तारानंद वियोगी
उन्नीस जून की तारीख आती है, और हमारा पूरा इलाका ग़म में डूब जाता है। इस भारी अफसोस के साथ कि उनके जीते जी हम उन्हें पहचान नहीं सके। विदा होने के पहले उन्होंने देर तक आवाज लगाई थी, मगर कहीं से कोई जवाब नहीं आया। नागार्जुन ने 'जनयुग' साप्ताहिक के अपने स्तम्भ 'यत्किंचित्' में तीस जून 1967 को यह जो लिखा था कि '19 जून को राजकमल चौधरी का देहावसान हो गया।... दर-असल वह ज्यादा जीना भी नहीं चाहता था।' -- राजकमल से बेहद जुड़े होने के बावजूद उन्होंने आधा ही सच लिखा था। आदमी की भी क्या नियति है! जिससे बेइंतहा नफरत करता है, यह भी साथ-साथ चाहता रहता है कि वह आकर मना ले। राजकमल अपने पिता से नफरत करते थे, लेकिन पिता के लिए ही तड़पते हुए मरे। मातृहीन उस बच्चे की कल्पना करें जिसके आदर्श उसके पिता हैं, लेकिन वह पिता को ही तोड़ डालना चाहता है। मरते वक्त उनकी आयु अड़तीस के करीब थी, लेकिन भीतर वही एक बच्चा था जो प्यार के लिए तड़पता रहा था। उनका लिखा जो भी साहित्य आज हमें उपलब्ध है, कह लें कि वह इस सबके 'बावजूद' है।
राजकमल ने हिन्दी और मैथिली में जो भी कुछ लिखा, अपने लिखे को उन्होंने कभी पढ़ा तक नहीं। लगा कि बात जम गयी है, तो लिफाफे में बन्द कर संपादक को भेज दिया, नहीं जमी लगी तो फाड़कर फेक दिया। अपने ही लिखे को पढ़ने तक की फुरसत जिसे नहीं हो, वह बेचैन आत्मा उनके भीतर थी। मुश्किल से आठ साल का समय उन्हें मिला, इसी में उन्होंने अपने लिखे से हाहाकार मचा दिया, जिसे कुछ लोग चकाचौंध भी कहते हैं।उन्हें निकट से देखने वाले उपेन्द्र चौधरी ने मुझे दावे से बताया था कि पच्चीस-तीस साल उन्हें अगर मिल जाते तो रवि ठाकुर के बाद वह दूसरे लेखक होते जो नोबेल जीत सकता था।
जीवन को देखने का उनका नजरिया बिलकुल ही अलग था। तमाम दृश्यों के बीच जो केन्द्रक काम कर रहा होता, वह सीधे उसी को पकड़ते थे। लेखकों को आम तौर पर इसकी आदत नहीं होती। वे दृश्यावलियों में उलझकर रह जाते हैं। दृश्य यदि तमाम वर्जनाओं से भरे मिलें तो जाहिर है, वे नाराज होते, हल्ला मचाते, लेकिन यह भी स्वीकार नहीं कर सकते थे कि वे असल में समझ ही नहीं पाए। राजकमल के लिए साथी लेखकों से कहीं ज्यादा उनके पाठक मूल्यवान थे। यह बात उन दिनों भी बहुत-से लोगों ने कही थी, और आज भी कहते हैं कि वह समय के काफी पहले आ गये थे। आप उस वर्तमान की कल्पना करें जिसमें भविष्य आकर विचरण कर रहा हो, और समूचे आभामंडल को चकाचौंध में डाल देता हो।
राजकमल का लगभग समूचा कथा-साहित्य स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के बारे में है। एक ऐसा विषय जिसकी चर्चा जाने कितने पहले से होती आई है, और न जाने कबतक होती रहेगी। सभी मानेंगे कि यह एक गहन विषय है। स्त्री-विमर्श का तब कोई चलन नहीं था। कहना चाहिए कि वह लगभग उसी त्वरा में स्त्री की ओर से बोल रहे थे, जैसे मिथिला के विद्यापति कभी बोले थे। उन्होंने मानो आँखों में उँगली डालकर यह दिखाने की कोशिश की कि चाहे सम्भ्रान्त घर की बहुएँ हों या सोनागाछी की वेश्याएँ, दोनों समान रूप से संतापित हैं। मर्दवादी सोच कितनी छिछली होती है, अर्थतन्त्र किस तरह मानवीय सम्बन्धों को तहस-नहस करता है, सामन्तों ने बाद को नेता का भेस धरकर किस तरह भारत की आत्मा को खोखला किया-- कितनी ही बातें हैं जो उन्हें मथित किये रहती थीं। ढहते सामन्ती अवशेषों को उनकी मैथिली कहानियों में बहुत प्रामाणिकता के साथ सुना जा सकता था।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जो महान आदर्श थे, उसने दूर तक राजकमल के कविव्यक्तित्व को प्रभावित किया था। लेकिन, उन आदर्शों के टूटने बिखरने की धमक राजकमल की तमाम कविताओं में पाई जाती है। इसलिए उनका जो कवितावाचक है, वहां एक टूटन भी है और दिशाहारापन भी, भले ही वह दुनिया को बदल डालने की मंशा रखता है। राजनीति उनकी कविताओं का एक जरूरी एंगल है। यह अलग बात है कि उनमें विचारधारागत स्पष्टता का अभाव है। यह हमें उनकी हिन्दी कविताओं में ज्यादा साफ दिखता है। अपनी मैथिली कविताओं में वह एक उप राष्ट्रीयता भी रखते पाये जाते दीखते हैं, जो कि उनका मैथिलत्व है। राजकमल का कवितावाचक एक बौद्धिक युवा है। यह मैथिली के लिए नई चीज थी। यात्री का कवितावाचक ग्रामीण किसान था।
अपनी जिस आवेगभरी भाषा के लिए वह जाने जाते हैं, वह गद्य और कविता दोनों में ही अपना कमाल दिखाती है। सामाजिक सरोकार उनकी कहानियों में ज्यादा स्पष्ट हैं। सामंतवाद का विरोध भी, और लैंगिक गैरबराबरी के खिलाफ गुस्सा भी। कहानियों के विषय उन्होंने ऐसे चुने जो समकालीन साहित्य की एक बड़ी रिक्ति भरते थे, और पाठक को एक नये संसार के सामने ला खड़ा करते थे। एक ऐसा संसार, जिसके बारे में या तो वह बहुत कम जानता होता था, या फिर इस तरह कभी सोचा तक नहीं होता था।
राजकमल की कही वह बात मुझे नहीं भूलती कि इतने लोगों ने इतने समय से, इतनी भाषाओं में कहानियां लिख लीं और लिख रहे हैं कि नया या मौलिक कथानक तो अब हमें मिलने से रहा। अपनी अज्ञानता में मौलिकता का दंभ हम चाहे लाख भर लें। अब तो शैली ही एक बच गयी है जो हमें अपने समकालीनों में अलग दिखा सकेगी। अपनी आवेगमयी भाषा में शैली का उन्होंने ऐसा चमत्कार रचा कि उन लोगों की बात को यूं ही उड़ा देना आसान नहीं है, जो राजकमल को कहानीकार के रूप में ज्यादा सफल पाते हैं। शैली को लेकर यह कहने की हिम्मत करना भी राजकमल जैसे रचनाकार के लिए ही संभव था, जिनके पास कन्टेन्ट मँडराए फिरते थे।


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