Monday, May 16, 2022

विद्यापति कें सही-सही देखि सकय, ताहि आंखिक एखनो प्रतीक्षे अछि

 तारानंद वियोगीक संग किसलय कृष्णक संवाद


साहित्य लेखन मे अहाँक आगमन कहिया आ कोना भेल ?


ता न वि-- अपन गामक संस्कृत स्कूल मे प्राय: पूर्व मध्यमाक विद्यार्थी रहल होयब, जखन काव्यलेखन दिस हमर प्रवृत्ति भेल। सरड़ा गामक पं. इन्दुनाथ ठाकुर हमर गुरु रहथि जे मैथिली लेखन लेल हमरा प्रेरित केलनि। हाइ स्कूलेक विद्यार्थी छलहुं जखन मिथिला मिहिर मे हमर कविता, लेख आ कथा पहिल बेर छपल।

           लेखनक दुनिया मे हमर प्रवेश किताबक दुनिया सं, किताब पढ़ैत भेल। ओही उमेर मे हम हजारो किताब पढ़ि गेल रही। हम कतहु लिखनहु छी जे राजकमल जीक पित्ती मांगनि चौधरी-सन अजूबा पढ़ाकू बुजुर्ग संग हमर दोस्ताना छल। हजार पेजक किताब पढ़बा मे हुनका मुश्किल सं तीन घंटा लागनि। हुनके दुआरे राजकमलक पुश्तैनी सरस्वती पुस्तकालय मे हमर प्रवेश भेल छल। एहन पढ़ाकू सब आरो हमरा गाम मे कैक गोटे रहथि। ओइ दिन मे ट्यूशन सं जे हम कमाबी लगभग सबटा पाइ किताब किनबा मे उड़ा दिऐक। तें हिनका लोकनि संग हमर सम्बन्ध बराबरी पर छल। ओ नव किताब हमरा पढ़य देथि तं हमहूं नव-नव किताब हुनका सब कें देबाक स्थिति मे रहै छलहुं।

           एहू समय सं पहिनेक बात छी जे हम सब बमपार्टी नाम सं एक कीर्तन-मंडली तारास्थान मे कायम केने रही। अनेक गीतकारक गीत सब गाबियनि। ताही बीच हमरा एक दिन पता लागल जे हमरे गौआं थिका कपिल जी, मने कपिलेश्वर मिश्र, जिनकर लिखल गीत हम सब गाबै छी। ओ हमरा सं तीन-चारि साल सीनियर छला। हुनका सं भेंट करय गेलहुं तं बहुत आश्चर्य लागल छल आ भेल जे जं ई लिखि सकै छथि तं हमहू लिखि सकै छी। ओहि समयक बहुतो रास हमर गीत एहन अछि जकर साहित्य मे कोनो हिसाब नै छै मुदा हमरा इलाका मे एकरा एखनो अहां गाओल जाइत सुनि सकै छी।


मैथिली साहित्य मे कोन लेखक/कविक रचना सँ प्रभावित भेलहुँ अहाँ ?


ता न वि-- मैथिली पढ़बा दिस हमर प्रवृत्ति कने बाद मे जा क' भेल। मधुप जीक झांकार, योगा बाबूक नाटक मुनिक मतिभ्रम, श्यामसुंदर झाक उपन्यास दाम्पत्य-सौरभ, रमानाथ बाबूक उदयनकथा, बलदेव मिश्रक रामायणशिक्षा-- ई सब किताब हमरा कोर्स मे छल। प्राय: तखने हमरा समझ मे इहो बात आबि गेल छल जे अपना समयक सर्वश्रेष्ठ कृति सब जे होइए तकरा कोर्स सं बाहरे रहबाक रहै छै। तें, मोन पड़ैए--यात्री जीक कविता जखन हम पहिल बेर पढ़ने रही, पन्द्रह-सोलह के रहल होयब तहिया, एकटा अननुभूत काव्य-संसार मानू हमर प्रतीक्षा मे छल, जकर द्वार एहि घटनाक संगहि हमरा लेल अनावृत्त भ' गेल छल। एहन किछु कविता सीताराम झा लग मे सेहो भेटल छल, द्विजवर जीक कोइलीदूती मे सेहो। मुदा, राजकमल कें जखन पढ़लियनि तकरा बाद तं हम वैह नै रहि गेल रही जे पहिने, मने तरुणावस्था मे रही।


एकदिसि बिहार सरकारक व्यस्ततम सेवा आ दोसर दिसि साहित्य सृजन ! समयक संतुलन कोना बनबैत छी ?


ता न वि-- हम अपना जीवन मे जे किछु प्राप्त क' सकलहुं किसलय, शपथपूर्वक कहै छी जे ई सब साहित्यक बदौलत छल। मोन पड़ैए, बीपीएससी मे चयनक बाद जखन एक पत्रकार हमरा पुछने रहथि जे एकर श्रेय ककरा दै छियै आ हम कहने रहियै जे कविता कें, तं बेचारे कें लागल रहनि जे कविता नामक कोनो महिला हेती। जखन कि ई असल मे एके साधै सब सधे के उदाहरण मात्र छल।हम अपन जीवन साहित्य कें देलियै, बांकी जीवनक सब जरूरति साहित्य पूरा केलक। साहित्य छोड़ि क' आन कोनो महत्वाकांक्षा कहियो नै रहल, तें समयक संतुलन बनेबाक समस्ये कहियो पैदा नै भेल। काजक बेर मे काज आ बांकी समय मे लिखापढ़ी, एहि क्रम मे कहियो गंभीर व्यवधान आएल हो, से कहियो नै भेल। हं तखन, अइ मे सब सं पैघ योगदान जं ककरो कहबै तं से हमर परिवार छल। अहां कें आश्चर्य लागत, आन-आन लोकक गार्जियन जतय अइ बातक लेल अक्सरहां दुखी होइ छथि, हमर कविता-लेखन सं हमर पिता अपना कें गौरवान्वित महसूस करथि। मिहिरक कोनो अंक मे हमर किछु छपय तं तकरा बरसो बरस बाद धरि पिताक सिरमा तर मे ओ अंक सब राखल देखल जा सकै छल। पिताक बाद यैह स्थान हमर पत्नी ल' लेलनि।


मैथिली साहित्य मे बेर बेर ब्राह्मण - गैर ब्राह्मणक प्रश्न उठैत अछि । आरोप इहो लगैत अछि, जे एकटा क्षेत्र विशेषक सवर्ण साहित्यकार लोकनि मैथिली केँ हथिया कय रखने अछि । अहाँक अनुभव एहि सन्दर्भ मे की कहैत अछि ?


ता न वि-- हमर जे अनुभव अछि से अहांक बातक समर्थन करैत अछि। कथनी आ करनी मे फरक कें सब सभ्यता मे खराब बात मानल गेल अछि। मुदा, अपना ओतय बुझू जे यैह चीज संस्कारवान हेबाक प्रमाण होइत छैक। मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, ई बात ब्राह्मणे लोकनि स्थापित केने रहथि। मने मैथिल महासभा मे मैथिली कें ग्रसि क'। गोप महासभा जखन दावा केलकै जे भाइ, मैथिली तं हमरो सभक भाषा छी, ताहि मोताबिक तं हमरो सब कें महासभाक सदस्यता भेटबाक चाही। अपना सभक इतिहास कते गंदा अछि, तकर की चर्चा करी! मानक मैथिलीक फंदा ऊपर सं लादल अछि। आइ अहां मठोमाठ लोकनिक मुंहें सुनब, मैथिली तं सबहक भाषा छियै। मुदा, ई मात्र हुनकर कथनी छी। करनी जखन देखबै तखन असलियत पता लागत। अंगिका-बज्जिका आन्दोलन असल मे की छी? एही हथियेबाक विरुद्ध स्वाभिमानक संघर्ष छी। एहन घटनाक्रम आगू अहां और देखबै जं हथियेबाक ई हुंठ षड्यंत्र बंद नै भेल। एकरा बंद हेबाक कोनो लक्षण अइ दुआरे हमरा नै देखाइए जे आइ जते जे क्यो मैथिलीक ठिकेदार सब छथि, किनको मे ने तं भाषा आ भूमिक प्रति कोनो भविष्यदृष्टि छनि, ने मैथिल संस्कृति के वास्तविक समझ। अपन कथनी मे जे सब सं पैघ मातृभक्त क' क' बांहि फड़कबैत देखल जेता, करनीक विश्लेषण करब तं संभव जे हुनके सब सं पैघ मातृहन्ताक स्थान पर राखय पड़य।

             


की अहाँ केँ नहि लगैत अछि जे विद्यापतिक लेखन खाँटी मैथिली लोकभाषा मे भेलन्हि, जे एखनहुँ समाजक एकटा पैघ हिस्सा मे प्रयुक्त होइत अछि , मुदा विद्यापतिक बाद ओ लोकभाषा केँ रचनाकार लोकनि संस्कृतनिष्ठ करैत गेलाह आ एकटा सीमित क्षेत्र आ वर्ग मे प्रयुक्त शैली केँ मानक घोषित करैत शेष मिथिला पर लादि देल गेल ?


ता न वि-- हरेक भाषिक भूगोलक अपन-अपन जातीय कविता होइ छै किसलय। ई चीज खाली लैटिन कि चीनी, तमिल कि बंगले के हेतै, से नहि। ई चीज मिथिला के सेहो हेतै। दुर्भाग्यक बात छी जे आइ धरि ने कोनो इतिहासकार के ध्यान अइ दिस गेलनि ने आलोचक के। फल भेल जे मिथिलाक जातीय कविता रूप सब कें नौजवान कवि सब की बुझितथि जे ओ आन-आन देशीय जेना जापानक जातीय कविता(जेना हाइकू) कें बुझबा मे अपस्यांत रहला। कते बात तं उनटे बुझैत रहला। जेना, छंद मैथिली कविताक जातीय वस्तु नहि थिक विजातीय वस्तु थिक। एकर बदला जातीय वस्तु लय छी। मुदा पंडी जी लोकनि उनटे बतौता। विद्यापतिक कविता लय मे छनि, छंदक हिसाबें देखबनि तं हजार गलती भेटत। मुदा, ताहि सं की?

           विद्यापति पहिल व्यक्तिकवि छला जे मिथिलाक जातीय कविता कें लिखबा योग्य भाषा मे ग्रथित केलनि। स्वाभाविक छल जे हुनकर कविता मे कथनशैली, शब्दावली, अभिव्यक्ति-भंगिमा सब कथू ठेठ मैथिल छल। जातीय साहित्यक स्वभाव होइ छै जे रचना तं कालान्तर मे बचल रहि जाइत अछि मुदा रचनाकार तिरोहित भ' जाइत अछि। सैह विद्यापतियोक संग भेलनि। हुनकर भणिता तं तते सर्वव्यापी भेल जे सैकड़ो कवि हजारो पद भनहि विद्यापति लगा क' लिखलनि। मुदा, विद्यापति स्वयं आदमी सं मिथक मे परिवर्तित भ' गेला। उगना आ गंगा आदिक किंबदन्ती एकर प्रमाण छी। अहां देखबै जे 1860, जकरा इतिहासकार लोकनि आधुनिक युगक आरंभ मानैत छथि, अबैत-अबैत विद्यापतिक व्यक्तित्वक जाबन्तो परिचिति मिथिलाक बुद्धिजीवी लोकनि कें विस्मृत भ' चुकल छलनि। तकर प्रमाण अहां बिहारीलाल फितरत के इतिहास-पुस्तक 'आइना-ए-तिरहुत' (1881) मे पाबि सकै छी जतय हुनका बड़ भारी नैयायिक बताओल गेलनि अछि आ एही ख्याति सं बिसफी गाम दान मे पबैत देखाओल गेल अछि। वास्तविकता ई अछि जे विद्यापति न्याय पढ़लनि वा लिखलनि तकर कतहु कोनो साक्ष्य नै अछि, स्वयं पं. गोविन्द झा सं पूछि लियनु। दोसर दिस अहां देखबै जे रमानाथ बाबू आदिक सब सं बेसी उद्यम अइ बातक लेल भेलनि जे विद्यापतिक व्यक्तित्व ठाढ़ कयल जाय। ई की छल? 'लोक' के संपति कें छीनि क' शास्त्रीयताक कठघरा मे बंद करबाक मानक प्रयास छल।

           स्थिति ई अछि जे जकरा ओ लोकनि 'मानक मैथिली' कहै छथि, स्वयं विद्यापतिये ओइ मे अंटि नै पबै छथि, हुनकर कोनो ने कोनो अंग ओइ सांचा सं बाहर भ' जाइत छनि। किछु विद्वान तं एहनो धृष्टता कइये चुकल छथि जे विद्यापतिक प्रयोग कें अशुद्ध मानि क' ओकर शुद्धीकरण धरि क' चुकलाहे। हम पुछै छी, मानक क्षेत्रक कोन ब्राह्मण पुरुष अपन स्त्री सं अइ भाषा मे गप करै छथि जे 'तोहें जे कहै छह गौरा नाचय, हम कोना नाचब हे'? आ कि पंचग्रामक कोन स्त्री कुदृष्टिक विरोध करैत एना कहि सकै छथि जे 'जञो दिठियौलए, ई मति तोर/ पुनु हेरसि हो खापड़ि मोर'। मोन राखू, चोट भने पनही सं पिटला पर बेसी लगैत हो, मुदा स्त्री-हाथक खापड़ि जं चानि पर पड़ि जाय तं पुरुषसत्ताक मानमर्दन बेसी ठीक ढंग सं होइ छै। खापड़ि कोन स्त्रीक अस्त्र छिऐक, मोन पाड़ि लिय'।

           की कहू, विद्यापति पर तं पचीस हजार पेज सं ऊपरक सामग्री विद्वान लोकनि लिखि चुकला अछि, मुदा विद्यापति कें सही-सही देखि सकय, ताहि आंखि के एखनो प्रतीक्षे अछि। आ एहि बेचारी मैथिलीक तं ई दशा भेल जे जकरा सिद्ध लोकनि, गैरब्राह्मण कलाकार लोकनि संस्कृतक प्रतिरोध मे आविष्कृत केने छला तकर पर्यवसान संस्कृतक पिछलगुआ भ' क' भ' रहल अछि। पंडित कवि लोकनि तं साफ-साफ लिखने छथि-- भाषा-सौन्दर्यक गति न आन। पिछलगुआ बनने बिना मैथिलीक कोनो आन गति नै छै।


मैथिली साहित्यक वर्तमान परिदृश्य केँ कोन रुपेँ देखैत छी, खासकय सोशल मिडिया माध्यमें धर्रोहि लागि रहल रचना संसार केँ ?


ता न वि-- कहबी छै जे अज्ञानी के हजार अपराध माफ रहैत अछि। जं क्यो मैथिली मे लिखैत छथि तं हुनका लेल सब सं जरूरी अछि जे हुनका लग मिथिलाक अपन एक विस्तृत समझ हेबाक चाही। दोसर जे मैथिली साहित्यक परंपरा, पृष्ठभूमि आ विशिष्ट लेखन सं घनिष्ठता हेबाक चाही। सोशल मीडिया कें अइ अर्थ मे तं हम बहुत उपयोगी मानै छी जे अभिव्यक्ति कें लोकतांत्रिक बनेलक अछि। मुदा, प्रश्न अछि जे अहां लग बात की अछि, ओ बात समाज आ साहित्यक लेल मूल्यवान कते अछि? आइ धरि जे मैथिली लेखक लोकनि लेखन क' चुकल छथि, ताहि मे अहां नवीन की क' रहल छी?

           मुदा दुखक बात ई अछि जे मैथिलीक माहौल एते गंदा बना देल गेलैए जे अइ सब बात कें सोचब आउटडेटेड भ' गेल छै। कचड़े लिखने सं जं किनको यश, सम्मान आ पुरस्कार भेटैत हुअय, तं अहां कहू जे के अभागल हेता जे एते तैयारीक संग साधनापूर्वक मैथिली लिखबा लेल उद्यम करता?


कथा, कविता, समीक्षा आ इतिहास मे समानांतर अहाँक कलम चलैत रहल अछि । सभ सँ प्रिय विधा कोन थिक ?


ता न वि-- हम अपना कें मूलत: कवि मानै छी। बांकी समस्त लेखन कें अहां हमर कवि-कर्मक विस्तार मानि सकै छी।


साहित्य अकादमी आ आन छोट पैघ पुरस्कार प्रक्रिया केँ कोन रुप मे देखैत छी ?


ता न वि-- मैथिलीक स्थिति कें देखैत बात करी तं श्रेष्ठ लेखन आ पुरस्कार दुनू बिलकुल अलग-अलग विपरीत ध्रुवक चीज छी, आ अधिकतर एक दोसरक विरोधी दिशा मे चलैत अछि। दस बरस पहिने कहियो एहनो भ' जाइ जे श्रेष्ठ कृति कें सेहो पुरस्कार भेटि गेल करैक। आइ तं सपनो मे अहां एकर कल्पना नै क' सकै छी। एकर कारण थिक दोषपूर्ण चयन-प्रक्रिया जकरा जानि-बूझि क' अपनाओल जाइत अछि। असल मे पुरस्कार जकरा हाथ मे रहै छै से अपने तं सृजनात्मक होइत अछि नहि, तें लेखनक गुणावगुण कें परखबाक कोनो दृष्टियो ओकरा मे नै होइछ। एकर स्थान पर ओ तुच्छ मनोवृत्ति सब सं संचालित होइछ आ पुरस्कार एक व्यवसाय मे बदलि जाइछ जकर जं बहुतो गंहिकी होइ छथि तं उखाड़-पछाड़ के ओकर अपन स्वतंत्र राजनीति होइ छै। 

            अकादमी आ संस्था सभक पुरस्कारक संग जं ई संकट छै तं दोसर दिस व्यक्तिगत प्रयास सं जे पुरस्कार संचालित होइत अछि तकरो स्थिति अहां ठीक नहि कहि सकै छियै। हुनका सब लग श्रेष्ठ लेखन कें खोजि सकबाक ने हुनर रहै छनि ने इच्छाशक्ति, तें अधिकतर अहां देखबै जे एहन पुरस्कार सब मैथिलीक श्रेष्ठ लेखनक विकास मे अपन कोनो योगदान नै रचि पबैत अछि। यात्री जी बड़ बढ़ियां कहथिन जे पुरस्कार की छी? गोबरक चोत छी। गाय कें की पता जे घरबे कोनो कर्मक छथि कि नहि, ओ तं धप सं अपन चोत खसा देत, सैह हाल अइ पुरस्कार सभक अछि। नीक बात ई थिक जे एहि दुष्चक्र कें तोड़बाक कोशिश सेहो भ' रहल छै। लक्ष्मी-हरि उपन्यास सम्मान कें अहां एकर दृष्टान्तक रूप मे देखि सकै छी।


मैथिली मे पाठकीयताक संकटक की कारण देखैत छी ?


ता न वि-- दशको सं ई सर्वसम्मत बात मानल जाइत अछि जे भारत मे साहित्यक सब सं बेसी पाठक बिहार मे बसै छथि आ बिहार मे मिथिला-क्षेत्र एहि मे सर्वोपरि अछि। मुदा, दुखक बात जे ई मैथिल पाठक लोकनि आन-आन भाषाक साहित्यक हाथें बन्हकी लागल छथि। उन्नत स्तरक जे साहित्यिक पाठक छथि, एक तं हुनका मैथिली पढ़ब ओरियाइत नै छनि, दोसर घटिया लेखनक दबाव मैथिली पर तेहन भारी छै जे एक किताब उनटा गेलाक बाद फेर हुनकर प्रवृत्ति मैथिली पढ़बा दिस हेतनि तकर कोनो संभावना नै बचैत अछि। दोसर दिस, मैथिली मे लेखन केनिहार लोकनि अपने सेहो तते बापुत छथि जे पाठकीयताक दुर्बलता दूर क' सकै छथि। मुदा, जे अपने मैथिलीक लेखक छथिहे से एकर पाठको किए हेता? आ जे स्वयं शिक्षके छथि मैथिलीक, हुनका फेर सं मैथिली पढ़बाक कोन काज? एहनो स्थिति मे मुदा आशाक किरण छथि ओ पाठकवर्ग, जे अपन अस्मिताक खोजवश मैथिली पढ़बा सं जुड़ला अछि। उन्नत बौद्धिक स्तरक यैह पाठकवर्ग भविष्य थिका, मुदा हुनका टारगेट क' लिखैत अहां कें कम्मे मैथिली लेखक भेटता।


नवागन्तुक रचनाकार सभ लेल की कहय चाहबनि ?


ता न वि-- एकटा खिस्सा सुनबय चाहबनि। गुलशन नंदा कें एक बेर तेख चढ़लनि जे एहन पोपुलर राइटर छथि ओ, लाखो पाठक छनि, दर्जनो फिल्म छनि मुदा साहित्यकार वर्ग मे हुनकर कोनो गिनतिये नहि छनि। हिन्दीक वरिष्ठ लेखक सब सं भेंट क' क' ओ अलख जगेबाक प्रयास मे लगला। दिनकर जी तं हुनका सं गप्पो करब स्वीकार नै केलखिन, डांटि क' भगा देलखिन। मुदा, हजारीप्रसाद द्विवेदी लग गेला तं नीक स्वागत भेलनि। पुछलखिन-- हम एते लिखने छी, मुदा हमरा क्यो साहित्यकार मानिते नहि छथि, जखन कि अहां कें लोक बड़ पैघ लेखक मानै छथि। एना किएक? हजारी बाबू कहलखिन-- असली कारण तं प्राय: हमरो नै बूझल अछि तखन भ' सकैए जे यैह कारण हो जे अहां बेसी लिखने छी जखन कि हम बेसी पढ़ने छी।

               दोसर बात हम कहबनि, जं वास्तव मे साहित्य-क्षेत्र मे किछु पैघ करबाक होइन तं पुरस्कारक बदला मे निन्दा आ विरोध के उम्मीद राखि क' चलथि। हरेक जड़ समाज जाग्रत-जीवन्त लोकक विरोधे करैत आएल अछि। तकर उदाहरण मिथिला समाज मे सेहो कोनो कम नै छैक। काल्हियो, आइयो।

               कोनो लेखक अपन चरम सार्थकता कखन प्राप्त करैत अछि? तखन, जं हुनकर लिखलाहा सं ओइ भाषाक रकबा पैघ हुअय, ओकर सामर्थ्य बढ़य, ओकरा मे नवीन क्षमता उत्पन्न हुअय। स्वाभाविक बात छै जे जखन अहां कें बुझल रहत जे मैथिलीक लेखक लोकनि कोना-कोना मैथिलीक सामर्थ्य बढ़ौलनि अछि, तखने अहां लग ओ बात उद्घाटित होयत जे ओ कोन वस्तु छै जकरा आइयो धरि क्यो नै क' सकला, आ अहां तकरे करबाक लेल कलम उठेने छी। नवागन्तुक लोकनि कें एहि तरहें सोचबाक चाहियनि।


मैथिली पत्रकारिताक वर्तमान स्वरूप केहेन हेबाक चाही ? दैनिक 'मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश'क प्रकाशन पर किछु कहबैक ?


ता न वि-- लोकल आ ग्लोबल के समाहार बैसबैत कोना सत्यक संग भेल जा सकैत अछि, सैह आइ पत्रकारिताक सब सं पैघ चैलेंज छैक। मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश ठीक दिशा मे अपन यात्रा क' रहल अछि। एक सुझाव जे हम देबय चाहबनि, एहि मारुख समय मे सकारात्मक होयब तं जरूर कठिन छै लेकिन संपादक लोकनि ख्याल राखथु जे कोनो दिनका अखबार अपन सकल प्रभाव मे अपना पाठक कें कहीं आरो बेसी अवसादग्रस्त तं नै करैत अछि!


सम्प्रति कोन विषय वस्तु पर लेखन चलि रहल अछि ?


ता न वि-- एखन हम अपन पुस्तक 'मैथिली कविताक हजार वर्ष' कें अंतिम रूप देबा मे लागल छी। ई किताब अंतिका प्रकाशन सं दू खंड मे आबि रहल अछि। एकरा संग हम अपन पहिल उपन्यासक तैयारी मे सेहो लागल छी। ई महान शास्त्रीय गायक पंडित मांगनलाल प्रसिद्ध मांगनि खवासक बारे मे अछि जे विद्यापति गीत कें चलन मे अनबाक लेल ओ कतेक भारी संघर्ष केलनि आ कतेक विरोधक हुनका सामना करय पड़लनि। बीसम शताब्दीक लगभग आरंभिक पचास वर्षक मिथिलाक गति-कुगति एहि मे आओत।


अपन व्यस्ततम समय मे सँ समय देबाक लेल आभार आ आइ जन्मदिनक अवसर पर मैपुप्र परिवार दिस सँ आत्मीय शुभकामना


ता न वि-- सादर आभार।


Tuesday, April 12, 2022

रेणु और नागार्जुन :: तारानंद वियोगी

 

रेणु और नागार्जुन

तारानंद वियोगी

रेणु की वह तस्वीर आपने जरूर देखी होगी, औराही हिंगना वाली, जिसमें वह खेत की गीली पांक में अपने साथियों के साथ धान रोपने उतरे हैं। कुल जमा सात लोग हैं। सबके हाथों में धान का बिचड़ा है और कुछ नया करने का रोमांच भी। खुद रेणु ने अपनी लुंगी समेटकर बाकायदा ढेका बांध लिया है लेकिन दो-एक लोग ऐसे हैं जो विना कपड़ों की परवाह किये पांक में घुस पड़े हैं और अब कपड़ा गंदा होने के द्वन्द्व से जूझ रहे हैं। रेणु के हाथों में बिचड़ा है और नजर नीचे धरती की ओर। अब वे रोपाई शुरू करने ही वाले हैं। इस बीच फोटो सेशन चल रहा है। लेकिन, इन सात लोगों में एक ऐसा है, जो धरती में झुक चुका है, ठीक उसी तरह जैसे कोई भी खेतिहर धान रोपने के वक्त झुकता है। उस आदमी का चेहरा दिखाई नहीं पड़ता। उसे फोटो सेशन की जैसे कोई परवाह ही नहीं है। आधी धोती उसने पहन रखी है, आधे का ढट्ठा ओढ़कर सिर तक को ढंक लिया है। उसकी निगाह जमीन पर है और उसने रोपाई शुरू कर दी है। तस्वीर में उसके दायें हाथ की उंगलियां बिचड़े की जड़ों के साथ गीली पांक के वक्षस्थल में घुसी दिखाई देती है। आदमी बुजुर्ग है लेकिन रोपनी का पुराना उस्ताद मालूम होता है। यह आदमी कौन है? यह नागार्जुन हैं। औराही हिंगना में,  रेणु के खेत में धान रोप रहे हैं। तारीख है 29 जुलाई 1973। वह रेणु के गांव आए हैं जहां अभी रोपनी का सीजन चल रहा है। रेणु इस तरह के हर सीजन में गांव पहुंचते थे। अक्सर तो कुछ सहमना साहित्यिक भी बटुर आते थे। यहां, यह अनुमान किया जा सकता है कि इस आइडिया के जनक भी नागार्जुन ही रहे हों कि चलें, आज हम सब भी धान रोपते हैं। रेणु ने इसे एक और नया आयाम दे दिया है। फोटोग्राफर से इसकी तस्वीर उतरवा ली है और बात अब हम सब लोगों तक पहुंच गयी है।
           उस रात नागार्जुन ने एक कविता भी लिखी। वह रेणु के गांव के बारे में है और खुद रेणु के बारे में। शीर्षक दिया है--मैला आंचल। कविता देखें--
पंक-पृथुल कर-चरण हुए चंदन अनुलेपित
सबकी छवियां अंकित, सबके स्वर हैं टेपित
एक दूसरे की काया पर पांक थोपते
औराही के खेतों में हम धान रोपते
मूल गंध की मदिर हवा में मगन हुए हैं
मां के उर पर, शिशु-सम हुलसित मगन हुए हैं
सोनामाटी महक रही है रोम-रोम से
श्वेत कुसुम झरते हैं तुम पर नील व्योम से
कृषकपुत्र मैं, तुम तो खुद दर्दी किसान हो
मुरलीधर के सात सुरों की सरस तान हो
धन्य जादुई मैला आंचल, धन्य-धन्य तुम
सहज सलोने तुम अपूर्व, अनुपम, अनन्य तुम।
          इस मौके पर सबके स्वर भी टेपित हुए थे, इसकी सूचना इसी कविता से मिलती है। शायद उसे सुनने का मौका हमें अब कभी नहीं मिल सकेगा। लगता है, उस संगत में रेणु ने कोई अनोखा गीत गाया होगा, जो नागार्जुन को बहुत पसंद आया होगा। इसकी खबर हमें नागार्जुन की उस उक्ति से मिलती है जहां वह उन्हें 'मुरलीधर के सात सुरों की सरस तान' बताते हैं। हर जाननेवाला जानता है कि रेणु बहुत मधुर गाते थे और लोकगीतों, गाथाओं का एक बड़ा भंडार उनके ओठों पर बसता था। सारंगा सदाबृज और लोरिकायन की तो लगभग समूची गाथा उन्हें याद थी। नागार्जुन ने रेणु को यहां 'दर्दी किसान' बताया है लेकिन यह भी कम दर्दीला नहीं है क्योंकि उन्होंने अपने आपको सिर्फ 'कृषकपुत्र' बतलाया है, यानी कि वह, जिससे दर्दी किसान होने का सौभाग्य एक पीढ़ी पहले छीन लिया गया। औराही उन्हें बहुत पसंद आया है। वहां वह 'मूल गंध' है, जिसमें धरती का प्यार उसकी उत्पादकता बनकर प्रकट हुआ करता है।‌ वहां की माटी सोनामाटी है। रेणु की खासियत है कि यह सोनामाटी उनके रोम-रोम से महक रही है। रेणु ने जो अपने उपन्यास का नाम 'मैला आंचल' दिया था, उसके पीछे एक गहरा व्यंग्य था। उस उपन्यास को बड़ा बनाने में जिन चीजों का योग है, उसमें से कुछ इस नाम का भी है जिसके पीछे व्यंग्य की अचूक गहराई है। वह बात ठीक वहीं से, इस कविता में भी उतर आई है। नागार्जुन इसे सिम्पली 'जादुई' बताते हैं। रेणु, जो नागार्जुन को 'बड़े भाई' या 'भैयाजी' कहते थे, के लिए उनके मन में कितना प्रेम, कितनी वत्सलता थी, इसका पता भी इस कविता से बढ़िया चलता है। वे कहते हैं कि इस धरती के नील व्योम से रेणु के ऊपर श्वेत कुसुम झरते हैं। यश का रंग श्वेत बताया गया है। फिर फिर वह कहते हैं-- सहज सलोने तुम अपूर्व, अनुपम, अनन्य तुम। यहां प्रयोग किया गया एक-एक विशेषण विशेष है, जिसका पता हमें नागार्जुन के उस लेख से चलता है जो बाद में उन्होंने रेणु के निधन के बाद उनपर लिखा था।
          रेणु और नागार्जुन का सम्बन्ध बहुत पुराना था। दोनों मिथिला समाज से आते थे। दोनों धरती से जुड़े, धरती के धनी। दोनों का जुड़ाव आमजन से एक-जैसा। लोकवृत्तियों और लोकविधाओं में दोनों का ही मन एक जैसा रमा हुआ। दोनों संघर्षधर्मा, सत्ताधारी पार्टी के आलोचक। दोनों की अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं थीं, जिनके बगैर सामाजिक सरोकार अधूरा पड़ता था। मध्यकाल से ही यह परंपरा चली आई है कि इस भूमि से जो भी कोई बड़ा साहित्यकार हुआ, उसने अपनी मातृभाषा में भी कुछ-न-कुछ जरूर लिखा। रेणु ने भी मैथिली में लिखा लेकिन नागार्जुन ने ज्यादा लिखा। लगभग जीवन भर उनकी संलग्नता अपनी भूमि और भाषा से बनी रही।  रेणु की संलग्नता और भी गहरी थी, यह और है कि उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम अलग-अलग थे। जैसे वह दर्दी किसान थे, वैसा ही मर्मी इंसान भी। उनका यह मर्म अनेक आयामों में प्रकट होता था। नागार्जुन ने अपने लेख में दिया है-- 'रेणु के यहां न तो कथ्य-सामग्री का टोटा था और न शैलियों के नमूनों का अकाल। सामाजिक घनिष्ठता रेणु को कभी गुफानिबद्ध नहीं होने देती थी। वह जहां कहीं भी रहे, लोग उन्हें घेरे रहते थे। फारबिसगंज, पटना, इलाहाबाद, कलकत्ता, मैंने रेणु को जहां कहीं देखा और जब कभी, निर्जन एकान्त में शायद ही देखा होगा।'
          विद्यापति के यहां 'सुपुरुष' का बड़ा माहात्म्य है। इसे ही कहीं वह सुजन कहते हैं तो कहीं सज्जन। उनकी एक मशहूर काव्यपंक्ति है-- 'सज्जन जन सं नेह कठिन थिक।' इस एक पंक्ति ने मिथिला के पुराने पंडितों को पिछले सौ वर्षों में कितना परेशान किया पूछिये मत। आजतक उनकी समझ में न आया कि सज्जन जन से नेह कठिन क्यों होगा, वह तो और आसान, और भी विधेय होना चाहिए। बात यहां तक चली गयी कि धृष्ट लोगों ने विद्यापति की पंक्ति संशोधित कर दी। अपने संकलनों में पाठ दिया--सज्जन जन सं नेह उचित थिक। 'कठिन' को 'उचित' बनाकर मानो उन्होंने टंटा ही खत्म कर दिया कि कठिन है या कि कठिन नहीं है। लेकिन इसका मर्म रेणु जैसे लोग जान सकते थे। नागार्जुन ने लिखा है-- 'लोकगीत, लोकलय, लोककला आदि जितने भी तत्व लोकजीवन को समग्रता प्रदान करते हैं, उन सभी का समन्वित प्रतीक थे फणीश्वरनाथ रेणु।' रेणु के यहां हम सुपुरुष, सुजन, सज्जन को मूर्त रूप में देख सकते हैं। आप 'तीसरी कसम' के हीरामन को याद कीजिए और गौर फरमाइए कि उसपर प्यार तो पूरा उमड़ आता है, उस नायिका का भी उमड़ आया था, लेकिन उस प्यार के साथ बने रहना, उसे निभा ले जाना कितना कठिन है! कहते है, लोग तो जन्म लेते और मरते रहते हैं, लेकिन 'लोक' अमर होता है। नागार्जुन फिर कहते हैं-- 'बावनदास से लेकर अगिनखोर तक जाने कितने कैरेक्टर रेणु ने पाठकों‌ के सामने रखे हैं। उनमें से एक-एक को बड़ी बारीकी से तरासा गया है। ढेर-के-ढेर प्राणवंत शब्दचित्र हमें गुदगुदाते भी हैं और ग्रामजीवन की आंतरिक विसंगतियों की तरफ भी हमारा ध्यान खींचते चलते हैं। छोटी-छोटी खुशियां, तुनकमिजाजी के छोटे-छोटे क्षण, राग-द्वेष के उलझे हुए धागों की छोटी-बड़ी गुत्थियां, रूप-रस-गंध-स्पर्श और नाद के छिटफुट चमत्कार-- और जाने क्या-क्या व्यंजनाएं छलकी पड़ती हैं रेणु की कथाकृतियों से।'
          रेणु से नागार्जुन का सम्बन्ध बहुत ही पुराना और आत्मीय था। दोनों का जब भी मिलना होता, दोनों मैथिली में ही बात करते थे। पत्राचार की भाषा भी मैथिली ही हुआ करती थी, जैसा कि रेणु रचनावली में संकलित पत्र से भी स्पष्ट है। अद्भुत है वह पत्र, जिसके शब्द-शब्द से रेणु की आंतरिकता झांकती है। पत्र 18.12.1954(या1955) का है। अभी-अभी 'मैला आंचल' छपा है।  रेणु गांव में हैं। आज उन्होंने किसी गुदरिया (गोरखनाथी) संन्यासी से राजा भरथरी की गाथा सुनी है। जरूर साधू ने बहुत ही मधुर, मार्मिक गाया होगा। रेणु ने नोट कर लिया है। गाथा का एक लंबा अंश वह नागार्जुन को, पत्र में लिखते हैं, जो बड़ा ही अनूठा है। वहां साधू बनने के बारह बरस बाद राजा भरथरी के अपने नगर पधारने का वर्णन है, सिद्ध जोगी बनकर। लगता है, अपने पिछले पत्र में नागार्जुन ने प्रश्न किया हो कि 'राजा भरथरी, यानी कि रेणु आजकल चुप क्यों हैं?' कहते हैं-- 'जेहि दिन नग्र पधारयो राजा भरथरी/ मंजरल बगियन में आम/ फुलबा जे फूले कचनार राजा/ लाली उड़े आसमान/ लाल लाल सेमली के बाग फूले/ धरती धरेला धेयान।' यानी कि गांव के पर्यावरण ने इस तरह राजा भरथरी को बांध लिया है कि चुप हो जाने के सिवा रास्ता नहीं बचा।
           फिर, गांव-घर की बातें बताते हैं। पहली बात तो यही कि गांव आते रहना इसलिए भी जरूरी है कि चीजों को, विरासत को नष्ट होने से बचाया जा सके। फिर उन्हें उस नौजवान लड़के की बात याद आती है जिसने रेणु को चैलेंज किया था कि गांव में आपका मन लगेगा? लड़के को जवाब उन्होंने क्या दिया था, सो बताते हैं। गरदन में मिट्टी का घड़ा बांधकर कूप में पैठ गये हैं, अब यहीं रहेंगे। फिर बताने लगते हैं कि गांव के जंगल का एक सियार पागल हो गया है, लोग लाठी साथ रखकर ही घर से बाहर निकलते हैं। रेणु के पास अपनी लाठी नहीं है। किसी से मांगा तो उसने कह दिया कि अब तो आप अपनी लाठी बनाइये, आप गांव में रहने आए हैं। फिर उन्हें अपने पिता की याद आ गयी जो तरह-तरह की लाठियां रखने के शौकीन थे। बांस के जंगल में घुसकर सही लाठीवाले बांस की पहचान भी एक महीन कला है। रेणु बताते हैं कि सिर्फ मन लायक लाठियां पाने के लिए पिता ने कैसे-कैसे लोगों से दोस्ती गांठ रखी थी। नागार्जुन ने पिछले पत्र में उन्हें सुझाव दिया था कि रेणु को वहां बंदूक का लाइसेन्स ले लेना चाहिए। रेणु को यह जरूरी नहीं लगा है, बताते हैं कि 'विश्वकोश का चोर अबतक गांव नहीं पहुंचा है', और शिकार के प्रयोजन की जहां तक बात है, गुलेल चलाने की उनकी 'पेराकटिस' इतनी जबर्दस्त है कि उसके आगे बंदूक फेल है। फिर वह उन्हें उस खंडकाव्य का प्लाट बताने लगते है-- 'दो पीर: एक नदी' जिसे लिखने का विचार उनके मन में चल रहा है। दो पीर-- ग्रामदेवता जीन पीर और ग्रामरक्षक चेथरिया पीर। नदी दुलारी दाय। नदी का गुण गाने लगते हैं कि इस इलाके के बाबू लोगों की जो बबुआनी है, वह इसी दुलारी दाय के प्रताप से है। कोशी जब इस इलाके से गयीं, उनकी पांच बहनें थीं, सबको वह बांझ बनाती गयीं, सबसे छोटी बहन इस दुलारी पर उसकी बहुत करुणा थी, इसीलिए यह बची रह गयी। अपने भैयाजी से आशीर्वाद मांगते हैं कि वह इस खंडकाव्य को पूरा कर सकें और वह शुभ भी बन पाये, सुंदर भी। फिर यह सूचना दी है कि मैथिली मासिक 'वैदेही' पिछले कुछ समय से उनके ग्रामीण पुस्तकालय में आना बंद हो गयी है, मतलब इसकी शिकायत प्रकाशक को कर दें और राय मांगते हैं कि 'आर्यावर्त' का ग्राहक उन्हें बनना चाहिए या नहीं! पत्र के अंत में लतिका जी से मिलकर हाल-समाचार कह देने का अनुरोध है और यह भी कि उन्हें भरोसा दे दिया जाए कि उनकी हिदायतों के मुताबिक ही वह गांव का जीवन जी रहे हैं। लेकिन, सबसे अंत मे यह है कि 'हम जे मैथिली मे पांती लिखैक धृष्टता कय रहल छी-- से तकर की हैत?' इसका क्या होगा! इन दोनों लोगों के बीच की आत्मीयता और सामीप्य-भावना को आप इस एक पत्र से समझ सकते हैं।
           सोचकर देखें तो यह आत्मीयता कोई आसान बात नहीं थी। नागार्जुन का पहला उपन्यास 'पारो' 1946 में छपकर आ गया था। था तो यह मैथिली में लेकिन इसने यह किया था कि नागार्जुन बिहार के उभरते हुए संभावनाशील उपन्यासकार के रूप में गिने जाने लगे थे। 1948 में छपे 'रतिनाथ की चाची' ने उन्हें स्थापित उपन्यासकार की पंक्ति में ला दिया था। लेकिन, 'बलचनमा'(1952) के बाद तो प्रथम श्रेणी के हिन्दी उपन्यासकारों में उनका शुमार होने लगा था। इसमें प्रेमचंद की परंपरा का स्पष्ट विकास देखा गया था। 'आंचलिक' शब्द भी उपन्यास के विशेषण में तभी पहली बार प्रयुक्त हुआ था और नागार्जुन हिन्दी के पहले आंचलिक उपन्यासकार माने गये थे। इसके बाद आया था 'मैला आंचल'। शुरुआती दिनों में तो कई संशय थे चतुर्दिक, लेकिन बहुत जल्द ही यह हिन्दी के चुने हुए सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में शामिल कर लिया गया। 'मैला आंचल' की सफलता निश्चय ही 'बलचनमा' से बढ़कर थी।
           इसमें संदेह नहीं कि इस तरह की स्थितियों में लेखकों की आपसी प्रतिस्पर्द्धा उनके बीच कटुता का सम्बन्ध बनाती है, और कई लोगों ने इस प्रतिस्पर्द्धा को उभारनेवाली बातें माहौल में चलाईं भी थीं, लेकिन नागार्जुन ने इसे कभी भाव नहीं दिया। खुद रेणु ने भी नहीं। 1955 में ही रेणु ने यह कहा-- 'सही माने में प्रेमचंद की परंपरा को फिर से 'बलचनमा' ने ही अपनाया। नागार्जुन जी पर बहुत भरोसा है मुझे। मेरी स्थिति उस छोटे भाई-सी है, जो अपने बड़े भाई के बल पर बड़ी-बड़ी बातें करता है।'
           हिन्दी संसार भले नागार्जुन को प्रथम आंचलिक उपन्यासकार कहकर चिह्नित करे, उन्होंने हमेशा इससे इनकार किया। जिन बातों को लेकर उनके उपन्यास लिखे गये थे, उन्हें आंचलिक कहकर कोटिबद्ध किया जाना उन्हें कभी सही नहीं लगा। जबकि रेणु की स्थिति बिलकुल अलग थी। वह खुद भी अपने लेखन को 'आंचलिक' कहते और औरों से भी इस कारण प्राप्त होनेवाली विशेष कोटि उन्हें पसंद आती थी। नागार्जुन कहीं बेहतर समझ रहे थे कि वह क्या कर रहे हैं, और इससे इतर रेणु के काम का महत्व क्या है, इसलिए 'मैला आंचल' के आने से उनका उपन्यास-लेखन किसी भी तरह प्रभावित नहीं हुआ। एक के बाद एक उनके उपन्यास आते रहे, और वे कमोबेश उसी मिजाज के भी बने रहे। आगे जब उनका उपन्यास लिखना छूटा भी तो इसके कारण व्यक्तिगत थे, उनकी यात्राओं और जनाकीर्णता ने उन्हें आगे इस तरह एकाग्र ही नहीं होने दिया जो ऐसे गद्यलेखन के लिए जरूरी होता है। दूसरे, भारतीय उपन्यास की समझ शुरू से ही उनपर तारी थी, यानी कि हिन्दी में लिखा गया भारतीय उपन्यास, जिससे भारत के यथार्थ को समझा जा सकता हो। इसलिए, समान भूमि, भाषा, और कथा-परिवेश के बावजूद दोनों लेखकों की परस्पर प्रीति अंत तक बनी रही।
           रेणु के लेखन को नागार्जुन ने, स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद जो हमारी कथाकृतियों में ढेर सारे परिवर्तन आने लगे थे, उस संदर्भ के साथ जोड़कर देखा है। वहां वह कहते हैं कि चिंतन में तो ताजगी के नये-नये आभास प्रकट हुए ही, शब्द-शिल्प की नयी-नयी छवियां भी तेजी से उभरने लगीं थीं, उनमें ताजगी और अनूठापन अधिकाधिक उजागर होने लगा था। कथाकार रेणु को इनमें सबसे प्रतिभाशाली वह इस आधार पर मानते हैं कि उनकी बुनावट नितांत घनी थी, और ढेर सारे दुर्लभ और बहुरंगी छवियों को मिलाकर वह एक ताजा और अनूठी बात कह जाते थे। उन्होंने लिखा है-- 'ऐसा उत्कट मेधावी युवक यदि कलकत्ता जैसे महानगर में पैदा हुआ होता और यदि वैसा ही सांस्कृतिक परिवेश, तकनीकी उपलब्धियों का वही माहौल इस विलक्षण व्यक्ति को हासिल हुआ रहता तो अनूठी कथाकृतियों के रचयिता होने के साथ-साथ सत्यजित राय की तरह फिल्मनिर्माण की दिशा में भी यह व्यक्ति कीर्तिमान स्थापित कर दिखाता। रेणु की कथाकृतियों में ऐसे बीसियों पात्र भरे पड़े हैं।'
           लेकिन, सब सपाट-ही-सपाट हो, ऐसा भी नहीं था। दोनों के मतान्तर भी कम नहीं थे। रेणु के प्राण भले औराही की गीली पांक में बसते हों, या चाहे उनका मन सबसे ज्यादा ठेठ ग्रामीण समाजियों की संगत में लगता हो, वह जब अपने व्यक्तिगत जीवन में लौटते तो अपने दैहिक 'स्व' के प्रति बहुत सजग हो जाते थे। यह उनके पहनावा-ओढ़ावा से लेकर उनके रहन-सहन तक में दिखता था। यह  उनकी अपनी तरह की संभ्रान्तता थी। लंबे बाल के शौकीन थे।  लंबे बाल की परवाह रखने की अपनी सजगता के बारे में उन्होंने एक जगह कहा है-- 'लोग पौधों की देखभाल करते हैं, बालों की देखभाल मेरी हॊबी है।' अपनी इस स्व सजगता से रेणु को फायदा था कि यह उन्हें कलाओं के उच्च और संभ्रान्त वर्ग में स्वीकार्य बनाती थी। यह अपने आप में एक बड़ा फायदा था, लेकिन नागार्जुन को यह सिरे से नापसंद था। 'आईने के सामने' में उन्होंने अपने हुलिये का मजाक उड़ाते वक्त रेणु को भी लपेट लिया है-- 'ओ आंचलिक कथाकार,  तुम्हारी आंखें सचमुच फूटी हुई हैं क्या? अपने अन्य आंचलिक अनुजों से इतना तो तुम्हें सीख ही लेना था कि रहन-सहन का अल्ट्रामाडर्न तरीका क्या होता है।' रेणु की अपनी जीवन-शैली थी, बचपन की निर्मित थी जिसमें कोइराला परिवार और औराही हिंगना की बराबर बराबर की साझेदारी थी। वह एक किसान थे, जबकि नागार्जुन कृषकपुत्र। यहां व्यवस्था थी, वहां विद्रोह था। रेणु दर्दी किसान थे, यह उनका विशेष गुण था। मगर थे किसान।
           रेणु को भी नागार्जुन से आपत्तियां कम न थीं। सबसे बड़ी आपत्ति तो उनके मुद्दे बदलते रहने पर थी। 1967 में बिहार की संविद सरकार ने उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाने का ऐलान किया। इसका बहुत जोरदार विरोध हुआ। रेणु ने इस घटना-क्रम की रिपोर्टिंग 'दिनमान' में की थी। स्वयं रेणु की रिपोर्ट में साक्ष्य है कि यह गैरजरूरी था, और केवल एक मुस्लिम नेता को संतुष्ट करने के लिए किया गया था। मामला लेकिन उर्दू का था, इसलिए हिन्दी का कोई लेखक इसके विरोध में नहीं आया। लेकिन नागार्जुन कूद आए। यह उनकी अपनी राजनीतिक समझ थी, जो जनता से मिलती थी। अब जबकि दूसरी राजभाषा बनाने के बाद सच में उर्दू भाषा-साहित्य को क्या फायदा हुआ यह हमारे सामने है, हम समझ सकते हैं कि सच में इस पचड़े में पड़ने का वह समय नहीं था। समाजवादियों के हाथ में सत्ता आई थी। बड़े-बड़े लक्ष्य थे बचे के बचे। रेणु ने तुलसी जयन्ती के दिनवाली गांधी मैदान की सभा की रिपोर्टिंग की है-- 'मंच पर साहित्य सम्मेलन‌ के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा बैठे हैं-- डा. लक्ष्मी नारायण सुधांशु(कांग्रेस), ठाकुर प्रसाद(जनसंघ) और... और... नागार्जुन।.... प्रस्ताव प्रस्तुत किया नागार्जुन जी ने। प्रस्ताव पढ़ते समय उनकी वाणी बौद्ध-भिक्षु जैसी ही थी। मगर जब प्रस्ताव पर बोलने लगे तो 'नागा बाबा' हो गये।' रेणु की आपत्ति अपनी जगह जायज थी।
           आगे वह भी समय रहा जब दोनों ने साथ-साथ राजनीति की। वह संपूर्ण क्रान्ति का दौर था। उसमें भी कोई प्रगतिशील लेखक नहीं गया था। बड़े लेखकों में यही दो थे। नुक्कड़ कविता का तभी आविष्कार हुआ था, जिसने परिवर्तन में गजब भूमिका अदा की। उसके हिट कवि नागार्जुन थे। रेणु हर गोष्ठी में रहते, लेकिन कविता नहीं पढ़ते। उनकी भूमिका दूसरी होती थी। गोष्ठी जब खत्म होने लगती, रेणु और रामवचन राय गमछा फैलाकर श्रोताओं में घूम जाते। जो पैसे आते, उनमें से लाउडस्पीकर आदि का किराया वगैरह देकर जो बचता उसे जरूरतमंद कवियों में बांट दिया जाता। एक जरूरतमंद नागार्जुन भी हुआ ही करते थे। फिर वह दौर आया, जब आपातकाल के दौरान बक्सर जेल में बंद नागार्जुन भयंकर बीमार पड़ गये। उनके बचने की उम्मीद न रही। तो, रेणु ही थे जिन्होंने लेखकों का प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन तैयार कराया था कि उन्हें जेल से मुक्त किया जाए। उन्हें जरूरत भर लेखकों के दस्तखत नहीं मिल सके, और नागार्जुन की जेल-मुक्ति के लिए दूसरे प्रयास करने पड़े, यह अलग बात है।
           अब, मजे की बात यह भी है कि रेणु ने उर्दू प्रकरण वाली अपनी रिपोर्ट में जिन नागार्जुन पर यह भाषण देने के लिए कि 'उर्दू का विरोध करना अगर 'जनसंघी' होना है तो मैं एक सौ जनसंघी होने को तैयार हूं', बड़ी खिंचाई की थी, उन्हीं नागार्जुन को 'संपूर्ण क्रान्ति' वाले जेल-जीवन में जब यह अहसास हो गया कि अपनी वैधता प्राप्त करने के लिए इस आन्दोलन को आर एस एस ने दबे पांव हाइजैक कर लिया है, तो वह वहां से निकल आए, लेकिन रेणु की अपनी राजनीतिक समझ थी कि वह अंत-अंत तक वहीं बने रहे। लेकिन, जो कि सच्चाई भी थी, रेणु का जब निधन हुआ, नागार्जुन ने अपने स्मृति-लेख में लिखा-- 'प्रशासकीय तानाशाही के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनेवालों में रेणु अगली कतार में भी आगे ही खड़े रहे।'
           और, जहां तक रेणु की संभ्रान्तता और जनांदोलनी तेवर के बीच तारतम्य का प्रश्न है, गोपेश्वर सिंह के लिखे एक संस्मरण का प्रसंग याद आता है। एक दिन कभी पटना के फुटपाथ किनारे के मजदूर होटल में आराम से बैठकर नागार्जुन रोटी-सब्जी खा रहे थे। गोपेश्वर जी ने देखा तो हैरत में पड़ गये। अभी हाल में रेणु का निधन हुआ था। वह चारों ओर चर्चा में बने हुए थे। गोपेश्वर जी ने नागार्जुन से पूछा-- 'बाबा, फणीश्वरनाथ रेणु यहां रोटी खाते या नहीं?' नागार्जुन ने तपाक से जवाब दिया-- 'नहीं। रेणु यहां रोटी नहीं खाते, लेकिन वे इन लोगों के लिए गोली जरूर खा लेते!'


Friday, April 8, 2022

की मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी? :: तारानंद वियोगी

 की मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी?


तारानंद वियोगी



कोनो भाषा ककर होइ छै, तकरा बुझबाक दूटा पैमाना भ' सकैत अछि। एक जे ओ कोन समूह छै जकर जीवनक समूचा अभिव्यक्तिक माध्यम वैह टा भाषा छै। मने ओइ भाषा कें छोड़ि क' दोसर भाषा बाजब ओकरा नै अबै छै। दोसर भाषा बाजै बला लोकक भाव भने संगतिवश ओ बूझियो जाय मुदा जखन उतारा देत तं अपने भाषा मे। एखनो गामघर मे हमसब एहन घनेरो लोक कें देखि सकै छियै, जखन कि कटु वास्तविकता ई अछि जे आइ समुच्चा मिथिला द्विभाषी(मैथिली आ हिन्दी) समुदाय मे परिणत भ' चुकल अछि।

           अइ पैमानाक आधार पर देखी तं मैथिली कोनो एक जातिक भाषा भइये नै सकैत अछि। भाषा नामक वस्तु कोनो एक जातिक अथवा एक धर्मक वा एक संप्रदायक किन्नहु नै भ' सकैत अछि। आइ काल्हिक विद्वानक बात तं छोड़ू, चौदहम शताब्दीक हमर महाकवि विद्यापतियो अइ सत्य सं वाकिफ रहथि जे भाषा कोनो जाति, धर्म, संप्रदाय सं बहुत ऊपरक वस्तु होइत अछि। मनुष्य सं मनुष्य कें जोड़बाक जे ताकत भाषा मे छै से जाति-धर्म-संप्रदाय मे नै भ' सकैत अछि। ई सत्य थिक मुदा सत्य कें देखबाक आंखि सब कें होइते हो, से कोनो युग मे नै रहल अछि। आजुक समय मे तं सत्यक जे दुर्दशा छै से सब गोटे देखिये रहल छी।

           तें, मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, ई बात सिरे सं गलत अछि। अइ कथन मे सत्यक लवलेशो मात्रा नै छै।

           दोसर पैमानाक बात करी। कोनो भाषा ककर छी, एकर निर्णय के आधार ई भ' सकैत अछि जे कोन समूहक धर्मक भाषा, धार्मिक अनुष्ठानक भाषा मैथिली छी। धर्मे किऐ? अइ दुआरे जे मनुष्य जकरा पवित्रतम बुझैत अछि तकरे अपन धार्मिक कृत्य संग जोड़ैत अछि। अपन समाज बीच देखू तं पता लागत जे बहुतो एहन जाति मिथिला मे बसैत अछि जकर धर्मक भाषा मैथिली छियै। अहां कोनो यादव के ओतय आयोजित धर्मराज-पूजा मे शामिल होउ। देखबै जे भजन आ मंत्र तं मैथिली मे रहिते छै, जखन भगताक भाव मे साक्षात धर्मराज वा कि कोनो आन देवता प्रकट होइ छथिन तं ओ देवता सेहो मैथिलिये बजैत छथिन। तहिना अहां डोम के ओतय देखियौ, मुसहर के ओतय देखियौ, धार्मिक कृत्य सहित हिनका लोकनिक देवता समेत के भाषा अहां कें मैथिली भेटत। अइ पैमानाक मोताबिक तं मैथिली हिनके सभक भाषा छी। अइ पैमानाक मोताबिक तं मैथिली आर भने कोन्नो जाति के भाषा हुअय, ई ब्राह्मणक भाषा नै छी, कारण ब्राह्मण लोकनि के धार्मिक कृत्यक भाषा तं आइयो संस्कृत छियनि।

           मुदा, सत्य एते सपाट हो सेहो बात नै अछि। आइ हम सब ब्राह्मणो लोकनि के घर मे गोसाउनिक पीड़ी पुजाइत देखै छी। ई पीड़ी की छी? ई छी चैत्य। सुदूर इतिहास मे जा क' देखब तं पता लागत जे विदेहक आर्य लोकनि चैत्यपूजक नै छला। वैशालीक लिच्छवि लोकनि चैत्यपूजक रहथि जे बुद्धक समर्थक छला। मिथिलाक पचपनिया समाज चैत्यपूजक छला जे सेहो बुद्धक समर्थक रहथि। पचपनिया लोकनिक घर मे जं पीड़ी(चैत्य) होइ छै तं से बुझबा योग्य होइत अछि। मुदा, ब्राह्मण लोकनिक घर मे पीड़ी कोना होइत छनि? महापंडित लोकनि कें जं एकर रहस्य पुछबनि तं 'लोकाचार' के नाम लेता। कते आश्चर्यक बात छी जे अखिल भारत मे धर्मतत्वक निर्णायक मिथिला  के अपन घरे मे 'लोकाचार' शास्त्राचार कें पराजित क' देने अछि। आइये नै, शताब्दियो सं। असल मे कट्टरपंथ आ उदारवादक उठा-पटक सब युग मे सदा सं चलैत आयल अछि। पंडित जी अपने तं संस्कृत कें गसिया क' धयनहि रहला मुदा पंडिताइन अपन घर अपना जूति सं चलबय लगली। लिच्छवि आ विदेहक परंपरा मिलि क' एक भ' गेल। ब्राह्मणक घर मे धर्मराज पूजित भेला, जे एक निर्गुण देवता थिका आ जिनकर पूजापद्धति बौद्ध लोकनिक पूजापद्धतिक जीवित अवशेष छियनि। आब धर्मराजक पूजाविधान तं मैथिलिये मे हो। चौदह देवान मे एक मीरा साहेब छथिन, ओ मुसलमान छथि, मुदा हमरा-अहांक घर मे ओ शताब्दियो सं पूजित छथि। हुनकर गाथाक भाषा मैथिली अछि। मैथिल संस्कृति कें अइ तरहें देखबाक चाही।

            दोसर दिस, मैथिली भाषा मे लिखित प्राचीनतम साहित्य जे उपलब्ध अछि से ब्राह्मणेतर वर्गक शूद्र, अतिशूद्र, महाशूद्र लोकनिक रचना छियनि। स्वयं महाकवि विद्यापति जाहि प्रकारक भाखा-रचना कें अपन आदर्श बनौलनि, से मूलत: शूद्र लोकनिक आविष्कार रहनि। ब्राह्मण लोकनि तं भाखा-रचना सं घृणा करै छला आ अइ दुआरे विद्यापतियो सं घृणे करैत रहथि, हुनकर उपेक्षा करैत रहला। आइ जे हमरा लोकनि विद्यापतिक एते चला-चलती देखै छी, मोन रखबाक चाही जे से अही डेढ़ सौ बरसक देन थिक।

           अइ सब तरहें तं ई कथन बेबुनियाद ठहरैत अछि जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा थिक। मुदा, तखन प्रश्न ई अछि जे ई बात बेर-बेर उठैत किए अछि? की एकरा पाछू कोनो इतिहास अछि? जी हं, इतिहास अछि आ से बहुत शर्मिन्दगी भरल इतिहास अछि।

           बीसम शताब्दीक पहिल दशक बिहार मे जातीय अस्मिताक उदयक समय छल। हमरा जेना कि मोन पड़ैत अछि, मैथिल महासभाक स्थापनाक आगुए पाछू गोप महासभाक स्थापना भेल छल। गोपे महासभा जकां मैथिल महासभा सेहो पूर्णत: एक जातीय संगठन छल। तखन एकर नाम ब्राह्मण महासभा किए ने भेलै? ब्राह्मण महासभा अलग सं एक स्वतंत्र संस्था छल। कायस्थ महासभा सेहो जखन अलग सं छल, आ इहो मोन रखबाक चाही जे तहिया कायस्थक गणना शूद्र वर्ण मे होइत छल। एहना मे कोनो जातीय महासभा दू गैरबराबर जाति कें शामिल क' क' जखन नै बनल छल तं एहन अजीबोगरीब संगठन मैथिले महासभा किए भेल जकर सदस्यताक लेल केवल आ केवल मैथिल ब्राह्मण आ कर्णकायस्थ योग्य मानल गेला? एहि पाछू जे राजनीति छल से स्पष्टत: राजभक्त लोकनिक कवच तैयार करब छल। दरभंगा राजक शोषणकारी व्यवस्था जगजाहिर अछि, आ स्वयं महाराजे एहि संस्थाक निर्माण करेने छला, वैह सर्वेसर्वा रहथि। इतिहास कहैत अछि जे 'मैथिल' शब्द अही ठाम अपन मिथिला-बोध सं भटकि गेल। असल मे कहल जाय तं अपन शोषणकारी सत्ता कें अनामति रखबाक हेतु समर्थक तैयार करबाक लेल एकरा पूरा रणनीतिपूर्वक मिथिला-बोध सं भटका देल गेलै।

           अइ संपूर्ण घटनाक्रम मे सब सं दुर्भाग्यपूर्ण ई भेल जे मैथिल महासभा 'अप्पन' भाषाक रूप मे मैथिली कें जोड़ि लेलक। मिथिला मे बसनिहार सब जातिक भाषा मैथिली छल, मुदा आब ई केवल दू जातिक भाषा बनय जा रहल छल। हमरा लोकनि कें आभारी हेबाक चाही गोप महासभाक ओहि महामना पूर्वज लोकनिक प्रति, जे लिखित रूप मे तहिया(1910 मे) ई घोषणा केलनि जे मैथिली तं हमरो अभक भाषा छी। आ, अही बात कें आधार बना क' ओ लोकनि दावा केलनि जे मैथिली जें कि हुनको सभक भाषा छियनि तें हुनको लोकनि कें मैथिल मानल जाय आ मैथिल महासभाक सदस्यता देल जाय। घृणा आ अवज्ञापूर्वक मैथिल महासभा अइ मांग कें अस्वीकार केलक। एकरे प्रतिक्रिया मे गोप सभा संगठित भेल छल आ लिखित घोषणा कयल गेल जे मैथिली हुनका सभक भाषा नै छियनि। जाधरि राजतंत्र आबाद रहल, तकर बादो कैक बरस धरि मैथिल महासभा जिंदा रहल। ओकर प्राय: हरेक अधिवेशन मे क्यो ने क्यो उदारवादी पंडित ई प्रस्ताव राखैत रहला जे मिथिला मे बसनिहार सब जाति कें मैथिल मानि लेल जाय, हुनकर भाषा मैथिली कबूल क' लेल जाय, मुदा नहि। मैथिल महासभा मरि जायब पसंद केलक मुदा ककरो आन के दावेदारी गछब स्वीकार नै केलक। मैथिली राजाक भाषा भ' क' रहि गेल, प्रजाक भाषा नहि बनि सकल। मैथिली शोषकक भाषा बनल, शोषितक नै। मैथिली राजभक्ति आ जी-हजूरीक भाषा बनल, संघर्ष आ विरोधक नहि। जं आगू चलि क' मैथिली साहित्य मे ई सब युगीन गुण पैदा क' क' एकर सामर्थ्य-वृद्धिक प्रयास कयलो गेल तं राजसंस्कारित मठाधीश लोकनिक द्वारा एहन प्रयास सब कें हतोत्साह कयल गेल, ओकर उपेक्षा कयल गेल।

           अहां कहि सकै छी जे अइ इतिहासक चर्चा करब बेमतलब के गाड़ल मुरदा कें उखाड़ब थिक। मुदा दुर्भाग्य सं अहांक ई कहब सही नै भ' सकत। एखन हाले (बस पछिला मास) मे हम सब देखने छी जे मैथिली अखबार मे दरभंगा राजक शोषणकारी व्यवस्थाक चर्चा भेला पर कोना 'मैथिल' भाइ लोकनि के खून खौलि उठल रहल रहनि। देश भने आजाद हो, संविधान भने लागू हो, मुदा 'मैथिल' लोकनि के आदर्श आइयो दरभंगे महराज छथिन। हुनकर शोषण पर लिखबाक हो तं अहां अंग्रेजी मे जा क' लिखू, हिन्दी मे जा क' लिखू, मुदा क्यो जल मे रहि क' मगर सं बैर करता, से चलै बला नहि अछि। आब कहू जे मैथिली ककर भाषा छी?

           सही बात छै जे दरभंगा नरेश ब्राह्मण रहथि, ब्राह्मणक उपकारार्थ बहुतो काज केलनि, ओ हुनका लोकनिक माथक मुकुट छथिन, हुनका लोकनिक शाश्वत स्मृति मे खचित छथिन। मुदा, बात अइ ठाम ब्राह्मणक नै, मैथिलीक भ' रहल अछि। हुनका लोकनिक शाश्वत स्मृति मे जं महराज खचित छथिन, तं की अहां सोचै छी जे यादव लोकनि कें, पचपनिया लोकनि कें कोनो स्मृति नै होइ छै? ओइ घृणा आ अवज्ञा कें ओ लोकनि बिसरि जेता आ अहांक स्मृति बला जयजयकार सबतरि निर्द्वन्द्व पसरि जायत? ताहू मे अइ स्थिति मे जखन कि बोलचाल मे मैथिली हुनके छियनि, धार्मिक कृत्य मे मैथिली हुनके छियनि, साहित्य-रचनाक आदि प्रेरणा हुनके पूर्वजक देन छियनि।

           मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, ई बात स्वयं ब्राह्मण लोकनि स्थापित केने छला। हुनकर उत्तराधिकारी लोकनि अपन रचना सं, अपन विचार सं, अपन निर्णय आ रणनीति सं, अपन वर्चस्व आ मनमानापन सं साबित करैत रहला अछि जे कि आइयो यथावत जारी अछि। यैह बिहार विधान सभा थिक जतय कहियो स्व. बी. पी. मंडल बाजल छला जे 'मैथिली हमारी माता नहीं, विमाता है।' विमाता सेहो तं अंतत: माते होइ छै। मुदा,ओ दोसर युग रहै। आइ समय बदलि चुकल अछि। संस्कार आ सुविधा दुनू परिवर्तित भ' गेल अछि। तें, अइ तरहक बात जं कतहु सुनी जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी तं हमरा लोकनि कें आत्मावलोकन आ आत्मालोचन करबाक चाही, ई नै जे एकरा 'सुनियोजित षड्यंत्र' कहि क' अपना वर्गक छुद्र मनोवृत्ति बला ठिकेदार 'विद्वान' सभक मनमानी कें नैतिक समर्थन प्रदान करय लागी। अइ मुद्दा पर नितान्त होश मे आबि क' सोचबाक बेगरता छै। 

(मिथिला आवाज, पाक्षिक सं साभार)


Thursday, March 24, 2022

युगों का यात्री: एक जीवनीकार की मुश्किलें

युगों का यात्री

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एक जीवनीकार की मुश्किलें


तारानंद वियोगी


देशव्यापी इस लाकडाउन के दौरान, जब सभी प्रकार के सम्मिलन और गोष्ठियों पर रोक थी, वर्चुअल माध्यमों ने एक नये विकल्प की ओर हिन्दी संसार का ध्यान आकृष्ट किया। यह सोशल साइट के पेज पर लेखक का लाइव आना था। दुनिया भर के पाठक यहां अपने लेखक को न केवल देख और सुन सकते थे, बल्कि उनसे सवाल भी कर सकते थे। यह दौर अभी जारी है और उम्मीद की जाती है कि साहित्य के सिकुड़ते  प्रसार-माध्यमों के बीच यह नया माध्यम अपनी एक स्थायी जरूरत, स्थायी जगह बना लेगा।


बात लेकिन 'युगों का यात्री' पर करनी है, जिसकी रचना-प्रक्रिया पर चर्चा करने के लिए मुझे भी मेरे प्रकाशक, राजकमल प्रकाशन ने अपने पेज पर आमंत्रित किया। उस सीमित समय के भीतर जितनी बातें की जा सकती थीं, मैंने कीं। लेकिन अपने पाठकों की विविध जिज्ञासाओं ने इस ओर मेरा ध्यान आकृ्ष्ट किया है कि इस बारे में मुझे और भी बातें करनी चाहिए।


मेरे बहुत सारे पाठक इस बात पर आश्चर्य करते हैं कि तीन वर्ष के भीतर इस तरह की कोई किताब कैसे लिखी जा सकती है, जिसमें नागार्जुन का अपना बीहड़ जीवन तो खैर है ही, अपने देश भारत का पिछले सौ वर्षों का पूरा इतिहास है, आजादी के पहले और उसके बाद का। फिर स्वतंत्रता-संग्राम की अंतर्वर्ती धाराएं हैं, किसान आन्दोलन, सशस्त्र भूमिगत आन्दोलन, जमींदारी उन्मूलन के लिए किया गया दीर्घकालीन जनान्दोलन, सारा कुछ है। यह सब इसलिए है कि नागार्जुन इन सब में शामिल रहे थे। फिर मैथिल समाज और हिन्दीपट्टी का पूरा समाजशास्त्र है, वे तमाम उद्यम जिन्हें हमारी भूमि के महामना पुरखों ने शुरू किये मगर जो बाद को घोर अगति में जाकर निमज्जित हुए। बिहार का कम्युनिस्ट आन्दोलन, प्रगतिशील लेखक संघ और इसके समानधर्मा दूसरे लेखक-संघों की गति-कुगति। उन दुर्गम यात्राओं का वृत्तान्त जो नागार्जुन ने अपने शुद्ध यायावरी तेवर में किये। उन हजारों लोगों के अनुभव, जो नागार्जुन के संपर्क-सामीप्य में रहे। फिर उनका साहित्य, जिसे अपने कच्चे माल के लिए हमेशा नागार्जुन के जीवनानुभव और आत्मसंघर्ष पर निर्भर रहना पड़ता था। कोई रचना उन्होंने कब लिखी, उसके पीछे घटना क्या थी, सरकार उस बारे में क्या सोचती थी और खुद नागार्जुन सरकार से कहां जाकर असहमत होते थे। इस तरह की और भी न जाने कितनी चीजें जो लिखते समय तो आसानी से लिख दी गयीं मगर अब अपने लिखे जाने का हिसाब मांगती हैं। अशोक वाजपेयी ने इस पर यह टिप्पणी की है कि इस किताब से उनके साहित्य को भी कहीं बेहतर समझा जा सकेगा। जबकि मुझे मालूम था कि मैं उनके साहित्य पर किताब लिखने नहीं बैठा हूं, मेरा क्षेत्र सीमित है। मुझे तो केवल उनके जीवन पर बात करनी है। लेकिन, आप ही बताएं कि उस लेखक का आप क्या कर सकते हैं जिसके समूचे साहित्य में उसका जीवनानुभव घुसा हुआ हो! यह नागार्जुन थे, जिन्हें ढलती उमर में जब यह पूछा गया था कि क्या आप अपनी आत्मकथा लिखने की योजना रखते हैं, तो उन्होंने मानो नोटिस लेने से इनकार करते हुए जवाब दिया था कि मेरी सारी कविताओं को मिला दो, मेरी आत्मकथा हो जाएगी। अपनी रचना को लेकर इतना भरोसा रखनेवाला लेखक विरल होता है, जबकि दूसरा पक्ष यह भी उनके साथ था कि जिस किसी ने जब भी मांगा, कविता लिखी और वहीं उसको दे दी, छपी तो छपी वरना गयी। जाने कितनी बार की उनकी यात्राओं में उनकी कविता की डायरियां खो जाती थीं। उनके बारे में यह जुमला बहुत ही मशहूर था कि 'बाबा कविता बोते और खोते चलते हैं।'


तो, लोग प्रश्न करते हैं कि तीन ही वर्ष में आपने यह सब इतना कुछ कैसे कर लिया, जबकि आप पूर्णकालिक लेखक हैं भी नहीं। अपने पाठकों के इस प्रश्न का मैं सम्मान करता हूं और मानता हूं कि एक सार्थक रचना कई प्रकार के विस्मय रचती है। सच पूछें तो तीन वर्ष की अवधि केवल वह समय है जो मैंने इसे लिखने में लगाया। इसकी तैयारी के लिए जो समय लगा, निश्चय ही वह इसमें शामिल नहीं है। और, सच तो यह भी है कि उस तमाम लगे समय को आप वर्ष के मात्रक से तोल भी नहीं सकते। उसमें तो पूरा जीवन लगा होता है। कई बार जीवन की त्वरा वर्ष के मानक को ध्वस्त कर जाती है, सो अलग। साफ कहूं कि मेरी राय में लेखकों को सिर्फ उन्हीं विषयों पर अपनी किताब लिखनी चाहिए जो जीवन भर का उनका साथी रहा हो। ऊपरी तौर पर लगता है कि भइ, तब तो लेखक के पास लिखने को कुछ भी नहीं रहेगा। आखिर ऐसे विषय हो भी कितने सकते हैं जिनसे लेखक का जीवन भर का साथ रहा हो! लेकिन वास्तविक सच देखें तो ऐसा कतई नहीं है। एक संवेदनशील भाषिक प्राणी को आप इतना कम करके भी न आंके। और ज्यादा न भी हो तो कम-से-कम सौ चीजें तो हर लेखक के खाते में जरूर आएंगी, जिनसे उसकी जनम भर की संगत रहती है। 'जनम भर की संगत' कहना भी कोई निरापद काम नहीं है। मेरा मतलब है, इतनी पुरानी कि इस बीच जीवन में कई-कई मोड़ आ गये हों। जब आप पुरानी संगत के विषयों पर लिखते हैं तो सारा कुछ इस आश्वस्ति के साथ खुलता है कि जैसे उसमें लेखक का 'स्व' बसा हो। ऐसे में जो आन्तरिकता लेखक को, उन लेखन के दिनों में पूरी तरह डुबोए रहती है, वही चीजें जब किताब से होकर पाठक के पास पहुंचती हैं तो उसे भी निमज्जित किये बगैर नहीं रहतीं। पुरानी कहाबत है कि जो दिल से आता है, वही दिल तक जाता है। जिन रचनाओं में हमें प्रबल पठनीयता का गुण मिलता है, ध्यान दें तो इसकी वजह केवल शिल्प की जादूगरी भर नहीं होती। अंदर बहुत सारी  चीजें अन्तर्भुक्त रहती हैं। वहां 'जनम भर की संगत' जैसी चीज की गंध भी होती है। दिल से निकले होने की मन्द्र मधुर ध्वनियां वहां तैरती मिलती हैं।


लेखक को अपने गहन जीवनानुभव के विषयों पर ही लिखना चाहिए, मगर अधिकतर लेखक यह नहीं कर पाते, क्योंकि साहित्य की तत्कालीन रूढ़ियां और उसका बाजार उसे ऐसा करने की सुविधा नहीं देते। कुछ विधाएं अधिक सम्मानदायक मानी जाती हैं, कुछ का बाजार चमकीला होता है, कुछ तो तात्कालिकता की मांग तक से अनुप्रेरित होकर लिखी गयी रहती हैं। बाजार, पुरस्कार और लोकप्रियता की ओर लेखक साकांक्ष हो तो यह मुश्किल है कि वह अपने जीवनानुभव पर एकाग्र रह पाएगा। इसके कई कारण होते हैं।‌ हमारे कई अनुभव ऐसे हो सकते हैं जिनके लिए साहित्य के पास कोई लोकप्रिय विधा नहीं होती। फिर यह भी संभव है कि बाजार के पास, या 'समकाल' के पास ऐसी किसी रचना के लिए कोई परवाह ही न हो। यह गहन निस्संगता की स्थिति भी हो सकती है। पुराने जमाने के कवि स्वान्त:सुखाय की बात करते थे। लेकिन यह बात किसी भी जमाने के लिए बराबर की सच हो सकती है, जिसका अर्थ हमेशा सामाजिकता से, सामाजिक संदर्भों से कटना ही नहीं होता। यह भी हो सकता है कि लेखक ने कोई ऐसी रचना लिखी जो उस जमाने के फैशन में शामिल नहीं थी, उसका कोई सहृदय सामाजिक वर्ग तक नहीं था। कई बार हमें यह देखकर चकित होना पड़ता है कि भरपूर सामाजिकता से पगी कोई रचना किसी ऐसे लेखक ने लिखी जो स्वान्त:सुखाय लिख रहा था। यह और कुछ नहीं, अपने काल की रूढ़ियों, गतानुगतिकताओं का अतिक्रमण है। फिर यह भी है कि हर जीवनानुभव अपने लिए अलग-अलग शैली, अलग-अलग अनुशासन की मांग रखता है, और हमेशा यह जरूरी नही कि बाजार के पास उसके लिए जगह हो। या अगर हो भी तो चटकीला हो, प्रतिष्ठादायक हो। तो, स्थिति यह बनती है अभिव्यक्ति की आंतरिक जरूरत बाजार की उपलब्धताओं पर निर्भर नहीं रह सकती। 



जैसे, जीवनी विधा को ही लें। इस विधा में काम तो कई उच्च कोटि के हुए हैं, एक किताब के तौर पर उन रचनाओं की अपनी ख्याति भी है, बाजार भी। लेकिन यह सब ऐकान्तिक रूप से उस किताब की उपलब्धियां हैं, विधा की नहीं। वरना यह क्योंकर होता कि जिस विधा में 'कलम‌ का सिपाही' और 'आवारा मसीहा' जैसी कृतियां लिखी गयीं, उस जीवनी-लेखन विधा को क्रियेटिव लेखन का दरजा तक प्राप्त नहीं है। उपन्यास लिखने की तुलना में इसे एक दोयम लेखन की हैसियत हासिल है। फिर यह भी है कि जीवनी-लेखन और प्रकाशन की कोई व्यस्थित परंपरा भी नहीं है, न बाजार। राजनेताओं और सामाजिक सुधारकों, धार्मिक झंडाबरदारों की जीवनी का अपना पाठक-वर्ग है, जरूरी नहीं कि वह साहित्य का पाठक हो। लेकिन, साहित्यकारों और दूसरी कलाविधाओं के वरिष्ठों की जीवनियां लिखने की परंपरा क्यों नहीं है? पर, यह सारे सवाल अपनी जगह हैं। लेखक की अपने विषय के साथ अंतरंगता इन सभी झंझटों से बचाकर उसे आगे निकाल ले जाती है। यह उसकी चिन्ता की वजह नहीं बनता कि उसके लिखे को कौन-सा दरजा मिलने वाला है। वहां रचना की आंतरिक जरूरत ही मुख्य होती है। वह रचना, जो उसके जीवनानुभव से निकलकर आती है।


नागार्जुन से मेरी पहली मुलाकात, बहुत शुरूआती दिनों में, जब मैं मुश्किल से सतरह-अठारह का रहा होऊंगा, हुई थी। उनसे उस पहली मुलाकात में हुई बातचीत का उल्लेख मैंने 'तुमि चिर सारथि' में किया है कि कैसे जब मैंने उनसे कहा कि बाबा, आपने इतना समय, इतना मान मुझे दिया यह मेरा सौभाग्य है, तो उन्होंने तपाक से कहा था कि अरे, सौभाग्य तो हमेशा फिफ्टी-फिफ्टी होता है। उन दिनों वह अपनी प्रसिद्धि के शिखर पर थे, लेकिन एक अनजान नौजवान से मिलने की यह गर्मजोशी उनमें थी, जो निहायत विशेष थी। जाहिर है, ऐसे लोगों को आप‌ भूल नहीं सकते। वह बार-बार आपकी स्मृति में झांकते रहेंगे। हद यह थी कि इस स्मृति को उपस्थिति में बदल देने की पहल भी वही अपनी ओर से शुरू कर देते थे--पत्रों से, बुलावा देकर, खुद उपस्थित होकर। जबतक जिये, कमोबेश मैं उनकी संगत में बना रहा। यह इतना गहन था कि उनके निधन से बात खत्म नहीं हो सकती थी। अनेक रूपों में वह मेरे जीवन में रहे चले आए। 'तुमि चिर सारथि' उनके निधन पर लिखी गयी थी। और अब जबकि पचपन पार हूं, कई घाट-कुघाट भटक आया हूं उनकी संगत बरकरार रखते, अब जब उनकी जीवनी पर काम करता हूं तो स्वाभाविक है कि उनका व्यक्तित्व, या और भी तमाम बातें आन्तरिकता से मुखरित होंगी। उसमें मेरे जीवनानुभव को शामिल होने से आप नहीं रोक सकते।



मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल था कि इस किताब की रूपरेखा क्या होगी! नागार्जुन के जीने का, और लिखने का भी, ढंग ऐसा था कि वह किसी एक व्यक्ति की तरह लगते ही नहीं थे। खुद कहते थे कि 'व्यक्ति तो जरूर हूं वरना 'व्यक्त' कैसे होता! किसी भी हाल में लेकिन इकाई नहीं हूं, सामूहिक मन की दहाई, सैकड़ा, हजार... जो समझ लो।' वह उन लेखकों में से थे जिनके जीवन में उनके काल का इतिहास शामिल रहता है, और वह खुद इतिहास में। कमलेश्वर ने बड़ा अच्छा तो लिखा है कि आप भारत-भूमि पर कहीं भी चले जाएं, कोई-न-कोई आदमी आपको ऐसा दिख जाएगा जो ठीक-ठीक नागार्जुन जैसा लगेगा, जबकि मुक्तिबोध को छोड़कर और कोई दूसरा हिन्दी लेखक ऐसा नहीं हुआ जो आम जन की प्रतिच्छवि बनकर बराबर इस तरह खड़ा जाए। लेकिन, प्रतिभा और उद्यम आदमी को भीड़ से अलग करते चलते हैं। इसी की वजह से तो इतिहास में शामिल होना भी हो पाता है। जाहिर है, ऐसे आदमी की जब आप जीवन-कथा लिखेंगे तो उसकी वैयक्तिकता से बाहर जाकर दूर-दूर तक के इलाके आपको खंगालने होंगे। इधर वैयक्तिकता जो होगी, वह भी वैयक्तिक-सी नहीं दिखेगी। लेकिन, विषय के साथ जीवनीकार की अंतरंगता हो तो वह जहाज-भर की सारी रूई धुनने को तैयार हो जाता है।


एक छोटा-सा उदाहरण दूं तो बात ज्यादा साफ होगी। नागार्जुन से जब लोग पूछते थे कि राजनीति की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ, जबकि आप तो बौद्धमठ में निवास करने वाले एक भिक्षु थे, तो वह स्वामी सहजानंद का नाम लेते हुए उन्हें अपना राजनीतिक गुरु बताते थे, और कहते थे कि श्रीलंका से लौटकर भिक्षुवेश में ही उन्होंने स्वामी जी द्वारा आयोजित एक महीने तक चलनेवाले 'समर स्कूल आफ पालिटिक्स' में भाग लिया था, उसमें देश भर के तपे तपाए समाजवादी और साम्यवादी क्लास लेते थे। बस, इतना ही बताते थे। इस स्कूल के बारे में इससे ज्यादा न कहीं कुछ उन्होंने लिखा, या  किसी को बताया। वह स्वतंत्रता संग्राम का समय था। सहजानंद उग्र वामपंथ की राजनीति करते थे। वे उन दिनों किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, और बिहार का किसान आन्दोलन निर्णायक रूप से सक्रिय और उग्र हो रहा था। समूचे स्वतंत्रता संग्राम की या फिर किसान आन्दोलन की ही बात की जाए तो महीने भर चले इस स्कूल का कोई खास महत्व नहीं था। ऐसे स्कूल तो उन दिनों अक्सर चलते रहते थे, क्योंकि उस जमाने के अग्रणी नेताओं की यह समझ थी कि जनता को राजनीतिक रूप से शिक्षित और सचेत करने के लिए ऐसे स्कूल चलते रहने चाहिए। इसमें पर्याप्त जन-सहयोग मिलता था और यहां तक कि उन दिनों की कांग्रेस सरकार(1937) का भी सपोर्ट रहता था, इसलिए ऐसे स्कूल तो अक्सर यत्र-तत्र चलते रहते थे। इतने विशाल किसान आन्दोलन में, और उससे भी विशाल स्वतंत्रता संग्राम में भला ऐसे किसी एक स्कूल की क्या अहमियत हो सकती थी? इसलिए इतिहास की किताबों में, यहां तक कि राज्य के स्वतंत्रता संग्राम में बिहार की भागीदारी पर कई वोल्यूम में लिखे गये इतिहास-पुस्तकों में भी, इस स्कूल के बारे में कुछ भी लिखा हुआ नहीं मिलता था।  लेकिन, एक जीवनीकार की समस्या देखिये कि जिस स्कूल की कोई खास अहमियत नहीं मानी गयी, उसके लिए वही सबसे बड़ी घटना है क्योंकि उसके चरितनायक के राजनीतिक विचार वहीं निर्मित होते हैं। हर कोई जानता है कि नागार्जुन न केवल एक स्पष्ट और सचेत राजनीतिक नजरिया रखनेवाले लेखक थे, बल्कि पार्टी की सदस्यता लेकर, उसके अधिकारी बनकर उन्होंने सक्रिय राजनीति भी की थी। इस अनुमान के आधार पर कि क्रान्तिकारी राजनीति के प्रति ब्रिटिश सरकार का रवैया सख्त था तो जरूर ही उसने इन गतिविधियों के ऊपर अपने जासूस लगाये होंगे, मैं सरकारी अभिलेखागारों में सीआईडी रिपोर्ट्स की पुरानी फाइलें खंगालता था। अनुमान सच था। सहजानंद की हर गतिविधि पर खुफिया विभाग की नजर थी। और, जहां तक इस स्कूल का सवाल है, इसके बारे में तो खुफिया के डीआईजी की बीस पृष्ठों की भेजी एक रिपोर्ट मुझे मिली, जिसमें यहां तक अंकित था कि किस दिन के किस क्लास में किस आदमी ने क्या पढ़ाया, क्या आपत्तिजनक, विद्रोहात्मक, भड़कानेवाली बातें कीं। हां यह जरूर था कि कोर कमिटी की जो गुप्त बैठकें हर रोज होती थीं, वहां खुफिया का सूत्र बाधित था।  तो, यह सब करना होता है।


किसान सभा में जब नागार्जुन कार्यकर्ता नियुक्त हुए, उन्हें स्वामी जी ने उस चंपारण में काम बढ़ाने भेजा जो गांधीजी का 'बैनामा' जिला कहलाता था। यह चंपारण सत्याग्रह का असर था कि गांधी के खिलाफ वहां कोई भी कुछ सुनना नहीं चाहता था, जबकि सहजानंद की पूरी राजनीति गांधी के खिलाफ थी। खिलाफ तो असल में वह जमीन्दारों के थी, लेकिन गांधी का इस मुद्दे पर लगातार चुप रहना उन्हें भी इस जद में ले आता था। इसे नागार्जुन की संगठन-क्षमता के प्रमाण के तौर पर देखा जाना चाहिए कि सहजानंद ने उस कठिन जगह पर काम करने भेजा जहां लोग समाजवादियों की आमसभा करने के लिए अपनी जमीन तक देने के लिए तैयार नहीं होते थे। वहां नागार्जुन के साथ जो टीम थी, वह बिलकुल वही टीम थी जिन्होंने भगतसिंह और चन्द्रशेखर आजाद, बैकुंठ शुक्ल के साथ काम‌ किया था। बैकुंठ के भाई केदारमणि तो तमाम समय नागार्जुन के साथ बने रहे, यहां तक कि भागलपुर जेल में भी दोनों साथ ही बंद थे।


अब लेकिन मुश्किल यह कि इन सब चीजों के बारे में नागार्जुन का कहा हुआ या लिखा हुआ कुछ खास नहीं मिलता था। सहजानंद ने अपनी आत्मकथा में चंपारण की चुनौतियों और उसके निराकरण का वर्णन तो खूब किया है, यहां तक कि अपने अग्रगामी कार्यकर्ता दल की बड़ी तारीफ की है, लेकिन नागार्जुन का कहीं नाम नहीं लिया है, किसी का भी नहीं लिया है। इधर,नागार्जुन की एक प्रवृत्ति हम यह देखते हैं कि अपने जिन जीवनानुभवों को उन्होंने लेखन का विषय बनाया, उसपर या तो उपन्यास लिखे हैं या फिर कविताएं। इन सृजनात्मक विधाओं की अपनी सीमा है कि उन्हें आप निर्द्वन्द्व होकर इतिहास की तरह उपयोग नहीं कर सकते। कदम-कदम पर यथार्थ के बीच कल्पना के मिश्रित रहने का खतरा रहता है। और कुछ न करें तो नाम-गाम ही बदल देंगे।  ऐसे में कोई जीवनीकार क्या करे? आसान रास्ता तो यही है कि ऐसे मामलों को छोड़ ही दिया जाए, जैसा कि ज्यादातर लोग करते भी हैं। मैंने लेकिन कुछ आगे बढ़ने का फैसला किया। इस बीच आकर क्या हुआ है कि बिहार सरकार के अभिलेखागार ने किसान आन्दोलन से संबंधित मूल दस्तावेजों को लेकर कुछ किताबें प्रकाशित की हैं, बाकी चीजें, यदि अध्येता चाहे तो मूल रूप में या डिजीटल रूप में उन्हें देखने की सुविधा वे देते है। उन‌ दस्तावेजों को जब मैंने देखा, पाया कि सहजानंद की प्राय: हर मीटिंग पर खुफिया की निगरानी थी, और बराबर ही उसकी भेजी रिपोर्ट पाई जा सकती है। पाया कि उन सभाओं में जिन खतरनाक लोगों को उन्होंने चिह्नित किया हुआ होता था, उनमें एक भिक्षु नागार्जुन भी होते थे। इस तरह तमाम चीजों को मिलाएं तो एक संगति-सी बनती जाती थी।


नागार्जुन ने जो अपना प्रसिद्ध उपन्यास 'बलचनमा' लिखा, उसमें उनके किसान आन्दोलन दौर के जीवनानुभव वर्णित हैं। नागार्जुन के उपन्यासों में कल्पना और यथार्थ का संतुलन बिलकुल अलग ढंग का होता था। बहुत जरूरी हो तभी वह कल्पना का सहारा लेते वरना यथार्थ ही इतने भरपूर और सघन थे कि कल्पना की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। लेकिन मुश्किल यह कि वहां उन्होंने लोगों और जगहों और अवसरों और माध्यमों  के नाम बदल दिये होते थे। जैसा कि मैंने कहा,  इनका उपयोग आप इतिहास की तरह निर्द्वन्द्व नहीं कर सकते थे। पर, जब आप 'बलचनमा' और 'मेरा जीवनसंघर्ष' को साथ मिलाकर पढ़ते हैं तो तमाम औपन्यासिकता पर से परदा उठ जाता है। उन दिनों 'जनता' साप्ताहिक निकलती थी, जिसके संपादक रामवृक्ष बेनीपुरी थे। उपन्यास में इसका नाम 'क्रान्ति' दिया गया है। यह किसान आन्दोलन का लगभग मुखपत्र था। बहुत सारे संदर्भ दिये हैं कि वहां ऐसा छपा, उसने ऐसा लिखा आदि, तो इसका फैसला आप 'जनता' के उन अंकों को देखकर कर सकते हैं।


लगभग यही स्थिति हम उनके भिक्षु-जीवन के दिनों का पाते हैं, जहां के अनुभवों पर तो उनका उपन्यास भी नहीं आया। लंका के दिनों के बारे में उन्होंने अपने कुछ मित्रों से बात की थी। कुछ बातें मुझसे की थीं। मेरा यह निर्णय शुरू से ही था कि मौखिक बातों, घटनाओं का उपयोग यहां न करूंगा, केवल मुद्रित, तथ्यात्मक साक्ष्यों को ही आधार बनाया जाएगा। ऐसे में बहुत सारी बातें ऐसी थीं जो उन्होंने मुझे या मित्रों को बताई तो जरूर थीं लेकिन उसका कोई लिखित साक्ष्य मिलना मुश्किल था। वह सब कहीं लिखा, छपा हुआ नहीं मिलता था। इशारे तक में नहीं। सात साल पहले उसी मठ में राहुल सांकृत्यायन रहे थे। नायकपाद सहित सारे के सारे आचार्य वही थे जो तब थे, इसका पता विद्यालंकार परिवेण के इतिहास और परंपराओं को देखने से मिलता है। राहुल जी ने 'मेरी जीवन-यात्रा' में अपने उन दिनों का विस्तृत विवरण दिया है। उससे एक अन्विति बनती है, और चीजें और स्थितियां दृश्यात्मक होती हैं। इसका मैंने विवेकपूर्वक उपयोग किया। यानी कि उनकी बताई जिन बातों की पुष्टि मठ की परंपरा से या राहुल जी की जीवनयात्रा से होती हो तो उसे ग्रहण किया, वरना अपने अनुभव में संचित रखा। पर, गहरी आन्तरिकता से लिखी रचना का एक वैशिष्ट्य यह भी होता है कि लेखक ने जिन बातों को अपने अनुभव में संचित और सीमित कर लिया होता है, उसकी खुशबू भी लेखन में व्याप्त हो जाने से बच नहीं पाती।


ठीक यही  समस्या वहां आती है जब द्वितीय विश्वयुद्ध के ऐन शुरुआती दिनों वह तीसरी बार जेल जाते हैं। वह ट्रेन‌ से जा रहे थे। साधू भेस में। सामान नीचे सीट के नीचे बोरों में भरा। वह क्या था तो एक पैम्फलेट के बंडल, 'न एक पाई न एक भाई'। यह सुभाष बोस का दिया नारा था, ब्रिटिश सरकार जो द्वितीय विश्वयुद्ध के लाम‌ पर भेजने के लिए बड़ी संख्या में सिपाहियों की बहाली कर रही थी, और घर-घर से युद्ध फंड के लिए लोगों से दान और चंदा वसूल रही थी, यह उसके विरुद्ध था। नागार्जुन उन दिनों सुभाष बोस के साथ, उनके समर्थन में जनजागृति अभियान पर थे कि न किसी घर से कोई भाई सिपाही भरती में भेजा जाए, न एक पैसे का भी चंदा दिया जाए। उन्होंने बताया है कि रास्ते में सर्च हुआ तो भिक्षु के पास बोरे देखकर पुलिस ने पूछा क्या है, तो बताया आलू है, लेकिन सिपाही ने बोरा खोलकर देख लिया और नागार्जुन गिरफ्तार कर लिये गये। उन दिनों के कानूनी प्रावधान क्या थे, विद्रोही साहित्य को प्रतिबंधित करने के लिए खास प्रावधान क्या किये गये थे, जो साहित्य बरामद किया गया उसमें क्या-क्या चीजें थीं, उनकी भाषा, उनका कंटेन्ट, विधा-- बहुत सारे प्रश्न थे, जिनका उत्तर तलाशना था। सरकार के खुफिया‌ विभाग ने सरकार को भेजे अपने प्रतिवेदनों के साथ प्रतिबंधित साहित्य की प्रतियां भी संलग्न की होती थीं। विद्रोह लेकिन तगड़ा था और ऐसा साहित्य भी बहुत सारा था। मुझे पूरी उम्मीद थी कि उस पैम्फलेट की प्रति भी मुझे मिल जाएगी। बहुत सारी चीजें तो मिली, लेकिन वह नहीं मिल पाई। मैं समझता हूं कि यह काम भविष्य के जीवनीकारों के हिस्से रहेगा। जो कुछ प्रतिबंधित चीजें मुझे मिल सकीं उनका विवरण किताब में आया है।


नागार्जुन के जीवन के दो अलग अलग चरण हमें स्पष्ट दिखाई देते हैं। पहले चरण में गति है, जबरदस्त गति है, दूसरे चरण में इसे हम जैसे अचानक‌ घट जाती हुई देखते हैं। अब गति नहीं, स्थिति है। 'युगों का यात्री' के पहले अध्याय को आप ठीक इसी जगह पर आकर खत्म होता हुआ पाएंगे जहां गति रुकती है। लेकिन सब जानते हैं, गति अचानक से स्थिति पर नहीं पहुंचती। वह पहले धीरे-धीरे घटती है। नागार्जुन का लगभग समूचा कथालेखन इसी घटती गति का विन्यास बताता है। इसे आप दूसरे अध्याय में पाएंगे। इसलिए उस अध्याय की शैली भी आप थोड़ी बदली हुई पाएंगे। तीसरे अध्याय में आकर यह शैली बिलकुल ही बदल जाती है। यह दरअसल गति के स्थिति में निमज्जन की कथा है। पहले अध्याय की समाप्ति ठीक उस जगह आकर होती है जब नागार्जुन फैसला करते हैं कि उन्हें घर को साथ लेकर चलना है, शोभाकान्त जी ने इसे उनके 'सद्गृहस्थ' साबित होने की उनकी सदिच्छा का नाम दिया है, जिसमें कि अन्तत: वह सफल नहीं हो पाए। नागार्जुन के जीवन का यह दिलचस्प पहलू है कि उन्हें स्थिति को गति में स्वेच्छानुसार परिवर्तित करते रहने में महारत हासिल था। हजारों लोगों से एक साथ जुड़े रहने का जो उनका पक्ष था वह यही था। स्थिति को गति में परिवर्तित करने की यांत्रिकी। यात्रा और ठहराव साथ-साथ उनके जीवन में चलते रहते थे। चले, फिर कहीं रुक गये, जी भरकर महसूस किया, फिर चले, रुके, फिर चले। जिन्दगी भर उनके जीवन में यही चलता रहा था। ऐसा रुकना भी हुआ कि कई वर्षों तक रुके रह गये, अक्सर तो ऐसा अपने घर में ही हो जाता था। लेकिन यह शुरुआती दिनों में, जब बच्चे छोटे थे। तरौनी, पटना और दिल्ली। बाद के दिनों में तो रुकने के दिनों की आखिरी संख्या निर्धारित कर ली थी, पन्द्रह। बाद में तो ऐसे गिने चुने घर (शहर) ही रह गये जहां मास-दो मास उनका मन रमता था। अब ऐसे आदमी की जो जीवनी होगी वह सपाट, सरल रैखिक नहीं हो सकती। उसे सारे कुछ को साथ समेटकर चलना होगा, यदि चरितनायक को और उसके समय को मूर्त करना हो तो। लेकिन, यह हरेक जीवनीकार की चुनौती होती है कि वह इतनी सारी अक्ल लगाने के बावजूद अपनी एक शैली निर्मित कर सके, जिससे रचना अन्तत: पढ़ी जा सकने के लायक बची रह सके। वरना, बातें तो वहां आप तमाम लाकर भर देंगे लेकिन वह भराव ऐसा बियावान रच देगा कि किताब ही पढ़ने लायक नहीं बचेगी!

           घटनाबहुल दिनों के आख्यान की जो शैली होगी, ठीक वही शैली अल्प घटना, किंतु प्रबल 'स्थिति' के दिनों के लिए नहीं हो सकती। यह एक आसान-सी बात है जिसे हर कोई समझ सकता है। इस बात को कोई और कहे, इससे ज्यादा अच्छी तरह स्वयं नागार्जुन की कविताएं बयान करती हैं। इतनी सारी शैलियां उनके यहां हैं कि चकित करती हैं। वह खुद कहते थे कि कन्टेन्ट अगर सच्चा हो तो अपने लिए अपनी शैली लेकर ही प्रकट होता है, लेखक में तो बस उसे पकड़ पाने का हुनर होना चाहिए। तीसरे अध्याय में आप देखेंगे कि जहां घटना-बहुलता है वहां तो वृत्तान्त की शैली है, यद्यपि कि वह भी ठीक-ठीक पहले अध्याय की तरह नहीं, बल्कि विश्लेषण और पृष्ठभूमि-विवरण के तत्व भी वहां मिले-जुले हैं। लेकिन, जहां अल्पता है वहां की शैली बिलकुल ही बदल गयी है। अपने कुछ गुणों और दुर्गुणों के कारण नागार्जुन खासे चर्चित बने रहते थे। जैसे कि उनका क्रोध या ताजा से ताजा नयी पीढ़ी के साथ उनकी मौजमस्ती, या फिर न नहाने, न मुंह धोने, भोजन के मामले में चटोरेपन आदि-आदि। यहां आकर आप देखेंगे कि एक-एक मामले को उठाकर उसपर लोगों की राय, उनका कथन, उनकी आदतों आदि का मानो कोलाज तैयार कर दिया गया है। इस तरह कंटेन्ट ने खुद अपने लिए शैली इजाद कर ली है।

           नागार्जुन में एक बड़ी खूबी यह थी कि नितांत घटनाविहीन दिनों को भी घटनाबहुल बना लेने के सौ गुर उन्हें मालूम थे। वह लोगों से घिरे रहते। अलग-अलग जगहों की यात्रा करते रहते। अलग-अलग शैलियों में कविताएं लिखते रहते। उनसे जुड़ा हर आदमी अपने आपमें एक इतिहास होता था। इसके लिए यह जरूरी नहीं कि वह कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति ही हो। वह एक साधारण रिक्शेवाला, कोई किसान, कोई बेरोजगार युवक हो सकता था। सामने वाले की महत्ता नहीं, उसे महत्वपूर्ण बनाती थी खुद नागार्जुन की स्मृति, जहां पहली मुलाकात से लेकर पिछली मुलाकात तक के सारे किस्से जीवन्त और मूर्त बने रहते थे। साधारण की प्रतिष्ठा का जो रूपक हमें नागार्जुन के जीवन और साहित्य में मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। नागार्जुन की यायावरी प्रसिद्ध थी। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जो भी उनकी पसंदीदा जगहें थीं, और ऐसी जगह हजारों में थी, वहां कम-से-कम दो बार तो वह जरूर ही हो आए थे। लेकिन, आश्चर्य होता है यह देखकर कि स्थानवाची कविताएं‌ नागार्जुन के यहां बहुत ही कम हैं, और व्यक्तिवाची कविताएं तमाम भरी पड़ी है। यह एक महत्वपूर्ण सूत्र देता है कि भूगोल का महत्व उनके लिए जीवंत मनुष्य, और पर्यावरण में मनुष्य के तमाम साथियों से मिलकर ही बनता है-- गाछ-वृक्ष, पशु-पक्षी, यहां तक कि मादा सूअर, नेवला, बच्चा चिनार-- इन तमाम को नागार्जुन की कविता में मुकम्मल नागरिकता हासिल थी। स्थानों का महत्व उनके लिए अतीत, या उसके किसी माहात्म्य को लेकर नहीं, वहां रहनेवाले लोगों को लेकर था, जिनसे उनका जुड़ाव गहन था, उन लोगों तक से जो उन्हें पहचानते तक न थे जबकि नागार्जुन बखूबी उन्हें जानते थे। उनके पुराने मित्र केदारनाथ अग्रवाल ने कहीं लिखा है कि बांदा जब वह जाते थे, शहर के उन नितांत साधारण, मलिन मुहल्लों में भी पहुंचते, यहां तक कि ऐसी जगहों पर जहां स्वयं केदार जी भी कभी नहीं गये होते थे। और, यह भी नहीं कि एक बार हो आए, उन जगहों के बाशिन्दा कई उनके पुराने मित्र भी पाये जाते थे, जिनसे संपर्क कहीं और नहीं, बांदा आने पर ही पहली मुलाकात के दौरान हुई होती थी। तो, गतिहीनता इसे कोई कैसे कह सकता है? अपनी 'स्थिति' को भी गति प्रदान कर देने की जो उनकी यांत्रिकी थी, वह लाजवाब थी। इन सारे प्रसंगों को एक शैली में, जहां कि तमाम छूटे हुए किस्से भी अपना वाजिब प्रतिनिधित्व पहले से ही पा गये प्रतीत हों,में ही कायदे से ढाला जा सकता है। नागार्जुन के इतने संपर्क थे, इतना विस्तार था कि  430 पृ्ष्ठ की एक किताब में उसे पूरा का पूरा समेट पाना असंभव बात है। मैंने वहां स्वीकार भी किया है कि उनकी जीवनी के दसियों वर्सन संभव हो सकते हैं, जिनमें से एक यह है। बावजूद इस विनम्र स्वीकारोक्ति के, वहां किया यह गया है कि तमाम संभावित वर्सन के प्रतिनिधि तत्व यहां आपको दिख जाएंगे। यह चीज इस किताब को गहन और यादगार बनाती है। वैसी, जैसी कि मैं लिखना चाहता था।


लेकिन, सौ बात की एक बात यह है, जैसा कि मैंने किताब की भूमिका में लिखा भी है कि दो-चार साल यदि इस किताब के साथ और बने रहने का अवसर मुझे मिला होता तो यह और भी ज्यादा हू-ब-हू हो सकती थी! लेखक के इस 'किन्तु,परन्तु' का क्या जवाब हो सकता है? बस केवल हम यही याद कर सकते हैं कि पुराने जमाने के हमारे लेखक समूचा जीवन लगाकर भी बस एक किताब ही क्यों लिख पाते होंगे!



Friday, February 4, 2022

एम्हर जे पढ़लहुं-5. प्रणाम बाबा/ कीर्तिनारायण मिश्र

 

समयबोध सं लैस सरलताक कवि
तारानंद वियोगी

कीर्तिनारायण मिश्र मैथिलीक वरिष्ठतम कवि लोकनि मे अन्यतम छथि। पछिला साठि वर्ष सं बेसिये समय सं ओ मैथिली मे कविता लिखैत रहला अछि। एहि बीच अनेक युग, अनेक पीढ़ी, अनेक काव्यान्दोलन बीति चुकल अछि। हुनका सदैव साहित्यक गतिविधि मे आ काव्यलेखन मे सक्रिय देखल गेल। मैथिली मे यात्रीक प्रथम पीढ़ीक शिष्य लोकनि मे सं एक प्रमुख ओ छथि तं राजकमल चौधरीक घनिष्ठ मित्र लोकनि मे सं अन्यतम वैहटा छथि जे एखनहु सृजनशील छथि। एखन हाल मे जे हुनकर कवितासंग्रह 'प्रणाम बाबा' नवारंभ सं आएल अछि, से हुनकर कवित्व आ संवेदनाक एहि समुच्चा यात्राक अविस्मरणीय स्पंदन सब लेने प्रकट भेल अछि। अनेको ठाम एहि संग्रहक कविता सब सजग पाठक कें विस्मय सं भरि दैत छैक, आ ठोस कारण दैत छैक जे मैथिली कविताक विकासमानता पर किएक मुदित हेबाक चाही।
            संग्रह मे 37 गोट कविता संकलित छैक। ई कविता सब एक चूड़ान्त संवेदनशील वरिष्ठ नागरिकक अनुभूतिक संसार मे हमरा लोकनि कें ल' जाइत अछि। अद्भुत अछि एहि संसार कें देखब। वृद्धक जीवन के संपूर्ण सकार्थता एतय प्रकृति आ पर्यावरणक संग नव पीढ़ीक नेना सभक संग एकलयता आ एकतानता मे व्यक्त भेलैक अछि। फूल-पात, गाछ-वृक्ष, चिड़ै-चुनमुन, तरह-तरहक प्राणी-संसार जे मनुक्खक संग अपन सहअस्तित्व जारी रखबाक लेल लालायित अछि। मुदा, एम्हर मनुक्खक की मंशा छैक? किएक ओ गाछ सब कें काटने चलि जाइए आ कंक्रीटक जंगल पसारने जाइए? जे पृथ्वी प्रेमपूर्ण सहअस्तित्वक पुकार संग चौबीसो घंटा भयानक घूर्णनो मे अपन संतुलन बनौने नाचि रहल अछि, ओहि पृथ्वी पर किएक प्रेमक बदला घृणाक आबोहवा एते पसारि देल गेलैए जे एहू कवि कें कहय पड़ैत छनि-- 'नीक हो जं अहांक जन्म नहि होअए/ नहि देखू ओ संसार/ जकर हम क' रहल छी निर्माण/जकरा हम बना देने छी विषाक्त/ एहि विनाश-गृह मे तं होइत छैक/ मात्र घृणा केर संचार।'(अजात शिशुक नाम)
            एहि संग्रह मे आरो बहुत रास कविता सब अछि जे अपना देश-समाजक वर्तमान परिस्थिति सभक मादे अत्यन्त वेधकताक संग लिखल गेल अछि। बहुत रास विडंबना तं एहनो छै जाहि सं समुच्चा दुनिया प्रभावित अछि आ अपन देश-समाज सेहो। आजुक घृणामूलक ओछ राजनीति पर, आ एहि राजनीति के द्वारा बनाओल गेल विकासक माडेल पर तं कैकटा कविता अछि जे भीतर धरि बेधैत अछि। ई दुनिया स्वार्थान्ध मनुक्ख सभक द्वारा कते भीषण नरक बना देल गेल अछि, से बात कत्तहु नहि बिसराइत छैक-- 'बाज भाइ बाज/ एम्हर छउ नेता, ओम्हर दलाल/ बिचला रस्ता पर शोणित के थाल/ हत्या मे कटबें कि होयबें हलाल/ बाज भाइ बाज।'(चल भाइ चल)
            मुदा, एहि कवितासंग्रहक खूबी बहुत पैघ अछि जे ई सबटा अधलाह पक्ष पृष्ठभूमि मे रहैत छैक। सामने जे दृश्य देखाइत छैक ओ बहुत आनंददायक आ प्रेरक अछि। एकरा सब कें देखने बेर-बेर सेहन्ता जगैत छैक जे हं, जीवन कें एहने प्रेमपूर्ण, एहने सद्भावना आ निश्छलता सं भरल, एहने सुंदर सहअस्तित्वक आगार हेबाक चाही। ई एक एहन विशेषता अछि जकरा लेल एहि संग्रह के महत्व सदा बनल रहतैक। मुदा की एहन कविता लिखि सकब कोनो आसान बात थिक? नहि। आसान तं नहियें, बहुत कठिन बात थिक। कीर्तिनारायण मिश्र-सन क्यो सिद्ध कविये एहन कविता लिखि सकैत छथि।
             एना कोना संभव भ' सकल अछि ताहि पर जं एक नजरि दी तं बात किछु साफ भ' सकैत अछि। एहि कविता सभक मुख्य विषय थिक बच्चा, दोसर गाछ-वृक्ष, तेसर चिड़ै-चुनमुन। आ अंत मे एक वृद्ध जे बच्चा सभक पितामह-तुल्य छथि आ एहि समस्त विषय सभक प्रति नितान्त संवेदनशील, सद्भावपूर्ण छथि। बच्चा सब केहन? 'गिलसी भरि- भरि/ हुलसि-हुलसि/ गमला मे दइ छथि पानि/ फूल-पात सं की बतियाबथि/ कोना सकब हम जानि?'(तारा) आ, गाछ-वृक्ष केहन? सहअस्तित्व लेल सदा यत्नशील-- 'कखनहु फूल, कखनहु पात खसबैत अछि/ गाछ-वृक्ष खिड़की सं रोज बजबैत अछि।'(से सभ की जान' गेल)
             'गिल्लू' एकटा लुक्खीक बारे मे अछि जे झाड़ीक दोग सं हुलकी मारि जखन भागि जाइत अछि तं कवि कें आश्चर्य होइत छनि जे मैथिल कन्याबला ई कला ई कोना सिखलक? मुदा जखन दोस्ती भेलैक, बेसी काल लगे मे आबि खेलय लागल। आ कवि जखन ओहि परदेस सं विदा होअय लगला, घरबे कें कहैत छथिन-- 'छोड़ि क' जा छी अहां लग ई दुलारू बेटी/ हमरा सब जतय रहब अहां लोकनि मोन पड़ब/ संगहि मोन पड़त अहांक ई चंचल प्रतिवेशी।'(गिल्लू)
             तहिना, 'रुस्सा-फुल्ली' कविता एक बछरूक बारे मे अछि जे अपन माय सं रुसल अछि-- ' हमर-अहां के देखा-देखी/ मुंह लटकायब सीखि गेल अछि/ अप्पन बछरू/ माय थुथुन सं देह हंसोथइ, ओ नहि डोलय/ सींग सटा गुदगुदी लगाबइ आंखि ने फोलय/ चुम्मा लइ छै, नाक घसइ छइ/ हंफिया-हंफिया पुचकारै छइ/ किन्तु ने ओ कनियों टसकइ छइ/देखि-देखि ई रुस्सा-फुल्ली/ हम चिन्तित छी।' तहिना, एकटा कौआ अछि जे मनुक्खक जाबन्तो चलाकी कें पकड़ि लेलक अछि आ ओकरा भगाबक लेल जे बिजूखा खेत मे ठाढ़ कयल गेलैए ओकरे माथ पर बैसि क' 'पांखि खजुआबैत अछि, चोंच पिजबैत अछि/ फूल चोंचिआबैत अछि/ आ फड़ तोड़ि क' उड़ि जाइत अछि।' कते कहल जाय, चमौटीबला कुकूर अछि, निश्छल-निर्भीक छोटकी फुद्दी अछि, पड़बा आ मैना अछि, रंग-रंगक चिड़ै सब अछि।
             कोनो कोंढ़ी सं फूल बनबाक एक प्राकृतिक प्रक्रिया होइ छै जाहि पर कहियो ध्यान दी तं अहां आश्चर्य सं भरि सकै छी। प्रात:भ्रमण पर बहरायल वृद्धकवि कें एहि आश्चर्य संग मुलकात पार्कक बेंच पर बैसल-बैसल होइत छनि। गाछ मे तीनटा कली छै जकर अपन-अपन अवस्था आ मुद्रा छैक, एक स्मितिक संग अपन पुट खोलैत, दोसर अपन निद्रालस तोड़ैत, तेसर प्रत्येक सिहकी पर अनेरे डोलैत। तहिना समुद्र, जे कवि कें भरि-भरि राति सोर करैत रहै छैक आ भोरे जखन भेंट होअय तं कविक संग चिक्का-दरबड़ खेल खेलाइत अछि। बहुत किछु अछि पृथ्वीक पर्यावरण मे, जकरा दिस स्वार्थान्ध संसारक ध्यान तं रौरव हाहाकारक कारण नहि जाइत छैक मुदा जे सब मिलि क' एहि आतंकपूर्ण समयक परिपूर्ण विकल्प रचैत अछि।
             एहि संग्रहक सर्वाधिक रमणीय कविता ओ सब थिक जे नान्हि-नान्हिटा बेटी सब पर लिखल गेल अछि। ओ तेसर पीढ़ीक सदस्या सब थिकी जे वृद्धकवि कें बाबा कहैत छनि। संग्रहक पहिल कविता 'प्रणाम बाबा' हमरा बड़ पसंद। ओहि मे छैक जे नान्हि बेटी अपन माय-बापक संग विदेश मे रहैत अछि, एतनी टा उमेर मे एहि महादेश ओहि महादेशक भ्रमण करैत रहैत अछि आ साल-दूसाल पर कहियो एतहु चलि अबैत अछि। कविक मोन एहि बेटी पर टांगल रहैत छनि आ ओकर सुधिक एहि समूचा अवधि मे ओ 'सालो भरि तरेगन गनैत रहैत' छथि। पछिला कोनो बेर जे ओ एतय आयल छली, बहुतो रास गाछ हुनका हाथें रोपल गेल रहैक। ओहि गाछ सभक फूलपात हरेक साल झड़ि क' पल्लवित भ' जाइत छैक। अपत्र गुलमोहर फेर पुष्पित होइए, आ जखन वीडियो कौल पर ओ प्रणाम बाबा कहैत अछि, वृद्धकवि ओकरे हाथें लगाओल गुलमोहरक लालिमा कें निहारैत विचारमग्न भ' जाइत छथि। ई विचारमग्नता बहुत मोहक हेबाक संग-संग बहुत दारुण सेहो अछि। ग्लोबल दुनिया परिवार कें छिन्न-भिन्न क' देलकैक अछि। जाहि प्रियपात्र कें सदति समीप रहबाक चाही से सात समुद्र पार बसैत अछि। टेक्नोलोजी जरूर एहि दूरी कें कम केलकैए जे इच्छानुसार वीडियो कौल भ' सकैए। मुदा, नेह-छोहक खगता एक एहन विषय थिक जे टेक्नोलोजीक भीतर अटान नहि ल' सकैत अछि।
             नान्हि बेटी सिरीजक कैक टा कविता एहि संग्रह मे छैक जे अपन संवेदना आ शैली मे विरल अछि। पुकार नहि सुनबा पर बाबा कें ई कहब जे 'बाबा अहां आब बहीर भ' गेलहुं/ हमर बात तं सुनिते नहि छी', खेल-खेल मे दोड़ैत-दबाड़ैत, सब कें पराजित करैत, अपन जीत पर ओकर ठहक्का लगायब, फूल-कली कें देखि चकित हेबाक ओकर मुद्रा, ओकर आवेशक तौर-तरीका-- 'आंखि छुअइ छथि/ कान मलइ छथि/ नाक मे दइ छथि अंगुरि घुसिया/ हंफसि-हंफसि कए, चिहुकि-चिहुकि कए/ आंखि घुमा कए, बजा रहल छथि रानी बेटी', बाबा कें नहि छोड़बा लेल जिदियायल बेटीक नान्हि अंगुरी मे फंसल धोतीक खूट-- ई सब अनेको प्रसंग छैक जे वर्णनक परिधि कें पार करैत अविस्मरणीय दृश्य बनि गेल अछि।
             कवि कीर्तिनारायण अपन काव्यलेखनक शिखर-उच्चता पर पहुंचि गेल एतय देखाब दैत छथि। हुनकर भाषा बहुत सरल भ' गेलनि अछि, तहिना भाव अधिकाधिक गंभीर। तरल संवेदना सं डगडग। कविता मे छंदक बन्धन कें तोड़बा लेल प्रतिश्रुत कविपीढीक ओ एक मुख्य सदस्य रहला, मुदा आब हुनका कविता मे छंद आबि रहलनि अछि। नागरबोध, संत्रास आ अस्मितासंघर्षक बहुतो युगीन मैथिली कविता हुनका नाम पर इतिहास मे दर्ज अछि, मुदा आब हुनक दृष्टिपथ पर वैकल्पिक संसारक अव्याख्येय सुंदरता आबि रहलनि अछि। अपना सभक मैथिल समाज मे बुढ़बाक गूंह गीजब केवल मोहाबरे टा मे नहि, वास्तविको मे चहुंदिस देखबाक हमसब अभ्यस्त छी। स्वयं पं. गोविन्द झा लिखलनि अछि जे बुढ़ारी मे लोक कें पाछू दिस दू टा आंखि निकलि अबैत छैक। मने, अतीत टा देखाइत छैक, अनन्त बितलाहा प्रसंग सब। कीर्तिनारायण मिश्रक कविता मे हमरा लोकनि उनटा पबैत छी। पाछू दिस नहि, एक जोड़ी आओर आंखि आगुए दिस निकललैक अछि जे आगामी पीढ़ीक सौन्दर्य कें, ओकर चमत्कारभरल चिंतन कें, ओकर तर्कातीत कार्यव्यवहार कें अजस्र सद्भावनाक संग देखबा मे सक्षम अछि। बहुत आनंदक विषय थिक ई सब। नवतुरिया पीढ़ीक एहि आनंदोत्सव मे एहि तरहें लहालोट होइत एक यात्रिये कें देखलियनि कि एक जीवकान्ते कें।
             प्रसिद्ध कवि जीवकान्त अपन काव्ययात्राक आखिरी चरण मे अपूर्व बालकविता सब मैथिली मे लिखने छला। सरल भाषा आ सुरेबगर छांदस-शैलीक ओ कविता सब हिनका पढ़ैत सेहो मोन पड़ैत रहैए। तं की कीर्तिनारायण ई संग्रह बालकविता-संग्रह छी? किन्नहु नहि। जीवकान्तक विषय प्रकृति आ बच्चा छलनि आ टारगेट पाठक सेहो बच्चे। कीर्तिनारायणक कविता संवेदना मे गज्झिन, गंभीर अभिप्राय सं भरल, अपन समयबोध सं लैस, वैकल्पिक पथ तकबाक चेतना सं परिपूर्ण कविता सब थिक जकर टारगेट चेतन पाठक थिकाह। आधुनिक मैथिली कविताक इतिहास मे एहि संग्रहक छपब एक यादगार घटना जकां हमरा मोन रहत।
              



            

Tuesday, January 18, 2022

एम्हर जे पढ़लहुं-4. अक्ष पर नचैत/ केदार कानन

 


अक्ष पर नचैत जीवकान्त, जेना पृथ्वी
तारानंद वियोगी

ई किताब (अक्ष पर नचैत, लेखक केदार कानन) एक अद्भुत कृति थिक। ई संस्मरणक किताब छी, किएक तं एहि मे पुरान समयक घटनावलीक स्मरण छैक, जाहि मे कवि केदार काननक अपन जीवन, परिवेश आ पर्यावरणक पूरा सुगन्धि सेहो पसरल छै। मुदा ई किताब पत्र-साहित्य सेहो छी कारण एकर लिखल जेबाक मूल आधार मैथिलीक एक महान लेखक जीवकान्तक पत्र थिक। मुदा जखन हम एहि किताबक संरचना आ महत्व पर चैन सं सोचै छी तं स्पष्ट लगैत अछि जे ई मैथिली साहित्यक सृजनात्मक इतिहास के एकटा खंड थिक जकर विषयवस्तु बीसम सदीक आठम आ नवम दशक छै।
              मैथिली साहित्यक इतिहास सब जे एखन धरि लिखल गेल अछि से कोना संकीर्णता सं ग्रस्त, एकभग्गू, बकनायल अछि, आ ज्ञान देबाक बदला ज्ञानप्राप्ति कें कठिन बनबैत अछि, ताहि पर राजमोहन झा सं ल' क' विश्वेश्वर मिश्र धरि लिखि गेल छथि आ अन्यत्र हमहू लिखने छी। मोन पड़ैत अछि, राज मोहन झा बारंबार ई आशा करथि जे मैथिलीक वास्तविक इतिहास नवतुरिया लोकनि लिखता। मुदा से कोना लिखता, आ ओ केहन होयत एकर कोनो स्पष्ट स्वरूप किनसाइते किनको लग मे हेतनि। एहि किताब कें देखने ओ बात हमरा मोन पड़ि गेल अछि आ लागल अछि जे ओ इतिहास एहने हेतै। ताहि पर सं एकर खास विशेषता छै जे मैथिली साहित्य मे जं अहांक रुचि आ उत्सुकता हो तं एहि किताब कें एक सीटिंग मे शुरू क' क' समाप्त क' सकै छी, तते पठनीयता सं ई महमह करैत अछि।
              किताबक नाम देलनि अछि--अक्ष पर नचैत। ई शब्दावली जीवकान्तक लेल प्रयोग कयल गेल एक यथार्थ कथन छी। अक्ष पर पृथ्वी नचैत अछि। पृथ्वी कें चैन नहि छै, ने स्वार्थ। सर्वसहा आ अनंत धैर्यक प्रतीक तं ओकरा कहले जाइत अछि। ई सब गुण जीवकान्त मे छलनि। लक्ष्य रहनि मैथिली साहित्यक चतुर्दिक विकास, जेना पृथ्वीक लक्ष्य अपन नाचब सं अपना कें जीवनक वासयोग्य बना क' राखब थिक। मैथिली मे यात्री आ राजकमलक बाद जीवकान्त प्राय: पहिल लेखक भेला जे अपन लेखन सं पूर्ववर्ती-समवर्ती लोकनि कें सर्वाधिक असुविधा मे दैत रहला‌ मुदा अपन बादक पीढ़ीक लेल सर्वाधिक उपयोगी प्रेरणाकेन्द्र बनल रहला। तें जीवकान्तक निधनक बाद हुनका पर केन्द्रित एक सं एक सुंदर आ पठनीय किताब हम सब छपैत देखि रहल छी। संस्मरणकृतिक सुंदरता केवल लेखकक क्षमताक परिचायक नहि होइत अछि, चरितनायक के जीवन मे कतेक सुंदरता आ स्पृहनीयता छै, तकरो पर निर्भर करैत अछि। तें एहि किताब कें केदार आ जीवकान्त, दुनू गोटेक जीवनसौन्दर्यक उद्घाटक कृति कहल जेबाक चाही।
              किताब शुरू होइत छैक 1975क एकटा प्रसंग सं, जे केदारक तरुणाइ मे पहिल बेर कविताक प्रवेश कतय आ कोना भेल। हमसब देखैत छी जे एहि घटनाक लगले बाद हुनका जीवन मे जीवकान्तक प्रवेश भ' जाइत छनि। आ, किताबक समापन होइत अछि 1991क सितंबर मे लिखल जीवकान्तक एकटा पत्र सं।अर्थात 1975-91क समय थिक जे अपन भिन्न-भिन्न रूप आ तेवरक संग एहि किताब मे आयल अछि। जीवकान्तक निधन 2013 मे भेलनि, मुदा ताहि सं दस बरस पहिनहि 2003 मे केदार ई पुस्तक लिखि चुकल रहथि। एतय धरि जे एकर पांडुलिपिक अवलोकन जीवकान्त अपनहु कयने छलाह। तखन ओ जे अपन टिप्पणी केदार कें पठौने रहथिन, सैह एहि किताबक ब्लर्ब पर छापल गेल अछि। जीवकान्त लिखलनि-- 'एकटा नदी अछि। ओ बहैत अछि। गीत गबैत अछि। ओकर गीत सुनबा लेल कान चाही। से कान जकरा सुनत, से सुनत। यमुनाक एक हजार नाम छनि। एकटा नाम छनि-- नदी। तकर अर्थ छैक जे नाद करैत होअय, कदाचित गीत गबैत होअय। अहांक एहि रचना मे से गीत अछि। से एकरा पठनीय आ स्वागत-योग्य बनबैत अछि।'
              जीवकान्त मैथिलीक एक विराट लेखक छला, मुदा समुच्चा समय मैथिली साहित्य मे हुनकर विरोधे होइत रहलनि। कारण आर किछु नहि, बस एतबे जे ओ एक निधोख लेखक छला आ अपन प्रतीति कें, अपन विचार कें निर्द्वन्द्व रूपें लिखि जाइत रहथि। प्रतिदिन नियमित रूप सं लेखन केनिहार लेखक मैथिली मे नहिंयेक बराबर, जं क्यो हेबो करथि तं हुनका सब मे जीवकान्त सर्वोपरि। एहि कारण सं ओ अनेक-अनेक विधा मे लेखन केलनि। सब सं मारुख होइत छलनि हुनकर टिप्पणी जे कि ओ पांच सौक करीब लिखने हेता मुदा जकर कोनो संग्रह एखनो धरि नहि प्रकाशित भेल अछि। आशा करैत छी, 'जीवकान्त रचनावली' सं ई सब वस्तु फेर सं देखार पड़त। पत्र लिखबा मे तं जीवकान्तक क्यो जोड़े नहि छला। पत्रलेखन सेहो हुनका लेल साहित्यलेखने सन पवित्र आ सृजनात्मक काज छलनि। एहि पत्र सब कें पढ़ू तं पता लगैत अछि, अपन एहि मातृभाषा मैथिली मे केहन-केहन सदाशय ऋषि लोकनि काज क' चुकला अछि।
              कल्पना करू एकटा एहन समयक जखन मैथिली साहित्यक परिदृश्य मे हरिमोहन झा मौजूद रहथि, यात्री जीक सक्रियता अपन चरम पर छल, सुमन जी, मधुप जी, किरण जी, अमर जी, सब गोटे अपन सर्वोत्तम द' चुकलाक बादो रचनाशील रहथि। धूमकेतु, राजमोहन झा, प्रभास कुमार चौधरी, जीवकान्त, गंगेश गुंजन, उदयचंद्र झा विनोद सर्वोत्कृष्ट लिखबाक प्रक्रम मे नित नवीन तरहें सक्रिय छला। 'मिथिला मिहिर' साप्ताहिक छपैत छल आ ओकर प्रत्येक अंक एक उत्सुकता, एक विचारोत्तेजनाक संग पाठकक हाथ मे अबैत छल। एकर श्रेय छलनि संपादकीय टीम कें जाहि मे मैथिलीक दू प्रमुख रचनाकार सुधांशु शेखर चौधरी आ भीमनाथ झा छला। बादक  पीढ़ी जाहि मे महाप्रकाश, सुभाष चन्द्र यादव, सुकान्त सोम आदि छला, नव यथार्थ संगें सक्रिय रहथि। एहने मे एक नव पीढ़ीक आगमन भेल रहैक, जकरा 'नवतुरिया पीढ़ी' कहल गेल रहय। विभूति आनंद-केदार काननक संयोजकत्व मे 1982 मे, राजधानी पटना मे नवतुरिया लेखक सम्मेलन भेल छलैक। केहन अद्भुत समय छल ओ! केदारक लेखनीक विलक्षणता छनि जे ओहि समुच्चा कालखंड कें अपन किताब मे ओ मूर्तिमान क' देलनि अछि। किताब अछि तं जीवकान्तक विषय मे, मुदा एहि मे मैथिली-साहित्यक तमाम इतिहास-भूगोल, आर्थिकी आ सामाजिकी आबि गेल अछि, कारण जीवकान्त एहि समस्त चीज सं गहमागट्ट जुड़ल छला।
              संस्मरण आ आत्मकथा तं बहुतो गोटे लिखने छथि। मुदा, ओकरा बहन्ने मैथिली साहित्यक इतिहास के ओ कालखंड मूर्तिमान भ' उठल हो, एहन कम्मे भेल अछि। कहबे केलहुं जे एहन कृतिक सफलता एहि बात पर निर्भर करैत छैक जे चरितनायकक जीवन मे सौन्दर्य कतेक छैक! आशा करैत छी, नव पीढ़ीक संग-संग पुरानो लोकक लेल ई किताब उत्प्रेरकक काज करत। (प्रकाशक अंतिका प्रकाशन, दिल्ली। किताब अमेजन पर उपलब्ध अछि।)

Thursday, January 13, 2022

एम्हर जे पढ़लहुं-3. इजोरियाक व्याकरण/अजित आजाद


 अजित आजादक कविता

तारानंद वियोगी


बीसम शताब्दीक अंतिम दशक मे अजित मैथिली कविताक संसार मे प्रवेश कयने छला। थोड़बे दिन मे ओ अपन परिचिति बना लेलनि। तें, जखन सन् 2001 मे मैथिलीक प्रमुख कवि लोकनि पर केन्द्रित 'देशज' के संकलन 'शताब्दीक आरंभ मे मैथिली कविता' प्रकाशित भेल तं ओहि मे नवतुरिया कवि लोकनिक बीच सं अजित आजादक कविता प्रमुखतापूर्वक छापल गेल छल। ओहिठाम ई संभावना निहित रहैक जे आबय बला समय मे अजित मैथिली कविताक क्षेत्र मे अवश्य किछु नीक करता। बहुत खुशीक बात थिक जे आइ वर्ष 2021 मे अजितक सातम कविता-संग्रह प्रकाशित भेलनि अछि, जे अहांक हाथ मे अछि।

            अजित आजादक जीवन सब दिन सं बहुआयामी आ बहुकोणीय। ताही हिसाबें हुनकर संघर्ष सेहो बहु बहुगुणित। ओ कोनो ठाम हिम्मति हारि गेल होथि, सेहो एखन धरि नहि देखल गेल अछि। हुनकर मित्र-समाज बहुत विशाल, तहिना हुनकर दिनचर्या सेहो भयानक कार्यसंकुल। जेना राजकमल चौधरी प्रवादक मुरीद छला-- किछु दिन जखन हुनका ल' क' कोनो प्रवाद नहि पसरनि तं ओ बोर हुअय लागथि, आ प्रवादक परिस्थिति स्वयं पैदा क' लेथि, लगभग वैह स्थान अजितक जीवन मे अस्तव्यस्तता के छनि। एहि अस्तव्यस्तताक व्यापकता बहुत पैघ। एहि मे हुनकर जीवनशैली, रहन-सहन, गतिविधि आ विचार धरि अटान ल' सकैत अछि। कतेको बेर हुनकर प्रेमी लोकनि कें लगलनि जे आब अजित सफल छथि, आब जरूर ओ व्यवस्थित हेता। मुदा, अजित जेना कोनो दोसर धातुक बनल लोक होथि, ओ फेर सं अपन यात्रा शून्य सं शुरू क' दैत रहला। समाजक जे रीत छैक, एहन लोकक जीवन सं बहुतो लोक, बहुतो चीज छुटि जाइत छैक। से अजितोक जीवन मे भेलनि। एक चीज जं हमरा लोकनि ताकी जे हुनका जीवन मे कहियो नहि छुटलनि, सब दिन संग बनल रहलनि-- तं से चीज कविता थिक। सोचि क' देखू तं ई कोनो मामूली बात नहि भेलै। एकर निहितार्थ बहुत विशेष। मैथिली मे जतय दर्जनो सफल लोकक जीवन सं कविता कें, साहित्य कें सदाक लेल विदा लैत, समाप्त होइत हमरा लोकनि देखैत रहबाक अभ्यस्त छी, एकटा एहनो लोक मैथिली कविता मे छथि, जे अपन पचास वर्षक जीवन मे अनेको बेर सफल भैयो क' अपन यात्रा बढ़बैत रहला, आ हुनका जीवन सं समाप्त होयबाक तं कोन कथा जे कविताक, साहित्यक स्पेस लगातार बढ़िते गेलनि-- अद्भुत कविलोक थिका अजित। कैक बेर हम सोचैत छी जे अजितक जीवन मे व्याप्त अस्तव्यस्तताक संग कविताक किछु अन्तर्निहित प्रभावी सम्बन्ध अवश्य छैक। कविता अपन कविक संग की की बर्ताव करैत छैक, तकर दृष्टान्त विश्वसाहित्य मे भरल पड़ल अछि। एतबा जरूर लगैत अछि जे कोनो भाषा मे एकटा जेनुइन कविक होयबाक एकटा इहो निसानी होइत हेतै। 

            ई किताब अजितक छठम काव्यसंग्रह छी। अपन पहिले कवितासंग्रह सं ओ मैथिलीक कविताप्रेमी लोकक ध्यान आकृष्ट कयने रहला। जेना कि हमरा मोन पड़ैए, ओहि संग्रह कें ओहि दशक मे प्रकाशित संग्रह सभ मे सं एक प्रमुख स्थान देल गेल रहै। एक बेचैनी आ छटपटाहटि अइ कविक पछोड़ शुरुए सं करैत आएल अछि। बदललो समय मे हुनकर ई बेचैनी बनले रहि गेलनि। शाश्वत विपक्ष सन के स्वभाव हुनकर कवि के रहल अछि। तें हरेक युग मे कहबा योग्य बातो हुनका भेटैत रहलनि आ कहबाक मुद्रा सेहो। तें भने छवटा संग्रह होइन हुनकर, रिपीटेशन सन के चीज कतहु नहि लागत, भने कविता अपन प्रभाव मे बेसी गंहीर भेल हो कि कमे गंहीर मे लसकि गेल हो। मुदा, रिपीटेशन नहि। हम समय-समय पर विविध माध्यम सं हुनकर कविता देखैत रहल छी आ हमरा लागल अछि जे हमरा समयक ई बेछप कवि लगातार आगू बढ़ैत गेला अछि। हुनकर ई संग्रह 'इजोरियाक व्याकरण' हमरा हाथ मे अछि।

            इजोरिया रातुक समय होइ छै। राति कें हम सब दू भाग मे बंटैत रहल छी--इजोरिया आ अन्हरिया। अन्हरिया राति कैक तरहें हमरा सभक जातीय स्मृति मे बेसी कठिन, बेसी प्रतिकूल समयक रूप मे पहचान रखैत अछि। प्राकृतिक रूप सं इजोरिया आ कि अन्हरिया मनुक्खक वश के बात नै छै। ई सनातन चक्र छी आ सतत परिवर्तनशील रहैत अछि। मुदा, मनुक्ख अइ पृथ्वी पर मात्र एक प्राकृतिक उत्पाद नै छी। ओकर एकटा अलगो दुनियां छै। ई ओकर मन के दुनिया छी। कहबी छै-- माइंड इज मैन। मनहि मनुष्य थिक। धर्म संस्कृति आदि की छियै? ई मनुक्खक मानसिक संसार छी। कविता, कला, विचार आदि मानसिक संसारक झलक दैबला उपकरण सब छी। मानि लिय' कि हमरा लोकनि एकटा विकराल राति मे घेरा गेलहुं अछि। जेना राजकमलक कविता 'महावन' मे अबै छै जे सौंसे मुलुकक लोक विकराल वर्षा मे श्मसानघाट मे घेरा गेल अछि। राति बहुत लंबा छै। मानि ली कि दस बरस लंबा कि ताहू सं पैघ! मनुष्यक मन के संसार एहन छै जे रातियो के जं मजबूरी होइ तं तकर जे बेहतर कल्पना छै, जेना इजोरिया, तकर ओ सरंजाम मोनेमोन करैत रहैत अछि। अजित अइ ठाम प्राय: सैह करैत देखल जा सकैत छथि। एतय ओ इजोरियाक व्याकरण निर्धारित करै छथि। मने जे एहि विकराल कालखंड कें शुभेशुभे पार क' जेबाक रस्ता की छै? तें एहि संग्रह कें एहि खास शीर्षक 'इजोरियाक व्याकरण' कविता सं बाहर, एकर संपूर्णता मे देखबाक हम जरूरत बुझै छी।

            एकटा सामान्य प्रश्न अइ ठाम ई उठैत अछि जे कवि विकराल रातुक विरुद्ध चमचमाइत दिनक ख्वाब किए ने बुनलनि अछि जे रातिये कें बेहतर करबाक चिंता मे लागल छथि। की ई कविक विद्रोहक स्थगन छी कि केवल हुनकर विनम्रता? अइ कवितासंग्रह कें पढ़ैत हम सब एहि बातक किछु टोह ल' सकै छी।

            अजितक अइ संकलनक जे पहिल कविता छी तकर शीर्षक ओ देलनि अछि--इजोतक गीत। ई कविता हमरा बड़ प्रिय। खूब पसिन्न। कतेको बेर एकरा हम पढ़ने होयब। एहि कविताक, आ एहि संकलनोक जे पहिल काव्यपंक्ति छी, से ई-- 'एहि अन्हार समय मे/ इजोतक गीत गयबाक मनाही छै'। मने, एकदम शुरुए मे ओ अपन कविता-समय पर साफ-साफ, विना गोंगियेने, टिप्पणी क' जाइत छथि। इजोतक गीत गयबाक मनाही किएक छै, के ई मनाही केलक, किएक केलक, की एकर कारण, की एकर पृष्ठभूमि, की सब एकर फलाफल-- अइ सब बातक तह धरि जेबा लेल पछिला एक दशकक समाजार्थिक-राजनीतिक परिस्थिति सभक आकलन करय पड़त। आ ई आकलन क' सकब केवल साहित्यक बुत्ताक बात हो, सेहो नहि। अइ लेल मानविकीक तमाम अनुशासन सब कें आधार बना क' अध्ययन करबाक होयत। मुदा ई जे कहल जाइ छै जे जहां न जाय रवि, तहां जाय कवि-- से कोनो ओहिना नहि कहल जाइ छै। सुनबा मे ई बात कठिन लागि सकैत अछि मुदा सत्य यैह छी जे ई समस्त आकलन कविता असकर सेहो क' सकैए। साहित्य कें स्वायत्त अनुशासन माननिहार लोकनि के एक प्रमुख तर्क इहो छै। जाहि कविक कविता मे अपना समयक धुकधुकी कें अख्यास करबाक दमखम होइ, से एना करैत आएल अछि। एकरो अपन विराट परंपरा छै। बितलाहा समय के बात जं छोड़ियो दी, आइ हमसब जाहि समय मे सांस ल' रहल छी, ई समय तं सभक सामने मूर्त अछि। ओना, इहो बात ओतबे सत्य जे कोनो समय मे जीनाइ आ ओइ समय कें, ओकर गति-कुगति कें चीन्हि सकनाइ दूटा अलग-अलग बात थिक। बेहोश भेल लोक तं सेहो जिबिते रहैत अछि। आ तहिना बेसोह भेल लोक सेहो। मुदा, की एहन लोक सं अहां अपना समय कें चीन्हि लेबाक उमेद क' सकै छी? मूल बात हम ई कहैत रही जे समस्त आकलन कविता असकर सेहो क' सकैए, केवल ओकरा आ ओकर कवि कें चेतन हेबाक चाही। जं विश्वास नहि हो तं अपन आजुक समय कें सामने राखी आ अजितक कविता सब कें कने मर्म आ स्पन्दनक संग पढ़ि जाइ, हमर ख्याल अछि जे अलग सं किछु कहबाक खगता नहि रहत।

            अपन काव्य-कारणक सूत्र बतबैत अजित अही कविता मे एकठाम कहै छथि-- 'हम इजोतक गीत गायब तं मारल जायब देह सं/ अन्हारक गीत गओला पर कननमुंह रहत आत्मा'। कते पैघ बात कहि गेला एहि एक रतीक लाइन मे! पहिल तं ध्यान देब' बला बात ई छै जे इजोतक गीत गयबा लेल जकर मनाही छै से तते ताकतवर अछि जे बात नहि मानला पर ओ हत्या क' सकैए। दोसर, हत्या जं हेतै तं ओइ मे मनुष्यक देह मारल जाएत, आत्मा नहि। आत्माक बारे मे जे प्राचीन भारतीय अवधारणा छै, जे पिंड मे छै सैह ब्रह्मांड मे छै, वा दोसर शब्द मे आत्मा परमात्मेक साक्षात अंश छी। आत्माक धर्म थिक स्वतंत्रता, समता, बन्धुत्व। देहक धर्म छी सुखाकांक्षा। इजोतक गीतक मनाही छै तं देहक लेल काम्य यैह हेतै जे इजोतक गीत नहिये गाबी, कारण हत्या तं असुखक पराकाष्ठा थिक। मुदा, आत्मा? आत्माक धर्मक तं ई विरुद्ध हेतै। आत्माक संग एकटा दिक्कत बराबर छै जे ओकर अपन कोनो स्वतंत्र देह नहि छै। ओ एही देह पर पूर्णत: अवलंबित अछि। हमसब अक्सरहां सुनै छी जे 'हुनकर आत्मा मरि चुकलनि अछि' अथवा 'नेता लोकनिक आत्मा मरि चुकल रहैत छनि' तं तकर अर्थ यैह थिक जे ओहि लोक मे देहधर्मक सोझा आत्माक एक नहि चलि पबैत अछि। ओ मृतवत पड़ल रहैत अछि बेहोश, बेसोह। एहने लोकक बारे मे कविलोकनि कहल करै छथि जे 'ओ मरि तं गेल छला बहुतो दिन पहिनहि, हुनका जराओल गेलनि वा दफनाओल गेलनि बहुतो बरखक बाद।'

            मुदा गौर करबाक बात थिक जे आत्मा मरैत तं अछि बाद मे जा क', पहिने कननमुंह होइत अछि। बाजार वा सभ्यताक दूटूक विश्लेषक लोकनि ई बात कहता जे अधिकतम आत्माक मरि चुकल रहब अधिकतम सभ्यता-विकास(?)क निसानी छी। साबिक मे एना नहि छल। जीवित-स्वस्थ आत्माक एकटा उपकरण होइ छल देह, जकरा द्वारा ओ अपन तमाम मनबांछित धर्म निमाहैत छल। फरक एलै तं आत्मा पहिने कननमुंह भेल, तखन बेहोश, तखन मृत।

            कवि आ साधारण समाजी के चेतना मे जे अंतर होइ छै से अइ ठाम देखल जा सकैए। आत्मा बेहोश अछि कि मृत, साधारण समाजी कें कोनो फरक नहि पड़ै छैक। कविक देह एतबे मे सिहरि उठैत अछि जे ओकर आत्मा कननमुंह भ' गेल, वा कि भ' जाएत। तें, वर्तमान मामला मे कवि एकर परवाह बेसी करत जे ओकर आत्मा स्वस्थ रहैक। जा धरि देहक हत्या नहि भ' जाइत अछि, ओ आत्मा-धर्मेक पालन करत। मनाही भने इजोतक गीत गयबा लेल होइ, ओ जा जियत इजोतेक गीत गाओत। तें, ऊपर जे शंका अइ संग्रह ल' क' रखने रही तकर समाधान भ' जाइत अछि।

            मुदा, प्रश्न अछि जे सवा सौ पृ्ष्ठक अइ किताब मे जे आरो आर कविता सब संगृहीत छै तकर विषय की छै आ प्रकृत प्रसंग संग की ओ सब अपन सम्बन्ध जोड़ि पबैत अछि?

            संग्रह मे मुख्यत: पांच-छव विषयक कविता छै। किछु कविता तं निज एहि समय पर छै, जकर भोग सौंसे मुलुकक संग कवि सेहो क' रहल अछि। एकर किछु झलक ऊपर आएल अछि। एकठाम ओ अइ समय कें 'नांगट समय' कहै छथि-- 'एहि नांगट समय मे उघार रहब कोनो बेजाय बात त नहि'। एकठाम कहै छथि-- 'चतुर्दिक पसरल अछि अन्हार'। अन्हार आ इजोतक बीच के निर्णायक फासला पर कविक अभिमत छनि-- 'दुविधा थिक पतन/ एक समय मे एक्के टाक संग संभव अछि न्याय!' अइ नांगट समयक भयावहता कें कोरोना-कालक श्मसानी हहारो आरो कैक गुना बढ़ा दैत छैक। कोरोनाक भयावहता पर कैक गोट कविता एहि संग्रह मे अछि। एहि दारुण समय मे महामारी सं जाहि सर्जनशील लोक सभक निधन भेलनि, तनिका सभक स्मृति मे बेस मार्मिक कैक-कैक टा कविता अछि। एक वर्ष सं बेसी समय धरि लगातार जारी रहैबला किसान-आन्दोलन पर सेहो किछु कविता अछि। समयक ई भयावहता अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य धरि जाइत अछि आ हम सब देखै छी जे अमेरिका, इजरायल, वियतनाम पर हुनकर अलग-अलग कविता अछि। ई कविता सब कविक विवेकक इयत्ता कें सेहो देखबैत अछि जखन कोनो वैश्विक मामला मे हुनकर विचार हुनका देशक सरकार सं भिन्न आ विपरीत होइत छनि।

            आत्माक कननमुंह हेबाक प्रसंग मे ऊपर हम साबिक जुगक बात करैत रही। साबिक जुगक कतेको वस्तु, परिवेश, सम्बन्ध-बन्ध आदि एहन अछि जे सभ्यताक बढ़ती क्रम मे आब अलोपित भ' गेल वा भ' रहल अछि। अइ अलोपित भेल जाइत विषय सब पर अइ संग्रह मे अनेक कविता अछि। ई कविता सब अपना पाछू एकटा कसक छोड़ैत छैक। ई कसक आत्मा कें स्वस्थ बनेने रखबाक पक्ष मे छैक। कहि सकै छी जे विपत्ति-काल मे बीतल अतीत दिस घुरि-घुरि क' ताकब मनुष्यक एक आदिम हिस्सक छी। ताहू हिसाब सं अइ सब कें देखल जा सकैत अछि। तखन फेर ई छैक जे विपत्ति-काल मे धैर्य आ साहस मनुष्यक चिर संबल रहल अछि, तकर स्वर कवि मे लगातार बरकरार रहलनि अछि। किछु कविता जेना मंसूबा, उजहिया, माटि आदि मे तं ई बेस स्फुट भेल अछि। 

            स्त्री आ प्रेम-विषयक कविता सब सेहो अइ संग्रह मे कैकटा आएल छै आ से सब मार्मिक आ हृदयस्पर्शी छै। प्रेमक लेल कविक बाहर-भीतर जे हाहाकार व्याप्त छनि, आ ताहि मे अइ नांगट समयक सेहो कम योगदान नहि छै, से सब अइठाम साफ-साफ सुनल जा सकैत अछि। 'लिखब अपन इतिहास' आ 'मथने अछि माथ' सन के कविता सब एक भिन्न आयाम कें उद्घाटित करैत अछि, जाहि मे कविक आत्मपरिचयक व्यापकता कें देखल जा सकैत अछि।

            रूप के दृष्टियें देखी तं अजित तीन प्रकारक कविता शुरुहे सं लिखैत एलाह अछि-- प्रबन्धात्मकता सं भरल दीर्घ कविता, जे बहुत लंबा तं नहि होइत अछि मुदा अपन व्यापकता सं दीर्घ हेबाक काव्यानुभूति जगबैत अछि। दोसर सिरीज कविता, जे अपन इकाइ मे अलग-अलग होइतो विषयक एकताक कारण अपन शीर्षक सार्थक करैत अछि। तेसर, समकालीन विडंबना सब कें ल' क' नब मोहाबरा रचबाक प्रयत्न मे रचल गेल छोट-छोट कविता सब, जे छन्द मे होइतो नहि होइतो अन्त्यानुप्रास आ तुकमिलानी सं छन्द सन के आभास दैत अछि। हुनकर प्राय: सब संग्रह मे अइ तीनू प्रकारक कविता संग-संग छपल अछि आ से अहू संग्रह मे छपि रहल अछि।

            अजित एखन अपन काव्य-यात्राक बीच मे छथि। एखन हुनका बहुत आगू जेबाक छनि। तें, जाहि संग्रह कें हम हुनकर सब सं नीक संग्रह कहि सकी, से एखन प्रतीक्षित अछि।

            एहि संग्रहक प्रकाशन लेल हम कवि कें आत्मीय शुभकामना दैत छियनि।

            तारानंद वियोगी