Sunday, September 18, 2022

इन्टरव्यू:: भारतीय साहित्य बीच मैथिली साहित्य (संजीव सिन्हा संग तारानंद वियोगीक वार्ता)




*संजीव सिन्हा--भारतीय साहित्य मे मैथिली साहित्यक कतेक प्रतिष्ठा अछि?

• ता न वि--जकरा पंडीजी लोकनि मैथिली साहित्य कहै छथिन, आ जकरा पुरस्कार-प्रतिष्ठान सब पुरस्कृत करैत अछि, आ जकरा प्रोमोट करबा लेल विश्वविद्यालय सब, मैथिली प्रतिष्ठान सब हलकान रहै छथि, ताहि मैथिली साहित्यक कोनो प्रतिष्ठा नहि अछि। उनटे निन्दा होइत अछि। नियमसंगत बात छै जे जकरा अहां पुरस्कृत करबै ओकरे अनुवाद भ' क' बाहर जाएत आ ओही पर प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा निर्भर करत।

        हिन्दी आलोचक नंदकिशोर नवल जखन पछिला दशक मे एकठाम लिखलनि जे मैथिली मे एखनो महाकाव्ये युग चलि रहल अछि तं मैथिल लोकनि हुनका भरि पोख गरियेलखिन। जखन कि तथ्य की अछि? डा. भीमनाथ झाक आकलन छनि जे दस बरस मे मैथिली मे बीस टा महाकाव्य छपि रहल अछि। दोसर दिस, हमर महान आलोचक रमानाथ झाक मान्यता रहलनि जे मैथिली मे प्राचीन काल सं आइ धरि दुइये टा युग भेल-- विद्यापति सं हर्षनाथ झा धरि कृष्णयुग, आ चंदा झा सं आइ धरि रामयुग। एहि सौ बरस मे दुनिया कते बदलि गेल आ मैथिली जं आइयो एही ठाम अछि तं भला एकर की प्रतिष्ठा भ' सकै छै?

           मुदा दोसर दिस, जाहि रचनाकार लोकनि कें पंडीजी सब गरियाबै छथिन, जिनका लेल ने कोनो पुरस्कार अछि ने कोनो प्रतिष्ठान, विना कोनो प्रोत्साहनक कोना आ किएक ई लेखक लोकनि आइयो मैथिली मे लिखि रहल छथि अन्त:प्रेरणा कें छोड़ि दी, तं एकर जवाबो ताकब रहस्यमय लागत-- भारतीय साहित्य मे जं आइ मैथिलीक कोनो प्रतिष्ठा अछि तं से एहने लेखक सभक दुआरे अछि। यात्री जी, राजकमल चौधरी, धूमकेतु, कुलानंद मिश्र सं ल' क' सुभाष चंद्र यादव धरि आ हुनका बादो ई क्रम जारी अछि। हमरा सदति आश्चर्य लगैत रहल अछि जे हरेक पीढ़ीक संग एहि कोटिक दू-चारि गोट लेखक आइयो मैथिली मे कोना, कोन प्रभाववश चलि अबैत छथि! एकरा अहां मैथिली साहित्यक सौभाग्य कहि सकै छियै।


*संजीव सिन्हा--एखन मैथिली साहित्यक केहन परिदृश्य अछि?

• ता न वि--गुहमा-गीज मचल अछि। मैथिली साहित्यक स्तर कें अठारहम शताब्दीक राजदरबार मे लिखल जाय बला साहित्यक रूप मे ढालबाक सघन प्रयास चलि रहल छै। नेतृत्व एहन लोकक हाथ मे छै जे साहित्यक सी अक्षर नहि बुझैत अछि मुदा समस्त सम्मान अरजि क' मठाधीश बनल अछि। मिथिलाराज, जे कि एखन नहि भेटल अछि, तकरा लेल युवावर्ग आंदोलित छथि, मुदा विश्वविद्यालय कि प्रतिष्ठान, जे कि पहिनहि सं मैथिली कें भेटल अछि, तकर वर्चस्ववादी धतकरम स्वयं मिथिलेक लोक कें एहि सभक प्रति निस्पृह आ निरपेक्ष बना रहल अछि। युवावर्गक ध्यान एम्हर नहि जाइए तं की एकर अर्थ ई नहि भेल जे हिनका सब कें जं मौका भेटि जाय, तं इहो सब सैह करता?

            जेना कि हम पहिने कहलहुं, अपन अंत:प्रेरणा सं आ अपन भाषा-भूमिक नेहवश जे प्रतिभाशाली लोक सब एकान्तवास क' साहित्यसृजन मे लागल छथि, मैथिली साहित्यक समुच्चा भविष्य हुनके सब पर टिकल अछि। मुदा परिदृश्य पर हुनकर कोनो पकड़, कोनो नियंत्रण नहि अछि। जिनकर नियंत्रण छनि हुनका ने मिथिला सं कोनो मोह छनि ने मैथिलीक प्रति कोनो ममता। अर्धमृत मैथिलीक मासु नोचि-नोचि कांच चिबेनिहार ई लोकनि अपन लाभ-लोभ छोड़ि आर कथूक चिन्ता नहि करैत छथि। कइये नहि सकै छथि।


*संजीव सिन्हा--मैथिली साहित्य मे कोन-कोन वाद, विमर्श, आंदोलन चलल अछि? संप्रति कोन साहित्यिक प्रवृत्तिक प्रधानता अछि?

ता न वि.--इतिहासकार सभक संकीर्णता सं बाहर आबि क' जं बात करी तं मैथिली साहित्य मे कुल्लम दुइये प्रकारक वाद चलल अछि-- प्राचीनतावाद आ आधुनिकतावाद।

       प्राचीनतावादक की अर्थ अछि? सनातन धर्मक कर्मकांडी स्कूलक मान्यताक पृष्ठपोषण। हम सब जनै छी जे सनातन धर्म मे बहुतो संप्रदाय अछि, वैष्णव संप्रदाय सेहो अछि, मुदा मैथिलीक प्राचीनतावाद मे एकरा प्रति घोर घृणा देखबै। आश्चर्यक बात ई अछि जे बारह सौ बरस पुरान अपन मैथिली साहित्यक परंपरा मे उत्स अहां कें आधुनिकतावादक भेटत, प्राचीनतावादक नहि। संसार भरिक अध्येता सब कैक अर्थ मे स्वयं विद्यापति कें आधुनिक माने छथि। दोसर दिस, मैथिली मे लेखनक जे आविष्कार भेल छल सैह संस्कृतक प्रतिरोध मे शूद्र वर्गक द्वारा भेल छल। छंद मे कविता लिखब मैथिलीक काव्य-परंपरा मे कहियो मान्य नहि रहल, राग-ताल-लय मे सं कोनो एक वा दू वा तीनू सब दिन मान्य रहलै। मैथिली जहिया सं वर्चस्ववादी लोकनिक शिकार भेल तहिये सं, उनैसम शताब्दीक अंत सं, एहि मे छंदक चलाचलती भेल। आइ जे ब्लैंक वर्स मे कविता लिखल जा रहल रहल अछि तकर परंपरा अहां ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकर मे पाबि सकै छी। प्रसंगवश कहि दी जे वर्णरत्नाकर एक काव्यपुस्तक छी आ स्वयं ज्योतिरीश्वरो एकरा काव्ये कहने छथि।

         आधुनिकताक प्रसार-क्रम मे अनेक आन्दोलन समय-समय पर चलैत रहल अछि। बीसम शताब्दीक आरंभिक बेला कें मोन पाड़ियौ। अंग्रेज हिन्दू-मुसलमान मे विभाजन पैदा करबाक लेल फारसीक स्थान पर हिन्दी कें प्रश्रय देलक आ मिथिलानरेश तं अंग्रेजक सदा सं अनुगामी चाकर, तें तहिया मैथिली साहित्य मे राष्ट्रीय चेतनाक कविता लिखब, मिथिला आ मैथिली कें विकसित करबाक स्वप्न देखब एक आन्दोलन छल। सामाजिक सड़ांध के प्रतिकार मे हरिमोहन झाक कन्यादान वा खट्टर काकाक तरंग कि यात्री जीक पारो आधुनिक मनोनिर्माणक दिशा मे मैथिली साहित्यक सर्वाधिक प्रभावी आन्दोलन छल। मैथिली साहित्यक प्रधान विधा सब दिन सं कविता रहल अछि। कविताक सीमा सब कें तोड़बाक, ओकरा आर अधिक अन्तर्गामी, आर अधिक यथार्थमुखी बनेबाक दिशा मे राजकमल आ हुनकर साथी कवि सभक आन्दोलन एक दिशानियामक अवदान साबित भेल। कविता लेल अबल-निबल लोकक पक्ष मे ठाढ़ हेबाक जे प्रतिश्रुति छै, तकर प्रतिष्ठापन लेल जं एक दिस यात्री जीक चलाओल काव्यान्दोलनक महत्व अछि तं दोसर दिस अग्निजीवी आन्दोलनक सेहो कम नहि, जकर सर्वश्रेष्ठ परिणाम हमरा लोकनि हरे कृष्ण झाक कविता मे पबैत छी।

         मैथिली साहित्य मे समकालीन विमर्श मुख्यत: दूटा प्रभावी रूप सं हस्तक्षेपकारी साबित भेल अछि-- स्त्री-विमर्श आ दलित-विमर्श। आइ एही दुनू विमर्शक रचनाशीलता सर्वाधिक प्राणवन्त, सर्वाधिक ध्यानाकर्षक रूप मे सामने आबि रहल अछि।

         

*संजीव सिन्हा--मैथिली साहित्यक समक्ष की समस्या-चुनौती अछि?

ता. न वि-- सब सं पैघ तं यैह अछि जे प्रतिभाशाली रचनाकार सभक आत्म-बलिदानी पीढ़ी आगुओ एतय कोना जनमैत रहय। एकरा लेल कोनो कतहु माहौल नहि अछि। हमर भरोस एखनहु धरि मरल नहि अछि जे वर्चस्वी लोकनिक क्षुद्र स्वार्थक दबोच सं कहियो मैथिली साहित्य मुक्त हेतै आ एहि अनागत प्रतिभा सभक लेल एतहु एक स्वस्थ पर्यावरण बनतै।

            चुनौती अछि जे एहन साहित्य मिथिला मे लिखल जाय जकर धमक विश्व भरि मे सुनाइ पड़ि सकै। चुनौती अछि जे जाहि हिसाबें नव-नव रचना-प्रवृत्ति सब मैथिली मे विकसित भ' रहल छै, तकरा देखबाक आंखि पहिने तं आलोचक लोकनि मे तखन पाठक लोकनि मे विकसित भ' सकै।

            चुनौती अछि जे श्रेष्ठ साहित्य लिखबाक अभीप्सा राखनिहार युवा लोकनि कोना पुरस्कारक मोह सं बचल रहि सकथि आ एकरे बहुत मानथि जे एहनो अंधकारकाल मे ओ साहित्यक साधना लेल जीवनक महत्वपूर्ण समय खर्च क' पाबि रहल छथि। समय चूंकि सर्वथा विपरीत छै तें मैथिली साहित्यक स्तर, जतय धरि कि आइ ई पहुंचि चुकल अछि, एकरा जीवित बनौने राखिये सकब सब सं पैघ चुनौती छै।


*संजीव सिन्हा--मिथिलाक अन्य भाषा- अंगिका, बज्जिकाक लेखक सँ मैथिली लेखकक संवाद केहन अछि?

• तान वि--कोनो संवाद नहि अछि। अथवा कहू जे घृणा करबाक सम्बन्ध अछि, मानू शुतुरमुर्ग आंखि बन्न क' लेत तं संकट टलि जेतै। रामदेव भावुक आखिरी कवि छला जे अइ पार-ओइ पारक बीच एक पुल छला। आइ समस्त पुल तोड़ल जा चुकल अछि। जेना बेंगक लेल ओकर संपूर्ण संसार इनारे होइ छै तहिना आइ मैथिल लोकनिक लेल संपूर्ण संसार दू जिला-- दरभंगा आ मधुबनी अछि। हं, मंच पर भाषण देबाक जखन बात रहत, बड़का-बड़का बात सुनबै, जेना हाथीक देखावटी दांत। हमरा भय अछि, मैथिल सभक संकीर्णता कहीं  समस्त भविष्यक बलिदान करैत मैथिलियो कें ओही साहित्यिक स्तर पर ने आनि पटकय जतय आइ अंगिका-वज्जिका अछि। एहिना जं सब किछु दस-बीस बरस चलैत रहल तं से निश्चिते भ' क' रहत। आ अहां भारतीय साहित्य बीच एकर प्रतिष्ठाक बात करै छी?

           प्रसंगवश इहो कहि दी जे अंगिका-वज्जिकाक विभाजन वास्तविकता सं कतहु बेसी मैथिल सभक संकीर्णताक प्रतिरोध छियै। कते आश्चर्यक बात छी जे हम सब आइ ओतय पहुंचि गेल छी जतय आठम-नवम शताब्दी मे संस्कृत छल आ संस्कृतेक प्रतिरोध मे मैथिली साहित्यक जन्म भेल छल। लगभग सैह प्रतिरोध आइ अंगिका वज्जिका दिस सं आबि रहल अछि।


*संजीव सिन्हा--मैथिली साहित्य मे नव लेखक लेल कोन तरहक अवसर आ संभावना अछि?

ता न वि--दू तरहक अवसर छै। एक तं कहुना एकटा किताब छपबा लिय' विना अइ बातक परवाह केने कि ओकर स्तर केहन अछि। तकर बाद, गनल-चुनल लोक छथि जानल-मानल, हुनका सभक सेवा मे लागि जाउ, यथाशक्ति तथाभक्ति। जाहि योग्य सेवा रहत, ताहि अनुपातक कोनो पुरस्कार, सम्मान घीचि आनू। मिथिला मे विद्वान लोकक सदा सं बहुत कदर। विद्वानक पहचान यैह जे अहां कें कोनो पुरस्कार भेटल हुअय। आर नहि किछु तं मिथिला विभूति। एतबे मे अहां अपन पुरखा-पति धरि के आत्मा कें तृप्त क' सकै छियनि, समाज मे आदरणीय स्थान पाबि सकै छी। ई पहिल।

                   दोसर जे अवसर छै ताहि लेल हमरा युवा दलित कवि रामकृष्ण परार्थीक एक कविता मोन पड़ि आएल अछि जतय ओ कहै छथि जे मैथिली लिखबा मे हमरा स्वतंत्रता-संग्राम मे सीधा उतरि लड़बा सन के तृप्ति भेटैत अछि। इतिहास कें मोन पाड़ी। हुनका सब कें की भेटलनि जे स्वतंत्रता लेल लड़ला आ मरला! सोचबा सोचबाक बात छी। अहां कें लागि सकैए जे अरे, इहो कोनो बात भेलै! स्वतंत्रता तं जाइत-अबैत रहै छै। आइ धरिक इतिहास मे कतेको बेर ई देश गुलाम बनल, फेर आजाद भेल, फेर गुलाम बनल। असल चीज छी व्यक्तिगत लाभ, से अहां सोचि सकै छी। तकरो अवसर कम नै छै। प्रतिष्ठान आ विश्वविद्यालय तं पहिनहु सं रहै, आब तं नेतागिरी आ दलाली मे सेहो मैथिली सेवनो सं कोनो कम लाभ नै छै।

Wednesday, September 14, 2022

'गुलो'क अन्तर्कथा आ सुभाष चन्द्र यादव

 


तारानंद वियोगी



          सब गोटे जनैत छी जे 1948 मे जखन यात्री जी सं हुनकर प्रकाशक, मने हिन्दी-प्रकाशक, उपन्यास लिखबाक अनुरोध कयने रहनि, तं यात्री जी जिद पकड़ि लेने रहथि जे ओ उपन्यास तं लिखता जरूर मुदा मैथिली मे लिखता। प्रकाशको हुनकर गद्यकला पर तेहन मुग्ध जे मानि गेल छला आ एहि तरहें आयल रहय 'पारो'। मैथिली मे हेबाक बादो ओकर सबटा प्रति छबे मास मे बिकि गेल रहै से तं एक बात, पैघ बात ई जे मैथिली उपन्यासक नियति कें ई उपन्यास बदलि क' राखि देलक रहय। एकर बाद एक हिन्दी तं दोसर मैथिली, एही हिसाब सं हुनकर किताब सब अबैत रहल। मुदा, हमरा कहबाक अछि जे यात्री जी मैथिली मे उपन्यास लिखब छोड़ि किएक देलथि? कहिया छोड़लथि? कोन एहन घटना भेलै जे हिन्दी मे तं हुनकर उपन्यास अबैत रहल मुदा मैथिली मे उपन्यास लिखब ओ बंद क' देलथि।

          एहि प्रसंगक सीधा सम्बन्ध सुभाष चन्द्र यादव लिखित उपन्यास 'गुलो'क संग अछि।

          'नवतुरिया' आ 'बलचनमा' एहन उपन्यास रहै जकरा यात्री जी मैथिली आ हिन्दी मे अलग-अलग लिखने रहथि। 1952 सं 1955 धरि ओ प्रमुखत: एही काज मे लागल रहल छला। हिन्दी मे 'बलचनमा' छपि गेलाक बादो ओ मैथिली 'बलचनमा'क आभा मे डूबल रहला। ई हुनकर स्वप्न आ सेहन्ताक मिथिला रहय। अपन समुच्चा अस्मिता मे जे आदर्श ओ अपन जुझारू जीवन सं अर्जित कयने रहथि, जे मैथिली हुनका प्राण मे सुवास जकां विराजित छली, ई से छल। अन्तत: जखन ई उपन्यास हुनका परिकल्पनाक एनमेन मुताबिक कागज पर उतरि अयलै, 15 फरबरी 1955 कें ओ हरिनारायण मिश्र कें लिखलनि: 'हौ हरि, मैथिली बलचनमा हिन्दी बला सं नि:सन्देह सुंदर भ' गेलैक अछि। अनावश्यक विस्तार आ बन्धुरतो एतय नहि छैक। ओकर धड़कन कैक गुना अइ मे बढ़ि गेलैक अछि, की कहियह!'

          मुदा, दुर्भाग्य देखू जे ई उपन्यास छपबाक लेल यात्री जी एकटा मैथिली संस्था-- मिथिला सांस्कृतिक परिषद्, कलकत्ता-- कें देलखिन, जखन कि हुनका लग तहियो प्रकाशकक कोनो कमी नहि रहनि। मैथिली-संस्था सब, से चाहे सोसाइटी हुअय कि सरकारी, आइ पैंसठ बरखक बादो, कोनो ब्राह्मणजातीय-संगठन सं अलग किछु किनसाइते होइत अछि, भने नाम संग संस्कृति जोड़ल रहय कि चेतना। तहिया केहन परिस्थिति रहल हेतै तकर अनुमान सहजे क' सकै छी। जखन कि 'बलचनमा' की छल? एक शूद्रक संघर्षक कथा छल। एतबे नहि ने। ओ बलचनमेक भाषा मे लिखलो गेल छल, जकर नाम यात्री जी देने रहथिन-- 'शूद्र मैथिली'। आब कहू, ई चीज कतहु मैथिली संस्था छापय? ओ सब यात्री जीक खेखनी तं करै छला एहि लेल जे बड़ पैघ लेखक छी तं किछु मैथिली संस्थो पर दया करियौ। ई के जनै छल जे ओ शूद्र मैथिली मे लिखि क' पठा देता?

           12 बरस धरि जखन संस्था 'बलचनमा' कें नहि छापलक तखन यात्री जी उग्र भेला। मुदा ताधरि पांडुलिपि पूर्णत: नष्ट भ' चुकल रहै। यात्री जीक अपन देशव्यापी प्रतिष्ठा रहनि, तें संस्था पर दवाबो चारूभर सं बनि गेलै। हिन्दी बलचनमा ताधरि हिन्दीक प्रथम श्रेणीक उपन्यास-रूप मे मान्यता प्राप्त क' लेने रहय। लाचार संस्था कोनो अज्ञात अछरकटुआ सं एकर अनुवाद करौलक आ अन्तत: 1967 मे प्रकाशित क' देलक। मूल कृति मुदा विलुप्ते भ' गेलै। मोहन भारद्वाजक मानब छलनि जे अइ किताब पर जे 'मूल लेखक नागार्जुन' छपल रहै, से संस्थाबला सभक खचरपनी छल, मुदा हमर मानब अछि जे खचरपनी नहि, ई हुनका लोकनिक ईमानदारी रहनि। सत्य कें ओ लोकनि लिखित रूप मे स्वीकार क' लेने रहथि। अस्तु, यात्री जीक यैह आखिरी उपन्यास साबित भेलनि जे कि अपन मूल स्वरूप मे छपियो नहि सकल छल।

          ब्राह्मण लोकनि 'शूद्र' कहैत अयलनि अछि मुदा शूद्र लोकनि अपना कें अदौ सं 'पचपनिया' कहै छथि। पचपनिया अर्थात पचपन जाति, जकर वास्तविक अर्थ थिक बहूतो जातिक समुदाय। एही पचपनिया मैथिली मे 'गुलो' छपल अछि।

          एहि तरहें, साठि वर्ष पहिने यात्री सन महामना लेखकक हारल एक अभियान कें हमरा लोकनि सुभाष चन्द्र यादवक एहि उपन्यास मे आकार लैत देखैत छी। एकरा कोनो छोट घटना, जेना थोकक हिसाबें मैथिली मे किताब बहराइत अछि, कोना मानल जा सकैत अछि? जें कि सुभाष सन के विरल सिद्धहस्त लेखक के लिखल ई रचना थिक, (तखनहि तं यात्री-प्रसंग संग एहि ठाम तुलनीय मानलो गेल अछि,) केवल भाषे धरि बात नहि रहल। कलाक एक एहन दुर्लभ नमूना मैथिली उपन्यास कें हासिल भेलैक जाहि पर बहुत युग धरि गर्व कयल जा सकैए। 

          यात्री जी सन पैघ लेखक बुते जे काज 1955 मे करब पार नहि लागल छलनि से काज 2015 मे सुभाष क' सकला, एकर एक अर्थ इहो भ' सकैत अछि जे अइ साठि बरस मे मिथिला समाज बदलि गेल। कतबा बदलल? कोनहु भाषाक सृजेता लोकनि तं तहिना समाजक शीर्ष होइत छथिन जेना गाछ मे फुलायल फूल। ओ परिष्कृत परिशोधित होइत छथि आ अपन जीवनक एक उल्लेख्य भाग अपना कें डिकास्ट आ डिक्लास्ड करै मे लगबै छथिन। तें हुनका लोकनिक व्यवहार सं अहां सकल समाजक स्थितिक सही-सही मापन प्राप्त नहि क' सकै छी, एतय धरि कि मैथिली संस्थाक संचालक लोकनिक वा पुरस्कार वा लाभ-लोभ (अर्थ अछि चारू प्रकारक लाभ-- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सं लिखनिहार लेखको धरिक स्वास्थ्यक सही पता नहि पाबि सकै छी। 

          असल मे, सुभाष अपन उपन्यास 2014 मे पूरा क' लेने रहथि आ 'मिथिलादर्शन'क अक्टूबर-नवंबर 2014क अंक मे ई प्रकाशितो भ' गेल रहैक। अइ बीच मे दूटा मुख्य घटना घटलैक। एक तं ई जे उपन्यास पूरा कयलाक बहुत समय बादो धरि सुभाष अपन रचनात्मक आवेग सं बाहर नहि निकलि पाबि रहल छला। पैघ रचनाक सृजनोत्तर आवेगो पैघ होइत छैक। एही निकलबाक प्रयत्न मे ओ 'पचपनिया मैथिली' नामक अपन लेख लिखि लेलनि। ई लेख प्रकाशित होयबा सं पहिनहि एकर एक अंश सोशल मीडिया पर प्रकाशित कयल गेल छल। बिखिन्न-बिखिन्न प्रतिक्रियाक धर्रोहि लागि गेल। बाद मे ई संपूर्ण लेख 'पूर्वोत्तर मैथिल'क अंक मे प्रकाशित भेल। संपादकीय विमतिक प्रायोजना-स्वरूप कही कि स्वाभाविक धर्मरक्षा-स्वरूप, पैघ-पैघ प्रतिक्रियाक धर्रोहि ओतहु लागि गेल। अइ सब सं असलियत बूझल जा सकैत छल जे सकल समाज कतबा बदलल अछि आ कि केहन बदलल अछि। 

          दोसर घटना ई भेल जे 2015क भूकंपक समय मे कथानायक गुलो मंडल के देहान्त भ' गेलनि। सुभाष आ केदार गुलो मंडलक संग कोना जुड़ल छला, तकर प्रसंग केदार काननक एक लेख मे आयल छैक। गुलोक मरब सुभाषक लेल एक पैघ घटना छल आ ई अनेक तरहें हुनका प्रभावित केलकनि। एक प्रभाव तं छल जे एहि बातक प्रकरण उपन्यास मे आनब हुनका जरूरी क' देलकनि। समापित आ प्रसारित उपन्यासक गीरह फेर सं खोलल गेल, किछु तहिना जेना सारा मे गाड़ल गुलोक लहास कें फेर सं खोदि क' निकालल गेल छल। किसुन संकल्पलोक सं जे 'गुलो' छपल अछि, ताहि मे ई समुच्चा अंश अछि जखन कि 'मिथिलादर्शन'क पाठ मे ई नहि अछि। किनको लागि सकै छनि जे एहि अंश कें जोड़ब उपन्यासकलाक हिसाबें गैरजरूरी छल, जखन कि कोनो दोसर गोटे कें जरूरियो लागि सकैत छनि। असल मे अपन कथानायकक संग उपन्यासकारक संलिप्तता आ तादात्म्य कोन रूपक छनि, ई प्रश्न ताहि पर निर्भर करैत अछि। वाजिबे थिक जे एकर संपूर्ण अधिकार सुभाष कें छलनि जकर यथेप्सित उपयोग ओ क' सकैत रहथि।

          मैथिली साहित्य मे सुभाषक महत्व पर विचार करैत प्रसिद्ध आलोचक कुलानंद मिश्र कहियो लिखने छला-- 'मैथिली कथाक क्षेत्र मे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक बादे आरंभ भेल।' बुधियार कें इशारा काफी बला अंदाज मे अपन बात कहैत कुलानंद जी ओतय साफ नहि कयने रहथि जे ई 'एकटा निश्चित सीमा' की छल आ सुभाष कोन तरहें एकर 'अतिक्रमण' केलखिन। आब हमसब इतिहासक एहि पार आबि क' देखैत छी तं बूझि सकैत छी। 'मैथिली-साहित्य' जकरा हमसब कहै छी, विश्वास करू ओ विशुद्ध 'ब्राह्मण-साहित्य' नहि थिक जेना कि किछु लोक अपन लेखन सं आ अधिकतर अपन रणनीतिक(?) व्यवहार सं साबित करैत रहैत छथिन। ई जं कहबै जे तमाम विविधताक बादो मैथिली साहित्य अन्तत: जीवन-जगत कें देखबाक एक ब्राह्मण-दृष्टि मात्र थिक, सेहो कहब उचित नहि। जं किनको लगैत होइन जे नहि, यैह उचित थिक तं हुनका मैथिली लिखब छोड़ि क' कठिन प्रयत्नपूर्वक अपना कें कुसंस्कारमुक्त हेबाक साधना करबाक चाही।

         

Friday, September 2, 2022

राजकमल चौधरी का हिन्दी और मैथिली लेखन


 ।।राजकमल चौधरी का हिन्दी और मैथिली लेखन।।

तारानंद वियोगी से सुजीत वत्स का संवाद


सुजीत वत्स-- राजकमल चौधरी के अधिकृत विद्बानों में से आप एक हैं।साथ ही आपने उनकी मैथिली कविताओं के साथ -साथ हिंदी कविताओं का भी सूक्ष्म अध्ययन किया है। आपसे मेरा पहला प्रश्न है कि आप राजकमल की हिन्दी कविताओं और मैथिली कविताओं के संवेदनात्मक स्वरूप में क्या अन्तर महसूस करते हैं।


तारानंद वियोगी-- राजकमल ने जब मैथिली में कविताएं लिखनी शुरू कीं, उनका स्वर और शैली बिलकुल पारंपरिक थे। युवापीढ़ी के साथ जो नया उत्साह और नया तेवर आता है, वही केवल था और वह दुनिया को बदल डालना चाहते थे।

    पर जब उनकी आरंभिक हिन्दी कविताओं को देखें तो तो वहां भी हमें यही चीजें देखने को मिलती हैं।

    फर्क आगे जाकर पड़ा जब उनकी मैथिली कविताएं ग्रामीण सौन्दर्यबोध में पगी देखने को आईं और हिन्दी कविताएं नागरबोध में। शाक्ततंत्र का उन्हें अच्छा ज्ञान था, जो दोनों ही भाषाओं की कविताओं में जगह जगह पूरे फैलाव के साथ आए हैं। दूसरे यह कि मैथिली की काव्यपरंपराओं में यहां की सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप ही कई वर्जनाओं को पूज्यभाव से देखा जाता था। इन्हें राजकमल ने निर्दयतापूर्वक तोड़ा। इसलिए उनकी मैथिली कविताओं ने मिथिला के काव्य परिदृश्य में काफी हाहाकार मचाया। हिन्दी के काव्यपरिदृश्य के लिए यह चीज उस तरह नई नहीं थीं। यहां उन्होंने दूसरी कई चीजें तलाश लीं। 

    राजकमल का कवितावाचक एक बौद्धिक युवा है। यह मैथिली के लिए नई चीज थी। यात्री का कवितावाचक ग्रामीण किसान था। हिन्दी में बौद्धिक कवितावाचक का प्रवेश काफी पहले हो चुका था।

   भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जो महान आदर्श थे, उसने दूर तक राजकमल के कविव्यक्तित्व को प्रभावित किया था। लेकिन, उन आदर्शों के टूटने बिखरने की धमक राजकमल की तमाम कविताओं में पाई जाती है। इसलिए उनका जो कवितावाचक है, वहां एक टूटन भी है और दिशाहारापन भी, भले ही वह दुनिया को बदल डालने की मंशा रखता है। राजनीति उनकी कविताओं का एक जरूरी एंगल है। यह अलग बात है कि उनमें विचारधारागत स्पष्टता का अभाव है। यह हमें उनकी हिन्दी कविताओं में ज्यादा साफ दिखता है। अपनी मैथिली कविताओं में वह एक उप राष्ट्रीयता भी रखते पाये जाते दीखते हैं, जो कि उनका मैथिलत्व है।



सुजीत वत्स-कवि के साथ-साथ राजकमल को एक कथाकार के रूप भी जाना जाता है।एक कवि या फिर एक कथाकार दोनों  में से  किस विधा में  उनकी रचनाएँ ज्यादा  सशक्त है?


तारानंद वियोगी-- हिन्दी और मैथिली दोनों ही भाषाओं में काफी लोग ऐसे हैं जो राजकमल को एक कथाकार के रूप में ही ज्यादा सफल मानते हैं। यह मानने के अपने कारण भी हैं। याद रखने की बात है कि कहानी में सिद्धता के अपने अलग मानदंड हैं, और वे कविता से अलग हैं। कोई अच्छा कवि हो तो केवल इसी से यह तय नहीं हो जाता कि कहानीकार भी वह अच्छा होगा। कहना चाहिए कि राजकमल ने इन दोनों ही विधाओं में अलग-अलग सिद्धि प्राप्त की।

      अपनी जिस आवेगभरी भाषा के लिए वह जाने जाते हैं, वह गद्य और कविता दोनों में ही अपना कमाल दिखाती है। सामाजिक सरोकार उनकी कहानियों में ज्यादा स्पष्ट हैं। सामंतवाद का विरोध भी, और लैंगिक गैरबराबरी के खिलाफ गुस्सा भी। कहानियों के विषय उन्होंने ऐसे चुने जो समकालीन साहित्य की एक बड़ी रिक्ति भरते थे, और पाठक को एक नये संसार के सामने ला खड़ा करते थे। एक ऐसा संसार, जिसके बारे में या तो बहुत कम जानता होता था, या फिर इस तरह कभी सोचा तक नहीं होता था। 

      राजकमल की कही वह बात मुझे नहीं भूलती कि इतने लोगों ने कहानियां लिख लीं और लिख रहे हैं कि नया या मौलिक कथानक तो हमें अब मिलने से रहा। अब तो शैली ही एक बच गयी है जो हमें अपने समकालीनों में अलग दिखा सकेगी। अपनी आवेगमय भाषा में शैली का उन्होंने ऐसा चमत्कार रचा कि उन लोगों की बात को यूं ही उड़ा देना आसान नहीं है, जो राजकमल को कहानीकार के रूप में ज्यादा सफल पाते हैं।



सुजीत वत्स-राजकमल ने अपनी हिन्दी कविताओं में मिथकों का बहुत ही अधिक प्रयोग किया है।क्या मैथिली कविताओं में भी उन्होंने मिथकों का प्रयोग  उसी अनुपात में प्रयोग  किया है?एक प्रखर प्रतिरोधी कवि की कविताओं में मिथकों का इतना अधिक प्रयोग कविता की सम्पेषणीयता में बाधा तो नहीं है??


तारानंद वियोगी- हां, ये सही है कि अपनी कविताओं में मिथकों का प्रयोग उन्हें प्रिय था। और, यह हिन्दी और मैथिली दोनों ही भाषाओं की कविताओं में समान रूप से किया गया है। ब्राह्मणशास्त्रीय प्राचीन मिथक उन्हें प्रिय थे। इनका उपयोग अक्सर वह अपनी अभिव्यक्ति को धार देने के लिए करते। यह उनके कथ्य को अतिरेक में ले जाता था। अतिरेक में होना उनकी अपनी विशेषता थी और इसके लिए तरह तरह के प्रयोग करते रहते। कई बार तो बस चौंकाने या सामनेवाले को आक्रान्त कर जाने के लिए मिथकों को घसीट लाते। लेकिन, अध्येताओं ने पाया है, और गौर करें तो हम भी देख सकते हैं कि कि ये मिथक उनकी आत्मा की बेचैनी और मन की दुराशंकाओं की सटीक व्याख्या कर जाते थे। उनकी एक मैथिली कविता 'महावन' में आए पुराने पाकड़ वृक्ष की धोधर में बैठे पुरातन गिद्ध के रंग को कविता में देखने के बाद मणिपद्म ने यह आशंका व्यक्त की थी कि इस कवि की मृत्यु अब सन्निकट है। और आश्चर्यजनक रूप से यह आशंका सच साबित हुई थी। मतलब यह कि जो भी प्रयोग वह करते उसमें उनका आत्म गहरे तक निमज्जित रहता था।