तारानंद वियोगी
हिन्दी मे नागार्जुन उपन्यासक अतिरिक्त आनो अनेक विधा मे लेखन कयलनि। कथा, जीवनी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तान्त, निबन्ध, बालकथा, बाल उपन्यास-- आदि-आदि अनेक विधा मे हुनकर रचना सब भेटैत अछि। एहि सबटाक अतिरिक्त दूटा विधा एहन अछि जे सब लेखक बुतें नहि भ' पबैत अछि। एहन विधा थिक-- पत्र-लेखन आ संवाद। स्वाभाविक छै जे पत्र-लेखन तँ ओ स्वयं करैत छथि, मुदा संवाद-संकलन एहन विधा थिक जाहि मे बात तँ समुच्चा नागार्जुनक छनि, मुदा लिखल कोनो दोसर लेखक द्वारा गेल अछि। यात्री-नागार्जुन पर हिन्दी-मैथिली मे दू सय सँ बेसी किताब छपि चुकल अछि, मुदा हमरा दृष्टि मे सब सँ मूल्यवान अछि-- 'नागार्जुन-संवाद' जे विजयबहादुर सिंहक द्वारा लिखल गेल अछि। विधावार एक दृष्टि हुनकर उपन्यासेतर हिन्दी गद्य पर देल जा सकैत अछि।
हिन्दी मे नागार्जुनक तेरह टा कथा प्रकाशित भेलनि जकरा रचनावलीक छठम खंड मे देखल जा सकैत अछि। हुनकर कथा सभक एक संकलन 'आसमान में चन्दा तैरे' नाम सँ पहिनहु सँ प्रकाशित छलनि। नागार्जुन अपन कथा सब खास दू समय मे लिखलनि, किछु तँ चारिम दशक मे, जे हुनका रचनाकारक निर्मितिक दौर छल। बांकी किछु कथा सातम दशक मे लिखलनि। ई एहन समय छल जखन जनपक्षधर साहित्यक सामने सर्वाधिक महत्वपूर्ण छल जे कथा कें मनोलोकवादी, मनोवैज्ञानिक गुत्थी सभक पेटार हेबा सँ कोना बचाओल जाय। नागार्जुनक जे जीवनशैली छलनि आ साहित्यक प्रयोजन कें ल' क' हुनकर समझ रहनि, ई बात ओ खूब गहराइ सँ बुझैत रहथि जे कथा-संसारक मनोलोकवादी बनि जायब, कथा-लेखकक कोन विवशताक कारण संभव होइत छैक। एहि बातक चर्चा पहिनहु भ' चुकल अछि जे प्रेमचंदक बाद हिन्दी कथा-साहित्य (एहि मे कथा उपन्यास दुनू विधा शामिल अछि) कोन बाट पकड़लक। जैनेन्द्र आ अज्ञेय, एहि दुनू लेखक कें जँ प्रतिनिधि मानल जाय तँ नागार्जुनक स्पष्ट मान्यता रहनि जे ई दुनू गोटे उच्चवर्गक, जकरा मार्क्सवादी शब्दावली मे बुर्जुआ कहल जाइछ, मनोनिर्मितिक वाहक रहथि। ई लोकनि एहन बाट पकड़लनि जाहि मे यथार्थ जगतक सामाजिक पक्ष एकदम्म सँ तिरस्कृत रहय। एकटा घोर व्यक्तिवादी, खुक्ख मानवतावाद आरोपित कयल गेल, जाहि मे धरती परहक वास्तविक संकट आ संघर्ष सिरे सँ गायब रहय। खायल-अघायल समुदायक यथार्थ स्वाभाविक रूप सँ श्रमजीवी वर्गक यथार्थ सँ दूर हेतै। नागार्जुनक व्यक्तित्व शोषणविहीन समाजक आदर्श ल' क' चलनिहार एक एहन लेखकक रहनि जे श्रमजीवी चेतनाक मानवतावाद कें आदर्श मानैत अछि। एहि कारणें ई संभव भेल जे कैक विधा मे रचल अपन रचना मे अक्सरहाँ असुविधाजनक प्रश्न उठबैत रहलाह। एही कारणें अहाँ इहो कहि सकैत छी जे हुनकर साहित्य व्यक्तिवादी कुंठाक विरुद्ध जनवादी आस्थाक साहित्य बनि क' सामने आयल। तें, हुनकर कथा सब मे देखल जा सकैए जे हुनकर हरेक पात्र यथास्थितिक विरुद्ध ठाढ़ होइत अछि। कर्मठतापूर्वक एहि दुनिया कें एहि सँ नीक दुनिया बनेबाक लेल संघर्ष करैत अछि। ने हारि मानैत अछि आ ने निराश होइत अछि। हुनकर बाल-साहित्य कें देखि क' कही तँ मानवेतर जीव-जन्तु समेत जखन हुनकर पात्र बनैत अछि तँ ओहि मे सेहो एहि मानवतावादक संकेत लक्ष्य कयल जा सकैत अछि।
'असमर्थ दाता' नागार्जुनक पहिल कथा छलनि जे 'दीपक'क अक्टूबर 1936 अंक मे प्रकाशित भेल छल। ई कथा भिक्षावृत्ति-समस्या पर केन्द्रित अछि। कहियो बजार मे कथावाचक कें नव-दस सालक एक बच्ची भेटैत अछि जे मैल-कुचैल अछि आ भिक्षा मँगैत अछि-- 'बाबूजी, एक पैसा! मेरी माँ अन्धी...' बच्चीक स्वर मे किछु एहन बेगरताक आहट छै, मुदा हुनका लग मे खुदरा पाइ नहि छनि। पानबला खुदरा करै सँ इनकार करैत अछि। मुदा, एतबी काल मे भिक्षार्थी बच्चा सभक ओतय झुंड आबि जाइछ, आ बचिया बुझि जाइत अछि जे आब नहि भेटि सकत-- 'अच्छा बाबूजी, फिर सही...' मुदा, थोड़बे काल मे झुंड कें चकमा द' क' बचिया फेर कथावाचक लग पहुँचि जाइछ-- हमर माय परसू सँ बीमार अछि, एक पैसा बाबूजी! एक पाइक बदला एहि बे ओ एकन्नी बचिया कें द' क' पिंड छोड़बै छथि, मुदा इहो कहि दैत छथिन जे हम अपने गरीब छी। आगू ई होइत छैक जे सहज करुणावश ओ बचियाक संग धयने ओकरा घर पहुँचै छथिन। माय ठीके बीमार छै। ओकरा झोपड़ी मे ठाढ़ो रहबाक जगह नहि छै। ओ बचिया कें पुछै छथिन जे तोरा कोनो काज करय नहि आबै छौ तँ ओकर माय जवाब दैत छैक जे ई तँ एखन धरि भीखो माँगब नै सीखि सकल अछि। मार्मिक वाक्य छै जे ओकर पेशाक सूचना सेहो द' रहल छै। अन्तत: होइत ई छै जे कथावाचकक संग मे कुल्लम जतेक पाइ रहैत छैक, एक रुपैया दू आना, बचियाक हाथ मे द' दैत अछि। लेखक कहैत छैक जे ओ माय-बेटी तँ सोचैत होयत जे दुनिया मे एहनो दाता होइत अछि, मुदा ओकरा की मालूम जे 'दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं, जिन्हें औरोंके सुख-दुख जानने की-- खुद लाचार होते हुए भी हमदर्दी दिखलाने की बीमारी होती है।'
संस्मरणक शैली मे लिखल एहि कथा कें पढ़ि क' हमरा लोकनि युवा नागार्जुनक स्वभाव कें बुझि सकैत छी। मुदा, एहि कथाक बारे मे आलोचक लोकनिक कहब भेलनि जे भिक्षावृत्ति जँ एक समस्या थिक तँ एकर समाधान केवल भावुकता सँ नहि, संवेदनशीलता आ सजग बौद्धिकता सँ होयबे संभव अछि। ठीक बात। आगू चलि क' नागार्जुनोक लेखन कें हमरा लोकनि एही आधार-भित्ति पर बढ़ैत देखैत छी। तकर एक दृष्टान्त हुनके एक आर कथा 'भूख मर गयी थी' मे देखि सकैत छी। एक तरहें कहल जा सकैत अछि जे इहो कथा भिक्षावृत्तियेक विषय पर अछि। मुदा, अन्तर साफ देखि सकैत छी जे पहिल कथा मे भीख माँगब एक वृत्त, एक पेशा थिक, जखन कि दोसर कथा परिस्थितिवश भीख माँगबा पर केन्द्रित अछि। ई कथा 1967क छपल थिक, जाहि मे ओहि परिस्थितिक पूरा विवरण आयल अछि जे एक वृद्ध व्यक्ति कें भीख माँगबा लेल मजबूर क' दैत छैक। बेहोश, अर्धनग्न अवस्था मे बुढ़ा बजारक एक चाह-दोकान पर पाओल जाइत छथि। लोक सभक परिचर्या सँ आश्वस्त होइत ओ अपन जीवनक कथा बतबैत अछि। दस बीघा जमीनक मालिक एहि बुढ़ा बेटा पुलिस विभाग मे छल जे डकैतक संग भेल एक मुठभेड़ मे मारल गेल। तीन व्यक्तिक परिवार छल-- अपने, पुतहु आ पौत्र। आय के कोनो साधन नहि रहय, अगत्या जमीन बेचि-बेचि क' खाइ लगला। जमीन जखन सबटा बीकि गेल तखन की करितथि? स्वयं प्रेरित क' क' पुतहु कें पापकर्म दिस ठेल' पड़लनि। सातम क्लास धरि पढ़ल पौत्र कें जखन ई सब बात पता लागल तँ घृणापूर्वक ओ घर सँ पड़ा गेल। ओही बच्चाक खोज मे बुढ़ा निकलल छथि। हुनका भय छनि जे कहीं गिरोहक हाथ मे ने बच्चा पड़ि जाय, जे अंग-भंग क' क' बच्चा सँ भीख मँगबैत अछि। एहि कथा मे हमसब साफ देखैत छी जे आर्थिक-सामाजिक संकटक प्रति नागार्जुन यथार्थवादी दृष्टि अपनौलनि अछि, जतय संवेदना तँ जरूर अछि मुदा भावुकता नहि।
'ताप-हारिणी' आ 'मनोरंजन टैक्स'-- एहि दुनू कथाक बुनाबटि सेहो संस्मरणात्मक अछि। 'तापहारिणी'क कथावस्तुक बारे मे तँ स्वयं शोभाकान्त लिखने छथि जे एहि कथाक घटना वास्तविक थिक। कथा-नायिका अपरा अपन पतिक संग सार्वजनिक घाट पर गंगा-स्नान लेल गेली अछि। गंगा मे नहाइत युवा स्त्री कें देखि क' घाट परहक 'मर्द' नामधारी जीव लोकनिक जे प्रतिक्रिया होइत छैक, ओकर वर्णन-- 'मुझे लगा कि इतने आदमियों के बीच एक तरुणी के आ जाने से सभी की मनसा चंचल हो उठी है। कोई कनखी से तो कोई सीधे ही, सभी उस कल्याणी के अर्द्धनग्न अवयवों की ओर, जो कभी जाह्नवी के श्यामल-नील सलिल में से झलक उठते थे, टकटकी लगाए हुए थे। तर्पण करनेवाले उस श्रद्धालु कुलपुत्र ने इस संभ्रम में पड़कर दुबारा तर्पण आरंभ कर दिया। जो धोती पछीट रहा था, उसकी बाँहें शिथिल पड़ गयीं। जनेऊ माँजनेवाला अपनी बेचैनी को छिपाने के लिए बार-बार खाँसने लगा। लोटा मलने वाले की अँगुलियाँ कटते-कटते बचीं।' कथाक अंतिम वाक्य थिक जे 'हम नहाकर बाहर निकले। लेकिन उस दिन जबतक अपरा नेवघाट नहीं छोड़ा, तबतक वहाँ से कोई विदा नहीं हुआ। मुझे उस समय मैक्सिम गोर्की का वह उपाख्यान याद आया, जिसमें सत्ताइस पात्र थे-- छब्बीस मर्द और एक औरत।'
'ताप-हारिणी' कें नागार्जुन एहि तरहें लिखने छथि मानू सांसारिक तापक हरण केनिहार गंगा नहि छथि, जेना कि शास्त्र-पुराण मे वर्णन कयल गेल छै। असल ताप-हारिणी अपरा छथि जे पुरुष-कुंठाक ताप हरण करैत छथि। स्त्री आ गंगाक साम्य भारतीय परंपरा मे व्यस्थित रूप सँ आयल छैक, मुदा एहि कथा मे एक तरुणी स्त्री गंगा पर भारी पड़ैत देखाओल गेली अछि।
'जेठा' आ 'ममता' कथा मातृहीन बच्चा सभक सम्बन्ध मे अछि। स्वयं नागार्जुन मातृहीन छला आ एहि दुनू कथा मे मानू ओ अपन बालपनक दुखद अनुभूति सब कें शब्द देलनि अछि। जेठाक नायक जेठानंद अपन मौसी-मौसाक संग रहैत अछि। अल्प वय मे ओकर पिता मरि गेला आ माय एक बनियां सँ विवाह क' लेलक। मायक अपराध ओकरा लेल असह्य बनल रहैत छैक आ ओ अन्तो अन्त धरि अपना माय कें क्षमा नहि क' पबैत अछि। 'ममता' कथा अपेक्षाकृत यात्रीक जीवनानुभवक अधिक लग अछि, जाहि मे बच्चाक माय मरि गेल रहैत छैक आ अपन काकी सँगे ओ रहैत अछि। काकी ओकरा अपनो बच्चा सँ बढ़ि क' स्नेह करै छैक। कोनो दिन काकी सँ रूसि क' ओ अपन कोनो मित्रक घर चलि गेल, मुदा लगले ओकर मान खंडित भ' गेलैक जे काकी ओकरा विना बहुत परेशान हेतै एखन।
'विषम ज्वर' बहुत गँहीर कथा छैक जाहि मे पूजीवादक षड्यन्त्र कें देखार कयल गेलैए जे अतिरिक्त पूजी कोना समष्टि-चेतना कें खंडित क' क' व्यक्तिनिष्ठ स्वार्थ लेल लोक कें मोहित करै छैक। पूजीपति अपना कर्मचारी कें मात्र ओतबे दैत छैक जे कहुना सपरिवार खेपि सकय। अधिक काज लेबाक प्रलोभन-स्वरूप जँ ओ कहियो अधिक पाइ द' दैत अछि तँ कर्मचारीक सामने ई संकट आबि जाइत छैक जे एहि अतिरिक्त पाइ कें ओ कोन मद मे खर्च करय। कर्मचारी दीनानाथक संग यैह होइत छैक। सय टाका ओकर वेतन रहैक। एक बेर कैशियर ओकरा एक सय नौ टाका देलकै, ई कहैत जे अहाँ ओवरटाइम केलहुँ से सेठ जी स्वयं देखने छथि, तें हुनकर ई आदेश भेलनि अछि। परिवार तँ सय टाका मे चलिये जाइत छैक, दीनानाथक संग समस्या छैक जे अतिरिक्त नौ टाकाक ओ की करय! ओ पत्नीक लेल साड़ी किनबा पर सोचैत अछि तँ झट सँ छोटका बच्चा मोन पड़ैत छैक जे ओ कोना खेलौना-दोकान पर रेलगाड़ी बला खेलौना लेल व्याकुल छल। बच्चा पर सोचैत-सोचैत ओ अपना दिय' सोचय लगैत अछि जे शंभूक माय लग जँ कोनो नब साड़ी नहि छैक तँ हमरो लग तँ कायदाक कोट नहि अछि, ओही कटल-फाटक कोट कें बरखो बरख सँ लटकौने फिरैत अछि। अंतत: ओ तय यैह करैत अछि जे ई नौ टाका ओ अपना पर खर्च करत। ओ होटल मे खाना खाय चाहैत अछि। होटल मे जा क' बैसैत तँ अछि मुदा विना खयने उठि जाइत अछि। ओ सिनेमा हाॅलक खिड़की पर लाइन मे लगैत अछि, मुदा बिन टिकट कटौने वापस बहरा जाइत अछि। ओकर मानसिक उथल-पुथल अद्भुत व्यक्त भेलैए। अन्तत: होइत ई छै जे राति एगारह बजे धरि भूखल-प्यासल बौएबाक बाद ओ बच्चा सब लेल पाँच टकाक मिठाइ कीनि क' घर धुरि अबैत अछि। आर्थिक विषमता सँ ग्रस्त दीनानाथक मनक आन्तरिक द्वन्द्व कें एतय मार्मिक ढ़ग सँ अभिव्यक्त कयल गेलैए।
सब क्यो अवगत छी जे महात्मा गाँधीक समय मे नागार्जुन हुनका विरुद्ध जा क' किसान सभाक राजनीति केलनि आ एकाधिक बेर जेल गेला। नेहरूक विरुद्ध हुनकर कविता सैकड़ाक संख्या मे भेटैत अछि, मुदा ध्यान दी तँ पायब जे एकर विपरीत गाँधीक विरुद्ध लिखबाक तँ के कहय जे हुनकर माहात्म्य कें स्थापित केनिहार कविता सब विविध विधा मे लिखलनि। आ, गाँधीक जखन हत्या कयल गेलनि तखन तँ ओ एहन आगि उगलैत कविता सब लिखलनि, जाहि लेल आजादीक बाद सेहो जेल जाय पड़लनि। खास तौर पर एहि स्थिति मे जे तरुणाइ काल मे हुनकर जे दुनू गुरु रहथिन, पं. बलदेव मिश्र ज्योतिषाचार्य आ कविवर सीताराम झा, दुनूक दुनू गाँधीक एहन धुर विरोधी रहथिन जिनकर विश्वास रहनि जे सनातन धर्म कें रसातल पहुँचाबक लेल गाँधी अवतार लेने छथि, कोना संभव भ' पायल होयत जे यात्री दुनू गुरुक सम्मान करितो गाँधीक प्रति अगाध श्रद्धा सँ भरल रहला। गाँधीक समझ रहनि जे गाम के विकास केनहि सँ भारतक विकास भ' सकैत अछि, ठीक यैह समझ यात्रीक सेहो रहनि। एहि बातक दृष्टान्त यात्री-नागार्जुनक साहित्य मे घनेरो भेटत। एहि ठाम एकर उल्लेख एहि लेल कयल जे एहि विषय मे नागार्जुनक उपन्यास (दुखमोचन) तँ छनिहे, हुनका लग कथा सेहो छनि जाहि मे हुनकर समझ कें कदाचित बेसी स्पष्टतापूर्वक देखल जा सकैत अछि। कथा अछि-- कायापलट (1946)।
'कायापलट' मिथिलाक एक गाम छितौनीक कथा कहैत अछि जे किछु मनस्वी लोकक उद्यम सँ कोना गामक कायापलट भ' गेलै। नायक छथि ओहि जबानाक इंजीनियर भुवनेश्वर झा। ओ शहर मे नौकरी करैत छथि। नौकरी लगलाक बाद कुल्लम तिनिये बेर गाम आयल छथि। 1942क अगस्त आन्दोलन मे दस दिनक लेल, दोसर बेर पन्द्रह दिनक लेल पिताक श्राद्ध मे, आ आब तेसर बेर मायक श्राद्ध मे गाम आयल छथि। पढ़ल-लिखल लोक के गाम कें त्यागबाक परिघटना आजादीक बाद शुरू भेल हो, से नहि। आजादी सँ पहिनहु पढ़ल-लिखल लोक गाम छोड़ि दैत छला। गाम मे भुवनेश्वर बाबूक प्रतिष्ठा तँ छलनिहे, गामक लोक सब सँ हेल-मेल सेहो पर्याप्त रहनि। से, एहि बेर जखन ओ गाम एला तँ गौंआ सब एकजुट भ' क' बिचारलनि जे हुनका कहल जाय। प्रतिनिधि बनलाह राजपूत टोलक वयोवृद्ध बाबू पलटू सिंह। पलटू सिंह सँ जे भुवनेश्वर बाबूक गपसप भेलनि, ताहि महक एकटा वाक्य देखल जाय-- 'जरा सोचो बाबू, पढ़-लिखकर सभी अगर इसी तरह गाँव छोड़ते चले जाएँ तो गाँव मसान बन जाएगा, मसान।' खैर, गौआँ सभक भावना वास्तविकता मे भुवनेश्वर झा कें प्रभावित केलकनि आ ओ गाम मे आबि क' रहबाक निर्णय करैत छथि। हुनका दू बालक-- रमेश आ नरेश। पहिने ओ बिचारने रहथि जे रमेश कें सिविल आ नरेश कें एक्साइज विभाग मे पठौता, मुदा आब हुनकर निश्चय ई भेलनि जे जेठका रमेश, एग्रीकल्चर आ फार्मिंग के शिक्षा लेथि आ छोटका नरेश डाॅक्टर बनथि। सैह भेलै। रमेश गाम आबि क' वैज्ञानिक ढंगक खेती शुरू केलक। नरेश डाॅक्टरी पढ़ि क' गाम मे आबि स्वास्थ्य विभागक संचालन करय लागल। गाम मे कन्या पाठशाला खोलल गेलै। विधवा लोकनिक लेल पचीस टा चरखा बनबाएल गेल। पक्का सड़क बनल। पोखरि-तड़ागक जीर्णोद्धार कयल गेल। गामक लोक लेल रोजगारक व्यवस्था करबाएल गेलै। पूर्ण गाँधीवादी ढंग सँ सहयोग समितिक माध्यम सँ एत बड़ गामक कायापलट संभव भ' सकलै। 1946 के कथा थिक, जखन देश आजादो नहि भेल छलै। ओ आजाद भारतक स्वप्न देखबाक समय रहैक। एतय हमसब देखि सकैत छी जे संदेश अपन लेख आ टिप्पणी सभक द्वारा गाँधी जी दैत छला, तकरा धरती पर उतारबाक परिकल्पना एहि कथा मे कयल गेलैए। हँ, ई बात जरूर जे आजादीक बाद कोनो सरकार गाँधीक एहि स्वप्न कें साकार करबाक ईमानदार प्रयास नहि केलक, आ आब तँ ई सोचबो असंभव भ' चुकल अछि।
'आसमान मे चन्दा तैरे' एक भावुकता-भरल नकली कवि-समुदायक विरुद्ध लिखल गेल अछि। एक वरिष्ठ कवि होइत छथि लीलाधर, जे कथा-नायक पद्मानंद कें कवि-सम्मेलनक चस्का लगा देने अछि, जखन कि ओ बी.ए.क विद्यार्थी थिक आ कविता आ कविसम्मेलनक चक्कर मे दू-दू बेर परीक्षा मे फेल भ' चुकल अछि। एतबे टा नहि, अपन कविता-संग्रह छपेबाक लेल ओ अपन पत्नीक जेवर बन्हकी लगबैत अछि। 157 टाका मे हजार प्रति छपबाक बात तय होइत छैक। पद्मानंद प्रसबला कें 100 टाका दैत छैक। बांकी 57 टाकाक लेल प्रेसबला 700 प्रति घेरि लैत अछि। 300 प्रति मे ओ गुरुजन आ मित्र लोकनि कें बाँटैत किछु प्रति बेचबो मे समर्थ होइत अछि जाहि सँ आय होइत छैक कुल पौने आठ टाका। पद्मानंद प्रयास मे लागल अछि जे जिला बोर्ड सब पचासो-पचास प्रति कीनि लियय तँ बन्हकी किताब छुटत। एक दिन एही क्रम मे ओ मानसी दिस जाइत अछि। भूख लगबा पर भूजा खाइत अछि। खेलाक बाद जखन ओहि ठोंगाक कागज कें देखैए तँ पबैत अछि जे ई ओकरे कविता-संग्रह 'दर्पण'क पन्ना थिक। ओकर दिमाग चकरा जाइत छैक। एवंप्रकारें, जखन ओकरा होश होइत अछि तँ पबैत अछि जे ओ वास्तव मे आइ की थिक? 'पद्मानंद को ऐसा लगा कि वह आदमी नहीं है, कूड़ा-कर्कट का चलता-फिरता ढेर है। लीलाधर जैसा धूर्त कुत्ता इस ढेर पर बैठा है। कवि को लगा कि उसका हृदय हृदय नहीं, बल्कि रद्दी कागज की लुग्दी है। इस लुग्दी से कुकुरमुत्ते के अँखुए निलते रहते हैं और लीलाधर जैसा सूअर उन्हें चरता जाता है।' ओ कविता आ दलाल लीलाधर कें अलविदा करैत अछि। तय करैत अछि जे आब ओ एम.ए. कइये क' घर घुरत। कहियो जँ हृदय मे भावनाक ज्वार आएत तँ ओ कविता नहि गद्य लिखत।
साहित्यक सम्बन्ध मे जे यात्री नागार्जुनक मान्यता सब रहनि, तकर बानगी एहि कथा मे देखल जा सकैत अछि। पहिल तँ यैह जे साहित्य वा कविता कें अपन पेशा नहि बनाबी। कैरियर कें अलग राखी, साहित्यिक कार्य कें अलग। यद्यपि ओ अपने ई नहि क' सकल छला, मुदा निष्कर्ष धरि यैह रहलनि जे दुनू कें अलग-अलग राखी। दोसर, सामाजिक चेतना सँ शून्य साहित्य रद्दी वा लुग्दी साहित्य थिक जकर कोनो मूल्य नहि अछि। लेखक कें व्यक्तिवादी नहि, समष्टि-चेतनाक संवाहक हेबाक चाही। तेसर, लेखकक रचनाशीलताक पाछू सुनिश्चित उद्देश्य हेबाक चाही आ लिखित वस्तु जँ प्रकाशित कराओल जाइत हो तँ ओकरा स्वान्त:सुखाय तँ किन्नहु नहि हेबाक चाही। चारिम, लेखकक उद्देश्य जँ भाव-प्रकाशनक संगहि समाज धरि पहुँचबाक हो तँ ओकरा गद्य-लेखन कें प्राथमिकता देबाक चाही।
दूटा जाहि कथाक लेल नागार्जुनक अत्यधिक मान छनि, ओ दुन्नू ऐतिहासिक कथा सब थिक। एक कथा थिक 'विशाखा मृगारमाता' (1947) आ दोसर 'हर्षचरित की पाॅकिट एडीशन' (1957)। गौर करबाक बात ई थिक जे दुनू कथा मे स्त्रीक सशक्त उपस्थिति दर्ज कयल गेल अछि। एहि दुनू कथा मे स्त्रीक एहन ओजपूर्ण आ विद्रोही तेवर व्यक्त भेल अछि जे कहल जाय, इतिहास कें प्राचीनकाल, मध्यकाल आ आधुनिक काल मे विभाजनक चलाकी कें ध्वस्त क' दैत छैक। नागार्जुनक एक अतिरिक्त विशेषता इहो छनि जे जाहि काल (समय) कें ओ अपन कथा मे उतारैत छथि, छोट-छोट डिटेलिंग आ वातावरण-निर्माण सँ ओहि समय कें मूर्त क' दैत छथिन।
'विशाखा मृगारमाता' कथा मद्रिका (अंग-प्रदेश) सँ आरंभ होइत छैक, जे कथा-नायिका विशाखाक जन्मस्थान छल। ई मगध राज्य मे पड़ैत छल जकर राजा ओहि समय बिंबिसार छला। मने ओहि समयक कथा, जखन भगवान बुद्ध सदेह धरती पर विराजमान रहथि। कोसल के राजा प्रसेनजित, जे बिंबिसारक सम्बन्धी रहथि, हुनका एहि बातक बहुत खेद रहनि जे छोट-मोट व्यापारी वैश्य तँ हुनका राज मे अनेको रहनि मुदा पुश्त-दर-पुश्त महान ऐश्वर्यशाली वैश्यकुल एक्को टा नहि रहनि, जखन कि मगध मे एहन ऐश्वर्यशाली कुलक बहुतो वैश्य महाजन लोकनि रहथि। राजा प्रसेनजित अपन बहनोइ बिंबिसार सँ अनुरोध करैत छथिन जे एकटा कुल कोसल मे बसेबाक लेल पठाओल जाय। कथाक किछु वाक्य देखल जाय जाहि मे आयल अछि जे बड़का बड़का सम्राट कोना बनियाँ पर आश्रित छला, से केवल अजुके सत्य नहि थिक, ताहू काल मे एहिना छल। 'सेठों का मुकाबला ये राजा लोग कैसे करेंगे?' 'राज-शक्ति हमेशा वणिक्-शक्ति की मोहताज रहेगी।' 'वैश्यवर्ग अपना हाथ पीछे खींच ले तो तक्षशिला उजड़ जाए, वहाँ सियार भूँकने लगें।' 'व्यापारियों के किसी बड़े कुल को चलाना धरती के चलाने की भाँति मुश्किल और भारी है।' आदि। जाहि कुल कें कोसल पठेबाक बात तय होइत छैक, ओ एही विशाखाक पितामह मेड़क सेठ (जिनका सर्व वैश्यकुलक कुलपतिक उपाधि प्राप्त रहनि, के पुत्र आ विशाखाक पिता धनंजय सेठ छला। विशाखा आठ बर्खक छली जखन ई लोकनि अंग प्रान्त सँ उपटि क' कोसल मे श्रावस्तीक निकट जा क' बसल छली। विशाखाक विवाह मे स्वयं राजा प्रसेनजित बरियाती आयल छला, आ चारि मास धरि मर्याद राखल गेल रहैक।
विशाखाक कुल गौतम बुद्धक अनुयायी छल। सात बर्खक अवस्था मे विशाखा बुद्ध कें केवल देखनहि टा नहि छली, हुनका भोजन करौने रहथि। कोसलक लोक-व्यवहार मगध सँ एकदम्म भिन्न। एक दिन एहन भेलै जे विशाखाक ससुर मृगार सोना करछुल सँ परसल सोनाक थारी मे खीर खा रहल छला। ताही काल एकटा बौद्ध भिक्षु भिक्षा माँगय एला। भिक्षा देबाक तँ कोन कथा जे मृगार मूड़ी उठा क' हुनका दिस ताकबो मुनासिब नहि बुझलनि। थोड़े काल मे विशाखा कें पता लगलैक तँ हबड़-दबड़ आबि क' भिक्षु कें कहलखिन-- 'आगे आइये भन्ते, मेरा ससुर अभी मुँह नीचा किये खीर खा रहा है। वह अपना पुराना खा रहा है।' विशाखाक कहल एहि बात सँ मृगार बहुत क्रोधित भेला आ खीर खायब छोड़ि क' आज्ञा देलनि जे हमरा अशुचि-भोजन केनिहार कहि क' अपमानित केनिहारि एहि स्त्री कें तुरंत हमरा घर सँ निकालल जाय। विशाखा सीधे इनकार करैत अछि-- 'तात, इतने भर से मैं निकलती नहीं। पनघट से पकड़कर लाई गयी लौंडी होती तो, तो डर भी जाती।' मृगारक क्रोध आरो भड़कि गेलै, ओ पंचैती बैसा क' विशाखा कें हटाब' चाहलनि। ओहि युग मे चलन रहै जे कन्याक विवाहक समय दुनू कुलक निष्पक्ष लोक सब कें पंच चुनि देल जाइत छल, जे एहन तमाम समस्या पर पंचैती करबाक अधिकारी होइत छला। बहुत किछु भेलै, अन्तत: जीत विशाखाक भेलनि। आब जखन मृगार ओकरा अपना घर मे रहबाक आग्रह केलनि तँ विशाखा शर्त राखि देलक-- 'भगवान बुद्ध के प्रति अत्यन्त अनुरक्त कुल की मैं लड़की ठहरी, हम तथागत के भिक्षु-संघ की सेवा किए बगैर रह नहीं सकतीं। यदि अपनी रुचि के अनुसार बुद्ध और उनके भिक्षु-संघ की सेवा करने पाऊँ तो ही रहूँगी।' मृगार स्वीकार केलनि। किछुए दिन बाद विशाखा कें बुद्ध एवं हुनकर भिक्षु-संघ कें आमंत्रित करबाक अवसर भेटलनि। ओहि दिन परदाक अढ़े सँ मृगार बुद्धक उपदेश सुनलनि तँ प्रभावित भ' क' उपासक बनि गेला। ओही दिन ओ विशाखा कें कहलखिन जे बेटी, आइ सँ अहाँ हमर माता भेलहुँ। विशाखाक नामक संग जे 'मृगारमाता' लगाओल जाय लगलै, तकर यैह कारण छल।
विशाखाक प्रति बुद्धक अपरिसीम करुणा छलनि। श्रावस्तीक दक्खिन जे जेतवन विहार छल, ओ सेठ अनाथपिंडक के द्वारा बनबाओल गेल छल। विशाखा अपन उद्यम सँ श्रावस्तीक पूब एक विहार बनबौलनि। विशाखा कें बहुत अभिलाषा छलै जे निज अपन खर्चा सँ ओ एक महाविहारक स्थापना करय। तथागत हुनकर बात मानि गेला, तँ प्रश्न खर्चाक उठल। भेल ई छलैक जे विवाहक समय मे पिता विशाखा कें नौ करोड़ दामक 'महालता' नामक एक अभूतपूर्व गहना देने रहथि। बरियात कें जे चारि मास मर्याद राखल गेल रहै तकर एक कारण वर्षा ऋतुक आगमन छल, मुदा ताहू सँ बेसी ई छल जे महालता गढ़' मे कारीगर सब लागल छला मुदा काज पूर्ण नहि भेल रहैक। खर्चाक बात आयल तँ विशाखा एक चतुराइ केलनि। महालता पहीरि क' एक दिन विहार गेली, आ महालता ओतहि छोड़ि क' घुरि गेली। बाद मे दासी कें पठौलखिन जे जँ ओकरा कोनो भिक्षु छूने नहि होथि तखने आनिहह। खैर, मृगार कें बुझबा मे एलनि तँ विशाखाक अभिलाषा वैह पूर्ण क' देलखिन, ओकर महालता बचले रहल।
एहि कथा मे भिक्षु-संघक बारे मे जे किछु मेंही सूचना सब एलैए, तकरा देखल जाय। वस्त्रक अभावक कारण भिक्षु लोकनि बहुत कम्मे स्नान क' पाबथि। वर्षा ऋतु मे जँ नहाथि तँ नंगटे। विशाखा कें ई जनतब भेलनि तँ बहुत खराब लगलनि। भिक्षु-संघ मे स्त्रीक प्रवेश ताधरि शुरू भ' गेल छल। मुदा विशाखा कें इहो जनतब भेलनि जे स्त्रीक घाट पर भिक्षुणी लोकनि नंगटे नहाथि, ओही घाट पर नहेनहारि वेश्या सब भिक्षुणी लोकनि पर व्यंग्य-वाण छोड़थि। तथागत सँ ई आज्ञा प्राप्त करबा मे विशाखा सफल भेली जे भिक्षु-भिक्षुणी आब एक जोड़ चीवर राखि सकत। पूरा बौद्ध-संघ कें एक जोड़ वस्त्र साले साल देबाक व्यवस्था विशाखा दिस सँ कयल जाइत रहलै। तहिना, ओ देखथि जे श्रावस्ती मे जखन भिक्षु लोकनि आबथि तँ थाकल-हारल रहलो पर ओ लोकनि पहिले दिन सँ भिक्षाक लेल गली-गली भटकथि। ओ तथागत सँ इहो बात मनबा लेलनि जे श्रावस्ती मे आयल भिक्षु लोकनिक शुरुआती किछु सप्ताहक भिक्षाक व्यवस्था विशाखा केलनि। विशाखाक आन्तरिक अभिलाषा रहनि जे अपन पति आ पुत्र कें तथागतक प्रति अनुरक्त करथि। एहि मे असफल रहबाक कारण ओ बताहि भ' गेली। हुनका फेर सँ स्वस्थ स्वयं तथागत, अपन उपदेश द्वारा केलनि। विशाखा तथागतक बारे मे एक ठाम कहैत अछि-- 'सैकड़ों बार मुझे उनकी बातें सुनने का अवसर मिला। कभी आवेश में आकर तथागत को बोलते नहीं सुना। उनका जीवन बहुत ही शान्त, नियमित और स्वाभाविक था।'
जखन विवाहक बाद विशाखा सासुर आयल छली तँ हुनका संग आन मारिते रास समान सभक संग पँच-पँच सौ दास आ दासी सेहो देल गेल छल। दास-प्रथा तहिया अपन चरम उठान पर छल। समाज मे अव्यवस्था नहि पसरय, ताहि लेल दास-दासीक प्रवेश भिक्षु-संघ मे वर्जित छल। कतेको दास-दासी कें विशाखा मुक्त कयने हैत, मुदा ओहि मे सँ अधिकांश फेर घुरि क' हुनके लग आबि जाय। किछु दास बालक कें ओ तक्षशिला विद्यापीठ मे नामांकन करौलनि जे टिकि नहि पाओल। किछु कें मुक्त क' क' ओ वाणिज्य मे लगौलनि। हुनकर सेहन्ता रहनि जे दास-दासी कें भिक्षु-संघ मे शामिल करेबाक प्रथा चलाबथि। कतेको कें ओ प्रोत्साहित केने हेती मुदा 'जानें क्यों, भिक्षु-संघ की सुविधा उन्हें अपनी ओर आकृष्ट नहीं करतीं।'
'हर्षचरित की पाॅकिट एडीशन' राजा हर्षवर्द्धन आ हुनकर बहीन राज्यश्रीक उत्तर जीवनक कथा थिक। कन्नौजक युवक महाराज ग्रहवर्माक प्राणेश्वरी राज्यश्री अपन पतिक मृत्युक बाद बौद्ध-धर्म ग्रहण क' लैत छथि आ हुनकर जीवन पूर्णत: बदलि जाइत छनि। हुनकर सादा आ स्वच्छ जीवन आब करुणा आ सेवा कें समर्पित छैक। बौद्ध विहार मे हुनकर निरन्तर आगमन बनल रहैत छनि आ आचार्य दिवाकर मित्रक संगहि श्रेष्ठ भिक्षुणी जेना 'भिक्षुणी सुनंदा' लोकनिक संग हुनक गहन संपर्क-सामीप्य छनि। एहि बीच हर्ष कन्नौज पर पुन: विजय प्राप्त करै छथि राज्यश्री कें कन्नौजक महारानीक पद पर राज्याभिषेक होइत छैक। हर्ष सेहो आब युद्धोन्माद सँ मुक्त भ' गेल छथि। एहि बीच एक नव समस्या एलनि अछि जे पछिला युद्ध मे ओ गौड़ाधिपति नरेन्द्र गुप्त शशांक पर विजय पौलाक बाद, प्राणदान मँगला पर ओ क्षमा क' देने रहथि। आब ओ क्षमा-प्राप्त पार्षद मित्र सामंत मानि लेल गेल छल। मुदा, शशांक बड़ भारी शैतान छल। ओ तरे तर हर्षक हत्या लेल जाल पसारि रहल छल। एक दिन दुनू भाइ-बहीन संगहि बैसल छला जखन महासेनापति भण्डि आ महामात्य माधवगुप्त आबि क' सूचित केलकनि जे शशांक महाराजक जान मारबाक लेल दू विषवैद्य कें भिक्षुक भूमिका मे पठौने छल, जकरा हर्षक सैनिक लोकनि काशी आ प्रयाक बीच गंगाकात मे पकड़ि लेलक। डर सँ त्रस्त दुनू भिक्षु गछलक जे ओ सब असल मे विषवैद्य थिक। भण्डि हर्ष सँ कहैत छनि-- 'महाराज, हम कई बार शशांक की प्रवंचना का शिकार बन चुके हैं। आपकी शान्त-नीति का वह मखौल उड़ाता है। कब तक हम इस तरह बेवकूफ बनते रहेंगे महाराज?
अन्तत: तय होइत अछि जे प्रजा-हित मे हर्ष एक बेर फेर शशांक पर आक्रमण करता, आ ओकर अन्ते केलाक बाद घुरता। युद्ध मे ने मात्र राज्यश्री संग जाइत छथि अपितु आचार्य दिवाकर मित्र सेहो संग रहता। मुदा, युद्ध मे भन्ते लोकनिक कोन काज? राज्यश्री बतबैत छथि जे जँ संग नहि रहबनि तँ हर्ष मे पुन: प्रतिहिंसा जागि सकैत अछि आ शशांकक संगहि ओ छोट-पैघ बीसो जनपद मे हाहाकार मचा सकैत छथि, निर्देओष-निरपराध प्रजा नहि मारल जाय, तें। असल मे ई जीवनक एक गहन प्रश्न थिक जे शान्तिक संदेश प्रसारित केनिहार राजा कें सेहो परिस्थिति-वश युद्धक आश्रय लेब' पड़ि सकैत अछि। शान्तिक लेल युद्ध यदि अपरिहार्य हो तँ एकर आश्रय लेल जेबाक चाही, यैह कथाक संदेश छैक।
नागार्जुनक निबन्ध-साहित्य
नितान्त आरंभिके काल सँ नागार्जुनक रुचि निबन्ध-लेखन दिस रहलनि। पहिनहु ई चर्चा आबि चुकल अछि जे जनवरी 1934 मे हुनकर पहिल निबन्ध 'मृत्युंजय कवि तुलसीदास' 'दीपक' मासिक मे छपल छल, आ दीपकक कर्ता-धर्ता स्वामी केशवानंदक संग नागार्जुनक गहन संपर्कक आधारशिला बनल आ बाद मे तँ दीपक पत्रिकाक संपादक ओ भेलाह। एहि निबन्ध मे उत्तर भारतीय समाज मे तुलसीदास आ हुनकर रामचरितमानसक लोकप्रियताक चर्चा करैत ई बात बताओल गेल अछि जे तुलसी दैनंदिन जीवन मे काज आबय बला बहुतो जे बात अपन रामायण मे लिखलनि अछि वैह एहि लोकप्रियताक आधार थिक। नागार्जुनक जे अपन रचनात्मक हिस्सक छनि ओ हुनकर निबन्ध सब मे नीक जकाँ देखाइत अछि। जेना, 1934क समय जे विश्वव्यापी मंदी आयल छल, तकर चर्चा एहि तरहें करैत छथि जे एहू मंदीक दौर मे जे किताब सब सँ बेसी बिकाइत अछि से रामचरितमानस थिक। तहिना, अंग्रेजी शासनक उद्दंडता कें ओ विना परहेज केने देखार करैत छथि। लिखलनि अछि, अंग्रेज जकरा 'डैमफुल' आ 'कुली' कहैत छल, सैह लोकनि तुलसी रामायणक प्रेमी छथि। निबन्धक आरंभे एहि पंक्ति सँ कयल गेल अछि जे 'घरवार छोड़कर फकीर हो जानेवालों की कमी न तुलसीदास के जमाने में थी,और न आज के जमाने में है।' तकरा बाद ओ कारण सभक चर्चा करैत छथि जे कोना व्यासदेवक बाद सर्वाधिक लोकप्रिय तुलसी रहला।
गौर करबाक बात ई छैक जे 1933 मे जखन नागार्जुन बाइस बर्षक रहथि, आइ दुनिया जाहि नागार्जुन कें जनैत अछि, तकरा धरि पहुँचबा मे हुनका एखन देरी छलनि। वैह नागार्जुन पूर्ण परिपक्व भेलाक बाद 1970 मे 'मानस चतु:शताब्दी समारोह' शीर्षक लेख लिखैत छथि तँ मानसक प्रति हुनकर दृष्टिकोण पूरा बदलल देखार पड़ैत अछि। 1934 बला निबन्ध मे नागार्जुन तुलसीदास कें 'नवजीवनदाता' कहैत छथि आ मानस कें 'अमृतवाणी'। 1970 बला निबन्ध मे नागार्जुन तुलसी कें 'अच्छे-खासे महन्त' आ वर्णाश्रम धर्मक ठिकेदार कहैत छथि। लिखै छथि-- 'रामचरितमानस हमारी जनता के लिए क्या नहीं है? सभी कुछ है! दकियानूसी का दस्तावेज है... नियतिवाद की नैया है... जातिवाद की जुगाली है। सामंतशाही की शहनाई है। ब्राह्मणवाद के लिए वातानुकूलित विश्रामागार... पौराणिकता का पूजा-मंडप... वह क्या नहीं है। सब कुछ है, बहुत कुछ है।' तुलसीक बारे मे कहैत छथि-- 'कबीर और नानक की बराबरी मे बिठलाकर तुलसीदास से जवाब-तलब करो तो आपको असलियत का पता चल जाएगा।'
1934 मे प्रथम निबन्धक बाद हुनकर दोसर निबन्ध 1936 मे ओही 'दीपक' मे छपलनि, जकर ओ सम्पादक छला-- 'बुद्धयुग की आर्थिक अवस्था'। तहिया धरि ओ मज्झिम निकाय पढ़ि लेने रहथि आ ओकरे असर मे ई निबन्ध लिखल गेल अछि। बुद्धयुग मे उत्पादन पर, आ पारिश्रमिक तथा लाभ पर समाजक पूर्ण नियंत्रण छल। जाहि शिल्पकार लोकनि कें बाद मे शूद्र आ दलित बना क' अपमानक दृष्टि सँ देखल गेल, ओहि युग मे एकर सर्वथा अभाव छल। राजा बनबा सँ पहिने राजकुमार कें की सब करय पड़ैत छल, तकर बानगी रखैत लिखलनि अछि जे 'राजकुमारकिसी कुम्हार के पास जाकर कहता है-- आचार्य मैं आपका शिल्प सीखना चाहता हूँ। ई आचार्य लोकनि छला-- बड्ढकि (बढ़इ), थपित (राजमिस्त्री), कम्भकार (कमार), चम्मकार (चमार), वेणुकार (बाँसक काज केनिहार डोम), लोणकार (नोन बनौनिहार)। 1936 जबानाक अंग्रेजी शासन पर लिखैत छथि-- 'इस गुलाम जमाने की मौजूदा मनोवृत्ति से उस युग की मनोवृत्ति को तौलना बड़ी धृष्टता होगी।' तहिना 'मुल्क की रग-रग में फैली हुई खुशहाली को इस तरह बेदर्दी दुह लेने के ये शैतानी तरीके तो मौजूदा जमाने की पूँजीशाही को ही मयस्सर है।' सोचि क' देखल जाय तँ 36क बात ठेठ अजुका बात सन लगैत अछि। ओहि युगक सामाजिक मनोवृत्तिक परिचय दैत बतबैत छथि जे राजपरिवार सन सुख-सुविधा मे पोसायल बालक सेहो जखन युवा होइत छल तँ कोनो काफिलाक संग भ' क' तक्षशिला चलि जाइत छल जे कोनो शिल्पक ज्ञान ली जाहि सँ अपन कायल खायब संभव भ' सकय। तहिया 'शिक्षा' अर्थ 'शिल्प' होइत छल, आ शिल्पक अर्थ शिक्षा, जकर प्रधान केन्द्र तक्षशिला रहय।
एहने एक आर अधिक बुद्धकालीन परिस्थितिक परिचय 'ब्राह्मण: बुद्ध युग में' निबन्ध मे भेटैत अछि। लिखलनि अछि जे बुद्ध-काल मे ब्राह्मणक रहन-सहन पूर्णत: आभिजात्यपूर्ण रहय। ओहि दिन मे तीने वेदक पढ़ल जायब चलन मे छल, चतुर्वेदी तहिया क्यो नहि होइत रहथि। ओहि कालक रेवाज सँ तहिया 'ब्राह्मण' हेबाक लेल पाँच टा गुण होयब अनिवार्य छल-- (1) मातृकुल आ पितृकुलदुनू दिस सँ अभिजात, (2) तीनू वेदक पारंगत, मंत्रधर एवं अध्यापक होयब (3) देखबा-सुनबा मे सुन्दर, अभिरूप (4) सुशील (5) चतुर, मेधावी, यज्ञ-दक्षिणा लेनिहार लोकनि मे प्रथम आ द्वितीय। जहाँ धरि गौतम बुद्धक मान्यताक प्रश्न अछि, बुद्ध जाति, वेद, वर्ण आदि कें नहि मानैत रहथि। हुनका संघ मे सवर्ण आ असवर्ण दुनूक स्थान बराबर छल। बचल बात ज्ञानक, तँ एकरा प्रति बुद्धक श्रद्धा अनन्य रहनि आ ज्ञानक मामला मे ओ ब्राह्मण आ श्रमण मे कोनो भेद नहि करैत छला। ब्राह्ण-समाज मे ज्ञानोपासनाक मानदंड की छल, तकरो विवरण बौद्ध-साहित्य मे प्राप्त होइत अछि। अध्ययनक विषय छल-- तीन वेद, शिक्षा-कल्प, निघंटु, व्याकरण, लोकायत, सामुद्रिक आदि। अड़तालिस वर्ष धरि गुरुकुल मे ब्रह्मचर्यक पालन करैत एहि सब विषय मे पारंगत हुअय पड़ैत छल। समावर्तन काल मे आचार्य ई कहि क' अन्तेवासी कें उत्तीर्ण करैत छला जे जे हम जनैत छी से तों जनैत छह, जतबा तों जनैत छह ततबे हम जनैत छी। एकर बादे ओ विवाह करथि, आ अध्यापन क'क' अपन यश कायम करथि। कोनो ने कोनो राजा सँ एहन ब्राह्मण कें लाखिराज ब्रह्मोत्तर भेटिये जाइत छलनि। पूर्ण यशस्वी भेलाक बाद हुनका 'दिसापाभोक्खो आचरियो' कहल जाइन, जकर अर्थ होइत छल-- अमुक दिशाक सब सँ पैघ आचार्य। त्रिपिटक आ अट्ठकथा मे बुद्ध युगीन किछु प्रभावशाली ब्राह्मण लोकनिक चर्चा आयल अछि, जाहि मे सँ पौष्करसाति, अम्बष्ठ, चंकि, कूटदन्त आदि ब्राह्मणक कथा विस्तारपूर्वक एहि निबन्ध मे आयल अछि। तत्कालीन ब्राह्मण-समाज मे गौतमक प्रति सामान्यत: श्रद्धाक भावना छल, सेहो स्पष्ट होइत अछि। लिखलनि अछि जे भारतीय ज्ञान-परम्परा मे जे प्रगाढ़ता आ गहराइ आयल, से बौद्ध दर्शनेक प्रभाव सँ। आगू बहुतो रास जे बौद्ध दार्शनि जेना-- नागार्जुन, असंग, वसुबन्धु, दिङ्नाग,धर्मकीर्ति आदि भेलाह, ई लोकनि ब्राह्मणे रहथि। तात्पर्य जे आगूक युग मे जे सब सँ प्रतिभाशाली बौद्धिक होथि, ओ बौद्ध दर्शनक दिस रुख करैत छला। गौतम कें कोना विष्णुक अवतार मानि लेल गेलनि, आ तकर बाद बौद्ध धर्म कें कोना ब्राह्मण धर्मक प्रभामंडलक बीच घीचि आनल गेल, पूरा विवरण एहि निबन्ध मे आयल अछि।
नागार्जुनक निबन्ध सब मे विषयगत विविधता बहुत बेसी छनि, जे हुनकर रुचि आ अनुभव दुनूक परिचय दैत अछि। भाषा, साहित्येतिहास, समाज, भूगोल, संस्कृति, धर्म, साहित्यिक व्यक्तित्व आदि पर तँ ओ लिखनहि छथि, आम जीवनक समस्या, भिन्न-भिन्न स्थान पर रहनिहार लोकक जीवनचर्या आ संस्कृति, तुच्छ सन देखाइत कोनो वस्तु वा हिस्सक-- ई सब चीज सेहो पूरा व्याप्तिक संग हुनकर साहित्य मे आयल अछि। 'मशक्कत की दुनिया', 'दिमागी गुलामी', 'सत्यानाशी जल-प्रलय', 'बम्भोलेनाथ', 'सर्कस: कलकत्ते में'-- ई सब हुनकर निबन्ध सभक शीर्षक थिक।
ई बात जरूर छैक जे अपन अधिकांश निबन्ध ओ भाषा आ साहित्यक सम्बन्ध मे लिखलनि। 'उपन्यास ही क्यों?', 'आज का मैथिली कवि', 'आज का गुजराती कवि', 'मैथिली और हिन्दी', 'राज्याश्रय और साहित्य जीविका', 'महाकवि वल्लतोल' आदिक अतिरिक्त अपन समकालीन साहित्यकार यथा राहुल सांकृत्यायन, बेनीपुरी, यशपाल, फणीश्वरनाथ रेणु, अमृता प्रीतम आदि पर हुनकर लेख छनि। प्रेमचंद आ निरा-- ई दू साहित्यिक व्यक्तित्व नागार्जुन कें एहि तरहें प्रभावित केने छलनि, जे हिनका पर लिखल कृति स्वतन्त्र किताबक हैसियत रखैत अछि।
'उपन्यास ही क्यों?' मे हुनकर चिन्ता ई छनि जे साधारण पढ़ल-लिखल लोक जासूसी, रोमांस, तिलस्मी आदि प्रकारक किताब पढ़ैत अछि, जखन कि प्रेमचंदक उपन्यास उपलब्ध छै, गोर्की आ विक्टर ह्यूगो सन प्रसिद्ध लेखक सभक किताब आब हिन्दी मे सेहो प्रकाशित छै। 'किस्सा तोता मैना' सन वस्तु घर-घर पहुँचल छै। सही साहित्य दिस जन-रुचि कें आकर्षित करबाक उपाय सब पर एहि निबन्ध मे चर्चा कयल गेल छैक। 'राज्याश्रय और साहित्य जीविका' मे हुनकर प्रश्न छनि जे आधुनिक साहित्यकारक लेल सरकार सँ सम्बन्ध कतेक आ कोन हद धरि उपयोगी छै। दोसर, साहित्य सँ इतर अपन जीविकाक लेल लेखक कें की करबाक चाही। कहैत छथि-- 'मौजूदा शासन के अन्दर सर्वांशत: राज्याश्रय सच्चे साहित्यकार के लिए ठंडी कब्र है, यानी प्राणिशोषक समाधि।' नागार्जुन प्रेमचंदक एहि कथनक प्रबल समर्थक छथि जे लेखक कें अपन जीविकाक वास्ते कोनो ने कोनो नोकरी पकड़ि लेबाक चाही, मने अपन आजीविका के भार साहित्य पर नहि लदबाक चाही। हुनका सन साहित्यकार जे पूर्णत: आम जनता कें समर्पित छथि, मानैत छथि जे लेखकक असल आश्रयदाता तँ साधारण पाठक होइत अछि। ओ लिखैत छथि-- 'जनसाधारण पाठकवर्ग ही हमारे अन्नदाता हैं। हमारे अन्नदाता कल नहीं तो परसों अवश्य सुखी होंगे, फिर अपने साहित्यकार की सुधि वे अवश्य लेंगे।'
'आज का मैथिली कवि' 1945 मे 'लोकयुद्ध' पत्रिका मे छपल छल। तहिया धरि मैथिलीक परंपरित काव्य-ढाँचा मे देखनगर परिवर्तन आबि चुकल रहैक। 1930-32क सविनय अवज्ञा आन्दोलन कोन रूपें मैथिली कविता कें प्रभावित कयने छल आ ओकर बादक प्रमुख मोड़, जेना किसान आन्दोलन अथवा भारत छोड़ो आन्दोलन सँ मैथिली कविता कें जाहि तरहक प्रभाव प्राप्त भेलै, तकर विश्लेषण एहि निबन्ध मे कयल गेल अछि। तहिना, द्वितीय विश्वयुद्ध, जकरा मिथिला मे जर्मन के लड़ाइ कहल जाइत छैक, सबटा विमर्शक विषय बनल अछि। एहि लेख मे एक मुसलमान कविक उल्लेख भेल छैक जे मैथिली मे गीत बना, पुस्तिका छपा क' ट्रेन मे गाबि-गाबि क' बेचैत छथि। 1945 मे यात्री लिखने छथि-- 'मिथिलेश (दरभंगा के महाराजा) और उनके बाप-दादों और चचा-भतीजों की गुण-गाथा गानेवाले कवियों की परंपरा अब आखिरी साँस ले रही है।... अब तक का मैथिली साहित्य संपन्न और अभिजात वर्ग का साहित्य रहा है, परंतु अब सर्वसाधारण जनता के सुख-दुख का वाहन बनने जा रहा है।'
तहिना अलग-अलग लेख सब मे ओ गुजराती, सिन्धी आ पंजाबी साहित्य पर लिखने छथि। कहब जरूरी नहि जे एहि सब भाषाक हुनका ज्ञान रहनि आ अद्यतन साहित्य-विकास सँ ओ सुपरिचित रहथि। नागार्जुनक जे निबन्ध मिथिला आ मैथिली मे सर्वाधिक चर्चित भेल, से छल 'मैथिली और हिन्दी।' एही शीर्षक सँ प्रसिद्ध हिन्दी आलोचक रामविलास शर्माक एक लेख 'पाटल'क जनवरी 1954क अंक मे प्रकाशित भेल छल। एहि लेख मे मोटामोटी यैह बात कहल गेल रहैक जे हिन्दीक व्याप्तिक सामने मैथिली नहुँ-नहुँ अपन सर्वस्व विलीन क' देतै आ एही मे ओकर कल्याण छैक। सर्वविदित अछि जे नागार्जुन घोषित रूप सँ मैथिलीवादी रहथि, आ एहि लेल कतेको कड़ा प्रतिरोध कम्युनिस्ट पार्टी दिस सँ वा हिन्दीक साहित्यकार समाज दिस सँ सहि चुकल छला। सब ठाम ओ करारा जवाब देने रहथि। ई मामला कने भिन्न एहि लेल छल जे रामविलास शर्मा हुनकर प्राचीन मित्र रहथिन आ दुनू गोटे कैक तरहें जुड़ल छला। नागार्जुनक नाम मे जे 'बाबा' शब्द लागल तकरो आदि प्रवर्तक यैह रामविलास शर्मा रहथि। मुदा, बात एतय मातृभाषा मैथिलीक रहैक, जाहि सम्बन्ध मे शर्मा जीक कहब रहनि जे जहिना कि सामंती अवशेष मेटायत, मिथिला मे मैथिली बोली समाप्त भ' जायत आ एकर स्थान हिन्दी ल' लेत। अपन मित्रक तर्क आ अवधारणाक निर्मम आलोचना करैत नागार्जुन लिखलनि जे रामविलासक सेहन्ता कहियो पूर्ण नहि हैत। मैथिलीक विशेषता बतबैत ध्वनिशास्त्र सँ ल' क' अभिव्यक्ति-सामर्थ्य मे अपेक्षाकृत अधिक दृढ़ताक उदाहरण दैत ओ चेतावनी देलनि जे 'आपलोग हिन्दी प्रचार आन्दोलन को शासकीय स्वर्ण-चंगुल से मुक्त कर लीजिये। कोटिपतियों के कृपा-कटाक्ष से छुटकारा पाने में हिन्दी की मदद कीजिये।' आ, सतर्क आ सतथ्य उद्घोषणा केलनि जे 'जिस तरह विद्यापति के पद्यों को आप नहीं पचा सके, उसी तरह मैथिली के आधुनिक कवियों-कथाकारों को भी आप आत्मसात नहीं कर पाएँगे। अभिव्यक्ति की,वाक्य-विन्यास की, उच्चारण के क्रमों की, ध्वनियों और स्वर-संघातों की हमारी अपनी विशेषताएँ हैं। उन्हें न संस्कृत हजम कर सकी,न फारसी। अंग्रेजी के भी बूते का यह काम नहीं रहा। मैथिली को पचा लेने की सामर्थ्य हिन्दी या भारत की किसी भी अन्य भाषा में नहीं है।'
नागार्जुन भाषा-समस्या पर एक आरो लेख 1962 मे लिखलनि जे 'धर्मयुग' मे छपल छल-- 'हिन्दी की छाती पर अंग्रेजी को लादा नहीं जा सकता'। एहि निबन्ध मे हुनकर ई चिन्ता प्रकट भेलनि अछि जे अंग्रेजी मानसिकताक कारण आइयो हिन्दी कें ओकर वास्तविक स्थान नहि भेटि सकल अछि। अंग्रजीदाँ लोकक मानसिकता कें ओ ठीक-ठीक ओही कोटिक मानसिकता मानैत छथि जकरा अनुसार मंदिर मे स्थापित 'देवता-क्लास'क लोक शूद्र-चांडाल आदिक स्पर्श-दोष सँ बचल रहय चाहैत अछि। जेना कि संग्रेजी बला सभक प्रचार छैक जे हिन्दी पछड़ल लोक सभक भाषा थिक आ तें एकरा अंग्रेजीक समतुल्य नहि मानल जा सकैए। गाँधी, विनोबा आदि कें सन्त कोटिक लोक कहि क' हुनकर भाषा-नीति सँ पिण्ड छोड़ाओल जाइछ। ओही ठाम, लोहिया समान लोकनिष्ठ राजनेता जखन 'अंग्रेजी हटाओ' के नारा देलनि तँ नबका अभिजात 'विश्वात्मा' लोकनि हुनका सनकी कहि क' बात कें तोपलनि। नागार्जुन लिखैत छथि-- 'संसार की निगाहों में हमारी यह अंग्रेजी-भक्ति भारतीय जनता की मानसिक पंगुता का चटकीला विज्ञापन साबित हो रहा है। देश से बाहर जाने पर इस सचाई का पता चलता है, दुनिया भर के समझदार व्यक्ति हमारे स्वाभिमान को संशय की भावना से तोलते हैं--क्या इन भारतीयों की अपनी कोई भाषा नहीं है?'
नागार्जुनक एक निबन्ध छनि-- 'मशक्कत की दुनिया'। एहि मे ओ हिमालय पर्वतक बारे मे प्रचलित एहि मिथ कें तोड़ैत देखाइत छथि जे हिमालय स्वर्ग सन सुन्दर अछि। असल मे ओ पहाड़ परहक निवासी लोकनिक दृष्टि सँ हिमालय कें देखलनि अछि। हमसब जनैत छी जे हिमालयक विभिन्न जगह सब हुनका बहुत प्रिय रहनि आ बराबर ओ हिमालयक यात्रा करैत रहला आ मासक मास ओतय रहला। एहि निकटता सँ व्यक्ति कोना असलियत के करीब अबैत अछि, ई लेख तकर दृष्टान्त थिक। लिखलनि अछि-- 'कालिदास ने जिस हिमालय को 'देवात्मा' कहा है, वह वास्तव मे मशक्कत की दुनिया है। यहाँ मिहनत से क ई गुना मिहनत करने पर भी उस स्वर्गीय प्रदेश के देवता-- पहाड़ के वाशिंदे सूखा खाते हैं और मोटा पहनते हैं। हाँ, नोटों का बंडल बाँधकर और थैली भरकर जो साहब उधर गर्मियों में सैर करने जाते हैं, हिमालय केवल उन्हीं को स्वर्ग दीखता है।' हाँ, एतबा बात जरूर जे ई निबन्ध 1942 मे लिखल गेल छल। निकृष्ट राजनीति आ पर्यावरणक विनाशक मानसिकताक कारण आब पहाड़ो पर थैलीशाह लोकनि भ' गे छथि। एकरा विकास कही कि विनाश, गहन प्रश्न थिक।
तहिना हुनकर एक निबन्ध छनि-- दिमागी गुलामी। स्वाधीन मनोवृत्ति कोना आन्तरिक स्वस्थताक सब सँ पैघ लक्षण थिक, से कहैत ओ दिमागी गुलामी कें परिभाषित करैत छथि। हुनका दृष्टि मे जे बात हमर हृदय कबूल करैत हो, मुदा ओहि बात कें हम अपन दैनिक व्यवहार मे, कुल्लम जीवन मे उतारि नहि सकी तँ यैह दिमागी गुलामी थिक। आजादी सँ पहिने लिखल एहि लेख मे ओ स्पष्ट करैत छथि जे दिमागी गुलामी, राजनीतिक गुलामी सँ बेसी घातक होइत अछि।
गाजीपुर किसान सम्मेलन, फर्स्ट क्लास फर्स्ट, पंजाब के पुरुषार्थी, रहनुमा, भ्रष्टाचार का दानव, अन्नहीनम् क्रियाहीनम् आदि निबन्ध समाजक समस्या आ संकट कें ल' क' लिखल गेल अछि। हुनकर निबन्धक जे संकलन बहार भेल ओकर नाम अछि-- अन्नहीनम् क्रियाहीनम्। ई निबन्ध बिहारक अकाल पर लिखल गेल अछि जाहि मे जनता कें अन्नहीन आ सरकार कें क्रियाहीन कहल गेल अछि। तहिना 'भ्रष्टाचार का दानव' मे ओ भ्रष्टाचार मे निरंतर होइत वृद्धिक लेल राजनीतिक नेता लोकनि कें मुख्य रूप सँ जिम्मेदार मानैत छथि। 'रहनुमा' शीर्षक निबन्ध शिक्षक लोकनिक योग्यता-अयोग्यताक विषय मे अछि। बेधड़क कहैत छथि-- 'पुराने शिक्षकों के प्रति नयी पीढ़ी की श्रद्धा-भक्ति दिन से दिन घटती जा रही है, यह चिन्ता का विषय नहीं है। मैं इसे भावी पीढ़ी के लिए बड़ा शुभ मानता हूँ। मेरी दृढ़ धारणा है कि युवकों के शिक्षक युवक ही हो सकते हैं। ठस दिमाग वाले सिकुड़े हुए दिल वाले वयस्क भला नौजवानों को क्या सिखलाएँगे?' 'वन्दे मातरम्' निबन्ध मे राष्ट्रीय गीतक बहन्ना सँ शासन-प्रशासन मे व्याप्त भ्रष्टाचार आ नैतिक पतन पर तीक्ष्ण व्यंग्य कयल गेल अछि। 'सरस्वती का अपमान' मंचीय कवि सभक आत्ममुग्धता, धनलोलुपता आदिक बारे मे अछि। 'दादाजी, आप रिटायर हों' मे गतिहीन आ आत्ममुग्ध वृद्ध लोकनि पर व्यंग्य अछि। नागार्जुनक मान्यता रहनि जे युवक कें चाही जे बूढ़ लोकनि कें सामने कुर्सी पर बैसाबथि, अपन छाती पर नहि, जेना कि अधिकांश बूढ़क मंशा रहैत छनि।
जेना नागार्जुनक निबन्ध सब मे विषय-वैविध्य अछि, ठीक तहिना शिल्पक सेहो बहुतो प्रकारक प्रयोग ओ अपन निबन्ध सब मे कयने छथि। कोनो निबन्ध जँ विचार-प्रधान अछि तँ कोनो भावना-प्रधान। कोनो जँ रिपोर्ताज शैली मे लिखल गेल अछि, तँ कोनो ललित निबन्धक शैली मे। सब ठाम मुदा भाषा एकदम सरल आ आम जनजीवनक लगीचक। अपन निबन्ध सभक लेल सेहो नागार्जुन बेस स्मरण कयल जाइत छथि।
संस्मरण एवं यात्रा-वृत्तान्त
यात्री नागार्जुनक जीवन-यात्रा पर पहिने चर्चा भ' चुकल अछि। ओ बीसम शताब्दीक प्राय: हिन्दी-मैथिलीक सब सँ पैघ अथक यायावर छला, जिनकर यायावरी हुनकर ऊर्जाक केन्द्र छल। अपन यायावरीक बहुत कम मात्राक उपयोग ओ अपन लेखन मे क' सकलाह। ई प्राय: हुनकर अपन चुनाव छलनि, कारण यायावरी कें ओ लेखनक विषय नहि, जीवन जीबाक शैलीक रूप मे बरति रहल छला। एहि यायावरीक प्रसादात् बहुत पैघ-पैघ लेखक सँ सेहो हुनकर संपर्क-सामीप्य भेलनि। संस्मरण आ यात्रा-वृत्तान्त ओ कम लिखलनि, मुदा जतबे लिखलनि से हिन्दी साहित्यक गौरव थिक। हुनकर यायावरीक सब सँ पैघ विशेषता रहलनि जे ओ संभ्रान्त पर्यटक जकाँ ने कतहु घुमला, ने ताहि रूप मे कोनो व्यक्ति संग जुड़ला। हुनकर शैली एक आम आदमीक शैली छल, जकरा बारे मे प्रख्यात लेखक कमलेश्वर अपन एक संस्मरणात्मक लेख मे लिखलनि अछि-- 'असम, उड़ीसा से राजस्थान या मध्यप्रदेश के अन्तरालों में या गंगोत्री की चढ़ाई में या कश्मीर के रास्ते में, या लोनावला के चायघर में, या बोरीबन्दर स्टेशन पर-- हर जगह एक-न-एक ऐसा व्यक्ति जरूर मिला है, जो नागार्जुन-सा लगता रहा है।' ओ प्रश्न करैत छथि-- 'ऐसा क्यों है कि हिन्दुस्तान के हर पड़ाव पर एक-न-एक नागार्जुन नजर आता है? यह सपने की बातें नहीं, सच्चाई है कि बाबा नागार्जुन हर जगह दिखाई पड़ जाते हैं। यशपाल दिखाई नहीं देते। अमृतलाल नागर भी नहीं, भगवती बाबू भी नहीं। पर मुक्तिबोध और और नागार्जुन दिखाई पड़ जाते हैं। एक बार किसी सूने छोटे-से स्टेशन से गाड़ी चली, केबिन गुजरा और दिखाई दिया कि नागार्जुन खिड़की की पाटी से लगे झंडी झुकाए खड़े हैं।... और अभी परसों ही, केफोर्ड मार्केट के मछली बाजार के पास से गुजर रहा था। देखा, बाबा मछलियों की पेटी में बरफ की तहें लगा रहे थे। दिसावर में भेजने के लिए।' तात्पर्य दूटा। एक तँ एहिना जगह-जगह ओ वास्तव मे देखल जाइत रहथि। दोसर, ओ एक आम, साधारण जनताक बुजूर्ग सदस्य सन देखबा-सुनबा मे लागथि। हुनकर ढब-ढाँचा एहन रहनि जे ओहि तरहक लोक बहुतो ठाम बहुतो काज करैत देखार पड़ि सकैत रहथि।
हिन्दी मे नागार्जुनक संस्मरण सब दू तरहक छनि। एक तँ अपन नौजवानी मे जे बीहड़ यात्रा सब केलनि, तकर संस्मरण। कोना हिमालय मे बेर-बेर जा क' अनंत आदमीयत के खोज करैत रहला। कोना कैलास मानसरोवर गेला (कैलास की ओर)। तिब्बतक थोलिङ् मठ मे प्रवेश कोना भेलनि आ ओतय सँ वापस कोन परिस्थिति मे भेला (थोलिङ् महाविहार)। एकटा भिन्न संस्कृतिक आतिथ्य सत्कार केहन छल (आतिथ्य सत्कार)। कोना ओ सिन्ध (आब पाकिस्तान मे) के इलाका मे तरह-तरहक अनुभव प्राप्त केलनि (सिन्ध में अत्रह महीने)। ई सब चीज तते सचित्र आ सरल तरीका सँ लिखल गेल अछि जे ओहि इलाका मे पाठक कें ल' जा क' ठाढ़ क' दैत छैक। आम तौर पर हमसब हिन्दू संस्कृति कें भारतीय संस्कृति मानि लैत छी, मुदा एही भारत मे जे पारसी लोकनि रहैत छथि वा बौद्ध लोकनि, हुनका सभक संस्कृति मे की तत्व छनि, सहज मानवताक दृष्टियें कतेक की वस्तु छनि, जे अपनाब' जोगरक अछि, ई सब बात समक्ष अबैत अछि। सिन्ध इलाकाक एक प्रसंग देखल जाय। नागार्जुन सक्खर नामक बस्ती गेला अछि। ई बस्ती सिन्धु नदीक काते कात बड़ी दूर धरि पसरल छै, जे कि आब पाकिस्तान मे पड़ैत अछि। लिखै छथि-- 'उस दिन शायद पूर्णिमा थी। हजारों नागरिक सिन्धुनद के दर्शन करने आए थे। दोने में किंकुम और अक्षत डालकर दीप जलाकर उसे प्रवाह में छोड़ रहे थे। शत-सहस्र दीपिकाओं का वह समूह अरब सागर की ओर बहा चला जा रहा था। और, मैं सिन्धी जनता के श्रद्धा-निवेदन का वह मधुर प्रतीक देख-देखकर चित्र-लिखित-सा खड़ा था। एक वृद्ध सज्जन ने भावावेश में पाकर मुझे छेड़ दिया-- कहाँ से आए महाराज? मैंने संक्षेप में बता दिया और पूछा-- नदी के किनारे इस प्रकार श्रद्धापूर्वक दीप बहाते तो मैंने कहीं भी नहीं देखा है, आपके देश में यह कौन-सी रीति है? वृद्ध सज्जन ने कहा-- हम सिन्धी वरुण के उपासक हैं। जहाँ जाएँगे, आप इस देश में यही रीति पाएँगे। उसी प्रसंग में उक्त सज्जन ने एक अनुष्टुप सुनाया-- केचिदत्र निराकारा: साकाराश्च तथापरे।/ वयं संसार संतप्ता नीराकारमुपास्महे।।' (दुनिया मे किछु लोक निराकारक उपासना करैत छथि, किछु साकार रूपक। मुदा संसारक ताप संतप्त हमरा लोकनि नीराकार अर्थात जलमय भगवानक रूपक उपासना करैत छी।) अद्भुत बात ई जे एहि लोक सब मे केवल हिन्दू आ पारसी होथि, से नहि। मुसलमान, जे कि बहुसंख्यक छथि, सेहो ओतबे रहैत छथि। ओ लोकनि सिन्धु कें महामान्य मानैत 'दरियाशाह' कहैत छथि।
दोसर प्रकारक संस्मरण साहित्यकार सभक संगतिक सम्बन्ध मे छनि। राहुल सांकृत्यायन, निराला आ प्रेमचंद-- एहि तीन वरिष्ठ साहित्यकार सँ ओ गँहीर रूपें जुड़ल छला। निराला पर तँ अलगे सँ एक पुस्तक लिखलनि, जाहि मे स्मरणक संग महत्व आ समीक्षा दुनू विषय कें ओ अंग बनेलनि। तहिना, बाल-पाठकक लेल ओ प्रेमचंदक जीवनी लिखलनि, जे कि एक स्वतन्त्र पुस्तक थिक। राहुल सांकृत्यायन पर हुनकर चारि गोट लेख छनि जे विभिन्न कालखंड मे लिखल गेल अछि आ राहुल जीक कर्मठ जीवन सँ ल' क' हुनकर अन्तिम दर्शन धरि व्याप्त अछि।
राहुल जी पर सब सँ रोचक अछि हुनकर ओ लेख, जाहि मे अंतिम दर्शनक संगहि हुनकर स्थिति-परिस्थिति आ हुनका संग कयल गेल यात्रा सभक प्रसंग नागार्जुन लिखने छथि। राहुल जी अपन जवानी मे, जखन कि हुनकर आयु मात्र 23 वर्ष छलनि, एक शपथ लेने छला जे जाधरि हमर उमेर पचास नहि पुरि जाइए ताधरि हम गृह तँ के कहय जे गृहजिला आजमगढ़ मे पयर नहि राखब। असल मे भेल ई छलैक जे ओही उमर मे ओ घर त्यागि क' साधू बनि गेल रहथि। कोनो कार्यक्रम मे ओ कहियो आजमगढ़ आयल रहथि, तकर सूचना पिता गोवर्धन पाण्डेय कें भेटि गेलनि। पुत्रक गृहत्याग सँ पिता बहुत अधिक व्यथित रहथि। सूचना पाबि किछु लोक कें संग क' ओ राहुल कें मनब' लेल पहुँचि गेला। घर घुरबाक बात तँ कात जाय, उनटे ओ भीषण प्रतिज्ञा क' लेलनि जे पचास पुरबा सँ पहिने गृहजिला मे पयर नहि धरब। 9 अप्रैल 1943 ओ दिन छल, जहिया ओ पचास वर्षक भ' गेला। सताइस वर्षक समय बीति चुकल छल। सताइस वर्ष बीति जायब की होइत छैक आ एहि बीच मे कोना की परिवर्तन होइत छैक, स्वयं राहुल लिखने छथि जे हुनको एकर अनुमान नहि छल। महत्वपूर्ण ई छल जे पचासक बाद अपन गामक जे पहिल यात्रा राहुल क' रहल रहथि, ओहि मे हुनका संग नागार्जुन रहथिन। राहुल जी अपन 'जीवनयात्रा' मे एहि प्रसंग कें विस्तारपूर्वक लिखने छथि। अपन गाम कनैला मे ओ चारि घंटा रुकलथि। भाइ श्यामलालक घर मे भोजनक व्यवस्था रहनि। भोजन जखन क' चुकलथि, राहुल लिखलनि अछि, 'कपड़ों से ढँकी एक मूर्ति ने मेरे पैरों पर गिरकर रोना आरंभ करना चाहा।' राहुलक विवाह शैशवावस्थे मे करबा देल गेल रहनि। ओ मूर्ति हुनकर पत्नी रहथिन। राहुल तँ झटपट उठि आँगन सँ बहरा गेला। नागार्जुन सँ से संभव नहि छलनि, एक तँ कवि-स्वभावक कारण, दोसर एहू कारण जे उमर मे छोट रहथिन ताहि दुआरे महिला लोकनिक रोब-दाब हुनका पर बेसी चलि सकैत रहथि। आगूक खिस्सा नागार्जुनक लिखल सुनल जाय-- 'उस स्वस्थ, सुंदर और प्रौढ़ ग्रामीण महिला ने मुझसे कैफियत तलब की--मेरा क्या कसूर है, क्यों छोड़ रखा है उन्होंने... जवाब में एक भी बोल इस मुँह से नहीं फूट रहा था। मैं चुप्पी साधे, निगाहें नीची किये था... छोटी-बड़ी उम्र की अनेक स्त्रियाँ खुले जँगले से बाहर खड़ी थीं, पैने सवालों से मुझे छेद-बेद रही थीं...तैश में आकर एक वृद्धा ने उस महिला की कलाई पकड़ ली, खींचती हुई चीखी-- छोड़ो छोड़ो, चलो यहाँ से। यह भी किसी को छोड़कर भाग आया होगा। केदार (राहुल) ने भगोड़ों की जमात कायम कर रखी है... मुझे कनैला की उस वृद्धा का वह आक्रोश कभी नहीं भूलता। वह भाभीजी को खींचकर मेरे सामने से हटा ले गयी थी।'
एक प्रसंग बनारसीदास चतुर्वेदीक छनि, जे 'सो रहा हूँ' मे आयल अछि। नील आ लाल रंगक मोटका अक्षर मे लिखल ओहि तख्ती पर लिखल रहैत छल, जे चतुर्वेदी जी अपना घरक बाहर टाँगि देल करथि। हुनकर अटल सिद्धान्त रहनि जे मध्याह्नोत्तर निद्रा अवश्य लेता, अढ़ाइ-तीन घंटाक। ओहि समय ओ सांसद रहथि, राष्ट्रपति-भवनक बगल मे सरकारी क्वार्टर मे रहैत छला, मुदा ओ तँ सर्वतन्त्र स्वतन्त्र रहथि। संस्मरणक आरंभ छैक-- ' भोजन के बाद चतुर्वेदी जी ने कहा-- साढ़े बारह बज गये हैं, अब जाइए और आराम कीजिए।
'मैं तो जाकर अब लिखूँगा, जरूरी है-- मैं बोला।
'फिर आप नया संसार कैसे बनाएँगे? दोपहर को डेढ़-दो घंटे सो लेना निहायत जरूरी है। मेरा बस चले तो स्पेशल आर्डिनेंस निकलवा दूँ और मध्याह्न के समय दो-ढाई घंटे की लाजिमी छुट्टी हुआ करे...'
कतेक बेर बहस केलनि, मुदा कोनो फर्क नहि। एक बेर तँ कहि देलखिन जे 'ग्रीष्म ऋतु मे दोपहर के वक्त बुद्ध के जमाने में भी लोग सोते थे, मगर सभी ऋतुओं में मध्याह्न निद्रा का विधान सिर्फ रोगियों के लिए है।' मुदा, तकरो काटि देलखिन चतुर्वेदी जी-- 'जनवादी अथवा समाजवादी शासन की स्थापना के लिए संतुलित चित्त वाले हजारों कर्मियों की आवश्यकता पड़ेगी और चित्त को संतुलित करने के लिए मध्याह्न निद्रा एक अनिवार्य साधन है।'
मैथिलीशरण गुप्त आ हुनकर अनुज सियारामशरण गुप्तक कहल एक वचन 'विषकीट' शीर्षक बला लेख मे आयल अछि। असल मे ओहि लेख मे ओ अपन बचपन, तरुणाइ आ युवावस्थाक अभाव-अभियोग आ संघर्षक विवरण देने छथि। लिखने छथि जे साहित्यक नौ रस मे सँ कोनो मे ओ लेखन नहि कयने छथि। हुनका साहित्य मे 'विक्षोभ' नामक दसम रसक आविर्भाव भेलैक अछि। लिखलनि अछि-- 'गरीबी की सीमा-रेखा से नीचे रहनेवाले लोगों की संख्यादस-पाँच लाख की नहीं है, यह तो हमारी सम्पूर्ण जनसंख्या की आधे से ऊपर चली गयी है... ऐसी स्थिति में यदि मेरी चेतना विक्षुब्ध भावभूमि पर विराजमान हो गयी तो अस्वाभाविक नहीं है। ... कबीर से मैंने दो-टूक अक्खड़पन लिया और निराला से स्वाभिमान का संस्कार। ... उच्चवर्ग के रहन-सहन के ढंग को, प्राचार्य और उच्च शिक्षाधिकारियों की व्यक्ति-केन्द्रिकता को, नेताओं के बहुरूपियापन को मैंने कभी क्षमा नहीं किया। ऐसा भी नहीं कि मैंने अपना मखौल न उड़ाया हो...'
मैथिलीशरण राष्ट्रकवि रहथि, कारण ओ राष्ट्रवादी विचारधाराक प्रतिनिधित्व करैत रहथि। जेहने ओ, तेहने हुनकर अनुज। दुनू कें नागार्जुन आ हुनकर विचारधारा सख्त नापसंद। एक बेर भेंट करय गेला तँ दुनू भाँइ संगहि बैसल छला। सियारामशरण जी नागार्जुन कें कहलखिन-- 'आपको देखता हूँ तो शंकित हो उठता हूँ। लगता है विष का मटका इधर डोलता आ रहा है...' एहि बात पर मैथिलीशरण जीक मुँह सँ वचन निकललनि-- 'संस्कृत का विद्वान होने पर भी इसके अंदर इतना जहर भरा है... ब्राह्मण वंश में जन्म हुआ, विद्यापति की मिथिला में पैदा होने से अमृत इसके लिए सहज लभ्य था, किन्तु यह तो विषकीट निकला।' एकर जवाब मे नागार्जुन इहो कहला सँ नहि चुकला जे अहाँ अपना दिस सँ अमृतक किछु बूँद टपका दी तँ हमर आमूल परिवर्तन भ' जाए। मुदा, लिखलनि अछि-- 'वैष्णवी साँचे में यदि मैं कुछ लिख पाता तो वह रचना उन्हें पसंद आती, फिर मुझे गुप्तजी से अच्छा प्रमाणपत्र मिलता।'
एहि तरहें हमसब देखि सकै छी जे जाहि कोनो विधा मे यात्री लेखन केलनि, वैचारिक रूप सँ जाग्रत आ ज्वलन्त, तथा भावात्मक रूप सँ जनापेक्षी आ मार्मिक बनल रहला। हुनकर यायावर प्रकृति आ अक्खड़ स्वभाव सब ठाम हुनका संग बनल रहलनि।
नागार्जुनक बालसाहित्य
संसारक प्राय: सब भाषा मे जे पैघ लेखक सब भेला, से कमोबेश बच्चाक सभक लेल सेहो लेखन केलनि। तकर पाछाँ मुख्य कारण ई जे भविष्यक प्रति ओ साकांक्ष होइत छथि। आइ जे बालक-बालिका छथि, वैह भविष्यक कर्णधार बनता। जँ हम चाहैत होइ जे भविष्य मे सेहो साहित्यक लेखक आ पाठक अनामति बनल रहय, तँ आजुक बालसाहित्य भविष्यक पाठक आ लेखक हेता।
अपन आरंभिक साहित्यिक जीवने सँ ओ बालसाहित्य लिखब शुरू क' देने छला। अबोहर मे रहि क' जखन ओ 'दीपक'क संपादन करैत रहथि, तखने सँ। एहि पत्रिका मे नियमित रूप सँ किछु पृष्ठ बच्चा सभक लेल सुरक्षित होइत छल। जानि नहि कतेको बेर पत्रिकाक खाली पृष्ठ कें भरबाक लेल ओ विभिन न छद्मनाम सँ बालसाहित्य लिखल करथि। एहि सब रचना कें ताकि पेबा मे एखन धरि सफलता नहि भेटल अछि।
1946 ईस्वी सँ ओ पटना रहय लगला। जाहि ग्रन्थमाला कार्यालय मे तहिया ओ डेरा रखने रहथि, आ जतय सँ हुनकर पहिल उपन्यास 'पारो' छपल, ओतहि सँ 'किशोर' नामक बाल-पत्रिका बहराइत छल। जून 1946 अंक सँ नियमित रूप मे 'किशोर' मे हुनकर रचना छपल भेटल अछि। ओहि समयक हिन्दीक सब सँ पैघ आ बहु-प्रसारित बाल-पत्रिका 'बालक' सेहो पटने सँ छपैत छल। 'बालक' मे नियमित रूप सँ ओ लेखन केलनि, एतय धरि जे किछु समयक लेल ओ 'बालक'क संपादक सेहो नियुक्त कयल गेला। पटना सँ बहराइ बला तेसर बाल-पत्रका छल 'चुन्नू-मुन्नू', एहू मे नागार्जुन नियमित रूप सँ लेखन केलनि।
विद्यापतिक 'पुरुष-परीक्षा' नागार्जुनक सर्वाधिक प्रिय पुस्तक मे सँ एक छल। एहि संस्कृत कथा-पुस्तकक कथा सभक बाल-पाठकक लेल भावानुवाद ओ 1953 सँ यदा-कदा करैत रहथि, जे अलग-अलग पत्रका मे ठाम-ठाम प्रकाशित होइत रहल। 1964 मे जखन 'विद्यापति के सौ गीत' नाम सँ भावानुवाद-सहित विद्यापति-पदावली सँ एक चयन छपलनि, तखनहि विचार भेल जे 'विद्यापति की कहानियाँ' सेहो छपबाक तैयारी भेल। पहिनेक कयल अनुवाद सहित किछु नव कथा कें शामिल करैत कुल तेरह बालकथाक संग्रह एहि नाम सँ 1964 मे छपल। एही मे सँ किछु-किछु कथा कें ल' क' हुनकर बालकथासंग्रह 'चार चोर' तथा 'षट्शास्त्री' नाम सँ प्रकाशित भेल।
1954-55 ई. मे नागार्जुन रामकथा पर एक एहन किशोरोपयोगी दीर्घ कथा लिखलनि जे बहुत अधिक प्रशंसित भेल। प्रथम संस्करण मे एकर नाम छल-- मर्यादा पुरुषोत्तम राम। दोसर संस्करण 'भगवान राम' नाम सँ छपल। तेसर संस्करण मे फेर एकर नाम बदलि क' 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कयल गेल। एही नाम सँ एखनहु ई पुस्तक उपलब्ध होइत अछि। एहि पुस्तकक विशेषता थिक जे वाल्मीकि आ तुलसी, दुनूक पाठ मिला क' ओ एहि पुस्तकक लेखन कयने छथि। ई पुस्तक अत्यन्त रोचक शैली मे लिखल गेल अछि जे रामकथाक मर्म कें किशोर पाठकक आगू ठाढ़ क' दैत छैक। एक उदाहरण देखी। राम कें चौदह वर्षक वनवास भ' गेलनि, आ दशरथ मृत्यु कें प्राप्त भेला। भरत मातृक सँ जखन घुरला, हुनका दुनू भाँइ कें किछुओ बूझल नहि छल। आगूक विवरण--
'अपने पुत्र के आगमन का समाचार सुनकर खुशी के मारे उछलती हुई कैकेयी बाहर आई। भरत ने प्रणाम किया और पूछा-- माँ, क्या बात है? न पिताजी को देखता हूँ, न भाइयों को। कहाँ हैं ये सब?
'कैकेयी ने विजयी स्वर में कहना शुरू किया-- भैया, मत पूछो उनका हाल। सब गुड़ गोबर हो रहा था। बेचारी मन्थरा ने हमें सहायता पहुँचाई। राजा ने तुम्हें युवराज बनाया और राम को चौदह साल के लिए वनवासी बना दिया। आओ बेटा, अब इन आँखों से तुम्हारा अभिषेक देखूँगी।
'कैकेयी के मुँह से यह बज्रतुल्य बातें सुनकर भरत का हृदय विदीर्ण हो गया।...
' कैकेयी ने इतना तक कह दिया कि बेटा, बूढ़े राजा की चिन्ता करना बेकार है। आज न सही, कल, मरते तो वह अवश्य। और, राम की वनवासी जीवन बिताने की अपनी इच्छा ही प्रबल थी। मैंने तो कुछ नहीं कहा था। कहा था इतना ही कि कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर घूम आओ।
भरत अपनी माँ को कोस ही रहे थे कि मन्थरा आ पहुँची। उस बुढ़या को अपनी सूझ-समझ पर बड़ा ही घमंड था। भरत ने गुस्से में भरकर उसकी ओर देखा। कुछ बोले नहीं। शत्रुघ्न से रहा न गया-- ओ बुड्ढी, सारे अनर्थों की जड़ तू है-- यह कहकर उसके कूबड़ पर शत्रुघ्न ने जमकर एक लात लगाई। वह ऐंच गयी। फिर शत्रुघ्न ने बाल पकड़कर बुढ़िया को आँगन में घसीटना शुरू किया। आखिर भरत के बीच-बचाव से उसके प्राण बचे।...'
किशोर पाठकक लेल ठीक एहिना एक पुस्तक ओ प्रेमचंद पर लिखलनि। प्रेमचंदक जीवनी। पीपीएच (पिपुल्स पब्लिशिंग हाउस), जकर स्थापना 1943 मे भेल रहैक आ जे प्रगतिशील परंपराक साहित्य-प्रकाशन लेल नामी छल, 1960 मे ई योजना बनलैक जे प्रमुख व्यक्तित्व सभक जीवनी किशोर-पाठक लेल लिखबाओल आ प्रकाशित कराओल जाय। प्रमचंदक जीवनीक भार ओ लोकनि अमृत राय (प्रेमचंदक बालक तथा स्वयं एक प्रसिद्ध लेखक) कें देलखिन। जीवनी जखन पूरा भेलैक तँ अमृत राय वचनभंग करैत ई निर्णय क' लेलनि जे ई पुस्तक अपने, हंस प्रकाशन सँ, छपता। पीपीएच विवश भ' क' नागार्जुन सँ अनुरोध केलनि आ ओ मानियो गेला। अन्तत: ई पुस्तक 1962 मे पीपीएच सँ छपलैक आ निस्सन्देह अमृत राय बला किताब सँ बेसी नीक भेलै। तकर कारण छल नागार्जुनक सृजनात्मक जतन। पहिल अध्यायक आरंभ एक स्वप्न सँ भेलैक अछि। लेखक सपना देखैत छथि जे 1932 मे ओ प्रमचंद सँ भेंट करय गेलाह अछि। हुनका इहो जानकारी दैत छथिन जे अहाँक जीवनी हम किशोर सभक लेल लिखय जा रहल छी। वास्तविक बात एतबे अछि जे 1932 मे हुनकर कैक भेंट प्रेमचंद सँ भेल रहलनि। सब सँ अविस्मरणीय लागनि प्रेमचंदक ठहक्का। आ, अन्तिम अध्याय मे सेहो एक स्वप्न छै। आब प्रेमचंद सेवा सँ रिटायर भ' क' पेंशन पबैत छथि। दुनू बालक व्यवस्थित भ' गेला अछि। हँ, दुइये टा हुनकर इच्छा छनि जे अपूर्ण रहि गेलनि अछि। स्वयं प्रेमचंदक उक्ति नागार्जुन एहि शब्द मे व्यक्त कयने छथि-- 'पहली इच्छा, खेत-मजदूरों के बारे में है कि गाँव का एक-एक भूमिहीन गुजारे लायक खेत हासिल कर ले। दूसरी इच्छा शहरी मजदूरों के बारे में है कि पुराने या नये कारखाने का एक-एक श्रमिक गुजारे लायक वेतन और भत्ता हासिल करे। कभी उसकी छँटनी न हो।'
1910-11 धरि प्रेमचंद अपन मूल नाम 'नवाब राय' के नाम सँ उर्दू मे लिखैत रहथि। हुनकर उपन्यास 'सोजे वतन' ब्रिटिश प्रशासन द्वारा विद्रोह भड़केबाक आरोप मे जब्त क' लेल गेल। कलक्टरक सामने धनपत राय (प्रेमचंद)क पेशी भेलनि। एहि अवसरक एक चित्र--
'कलक्टर ने कड़कर पूछा-- नवाबराय तुम्हारा नाम है?... जी हाँ-- जवाब मिला। ...कलक्टर ने सिर से पैर तक धनपत को देखा। निकट ही एक तरफ 'सोजे-वतन' की प्रतियों के ढेर रखे थे।... कहानीकार नवाब राय का माथा ठनका। महीनों से खुफिया सिपाही इस कहानी-संग्रह के लेखक की खोज कर रहे थे। किताब कानपुर से छपी थी, लेकिन अंदर-बाहर कहीं कहानीकार का नाम नहीं था।यह भी पता नहीं चलता था कि किस प्रेस में छपी है।... सीआईडी वालों ने प्रेस का पता तो मालूम कर ही लिया, वे लेखक को भी जान गये।... हमीरपुर के कलक्टर के सामने कहानीकार की पेशी हुई।... --यह किताब तुम्हारी लिखी हुई है? -- जी।... --इस तरह की और भी किताब छपवानेवाले हो?... -- नहीं हुजूर!... नौकरशाही के उस उस पुतले की आँखों में शासन-मद का नशा उतर आया। बोला-- खैर मनाओ कि अंग्रेजों की अमलदारी है, वर्ना आज तुम्हारे हाथ कटवा लिये जाते। जानते हो, बगावत फैलानेवालों को क्या सजा मिलती है?... -- गोली से उड़ा दिये जाते हैं-- सरकारी वकील के बस होठ हिलकर रह गये। वह अभियुक्त की ओर देख रहा था।... युवक कहानीकार चुपचाप खड़ा था।... साहब ने कहा-- इन किताबों में आग लगा दो।... यों छुटकारा नहीं मिलेगा।... नवाब की आत्मा भीतर ही भीतर रो पड़ी।... 'सोजे-वतन' की 600 प्रतियों का ढेर अगले ही क्षण सुलग उठा।... दिल को कितनी चोट पहुँची होगी!... गोली खाकर मरते वक्त शायद ही इतना कष्ट होता... मगर इसी घटना ने प्रेमचंद को 'प्रेमचंद महान' बना दिया। कलक्टर ने कहानीकार को डरा-धमकाकर छोड़ दिया।'
1958 मे नागार्जुनक बाकथा सभक संग्रह 'कथा-मंजरी' नाम सँ प्रकाशित भेल। यैह संग्रह 'सयानी कोयल'क नाम सँ 1978 मे छपल, जे वर्तमान मे सेहो उपलब्ध अछि। विक्रम-वैतालक लोक-प्रसिद्ध कथा कें ओ 'वीर विक्रम' नामें लेखन केलनि। एखनहु ई पुस्तक एही नाम सँ प्रकाशित अछि। तहिना, 1966 मे 'अद्भुत टापू' नामक कथा-संग्रह प्रकाशित भेल। आगू 1979 मे जखन एकर दोसर संस्करण छप' लागल तँ एकर नाम बदलि क' 'अनोखा टापू' क' देल गेल। हुनकर बालकथाक एक अन्य संग्रह 'तीन अहदी' छनि। पटनहि सँ एक छात्रोपयोगी पत्रिका 'छात्र-सखा' बहराइत छल। एकर अनुरोध पर किशोर लोकनिक लेल ओ धारावाहिक उपन्यास 'तुकों का खेल' लिखलनि। एहि पत्रिकाक किछुए अंक उपलब्ध भ' सकलैक अछि।
पटना सँ एक प्रसिद्ध समाचार-विचारक पत्रिका प्रकाशित होइत छल-- 'योगी'। सौंसे देश मे ई पत्रिका पढ़ल जाइत छल। मूलत: तँ एकर स्वभाव राजनीतिक छल मुदा साहित्यिक सामग्री सेहो एहि मे पर्याप्त रहैत छल। संपादक ब्रजशंकर वरमाक अनुरोध पर नागार्जुन 'होनहारों की दुनिया' लिखब शुरू केलनि, आ बच्चा सभक 'बुझावन काका' बनि क' प्रकट भेला। 10-12 आयुवर्गक बच्चा लोकनि अपन लिखावट मे छोट कथा, अथवा तुकबंद कविता लिखि क' पठाबथि। नागार्जुन ओकर संशोधन क' क' मर्म सेहो बुझाबथि, आ ओहि बच्चा सभक रचना 'योगी' मे प्रकाशित भ' जाय। परिचित परिवार सभक तँ के कहय जे सुदूर देहातोक बच्चा पत्र द्वारा बुझावन काका सँ संपर्क करथि। मुश्किल सँ छव मास ई काॅलम चलि सकल। यदि दुइयो वर्ष चलि सकितय तँ एक एक अपूर्व धरोहर हिन्दी बालसाहित्य कें प्राप्त भ' सकैत छल।
अन्यान्य विधा
मुश्य रूप सँ चारि विधा अछि जाहि मे नागार्जुन सुविधापूर्वक लेखन केलनि। जेना कि हुनकर रचनावली सँ पता लगैत अछि, ओ आरंभिके काल सँ डायरी लिखैत छला। मुदा वैह बात, 'कुछ खो गयी हैं, कुछ खो जाने की स्थिति में हैं, कुछ मित्रों के पास बिखरी पड़ी हैं, और बाकी इस यात्री कवि के थैले में...सफर करती फिर रही हैं।' रचनावली-प्रकाशनक समय (2003) धरि हुनकर केवल दूटा डायरी उपलब्ध भ' सकल, पहिल 1967 के, आ दोसर 1971क।
'यत्किंचित' अपन डायरीक आरंभिक पृष्ठ पर ओ मोट-मोट आखर मे लीखि देल करथि। मतलब जे अपन डायरी कें ओ ई नाम देने रहथि। ई शब्द 'यत्किंचित' हुनका कतेक पसंद रहनि, तकर दृष्टान्त अछि जे मैथिली पत्रिअ 'मिथिला दर्शन' जखन हुनका सँ पत्रिकाक लेल स्तम्भ लिखबाक अनुरोध केलनि तँ एहि स्तम्भक नाम छल-- यत्किंचित। ठीक यैह बात तखन भेलै, जखन हिन्दीक लोकप्रिय साप्ताहिक 'जनयुग' मे ओ स्तम्भ लिखय लगला तँ ओकर नाम देलखिन--यत्किंचित।
1967क 30 जून कें ओ राजकमल चौधरीक निधनक सम्बन्ध मे लिखलनि-- '19 जून को राजकमल चौधरी का देहावसान हो गया।... दर-असल वह ज्यादा जीना भी नहीं चाहता था।' 2 जुलाइ कें फेर लिखलनि-- 'निवेदिता' (त्रैमासिक) वाले राजकमल-स्मृति अंक निकाल रहे हैं। अच्छा रहेगा। निकालें, जरा मेहनत से निकालें।... 'दिनमान' (2/7) में राजकमल चौधरी के देहावसान पर बहुत भद्दी टिप्पणी आई है। हाय रे राज. चौ., जीते जी जिसकी अनुकंपा और हमदर्दी में डूबी पंक्तियाँ तुम्हारे मन-प्राणों को आलोड़ित कर जाती थीं, जिसके खत तुम्हारे सिरहाने, तकिये के नीचे सहेजकर रखे जाते थे अस्पताल की बेहिशियों के दरम्यान भी, उसी का रुख अब कितना बदल गया!! हाँ, 'धर्मयुग' ने अपने ताजे अंक में तुम्हें अच्छी तरह याद किया है... शील और शालीनता हो तो दिवंगत व्यक्ति के नाम पर इसी तरह लिखा जाएगा न? लाख निकृष्ट हो मृत व्यक्ति, भारतीय परंपरा के अनुसार तर्पण के समय कलुष चित्र से उसकी स्मृति में अनाप-शनाप कहने-सोचने की अनुमति नहीं दी गयी है...'
सर्वाधिक महत्वपूर्ण अछि 1971क डायरी, जाहि मे ओ सोवियत रूसक एकैस-दिवसीय यात्राक ब्योरा लिखने छथि। एहि सम्बन्ध मे विस्तारपूर्वक जनबाक लेल 'युगों का यात्री' देखबाक चाही।
हिन्दीक दू पत्रका 'जनयुग' आ 'ज्योत्सना' मे नागार्जुन स्तम्भ लिखलनि। जनयुगक 'यत्किंचित'क चर्चा एखने भेल। एहि स्तम्भ मे ओ तत्कालीन विश्व-व्यवस्था पर अपन दू-टूक विचार राखल करथि। उदाहरणक लेल 4 अगस्त 1968क अंक मे ओ भारत सरकारक भाषानीति पर ई लिखैत जे 'भारत में किसी भारतीय भाषा को पूर्ण अधिकार नहीं मिला है। नीचे से ऊपर तक अंग्रेजी का बोलबाला है', पाकिस्तानक अंग्रेजी-परस्त भाषा-नीति पर लिखलनि-- 'पाकिस्तान में उर्दू और बंगला को बहुत थोड़े-से हक हासिल हैं। कहने को उर्दू वहाँ शासन की प्रमुख भाषा है, बस, कहने-भर को! बंगला का तो और भी बुरा हाल है। पश्चिमी पाकिस्तान के महाप्रभु 'संस्कृतनिष्ठ और हिन्दुत्व-मूलक' बतलाकर बंगला भाषा का मखौल उड़ाते हैं। वे उर्दू और बंगला को मिलाकर एक खिचड़ी भाषा तैयार करवाना चाहते हैं। पूर्वी बंगाल पर वही खिचड़ी भाषा लाद दी जाएगी। पंजाबी, सिन्धी, बलोची और पश्तो भाषाओं का विकास अयूबशाही भला क्यों पसंद करने लगी!' स्मरण राखल जाय जे तहिया धरि बंगलादेश नहि बनल छल, ओ पूर्वी पाकिस्तान कहबैत छल। एहि भाषानीतिक की असर भेलै, से आब जगजानित अछि।
'ज्योत्स्ना' पटनाक एक प्रसिद्ध पत्रका छल, जाहि मे लगभग तीन साल धरि, टूटल क्रम मे, नागार्जुन 'मुखड़ा क्या देखै दर्पण में' नाम सँ स्तम्भ लिखलनि। हुनकर इहो स्तम्भ तत्कालीन परिघटना सब पर दृष्टिपत्र प्रस्तुत करबा सन छल।
अक्टूबर 1964क अंक मे प्रख्यात कवि मुक्तिबोधक निधन पर लिखलनि-- 'आठ महीने तक घोर यंत्रणाएँ झेलने बाद, प्रख्यात कवि-दार्शनिक-आलोचक श्री गजानंद माधव मुक्तिबोध (47) अभी-अभी 11 सितंबर को भवताप से सदा के लिए छुटकारा पा गये।... श्राद्ध-तिथि की सूचना के तौर पर चि. श्री रमेश मुक्तिबोध का पत्र मिला है... पिछले कई दिनों के अंदर मैंने इस पत्र को जाने कितनी बार पढ़ा होगा! आगे भी जाने कितनी बार इसे देखूँगा... शायद मुझे भी लकवा मार जाएगा... शायद मेरी भी जीभ अकड़ जाएगी... क्या करेगा जीकर? तू और तेरे समकालीन झख ही तो मार रहे हैं... स्वानुभूति के क्षणों का कपास धुन रहे हो? व्यक्तिगत व्यथा का झाग बिखेर रहे हो? क्या कर रहे हो? नवनीत-लेपन की प्रक्रिया मालूम है आपको? गालियाँ सुनते समय मुस्कराने का अभ्यास आपको डालना होगा... मुक्तिबोध बुद्धू थे, इसीलिये उनकी दुर्दशा हुई... अक्खड़, दबंग, बातूनी और सीधा-सादा इन्सान आखिर कबतक अपने को बचाए रखेगा?'
तहिना, श्रीलंकाक भाषानीतिक प्रशंसा करैत जून 1967 अंक मे ओ लिखलनि-- 'श्रीलंका (सिंहल) मुख्यत: बौद्धों का देश है। भवात्मक दृष्टियों से वह इस महादेश (भारत) के अति निकट पड़ता है।... श्रीलंका के शासकों ने घोषणा की है कि 1968 से उनके यहाँ सरकारी कामों में अंग्रेजी का इस्तेमाल कत ई नहीं होगा। प्रशासन और प्रशिक्षण के सारे कार्य सिंहली और तमिल में ही होंगे।... काश,श्रीलंका के निवासियों से हम थोड़ा-सा साहस उधार ले लेते!'
नागार्जुन अपन पत्र-लेखनक लेल बहुत मशहूर रहथि। अपन जीवन मे ओ हजारो पत्र लिखने हेता। समुच्चा देश मे हुनकर प्रेमी लोकनि पसरल रहनि। हुनकर हिस्सक रहनि जे यात्रे पर सँ ओ यात्रा पर बहरा जाइत छला, एहि लेल पत्र-लेखन जरूरी छल। युवा लोकनि सब समय हुनका सँ अत्यधिक जुड़ाव अनुभव करैत रहथि। हुनका लोकनिक जे जिज्ञासा होइन तकरो लेल पत्र-लेखने टा ओहि समय एकमात्र साधन छल। काशीप्रसाद जायसवाल, स्वामी सहजानंद, राहुल सांकृत्यायन आदिक संग जे हुनकर गँहीर सम्बन्ध भेलनि, तकरो आरंभ एहि पत्र-लेखने सँ आरंभ भेल छल। हुनकर पत्र सभक तीन गोट संग्रह एखन धरि हमरा नजरि सँ गुजरल अछि-- 'बाबा नागार्जुन' (नरेन्द्र कोहली कें लिखल पत्रक संकलन), 'मैं पढ़ा जा चुका पत्र' (नन्दकिशोर नवल कें लिखल पत्रक संकलन) आ 'नागार्जुन के पत्र: हरिनारायण मिश्र के नाम'। रचनावली-प्रकाशनक समय धरि नागार्जुनक 2500 पत्र संपादक शोभाकान्त कें भेटल रहनि, जाहि मे सँ किछु चयनित पत्र रचनावली मे आयल अछि।