Thursday, April 16, 2026

हरिमोहन बाबूक स्मृतिकण

 .    डाॅ. भीमनाथ झा          

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       कठिन अछि हमरा लेल हुनक संस्मरणक दू-चारि टा बानगी देब। हुनक जीवनक अन्तिम एगारह वर्ष धरि हुनका हम देखलियनि– लगभग सभ दिन, दिनमे दुइयो बेर, तिनियो बेर– 1982 मे दरभंगा अयबासँ पूर्व धरि, पटनामे रहलापर।

       कहलहुँ– कठिन अछि। से, लगले गड़बड़ा गेलहुँ। “हुनका हम देखलियनि”-- कतेक भारी फूसि बजना गेल ! हुनका सन महान् लेखककेँ, पहुँचल दार्शनिककेँ, वाग्देवीक वरदपुत्रकेँ भला हमर कोन मोल अछि जे हम अभिमान करी ई कहबाक ज़े ‘हुनका देखलियनि।’ हम तँ ओहि विशाल वटवृक्षक छाहरिमे ओतबा दिन अपनाकेँ, अपन अस्तित्वकेँ देखैत रहलहुँ,नपैत रहलहुँ। देखैत रहलहुँ जे कोना-कोना हंस थाकल-ठेहिआयल मानसरोवरक ताकमे अबैत अछि आ जड़ि लग सुस्ताइत, सरस्वती-दुग्धक पान करैत उड़ि जाइत अछि ! कोना-कोना हाथी आ सांढ़, भेड़ा आ बकरा, गाय आ महीस, कोकिल आ सूगा, खढ़िया आ चुहचुहिया चारू दिससँ टघरल पहुँचैत अछि आ हलसल बहराइत अछि ! वटवृक्ष ओहिना चतरल-पसरल, ओहिना भरल-फड़ल, ओहिना डोलैत-झूमैत, हँसैत-खिलखिलाइत रहैछ। ऋतुक कोनो टा प्रभाव नहि– सभ दिन सदाबहार, एभर ग्रीन।

       फेर गड़बड़ ! एभर ग्रीन ओ अवश्य रहल होयत कहियो‌। ओकर हाड़-काट, ओकर ठाठ-बाट से कहैत छैक। ठोरक मुस्की अपन स्वर्णिम अतीतक अति मीठ कथा अनायासे सुना जाइत छैक। मुदा ओहि वटवृक्षक छाहरिमे हम जहिया गेलहुँ, तकर बादसँ जहिया धरि ओ ठाढ़ रहल– झंझावात बहैत रहलैक बेसी काल– कालक। ओकर जड़िकेँ झिकझोड़ि देलकैक, हिला देलकैक। जीवनी शक्तिक सीर खटाखट टूट’ लगलैक। माटि छोड़’ लगलैक। देखैत-देखैत ओ गाछ की-सँ-की भऽ गेल !

       की-सँ-की तँ भऽ गेल– मुदा से अपना लेल। अपन छाहरिमे आब’वला प्राणीकेँ ओहू स्थितिमे की-की ने देलक ओ ! जे केओ जे चाहलक, लेलक। जे जाहि कामना लऽकऽ पहुँचल, पूर भेलैक। जे निष्काम गेल, ओहो कृतार्थ भेल।

       अपना दऽ की कहू, हम तँ एगारह वर्ष, जे  केओ एगारह मिनट हरिमोहन बाबूक सान्निध्य लाभक सौभाग्य पौने होयता, कृतार्थ-कृतार्थ भेल होयता।

       हुनक हर्षक एक अवसरपर संग छलियनि– हुनक चारिम आ सभसँ छोट पुत्र भुवनजी (डा. मनमोहन झा---आब ओहो स्मृतिशेष)क विवाहक बरियातीमे सहरसा। मुदा, कष्टक पाँच-पाँच टा त्रासद क्षणक मर्मान्तक पीड़ाकेँ हुनका भोगैत काल लग रहियनि– एकमात्र बाल पौत्रकेँ मुखाग्नि देबा काल, मृत्युक मुँहमे जाकऽ बहरयबा काल, हुनक अहर्निश सेविका पत्नीक प्राण-वियोग काल, पहिल बेर पटनामे आंखिक आपरेशनक बाद मानसिक ओझरौटक स्थितिमे, दोसर बेर दरभंगामे आंखिक आपरेशनक बाद महायात्रा धरिक वेदना-घड़ीमे।


       — भीमजी, अहाँ हमर सुख-दु:ख दुनूमे संग रहैत छी। एकटा उपकार क’ दिय’। ई ‘जीवन-यात्रा’ कहुना पार लागि जाय, से उतार’ लेल एकटा नीक अक्षर लिखनिहारकेँ ताकि दिय’। हम उचित पारिश्रमिक देबै।

       – जी, तकबै। ता देल जाओ, थोड़े हमहीं उतारि दै छी।

       – नहि भीमजी, अहाँसँ नहि उतरबायब। अहाँ बड़ व्यस्त लोक छी। कोनो बेरोजगार लोककेँ ताकि दिय’।

       –जी, से जहिया भेटत तहिया। ता, थोड़ेक तँ हमहूँ कऽ सकै छी।

       – नहि -नहि, अहाँसँ ई काज नहि लेब।

       कमसँ कम एक दर्जन व्यक्ति हुनक ‘जीवन-यात्रा’क पाण्डुलिपिकेँ उतारने होयताह, विज्ञातसँ अज्ञात धरि। मुदा, हमरा एकोटा शब्द नहि उतार’ देलनि।

       हम कोना बुझबितियनि जे ओहिसँ बेसी जरूरी हमरा कोन व्यस्तता भऽ सकैत छल ? तर्कसँ हुनका के मना सकैत छल ?


       कहियो कालकऽ ‘मिथिला मिहिर’ हमरासँ सुनथि। से, परिचित-अपरिचितक ककरो कथा, ककरो कविता। सभसँ पराभवमे पड़ी नवकविता सुनयबा काल। कविता सुनि लैत छलाह, तखन पुछैत छलाह– एहि कविताक की अर्थ ?

       – कविकेँ कहबाक आशय छनि जे…

       – हम पुछैत छी जे कविता की कहैत अछि ?

       – जी, कविताक तात्पर्य छैक…

       – से कोना बुझैत छिऐक जे यैह तात्पर्य छैक ? एहि पांतीक माने की भेलैक ?

       – जी, नवकवितामे कोनो एक पांतीसँ अर्थ स्पष्ट नहि होइत छैक।

       – तँ दू पांतीसँ अर्थ स्पष्ट करू।

       – जी, दुइयो पांती…

       – तँ सभ पांती पढ़िकऽ अर्थ बुझा दिय’।

       –  ‘.....’

       – औ भीमजी, जँ अर्थ नहि बुझैत छिऐ तँ किए छपैत छिऐ ?

       – प्रतिष्ठित कवि छथि।

       – एहिसँ तँ हुनक प्रतिष्ठापर आघात लगैत छनि। नहि छापिए कऽ हुनक प्रतिष्ठाक रक्षा करबनि अहाँ।

       – रुष्ट भऽ जेता।

       – आ छपला उत्तर पाठक जँ रुष्ट भऽ जाय ?

       – ‘.....’

       – देखू भीमजी, अहाँ सम्पादक छी। जाहि वस्तुकेँ छापी, अर्थ बुझिकऽ छापी। पाठककेँ तँ उत्तर अहींकेँ देब’ पडत। हम ककरासँ पुछबैक ? कवि भेटितथि तँ हुनकेसँ पुछितियनि। ओ नहि छथि तँ अहाँसँ पूछब।

       – जी, आब बिना बुझने नहि छपबै।

       फेर, अगिलो सप्ताह कोनो-ने-कोनो एहन भेटिए जाइन आ फेर हम फेरमे पड़िए जाइ।


       किन्तु, ई सभ मनोरंजनार्थ करैत छलाह। नवका लेखकक प्रति जतेक स्नेह आ जेहन आह्लाद हुनकामे छलनि, नवीन पीढ़ीक प्रति प्रोत्साहनक भाव जतेक ओ रखैत छलाह, से कोनो पीढ़ीक वरिष्ठ लेखकमे दुर्लभ अछि।

       तिलकेँ ताड़ ओ बनबैत छलाह, मुदा खजूरकेँ बबूर बनबैत नहि देखलियनि। जनिकामे जे रहैत छलनि ताहिसँ बेसिए ओ कहैत छलथिन, बहुत बेसी। मुदा, ककरो कनियो कम कऽ कहैत नहि सुनलियनि। तनिक परोक्षोमे नहि।

       हुनक साहित्यिक उचाइक सम्बन्धमे की कहल जाय ? लोक अबैत रहत, जाइत रहत, हरिमोहन बाबूक साहित्य ओहिना चमकैत रहत। हुनक व्यक्तित्वक इन्द्रधनुषी कथा पसरैत रहत, बहुत-बहुत दिन धरि लोककेँ हँसबैत रहत‌।

       एखन बहुत दिन धरि बहुत गोटे रहताह जे हरिमोहन बाबूकेँ देखने होयताह, हुनकासँ गप्प कयने होयताह, हुनक लिखल चिट्ठी रखने होयताह।

       मुदा, एखनहुँ बहुत लोक नहि होयताह जनिका लग ‘कन्यादान’ होइन आ ‘कन्यादान’क लेखकक नीचाँ हरिमोहन बाबू स्वयं हस्ताक्षर कयने होथि। (ओकर फोटोकापी 23 फरवरीक अपन पोस्टमे देने छिऐ।)

       ‘कन्यादान’क लेखक– बापरे! कत्ते भारी लोक ! जेना सम्पूर्ण अतीत वर्तमान बनि गेल हो ! जेना वर्तमान अतीतमे हेड़ा गेल हो !

       हे भगवन्! हम सय वर्ष आर जीवी, से खाली एहि लेल जे ताहि दिनक लोककेँ जोर-जोरसँ कहिऐक– देख हमरा, ई मुँह प्रोफेसर हरिमोहन झासँ गप्प कयने अछि, ई हाथ हुनक चरण छूने अछि।

       आ, ताहि दिनक लोक हमर ठोरकेँ छुबिकऽ, हमर हाथकेँ दाबिकऽ तेहने सुख प्राप्त करत जेना ओ हरिमोहने बाबूसँ गप्प कऽ रहल हो, जेना ओ हुनके चरण छूबि रहल होइनि ! 

                        – भीमनाथ झा

                        (फरवरी, 1986)