Wednesday, June 10, 2026

यात्री नागार्जुनक हिन्दी कविता


        हिन्दी मे नागार्जुनक जे नाम-यश छनि, ताहि मे पचहत्तर प्रतिशत हुनकर कविता, तथा पच्चीस प्रतिशत हुनकर उपन्यास आ अन्यान्य लेखन पर आधारित छनि। हिन्दीक प्रगतिशील काव्यधाराक वृहत्त्रयी मे हुनकर नाम अबैत छनि। अन्य दू कवि छथिन-- केदारनाथ अग्रवाल आ शमशेर बहादुर सिंह। जनवादी काव्यधाराक जँ अलग सँ बात कयल जाय तँ ओकर सर्वोच्च शिखर नागार्जुन कें मानल जाइत छनि। हिन्दीक, आगूक जे प्रगतिशील काव्यधारा चललैक तकर तँ मानू प्रमुख आदर्श नागार्जुन कें मानल जाइत छनि। यशस्वी कवि अरुण कमलक एक कथन एतय हमरा मोन पड़ैत अछि जतय ओ कहने छथि जे कविता मे अपन ज्येष्ठ कवि सब कें जखन ओ पढ़य लगला, आ जखन हुनकर भेंट नागार्जुनक कविता सँ भेलनि, तँ लक्ष्य साफ भ' गेलनि जे हुनका कोन दिशा मे जेबाक छनि, सब सँ बेसी आश्चर्य हुनका ई देखि क' लागल रहनि जे अपना चारूकात जे समाज ओ देखि रहल छला, तकर वस्तुस्थिति, स्वप्न आ सेहन्ताक ठीक-ठीक अनुगूंज हुनका नागार्जुनक कविता मे भेटल रहनि। आलोकधन्वा एही बात कें एहि तरहें कहै छथि जे नागार्जुनक आंगुर पकड़ि क' हमर पीढ़ी कविताक दिशा मे आगू बढ़ल छल।

            दोसर दिस, हिन्दी कविता मे जे हुनकर अवदान छनि तकरा अशोक वाजपेयी, जिनका संग नागार्जुनक मुखर विरोध जगजाहिर अछि, मानैत छथि जे बीसम शताब्दीक जँ दस टा सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कविताक नाम गनल जाय तँ ओहि मे एक नागार्जुनक कविता 'अकाल और उसके बाद' राखल जाएत। ओ तँ एतय धरि गछैत छथि जे जँ ई सूची पाँच धरि सीमित करय पड़य तँ ओहू मे एहि कविता कें छोड़ब कठिन भ' जाएत। तेसर, हमसब देखैत छी जे प्रेमचंदक बाद जाहि रचनाकारक अवदान पर सब सँ बेसी शोध-आलोचनात्मक पुस्तक छपल अछि, ओ नागार्जुन छथि। हुनका पर एखन धरि दू सय सँ बेसी पुस्तक छपाओल गेल अछि, जाहि मे सँ डेढ़ सय हुनकर कविता पर केन्द्रित छनि। नागार्जुन कें अपना युगक कबीर कहल गेलनि। कबीरे सनक दू टूकपन, तिक्ख व्यंग्य, अथाह मानवपन, आ चूड़ान्त क्रान्तदर्शिता नागार्जुन मे पाओल गेलनि। हुनकर काव्यकलाक जँ बात हो तँ प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंहक ई कथन हमरा मोन पड़ैत अछि जे जते तरहक काव्यगत प्रयोग एसगर कवि नागार्जुन कयने छथि, हिन्दीक समस्त प्रयोगवादी कवि सभक कयल प्रयोग कें एकट्ठा शामिल क' लेल जाय, तैयो नागार्जुनक पलड़ा भारी रहतनि।

            पहिनहु एहि बातक चर्चा भ' चुकल अछि जे विद्यार्थी, वैदेह आ यात्रीक उपनाम सँ ओ अपन आरंभिक कविता सब मैथिली मे लिखलनि। लगभग 1941 धरि हुनकर काव्यरचनाक भाषा मैथिली आ गद्यलेखनक भाषा हिन्दी रहलनि। हुनकर पहिल कविता 1929 मे मैथिली मे छपल, जखन ओ अठारह बर्खक एक तरुण रहथि। अभ्यास-कालक हुनकर कविता सब, जाहि मे कि कथ्य आ शिल्प, दुनू मे बेस कांचपन देखाइत छैक, मैथिली मे लिखल भेटैत अछि। जहिया कहियो यात्री सँ पूछल गेलनि जे अहाँक पहिल प्रकाशित हिन्दी कविता कोन अछि, तँ ओ अपन एक प्राचीन कविता 'राम के प्रति' के जिक्र कयल करथि। एहि कविता कें 1934 मे प्रकाशित भेल मानल जाइत अछि। मुदा, आइ धरि ओ कविता किनको कतहु नहि भेटलनि अछि। एकरा बदला मे हुनकर हिन्दी मे प्रकाशित पहिल रचना एक गद्यलेख 'मृत्युंजय कवि तुलसीदास' उपलब्ध होइत अछि, जे 'दीपक' पत्रिकाक जनवरी 1934क अंक मे प्रकाशित भेल छल। ज्ञात हो जे 'दीपक' अबोहर सँ स्वामी केशवानंदक संपादन-व्यवस्थापन मे बहराइत छल। 'युगों का यात्री' मे एकर उल्लेख विस्तारपूर्वक भेल अछि जे कोना एही लेखक बदौलत स्वामी केशवानंदक संग हुनकर एहन निकटता बढ़ल जे 1934 सँ 1936 धरि ओ अबोहर मे रहि क' 'दीपक' के संपादन केलनि।

               हिन्दी मे जे हुनकर पहिल प्रकाशित कविता भेटैत अछि, से थिक-- 'निर्वासित'। ई कविता ठीक-ठीक ओही मनोदशाक थिक, जकरा वशीभूत ओ मैथिली कविता 'अंतिम प्रणाम' लिखने रहथि। एहन प्रतीत होइत अछि जे अबोहर सँ लंका-यात्रा पर बहाएल ओ काशी पहुँचल रहथि, तखनहि दुनू कविताक रचना प्राय: एक्के समय मे कयने रहथि। 'निर्वासित' विशाल भारत कें पठाओल गेल, जे एहि पत्रिकाक जून 1936क अंक मे प्रकाशित भेल, आ 'अंतिम प्रणाम' मिथिलामोद कें पठौलनि, जकर प्रकाशन माघ 1937क उद्गार 4 मे भेल। ज्ञात हो जे प्राय: 1941 धरि हिन्दी आ मैथिली दुनू भाषा मे हुनकर प्रकाशित रचना सब यात्रीक नाम सँ प्रकाशित भेल। एहि कालखंडक जे किछु सुप्रसिद्ध हिन्दी कविता सब अछि, ओहि मे 'कालिदास', 'उनको प्रणाम', 'बादल को घिरते देखा है', 'रजनीगंधा' आ 'रवि ठाकुर' थिक। काशी सँ रामेश्वरम यात्राक बीच मे कतहु 'कालिदास' लिखल गेल। संभवत: नागपुर शहरक लगीच रामटेक पर्वत पर विहारक क्रम मे, जकरा सम्बन्ध मे प्रचलित अछि जे राम अपन वनवास-कालक किछु समय एही ठाम व्यतीत कयने रहथि, आ दोसर, मेघदूतक शापित यक्ष एही पर्वत पर बनल आश्रम सब मे अपन वियोग-अवधि पूरा कयने रहय। एहि पर्वत पर प्राचीन राममंदिर सेहो अछि आ कालिदास-स्मारक सेहो। स्वयं कवि एहि कविता मे पर्वतक नाम 'चित्रकूट' देने छथि, तें इहो संभव जे मध्यप्रदेशक सतना जिला मे अवस्थित चित्रकूट ई स्थान रहल हो। जेना-तेना जखन ओ लंका पहुँचि गेला, मुदा सनातनी साधू सभक फेर मे पड़ि बाबा कल्याणपुरीक मठ मे बन्हकी लागल रहला। यात्रीक उद्देश्य विद्यालंकार परिवेण पहुँचि क' बौद्ध शास्त्र सभक अध्ययन करब छलनि, मुदा कल्याणपुरी मठ जे कि तमिल हिन्दू लोकनिक एक विख्यात धर्मस्थल छल, बला साधू सब जम्बूद्वीपक एक ब्राह्मण युवक विधर्मी सभक कुटी मे जा क' अपकारी विद्या अर्थात बौद्धशास्त्र पढ़थि, से नहि चाहैत रहथि। कथावाचक पुजेगरीक बाना मे रहैत लाचार यात्री ओहि ठामक विपरीत आबोहवाक कारण एक बेर तते बीमार पड़ि गेला जे जीवित बचबाक संभावना नहि रहलनि। स्वयं अपनहु ओ जीवन सँ असोथकित भ' गेल रहथि। एहि मनोदशा मे लिखल कविता थिक-- उनको प्रणाम। कविताक पहिल पांती छैक-- 'जो नहीं हो सके पूर्णकाम/ मैं करता हूँ उनको प्रणाम।' ठीक-ठीक एही समय आ मनोदशाक हुनकर मैथिली कविता छनि-- 'जन्मभूमि।' दूनू कविता डाक सँ पठाओल तँ गेल होयत संगहि, मुदा मैथिली कविता 'विभूति'क दिसंबर 1937 अंक मे छपि गेल जखन कि हिन्दी कविता 'विशाल भारत'क मइ 1939 अंक मे आबि क' छपल।

           विद्यालंकार परिवेण सँ नागार्जुन कें छुट्टी भेटल रहनि राहुल सांकृत्यायनक संग तिब्बत-यात्राक लेल। ओ राहुल जीक टीम संग विदा सेहो भेल रहथि, मुदा उपत्यका पर चढ़लाक किछुए दिनक बाद हुनका ज्वर आबय लागल रहनि। बाद मे ओ तते बीमार पड़ि गेला जे हुनका यात्रा स्थगित क' पाछू घुरय पड़लनि। एहि घुरती काल मे कतहु उपत्यकाक मेघाच्छन्न पर्वत कें देखि 'बादल को घिरते देखा है' कविता ओ यात्रीक नामें लिखने रहथि। ई 1938क बात थिक। ई कविता जखन 'सरस्वती'क अक्टूबर 1940क अंक मे छपल, तँ ओहि संग संपादकीय टिप्पणी छल-- 'यात्री महोदय भूटान के निवासी हैं और इनका राष्ट्रभाषा प्रेम सराहनीय है।' तिब्बतक असफल यात्रा सँ घूरि क' नागार्जुन स्वामी सहजानंद सरस्वतीक सीताराम आश्रम, बिहटा पहुँचला। समर स्कूल आफ पाॅलिटिक्सक मासव्यापी प्रशिक्षणक बाद ओ चंपारण जा क' किसान सभाक क्रान्तिकारी राजनीति मे सक्रिय भ' गेला। 1938क अक्टूबर मे राहुल जी तिब्बत सँ घुरला तँ ओहो किसान सभाक क्रियात्मक राजनीति मे सक्रिय भेला। छपराक अमवारी मे किसान सभाक नेतृत्व करैत नागार्जुन गिरफ्तार भेला। क्रमश: सीवान आ छपरा जेल सँ होइत हुनका हजारीबाग सेन्ट्रल जेल पठाओल गेलनि। 'रजनीगंधा' एही जेल मे 1939 मे लिखल गेल छल। 'रवि ठाकुर' कविता विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुरक निधन पर 1941 मे लिखल गेल छल। एही संग नागार्जुन निश्चित क' लेला जे अपन मैथिली कविता तँ ओ यात्रीक नाम सँ पूर्ववत लिखैत रहता मुदा अपन हिन्दी कविता, वा आनो वस्तु ओ नागार्जुनक नाम सँ लिखता। 'रवि ठाकुर' एक अत्यन्त मूल्यवान कविता थिक जकर महत्व हिन्दी मे लगभग ओतबे सिद्ध अछि जतबा ओही साल लिखल मैथिली कविता 'कविक स्वप्न'क महत्व मैथिली मे अछि। तखन, हमर सोच इहो अछि जे एहि मैथिली कविताक महत्व अपेक्षाकृत पहिने स्वीकारल गेल, ओम्हर हिन्दी मे 'रवि ठाकुर'क महत्व कें स्वीकार्य बनै मे समय लागल।

                 कहबे केलहुँ जे नागार्जुनक पहिल उपलब्ध हिन्दी कविता 1936 मे प्रकाशित भेल आ हुनकर अंतिम हिन्दी कविता 1997क लिखल भेटैत अछि। एहि तरहें देखल जाय तँ ओ लगातार छव दशक सँ बेसी समय धरि हिन्दी काव्य-लेखनक क्षेत्र मे सक्रिय रहला। ई सक्रियता निरंतरतापूर्ण रहल। हिन्दी मे ओ उपन्यास, निबंध, कथा, बालसाहित्य, डायरी-लेखन, अनुवाद आदि विधा मे सेहो पर्याप्त काज केलनि। मुदा, ई सब काज एक निश्चित समय-सीमा धरि जारी रहल। अलग-अलग कारण सँ एकरा ओ जीवनावधि निरंतर नहि राखि सकला। ई कविते छल जे निरंतर बनल रहल। हुनकर हिन्दी कविता नागार्जुन रचनावलीक खंड एक आ दू मे कुल 1059 पृष्ठ मे प्रकाशित अछि, जखन कि हुनकर सैकड़ो कविता एहन होयत जे लुप्त भ' गेल, आ पचासो कविता एहन जे कोनो वर्ष कतहु छपल, मुदा रचनावली-संपादक ओकरा ताकि नहि सकला। हुनका बारे में हिन्दीक दुनिया मे ई कहावत मशहूर छल जे 'बाबा कविताएँ बोते और खोते चलते हैं।' एहन अक्सरहां होइत छल जे ककरो आग्रह पर ओ कविता लिखलनि आ मूल प्रति ओही व्यक्ति कें द' देलनि। ओ जँ छपल तँ छपल, नहि छपल तँ से हुनकर स्मृतियो मे नहि रहलनि। हुनकर बहुतो कविता विद्यार्थी जीवन मे लिखल गेलनि। जखन ओ किसान सभाक क्रान्तिकारी राजनीति मे सक्रिय रहथि, ताहू समय मे ढेर कविता लिखलनि। ओ सब आब कतहु नहि भेटैत अछि, मानू ओ जनताक लेल लिखल गेल छल आ जनते कें समर्पित क' देल गेल। हुनकर पहिल कविता-संग्रह 'युगधारा'  1953 मे आबि क' छपलनि। संग्रहक प्रकाशकीय मे ओ लिखलनि-- 'इस प्रकार के चार संकलन और तैयार हो सकते हैं। उन्हें सँभालना नागार्जुन के लिए एक समस्या है... कुछ खो गयी हैं, कुछ खो जाने की स्थिति में हैं, कुछ मित्रों के पास बिखरी पड़ी हैं और बाकी इस यात्री कवि के थैले में दरभंगा-पटना-इलाहाबाद-दिल्ली, दिल्ली-इलाहाबाद-पटना-दरभंगा सफर करती फिरती हैं।' कहब आवश्यक नहि जे ई स्थिति हुनका संग जीवन भरि बनल रहलनि।

                 डाॅ. विजय बहादुर सिंह ठीक लिखने छथि जे नागार्जुनक कविता ओहि तीन चौथाइ हिन्दुस्तान सँ सम्बन्धित अछि जे राष्ट्रीय उत्पादन आ विकासक रीढ़ थिक। निश्चित रूप सँ वैह हुनकर जीवनक लक्ष्य रहलनि आ ओही समाजक दुख-सुख, राग-विराग, संघर्ष आ आन्दोलन, स्वप्न आ सेहन्ता सँ जुड़ल छल। यैह ओ जनता छल जकर जनकवि ओ अपना कें मानै छला आ ओकरे संग अपना कें प्रतिबद्ध, सम्बद्ध आ आबद्ध मानैत रहथि। हुनकर काव्य-विषयक विस्तार तते पैघ अछि जे हिन्दीक तमाम पैघ कवि सँ बेसी रकबा राखनिहार किसान-कवि हुनका मानल जाइत अछि। कोन विषय, कोन मुद्दा, कोन घटना पर हुनकर कविता नहि छनि, तकरा ताकि सकब लगभग असंभव अछि। डाॅ. नन्दकिशोर नवल हुनका बारे मे ठीक लिखलनि अछि जे 'नागार्जुन की कविता से गुजरना बीसवीं शती के प्राय: अंतिम साठ वर्षों के इतिहास से गुजरना है। यह इतिहास विशेष रूप से राष्ट्रीय है, सामान्य रूप से अन्तर्राष्ट्रीय। दूसरे, इस इतिहास में समाज और राजनीति ही नहीं, प्रकृति भी शामिल है।' अकारण नहि थिक जे 1994 मे जखन हुनका पूछल गेलनि जे की अहाँ आगू अपन आत्मकथा लिखबाक योजना रखैत छी, तँ निधोख भ' क' ओ जवाब देने रहथिन जे 'नहि, एहन कोनो योजना नहि अछि। हमर सबटा कविता कें मिला दियौ, हमर आत्मकथा भ' जाएत।' तात्पर्य जे तीन चौथाइ हिन्दुस्तानक एक साधारण प्राणी तहिना ओ अपनो कें मानैत रहथि, जेना हुनकर कविताक पात्र सब, कविता-वाचक सब। विश्वसाहित्य मे हमरा सब कें बिरले क्यो एहन कवि भेटता जिनका अपन कविता पर एतेक भरोस होइन जे ओही सब कें मिला देने अपन आत्मकथा भ' जेबाक विश्वास हो।

             यात्रीक आरंभिक मैथिली कविता सब मे जे नवसिखुआपन आ अभ्यास-कालीनता हमसब देखै छी, हुनकर आरंभिक हिन्दी कविता सब ताहि सँ सर्वथा भिन्न अछि। ई नवसिखुआपन 'अंतिम प्रणाम' सँ पहिनेक लिखल प्राय: सब कविता मे पाओल जा सकै छै, किन्तु हिन्दी कविता कें बाद मे, प्राय: समुचित परिपक्वता आबि गेलाक बाद ओ अपन अभिव्यक्तिक माध्यम बनेलनि, तकर परिणाम देखैत छी जे 'निर्वासित' सन कविता सँ ओ प्रारम्भ करै छथि जे कि 'अंतिम प्रणाम'क समतुल्य अछि। ठीक एही कालक लिखल छव पांतिक हुनकर एक कविता छनि-- 'बेकार'। कविता एना छै-- 'मानव होकर मानव के ही चरणों में मैं रोया/ दिन बागों में बिता रात को पटरी पर मैं सोया/ राजकीय ये उच्च डिग्रियां, ऐसा सुंदर मुखड़ा/ तो भी नहीं किसी ने सुनना चाहा मेरा दुखड़ा/ कभी घुमक्कड़ यार-दोस्त से मिलकर कभी अकेले/ एक-एक दाने की खातिर सौ-सौ पापड़ बेले।' सोझ-सोझ देखी तँ निजी आर्थिक दैन्यक मर्मवेधी कविता एकरा कहि सकै छियै। मुदा, दूटा बात विशेष ध्यान देबाक थिक। पहिल तँ ई जे जे नागार्जुन सदा-सर्वदा वस्तुनिष्ठ आ समाजनिष्ठ कविताक लेल जानल गेला, से एहन जकर जोड़ भेटब कठिन, आ से कवि अपन कविता-लेखनक आरंभ व्यक्तिनिष्ठ कवि रूप मे केलनि! जी हँ, सत बात यैह छैक। आ एतबे नहि, समस्त वस्तुनिष्ठताक अछैत ताजिनगी ओ एहन कविता सब लिखैत रहला जाहि मे फुटका क' अपन निजी सुख-दुख कें अभिव्यक्त केलनि, विकुंठ भाव सँ, बिनु कोनो परदा कयने। मोन पाड़ल जाय, नागार्जुनक जे परम प्रसिद्ध कविता छनि 'सिन्दूर तिलकित भाल' आ 'यह दंतुरित मुस्कान' सेहो एकर थोड़बे दिनका बादक लिखल थिक। हम एतय इहो मोन पाड़य चाहब जे अपन रचनाशीलताक गुण-धर्म बखान करैत जखन बहुत आगां चलि क' ओ 'प्रतिबद्ध हूँ' कविता लिखने छला, तँ ओहि मे आन अनेको प्रतिबद्धता देखेबाक संग-संग एहू प्रश्न कें बराबरी मे शामिल रखलनि-- 'अपने आप को भी व्यामोह से बारम्बार उबारने की खातिर/ प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ।' हिन्दी मे जखन हुनका दोसर कबीर कहल जाइत छनि तँ तकर एक कारण इहो बताओल जाइछ जे अपना आप पर तिक्ख व्यंग्य करबा सँ सेहो ओ नहि कतहु चुकैत छथि। नागार्जुनक एहि काव्यप्रवृत्ति सँ एक इहो तथ्य प्रतिपादित होइत अछि जे गहन व्यक्तिनिष्ठतेक उदर सँ अक्सरहाँ वस्तुनिष्ठताक जन्म होइत छैक। अथवा, एही बात कें अहुना कहल जा सकैत अछि जे गंभीर निर्वैयक्तिक हेबाक लेल नितान्त वैयक्तिक होयब कदाचित एक आरंभिक शर्त होइत अछि।  खैर, ओहि 'बेकार' कविता मे दोसर जे देखबाक वस्तु अछि से थिक छंद पर नागार्जुनक निस्सन पकड़, शब्द-प्रयोगक संतुलित विवेक, जखन कि ओहि समय मे नागार्जुन मात्र बाइस-तैस बरखक जुबक छला।

             'कालिदास' आ 'उनको प्रणाम'-- नागार्जुनक ई दुनू कविता हद सँ बढ़ि क' लोकप्रिय भेल। हजारो ठाम अइ दुनू कविता कें उद्धृत कयल गेल होयत। जखन नागार्जुन अस्सी बरखक बूढ़ भ' गेल छला, तखनो गोष्ठी सब मे हुनका सँ अनुरोध कयल जाइन जे 'कालिदास' सुनाउ, 'उनको प्रणाम' सुनाउ। एखनो यूट्यूब पर हुनकर वीडियो भेटि जायत, जतय ओ ई कविता सब सुनबैत देखाइत छथि। हिन्दीक दुनिया मे ई दुनू कविता एतेक प्रशस्त भेल जे एहि बात पर भरोस केनाइ कठिन लगैत छैक जे ई दुनू हुनकर आरंभिक कविता छियनि, जखन ओ केवल पच्चीस-तीसक उमेर मे छला। एहि दुनू कविताक कथ्य तते आधुनिक, तते क्रान्तदर्शी अछि जे से एहि भरोस कें आरो कठिन बनबैत छैक। 'कालिदास' एहि विषय पर लिखल गेल अछि जे रचना आ रचनाकार दुनू कें समरूप बुझबाक चाही। अज, रति आ यक्ष कालिदासक काव्य के पात्र सब छथि। एहि ठाम वर्ण्य विषय अछि दुख। दुख मे कयल गेल रोदन, विलाप। क्यो कवि जखन अपन पात्रक दुख कें वर्णित करैत अछि तँ जखन ओ दुख एहि तल धरि पहुँचि जाय जे ओ स्वयं कविक अप्पन भोगल दुख हो। कवि अन्तत: मानव आत्माक गुप्तचर होइत अछि। कविता मे आएल अछि-- 'पर-पीड़ा से पूर-पूर हो/ थक-थक कर औ चूर-चूर हो/ अमल-धवल गिरि के शिखरों पर/ प्रियवर, तुम कब तक सोये थे/ रोया यक्ष कि तुम रोये थे/ कालिदास, सच-सच बतलाना!' ई जे पर-पीड़ा सँ पूर-पूर होयब थिक, से मानू कविक नियति थिक-- एक नवतुरिया कविक ई स्थापना सत्ते कते विरल बुझाइत अछि। थोड़बे दिन बाद जखन नागार्जुन 'बादल को घिरते देखा है' कविता लिखलनि, हुनकर एक अद्भुत कविता थिक इहो, जतय ओ कल्पना आ यथार्थक अनमोल रसायन हिमालय-वर्णन मे केलनि अछि। ओहू ठाम कालिदास कें स्मरण कयल गेल छनि। दुर्गम बर्फानी घाटी मे शत-सहस्र फीट उंचाइ पर ओ पहुँचल छथि। कालिदासक वर्णन अनुसार धनपति कुबेरक अलकापुरी कें एतहि कतहु हेबाक चाही, से हुनका कतहु नहि देखाइत छनि। आकाशगंगाक पृथ्वी पर उतरबाक स्थान सेहो कतहु एही ठाम हेबाक चाही, सेहो कतहु नहि देखना जाइत छनि। मेघदूतक महामेघ तँ मानि लेल जे एतहि कतहु बरसि गेल होयत , मुदा की पता जे ई समस्त विवरण केवल कवि-कल्पित हो। तखन? पांती आएल छैक-- 'जाने दो, वह कवि-कल्पित था/ मैंने तो भीषण जाड़ों में/ नभचुंबी कैलाश-शीर्ष पर/ महामेघ को झंझानिल से/ गरज-गरज भिड़ते देखा है/ बादल को घिरते देखा है।' एतय जे 'देखब' छै, से कते विशेष छै, देखल जाय। संभव थिक जे विज्ञान-बुद्धि आ पर्यावरण-क्षति मिलि क' आगू आजुक बहुतो विद्यमान सत्य कें 'कवि-कल्पित' मानि लेबा पर बाध्य हुअय पड़य, मुदा, एहि तरहक 'देखब' तँ सब दिन काज आएत। मानू तँ ई कविता अपन पाठक कें अपना चौबगली विद्यमान यथार्थ कें देखबाक लूरि सिखबैत छैक।

            'उनको प्रणाम' के वितान आरो विस्तृत छैक। एकर केन्द्रीय विषय थिक जे जे व्यक्ति संघर्ष करैत रहलाक बादो हारि जाइत अछि, ओकर हारब नहि, ओकर संघर्ष सैह मूल्यवान होइत छैक। जखन कि दुनियाक रेबाज एकर ठीक उनटा अछि। एतय इतिहास केवल विजेता कें मोन रखैत छैक, समुच्चा पान-फूल विजेते कें चढ़ाओल जाइत छैक, समस्त जयजयकार विजेतेक होइछ। मुदा, एहि कविताक पहिले पांती थिक-- 'जो नहीं हो सके पूर्णकाम/ मैं उनको करता हूँ प्रणाम।' एहि घोषणा पर ध्यान देल जाय-- जे संघर्ष केलाह, मूल्य तिनकर छनि, ने कि अइ बात के कि ओ हारला कि जितला। जे कृत-कृत्य हेबाक बदला फांसी पर झूलि जाएब कें श्रेयस्कर बुझलनि। तकर एवज मे हुनका भेटलनि की? 'कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी/ यह दुनिया जिनको गयी भूल!/ -- उनको प्रणाम।' 37-38 के लिखल कविता थिक। स्वातंत्र्य समर उफान पर चलि रहल छल। आजादी एखन दूर छल। मुदा हजारो एहन युवा रहथि जे चाहितथि तँ कृत-कृत्य भ' सकै छला, मुदा ओ फांसी पर झूलि जाएब पसंद केलनि। 1857क शहीद सब सँ ल' क' रामफल मंडल आदि तमाम आजादीक दीवाना सभक चित्र एतय मूर्तिमान भ' उठैत अछि। दुनिया भने बिसरि जाइन, मुदा कवि कोना बिसरता? हुनकर प्रणाम तँ हुनके सभक लेल हेतनि। दुनिया आ कविक बीच मे फरक की होइत छैक, अइ ठाम बात तकरो उठाएल गेल छैक। एकटा पांती एलैए-- 'थी उग्र साधना, पर जिनका/ जीवन-नाटक दु:खान्त हुआ/ था जन्म-काल में सिंह लग्न/ पर कुसमय ही देहान्त हुआ/ --उनको प्रणाम।' हमरा सब मे सँ हरेक आदमी अपन आस-पास नियतिक ई खेल चलैत देखैत छी। निष्पक्ष भ' सोचब तँ सब तरहें लागत जे नहि, हिनका सन लोक कें तँ जरूर सफल हेबाक चाही छल, मुदा से नहि होइत अछि। तें कि ओ संघर्ष सेहो मिथ्या भ' जाएत जे कि ओइ आदमी द्वारा कयना गेल? एक-डेढ़ दशक बाद यैह यात्री कवि अपन मैथिली कविता 'परम सत्य' मे लिखने छला-- 'सत्य थिक संघर्षरत जनताक ई इतिहास/ सत्य धरती, सत्य थिक आकाश/ परम सत्य मनुक्ख अपनहि थीक।' हमसब साफ देखि सकै छी जे लगभग एही तरहक निष्कर्ष पर कवि एहू कविता मे पहुँचल देखना जाइत छथि। ताहि पर सँ की छै जे नागार्जुन संस्कृतक लोक रहथि, धर्मादि नाना वितंडाक ज्ञान अथ उत सँ च तु धरि हुनका रहनि। जखन कखनो हुनका अवसर भेटैत छलनि, एहि वितंडा कें एक ढाही मारने विना छोड़ि नहि सकैत छथि। एहू ठाम देखि सकै छी-- ज्योतिषक अनुसार सिंह लग्न मे जनमल जातक पराक्रमी हुअय, मुदा 'कुसमय ही देहान्त हुआ।'

                   एहि दुनू कविता कें पर्याप्त हियाब संग देखल जाय तँ एक परत आर खुलैत अछि। ई समय छल जखन यात्री अपन जीवन-संघर्षक मझधार मे छला। मोन राखी जे एखन धरि ओ विद्यालंकार परिवेणो धरि नहि पहुँचि सकला अछि, बद्धपरिकर भ' क' लेखक बनबाक निर्णय करथि, ताहि मे तँ एखन बहुत देरी रहनि। अइ कविता मे एकटा बंध एहन छै जे कविक जीवनक तत्कालीन परिस्थितिक अभिधात्मक विवरण दैत अछि-- 'एकाकी और अकिंचन हो/ जो भू-परिक्रमा को निकले/ हो गये पंगु, प्रति पद इतने/ अदृष्ट के दांव चले/ --उनको प्रणाम।' परत ई खुलैत अछि जे स्वयं अपन आत्मबल कें पुष्ट करक खातिर, स्वयं अपन कर्म कें इमानदार बनेबाक खातिर ओ बारंबार-बारंबार संकल्पित होइत चलैत छथि। अपना आप कें व्यामोह सँ बचबैत, दृढ़ आत्मदीप्ति कें जोगबैत।

            हजारीबाग जेल मे लिखल हुनकर कविता 'रजनीगंधा' आ लगले बाद लिखल 'बहती है जीवन की धारा'

कविता कें संग-संग पढ़ने स्पष्ट होइत छैक जे जीवन मे गहन रूप सँ डूबब, आ कात-करोट सँ उबडुब करैत रहबा मे की फरक छै। कविक परिस्थिति एहन छनि-- 'यह प्रहरी के बूटों की कर्कश टापें/ रह-रहकर बहुधा नींद तोड़ जाती हैं/ आँखें खुलतीं तो बस झुँझला उठता हूँ/ ये हृदयहीन! ये नर-पिशाच! ये कुत्ते!' मुदा, जीवन मे जे कन्ट्रास्ट रहैत छैक जकरा दुआरे विपरीतो परिस्थिति सहनीय बनैत छैक, तकर चित्र देखी-- 'यह जेल और यह सेल-नियंत्रित प्राणी/ इस आँगन में उस ओर तुम्हारा खिलना/ यह भीनी-भीनी सारी रात महकना।' आ दोसर दिस, कात-करोट रहि जिनगीक तमाशा बनेनिहार व्यक्तिक मादे दोसर कविता मे ओ कहैत छथि-- 'साँस-साँस पर थकने वाले/ पार नहीं जा सकने वाले/ उब-डुब उब-डुब करने वाले/ तुम्हें मिलेगा कौन सहारा?/ बहती है जीवन की धारा!' 

             नागार्जुनक हिन्दी कविताक प्रवृत्ति सब पर हम बात करी, ताहि सँ पहिने 1948 मे महात्मा गांधीक हत्या पर केन्द्रित कविता-सिरीज पर एक दृष्टि दियाब' चाहब। ई कविता सभ दू दृष्टि सँ महत्वपूर्ण छै। एक तँ आजादीक बाद जे हुनका पहिल बेर गिरफ्तार कयल गेलनि, तकर मुख्य कारण ई कविते सब छल। दोसर, गांधी जी कें तर्पण करैत ओ संप्रदायवादी दैत्य सभक प्रबल विरोध के जे प्रतिज्ञा केलनि, तकर रक्षा हुनकर संपूर्ण जीवन मे देखार रूप सँ कयल गेल देखाइत अछि। प्रसिद्ध अखबार 'जनशक्ति' जाहि मे ई कविता-सिरीज छपल छल, स्थिति ई भेलैक जे पहिने जतय एकर आठ सौ प्रति छपैत छल, आब चारि हजार पर पहुँचि गेल। अन्तत: तँ एहन भेलैक जे स्वयं सरकार कें छापामारी क' क' एहि अखबार कें बंद कराब' पड़लैक आ बहुतो कम्युनिस्ट बौद्धिकक संग नागार्जुन सेहो गिरफ्तार कयल गेला।

                    'तर्पण' कविता तँ गांधी जीक हत्याक दोसरे दिन 31 जनवरी, 1948 कें लिखल गेल। एहि कविताक आरंभे एहि प्रसंग सँ भेलैक अछि जे हे पिता, काल्हि जाहि बर्बर आतंकीक हाथें अहाँक खून कयल गेल, ओ 'मराठा हिन्दू' आ 'मूर्ख' वा कि 'पागल' नहि छल। कविताक पहिले पांती मे नागार्जुन स्वयम सरकार के पानि उतारि देलखिन, कारण सरकार ओहि कातिल कें एही सब नामें चिह्नित कयने छल, आकाशवाणी सँ सीधा प्रसारण चलि रहल छल। प्रश्न छल जे हत्यारा जँ ई सब नहि छल तखन फेर की छल? नागार्जुन कें ओहि बर्बरक पूरा वंशावली बूझल छलनि। ओ लिखलनि-- 'वह प्रहरी है स्थिर-स्वार्थों का/ वह जागरूक, वह सावधान।' मर्म बूझल जाय, गोडसे मात्र एक प्रहरी, एक रखबार छल। क्यो मालिक छलै स्थिर-स्वार्था प्रवृत्तिक, तकर ओ मात्र एक सेवक छल। कविता मे आगू कवि ओहि वर्गपति कें आ ओकर प्रहरी सब कें ओ एक संग मिला क' कहै छथि-- 'मानवताक महाशत्रु'-- 'जो कहते हैं उसको पागल/ वह झोंक रहे हैं धूल हमारी आँखों में/ वह नहीं चाहते परम क्षुब्ध जनता घर से बाहर निकले/ हो जायें ध्वस्त/ इन सम्प्रदायवादी दैत्यों के विकट खोह/ वे नहीं चाहते पिता, तुम्हारा श्राद्ध, ओह!' के जनताक आँखि मे 'धूल' झोंकि रहल  रहल अछि? के नहि चाहैछ जे गाँधी जीक श्राद्ध होइन? कविताक अनुसार, पटेल नहि चाहैत छला, नेहरू नहि चाहैत रहथि! आगूक पांती छै-- 'शैतान आएगा रह-रह हमको भरमाने/ अब खाल ओढ़कर तेरी सत्य-अहिंसा का'-- शैतान के? मजा के बात छै अपन ओही दिनका रेडियो प्रसारण मे सरदार पटेल देशक जनता सँ अपील कयने रहथि जे 'महात्मा जीक द्वारा देल गेल प्रेम आ अहिंसाक संदेश कें ग्रहण करै जाउ।' नागार्जुन नीक जकाँ बूझि रहल छला जे एक अराजनीतिक भ' चुकल महात्मा के हत्या के ई लोकनि राजनीतीकरण क' रहल छथि। ओ लिखलनि-- 'एकता और मानवता के/ इन महाशत्रों की न दाल गलने देंगे/ हम एक नहीं चलने देंगे।' सरकारक मुखिया लोकनि जे चाहि रहल छथि, तकरा अहाँ नहि होब' देबै? एहन मजाल? मानि जे नहि होब' देबै, मुदा तखन अहाँ करबै की? कविता मे पांती छै-- 

'मैदानों के कंकड़ चुन-चुन/पथ के रोड़ों को हटा-हटा/ तेरे उन अगणित स्वप्नों को/ हम रूप और आकृति देंगे/ हम कोटि-कोटि/ तेरी औरस सन्तान पिता!'

            तेरह दिनक राष्ट्रीय शोकक बाद दिल्लीक यमुना-तट पर गाँधी जीक श्राद्ध भेलनि। 'शपथ' कविता ओ ओही दिन लिखलनि। एहि मे तँ ओ साफ-साफ लिखलनि जे 'क्या करते थे दिल्ली में बैठे पटेल सरदार?/ जिसके घर में कोई घुसकर साधु को दे मार/ उस गृहपति को धिक्कार।' एहि कविताक अन्त मे नागार्जुन लेल संकल्प आयल अछि-- 'हिटलर के ये पुत्र-पौत्र जब तक निर्मूल न होंगे/ हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख फासिस्टों से न हमारी/ मातृभूमि यह जब तक खाली होगी/ सम्प्रदायवादियों के विकट खोह/ जबतक खण्डहर न बनेंगे/ तबतक मैं इनके खिलाफ लिखता जाऊँगा/ लौह-लेखनी कभी विराम न लेगी.....' लिखबाक सिवाय हुनका हाथ मे आर छलनिये की? मुदा हुनका जेल मे बन्द कयल गेलनि। ओ समय छल, जखन गाँधी हत्यारा गोडसे जेल मे बन्द छल, आ ठीक ओही समय गोडसे पर गोस्सा केनिहार नागार्जुन सेहो कोनो आन जेल मे बन्द छला। 'वाह गोडसे' एहि सिरीजक एक एहन कविता थिक, जाहि मे ओ जेल मे भेटै बला सुविधाक आधार पर ई आकलन करबाक प्रयास कयने छथि जे सरकारक सहानुभूति ककरा संग रहैक! पांती छै-- ' वाह गोडसे/ जिनको तुमपर गुस्सा आया/ उन्हें माफ नहीं सरकार करेगी/ पकड़कर बन्द कर दिया है हाजत में/  अजा मिलेगी कड़ी से कड़ी/  बड़भागी तुम, बने हुए हो शाही कैदी/  उन गुस्ताखों का बदमाशों में शुमार है/ तुम सुनते हो रोज रेडियो/ पर उनको तो/ मामूली अखबार भी न मिलता होगा।'

           एही स्वर आ त्वराक कविता नागार्जुन जिनगी भरि लिखैत रहला। आपातकाल सँ बहुत पहिनहि ओ इंदिरा गाँधीक तानाशाही मिजाज कें पकड़ि चुकल रहथि। जे नागार्जुन कहियो बैंक सभक राष्ट्रीयकरण आ प्रीवी पर्सक समाप्तिक कारण इंदिरा के प्रशंसा मे कविता लिखैत हुनका दुर्गा धरि कहि गेल रहथि, वैह आपात्कालक दौरान दर्जनो एहन कविता लिखलनि जाहि मे विद्रोही स्वर कें साफ सुनल जा सकैत छल-- 'इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको? सत्ता की मस्ती मे भूल गयी बाप को?' राजीव गाँधी, देवगौडा होथि आ कि नरसिंहाराव, जनताक हक के मुद्दा पर ओ ककरो नहि बकसलनि। 

           नागार्जुन जें कि जनान्दोलन सँ बहरायल कवि रहथि, हुनकर कविता सभक बुकलेट समय-समय पर प्रकाशित होइत रहल आ लाखो लाख जनताक बीच ओ बुकलेट सब पहुँचल, अपन एहन पुस्तिका सब कें ओ 'कितबिया' मने छोटकी किताब कहथि। एहि तरहक पुस्तिका मैथिली मे सेहो छपल रहय, संस्कृत मे सेहो जकर चर्चा भ' चुकल अछि। गाँधी जीक हत्याक प्रसंग मे लिखल कविता सभक पुस्तिका 'शपथ' नाम सँ 1948 मे छपल। तहिना, 1952क पहिल आम चुनाव मे हुनक काव्य-पुस्तिका 'चना जोर गरम' छपलनि। 1955 के छात्र-आन्दोलन, जे कि बी. एन. काॅलेजक छात्र सब पर पुलिस द्वारा गोली चलेबाक प्रतिक्रिया मे शुरू भेल छल, एहि समय हुनकर कविता-पुस्तिका 'खून और शोले' प्रकाशित भेलनि। तहिना, अकाल पर लिखल हुनकर मार्मिक कविता सभक पुस्तिका 'प्रेत का बयान' नाम सँ छपल छल। व्यवस्थित रूप सँ जकरा कविता-संग्रह कहल जाय, से 'युगधारा' नाम सँ 1953 मे छपल। ई हुनकर पहिल कविता-संग्रह छलनि।  1959 मे हुनकर दोसर कविता-संग्रह 'सतरंगे पंखोंवाली' प्रकाशित भेलनि। 1962 मे तेसर संग्रह 'प्यासी पथराई आँखें' अयलनि। एकर बाद, 1974 मे हुनकर संग्रह 'तालाब की मछलियाँ' प्रकाशित भेलनि। एकर बाद, 1980क दशक मे, जखन कि ओ बेस प्रख्यात भ' गेल रहथि, तखने हुनकर आन-आन संग्रह सब आबि सकल। हिन्दी मे हुनकर कुल तेरह टा कविता-संग्रह प्रकाशित भेलनि। आन-आन संग्रहक नाम छल-- 'तुमने कहा था' (1980), 'हजार-हजार बाँहोंवाली' (1981), 'पुरानी जूतियों का कोरस' (1983), रत्नगर्भ' (1984), 'ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या!' (1985), 'आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने' (1986), 'इस गुब्बारे की छाया मे' (1990), 'भूल जाओ पुराने सपने' (1994) आ हुनकर जीवन-कालकअंतिम कविता-संग्रह 'अपने खेत में' (1997)। एहि सभक अतिरिक्त, महाकवि कालिदासक 'मेघदूत'सृजनात्मक काव्यानुवाद (1953) एवं खंडकाव्य 'भस्मांकुर' (1970) प्रकाशित छनि। हुनकर सैकड़ो कविता हेरा गेलनि, अथवा ओ ककरो देलखिन आ हुनका लग तकर प्रति नहि बचल। एहन बहुतो रास कविता शोभाकान्तक उद्यम सँ रचनावली मे पहिल बेर प्रकाशित भेल। मुदा एखनो हुनकर सबटा कविता भेटिये गेलनि अछि, एहन दाबी क्यो नहि क' सकै छथि। हुनका बारे मे सबतरि कहबी प्रचलित छल-- बाबा कविता बोते और खोते चलते हैं। ई स्थिति नितान्त शुरुहे सँ ताहि तरहें व्याप्त छल जे अपन पहिल कविता-संग्रह 'युगधारा'(1953)क भूमिका मे ओ लिखने रहथि-- 'कुछ कविताएँ खो गयी हैं, कुछ खो जाने की स्थिति में हैं, कुछ मित्रों के पास बिखरी पड़ी हैं और बाकी इस यात्री कवि के थैले में दरभंगा-पटना-इलाहाबाद-दिल्ली, दिल्ली-इलाहाबाद-पटना-दरभंगा सफर करती फिर रही हैं।'

                जहाँ धरि हुनकर हिन्दी कविता सभक प्रवृत्तिक प्रश्न अछि, मुख्यत: आठ-दस कोटि-क्रम मे हुनकर कविता कें राखल जा सकैत अछि। पहिल तँ अछि जे हुनकर कविताक केन्द्र मे देशक ओ बहुसंख्यक जनता अछि जकरा बदौलत देशक उत्पादन आ अर्थतंत्र टिकल अछि। ओ श्रम सँ जुड़ल वर्ग थिक। वैह बहुसंख्यक जन बाजार कें गति दैत अछि आ ओकरे देल वोट पर कोनो नेता देशक शासन-तंत्र पर काबिज होइत अछि। देशक कल्याणक नाम पर देल गेल वचन वा कयल गेल कोनो प्रयास, जँ ओ ढकोसला मात्र नहि हुअय तँ असलियत मे एही वर्गक कल्याण कें सुनिश्चित करैत अछि। दोसर दिस, भारतक महान स्वतन्त्रता-संग्रामक आदर्श जँ सत्ते जीवित हो तँ निश्चय एही वर्गक कल्याण हेतैक। मुदा ई ढकोसला कोन स्तर धरि आजादीक बादे सँ शुरू भ' गेल रहैक, तकर ठोस आ स्पष्ट निसानी नागार्जुनक कविता मे भेटैत अछि। एहि वर्गक पहचान स्पष्ट करबाक लेल एतय हम हुनकर कविता 'पूरी आजादी का संकल्प'क अंश उद्धृत करब। ई उद्धरण एहू लेल उपयोगी छैक जे आमजनक भाषा मे आमजनक दुख-सुख लिखबाक लेल प्रतिबद्ध ई कवि कोना अपन काव्यभाषा कें जनभाषाक अत्यन्त लगीच धरि घीचि अनैत अछि। पंक्ति अछि--

बीज नहीं है, बैल नहीं है, वर्षा बिन अकुलाते हैं

नहर रेट बढ़ गया, खेत में पानी नहीं पटाते हैं

नहीं भूमि में कनमा-भर भी दाना उपजा पाते हैं

पिछला कर्ज चुका न सके, साहू की झिड़की खाते हैं

उतना ही फँसते, अपने को जितना अधिक बचाते हैं

भूखे रहकर, आधा खाकर दिन पर दिन दुबराते हैं

हड्डी छेद रहा है जाड़ा, बरबस दाँत बजाते हैं

दवा न कर पाते रोगों की, यम को पास बुलाते हैं

हरि-इच्छा या राम भरोसे अपने को समझाते हैं

मिलवाला मनमानी करता,ऊख अगर उपजाते हैं

खर्चा के डर से बच्चों को कुछ भी नहीं पढ़ाते हैं

चाँदी तो क्या, टलहा तक की औंठी नहीं गढ़ाते हैं

परब-तीज-त्यौहार नहीं तंगी के कारण भाते हैं

तबियत बहलाने की खातिर तुलसी के पद गाते हैं

             आँखि खोलि क' ताकी तँ देखैत छी जे ई जे उत्पादक श्रमजीवी वर्ग अछि, तकरे शिकार करबाक घात मे जाबन्तो राजनेता, पूजीपति, धर्मोपदेशक, व्यापारी, अधिकारी आदि वर्ग लागल अछि। हिसाब अस्सी आ बीस प्रतिशतक छै--अस्सी प्रतिशत शोषित आ बीस प्रतिशत शोषक। सरकार एहि दुनू वर्गक बीच ककर हित-चिन्तन पर एकाग्र अछि, नागार्जुन साफ लिखलनि अछि--

अस्सी प्रतिशत जनता की खातिर कृपाण है

बाकी लोगों की खातिर बस पुष्पवाण है

              एहि अस्सी-बीसक प्रसंग मे राहुल सांकृत्यायन द्वारा पूर्व-आधुनिक युगक एक हिसाब हमरा ध्यान मे अबैत अछि। अपन पुस्तक 'हिन्दी काव्यधारा'क अवतरणिका मे ओ लिखने छथि जे तहिया बीस प्रतिशत लोक (दास-दासी) तँ मात्र देखैए-सुनै मे मनुख-सन लगैत छल, वस्तुत: ओ अपन मालिकक जंगम सम्पत्ति होइत छल, जकर क्रय-विक्रय कोना होइ छल तकर विवरण स्वयं विद्यापतियेक रचना मे पाओल जाइत अछि। हिन्दू राष्ट्रक ई व्यवस्था एते बद्धमूल छल जे नेपाल मे सन् 1925 धरि चलन मे छल। शेष मे सँ पचास प्रतिशत किसान, दस प्रतिशत मजदूर आ दस प्रतिशत लोक शिल्पकार छला। साफ बुझि सकै छी जे देशक राष्ट्रीय आय कतय सँ अबैत छल आ एतेक रास उत्पादनक श्रेय किनकर छलनि। मुदा राहुल जीक शब्द मे-- 'वहाँ सारा शिल्प, सारा व्यवसाय, सारी कृषि मुट्ठी भर आदमियों के भोग के लिए होती थी। दूसरों को तो मुश्किल से सिर्फ जीने और ब्याने भर का अधिकार था।' आइ, विभिन्न कारण सँ प्रतिशत मे जे अन्तर आयल अछि, ताहि सँ परिस्थिति बदलि गेल हो सेहो बात नहि अछि। नागार्जुनक 'आम जनता' वा 'साधारण जन' के छल, से एहि प्रसंग सँ बुझल जा सकैत अछि।

        1949क स्वतंत्रता-दिवस पर अपन 'साधारण जन'क शक्ति आ भवितव्य कें अकानैत नागार्जुन 'जन-वन्दना' लिखलनि, जकर आरंभे मे ई पांती अबैत अछि--

'हे कोटिशीर्ष हे कोटिबाहु हे कोटिचरण!

युग की लक्ष्मी भव की विभूति कर रहीं तुम्हारा स्वयं वरण

तुम महिमामंडित परम्पराओं के वाहन

तुम साधारण, तुम निर्विशेष

निज जटाजाल में विद्युत की गतिविधि समेट

तुम सर्वग्रासी हिरणकशिपु का फाड़-फाड़कर विकट पेट

विज्ञान-कला-संस्कृति के शिशु प्रह्लादों को

-- दे रहे निरंतर अभयदान!!'

              एहि आम जनक शिकार करबा लेल घात लगौने सक्रिय राजनीति, धर्मतन्त्र आ पूजीतन्त्रक गठजोड़ षड्यंत्र कें नागार्जुनक कविता सदैव नांगट करैत चलैत अछि। कखनो व्यंग्य अथवा विरोध करबाक अवसर नहि चुकैत अछि। मानू यैह हुनक कविता-यात्राक मुख्य प्रतिज्ञा होइन। अपन प्रसिद्ध कविता 'प्रतिबद्ध हूँ' मे ओ स्पष्ट कहैत छथि--

'प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ

बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त--

संकुचित 'स्व' की आपाधापी के निषेधार्थ...

अविवेकी भीड़ की 'भेड़िया-धसान' के खिलाफ...

अंध-बधिर 'व्यक्तियों' को सही राह बतलाने के लिए...

अपने आपको भी 'व्यामोह' से बारंबार उबारने की खातिर...

प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ!'

                 'संकुचित स्व' की भेलै? ओ कविक व्यक्ति-हित भ' सकैए। वर्णहित अथवा वर्गहित भ' सकैए जे बहुजन समाज के विरुद्ध जाइत हो। तकर निषेध लेल प्रतिबद्ध। 'अविवेकी भीड़क भेड़िया-धसान' हमसब अपन चतुर्दिक देखि रहल छी। एकर विस्तार माॅब-लिंचिंग सँ ल' क' राष्ट्रीय अराजकता धरि जाइत छैक। कविक प्रतिज्ञा अछि जे ओ एकर खिलाफ रहत। 'अंध-बधिर' के भेला, आ से किएक एहन बनल रहैत छथि, स्पष्ट अछि जे वर्गशत्रुक शिकार भइयो क' हुनका अपन वास्तविकताक परिज्ञान नहि रहैत छनि, एहन लोक कें सही बाट पर घीचि आनब कविक काज थिक। मने कवि केवल लेखक नहि होइत अछि, ओ एक्टीविस्ट सेहो होइछ, जकर साक्ष्य नागार्जुनक कविता दैत अछि। कविक आगू अपन-परार के दुविधा बेर-बेर अयबाक संभावना रहैत छैक। मुदा ई व्यामोह कखनहु ओकरा अपन कर्तव्य-पथ सँ डिगेतै नहि, एहू लेल प्रतिबद्धता व्यक्त कयल गेलैए। अपन प्रतिबद्धता कें स्पष्ट करैत नागार्जुन स्वयं कहैत छथि-- 'वैचारिक प्रतिबद्धता को किसी पार्टी या राजनीति की परिधि में नहीं समझा जा सकता। वह धरती की तरह विराट और समुद्र की तरह गहरी होती है।' एहि प्रतिबद्धताक प्रतिज्ञा एहि पांती मे प्रकट भेलैक अछि, जतय कवि अपना कें 'जनकवि' कहैत अपन संपूर्ण दायित्व एकमात्र जनतेक प्रति व्यक्त करैत अछि--

'जनता मुझसे पू़छ रही है, क्या बतलाऊँ?

जनकवि हूँ मैं, साफ कहूँगा, क्यों हकलाऊँ?'

अथवा, 1950 मे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पर लिखल अपन कविता मे ओ कहैत छथि--

मैं न अकेला, कोटि-कोटि हैं मुझ-जैसे तो

सबको ही अपना-अपना दुख है वैसे तो

पर दुनिया को नरक नहीं रहने देंगे हम

कर परास्त छलियों को, अमृत छीनेंगे हम

                   आलोचक विजय बहादुर सिंह एक ठाम लिखने छथि जे 'नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम किसी बड़े परिवार के मुखिया की डायरी पढ़ रहे हों। और संयोग से वह मुखिया चित्रकार भी है। नागार्जुन अपने इस परिवार के सुख-दुख, राजी-खुशी, संघर्ष-प्रयत्न और सुबह-शाम तक की दिनचर्या से न केवल परिचित हैं बल्कि उसके भागीदार भी हैं।' एहि परिवारक विस्तार कतेक टाक अछि? खेत मे काज केनिहार खेतिहार मजदूर, किसान, महानगर मे रिक्शा-ठेला घिचनिहार पालक बोझ ढोनिहार मजूर, बस-ट्रामक ड्राइवर, फैक्टरी सभक चटकल मजदूर, धान कुटनिहारि किशोरी, फुटपाथ पर पड़ल भिखारि, बौक-बहीर-विकलांग लोक, असहाय बुढ़ारी काटनिहार वृद्धजन, हिमालयक बर्फ लादल पहाड़ पर देशक रक्षा लेल प्रतिबद्ध सैनिक, सामाजिक बर्बरताक शिकार होइत स्त्री लोकनि, अपन देह सँ कमाइ केनिहारि विज्ञापन-सुन्दरी लोकनि, कूड़ा-कचराक ढेर सँ भोज्य पदार्थक संग्रह केनिहार भुखाहल लोक सब-- आदि-आदि जतय धरि विस्तार पबैत हो, नागार्जुनक कविता ओतय धरि पसरल अछि। एहन-एहन समस्त लोक नागार्जुनक कविता-जगत मे हबगब बनेने रहैत छथि। साधारण जनक यैह हबगब नागार्जुनक आन्तरिक शक्तिक स्रोत छियनि। एहि तथ्य कें कतेको ठाम लिखित रूप मे स्वीकारलनि अछि जे 'संघर्षशील जनता का विपन्न बहुलांश ही मुझे शक्ति प्रदान करता है। कोटि-कोटि भारतीयों के वे निरीह, पिछड़े हुए, अकिंचन, दुर्बल समुदाय जो चाहने पर भी अपना मतपत्र नहीं डाल पाए, मेरी चेतना उनकी विवशताओं से ऊर्जा हासिल करेगी।'

                हुनक कविताक एक दोसर विस्तार ओहि दिस जाइत अछि जतय यथास्थिति कें बदलबाक लेल दुर्गम क्रान्तिक बाट पकड़निहार युवा लोकनि छथि। आजादी सँ पूर्वक सहजानंदक किसान-आन्दोलन हो, तेलांगनाक पचासक दशक के विद्रोह हो, साठि के दशकक नक्सलबाड़ी विद्रोह हो, सत्तर के दशकक आपातकालक विरोध मे उठल जेपीक आन्दोलन हो, नागार्जुन कें साक्षात रूप मे ओहि ठाम उपस्थित सेहो देखल जा सकैत अछि, एकर अतिरिक्त जे हुनकर कविता मे ई ऐतिहासिक घटना सब पूरा विस्तार मे आयल अछि। आ एतबे किएक, महाग उपेक्षित फल कटहर, आम तौर पर घृणापूर्वक स्मरण कयल जायब जीव सुग्गर, महाशय बेंग, चतुर बिज्जी, कनहा कुकूर, 'मटिया' नामें मशहूर किरासन तेल, कतहु नीमक कतहु बच्चा चिनारक गाछ-- आदि-आदि-- एहि सबटा कें नागार्जुनक कविताक नागरिकता भेटल रहैक। विचारला पर लगैत अछि जे सर्वहाराक सामाजिकता आ श्रम-परायणता सँ आत्मबुद्धि रखनिहार कवियेक दुनिया मे एहन ई सब होयब संभव भ' सकैत छल।

               नागार्जुन प्रगतिशील कवि रहथि। स्वयं अपनहु ओ कतेको ठाम प्रगतिशीलता कें परिभाषित केलनि अछि। कुल्लम बात यैह जे प्रगतिशीलता कें कोनो खास राजनीतिक दल वा विचारधारा सँ बान्हि कें नहि देखल जा सकैत अछि। ई किछुएक नारा वा निर्देशित विषय धरि सीमित नहि अछि। प्रगतिशीलता ने तँ कोनो 'विषय' थिक, ने कोनो 'शैली'। ई एक संपूर्ण जीवन-दृष्टि थिक जे समस्त विषय-वस्तु आ शिल्प-शैली मे अन्तर्निहित भ' सकैत अछि। नागार्जुनक प्रकृति-कविता मे एहि चीज कें बेसी स्पष्ट रूप मे देखल जा सकैत अछि, खास क' क' तखन, जखन हुनकर कविता कें अन्तश्चेतनावादी कवि लोकनि, यथा अज्ञेयक कविताक समानान्तर राखि क' देखल जाय। नागार्जुनक लग मे गर्मी-जाड़, रौद-छाँह, पानि-अकाल, आगि-पानि, पर्वत-रेगिस्तान आदि अब कथूक कविता अछि, आ से केवल आँखि देखल हो, ततबे टा नहि, हुनकर समस्त अभिव्यक्ति प्रत्यक्ष स्वानुभूति सँ जनमल अछि, जे कि कोनो पर्यटक कें नहि, ओहि सभक बीच जीवन जीनिहार मनुक्खे कें उपलब्ध भ' सकैत अछि। श्रम-परायणता कें विशिष्ट माननिहार कोनो सर्वहारा कविये के जीवन-दृष्टि मे ई वस्तु अर्जित भ' सकैत छैक।

                प्रगतिशीलताक संसार मे जतबे आवश्यक इतिहास-बोध होइत छैक, ततबे वैज्ञानिक बुद्धि। नागार्जुनक वैज्ञानिक बुद्धि पर कम बात होइत अछि, तें एकर किछु दृष्टान्त एतय राखय चाहब। 1960 के लिखल हुनकर एक कविता छनि-- 'दूर बसे उन नक्षत्रों पर'। स्मरण करी जे 1960 ओ वर्ष छल, जहिया सोवियत संघ अंतरिक्ष मिशनक आरंभ कयने रहय। प्रथम अंतरिक्ष-यात्री यूरी गगारिन के अंतरिक्ष-यात्रा तँ अप्रैल 1961 मे भेल, मुदा 1960क लगभग समुच्चा वर्ष सोवियत संघक एहि अभियानक चरचा आ उत्तेजना सँ भरल रहल। पृथ्वीग्रक वासी लोकनिक लेल ई बहुत पैघ समाचार छल। नगार्जुन एही विषय पर ई कविता लिखने रहथि। एहि कविता मे अतिशय रचनात्मक भ' क' ओमानव-जातिक सुन्दर भविष्यक एतय रूपरेखा रखलनि अछि। कविताक पांती छै--

दूर बसे उन नक्षत्रों पर

टहल-बूलकर

मानव वापस आ जाएँगे

ग्रह-उपग्रह अविजित न रहेंगे

अंतरिक्ष के उद्यानों में

निर्भय-निरातंक मानव-शिशु

निशिदिन मुक्त विहार करेंगे

कविताक बिच्चहि मे हुनका त्रिशंकुक मिथक मोन पड़ै छनि तँ कहैत छथि जे ओहू बेचारा कें आब जनम-जनम के अभिशाप सँ मुक्ति भेटि जेतैक। आब तँ जानि नहि कतेको कतेक विश्वामित्र जन्म लेता जे कतेको कतेक सृष्टि ठाढ़ करबा मे सफल हेता। विज्ञानक उद्यम सँ स्थान-कालक सीमा समाप्त होयत। कोन्नहु मौसमक फूल कोनो आनो मौसम मे फुला सकतै। दूर अंतरिक्षो मे आब दिव्यधाम वास्तविकता मे सुशोभित हेतै। ठीक एही ठाम हुनका महाकवि कालिदास स्मरण अबै छथिन जिनकर मेघदूत मे वर्णन भेलैक अछि जे अलकापुरी मे दुख नामक कोनहु वस्तु वा स्थितिक अस्तित्वे नहि छल। लिखैत छथि--

आँसू होंगे, सुख के होंगे

दुख के आँसू कहीं न होंगे

सारी उम्र जवानी होगी

छेड़छाड़‌ होंगे प्रियतम के

और प्रिया के

वर्ना यों तो जनजीवन में

कहीं कलह का नाम न होगा

-- आइ भने चरित्रहीन-नीतिविहीन नर-वानर राजनेता सब कविक एहि स्वप्न-- कहीं कलह का नाम न होगा-- कें साकार हेबा मे निरंतर बाधक बनल हो, मुदा मोन रखबाक चाही जे मनुष्यताक चरम लक्ष्य यैह थिक।

                एहि ठाम एक नजरि हुनकर कालजयी कविता 'अकाल और उसके बाद' मे आयल किछु दृश्य पर देब सहायक होयत। बुझले बात अछि जे कुल आठ पांतिक ई कविता दू बन्ध मे दृश्यांकित अछि, पहिल मे अकालक चित्र छैक आ दोसर मे ओकर बादक। अकालक बाद जखन पहिल बेर घर मे दाना एलैक अछि, तँ तकर दृश्य कें अंकित करबाक लेल कवि तीन टा चित्र खचित केलनि अछि। पूरा बन्धे देखल जाय--

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठीं घर भर की आँखें कई दिनों के बाद

कौए ने खुजलाईं पाँखें कई दिनों के बाद

            आँगन सँ ऊपरक दिस उठ' बला धुइयाँक दृश्य प्रसन्नतासूचक थिक। मुदा, ओहू सँ विशेष अछि कौआक पाँखि कुरियेबाक चित्र। बात स्पष्ट भ' रहलैक अछि जे कौआ बेचारा तँ रोज एहि अँगनाक ऊपर आबि क' बैसैत छल, मुदा भोजन-भातक कोनो लक्षण नहि पाबि क' निराश घुरि जाइत रहय। आइ ओ आँगनक ऊपर धुइयाँ उठैत देखलकै तँ बुझि गेल जे दाना एलैक अछि, किछु ने किछु गुंजाइश ओकरे लेल आइ जरूरे हेतै। एहि खुशी मे अपन लोल सँ ओ अपन पाँखि कें कुरिया रहल अछि। आलोचक नन्दकिशोर नवल लिखलनि अछि जे 'चमक उठीं घर भर की आँखें' धरि तँ कोनो दोसरो सुकवि पहुँचि सकै छला, मुदा तकरा बादक जे दृश्यांकन छै, 'कितने कवियों की पहुँच यहाँ तक होती है?'

           नागार्जुनक प्रकृति-कविताक बारे मे विजय बहादुर सिंह लिखलनि अछि जे ओ असकर एहन कवि छथि जिनका ओतय बेंग सभक कबदेबा सँ खिन्न कोइली राति-राति भरि कनैत अछि। बड़का गबैया भेलीहे, अपना कें बहुत काबिल नहि बरु सब सँ काबिल बुझैवाली। नागार्जुन एहि 'बहुत' कें छांटैत चलैत छथि। हुनका ओतय सबहक हैसियत बराबर अछि। क्यो ककरो सँ कम नहि, बेसियो नहि। यैह हुनकर कविताक साम्यवाद थिक आ यैह थिक हुनकर परिवार-दृष्टि। सौंसे संसार एही रूप मे एक परिवार थिक। यैह कारण थिक जे ओ 'मेरी भी आभा है इसमें' सन कविता लिखि पबैत छथि। एहि कविता मे पांती अबैत छैक--

भीनी भीनी खुशबू वाले

रंग बिरंगे

यह जो इतने फूल खिले हैं

कल इनको मेरे प्राणों ने नहलाया था

कल इनको मेरे सपनों ने सहलाया था


पकी सुनहली फसलों से जो

अबकी यह खलिहान भर गया

मेरी रग-रग के शोणित की बूँदें इसमें मुसकाती हैं


नये गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है

यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है

मेरी भी आभा है इसमें।

            बीसम शताब्दीक भारतीय साहित्य मे नागार्जुन सर्वाधिक यायावर साहित्यकार रहल छथि। एहि यायावरीक बहुतो लाभ हुनका कविता कें भेटलनि अछि। विषयक विविधता ततेक जे जाहि कोनो भावक चाहैत होइ, हुनका कविता मे उपलब्ध भेटत। तहिना भाषा-शैली, कतहु नारा जकाँ, कतहु गीत जकाँ, कतहु सम्यक् छन्दोबद्ध तँ कतहु विलक्षण लयात्मक गद्य-- नागार्जुनक भिन्न-भिन्न भाँतिक विविधता ततेक पसार लेने अछि जे चकित करैत अछि। 'मंत्र कविता' मे ओ कहैत छथि--

'ओम् दलों मे एक दल अपना दल, ओम्

ओम् अंगीकरण, शुद्धीकरण, राष्ट्रीयकरण

ओम् मुष्टीकर, तुष्टीकरण, पुष्टीकर

ओम् एतराज, आक्षेप, अनुशासन

ओम् गद्दी पर आजन्म वज्रासन

ओम् ट्रिब्यूनल, ओम् आश्वासन

ओम् गुटनिरपेक्ष सत्तासापेक्ष जोड़-तोड़

ओम् छल-छद्म, ओम् मिथ्या, ओम् होड़महोड़

ओम् बकवास, ओम् उद्घाटन

ओम् मारण-मोहन-उच्चाटन।'

आ, हुनकर ई प्रखरता 10 जुलाइ 1997 कें लिखल हुनकर अंतिम कविता 'मायावती-मायावती' मे ओहिनाक ओहिना देखल जा सकैए--

'जय-जय हे दलितेन्द्र

आपसे दहशत खाए केन्द्र

अगल-बगल हैं पंडित सुखराम

जिनके मुख में राम

सोने की ईंटों पर बैठे हैं

नरसिंह राव

राजा होंगे आगे चलकर

उनके पुत्र प्रभाकर राव।'

                नागार्जुनक कविताक विशेषता रहनि जे ओहि मे तत्कालीन देश-काल के पूरा-पूरा विवरण पाओल जा सकैत छल। ओ जनताक रोजमर्राक विकट समस्या सब कें अपन कविताक विषय बनाबथि। हड़ताल हो वा आन्दोलन, नागार्जुन कें जनताक मुद्दाक संग बनल देखल जा सकैत छल। ओ अपना कें जनान्दोलनक कवि मानथि, आ संतोषपूर्वक कहथि जे 'अगले पचास वर्षों बाद जब हिन्दी कविता की जीवन्तता के प्रमाण खोजे जाएँगे तो हमारी वे पंक्तियाँ उद्धृत की जाएँगी जो चलताऊ ढंग से आन्दोलनों को लक्ष्य करके लिखी गयी हैं।' मुदा, एकर एक दोसर पक्ष सेहो छल। हिन्दीक परंपरित आलोचना मे नागार्जुन-सन कविक मूल्यांकनक वास्ते कोनहु निर्धारित निकष नहि छल। दोसर, एहन-एहन संघर्षधर्मी गरीब-किसान-मजदूर-सर्वहाराक संकट कें व्यक्त करबाक लेल नागार्जुन जाहि यथार्थ, जाहि भाषा आ जाहि शिल्पक नित नवीन प्रयोग कयने चलल जाइत रहथि, ई सब मिलि क' हुनकर मूल्यांकन आरो बेसी कठिन बना दैत छल। तेसर बात इहो छल जे बहुत शुरुहे मे, 1958क जबाना मे, नागार्जुन आलोचक लोकनि कें उघार करैत, आ कवि-आलोचकक साहित्येतर गठजोड़ कें देखार करैत, 'कीर्ति का फल' शीर्षक कविता लिखने छला जे जतबे छोट छल, ततबे बेसी मारक। ओ कविता अछि--

नागार्जुनक कविता मे वर्तमान के बहुत महत्व छल, जखन कि कविता विधा कें आम तौर पर पश्चगामी मानल जाइत रहल अछि। वर्तमानक यथार्थ मे कैक स्थिति एहन होइत छैक जे निर्माणाधीन अवस्था मे रहैत छैक। ओहि अवस्था पर कविता-लेखन सँ सामान्यत: पैघ कवि सब परहेज करैत रहला अछि। मुदा, नागार्जुन कें कहियो एहि सँ एकदम्मे परहेज नहि रहलनि। कतेको कविता तँ ओ वर्तमाने नहि, तात्कालिक वर्तमानक विषय मे लिखलनि। एकर जे खतरा होइत छैक, तकर सामना नागार्जुन कें सब दिन करय पड़लनि। हुनका बारे मे कतेको गोटे एहन मत रखैत छला जे नागार्जुनक कोनो पक्का स्टैंड नहि होइत छनि। आइ जकर विरोध मे लिखलनि, संभव अछि काल्हि ओकर प्रशंसा मे लिखथि। एकर दू कारण छल। पहिल कारणक तह मे जाइ तँ हमसब देखब जे प्रधानमंत्री नेहरूक खिलाफ ओ एक सय सँ बेसी कविता लिखलनि। बहुलांश विरोधपरक। मुदा, अपन कविता मे जाहि राजनेताक ओ सर्वाधिक फज्झति केलनि, ओ इन्दिरा गाँधी छली। 'इन्दुजी, इन्दुजी क्या हुआ आपको?' तँ किछु कोमल लागत जँ इन्दिराक विरोध मे लिखल आन-आन हिन्दी-संस्कृत कविता कें संग क' क' देखल जाय। मुदा गौर करबाक बात छै जे वैह नागार्जुन एक समय मे इन्दिरा कें 'दुर्गाक अवतार' बता चुकल रहथि आ हुनकर प्रशंसा मे अनेक कविता लिखने रहथि। कारणक पड़ताल करी तँ पायब जे तहियाक बात भिन्न रहैक। हमसब पबैत छी जे 1969क राष्ट्रपति-चुनाव मे काँग्रेसक दक्षिणपंथी घाघ तबका, जकरा आइ-काल्हि 'स्लीपर सेल' कहल जाइत छैक, ओ अपन बड़ भारी दबाव बना लेने रहय, आ प्रधानमंत्री कें टेरै लेल तैयार नहि। मुदा, केवल नागार्जुने नहि, देशक समस्त लोकतांत्रिक सोच राखनिहार लोक कें ई देखि क' बहुत बल भेटल रहनि जे इन्दिरा  हिनका सब कें नथलनि, कदापि झुकली नहि आ अपना लेल समाजवादी बाट चुनलनि। हुनकर दूटा फैसला एहन भेलनि जे क्यो बहुत बहुत बहादुरे प्रधानमंत्री ई फैसला ल' सकैत रहथि। एहि मे सँ एकटा तँ छल बैंक सभक राष्ट्रीयकरण, आ दोसर, भूतपूर्व जमीन्दार सब कें प्रतिवर्ष देल जाइ बला प्रीवी पर्स, जे कि करमुक्त आय होइ छलै आ जकर प्रावधान संविधान मे कयल गेल छल, कें सदा-सर्वदाक लेल समाप्त करब। एकरा लेल इन्दिरा सरकार कें संविधानक छब्बीसम संशोधन करय पड़ल छल। नागार्जुन किसान सभाक जोरदार राजनीति मे भाग ल' चुकल छला। किसान सभाक प्रमुख माँग यैह रहैक जे जमीन्दारी उन्मूलन कयल जाय आ जमीन्दार लोकनि कें कोनो कोनो मुआवजा नहि देल जाय। पहिल माँग तँ पूरा भ' चुल रहै मुदा दोसर माँग पूरा करबाक हिम्मत ककरो नहि होइ छलै, जकरा इन्दिरा गाँधी आबि क' पूरा केलनि। नागार्जुन इन्दिराक प्रशंसा मे कविता लिखलनि--

नये हिन्द में आ धमका है नया जमाना

मुश्किल होगा इसको अब पीछे लौटाना

देख-देखकर इसकी गति-मति

हाथ मलेगा लगातार निक्सन का नाना

        एही समय नागार्जुन इन्दिरा मे दुर्गा-रूप देखने छला--

महिषमर्दनी के त्रिशूल का तगड़ा-तगड़म्

महीं चलेगी अगड़म-बगड़म्

         सिंडीकेटक घाघ काँग्रसी महाप्रभु सब पर ओ लिखने रहथि--

गाँधी-तिलक-सुभाष, सभी से परिचित उनकी आँत

वही इन्दिरा की गर्दन पर चले गड़ाने दाँत

          गौर कयल जाय, गाँधी-तिलक-सुभाष कें जमीन्दार लोकनि खा क' पचा गेल रहथि, तें तँ हिनका सभक अँतरी ओहि लोकनिक स्वाद सँ परिचित रहय। सही बात छै जे गाँधी लोकनि तँ जमीन्दारक मददगार छला, कारण हुनका सभक फंडिंग ओतहि सँ भ' रहल छल। दोसर, जमीन्दार सब खुलेआम घोषणा क' देने रहथि जे जँ हमरा सभक हक मारल गेल तँ जिम्मेदार नेता सब कें ओ लोकनि मारि क' गंगा मे बहौता। एम्हर, नागार्जुन तँ एहि मिजाजक रहथि जे 15 अगस्त 1947क मध्यरात्रि मे, जखन कि केवल देश आजाद भेल रहै, जमीन्दारी उन्मूलन नहि, अपन कविता मे अपन स्वप्न लिखने रहथि--

खाक बन गये सूर्यवंश-चन्द्रवंश के ठूँठ

तलवारें गल गयीं आँच में, बिकी रत्नमय मूँठ

             एते बात जनलाक बाद कोनो आश्चर्य नहि हेबाक चाही जे वैह कवि, ओही दशक मे, ओही इन्दिरा पर ई कविता लिखलनि--

ठगों-उचक्कों की मलिकाइन/ प्रजातन्त्र की ओ हत्यारी

अबके हमको पता चल गया/ है तू किन वर्गों की प्यारी

अपने भोलेपनके चलते/ माई, हम तो मात खा गये

तेरे पालित पशु फसलों की/ एक-एक पत्ती चबा गये

           बात की रहै? बात रहै जे 1971क चुनाव मे इन्दिरा भारी बहुमत ल' क' जीतल रहथि। सम्पूर्ण शक्ति इन्दिरा मे निमज्जित भ' गेल रहै-- इन्दिरा इज इंडिया। सरकारक कामकाज मे भारी भ्रष्टाचार व्याप्त रहै, कहल जाइत रहै जे अवैध उगाहीक अंश प्रधानमंत्री आवास धरि जाइत रहै, जकर मूल संरक्षक रहथि संजय गाँधी, इन्दिराक द्वितीय पुत्र। संजय लोकतन्त्रक लेल भारी खतरा बनि गेल रहथि, जखन कि हुनका लग कोनो संवैधानिक पद नहि रहनि। कुलदीप नैयर संजय गाँधीक दुस्साहसक विवरण दैत लिखने छथि जे जायज-नजायज पैरवी नहि सुनला पर संजय प्रधानमंत्री पर हाथ छोड़ि द' सकै छला, थापड़ चला सकैत रहथि। चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय-सन संस्था सब बेहिचक इन्दिरा कें लाभ पहुँचेबाक लेल तमाम मर्यादा तोड़ि सकैत छल। आमजन महँगाइ, कालाबजारी, बेरोजगारी आ निरंतर बढ़ैत अपराध सँ त्रस्त छल। आगू आपातकाल घोषित हेबाक रहै। एहि परिस्थिति मे नागार्जुन ई कविता लिखने रहथि। हुनकर बांकी कविता सब पर जँ ढुलमुल हेबाक आरोप लगैत हो तँ निस्तुकी करबाक लेल ओहि कविता सबहक पृष्ठभूमि मे जा क' देखबाक चाही।

            एहि विषयक दोसर आरोप ई कयल जाइत छैक जे जनान्दोलन आ राजनीतिविषयक हुनकर विचार समय-समय पर बदलैत रहल। एकर सब सँ पैघ उदाहरण देल जाइछ जे जेपीक सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन मे ओ सहयोगी बनला, जखन कि साम्यवादी पार्टी सब एहि सँ दूरी बनेने छल। ओ किएक एहि आन्दोलन मे शरीक भेल छथि, ताहि विषय पर हुनकर कथन आ कविता दुनू पर्याप्त तर्कसंगत छैक। मुदा, लगले देखल गेल जे एहि आन्दोलन सँ ई कहैत ओ अपना कें अलग क' लेलनि, जे हम गलत संगत मे चलि गेल छलहुँ आ एकर बोध भेला पर आब अपना कें एहि सँ अलग करैत छी। बोध ई छल जे एहि संपूर्ण पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघक कब्जा अछि जे अपन वैधता प्राप्त करबाक कोशिश मे छल। ई बोध हुनका जेल मे भेलनि, जकर पूरा विवरण 'युगों का यात्री' वा अन्यत्र देखल जा सकैत अछि। अपन गलतीक स्वीकार आ तकरा संशोधित करबाक जतन नागार्जुन पूरा जीवन निमाहलनि। एहि ठाम महान आलोचक रामविलास शर्माक एहि विश्लेषण, जे कि अजय तिवारी द्वारा लेल गेल एक इन्टरव्यू मे कहने रहथिन, के स्मरण अप्रासंगिक नहि होयत-- 'नागार्जुन की ये बहुत बड़ी विशेषता है कि उन्होंने हमेशा जन-आन्दोलनों के साथ चलने की कोशिश की है। सम्भव है कि जन-आन्दोलन के साथ चलने में वे बहुत जगह भटके हों। सवाल यह है कि जन-आन्दोलन के नेता भटके हैं कि नहीं? मेरा खयाल है कि नेताओं से नागार्जुन कम ही भटके हैं। जो उनका भटकाव है वह सहज है। वे समझ नहीं पाए हैं। उन्होंने बेईमानी की नीयत से कोई काम नहीं किया, जबकि जन-आन्दोलन के नेताओं के बारे में यह ईमानदारी के साथ कहना बहुत मुश्किल बात होगी।'

              नागार्जुनक कविता सभक एक बहुत पैघ महत्व एहि बात मे अछि जे ओ सदैव नवतुरिया कें संबोधित छथि। हरदम हुनका ई प्रयत्न करैत देखल जा सकैत अछि जे हुनकर जीवन आ कृतित्व नव पीढ़ीक हिम्मत आ मनोबल कें बढ़ा सकैक। एक जबाना छल जखन देशक सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय सभक जीनियस सामाजिक आ आर्थिक अन्यायक विरोध मे हथियार उठा लेने रहै। शासन-प्रशासनक नजरिया एहि बारे मे की आ केहन रहलैक अछि, से ककरो सँ नुकायल नहि अछि। मुदा, नागार्जुनक की नजरिया रहनि?  संबलपुर विश्वविद्यालयक छात्रावास मे श्रीकाकुलम के लड़ाका सब सँ भेंट भेला पर ओ ई कविता लिखने रहथि--

'मैं तुम्हारा ही पता लगाने के लिए

घूमता फिर रहा हूँ

सारा-सारा दिन : सारी-सारी रात

आगामी युगों के मुक्ति-सैनिक, कहाँ हो तुम? 

निपीड़ित-शोषित मानवता के उद्धारक, कहाँ हो तुम?

आओ, सामने आओ बेटे!

मैं तुम्हारा चुम्बन लूँगा

मैं तुम्हें अपना चुम्बन दूँगा।'

           मुदा हुनकर एहन कविता सभक एक पक्ष आर अछि। निर्बल कें बल दियय, हारल कें जितबाक भांज बताबय, भटकल कें दिशा देखाबय, हिया हारल कें आत्मीय उत्साह दियय-- सीधा-सीधा अभिधा मे-- एहनो कविता नागार्जुन लग मे बहुत छनि। एहने एकटा कविता सँ एहि अध्यायक समापन करब नीक हेतै-- 'ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या!'--

          'ऐसा भी तन क्या!/ ऐसा भी देह क्या!/ सह न सके--/ शीतातप-वृष्टि-उमस../ पुलक, पसीना/ प्रभंजनी वात्याचक्र/ चरम ठिठुरन, हड़कम्प/ लू के थपेड़े, विघूर्णन.../ सह न सके, आँतों की मरोड़/ ऐसा भी देह क्या!/ ऐसा भी तन क्या!

         ऐसा भी मन क्या!/ ऐसा भी बुद्धि क्या!/ कर न सके प्रपंचों का छेदन-भेदन.../ घबराए जरा-जरा बातों में/ अकारण बिदके, पग-पग पे रूठ जाए/ पहन ले दम्भ का मुकुट/ पचा नहीं पाए ग्लानि और अपमान/ ले नहीं पाए प्रतिशोध/ क्षमा ही क्षमा करता चला जाए.../ ऐसा भी बुद्धि क्या!/ ऐसा भी मन क्या!

         ऐसे भी हम क्या!/ ऐसे भी तुम क्या!/ रूठ जाएँ पग-पग पे/ पग-पग पे मान जाएँ/ सोंधते रहें जुगत भीतरघात की/ कदर नहीं करें दिन की, रात की/ पल-पल खोते चलें/ छिन-छिन रोते चलें/ औरों की सिद्धि पर सिर धुनें/ दूर की ढोल पर गप्प ही गप्प बुनें/ आज के काम टालें कल पर/ तर्क ही तर्क करें--/ सीप की चमक पर, छायामय जल पर/ ऐसे भी हम क्या!/ ऐसे भी तुम क्या!।'

       गौर करबाक बात छैक जे कविताक शुरू मे जे देह आ मन एलैए, से ककर थिक? ओ के थिक जकरा आदर्श मानि कहल गेलैए जे मनुक्ख कें ओहन हेबाक चाही। ओ श्रमशील सभ्यताक मनुक्ख थिक, जे देश के उत्पादक वर्ग थिक, कहल जाय जे वास्तव मे देश वैह थिक। कते विलक्षण, कते ठोस हकीकत के बात थिक जे बौद्धिक श्रमक समतुल्य शारीरिक श्रम कें नागार्जुन राखि रहल छथि आ श्रमिक वर्ग कें बौद्धिक वर्गक समतुल्य मनुष्यता के गरिमा स्थापित करैत छथि। एहि कविता मे देह, मन, बुद्धि आ जीवनशैली के आधार पर जकरा ओ आदर्श मानै छथि, असल मे वैह हुनकर अन्तर्तम छनि, वैह ओ स्वयं छथि। अपन सम्पूर्ण लेखन मे ओ ओकरे प्रमाण मानलनि अछि, ओकरे बात कहलनि अछि।



           

'अगर कीर्ति का फल चखना है

कलाकार ने फिर-फिर सोचा--

आलोचक को खुश रखना है


अगर कीर्ति का फल चखना है

आलोचक ने फिर-फिर सोचा--

कवियों को नाथे रखना है।'

-- तें, हमसब पबैत छी जे जाहि कालखंड धरि दिनकर वा अज्ञेय अपना-अपना मठक मठाधीश भ' चुकल रहथि, ताहू समय धरि नागार्जुन एक गाम-शहर सँ दोसर गाम-शहर मे बौआइत नवतूरक कवि लोकनि के संगोर करैत, प्रगतिशील कविताक मानक पर चर्चा-परिचर्चा करबैत, भिन्न-भिन्न जनान्दोलन मे सदेह शामिल भ' क' अपन जनान्दोलनी कविता सभक पाठ करैत देखल जा सकैत रहथि। हुनकर कविताक स्वभाव पर आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय जे लिखने छथि, तकरा ठीक सँ अख्यास करबाक जरूरति छैक-- 'सब कुछ भोगते हुए और सबसे बँधकर भी सबसे बाहर आ खड़े होने का साहस नागार्जुन में था। कविता की शाश्वतता की उन्हें चिन्ता नहीं रही। जो चीजें जनता को उलझातीं, भीरु बनातीं, शोषित-पीड़ित करतीं, नागार्जुन की कविताएँ उनका हिम्मत के साथ विरोध करती थीं। उनकी कविता का जो राग-पक्ष है, वह भी आत्म-राग न होकर लोक-राग है। उनके भीतर महाकरुणा का निवास है, जो आत्मवंचना से नहीं, आत्मपीड़न की पराकाष्ठा से ही संभव होता है।'

            

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