यात्री नागार्जुन आ मैथिली
तारानंद वियोगी
हुनकर पूरा नाम रहनि-- वैद्यनाथ मिश्र विद्यार्थी वैदेह यात्री नागार्जुन बाबा। ई लंबा नाम कैक-कैक युगक प्रतिनिधित्व करैत छल।आम तौर पर लोक बड़ बेसी भेल तँ अपना युगक प्रतिनिधि होइत अछि। मुदा यात्री अपन मेधा,उद्यम, क्रियाशीलता आ अध्यवसाय सँ कैक युग मे अपन प्रवेश संभव बना लेने रहथि। बीसम शताब्दीक मिथिला मे हुनका सन ने क्यो सिद्ध यायावर भेला ने एहन साहित्यकार, जे अपना युगक बाद आब' बला हरेक युग कें प्रभावित केलखिन, दिशा-निर्देश केलखिन। हमरा एतय कवि भीमनाथ झाक किछु काव्यपंक्ति मोन पड़ैत अछि जे ओ महाकवि यात्री पर लिखने छथिन-- 'नहि कहैत छी, अहाँ युगक साहित्य-विधायक/ नहि कहैत छी, अहाँ एहि पीढ़िक छी नायक/ नहि कहैत छी युगक क्रान्तिकारी कवि-पुंगव/ नहि कहैत छी, अहाँ विरोधी छी अन्यायक/ एहन-एहन सब युग मे क्यो-ने-क्यो छथि अबिते/ सब युग मे युगपुरुष कहबिते रहला क्यो-क्यो/ युग-युग धरि नहि जोति जकर कम हैत कनेको/ अही युगक युगपुरुष कोना ओ? भने कहओ क्यो...' एहि दू बन्धक कविता मे जाहि-जाहि विशेषताक बारे मे कवि 'नहि कहैत छी' लगा क' बात केलनि, ई सबटा गुण तँ यात्री मे छलनिहे, एहि सँ बेसी जे छलनि जकर व्याप्ति युग-युग धरि बनल रहत, तकरे गप करब एतय कविक मूल अभिप्राय छनि, आ सैह गप एतय हमहूँ कहि रहल छी।
मैथिली साहित्य कें जे चीज ओ देलखिन से की छल? पौराणिकता आ कविरूढ़ि कें कात हटा क' एहन दुनिया कें ओ साहित्य मे प्रतिष्ठित केलखिन, जेहन कि ओ वास्तव मे हमरा सभक चौबगली मौजूद अछि। जँ समाज मे कोनो रोग अछि तँ ओकरा झाँप-तोप करबाक बदला ओकरा देखार केलखिन जाहि सँ एकर समाधान निकलय। अतीतमुखी दृष्टि भेने आ केवल चर्वित-चर्वण कयने कोनो समाजक भलाइ नहि भ' सकैए, अपन दृष्टि कें भविष्यमुखी बनायब अपरिहार्य अछि, ई हुनक कहब छलनि। ई दृश्यमान जगत मिथ्या नहि थिक, आ ने माया। ठीक एकर उनटा यैह जगत टा सत्य थिक। जगत मे जे किछु परिघटना होइ छै, सभक जड़ि मे कार्य-कारण सम्बन्ध रहैत छैक। विश्वक उन्नति तखने टा संभव जँ समस्त जनता, मने गरीबी रेखाक भीतर आब' बला जनता सेहो, सुखी रहतैक। हमर एक एहन समाज बनय जे एक्कहि संग लोकतांत्रिक, समता आ बन्धुतापूर्ण आ वैज्ञानिक दृष्टि सँ पूर्ण हो। यैह मानवताक परम लक्ष्य थिक, यैह भारतीय स्वतंत्रता संग्रामक जीवित आदर्श सेहो थिक, आ ठीक यैह हमर आगामी युगक साहित्यक सेहो लक्ष्य थिक। अहाँ चाही तँ एक परीक्षण क' सकैत छी। जेना फल्गु नदीक ऊपर बालु कें कनेके खोदने जलक स्रोत देखाय लगैत अछि, अहाँ एकैसम सदीक कोनो मैथिली लेखकक कोन्नो रचना उठा लिय'। कनेके खोदने ओहि मे यात्री-धाराक स्रोत देखार पड़य लागत।
मैथिली साहित्य मे आधुनिकताक प्रवर्तन कहिया आ कोना भेल, एहि पर बहुत विवाद छै। विवादक मुख्य कारण छै जे विद्वान लोकनि स्वयं साहित्ये कें साध्य मानि क' निर्णय कर' लगैत छथि। साहित्य स्वयं मे कोनो साध्य कोना भ' सकैत अछि? तखन लोक ओकरा पढ़त किए? तखन ओकरा सँ कोनो उम्मेद कोना कयल जा सकतै? साहित्य एक साधन थिक-- अखिल मानवता कें किछु आर पुष्ट करबाक, जेहन ई दुनिया अछि, ताहि सँ कने बेहतर दुनिया बनय-- एहि लक्ष्यक संग साहित्य लिखल जाइत अछि। हमर तँ स्पष्ट मान्यता अछि जे मैथिली साहित्य मे आधुनिकताक प्रवर्तन 1941 मे छपल यात्रीक कविता 'कविक स्वप्न' सँ होइत अछि। कारण, जे परंपरित साहित्यक जे सोच, जे विषय, जे अवधारणा छल, तकरा नकारि क' ओ अपना समय कें, अपना समयक यथार्थ कें, अपना समयक अन्तर्विरोध कें देखबाक प्रस्ताव करैत अछि। इहो मोन रखबाक बात थिक जे आधुनिकता अपना आगू-पाछू सातत्य बनबैत चलैत अछि। पाराडाइम शिफ्ट जखन होइछ तँ आगूक समय ओहने नहि रहि जाइछ जेहन कि ओ पहिने सँ चलि अबैत छल। यैह बात यात्रीक संग भेलनि। हुनका हेबाक बाद हमसब ओहने नहि रहि गेलहुँ, जेहन पहिने रही।
यात्री बहुभाषाविद् छला। मिथिला मे बहुभाषाविद् कवि कें प्राचीन काल मे अधिक सम्मान देल जाइत छलनि, जखन कि बहुभाषाविद् लेखक कें आइ हीन लेखक बूझब मैथिलीक विद्वान लोकनि कें सुरक्षित लगैत छनि। अहाँ ज्योतिरीश्वर कें देखियनु, विद्यापति कें देखियनु, ई लोकनि एक्कहि संग अनेक भाषा मे रचना केलनि। यात्री कें जँ एक दिस संस्कृत, प्राकृत, पालि, अपभ्रंश आदि प्राचीन भाषाक ज्ञान छलनि तँ सिंहली, तिब्बती आदि विदेशी भाषा पर सेहो गँहीर पकड़ रहनि। आधुनिक भारतीय भाषा सब मे सँ गुजराती, सिन्धी, असमिया, उड़िया, बंगला, पंजाबी-- ई सब पढ़ैत-लिखैत तँ खुद हमही देखने छियनि। लेखन ओ चारि भाषा मे केलनि-- संस्कृत, मैथिली, हिन्दी आ बंगला। संस्कृत सँ ओ लेखनक आरंभ कयने रहथि, आ अपन बुढ़ारी मे बंगला मे सेहो लिखलनि, जखन कि बंगलाक ज्ञान हुनका तरुणाइये अवस्था सँ छलनि। बहुत गोटे यात्री पर अभियोग लगबैत छथि जे ओ हिन्दीक लेल बेसी काज केलनि, मैथिलीक लेल एतबा कयने रहितथि तँ केहन उत्तम होइतय। ई अभियोग कोनो आइये लगायल जाइत हो, से बात नहि अछि। हुनका जीबैत-जी सेहो ई प्रश्न उठैत छल, आ अपन एक मैथिली लेख 'पृथ्वी ते पात्रम्' मे ओ एहि प्रश्नक उतारा सेहो देलनि अछि। उतारा यैह जे हुनकर जीविकोपार्जनक एकमात्र साधन हुनकर लेखने छलनि। गरीब रहथि, जमीन-जाल रहनि नहि, तें जतय सँ पारिश्रमिक अबैत हो, तही ठाम लिखब हुनका लेल बाध्यकारी छलनि। की अहाँ एकैसमो सदीक लेल ई कल्पना क' सकै छी जे मैथिली लेखन जीविकोपार्जन साधन भ' सकैत अछि?
मुदा, आइयो जँ ई प्रश्न उठाओल जाइत हो, तँ एकरा की कहल जाय? असल मे ई विचारधाराक टकराहट थिक। एकर मूल मे कारण छै जे यात्री भविष्यदृष्टि बला लेखक छला, प्रश्नकर्ता स्वर्णिम अतीत मे फँसल छथि आ ओकरे धरती पर फेर सँ उतारब हुनकर साहित्य-लेखनक संकल्प छनि। यात्री जँ आधुनिकता, विज्ञान-बुद्धि, लोकतांत्रिकता, समता आ बन्धुत्वक पैरवीकार छला, तँ अपना समाज मे एखनो एहन लोक घटल नहि छथि जिनकर विश्वास लोकतंत्र वा समता मे नहि, जमीन्दारी-राज आ वर्णाश्रमधर्म मे छनि। हुनका जखन आन कोनो उपाय नहि भेटैत छनि तँ ओ लोकनि यात्रीक मैथिलत्व पर, हुनकर मिथिला-मैथिलीप्रेम पर प्रश्न उठबैत छथि। दुखद ई अछि जे ने तँ यात्री-साहित्य कें सरिया क' ओ पढ़ने रहैत छथि, ने यात्रीक कवि-स्वभाव व्यक्तित्व कें ओ जनने रहैत छथि।
यात्री हिन्दी मे लिखलनि, एहि प्रश्न सँ कने आगू बढ़ि क' हमसब ई देखी जे हिन्दी मे ओ 'की' लिखलनि, तँ बहुत काजक दृष्टि विकसित भ' सकैत अछि। हम तँ एतबे कहब जे यात्री हिन्दी मे लिखने होथु कि कोनो आन भाषा मे, जतबा जे ओ लिखलनि से 'मिथिला' कें लिखलनि। मुदा, एहि बात कें हम एतय जेना कहि रहल छी, एहू सँ बढ़िया तरीका सँ आन लोक सब एही बात कें लिखने छथि। पहिने कवि भीमनाथ झाक ओही कविताक एक अन्य बन्ध सुनी-- 'अहँक मुँहक मैथिली भनहि बाजथु हिन्दी मे/ बाजथु संस्कृत मे, बंगलो मे, अथवा जइ मे/ कहाँ कतहु छोड़ै छथि अपन गाम कें, घर कें/ तरौनीक बलचनमे रहइछ ओइ मे, अइ मे।' यात्री कें निकट सँ देखल-पढ़ल एहि जिम्मेदार कविक आकलन देखल जाय! यात्री भने कोन्नहु भाषा मे लिखने होथु, ओकर विषय-वस्तु मिथिले रहलैक। मिथिलाक कोन-कोन वस्तु, कोन-कोन लोक, कोन-कोन संस्कृति नागार्जुनक रूप मे मूर्तिमान भेल रहैक, तकर विवरण महान हिन्दी कवि केदारनाथ अग्रवालक ओहि कविता मे आयल अछि, जकर शीर्षक छैक-- 'नागार्जुन के बाँदा आने पर'। बाँदा, अर्थात उत्तरप्रदेशक ओ शहर जतय केदार जी रहै छला। कविताक पाँती देखी-- 'आओ साथी, गले लगा लूँ/ तुम्हें, तुम्हारी मिथिला की प्यारी धरती को/ तुममें व्यापे विद्यापति को/ और वहाँ की जनवाणी के छन्द चूम लूँ/ और वहाँ के गढ़पोखर का पानी छूकर नैन जुड़ा लूँ/ और वहाँ के दुखमोचन, मोहन माँझी को मित्र बना लूँ/ और वहाँ की आब-हवा से वह सुख पा लूँ/ जो गीतों में गाया जाकर कभी न चुकता/ जो नृत्यों में नाचा जाकर कभी न चुकता/ जो ज्वाला में डाला जाकर कभी न जलता/ जो रोटी में खाया जाकर कभी न कमता/ जो गोली से मारा जाकर कभी न मरता/ जो दिन दूना, रात चौगुना व्यापक बनता/ और वहाँ नदियों में बहता/ नावों को ले आगे बढ़ता/ और वहाँ फूलों में खिलता/ बागों को सौरभ से भरता...' विष्णुपुराण सँ ल' क' आइ धरि लिखल मिथिलाक वर्णन बहुत सुनने हेबै। मुदा, एहि कविक मिथिला-वर्णन सुनियौ। ई कवि कहियो मिथिला नहि एलाह। मिथिले हुनका लग पहुँचलनि अछि नागार्जुनक रूप मे। एक नागार्जुन कें आलिंगन करबाक अर्थ कतेक हजार चीज कें आलिंगित करब थिक, जे कि मिथिलाक प्रतिनिधित्व करैत अछि। ओहि मिथिलाक नहि, जे कि क्यो आबि क' देखि जाय, अपितु ओहि मिथिलाक, जे कि नागार्जुनक व्यक्तित्व मे आ साहित्य मे अक्षय-अनंत सौरभ लेने प्रकट भेल छलैक!
आ, एकर आभास स्वयं यात्री कें नहि होइन, सेहो नहि। हुनकर साक्षात्कार बला पुस्तक देखल जाय, कतेको लोक कें कतेको बेर ओ कहने छथिन जे 'हम वास्तव में क्या हैं, यह तुम्हें समझना हो तो मेरी मैथिली कविताएँ पढ़ो।' मोन पड़ैए, महान कवि शमशेर बहादुर सिंह जखन अपन एहि मित्र लग बैसथि तँ अत्यन्त आत्मीयता सँ कहनि जे 'तुम अपनी मैथिली कविताएँ सुनाओ।' केहन सूक्ष्म संवेदनाक कवि रहथिन शमशेर, अहाँ कें साइत बूझल हो, ओ चूड़ान्त कवि यात्रीक मैथिली कविताक भाषिक संगीतक पारखी छला। 'कवि-कोकिल' कहै छियनि हमसब विद्यापति कें। मुदा, बिसरल रहै छी जे मिथिला कें आनो कवि-कोकिल पैदा करबाक बुत्ता रहल छै, आइयो छै।
मिथिला कोन तरहें यात्रीक मनोमस्तिष्क मे व्याप्त छली, तकर दृष्टान्त लेल एतय हम किछु तथ्य राखय चाहब। 1931 मे, जखन यात्री बीस बरखक एक युवा छला, कार्तिक धवल त्रयोदशी कें विद्यापति स्मृति पर्व मनेबाक आविष्कार कयने छला, आ एकर पहिल आयोजन बीएचयू काशी मे भेल रहैक। ओकर विवरण डाॅ. काञ्चीनाथ झा किरण अपन संस्मरण मे विस्तारपूर्वक लिखने छथि।
पंजाब-सिन्ध-गुजरात-मराठा होइत जखन 1946 मे यात्री पटना घुरला तँ ग्रन्थमाला कार्यालय कें अपन डेरा बनौलनि। ग्रन्थमाला कार्यालय देशक एक प्रतिष्ठित प्रकाशक रहय, जे कि एक नन-मैथिल रामदहिन मिश्रक छलनि। वैह रामदहिन मिश्र, जिनकर लिखल पुस्तक 'काव्य-दर्पण' हिन्दीक एक क्लासिक कृति थिक। ग्रन्थमाला कार्यालय सँ 'पारिजात' नामक साहित्यिक पत्रिका छपैत छल जे ओहि युग मे हिन्दीक सर्वश्रेष्ठ पत्रिका मे सँ एक छल, आ ओकर सर्कुलेशन देश भरि मे रहै। एही ठाम सँ दोसर पत्रिका 'किशोर' बहराइत छल। एहि पत्रिका सभक महत्व एही सँ बूझल जा सकैत अछि जे आचार्य नलिन विलोचन शर्माक प्रसिद्धतम लेख मे सँ एक 'सूरदास' किशोर मे छपल छल आ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदीक प्रसिद्ध उपन्यास 'चारु चन्द्रलेख' पारिजात मे धारावाहिक छपि रहल छल। नागार्जुन पटना पहुँचिते पत्र-पत्रिका मे धुआँधार लेखन शुरू केलनि। प्रकाशनक स्वामी रामदहिन मिश्रक एक आर सेहन्ता रहनि जे प्रतिभाशाली युवा साहित्यकारक पहिल पुस्तक छपबाक अवसर हुनके भेटनि। आरसी प्रसाद सिंह, हंसकुमार तिवारी, राम इकबाल सिंह राकेश आदिक पहिल पुस्तक एतहि सँ छपल छल। प्रकाशक नागार्जुन सँ अनुरोध केलनि जे अहाँ उपन्यास लिखू, हम छापब। बहुत दिन धरि तँ ओ अनठेने रहला। अन्तत: घोषणा केलनि जे हम उपन्यास तँ लिखब, मुदा ओकर भाषा रहतै मैथिली। हिन्दी प्रकाशकक लेल ई एक विचित्र प्रस्ताव छल, मुदा नागार्जुन अड़ि गेला। वैह उपन्यास थिक 'पारो', जकरा लिखल तँ गेल छल मैथिली मे मुदा, सौंसे देशक ध्यान आकृष्ट केलक जे बिहार सँ एक नीक नवोदित उपन्यासकार बहरेला अछि।
हिन्दीक एक प्रतिभाशाली युवा लेखक ई किएक चाहैत अछि जे ओकर पहिल प्रकाशित किताब मातृभाषा मैथिली मे छपय! किछु तँ बात छै, जेना कि केदारनाथ अग्रवाल लिखनहु छथि, 'तुममें व्यापे विद्यापति को।' मने जे महाकवि विद्यापति, कवि नागार्जुन मे व्यापि गेल छला।
जखन यात्री पटना मे रहय लगला तँ हुनका बिहारक साहित्यिक राजनीति सँ मुठभेड़ भेलनि। परिस्थिति एहन बनलैक जे तमाम हिन्दी युवा लेखक नागार्जुनक नेतृत्व मे पुरातनपंथी गुटक विरुद्ध हल्ला बोल शुरू केलनि। मुदा, नागार्जुने पाछाँ हटि गेला? बुझबै जे किएक पाछाँ हटि गेला? एहि दुआरे जे ओ एखन निर्माण-कार्य मे लागल छला।मैथिलीभाषी लोकनिक एक स्थायी संस्था ठाढ़ करबाक उद्यम मे भीड़ल छला, आ एही पर पूर्णत: एकाग्र छला। वैह संस्था थिक ई चेतना समिति, जकर सह-आयोजन मे ई कार्यक्रम भ' रहल अछि।जेंकि नागार्जुनक मातृभाषा-प्रेम कम्युनिस्ट पार्टीक भाषानीति सँ मेल नहि खाइत छल, ओ पार्टी सँ बर्खास्त भ' जायब मंजूर क' सकैत छला, मुदा मैथिली कें, चेतना समितिक निर्माण कें छोड़ब नहि।
15 अगस्त 1947 कें देश आजाद भेल रहय। ई एक एहन दुर्लभ अवसर रहय जे कोनो कोनो भाग्यशाली शताब्दी कें देखबाक सौभाग्य भेटैत छैक। ओहि समय दरभंगा जिला किसान सभाक ओ अध्यक्ष रहथि, आ ओही समय मे किसान सभाक संग जमीन्दारक खिलाफ ऐन दरभंगा मे, सड़क पर उतरि क' आन्दोलन क' रहल छला। पार्टी लाइनक विरुद्ध जा क' ओ 15 अगस्त कें आजादीक त्योहार मनेलनि आ ओही राति 'वन्दना' शीर्षक कविता मैथिली मे लिखलनि। एहि लेल हिन्दी बला सब जीवन भरि हुनकर गंजन करैत रहलनि, हुनकर निष्ठा कें एहि आधार पर संदेहास्पद मानैत रहला जे एहन दुर्लभ अवसरक वस्तु ओ हिन्दी मे किएक नहि लिखलनि जे मैथिली मे लिखलनि!
नागार्जुनक लिखल एक दीर्घ निबन्ध 'मैथिली और हिन्दी' बहुतो गोटे कें मोन हेतनि। ई निबन्ध ओ एही शीर्षक सँ लिखल गेल एक अन्य निबन्धक प्रत्युत्तर मे लिखने रहथि। ओ निबन्ध प्रख्यात आलोचक रामविलास शर्मा लिखने छला। रामविलास जी नागार्जुनक अंतरंग मित्र रहथिन, आ से एहन मित्र जकरा घुट्ठी-सोहार कहल जाय। मैथिलीक बारे मे रामविलास शर्मा लिखने छला जे मैथिली सामन्ती अवशेषक एक बोली थिक जकरा मैथिल सम्भ्रान्त लोकनि बजैत छथि आ किछु-किछु लिखितो-पढ़तो छथि। हुनकर कहब रहनि जे आजादी-बादक बिहार के जेना-जेना प्रगति आ विकास हेतै, ई बोली स्वत: लुप्त भ' जायत, आ हिन्दी पूरा मिथिलांचल कें गछाड़ि लेत। मैथिलीक विरुद्ध एहि सँ कड़ा लेख एहि सँ पहिने नहि कहियो लिखल गेल छल। नागार्जुन पर भयंकर प्रतिक्रिया भेलनि। ओहि काल मे ओ बिसरि गेला जे रामविलास हुनकर मित्र छथिन। भाषाविज्ञानक विभिन्न प्रक्रम-- फोनोलाॅजी, माॅर्फोलाॅजी, सिन्टैक्स, सिमेन्टिक्स, प्रैगमैटिक्स आदिक अतिरिक्त सोशियोलिंग्विस्टिक्स आ साइकोलिंग्विटिक्स के विस्तृत अध्ययन सँ पहिने तँ मैथिली कें हिन्दी सँ बेसी समृद्ध भाषा घोषित केलखिन, तदुपरान्त तथ्य देलखिन जे मैथिली कें मरबाक कामना राखनिहार पीढ़ीक पीढ़ी मरि जायत, मैथिली आबाद रहत। ओ इहो तथ्य ओतय रखलनि जे हिन्दी कें साम्राज्यवादी रुख छोड़ि क' अप्पन विकास लेल चिन्तित हेबाक चाही। बचल बात मैथिलीक, तँ हिन्दी सँ ने ओकरा कोनो बैर छै, ने झगड़ा। बात बस एतबे छैक जे राजभाषाक अभिमानवश ओ अपन साम्राज्यवादी मानसिकता सँ बाहर नहि निकलि पाबि रहल अछि। ओकरा एहि सँ निकलि जेबाक चाही, तही मे एकर भलाइ छै। ओहि घटनाक बाद सँ आइ धरि कोनो हिन्दीदाँ कें मैथिली पर एतेक कड़ियल आक्रमण करबाक हिम्मत नहि भेलैक अछि, भने चोर-दरबाजा बाटें बिठुआ काटि लैत हो क्यो, से अलग बात।
1968 मे यात्री कें मैथिली कविता-संग्रह 'पत्रहीन नग्न गाछ'क लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल गेलनि। हिन्दी मे सेहो ओ ताधरि पूर्ण ख्यात भ' गेल रहथि। हुनका कैक स्वार्थी तत्व द्वारा समझाओल गेलनि जे हिन्दी मे नहि द' क' मैथिली मे हुनका पुरस्कार देनाइ हुनकर कद छोट करब थिक, मुदा कहियो एहि बात के ओ संज्ञान नहि लेलनि। उनटे एकर कड़ा प्रतिवाद केलखिन। 1971 मे जखन अकादेमी पुरस्कृत कविक रूप मे हुनका एक शिष्टमंडलक संग तीन सप्ताहक लेल सोवियत संघ (रूस) पठाओल गेलनि तँ ओ एक आर अद्भुत काज केलनि। सोवियत संघक विभिन्न संस्था सब मे भ्रमण करैत जखन-जखन विजिटर्स बुक हुनका सामने राखल गेलनि , यात्री अपन विचार मैथिली मे अभिलिखित केलनि। आ एतबे नहि, ओतय हिनका सभक सम्मान लेल जे काव्य-गोष्ठी विभिन्न ठाम आयोजित कयल गेल रहै, ओहि मे सब ठाम ओ अपन मूल मैथिली कविता सुनेलखिन, जकर रूसी अनुवाद दुभाषिया सुनेलक।
संक्षेप मे, एतबे कहब जे यात्री बीसम शताब्दीक मिथिलाक एक एहन दुर्लभ रत्न छला, जे जतबे मैथिल रहथि, ततबे भारतीय, आ ततबे वैश्विक। मुदा, प्रतिनिधि ओ निस्सन्देह मिथिलाक रहथि। हुनका हिन्दीक आंचलिक उपन्यास विधाक जन्मदाता कहल गेलनि। प्रेमचंदक उपन्यास-परंपराक जिनका मे पहिल विकास परिलक्षित कयल गेल छल, से नागार्जुन कें मानल गेलनि। आलोचक लोकनि एहि बात कें स्पष्टतापूर्वक लक्ष्य केलनि जे अस्सल भारतीय उपन्यास जकरा कहल जेतैक से नागार्जुने परंपराक आलोचनात्मक यथार्थवादी उपन्यास हैत, जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय आदिक मनोलोकवादीक उपन्यास नहि।
यात्री नागार्जुन विविध भाषा आ विविध विधा मे बहुतो प्रकारक रचना केलनि। ओहि समस्त रचना सब मे ओही एक यात्री कविक दृष्टि-निक्षेप भेलैक अछि, जे मिथिलाक छला, मैथिल छला। तें हुनकर तर्कसंगत समीक्षा जँ कयल जायत तँ निश्चित रूप सँ, केवल मैथिली मे लिखल वस्तु सँ नहि, अपितु समस्त भाषा मे लिखल गेल वस्तुक समेकित स्वरूपक आकलने एकैसम शताब्दीक हमर साहित्यक विकासक मार्ग प्रशस्त क' सकैत अछि। खंड-खंड मे हुनका बहुत देखलियनि। आउ, आब सबटा कें मिला क' परिपूर्ण यात्रीकी कें देखल जाय।


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