे बैराग्यक जीवनशैली ओकरा पसंद नै छै, ओ महंथीक करोड़ो के जमीन्दारी सं मुक्त करबाक नेहोरा करत, से तं जेना सोचबो असंभव अछि। हरि दास जी एहने असंभव लोक छला। महंथ जी कें जखन ओ साफ कहि देलखिन जे ओ विवाह करता तं महंथ जी कें स्वाभाविके एहन लगलनि जे ई बालक स्त्रीक भोग करय चाहैत अछि। ओ उतारा देलखिन जे अइ लेल विवाह करब जरूरी नै अछि, ओकरा ई सुविधा भेटैत रहतै। माथ पर हाथ द' क' सोचल जाय, एकर संकल्पनो नै छलै ओइ वर्ग मे, जे क्यो व्यक्ति बैराग्य पसंद नै हेबाक कारण गृहस्थाश्रमक जीवन व्यतीत करय चाहि सकैत अछि, करोड़ोक संपति कें लात मारि। महंथ संग हुनकर समुच्चा जीवन धरि चलै बला संघर्षक शुरुआत अही घटनाक बाद भ' गेल। हरि दास जी महालक्ष्मीक संग विवाह केलनि आ योग्यता बलें शिक्षकक नौकरी प्राप्त क' एकटा आम आदमी जकां जीवनक शुरुआत केलनि। अपन पत्नीक बारे मे ओ लिखैत छथि-- 'हम स्वेच्छा सं,निर्लोभ भ' क' एकटा गरीब ब्राह्मणक बेटी सं विवाह केने छलहुं। पत्नी महालक्ष्मीक जीवटता, सहृदयता आ सहनशीलता पर लिखय लागब पूरा उपन्यास बनि जायत। ओ साहस, दया, क्षमा आ त्यागक सद्य: प्रतिमूर्ति छथि जे हुनका भरिसक अपन पिता सं भेटल छनि।' मुदा, आगू चलि क' हुनकर पत्नी, डाक्टर आ चिकित्सा-व्यवस्थाक लचरपनक कारण, लापरवाहीक कारण रोगग्रस्त रहय लगली आ रोग संग लड़बाक ई कथा लगभग जीवन भरि चलैत रहलनि। 1976 मे एम्स, दिल्ली मे जखन पत्नीक जटिलतम आपरेशन भेल छलनि, दुर्दशापन्नताक स्थिति छल-- 'नीन हमर हराम भ' गेल छल। कखन भोर हुअय आ कखन सांझ, किछु पता नै चलि रहल छल। बेर-बेर डाक्टरक कथन मन पड़ि जाय जे दस दिन बहुत खतरा है। रहि-रहि क' पत्नी आ हम, दुनू कान' लगैत रही आ सोचि रहल छलहुं जे की जिन्दगी भरि एहिना कर' पड़त?' ओम्हर, महंथक दुश्मनीक आलम ई छल जे केस-फौदारी तं ढेर रास लादिये देने छला, समाज मे क्यो हिनकर सहायता नै करय से व्यवस्था केने रहथि, एकरो प्रसंग आएल अछि जे गामक पोस्टमास्टर हरि दासक नाम आयल चिट्ठी समेत हुनका धरि नै पहुंचय दै छला, ऊपर सं महंथ ई प्रचारित क' रहल छला जे हुनके देल श्रापक फल हिनकर पत्नीक बीमारी थिक। सोचि सकैत छी, ओहन संत केहन राक्षस भ' सकैत अछि, आ एहन आदमीक जीवन-संघर्ष कते जटिल भ' सकैत छै! मुदा, हरि दास जी अपन किताबक नाम रखने छथि जनम जुआ मति हारहु। हिम्मत नहि हारबाक छै, सब संघर्ष के सामना वीरतापूर्वक करबाक छै, अपन पुरुखार्थ सं समस्त संकट पर विजय प्राप्त करबाक छै। आ, हुनकर जीवनक साफल्य अही मे अछि जे, से ओ क' सकला। अनुमान क' सकै छी जे जीवन मे लक्ष्य आ पुरुखार्थ कें महत्व दैबला लोकक लेल ई किताब कते पठनीय हेतै। अद्भुत बात इहो अछि जे साहित्य मे कोनो पेशेवर पहचान नै राखनिहार हरि दास नामक अइ लेखकक अइ किताब मे पठनीयताक गुण तते प्रबल छै जे एक बेर जं पढ़ब शुरू करू तं खतम कइये क' चैन पड़ैत अछि। शैलीक ई कसावट हुनका कोना सिद्ध भेल हेतनि, हम सोचि नै पाबै छी। लगैत अछि जे ठीक कहल गेल अछि, एके साधे सब सधे। जकरा जीवन मे असल के संघर्ष-ताप हेतै से जं कहुना लिखैत चलि जाएत तं ओ ताप अपन अभिव्यक्तिक त्वरा प्राप्त कइये टा लेत।
        किताबक परिशिष्ट मे हरि दास जीक किछु पत्र संकलित छनि, ताहि सब सं हुनकर जीवन-संघर्ष पर बेस प्रकाश पड़ैत अछि। अपन विद्यार्थी जीवन मे ओ हिन्दी मे किछु कविता सेहो लिखने छला, उपलब्ध भेल कविता सब कें सेहो अंत मे द' देल गेल छै। कविता सब पुरान ढंगक अछि, मुदा एकरा सब कें देखने हमरा लोकनि हुनकर मानस-निर्माणक किछु पता पाबि सकै छी। अपन पहिले कविता 'अभिलाषा' मे ओ लिखने छथि-- 'करूं नहि जग मे कभी अनीति/ यही हो प्रभु, मेरा संगीत।' वर्चस्वी वर्गक अनीति पर हुनकर ई पांती आइयो कते प्रासंगिक अछि-- 'विद्या-धन से वंचित कर भारतपुत्रों को/ गिना क्षुद्रतर पर-पीड़क ने हम मित्रों को।' (भाग्य-चक्र) विद्यार्थी लोकनिक आह्वान करैत एकटा कविता लिखने छथि, तकर ई पांती आजुक हाइटेक विद्यार्थी सभक लेल आंखि मे अंगुरी भोंकि क' जगेबाक तुल्य अछि--  'क्या विद्या सिखलाती है केवल सुख करना?/ या मुक्ति देश की, बंधु-बांधवों की भी करना?'
        फेर कहब, मैथिली मे अइ किताबक प्रकाशन एकटा घटना छी, जकरा बहुत दिन धरि मोन राखल जेतै।

Wednesday, August 18, 2021

कृष्णमोहन झाक कविता अंग्रेजी अनुवाद सहित


 

बभनगामाबाली भौजीक जीवनक महत्वपूर्ण घटना सभक एकटा संक्षिप्त विवरणिका

कृष्णमोहन झा [Krishnamohan Jha]

आ से एहेन अहिबाती के हेती
जे बभनगामाबाली भौजीक सोहाग-भाग देखि जरि नइँ जेती

ओना मानलहुँ
जे हुनका
पोथी-पतराक दर्शन नइँ भेलनि
मानलहुँ जे पाबनि-तिहारे हुनका तेल-कूड भेटलनि
मानलहुँ जे चाभीक गुच्छा
ओ कहियो अपन आँचर मे नहि बान्हि सकलीह
ईहो मानलहुँ जे लाख कबुलाक बादो
आजीवन ओ दोसर पुत्र-रत्न प्राप्त नहि क' सकलीह
मुदा निस्संदेह
एक टा भरल-पुरल जीवन केँ छाँटैत-फटकैत
अपन 37 बरखक बयस मे ओ
38289 टा सोहारी पकेलीह
2173 डेकची भात पसेलीह
13000 बेर बर्तन-बासन माँजलीह
307 बेर आँगन निपलीह
47 टा साडी आ 92 टा ब्लाउज पहिरलीह
275 राति भूखल सुतलीह
हुनका 3 बेर भेटलनि संभोगक सुख आ 949 बेर भेलनि बलात्कार
बेटी जनमौलनि 4 टा आ 5 बेर
भेलनि गर्भपात

मुदा ई देखू सभ सँ मार्मिक बात
जे ठीक बरसातिक प्रात
जखन हुनक सीथ रहनि सिनूर सँ कहकह करैत
आ भरल रहनि लहठी सँ हाथ-
तखन अपन स्वामीक आगू
बिना अन्न-जल ग्रहण कयने ओ
भ' गेली विदा.

अंग्रेजी अनुवाद: शारदा झा [Sharda Jha]

A brief documentation of important events of my sister in law from Barhmin's village

There wouldn't be a single married woman
Who would not have envied the grace of my sister in law from the village of Brahmins

I accept she was uneducated

She received frugal things occasionally

She could never possess a significant place in her household

I also accept that despite endless prayers
She could never bear a second son

But certainly
While sifting through her wholesome life of 37 years
She baked 38289 breads
Cooked rice 2173 times
Cleaned vessels 13000 times
307 times daubed the courtyard
Wore 47 sarees and 92 pieces of bouses
Slept starving for 275 nights

She enjoyed copulation 3 times
And was raped 949 times
Gave birth to 4 girls and 5 times
Suffered abortion

But here is the most poignant thing
The very next morning of Barsait
When her forehead was glowing with vermilion
And her hands were full of bangels
In front of her husband
She passed away without having a morsel.

Friday, August 6, 2021

ग्लोबल चिन्ताक संग ठाढ़ मैथिली कविता अंग्रेजी एवं नेपाली अनुवाद सहित

 


1 अगस्त 2021 कें कवि-एक्टिविस्ट अजित आजादक संयोजकत्व मे मैथिली लेखक संघ एकटा विलक्षण कार्यक्रम सोशल मीडिया पर लाइव प्रसारित केलक। ई हुनक व्यापक कार्ययोजनाक तेसर कड़ी छल।कार्यक्रम छल मैथिली कवि तारानंद वियोगीक एकल काव्यपाठ। संयोजन एहन छल जे मैथिलीक एक कविता सुनेलाक तुरंत बाद ओकर अंग्रेजी अनुवाद कवि-अनुवादक अंशुमान सत्यकेतु सुनाबथि आ तकर लगले ओकर नेपाली अनुवाद कवि-पत्रकार विजेता चौधरी प्रस्तुत करथि। समूचा सत्र मैथिली कविताक अंतर्राष्ट्रीय प्रेमी लोकनि कें समर्पित छल। कविता सब सेहो एहन रहय जाहि सं साफ स्पष्ट होइ छलै जे ग्लोबल चिन्ताक संग कोन तरहें मैथिली कविता आइ विश्व-कविताक संग ठाढ़ अछि। कार्यक्रमक संचालन मैथिली-अंग्रेजी कवि भास्कर झा क' रहल छला आ स्ट्रीम यार्ड पर आयोजित एहि कार्यक्रमक सोशल मीडिया पर प्रसारण युवा कवि-एक्टिविस्ट गुंजनश्री क' रहल छला।

विजेता चौधरी काठमांडू सं एहि कार्यक्रम मे भाग ल' रहल छली। ओहि ठामक मौसम खराब हेबाक कारण नेटवर्क कमजोर रहने बेर-बेर लाइन कटल, तें नेपाली अनुवादक रसास्वादन श्रोता लोकनि नीक जकां नहि क' सकला। सभक आग्रह रहनि जे एहि कविता सभक लिखित रूप सोशल मीडिया पर प्रकाशित कयल जाय।

एहि ठाम मूल मैथिली कविता, ओकर अंग्रेजी अनुवाद तथा नेपाली अनुवाद अविकल प्रस्तुत कयल जा रहल अछि। नीचां मे मूल कार्यक्रमक वीडियो-लिंक सेहो द' देल गेलैए।

https://youtu.be/LXDQzisec6o


तारानंद वियोगी [Taranana Viyogi]क मैथिली कविता


।।सुन्न वीरान इलाका मे रेल इंजिन फेल भ' गेला पर।।


दूर क्षितिज धरि निहारैत छी

कत्तहु नहि अछि एको टा मनुक्ख

ने एक्को टा देबाल

ने कारखानाक चिमनी

कत्तहु सं नै उठि रहल अछि धुआं, ने रुदन

से--

ई विशाल क्षेत्र ककरा राज मे पड़ै छै?


गाड़ी सं उतरि क' देखलहुं

ने जानि कोन कोन चिड़ै, जनम जनम के मीत लगैत

कोन कोन लता-गुल्म

एह, कते सोझ सोझ गाछ!

हम मोन पाड़य लगलहुं

एहन हरियर कचोर वनस्पति-राज

की हम अपना जनम मे कतहु देखनहु छी?


गर्व सं माथ उठौने

नान्हि नान्हि दूभि

हमरा देखलक आ खिलखिला देलक

कि तखनहि कोनो चिड़ै बाजल चीं चीं

ओह, दिल के बाग बाग होयब की एकरे कहै छै!


एक झंखार मे पैसि

हम बहुत रास फूल तोड़ि अनलहुं

जानि ने कोन कोन फूल

एकर सभक गांथब एक माला

आ अपन कोठली मे राखल ग्लोब कें पहिरा देबैक


सुकुमारि स्पर्शातुर हवा

लटपटा गेली हमर अंग-अंग सं

रोमांचित हम

श्वास-रन्ध्र सं होइत

फेफड़ाक गह-गह धरि

समा लेलहुं कुमारि हवा,

ने जानि कते कते नश्वरता कें

पिटपिटा देलिऐ


पृथ्वी हमरा लेल कतबा टाक छथि?

एहि कुमारि हवा कें समा क'

जतेक फुला सकै छी हम अपन फेफड़ा!


बगल द' क' बहि रहल अछि एक तन्वंगी नदी

अहा, केहन सुडौल छरहर बेमत्त मन्दाक्रान्ता!

कालिदास रहितथि तं फेर लिखल जाइत

वेत्रवती-आख्यान


हम गाड़ी मे घुरि अयलहुं


अपन अपन बोगी मे बन्न लोक

अपस्यांत अछि, फिरिसान

कखन इंजिन औतै, कखन

कखन लोक पहुंचत अपन अपन कबुरगाह?

जुलुम भेल, जुलुम

अइ जंगल मे लाबि क' धोखा देलक रेलवे

आफद अछि, आफद

कखन धरि रहय पड़त वीरान मे, कखन धरि?


अपन अपन समस्याक अभियुक्त

कैद अछि सबटा मोसाफिर अपन अपन बोगी मे!


बाहर

सुन्न वीरान अइ इलाकाक निवासीगण

हंसि रहल छथि

बिलहि रहल छथि आशीष।


अंग्रेजी अनुवाद: अंशुमान सत्यकेतु[Anshuman Satyaketu]

On failure of rail engine in a desserted area


I look far and wide up to the horizon

But find not a single soul

Nor any wall

No smoke is coming out of

Any factory chimney

No body is crying either

Whose kingdom does this vast territory belong to? 


Getting down the train I see

Various kinds of

Ever-friendly but unknown birds

Unknown creepers

Tall trees

I began to recall

If I have ever seen

The viridity of vast vegetation


Tiny tender grass

Peeping out with pride

Chanced a glance at me and giggled

When a bird began chirping

Is it what is called overjoy


I gathered

Some unknown flowers

From a bush

I would thread them in a wreath

And place it round the globe kept in my room


I was thrilled 

When the soothing and eager- to-touch air

Cuddled my limbs

I inhaled it in

To fill my lungs

So as to smother transiency


How big is the earth for me? 

Definitely as large as

The soothing air can make my lungs expand


A river

Slender, long, svelte, gracile and delusional

Is flowing by

Had Kalidas been alive

Vetravati Akhyan would have been rewritten


I returned back to my compartment


People, in their respective compartment, are

Tired and pestered

Waiting relentlessly for

The replacement of engine

And reaching their destination

It is our bad luck that

Railway has played false on us

Now we don't know

For how long we would have to stick here


Accused of their own problems

Passengers are confined to their respective compartments


Meanwhile the dwellers of this locality are

Smiling and 

Sending blessings from outside.


नेपाली अनुवाद: विजेता चौधरी[Bijeta Chaudhary]

शुन्य-विरानाे इलाकामा रेल इन्जिन फेल भए पछि 


टाढा क्षितिज तिर नियाल्छु

कहि कतै छैन एउटै मान्छे 

न एउटै पर्खाल

न त कारखानाकाे चिम्नी

कतैबाट पनि उठि रहेकाे छैन धुँवा

न त राेदन

अहाे...

याे विशाल क्षेत्र कसकाे राज्यमा पर्छ?


गाडीबाट अाेर्लेर हेरे

कुन्नि कुन-कुन चरा

जन्म जन्मका मीत लाग्थे

कुन-कुन लता-फूल

अहाे कस्तो ठाडाे र सीधा रूख!

बिचार्न थाले म

यस्तो हरियाे कचाेर वनस्पति-राज्य 

के मैले अाफ्नाे जन्ममा देखेकाे थिएँ र?


गर्वले शीर ठाडाे पारेकाे 

मसिनाे मसिनाे दूबाे

मलाई हेर्दै मुसुक्क हाँसिन्

उतिबेलै कुनै चराले गरे चिरबिर-चिरबिर

अहा, दिल बागबाग हुनु के यसैलाई भनेकाे हाे?


एउटा झाडीमा पसेर

म‌ैले थुप्रै फूल टिपेर ल्याएँ

कुन्नि कुन-कुन फूल

यी सबैलाई उनेर बनाउँछु एक माला

अनि लगाइदिन्छु अाफ्नाे काेठामा राखेकाे ग्लाेबलाई


सुकुमारी स्पर्शातुर हावा

लुटपुटिन अाइपुग्छिन् मेराे अंग अंगमा

राेमाञ्चित म

श्र्वास-रन्ध्र हुँदै

फाेक्साेकाे कुना काप्चासम्म

समाहित गरे कुमारी हावा

थाहा छैन

कति कति नाश्वरतालाई

थपथपाएर गई


पृथ्वी मेरालागि कत्रो छिन्?

यी कुमारी हावालाई भरेर

जति फूलाउन सक्छु 

म अाफ्नाे फाेक्साे !


छेउबाटै बगि रहेकी छन् एक तन्वंगी नदी

अहा, कस्ताे सुडाैल, छरिताे, बेमत्त मन्दाक्रान्ता

कालिदास भएका भए फेरि 

लेखिन्थ्याे हाेला वेत्रवती अाख्यान 


म गाडीमा फर्केर अाएँ

आफ्नो-आफ्नाे बाेगीमा 

थुनिएका छन् मान्छे

आजित अनि दिग्दार छन्

कतिबेला इन्जिन आउँछ, कतिबेला 

कतिबेला मान्छे पुग्छन् 

अा-अाफ्नाे कब्रगाह?

के अचम्म हाे यस्तो 

यस्तो जंगलमा ल्याएर 

धाेखा दिए रेल्बेले

अापत रहेछन् अापत

कतिबेलासम्म बस्नुपर्ने हाे

यस निर्जनमा, कतिबेलासम्म?


अा-अाफ्नाे समस्याका अभियुक्त 

कैद छन् सबै यात्रु अा-अाफ्नाे बाेगीमा

बाहिर शुन्य निर्जन यस इलाकाका निवासीगण

हाँसि रहेका छन्

बाँटी रहेका छन्, अाशिष ।।।


2

मैथिली कविता

।।घरबे।।


--घरबे छी यौ?

डेढ़िया पर सं अबाज द' रहल छथि

हमर क्यो अपेक्षित


हम घरे मे छी

घरक भीतर चौकी पर बैसल

निहारि रहल छी अइ बगड़ा कें


बगड़ा चार मे लगेने अछि अपन खोता

खोता मे ओकर चारि-पांच बच्चा

आ तकरा सब सं 

बतिया रहल अछि एखन विभोर


आ हम विभोर

एकरा सब कें निहारै मे


हम अपन घर मे छी

आ बगड़ा सेहो अपन घरे मे अछि


--घरबे छी यौ?

फेर पुकार लगबै छथि अपेक्षित


एह

केहन हो

जे हमरा बदला ई बगड़ा दियय जवाब

--आउ आउ अपेक्षित, अहांक स्वागत।


अंग्रेजी अनुवाद: अंशुमान सत्यकेतु

The Resident


Is there the resident inside? 

One of my intimates

Is calling from the portal


I am inside the house

Sitting in my bed

Gazing at the sparrow


The sparrow

Nesting in the thatched roof

Is busy right now

Talking to its 

Four or five fledglings 

With great rapture


And 

I am engrossed gazing at them


I am inside my house

And so is the sparrow


Is there the resident inside? 

Again calls the intimate

Wow! 

How amusing it will be

If the sparrow replies and Welcomes the guest

Instead of me.


नेपाली अनुवाद: विजेता चौधरी

घराँ हुनुहुन्छ हजुर!


घराँ हुनुहुन्छ हजुर...?

डीलबाट साेधी रहेका छन्

मेराे कुनै अपेक्षित ले ।


म घरमै छु

घरभित्र खाटमा बसेर

नियाली रहेको छु यस भँगेरीलाई


भँगेरीले छानामा बनाएकी छे गुँड

गुँडमा छ उनको 

चार-पाँच वटा बचेराहरू

जाेसंग विभाेर भएर

बात मार्दै छिन् उनी ! 


अनि म विभाेर छु नियाल्नमा

म अाफ्नाे घरमा छु

अनि भँगेरी पनि अाफ्नै घरमा छे


घराँ हुनुहुन्छ हजुर...?

फेरि बाेलाउँछन् अपेक्षितले !


अहाे, 

कस्तो हुन्थ्यो हाेला

मेराे साटाे यी भँगेरीले दिन्थिन जवाफ 

अाउनुस् अाउनुस् अपेक्षित,

यहाँकाे स्वागत !!


3

मैथिली कविता

।।अजान।।


अजान पढ़ि रहल छथि मौलवी साहेब

जेना कोनो तिलस्मी बांसुरी बाजि रहल हुअय

धैवत धुन मे

धोइत पखारैत सौंसे संसारक कोहराम कें


शब्द सं बहराइ छथि अल्लाह

आ, उठैत उठैत नि:शब्द धरि ठेका देल जाइ छथि

मूर्त सन करुणा एगो 

ओइ आलाप मे गुंथाएल छै,

बीच बीच मे जखन लैत छथि विराम

मुखर सं मुखरतर मौन

बाउग भ' जाइत अछि अंतरिक्ष मे

अंतरिक्षक निच्चां मे ठाढ़ हम उबडुब करैत शाश्वत मे

निरभ्र प्रतीक्षा आतुर--

कखन मौलवी साहेब अगिला पद कहथिन


अइ अनभुआर ठेकान पर ठहरल छी संयोगात

की पता, शेष चारि बेरका नमाज लेल अजान के दैत हेथिन

ई बेचारे तं उदित होइ छथि नित्त अही बेर

रातुक आखिरी अजान काल मे

आ कि सब बेर यैह दैत होथि

हमही नहि सुनि पबैत होइ कोहराम मे

जे अइ दिनक सब सं बड़का सत्य बनल अछि



जानि नहि, अइ बेचारे मौलवी साहेब कें

की कहि क' पुकारैत हेतनि हुनकर समाज 

मुअज्जम हुजूर तं नहियें कहैत केतनि

नै जानि आर्थिक सखापात कोन तरहें मदतगार होइत हेतनि

आ कि नै होइत हेतनि?

कहि नै असंतुष्ट तं नै कदाच रहैत हेता

जं रहैत हेता असंतुष्ट तं मनुष्यताक लेल ई कते महाअनर्थ बात!

बुद्धक करुणा जाहि व्यक्तिक अबाज मे प्रत्यक्ष

ओह, ओकरा तं राजा हेबाक चाही

मुदा, नहि जानि ...


पच्चासो टा प्रश्न मोन मे उचरैए

एक ओइ आदमीक लेल

जकरा कि कहियो हम देखनो नै छी

चिन्है परजन्त नै छी

बस एतबे मे एतबे जे

ओ ओम्हर पढ़ै छथि अजान 

आ एम्हर हम सुनैत छी उबडुब उन्मेष मे


जा धरि खतम नै भ' जाइए अजान

कत्तहु दोसर दिस नै जाएत चित्त ने कान

ओह, क्यो हमरा मौलवी साहेबक संग कहियो बैसाबितय!


अंग्रेजी अनुवाद: अंशुमान सत्यकेतु

Azaan: The Prayer


A maulavi is saying his prayer

As if some magical flute is being played

On Dhaivat note

To end the chaos from the world


Allah comes out of the word

But

With the rise in scale he becomes wordless

A tangible pathos is entwined

In the form of alaap

When he breathes in between

A sonant taciturnity pervades

The universe

Skipping with perpetuity 

under it

I am eagerly waiting for him

To say his next verse


I have reached this unacquainted place

Coincidentally

This poor guy appears everyday

On his scheduled time

To say the last prayer of the day

No idea about

Who says the remaining prayers

May be he is assigned for the same

Which, unfortunately, 

I missed out on account of the hubbub around, 

And it became

The cogent truth of the day


I simply can't say

How is Maulvi Sahab known as in his society

Definitely not as Muazzam Huzur

Whether his kith and kins help him economically or not

Whether he is dissatisfied

If so

How inane it is for humanity

He ought to be a king

Whose voice has the pathos of Lord Buddha

But alas...! 


A lots of queries erupt in my brain

For the person

I have never seen

Or have no acquaintance what so ever

There is the sole connection

He says the prayer at one end and

I listen to it with great alacrity


I won't let myself

Deviate hither and thither

Till the prayer is being said

I wish he will let me 

Sit beside him someday.


नेपाली अनुवाद: विजेता चौधरी

अजान


अजान पढि रहेका छन् माैलवी साहेब

कुनै तिलस्मी मूरली बजिरहेकोजस्तै

धैवत धुनमा

धाेइ-पखाली सारा संसारका काेलाहललाई

शब्दबाट अवतरित हुन्छन् अल्लाह

अनि उठ्दा-उठ्दै निःशब्दसम्म पुर्याइन्छ

गाँसिएको छ मूर्त एउटा करूणा

त्याे अालापमा,

बीच बीचमा जब लिन्छन् विराम

मुखरदेखि मुखरित माैन

विलिन हुन्छ अान्तरिक्षमा

अान्तरिक्ष मुनि उभिएर म

डुबुल्की मार्दै शाश्वतमा

निरभ्र प्रतीक्षा अातुर

कतिबेला सुनाउछन् माैलवी साहेबले

अर्को पद


याे अनाैठाे ठेगानामा उभिएको छु संयाेगान्त

थाहा छैन शेष चार पटक नमाजका लागि कसले दिन्छ अजान

यिनी विचरा नित्य उदित हुन्छन् यतिबेलै

रातिकाे अन्तिम अजानकाे बेला

अथवा हरेक पटक यिनैले दिन्छन् हाेला

मैले नै सुन्न नसकेको हाे कि काेलाहलमा

जाे बनेकाे छ यतिबेला 

सैबैभन्दा ठूलो सत्य 


कुन्नि, यी बिचरा माैलवी साहेबलाई

के भनेर बाेलाउँदा हुन् उनका समाजले

मुअज्जम हजुर त पक्कै पनि भन्दैनन हाेला

अनि थाहा छैन अार्थिक जाेरजाम कसरी पुर्याउँछन् हाेला

अथवा हुँदैन पाे कि?


असन्तुष्ट त कदाचित रहदैनन हाेला

यदि असंतुष्ट भएमा

मनुष्यताकाेललागि कति ठूलो महाअनर्थकाे कुरा


बुद्धकाे करूणा प्रत्यक्ष छ 

जुन व्यक्तिको अाबाजमा

अाह, उनलाई त राजा हुनुपर्ने 

तर कठै,


पचासौं प्रश्न मनमा उठ्नथाल्छ

एउटा यस्तो व्यक्तिकोलागि

जसलाई मैले कहिल्यै देखेको छैन

चिनेको पनि त छैन

बस यतिमात्र कि

उनी उता पढ्छन अजान

अनि म यता सुन्छ, चुर्लुम्मम उन्मेषमा डुबेर


जबसम्म सकिदैन अजान

कत‌ै अन्ततिर जाँदैन मेराे चित्त अनि कान

अाह, कसैले कुनै दिन

मलाई माैलवी साहेबकाे छेउमा बस्न लगाउँथ्याे ।।।


4

मैथिली कविता

।।चिड़ै-चुनमुन उगबैए रौद।।

अनंत अजस्र ऊर्जा तहिना हमर काया मे नुकाओल

जेना नान्हि टाक बीज मे विशाल बटवृक्ष,

मुदा, से खाली कहबाक बात


सुटकल रहै छी बिछाउन पर

बड़ी बड़ी भोर धरि

ओम्हर, बहार मे चिड़ै-चुनमुन करैत रहैए किलोल

मचौने रहैए अट्ठाबज्जर

माथ धुनैए, देह पटकैए

जानि नै कते कते मोर्चा जीतैए

आ अन्तत:

उगाइये अनैत अछि रौद


अन्हरझोलीक अइ कालखंड मे

अन्हारक विरुद्ध निर्णायक अइ युद्ध मे

कते जरूरी अछि रौद हमरा खातिर

सब क्यो जनिते छी


मुदा, हम अपने रहै छी सुटकल बिछाउन मे

आ, चिड़ै-चुनमुन उगबैए रौद।


अंग्रेजी अनुवाद: अंशुमान सत्यकेतु

Birds beget Sunlight


It is nothing but a gossip to say that

My existence has immense energy

Similarly as there is a colossal banyan tree 

Inside a tiny seed


I hid myself inside the bed

Till late in the morning

But outside

Birds hop and chirp

Creates destruction

Fight with grand unity

To register a victory

And finally beget sunlight


Everybody knows

How important is light for me

For the ultimate battle against darkness

In this age of illusion


Even then

I hid myself inside the bed

And birds beget sunlight.


नेपाली अनुवाद: विजेता चौधरी

चराचुरुङ्गीले उदाउँछन् घाम


अनन्त अजस्र उर्जा त्यसैगरि छ 

मेराे कायामा लुकेको 

जसरी  मसिनाे बीउमा विशाल बटवृक्ष

तर, यी भन्ने कुरा मात्र हुन् 


गुटमुटिएकाे हुन्छु अाेच्छयानमा

एकाविहान भरि

उता बाहिर भने चराचुरुङ्गीले

डाकी रहेका हुन्छन्

मच्चाउने गर्छन् काेकाेहल

उफ्रिफाप्रि गर्दै

जित्छन् अनेकौं माेर्चा

र अन्ततः उदाउन करैलाग्छ घामलाई


निर्लिप्त अध्यारो यस कालखण्डमा 

अन्धकार विरूद्ध निर्णायक 

यस युद्धमा

घाम कति अावश्यक छ मेरालागि 

सबैले थाहा पाएकै हुन्


तर म अाफैं

टास्सिएकै छु अाेच्छयानमा

अनि चराचुरुङ्गीले

उदाइ सकेका छन् घाम ।।


5

मैथिली कविता

।।पृथ्वी-राग।।


सौरमंडल मे छलि एकटा पृथ्वी जतय जीवन छलै

कहथि वैज्ञानिक लोकनि जे दोसरो दोसर ग्रहक मनुख

भेस बदलि क' पृथ्वी पर उतरय

पाबय तते ऊष्मा, तते राग


बहुत उमर भ' गेल रहै पृथ्वीक

तें आगूक औरदा कम छल

ज्ञानी लोकनिक आंखि

अइ सं नम छल,

ओ लोकनि आर कइये की सकै छला

पृथ्वी छल नेता सभक कब्जा मे

जाहि ढहुरी कें मनुखतो धरिक पहचान नै

ने ज्ञानक लेल आदर

ने जीवनक लेल राग,

परमात्मा हेता तं अचरज करैत हेता जरूर

सैह, एहनो लोक रहल अइ लोक मे

जकरा लेल जीवन मने अपने टा जीवन

सुख माने अपने टा सुख

दुख माने अपने टा पार्टीक हारब


मरि रहल छलि पृथ्वी नहुं नहुं

मारि रहल छला नेता लोकनि

कुहरि रहल छल विदीर्ण हृदय

मुदा मनुखक भवितव्य देखियौ

नेतेक कब्जा मे छलि पृथ्वी

आ मनुख होइतो

लोक जीबि रहल छल नेतेक हजूरी मे


अइ बात पर आब

होथि तं कप्पार पीटथि परमात्मा

जे नेताक पैदाइश होइ छल अधिकतर वोट सं

आ वोट दियय के, तं मनुख!


अंग्रेजी अनुवाद: अंशुमान सत्यकेतु

 Affection for the Earth


There was an earth in the solar system

Where existed life

Scientists say that 

People from other planets

Used to visit the earth in disguise

To get some warmth and affection


The earth had gone very old 

And its end was quite near

Because of it

Wise men had tears in their eyes

What more could they do

The earth was taken over 

By the lewd leaders

Who didn't recognise humanity

Nor had the respect for knowledge

Not even affection for life

Almighty overhead

Would be wondering

If such people lived on this earth

Who only thought about their

Lives and welfare

And considered party's defeat

As their loss


Leaders were striking down the earth

Bit by bit

Which left our heart 

Shattered and moaning

But look at people's destiny

They still are the yes men of the leaders

Who has imprisoned the earth


If God exists somewhere

He must repent for

Votes create leaders and

People caste votes for them.


नेपाली अनुवाद: विजेता चौधरी

पृथ्वी-राग


साैर्य मण्डलमा थियाे एउटा पृथ्वी 

जहाँ जीवन थियाे

भन्थे वैज्ञानिकहरूले

अन्य अन्य ग्रहका मानिस

भेष बदलेर पृथ्वी माथि झर्थे

पाउथे अधिक उष्मा अनि राग


उमेर धेरै भएको थियाे पृथ्वीकाे

त्यै भएर कम थियाे बाँकी अायू

हाे यही कारण अाँखा रसाउँथ्याे ज्ञानीहरूकाे

तिनीहरू अरू के नै गर्न सक्थे र

पृथ्वी थियाे नेताकाे कब्जामा

जुन लठुवालाई मानवता धरिकाे पहिचान छैन


न ज्ञानको लागि अादर

न त जीवनकाे लागि राग

परमात्मा कतै छन् भने

अाश्चर्य मान्दैछन् हाेला पक्कै

यस्ता मानव पनि छन् यस लाेकमा

जसकाेलागि जीवन भनेको 

अाफ्नाे मात्रै जीवन

सुख भनेकाे अाफ्नाे मात्रै सुख

दुःख भनेकाे अाफ्नाे पार्टी मात्र हार्नु


मरिरहेकाे छ पृथ्वी विस्तारै विस्तारै 

मारिरहेका छन् नेताहरूले

कहारि रहेका छन् विदिर्ण हृदय

तर मानवकाे भविषय कठै!

नेताकाे कब्जामा छ पृथ्वी 

अनि मानव भएर पनि

मान्छे बाँचिरहेका छन् नेताकै हजुरीमा


यस्तो चाला देखेर

कतै छन् भने परमात्माले अाफ्नै खप्परमा हिर्काउथे 

जुन नेताकाे जन्म नै

अधिकांश भाेटले हुन्थ्यो 

ती भाेट दिने काे, त्य‌ै मानवले।।









Saturday, July 24, 2021

मैथिली आलोचना मे मोहन भारद्वाजक महत्व


 

मैथिली आलोचना मे मोहन भारद्वाजक महत्व

                
फोटो आ आलेख
तारानंद वियोगी

एक समय छल जखन हम अपन राय देने रही जे मैथिलीक मार्क्सवादी/प्रगतिशील आलोचना-पद्धतिक बात होयत आ एकर उद्गाता आ प्रतिष्ठापक पुरुषक प्रश्न उठत तं हमरा लोकनि लग मे दूटा नाम-- कुलानंद मिश्र आ मोहन भारद्वाज मे सं कुलानंदे मिश्र कें चुनबा योग्य पाओल जायत। मुदा जहिया हम ई बात कहने रही, ओ बड्ड पुरान समय छल। कुलानंद मिश्र अपन दूटूक आलोचकीय विवेक के शिखर उच्चता पर छला आ मोहन भारद्वाजक एक्कोटा संकलन वा किताब ताधरि नहि बहरायल रहनि। उपलब्धिक नाम पर हुनका लग मात्र किछु संपादित आ अनूदित किताब रहनि, जे गुणावगुण मे जते औसत छल ओकरा बारे मे ततबे किंबदन्ती सब प्रचलित रहैक। अस्सल मोहन भारद्वाजक पदार्पण एखन बांकी छल।
          साहित्यक बारे मे गपसप करैत ओ ततेक अक्खड़ आ रगड़ी भूमिका मे रहल करथि आ तेना हल्ला क' क' बाजथि जे कतोक बेर ताहि दिन मे हमरा ई ख्याल आएल हैत जे बालापन कि तरुणाइ मे हिनका बात कें साइत क्यो मोजर नै दैत छल होयत, तकर ई कंप्लेक्स थिक। राजनीतिशास्त्रक ओ विधिवत अध्ययन केने छलाह आ हुनकर सोच रहनि जे राजनीतिक रूप सं सचेत हरेक लोक कें अपन समानसोची लोक सभक गुट तैयार करबाक चाही, कोनो तथ्य कें ढकरि क'(विथ ए बैंग) कहबाक चाही। मैथिली गतिविधि मे जहिया ओ सर्वाधिक सक्रिय रहथि, अस्सीक दशक मे, अद्भुत छल मैथिली साहित्यिक पर्यावरण पर हुनकर पकड़ जे हुनका इग्नोर क' क', भने ओ कोन्नहु मंच हो, कोन्नहु विचारधाराक, किछु नहि कयल जा सकैत छल। ताहि पर सं हुनकर मान्यता रहनि जे मंच चाहे विरोधिए लोकनिक किएक ने हो, अपन बात जरूर कहबाक चाही, कारण एक्को टा क्यो श्रोता जं उचित विचार बला भेटि गेला तं बूझल जाय जे हमर एक समांग बढ़ला।
          बाद मे हुनकर एकक बाद एक अनेक पुस्तक आएल। ई पुस्तक सब अपन व्याख्या-विश्लेषण मे टूटूक तं छलहे, स्वर मे सकारात्मक आ प्रभाव मे नवोन्मेषी सेहो छल। अपन लेख सभक अनेक संकलन ओ प्रकाशित करौलनि। विविधविषयी सं ल' क' एकविधानिष्ठ धरि। ओकर कालावधि सेहो बहुत व्यापक। ज्योतिश्वर-विद्यापति सं ल' क' एकैसम सदी मे सद्य: लिखल जाइत साहित्य धरिक ओ सोह लेलनि।  हजार बरख मे चतरल-पसरल मैथिली साहित्यक सीमांकन करबाक हुनकर दृष्टि कतेक फरिच्छ छल से देखल तं एहि समस्त ठाम जा सकैत अछि, मुदा एकर मर्म बुझबाक लेल पुस्तक रूप मे लिखल हुनकर दूटा कृतिक विषये कें बूझि लेब सेहो कम पर्याप्त नहि होयत। हुनकर एकटा पुस्तक डाकवचन पर अछि। ई मैथिल रचनाशीलताक प्राचीनतम स्रोतक विषय मे अछि। आमजनक संवेदना, आमजनक भाषा, आमजनक बेगरता, एतय धरि कि रचनाशीलता सेहो आमजनेक। अपन दोसर पुस्तक ओ यात्री जीक उपन्यास 'बलचनमा' पर लिखलनि। ई मैथिल रचनाशीलताक उत्तर सीमा छल, जतय सं हम सब अपन साहित्य कें समकालीन साहित्य कहैत छिऐक। ई काल खासमखास ओ काल थिक जकर असर आ नुकसान सं हमर सभक वर्तमान ने मात्र प्रभावित अछि , कहबाक चाही जे गहमागट्ट डूबल अछि। एहू ठाम वैह सब बात। आमजनक संवेदना, आमजनक भाषा, आमजनक बेगरता, एतय धरि जे रचनाशीलता सेहो आमेजनक। जननिहार लोक सब ई बात जनैत छथि जे यात्री जी ई उपन्यास 'शूद्र मैथिली' मे लिखने छला। जे मिथिला एकैसम सदीक एहि दोसर दशक मे आबियो क' सुभाष चंद्र यादवक 'गुलो' कें बरदास्त करबा योग्य नहि भ' सकल अछि, ओ सत्तर बरख पहिने पचासक दशक मे कतय छल होयत, सहजे अनुमान क' सकै छी। मुदा मोहन भारद्वाज अपन सर्वश्रेष्ठ लेखन ओही उपन्यास कें समर्पित कयलनि।
          हुनकर आलोचना-यात्रा ठीक ओहिना शुरू भेल छल जेना कोनो आन आलोचकक शुरू होइत छैक। कथा-कहानी तं सुरुहे मे छूटि गेलनि। सुरुहे मे ओ अपन आत्मविस्तार कें प्राप्त कयलनि आ आनक लिखल वस्तु कें मोजर देबाक उदारता विकसित कयलनि। एक गंभीर आलोचनात्मक प्रयत्न अपना रचनाक स्थान पर आनक रचना कें वरीयता देबाक उपक्रम थिक। ई सर्वजानित बात थिक जे एक कविक तुलना मे एक आलोचकक काज बेसी भारी आ जटिल होइत छैक। मुदा, मैथिलीक पर्यावरण एहन रहल जतय आलोचकक लेल कोनो सम्मानजनक स्थान कहियो नहि रहलैक। जखन क्यो मैथिली आलोचनाक अखाड़ा मे उतरैत अछि तं कमोबेस ई अवधारिये क' उतरैत अछि जे ओकर काजक मूल्यांकनक कोनो निकष समाज लग नहि छैक, आ तें सम्मानो नहि छैक। मोहन भारद्वाज सब दिन एकतरफा चललाह। कोनो रचनाकार कें मूल्यांकित करबाक हुनकर निकष बहुत कठोर छलनि, ई बात सब क्यो जनैत छी। ओहिठाम मायानंद मिश्र आ जीवकान्तक लेल सेहो पासमार्क प्राप्त करब एक कठिन बात छल। मुदा, हुनकर दोसर पक्ष सेहो हमरा लोकनि नीक जकां जनैत छी। नवपीढ़ीक जे क्यो युवा हुनका संपर्क मे अयलनि, ओकरा ओ आंखि-पांखि देबाक जतन कयलनि, आगूक रस्ता बतौलनि, हरेक नीक-अधला प्रसंग मे ओकरा संग ठाढ़ भेला। हुनका लग देस-विदेसक मैथिली अध्येता सभक पहुंचब तते निरंतरतापूर्ण छल जे हुनकर शत्रु लोकनि हुनकर आवास कें 'अकालतख्त' कहल करथि।
          समकालीन साहित्यक आलोचना सं होइत ओ मैथिली साहित्यक पृ्ष्ठभूमि कें अनावृत्त करबाक दिशा मे बढ़ला। ओ बारंबार कहल करथि जे आजुक साहित्य कें परखबाक लेल अतीत आ परंपराक ठीक ठीक ज्ञान होयब जरूरी अछि। ई कतेक जरूरी बात छल, से मर्म कें बुझनिहार लोक अख्यास क' सकैत छथि। डाक आ यात्रीक बाद जे काज हुनका सब सं जरूरी लगैत छलनि से छला विद्यापति। ओ विद्यापति पर एक मुकम्मल किताब लिखय चाहैत रहथि। झंझटि ई जे एसकर विद्यापति पर एखन धरि कम सं कम पचीस हजार पृष्ठक आलोचना-साहित्य लिखल जा चुकल अछि। ई बात भिन्न जे एहि मे सं सब सं बेसी पृ्ष्ठ बंगला मे छैक आ सब सं कम मैथिली मे। मुदा तैयो एसकर रमानाथ झा पांच सय पेज विद्यापति पर लिखने छथिन। मुदा मोहन भारद्वाजक कहब छलनि जे विद्यापतिक ठीक ठीक मूल्यांकन एखनो धरि नहि भ' सकलनि अछि। एकटा खिस्सा ओ सुनाबथि जे कोना एक बेर सुरेन्द्र झा सुमन हुनका जखन पुछने रहथिन जे आइकालि की लिखि रहल छी आ ओ बतौने रहथिन जे विद्यापति पर लिखि रहल छी, तं सुमन जी कोना आश्चर्यसागर मे निमग्न भ' गेल छला जे यौ, विद्यापति पर आब की लिखि रहल छी? कहब जरूरी नहि जे हुनकर काजक महत्व सभक बुते, मने आचार्यो लोकनिक बुते बूझब आसान नहि छल। हुनकर भविष्यदृष्टि बहुत पुख्ता छलनि। एहि तरहक काज मानू ओ अनागत कालक लेल क' रहल छला। भविष्यक पीढ़ी कें विद्यापति कें, वा कि जीवजगतक कोनो आन विषयवस्तु कें कोना क' बुझबाक चाही, हुनकर ध्यान सदति एहि बात पर रहैत छलनि। अस्तु। विद्यापति पर अपन किताब ओ पूरा नहि क' सकला मुदा जतबे लिखि सकला से पछिला लिखलाहा पर कतेक भारी अछि तकर पता हमरा लोकनि युवा विद्वान लोकनिक आंखि मे पाबि सकैत छी। आंखिये टा मे किएक, आब तं ओकर लिखित रूप सेहो आबय लागल अछि। अरविंद कुमार मिश्रक पुस्तिका कें एकर एक दृष्टान्त मानबाक चाही।
          मोहन भारद्वाजक आलोचना-कर्मक महत्व कें बुझबाक लेल हमरा लोकनि कें मैथिली आलोचनाक इतिहास दिस एक नजरि देखय पड़त। परंपरागत रूप सं जकरा हमरा लोकनि मैथिली काव्यशास्त्र कहैत छिऐक, नहि बिसरबाक चाही जे असल मे ओ संस्कृत काव्यशास्त्र छिऐक। संस्कृतो मे कालान्तर मे गति-प्रगति भेने आलोचनाक अनेक संप्रदाय चलन मे आएल। मुदा एतय से सब नहि, प्राचीनतम जे रससम्प्रदाय छैक, तकरे सीमा मे मैथिली काव्यशास्त्र आबद्ध रहल। छव सय बरख पहिने विद्यापति कें चेतना भेल छलनि जे 'सक्कअ वाणी बहुअ न भावइ' मुदा आधुनिक युग मे आबि हमरा लोकनि ततेक दमित सीदित परबुद्धी बनल रहलहुं जे कहल 'भाषा सौन्दर्यक गति न आन', संस्कृतक शरणापन्न भेने विना मैथिली भाषाक कोनो आन गति नहि छैक। आचार्य रमानाथ झा आलोचना-समीक्षा पर एकाग्र भेला तं हुनक ध्यान मैथिली काव्यशास्त्रक एहि अपंगता दिस गेलनि आ एकर भरपाइ करबाक लेल अपना युगक श्रेष्ठ पाश्चात्य आलोचना-सिद्धान्त, जकर उद्भावक आ प्रतिष्ठाता टी एस इलियट छला, कें अपन कसौटी बनौलनि। तहिया सं आइधरि अंग्रेजीदां मैथिली आलोचना कें हमरा लोकनि ओत्तहि ठमकल देखि सकैत छी। अद्यतन उदाहरण ललितेश मिश्र छथि। एहि सिद्धान्तक आधार पर रमानाथ बाबू ई तं जरूर केलनि जे कविक व्यक्तित्व कें उद्घाटित केलनि जाहि सं कविताक मूल भाव स्फुट भेल, मुदा दू कारण भेल जे इहो सिद्धान्त मैथिली आलोचनाक सिद्धान्त नहि बनि सकल। इलियट अपन समकाल कें उद्घाटित करबाक लेल एकर प्रवर्तन कयने छला मुदा रमानाथ बाबू अपन अतीत कें सोझरेबाक लेल एकर प्रयोग कयलनि। हरेक प्रयोग अपना संग अपन सीमा सेहो नुकौने रहैत अछि। से हमरा लोकनि देखल जे अतीत कें सोझरेबा मे सफल रहलाक बादो ओ अपन समकाल कें स्फुट करबा मे असफल रहि गेला। एकर प्रमुख कारण छल जे संस्कारवश ओ अपने रुचि कें अंतिम प्रमाण मानि लेलनि, जखन कि हुनक पक्षपात अतीतक प्रति छलनि। दोसर जे कविताक समीक्षाक लेल तं ई सिद्धान्त ठीक छल कारण एही बेगरता कें ध्यान मे रखैत एकर प्रवर्तन भेल छल मुदा आन आन विधा जेना कथा, उपन्यास आदिक लेल ई अपर्याप्त साबित भेल। तहिना, कविव्यक्तित्वक स्फुटन लेल तं ई सक्षम छल मुदा पाठाधारित विवेचना एकरा बुतें कदाचित संभव नहि छलैक।
            कुलानंद मिश्र मैथिली आलोचना कें मार्क्सवादी नजरिया प्रदान कयलनि आ अपन अनेक लेख द्वारा एकर प्रतिष्ठापन कयलनि। रचनाक भौतिकतावादी पृष्ठभूमिक विश्वसनीय विश्लेषण तं हुनकर लेखन मे अवश्य आएल आ एहि आधारक पर्याप्त पुष्टि सेहो जे कोना एक रचनाकार अपन समाजार्थिक परिस्थितिक उपजा होइत अछि, से वस्तु स्वयं मोहन भारद्वाजक लेखन मे सेहो पूरा स्पष्टताक संग आएल। मुदा, मैथिलीक मार्क्सवादी आलोचनाक ई विकट सीमा रहल जे ई अपन सैद्धान्तिकी नहि तैयार क' सकल। तें हमरा लोकनि देखब जे मैथिलीक मार्क्सवादी आलोचना मे पहिने तं सैद्धान्तिकीक पैघ-पैघ देशी-विदेशी उद्धरण रहैत अछि जकर कोनो सम्बन्ध मिथिला वा मैथिली सं सामान्यत: नहि रहैछ आ ने ओ मिथिलाक ऐतिहासिक वा समाजार्थिक पृष्ठभूमि कें खोलबा मे किछु मददगार भ' पबैछ।
            मोहन भारद्वाजक आलोचनाक महत्व एही ठाम आबि क' हमरा लोकनि बूझि सकैत छी। मैथिलीक मार्क्सवादी आलोचना मे जे सैद्धान्तिकीक फांक रहैक तकरा ओ मिथिला-विमर्श ल' क' भरलनि आ से करबाक क्रम मे मिथिलाक जन इतिहास, लोकपरंपरा, प्राचीन प्रगतिशील लेखन, लोकवादी परंपरित व्यवहार आदि कें आलोचनाक मुख्यधारा मे आनि प्रतिष्ठित कयलनि। कहब आवश्यक नहि जे ई सब उपक्रम मैथिलीक ऐतिहासिक-समाजशास्त्रीय आलोचना-पद्धतिक विकास लेल उठाओल पहिल सुनिश्चित डेग छल। 1995 मे ओ 'अनवरत' नाम सं अपन आलोचनात्मक लेख सभक पहिल संकलन प्रकाशित करौलनि। ओहू संकलन मे हमरा लोकनि हुनकर एहि अभिनव दृष्टिक झलकी पाबि सकैत छी। जेना जेना ओ अगिला संकलन सभक प्रकाशन करबैत गेला उत्तरोत्तर हुनकर दृष्टि स्फीत आ समावेशी होइत गेलनि। एतय धरि जे निधनक एके वर्ष पूर्व अपन पचहत्तरिम जन्मदिन पर जे पुस्तक ओ लोकार्पित कयलनि, से स्वयं मैथिली आलोचनाक हालसूरति आ भवितव्य पर केन्द्रित छल आ ताहि मे एक वस्तुनिष्ठ साहित्यविमर्शक सुचिन्ता अन्तर्ग्रथित रहैक।
            आलोचनाक भाषा एक भिन्न पक्ष थिक जाहि मे मोहन भारद्वाजक कयल काज हमरा लोकनि कें गौरवान्वित करैत अछि। सब गोटे अवगत छी जे मानक भाषाक सम्बन्ध मे रमानाथ झाक अपन आग्रह रहनि। ई आग्रह ताहिखन तं अत्यधिक प्रबल भ' जाइत छल जखन ओ आलोचना लिखथि। अपन कैक लेख मे तं ओ विधिपूर्वक ई व्यवस्था देने छलाह जे आलोचना जखन कखनहु लिखल जाय निश्चित रूप सं अपन विहित भाषा आ शैलिये मे लिखल जाय। हुनक ई सिद्धान्त वचन कतेक प्रभावकारी भेल तकर पता हम सब एक एही उदाहरण सं पाबि सकैत छी जे जे कुलानंद मिश्र रमानाथ बाबूक आलोचना-सिद्धान्त सं पूरे अलग होइत एक प्रतिरूप रचि देबा मे सफल भेला, हुनको बुतें हुनक एहि विहित भाषा आ शैलीक अनुशासन कें तोड़ब संभव नहि भ' सकल छल। ई काज मोहन भारद्वाज क' सकला, से कदाचित मैथिली साहित्य कें देल गेल हुनक सब सं पैघ अवदान थिक। पहिने जे आलोचना विहित शैली मे होयबाक कारण पूर्वबोधापेक्षी छल, मने ओकरा नीक जकां बुझबाक लेल पंडित विद्वाने लोक सक्षम भ' सकैत छला, आब से आलोचना साधारणो पाठक अपन यथालब्ध बोधक संग बुझबा मे समर्थ भ' गेल। मुदा जं ई कही जे सामान्य जनक भाषा मे आलोचना कें प्रस्तुत क' सकब कोनो सामान्य काज थिक जकरा क्यो बुद्धिमान व्यक्ति अभ्यास सं सिद्ध क' सकैत अछि, तं सेहो कहब गलत होयत कारण भीतरक अन्तर्वस्तु मे जा धरि स्पष्टता आ पारदर्शिता नहि रहतैक केवल बाहरी भाषा मे ओकरा व्यक्त क' लेब एक प्राणहीन कवायद मात्र भ' क' रहि जायत। एकरा लेल समाज संग, इतिहास आ आर्थिकीक संग जे चयन-विवेक, अवगति आ आपकता चाही तकरा साधबाक लेल कोनो लेखक कें ओहिना अपन जीवन समर्पित करय पड़ि सकैत छनि जेना मोहन भारद्वाज कयलनि। एकर कोनो शार्टकट होयब संभावित नहि अछि। कहियो भैयो नहि सकैत अछि।
            आइ जखन ओ हमरा लोकनिक बीच सं परोक्ष भ' गेलाह अछि, हुनकर अनुपस्थिति एक एक मैथिली अध्येताक हृदय सालैत अछि। मानू तं हुनकर उपस्थिति पर हुनकर अनुपस्थिति भारी पड़ि रहल अछि। हमर ख्याल अछि, जेना जेना मैथिली विषयक अध्ययन मे परिपक्वता आ वस्तुपरकता अबैत जयतैक, हुनकर कद आरो आर विराट होइत जायत।

@पटना, 7.2.2020

Friday, July 2, 2021

मैथिली आलोचना: स्थिति आ अपेक्षा


 तारानंद वियोगी



मैथिली आलोचनाक आइ की स्थिति अछि आ एकरा सं लोकक की अपेक्षा छै, ताहि पर हम गप करी, एहि सं पहिने कने एक नजरि एहि दिस देखि लेबय चाहब जे एहि आलोचनाक बारे मे आम लोकक समझ केहन छनि। आम लोक माने आम साहित्यक लोक, कारण शुद्ध रूप सं जकरा आम लोक कहल जाय ओकर प्रवेश आलोचना धरि हेबाक प्रश्ने कहां, आम साहित्यिक लोक सेहो आलोचना सं कनछी कटैत, हांजी हांजी करैत कहुना आगूक बाट पकड़ि बढ़ि जाय चाहैत रहैत अछि। आलोचना ककरा चाही? पुरस्कार सब पर जिनकर नजरि छनि तिनका लेल आलोचना बेकार, कारण पुरस्कार कोनो आलोचना पढ़ि क' नहि देल जाइत अछि।  जे स्वान्त:सुखाय लिखै छथि हुनका आलोचना सं काजे की? जे पकिया लेखक छथि हुनको आलोचना सं बहुत मतलब नहि कारण अपन रचनाशीलता कें आलोचना सं दग्ध हेबाक अवकाश ओ नहि छोड़य चाहैत छथि। 

       कतेक लोक दोसरो बात कहै छथि। कहै छथि जे माटि सं जुड़ल भाषा-समाज सब मे आलोचनाक लेल स्पेस कम रहैत छैक। ओतय हृदयधर्मी आपकताक चलन पाओल जाइत छैक, जखन कि आलोचना एक बौद्धिक  उपक्रम थिक। एहि तरहक सोच रखनिहार लोक सब निश्चिते कोनो भाषा मे ओकर आलोचनाक विकास कें ओहि समाजक बौद्धिक विकास सं जोड़ि क देखबाक आग्रही छथि। हमरा मुदा, एहू आग्रह मे कोनो दोष नहि देखाइत अछि। मैथिली माटिक भाषा छी। माटिक भाषा मे लोकक प्रकृत संस्कार सब सं बेसी घनगर रहैत छैक। लोक शिक्षा आ युगीनता बाहर सं सिखैत अछि। साक्षर हेबाक बादो लोक युगीनता कें सिखबा सं इनकार क सकै छथि, सेहो होइ छै।

         अपन स्थिति देखैत छी तं मोन पड़ैत अछि जे मैथिली आलोचनाक संग हमर संबंध कते पुरान अछि। 1982 मे, जखन कि हम एक सद्य:नवागंतुक कवि रही, ओही साल पटना मे नवतुरिया लेखक सम्मेलन आयोजित भेल रहै, आ ओहि मे साहित्यक प्रमुख विधा कविता पर आलोचना-सत्र मे लेख पढ़बाक जिम्मा हमरे पर छल। ओहि प्रसंग छत्रानंद बटुक भाइक ओ बात मोन पड़ैत अछि। पुछने रहथि की करै छी? उत्साह सं उत्तर देने रहियनि, राजकमल कान्वेन्ट स्कूल मे प्रिंसिपल छी। बाजल रहथि, ऐं यौ, तखन तं अहां स्कूलक मास्टर सब एखन धरिये पहिरैत हेता!  मतलब, मैथिली आलोचना मे हमर रुचि अत्यन्त प्राचीन अछि। तें लगभग चालीस वर्षक आलोचना कें निकट सं देखलाक बाद हम आलोचना सं अपेक्षाक बारे मे दू-चारिटा गप कहब आ उम्मीद करब जे एकर जे स्थिति छै से स्वाभाविके रूप सं एहि मे आबि जाएत।

         मैथिली आलोचनाक बारे मे आम राय की अछि? राय अछि जे एकर विकास नहि भ सकल। कि मैथिली मे आलोचना एकदम अवनत दशा मे अछि। जकरा देखू सैह आलोचना पर थुम्हा भरि थूक फेकैत नजर एता जे धुह, ई कोनो जोगरक नहि भ सकल। जे मैथिली आलोचनाक विकास सं सर्वथा अनजान छथि सेहो एहन कहैत भेट जेता जे मैथिली मे आलोचना एखन अपन बाल्यकाल मे अछि। उचिते, एहि तरहक स्थापना देबाक लेल एकमात्र अज्ञानते सं आत्मविश्वास भेट सकैत अछि।

         मुदा प्रश्न अछि जे आम राय एहन किएक अछि? मिथिला-समाज कें अहो रूपं अहो ध्वनि: चाहिऐक, आलोचना नहि चाहिऐक, की बात एतबे अछि आ कि एहि मे मैथिली आलोचनाक अपनो किछु दोख अछि? निश्चिते अपनो दोख अछि। से जं नहि होइत तं कोनो कारण नहि छल जे जाहि भाषा मे रमानाथ झा सन अतंद्र विद्वान आद्य आलोचक भेला, काञ्चीनाथ झा किरण सन तत्वदर्शी विचारक भेला, किसुन जी आ रामानुग्रह झा सन अध्येता समीक्षक, कुलानंद मिश्र आ मोहन भारद्वाज सन पक्षधर विमर्शकार भेला, राजमोहन झा आ जीवकान्त सन दूटूक टिप्पणीकार काज केलनि, अवसर एला पर यात्री जी आ राजकमल चौधरी सन यशस्वी लेखक आलोचनाक पक्ष मे ठाढ़ भेला, कोनो कारण नहि छल जे से आलोचना थूक फेकबा जोग स्थिति मे मानल जाय। तें दोख तं एहि मे आलोचनाक अपनो अछि।

         रमानाथ झाक आलोचनाक एक अध्ययन हम वर्ष 2006 मे प्रकाशित करौने रही। ओहि ठाम हम देखौने रही जे आलोचनाक उच्च मानदंड रचितो रमानाथ बाबू मैथिली आलोचना कें ताहि रूपें प्रतिष्ठापित करबा मे किए असफल रहला, जखन कि हुनके सन स्थिति मे होइतो रामचंद्र शुक्ल हिन्दी आलोचना कें प्रतिष्ठापित करबा मे सफल भेला। असल मे रमानाथ बाबू अतीत गौरवक निस्सन पक्षपाती रहथि आ हुनका लेल प्रयुक्त शब्द 'हंसवृत्ति' अथवा 'नीरक्षीरविवेकी' आदि सनातन जुमलाबाजी सं बेसी महत्वक बात नहि छल। आश्चर्यक बात छल जे टी एस इलियट कें अपन आदर्श मानितो ओ अतीतमुखिये बनल रहला आ युगीन लेखन सं लगभग निरपेक्ष आ असहमत बनल रहला। मैथिली आलोचना कें एकटा स्वरूप द क ओ ठाढ़ तं जरूर केलनि मुदा आलोचना-पुरुषक आंखि ओकर पीठ दिस निरमाओल गेलै, जकर रूपक एखनहु पं गोविन्द झा अपन आत्मकथा मे व्यवहार करै छथि। रमानाथ बाबू आलोचक मे पाओल जाइ बला गुण आ ओकर कार्यप्रणालीक दमदार मार्गदर्शिका बनौलनि आ वैचारिक गद्यलेखन कें शोध आ आलोचनाक रूप मे दू अलग अलग अनुशासन मे विभक्त केलनि। देखय चाही तं हमरा लोकनि देखि सकै छी जे रमानाथ बाबूक आलोचकीय मानदंड तते उच्च छलनि जे हुनक विशाल शिष्यमंडलीक होइतहु हुनका परंपराक क्यो आलोचक नहि भ सकला, जे भेला से विद्वान आ शोधप्रज्ञे भेला। हुनकर सीमा पाठ्यपुस्तक, विश्वविद्यालय आ पुरस्कार-प्रतिष्ठान धरि घेरायल रहल। आइ विश्वविद्यालय सभक मैथिली शोध विभागक की हाल अछि से ककरो सं नुकाएल नहि अछि।

         आधुनिक अर्थ मे जकरा ठीक ठीक आलोचना कहल जाय, तकर शुरुआत मैथिली मे किरण जीक लेखनक संग होइत अछि। मुदा, किरण जीक आक्रोशी आ विद्रोही स्वर अंत अंत धरि हुनका मे बनल रहलनि, एतय धरि जे अपन एक कविता मे, मृत्यु पर्यन्त ई स्वर हुनकर बनल रहनि तकर ओ कामना करैत सेहो देखल गेला। विद्यापति, उमापति, चंदा झा, किरतनिञा नाच, लोकपरंपरा आदि कतेको विषय छल जाहि पर रमानाथ बाबू सं किरण जीक घोर मतभेद छल आ तकरा ओ साफ साफ धारदार भाषा मे लिखबो केलनि। मुदा ओहि जुगजबानाक नायक रमानाथ झा रहथि आ तें किरण जी कें खलनायकक हैसियत भेटलनि आ हुनकर काज कें परिभाषित करबाक लेल एकटा नब शब्द क्वाइन कयल गेल--प्रत्यालोचना। गंहीर नजरि सं देखू तं आश्चर्य लागत जे एते भारी लोक आ सिद्धान्तकार भेलाक बादो मिथिला आ मैथिली कें ल क रमानाथ बाबूक भविष्यदृष्टि किरण जी जकां साफ नहि छलनि। तकर कतेको उदाहरण अछि। मुदा, जाहि तरहें विद्वत्समाज किरण जीक जीताजी हुनकर मूल्यांकन केलनि, ई बात सामने आएल जे 'प्रत्यालोचना' संभ्रान्त समाजक मान्यता आ शास्त्रसम्मत साहित्यदृष्टि के विरोधी चीज थिक। कहब जरूरी नहि जे जकरा ओ लोकनि प्रत्यालोचना कहि रहल छला, वस्तुत: वैह मैथिली आलोचना छल।

         रमानाथ बाबू अपन प्रभावशाली धीर-गंभीर व्यक्तित्व  आ कर्मठ ज्ञानकुशलताक कारण, अनेक प्रभावी शिष्यमंडली सं सुशोभित हिमालयक कठिन शिखर जकां अलंघ्य मानल जाइत रहथि। हुनकर सघन प्रभाव मैथिली साहित्य पर पड़ब अवश्यंभावी छल। मैथिली आलोचना एहि सं दीर्घकालिक रूपें प्रभावित भेल। एहि प्रभाव कें हम आइयो धरि घनगर बनल देखि सकै छी। दूटा दृष्टान्त। मैथिली आलोचनाक मूलस्वभाव अतीतगामी अछि। जे बीति चुकल छै, मैथिली आलोचना कें तकरे चिन्ता करैत देखबै। ओना तं आलोचना विधे अपन स्वभाव मे साहित्यक पश्चगामी होइत अछि, मुदा ओकर पयर अपना जुगक जमीन पर ठाढ़ रहै छै। बुझनिहार बूझि सकै छथि जे अतीतगामी हेबाक बात जे हम कहि रहल छी से एहि सं भिन्न बात थिक। दोसर, मानक भाषाक बहुत आग्रही रमाथ बाबू छला। आलोचनाक अपन विशिष्ट भाषा होइक तकर ओ व्यवस्था देलनि आ एहि व्यवस्था मे आलोचना आबद्ध बनल रहल। हमरा लोकनि आगूक विकास कें देखि चकित भ सकै छी। कुलानंद मिश्र मैथिली आलोचनाक दोसर पैघ सिद्धान्तकार भेला। ओ रमानाथ बाबूक समानान्तर आलोचनाक एक प्रतिरूप ठाढ़ केलनि। ओतय वर्गविभाजित समाज मे साहित्य कें भौतिकताक नजरि सं देखबाक आग्रह छल। समाजार्थिक आधार कोना साहित्य आ साहित्यकार कें उपयोगी आ कालजयी बनबैत छैक, तकरा ओहि ठा देखल जा सकैत छल। आठम-नवम दशक मे कुलानंद जी काज क रहल छला मुदा हुनकर विचारक अवधि आजादी बादक पांचम-छठम दशकक साहित्य छल। मुश्किल तं ई छल जे मानदंड मे रमानाथ बाबूक प्रतिरूप रचितो कुलानंद जीक आलोचना-भाषा रमानाथ बाबूक अनुगामी छल। हुनकर भाषाक जादू सं ओ बाहर नहि निकलि सकलाह। एहि भाषाक जादू कें तोड़ैत हमरा लोकनि मोहन भारद्वाज कें देखै छियनि। कदाचित यैह हुनकर सब सं पैघ देन छनि, यद्यपि कि क्षेत्रीय इतिहास आ स्थानीय समाजशास्त्र कें आधार बना ओ साहित्यालोचनाक एक नव परिपाटी विकसित केलनि। मजा के बात छै जे कि राजमोहन झा आ जीवकान्त अपन आलोचनात्मक लेखन मे अतीतगामिता आ मानक भाषिकता--एहि दुनू अपाय सं कहिया ने बहरा गेल छला। मुदा, हिनका लोकनिक मूल स्वर असहमतिमूलक छल, जकर तात्र्य जे मुख्यधारा ओ कोनो आन पद्धति कें मानि रहल छला, आ एहि तरहें इज्जति उतारितो मानि ओ ओकरे द रहल रहल छला। फलस्वरूप कोनो प्रतिरूप नहि रचि पाबि रहल छला।



              मैथिलीक आम समुदाय मे आलोचक कें नीक नजरि सं नहि देखल जाइछ। प्रकारान्तर सं ईहो वैह बात थिक जे एतय आलोचना कें कोनो जोगरक नहि मानल जाइछ। सामाजिक छविक दृष्टि सं जं विचार करी तं देखब जे कविताक चलन भने सब सं बेसी होउक मुदा कविक छवि कोनो निरस्तुकी पोख्ता छवि नहि अछि। कुलानंद मिश्र सन नास्तिको कवि छथि आ प्रदीप मैथिलीपुत्र सन आस्तिको। कथाकार अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति मे छथि मुदा नितान्त प्रतिगामी सोच रखनिहारो अनेक अयुगीन लोकक प्रवेश कथा-क्षेत्र मे छैक। एहि समस्त लेखक समुदाय मे सं एक आलोचके छथि जिनकर पोखता सामाजिक छवि बनि सकल अछि। परंपरित मैथिल मानदंडक हिसाब सं आलोचक आधुनिक होइत छथि, जिनका साबिक मे अंग्रेजिया कहल जाइन लगभग तेहने। अधिक तं संभावना जे ओ नास्तिक होथि, आ जं से नहियो तं पूजापाठ, धर्मकर्म नुका क, एकान्त मे करैत छथि। धर्मक विचार ओकरा मे नहि पाओल जाइछ। आचार विचार सं अपवित्र, अभक्ष्य खेनिहार, अविहित बरतनिहार। ऊपर सं भारी दोख ई जे राजनीतिक विचार सेहो रखैत अछि। सेहो कोन तं अधिकतर वामपंथी। 'बुद्ध अ इसन अन्हार' रट'बला मैथिल समाज एहि आलोचक समुदाय पर कोना भरोस क सकैत अछि? तें लोक थूक फेकैत छथि आ बजै छथि जे आलोचना कोनो जोगरक नहि भ सकल।

              जं आलोचकक पोख्ता छवि छैक तं अकानबाक विषय थिक जे एकर मने आलोचनाक कोनो तेहन उपलब्धि छैक की नहि? एखन हाल मे हम फेसबुक पर मिथिला स्टुडेन्ट यूनियनक एक विद्यार्थी आदित्य मोहनक एक पोस्ट देखैत रही। कोनो मित्र हुनका हरिमोहन बाबूक पुस्तैनी घर के वीडियो पठौने रहनि। ओहि घरक उजड़ल-उपटल अवस्था देखि क आदित्य बहुत दुखी रहथि आ अपील केने रहथि जे एहि महान साहित्यकारक घर मिथिलाक तीर्थस्थान थिक आ तें आउ, हम सब सामाजिक सहयोग सं एकर पुनर्निर्माण करी। सत्य पूछी तं आदित्यक ई पोस्ट पढ़ि क हमरा मैथिली आलोचनाक ताकत के अनुमान भेल छल। जेठजन कें मोने हेतनि जे एखन हाल तक हरिमोहन बाबू कें 'हास्यरसावतार' कहल जाइत छलनि। हुनका संबंध मे विद्वान लोकनिक राय की रहनि? पहिलुका जुग मे एकवाक्यीय आलोचनाक चलन रहै। जेना उपमा कालिदासस्य,जेना मुरारेस्तृतीयो पन्था:, जेना सूर सूर्य तुलसी शशी। तहिना हरिमोहन बाबू आ यात्री जी पर रहनि-'स्वच्छंद प्रोफेसर टांग-हाथ, दंतावलि पूर्वहि तोड़ि देल। दुर्भाग्य सं संप्रति मैथिलीक 'पारो' कपारो फोड़ि देल।'  प्राचीन परंपराक एहि आलोचकीय स्थापना सं हमरा लोकनि बूझि सकैत छी आजुक युगक दू प्रमुख शलाकापुरुषक बारे मे हुनका लोकनिक राय की रहनि। आइ जे हिनका लोकनिक प्रति समाजक सहमति-भाव छैक, से मैथिली आलोचनाक एक देन थिक। किरण जीक थोड़-बहुत शिकायत कें छोड़ि देल जाय तं हम सब देखब जे मैथिली आलोचनाक समस्त उपक्रम हरिमोहन झा कें समर्थन देबा मे एकमत अछि। किरण जीक जे शिकायत रहनि सेहो हुनकर व्यंग्य पर नहि, हुनकर हास्य पर रहनि आ तकरा द्वारा हुनकर आरोप रहनि जे हरिमोहन बाबू मे करुणाक अभाव रहनि। किरण जीक शिकायत मे सेहो सार रहनि कारण हम सब देखल जे प्रतिपक्षी जखन हुनका रफा-दफा केलकनि तं हास्यरसावतारे कहि क केलकनि। स्वयं राजकमल चौधरीक प्रतिष्ठा सेहो एहने उपक्रमक प्रमाण थिक। आइ जे हमरा लोकनि पढ़ैत छी जे पचासक दशक मे ललित-राजकमल आदिक कथा-युग मैथिली साहित्य मे आधुनिक युगक श्रीगणेश छल, ने कि अंधकार-कालक आरंभ, मोन रखबाक चाही जे एहि मे आलोचनाक केहन भूमिका छैक। दोसर दिस, आलोचना जे नहि क सकल से काज हेबा सं कोना छुटले रहि गेल तकरो दर्जनो उदाहरण हमरा सब लग अछि। जेना महाप्रकाशक कथा-साहित्य। आलोचनाक नजरि एखनहु नहि पड़ल अछि। जहिया पड़त तं पता लागत जे विश्वसाहित्यक दुर्लभ दृष्टान्त कोना मिथिलामिहिरक पन्ना मे हेरायल छै। मैथिलीक  मैनेजर लोकनि जरूरे आलोचनाक एहि ताकत सं वाकिफ छथि तें हमरा लोकनि देखैत छी जे राजकमल चौधरी पर जखन लिखबाक अवसर अबैत छैक तं ओ लोकनि प्राचीन विश्वविद्यालयीय विद्वत्ताक मूर्ति दिनेश झा कें आगू अनैत छथि, जाहि सं नीक जकां राजकमलक श्राद्ध केल जा सकय। आ से ई कोनो दुर्घटना नहि थिक, सुनियोजित कार्यप्रणाली थिक। एहि सं आलोचना पर लगातार थूक फेकैत रहबाक सुविधा बरकरार रहै छै।

              प्राचीन परिपाटीक विद्वान आ आधुनिक आलोचकक दृष्टिकोण मे जे अंतर छै, प्रसंगवश ताहू बारे मे हमरा लोकनि कें किछु गप करबाक चाही। रमानाथ बाबू भने एकाध ठाम अपना कें आलोचक कहि गेल होथि, मुदा ओ मूलत: विद्वाने छला आ सैह कहबाएब हुनका पसंद रहनि। हुनकर जे लेखनशैली अछि सेहो विद्वाने बला अछि। ओहि ठाम लोकतांत्रिक ढंग सं विमर्शक गुंजाइस नहि छैक, एकर बदला ज्ञाता हेबाक ठसक छै आ ताहि कारणें लहजा उपदेशात्मक छै। निरुपाय भेने आधुनिक लोकनि अपन प्रथम आलोचक के रूप मे रमानाथ बाबूक नाम लैत छथि। आ प्राचीन लोकनि कें आधुनिकक सामना करैत जखन निरुपाय भ जाय पड़ैत छैक तं ओ लोकनि रमानाथ बाबू कें बीच मे ठेलि अनैत छथि। पछिला तमाम वर्ष मे यैह खेल चलैत रहल अछि। मुदा, दृष्टिकोण? रमानाथ बाबू पांच सय सं बेसी पृष्ठ मे अपन विद्यापति संबंधी अध्ययन प्रकाशित करौलनि। ओहि मे विद्यापतिक कुलगोत्र-देवता-गुरु-आश्रय दाता आदि समस्त विषयक विशाल अध्ययन छैक। विद्यापति पर किरण जी सेहो लिखलनि आ रमानाथ बाबूक  अध्ययन मे झोल सेहो देखौलनि। हुनक कहब भेलनि जे विद्यापति कें देखबा लेल मैथिल आंखि चाही। मने इहो जे रमानाथ बाबू मे तकर अभाव छनि। ई 'मैथिल आंखि' शब्द आगू आलोचनाक एक विशिष्ट पारिभाषिक शब्द बनि गेल। ई आंखिबला मैथिल निश्चये रमानाथ बाबूक मैथिल सं भिन्न छल। ओतय जूगल कामति, छीतन खबास कें प्रामाणिक मैथिल मानबाक आग्रह छल। रमानाथ बाबू विद्यापति संगीत पर सेहो काज केलनि। ओ समय छल जहिया मिथिला कें नब नब विद्यापति भेटल रहनि आ सौंसे दुनियां पसरबाक गहमागहमी सं मैथिली समाज भरल छल। पचगछिया घरानाक मांगनलाल खबास गायकीक क्षेत्र मे सौंसे देश मे धूम मचेने छला। मांगनलाल विद्यापति कें सेहो गाबथि, आ से बेस प्रशंसित भ रहल छल। ओ पहिल गायक रहथि जे विद्यापति-गीत कें सोलो गेबा जोग धुन मे बन्हने छला, ने तं एहि सं पहिने स्त्रीगण उत्सव आदि मे आ नटुआ नाच मे एकरा जखन गाबथि, कोरस गाबैत छला। मांगनलाल के देखादेखी रामचतुर मल्लिक सेहो गाबय लागल छला। ग्रामोफोन रेकर्ड पहिल पहिल शारदा सिन्हा के बहरेलनि, से मोन रखबाक चाही जे शारदा जी पचगछिया घरानाक शिष्या रहल छथि। अस्तु। एक विशेषज्ञ अध्येताक रूप मे जखन रमानाथ बाबू लग ई प्रश्न उपस्थित भेलनि जे विद्यापति-संगीतक संरक्षण कोना हो, ओ व्यवस्था देलखिन जे विद्यापतिक गीत कखनहु सोलो नहि गाओल जेबाक चाही आ सदति कोरसे गेबाक चाही। वैद्यनाथ धामक पंडा लोकनि किरतन मे जेना विद्यापति गीत गबै छला तकरा ओ आदर्श रूप मानलनि आ तकर संरक्षणक जरूरत बतेलनि। ऊपर हम रमानाथ बाबूक भविष्य-दृष्टिक बात केने रही। तकर हुनका मे कोना अभाव छलनि से एहि ठाम बूझल जा सकैत अछि। सामाजिक प्रोत्साहनक अभाव मे विदापत नाच लुप्त भ गेल आ स्त्रिगणक कोरस निमुन्न मे पतराइत गेल। वैदनाथ धामक गीत ओकर अपनो किरतन सं समयक अनुसार गायब होइत गेल। आइ विद्यापति संगीत जं बचल अछि तं सोलो गायके लोकनिक उद्यम पर बचल अछि। दोसर दिस 'मैथिल आंखि' के अवधारणा समयक संग भकरार होइत गेल अछि आ हरेक युगक मिथिला अपन आदर्श एहि आंखि ल क ताकि लेत, ततबा पर्याप्त अर्थव्यंजना एहि मे भरल छैक। 



          एहि साल मैथिलीक प्रमुख आलोचक लोकनि मे सं एक मोहन भारद्वाज निधन भेलनि, तं तहिया सं मैथिली आलोचनाक प्रति विवेकी जनक हृदय मे बहुत चिन्ता होइत हमरा लोकनि देखि रहल छी। भारद्वाज जी पूर्णकालिक आलोचक रहथि आ मैथिली आलोचनाक इतिहास मे कैकटा नब स्थापना आ नब आलोचना-भाषाक लेल जानल जाइत रहथि। प्राय: दू दशक पहिने ओ 'सांस्कृतिक चेतना'क अवधारणा निरूपित कयने रहथि, जाहि पर सुभाष चंद्र यादव हुनका पर कटु आलोचना लिखने रहथि। समय साबित केलक जे सांस्कृतिक चेतनावादक अवसान दक्षिणपंथी अधिनायकवादे पर जा क होइत अछि आ एहि तरहें सुभाष जीक चिन्ता बेसी सही साबित भेल। मुदा, ई एक सिद्धान्तक बात भेल। अपन दू प्रमुख आलोचना पुस्तक  मे सं दुनू ओ श्रमजीवी मैथिल संस्कृतिक प्रतिष्ठापन मे लिखलनि। हुनकर लेख सब नब समाजार्थिक संदर्भ मे साहित्य कें देखबाक दृष्टि दैत छल। तें चिन्ता स्वाभाविक अछि कारण ओहि तरहक क्यो आलोचक आइ उपलब्ध नहि छथि। मुदा, हियासि क हमरा लोकनि देखी तं पायब जे जेना भारद्वाज जीक अपन खास विशेषता, खास ध्वनि छलनि, तहिना आनो अनेक लोक अपन अपन खास विशेषताक संग मैथिली आलोचना मे सक्रिय रहल छथि। भीमनाथ झा पुरान परंपराक लोक छथि मुदा अपन खास अंदाज मे नब रचनाशीलता कें जाहि तरहें परिभाषित आ मूल्यांकित करबाक काज ओ केलनि अछि सेहो फेर आन ठाम दुर्लभ अछि। हरे कृष्ण झा आलोचनाक क्षेत्र मे लगभग निष्क्रिय छथि मुदा कहियो कदाल जे हुनकर लेख सब अबैत अछि जे तेहन पारंगामी पाठालोचनात्मकता सं लैस रहैत अछि जे तकरो अन्य उदाहरण दुर्लभ अछि। तहिना सुभाष चंद्र यादव। असल मे, आजादी बादक तमाम समय मे जहिया सं मैथिली साहित्य मे आधुनिकताक प्रतिष्ठापन भेलैक अछि, मैथिलीक तमाम विधा मे काज केनिहार काबिल लेखक सब मे आलोचनात्मक विवेक पूरा प्रस्फुटित भेल भेटैत अछि। कहब जरूरी नहि जे जाहि आलोचनात्मक विवेक कें ल क क्यो लेखक दुनियांक यथार्थ मे सं अपन रचनाक लेल वस्तु तकैत अछि, एक नीक आलोचना लिखबाक लेल सेहो ओही आलोचनात्मक विवेक के खगता रहैत छैक। तें हमरा लोकनि देखैत छी जे मूलतः जे कवि छथि जेना सुकान्त सोम, नारायण जी, वा मूलतः जे कथाकार छथि जेना अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, वा जे कवि-कथाकार छथि जेना विभूति आनंद, देवशंकर नवीन, हुनका लोकनिक आलोचना युगीन ऊष्मा सं  भरपूर तं रहिते अछि, आलोचनात्मक विवेक सेहो प्रखर रहैत अछि। जखन कि विश्वविद्यालयक पेशेवर विद्वान सब मे एहि चीजक सिरे सं अभाव भेटत।

          रमानंद झा रमण एहि सब गोटे मे सब सं अलग छथि। ओ एखनुक समय मे एकमात्र पूर्णकालिक सक्रिय आलोचक छथि। हुनकर विषय विस्तार बहुत व्यापक छनि। प्रमुख क्षेत्र मुदा अतीते छियनि। जेना रमानाथ बाबू मध्यकालक अनेक अज्ञात, अचर्चित कवि सभक उद्धार केलनि, रमण जी अनेक आधुनिक अचर्चित अल्पचर्चित रचनाकार सभक कृति आम पाठक धरि सुलभ केलनि। हुनकर काज मे निरंतरता सेहो रहल अछि जे हुनकर अवदान कें पैघ बनबैत अछि। अतीतोन्मुखताक बन्हन कें तोड़ि क ओ युगीन रचनाशीलता कें विश्लेषित करबाक प्रयास सेहो केलनि अछि जकरा हुनकर दर्जनो निबंध मे देखल जा सकैत अछि। मुदा रमण जीक दूटा सीमा छनि जाहि कारणें ओ बन्हन तोड़ि क' बहरा नहि पाओल छथि। एक तं नव रचनाशीलताक प्रति अधिक काल असहमतिक स्वर, दोसर अपन रुचि कें अंतिम प्रमाण मानि लेब। एहि पर विस्तार सं कहियो गप हो तं नीक।

          आइ स्थिति एहन देखाइत अछि जे पूर्णकालिक आलोचकक भरोसें मैथिली आलोचना कें तहिना नहि छोड़ल जा सकैत अछि जेना विश्वविद्यालयीय पेशेवर आलोचनाक भरोसें नहि छोड़ि सकैत छी। हम देखैत छी जे आलोचनाक रैखिक विकास तं खूब भेल अछि, क्षैतिज विकास मे अवश्य कमी अछि। आलोचना मे कोनो एक नवीन अवधारणा एलाक बाद अनेक दृष्टि सं, अनेक आयाम कें ल क ओकर बारंबार व्याख्याक जरूरत रहैत छैक। अक्सरहां असहमति आ विवादक विना कोनो अवधारणा अपन पूर्ण प्रस्फुटन पर नहि पहुंचि सकैत अछि। एहि सब काजक लेल अनेक व्यक्ति चाही। तकर अभाव अवश्य अछि। एक सं एक स्थापना अबैत छैक आ से किताबक, पत्रिकाक पन्ना मे दबल रहि जाइत छैक

           जे लोकनि हल्ला करैत छथि जे आलोचना एखनो नाबालिग अछि से जं हल्ला करबाक बदला ओहि स्थापनाक विरुद्ध एक टिप्पणी लिखि क प्रकाशित करौने  रहितथि आ सैह आनो लोक करतथि तं कहिया ने ई बालिग भ गेल रहैत। वैह बात अछि। हमही सब एकरा अपन अकर्मण्यता सं नाबालिग बनेने छियैक आ हमही सब भोकरै छी जे ई नाबालिग अछि।

           मैथिली आलोचना कोन तरहें अपन स्पष्ट छवि आ शाफ स्वरूप बना चुकल अछि तकर दृष्टान्त लेल हम नवतुरिया लोकनिक लेखन दिस संकेत करब। जाहि नवागंतुक लोकनिक दृष्टि एखन साफ नहि भेलनि अछि आ ने पक्ष मजगूत, ओहो  जखन वैचारिक गद्य लिखै छथि तं आधुनिक आवाज मे, आलोचनाक शैली आ शब्दावली अपनाबैत बजबाक कोशिश करैत छथि। ई अपना आप मे एकटा साक्ष्य थिक जे मैथिली आलोचनाक स्थिति ओते दुर्गत नहि अछि जते भाइ लोकनि प्रचारित करैत छथि।

           एतय हम एकटा सूची राखय चाहै छी जाहि मे आजुक समयक चुनौती कें उठा सकबा मे सक्षम किछु लोकक नाम छैक। पहिल पंचक मे रमानंद झा रमण छथि, जिनकर अतंद्र अन्वेषकता कैक बेर हमरा लोकनि कें रमानथ बाबूक स्मरण करा जाइत अछि। विभूति आनंद छथि जे एक नब तरहक आलोचना-भाषा, संस्मरणात्मक आलोचना-भाषाक अन्वेषक आ प्रयोक्ता छथि। संपूर्ण ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मे युगीन साहित्य कें बुझबाक हो तं अशोक छथि, जे मैथिल आंखिक व्यापकताक संधानी छथि। युगीन परिवेश कें रचना कोना अपना संग जज्ब केने रहैत छैक आ तकरा अपन अभिप्राय मे परिणत करै छै, ताहि पर देशंकर नवीनक काज देखबा जोग अछि। तहिना, रचनाक मूल पाठ अपना भीतर कोना हजारो तरहक सामाजिक संवेदना आ तकर अन्तर्कथा धारण केने रहैत छैक ताहि पर शिवशंकर श्रीनिवासक मूल्यवान काज अछि। मैथिलीक ओ पहिल आलोचक छथि जे मूलतः कथालोचकक पहचान बना सकल छथि। दोसर सूची मे पांचटा एहन युवा रचनाकार छथि जे आन आन विधा मे काज करितो समय समय पर अपन आलोचनात्मक लेखन सं आश्वस्त करै छथि। एहि मे छथि पंकज पराशर, श्रीधरम, कमलमोहन चुन्नू, रमण कुमार सिंह आ अजित आजाद। सारंग कुमार आदि सेहो एहि मे शामिल भ सकै छथि जे पहिनेक अपन लेखन सं अपन आलोचकीय क्षमताक प्रति आश्वस्त केने छथि। कहल जाय तं चुनौती उठेबाक असली जिम्मेवारी हिनके लोकनि पर छनि। तेसर सूची मे पांचटा एहन नाम छथि जे मैथिलीक नवागंतुक रचनाकार छथि, आन आन विधा मे लिखै छथि आ जिनकर आलोचकीय क्षमता दिस हमर ध्यान गेल अछि। एहि मे छथि अरुणाभ सौरभ, चंदन कुमार झा, रघुनाथ मुखिया, विकास वत्सनाभ आ ।  ई युवा लोकनि जं अपन आलोचनात्मक क्षमता संग जं जतन करथि तं अपना जे रचनात्मक लाभ हेतनि से तं हेबे करतनि, मैथिली आलोचनाक सेहो गहमागहमी बढ़तैक। 



         अपेक्षाक जहां धरि बात छै, से कोनो अलग सं होइत हो से हमरा नहि बुझाइत अछि। स्थिति जे अछि से सैह अपेक्षा दिस इशारा करैत रहैत छैक। जतय स्थिति कमजोर देखै छी, ओतय सब गोटें मिलि क जोर लगा दियैक, सैह भेल अपेक्षा। अपेक्षा तं हमर सब सं पहिल यैह अछि जे मैथिली आलोचनाक अतीतगामिताक स्वभाव कें हम सब बदली। किछु गोटे के अतीत मे गेनाइ सार्थक होइत छैक। जेना मोहन भारद्वाजक डाकवचन लग गेनाइ। मुदा, मात्र एही लेल हम अतीत मे जाइ जे आलोचनाक टूल्स तहियेक बनल छै, आगूक बनले नहि छै, एकरा हम पथभ्रष्टता बुझैत छी। यदि निकष(टूल्स) के नमूना उपलब्ध नहि छै, तं हमरा बनेबाक चाही। असगरे बनायब जं पार नहि लगैत हो तं जतबा बना सकै छी, बना क अगिला कें बढ़ा देबाक चाही। 

         दोसर बात जे हमरा सब कें ई अपसोच मोन सं निकालि देबाक चाही जे मैथिली मे पूर्णकालिक आलोचक नहि अछि। असल मे युग एहि हिसाब सं मोड़ लेलक अछि जे आगू पूर्णकालिक आलोचक होयबो मुश्किल अछि। क्रिएटिव राइटिंग बेसी चोख भेलैए आ से प्रतिभाशाली सब कें सिद्दत सं आकर्षित करै छनि। आलोचना के कोनो शिक्षा नहि छै। एते एते विश्वविद्यालय मे एते एते शिक्षक मैथिली पढ़ा रहल छथि मुदा ढंग के एकटा आलोचक नहि तैयार भ' सकल। जे अबैत छथि तिनकर साहित्यक समझ क्रिएटिव राइटक स्तर सं बहुते बहुत नीचां रहैत छनि। दोसर छै जे आलोचना लेखन मे लेखक कें बरक्कति नहि छैक। आलोचक कें नापसंद कयल जाइ छै। आलोचना विधा कें द्वितीय श्रेणीक विधा मानल जाइछ। ओहि मे सम्मान नहि छै। देखबे केलहुं जे मोहन भारद्वाज सन के आलोचक कें साहित्य अकादेमी अन्तो अन्त धरि पुरस्कार नहिये देलक आ अपन नकारापन के, नासमझी के सुंदर उदाहरण प्रस्तुत केलक। मोहन भारद्वाजक परोक्ष भेला सं चिन्तित तं सब क्यो छी, मुदा हमरा सभक भाषाई प्रबंधन कोन तरहें सुधरय से नहि क्यो क पाबि रहल छी।     

           ई एक बात। दोसर जे हरेक क्रिएटिव लेखक कें आलोचना सेहो जरूर लिखबाक चाही। नहि लिखबाक पाछू भय रहैत छैक अपना छुटि जयबाक। अपन नाम लिय' तं सेल्फ प्रोमोशन जकां, तुच्छ काज जकां लगै छै। नहि करियौ तं अपना प्रति अपने कयल अन्याय जकां लगै छै। तें ई भय बहुत वाजिब थिक। मुदा हम तैयो कहब जे लिखबाक चाही कारण आलोचना लिखबाक सुख एक अलग तरहक सुख होइत छैक। ई सुख छै जे हम अपन युग कें देखि रहल छी। द्रष्टा छी हम तं हमरा अपने ओहि दृश्य मे किएक हेबाक हेबाक चाही? ई सुख हमरा आलोचना द सकैए। बाकी आगूक लोक जखन देखता तं अपन सुधारि क देखता। ई हुनक टेन्सन छियनि। हमरा लिखबाक चाही।

           नब सं नबो लोक कें आलोचना लिखबाक चाही। बाधा जे पैदा करैत अछि से से छी अल्पज्ञताक भय। आलोचना लिखबा सं पहिने खूब पढ़ि लेबाक मोन करै छी। आब झंझट ई छै जे पढ़बाक आनंद एक अलगे संप्रदाय के आनंद थिक। ओकरा सामने मे लिखनाइ तुच्छ। एहि प्रकारें अल्पज्ञताक भय आलोचनाक उत्साह कें ध्वस्त क दैत छैक।  तें युवा कें अपना पीढ़ीक बारे मे लिखबाक चाही। ओतय अल्पज्ञताक खतरा न्यून रहै छै। एहि सं असली फैदा ई छै एहि सं आलोचनाक वातावरण सुरभित लगै छै। क्यो आइ पर लिखि रहलाहे, क्यो पछिला दशक पर, क्यो क्यो अतीतो मे आवाजाही बनौने छथि। एखन जे मुरदनी छाएल छै तकर एहि सं निस्तार होयत। 

           तहिना, पुरान प्रतिष्ठित कैक गोट रचनाकार एम्हर फेर सं सक्रिय भेल छथि जेना ललितेश मिश्र, महेन्द्र, गंगानाथ गंगेश आदि। हिनका लोकनिक आलोचकीय क्षमता अचूक छनि। रामदेव झा अपन लेखन आब स्थगित क चुकल छथि। मुदा, कतेक नीक होइत जे क्यो गोटे तैयारी क क हुनकर आ हुनका सन आनो लोकक इन्टरव्यू करितथि। हमरा सभक जबाना मे नब लेखक पुरान रचनाकार सब सं बराबर इन्टरव्यू लेथि, तकर प्रकाशन सं सबहक उपकार होइत छल। सुभाष चंद्र यादव, सुकान्त सोम आ हरे कृष्ण झा आइ लिखि नहि पाबि रहल छथि तं अपेक्षा अछि जतबे होइन लिखथु।

           मोहन भारद्वाज एक समय मे 'मैथिली आलोचना' नाम सं एक पत्रिका निकालब शुरू कयने रहथि, से मोन पड़ैत अछि तं होइत अछि जे एहि खगता कें सेहो क्यो गोटे उठाबथु।

           मैथिली आलोचना कें बेकार आ आलोचक कें पूर्वाग्रही कहब बहुत आसान छै। ततबे आसान जतबा गांधी जी कें बैमान कहब। क्यो उनटि क' उपराग देबय नहि आओत, ने गांधी जी दिस सं ने आलोचना दिस सं। मुदा, मोन राखल जाय, यैह समय होइ छै जखन विवेकी जन कें मूल जड़ि पकड़य पड़ैत छै आ अपन भूमिका तय करय पड़ैत छैक।