तारानंद वियोगी
मिथिलाक विद्वत्-समाज डाॅ. जयधारी सिंह कें एक गंभीर विशेषज्ञ विद्वान तथा काव्यशास्त्रक पारंगत समालोचकक रूप मे विगत शताब्दीक छठम दशक सँ जनैत रहल अछि। आचार्य रमानाथ झाक एहन योग्यतम शिष्यक रूप मे हुनकर ख्याति छनि जे आचार्यक यश कें सर्वाधिक पसारलनि। डाॅ. सिंहक प्रख्यात कृति 'बौद्धगान मे तांत्रिक सिद्धान्त' (1969) शोध-कृतिक एक एहन मानक रचलक, जकर महत्व ताहू दिन मे महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज आ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी सन असंदिग्ध महापंडित स्वीकार कयने छला। एते वर्ष बीति गेलाक बादो, आ हजारन मैथिली शोध-प्रबन्ध लिखायल जेबाक बादो, आइयो एहि प्रख्यात कृतिक प्रतिमान अपना जगह पर मौजूद अछि, जतय धरि हमरा ज्ञान अछि, एहि सँ आगाँ क्यो नहि बढ़ि सकल छथि।
मैथिली साहित्यक जाहि कालखंड कें मैथिल विद्वान लोकनि सर्वाधिक तमासावृत्त मानै जाइ गेला अछि, जयधारी बाबूक महत्व एहि बात सँ बूझल जा सकैत अछि जे ओही तमसावृत्त कालखंड--सिद्ध-साहित्यक रचनाकाल-- पर ओ अपन शोधकृति लिखने छला। मिथिला मे आ बाहरो, एहि विषयक विशेषज्ञक रूप मे हुनकर ख्याति सबदिन बनल रहलनि। अनेक अवसर पर अपन ज्ञान सँ ओ मैथिलीक पीढ़ी-दर-पीढ़ी कें एहि कालखंड आ एहि मे लिखल कविताक पृष्ठभूमि आ आशय सँ परिचित करबैत रहला। संगोष्ठी मे परचा पढ़ल, विद्वान लोकनिक बीच भाषण केलनि, आकाशवाणी पर आलेख प्रसारित केलनि। सिद्ध-साहित्य पर लिखल हुनकर एहन किछु वस्तु कें एहू पुस्तक मे देखल जा सकैत अछि।
मिथिलाक परिसर मे दोसर जाहि गुणक कारण जयधारी बाबू कें बेस महत्व देल जाइत छनि, ओ थिक हुनकर अप्रतिम काव्यशास्त्रज्ञ हैब। भारतीय काव्यशास्त्रक संगहि पाश्चात्य काव्यशास्त्र पर सेहो हुनकर कतेक मजगूत पकड़ रहनि तकर प्रमाण थिक दू खंड मे प्रकाशित हुनकर कृति-- 'काव्य-मीमांसा' (1962)। ई पुस्तक जे अहाँक हाथ मे अछि,तकर परिशिष्ट मे छपल पुस्तक 'गोविन्द-काव्यालोक' (1958) सँ सेहो हुनकर काव्यशास्त्रक मर्मज्ञ हेबाक थाह पाओल जा सकैत अछि। मुदा हमरा कह' दिय' जे इहो सब कथू हुनकर मर्मज्ञताक मात्र किछु अंश थिकनि। 'काव्य-मीमांसा' पूरा केलाक बाद हुनकर मन मे ई कसक जागल छलनि जे ई मीमांसा तँ मात्र सैद्धान्तिक पक्षक भेल जे प्रमुखत: काव्यशास्त्रीय तत्व सब पर आधारित अछि। हुनका भीतर जतबा भीजल रहनि संस्कृत काव्यशास्त्र, पाश्चात्य काव्यशास्त्र सेहो ततबे भीजल रहनि। कसक ई बनल रहलनि जे मौलिक रूप सँ जकरा मैथिली समालोचनाशास्त्र कहल जा सकय, से ओ नहि लिखि सकला अछि। आ, बाद मे हमरा लोकनि देखल जे ठीक एही नाम-- समालोचनाशास्त्र-- नाम सँ ओ एक पुस्तक लिखलनि जे मैथिली अकादमी सँ प्रकाशित अछि। व्यापकता मे समालोचनाक बारे मे जे हुनकर मान्यता छलनि, ताहि हिसाबें आधुनिक मैथिली साहित्यक आलोचना लेल संस्कृत काव्यशास्त्र पर्याप्त नहि रहय, अपितु पाश्चात्य परंपरा सँ किछु आवश्यक तत्व लेनाइ अपरिहार्य छल। पाश्चात्य समालोचक आइ.ए.रिचाॅर्ड्सक विचार हुनका सर्वाधिक उपयोगी प्रतीत होइन। रिचाॅर्ड्सक मान्यता छल जे आधुनिक साहित्यक समालोचन लेल असकरे साहित्यविद्या सक्षम नहि अछि, आ एहि लेल मानवविज्ञान, समाजशास्त्र आ मनोविज्ञानक सहायता लेब अपरिहार्य अछि। ओ स्पष्टत: समालोचनाक दू पक्ष-- सैद्धान्तिक आ व्यावहारिक-- मानलनि आ व्यावहारिक समालोचन लेल मानविकीक अन्यान्य शास्त्र सभक सहयोग लेल प्रयोजनीय बतौलनि। कलावादी पाश्चात्य शास्त्रकार ब्रेडलेक मत सँ जयधारी बाबू स्पष्ट असहमति व्यक्त करैत आवश्यक बतौलनि जे कला, केवल कलाक लेल होअय से सर्वथा त्याज्य थिक। आ, कला कें सदति जीवनक लेल प्रयोजनीय हेबाक चाही। अपन निबन्ध 'आलोचनाक स्वरूप' मे ओ लिखलनि-- 'जीवन सँ संबद्ध रहनहि ई संभव जे कविक कोनो रचनाक बोध दोसर व्यक्ति कें भ' सकतनि।... अन्य व्यक्तिक सौन्दर्यबोध कें कवि कोना जगा सकताह जँ हुनका संग बोधक स्तर पर मीलि नहि सकताह? जीवनक विस्तृत रहस्यमय अनुभवक क्षेत्र मे कतहु-ने-कतहु कवि-आलोचक अवश्य मीलि जाइत छथि तें कोनो पाठक कें विशेषता कविविशेषक, आलोचकविशेष कें बुझबा मे आबि जाइत छनि।'
जेना कि पहिनहि कहि आयल छी, अपन ज्ञानक विषय सब पर प्रकाश देबाक लेल ओ समय-समय पर संगोष्ठी, व्याख्यान आ आकाशवाणी वार्ता आदिक उपयोग करैत रहैत छला। एहि संग्रह मे हुनकर किछु एहने सामग्री सब संकलित कयल गेल छैक। एहि निबन्ध सब मे हमसब जयधारी बाबूक ज्ञानक विशदता तथा संप्रेषणक निपुणता नीक जकाँ देखि सकैत छी।
एहि संग्रह मे आधुनिक समालोचना पर जयधारी बाबूक तीन निबन्ध संगृहीत अछि। एकरा पढ़ने सँ स्पष्ट भ' जायत जे ओ अपन बात कहबाक लेल कतेक भीतरी स्तर धरि जाइत छथि। कोनहु रचनाकार जीवन मे सन्हियायल चेतना कें कोना अपन रचना मे उतारि पबैत छथि? ओ कहै छथि, एहि प्रक्रियाक दू चरण होइत छैक-- ज्ञानेन्द्रिय सँ प्रत्यक्ष अनुभव तथा ओहि अनुभवक स्मरण। ओ विवरण दैत छथि जे जखन कलाकार जागतिक वस्तुक संपर्क मे रहत तखनहि, मात्र तखनहि टा ज्ञानेन्द्रिय सँ कोनो अनुभव प्राप्त कयल जा सकैत अछि। ओही ठाम ओ एहू प्रश्न पर विचार करैत छथि जे साहित्य मे व्यक्त कलाकारक अनुभव चेतनाक स्तर पर तलस्पर्शी भ' पाबय, तकर तीन गोट प्रक्रिया संभव छैक-- कि तँ ओ चेतना स्मृतिमयी होयत, अथवा कल्पनामयी होयत, अथवा प्रतिक्रियामयी होयत। ई स्मरणीय जे कल्पना निराधार हो तँ से साहित्यक लेल अनुपयोगी भ' जाइत छैक। जेना कि सामान्यत: कहि देबाक चलन अछि, कल्पना असीम नहि भ' सकैत अछि। ज्ञानेन्द्रिय सँ प्राप्त अनुभवक चेतना मे रूपान्तरक वास्ते जतबा योग कल्पनाक भ' सकैत हो, ततबे उचित बुझबाक चाही।
जयधारी बाबू साहित्य-लेखनक प्रक्रिया मे सर्वाधिक महत्व संप्रेषणीयता कें दैत छथि। ओ स्पष्ट क' क' बतबैत छथि जे काव्यक ओ अनुभूति जे कवि कें भेलनि आ जकरा ओ कलारूप मे अभिव्यक्त केलनि, ठीक-ठीक ओही रूप मे श्रोता वा पाठक कें भ' जाइन, ई कविक सब सँ पैघ दायित्व थिक। कविक अनुभूतिक्षेत्र आ श्रोता वा पाठक अनुभूतिक्षेत्र भिन्न-भिन्न भ' सकैत अछि, एहि स्थिति मे एहन रचनात्मक शैली कें कवि पकड़थि जे पाठकक पूर्वानुभव वा पूर्वज्ञान कें सक्रिय क' दैत हो, सूक्ष्म प्रक्रिया द्वारा अपन अनुभूतिक साधारणीकरण करथि, एहन बिम्बक रचना करथि, एहन प्रतीक वा रूपक ताकथु जाहि सँ पाठक कें ठीक-ठीक ओही अनुभूति-स्तर पर ल' आनि सकथि, जाहि पर रहि क' ओ कवि अपन रचना कयने छथि। एहि प्रक्रिया मे कविक बुतें दू तरहक गलती भ' सकैत अछि-- मूल्यहीन अनुभूतिक निर्दोष संप्रेषण अथवा मूल्यवान अनुभूतिक सदोष संप्रेषण। कहब जरूरी नहि जे दुनू स्थिति समान रूप सँ गड़बड़ अछि। साहित्यक असल काज मूल्यवान अनुभूतिक निर्दोष संप्रेषण थिक। कवि कें ने तँ मूल्य सँ समझौता करबाक सुविधा छैक, ने संप्रेषण सँ। एहि दुनू मे सँ कोनो जँ हूसल तँ ओहि रचनाक अवमूल्यन अवश्यम्भावी भ' जाइत छैक। एही बात कें जयधारी बाबूक शब्द मे कही तँ 'समालोचना दू स्तम्भ पर ठाढ़ अछि-- मूल्य आ संप्रेषण।' ओ इहो कहैत छथि जे रचनाक मूल्य वा मान्यता तँ युगानुसार बदलैत छैक, जीवनक मान्यता मे जेना-जेना परिवर्तन आयत, रचनाक मान्यता तहिना-तहिना बदलबाक लेल बाध्य रहत। जे कवि युगानुरूप अपना कें नहि बदलि पबैत छथि, हुनकर अप्रासंगिक भ' जायब सेहो अवश्यम्भावी अछि। मुदा, मूल्य सँ कतहु बेसी संप्रेषणक खगता छैक, से खाहे पुरान युगक कवि रहथु वा आधुनिक युगक। अपन निबन्ध 'आधुनिक समालोचना: तत्व तथा संभावना' मे हुनका, मूल्य सँ कतहु बेसी संप्रेषणक उपेक्षा सँ चिन्तित देखल जा सकैत छनि। हुनकर जे चिन्ता छनि, तकरा समस्त सचेत रचनाकारक समवेत चिन्ताक रूप मे देखल जा सकैत अछि-- 'संप्रेषणक भविष्य मूल्यहुक भविष्य सँ अधिक अन्धकारमय प्रतीत होइत अछि। कारण अछि कविक ओहि शब्द-सामर्थ्यक कमती, जाहि सँ ओ ताहि रूपक शब्द-ध्वनिमय रचना रूप मे कविता कें ठाढ़ क' सकथि जे अपन आह्लादक रूप मे श्रोता कें हठात अपना दिस घीचि लेथि।'
अपन निबन्ध 'साहित्यक गतिविधि आओर साहित्यकारक दायित्व' मे तँ ओ आरो बेसी आगाँ धरि गेलाह अछि। एहि ठाम ओ साहित्य कें दू वर्ग मे बँटैत छथि-- लिखित साहित्य आ उक्त (बाजल गेल) साहित्य। हुनकर वीजन पर कने गौर कयल जाउ। मिथिलाक जे जातीय साहित्य अछि, जकर निर्माण हजार बरस सँ चलि रहल अछि, एकर बहुलांश लिखित नहि, अपितु 'उक्त साहित्य' थिक। डाकवचन, लोकगाथा, लोकगीत, उक्ति-विधाक रचना जकरा फकड़ा कहल जाइक, आदि-आदि। हँ, 'उक्त' साहित्यक भीतर कोनो गोष्ठी मे सुनाओल गेल रचना सेहो आयत। जयधारी बाबू कहैत छथि-- 'उक्त वा लिखित कोनो शब्द श्रोता वा पाठक कें लक्ष्य कए प्रयुक्त होइत अछि, जँ सुननिहारे नहि, तँ बाजल की जाएत? आ जँ पाठके नहि, तँ लिखल की जाएत?... ध्यान दए ई देखए पड़त जे वक्ता कोना अपन भावना कें श्रोताक कान द्वारा हुनक मस्तिष्क मे पहुँचाए हुनका सहभागी बनबैत छथि, आ यैह स्थिति रहैत अछि लेखक-पाठकक मध्य।' जयधारी बाबू ओहि कोटिक आलोचक छथि जे संप्रेषण कें एकान्तत: लेखकक दायित्व मानैत छथि आ साफ कहै छथि जे कविक भावना जँ श्रोता वा पाठक नहि बुझलक तँ एकर समस्त जिम्मेदारी कवियेक जड़ता पर छै। राजशेखरक प्रसिद्ध सूक्ति कोट कयने छथि-- वक्तुरेव हि तज्जाड्यं श्रोता यन्नाभिगम्यते। सुननिहार जँ ग्रास्प नहि क' सकल, तँ एकर दायित्व बजनिहारक मूर्खते कें मानबाक चाही।
मुदा, एहि ठाम हमरा एहू बातक उल्लेख जरूरी बुझाइत अछि जे सब ठाम वक्तेक जड़ता संप्रेषणक लेल बाधक हो, सेहो जरूरी नहि होइत छैक। जतय संप्रेषणक वस्तु भावना हो, ततय तँ मानि ली जे वक्ताक मूर्खता कारण होइत छैक, मुदा वस्तु जखन शास्त्रीय वा बौद्धिक हो, तँ एहि मूर्खताक किछु जिम्मेदारी श्रोता पर सेहो आबि जाइत छैक। स्वयं जयधारी बाबूक एहि लेख सब कें जखन पाठक पढ़ता तँ संभव छै जे किछु लोक कें किछुओ समझ मे नहि आबनि। आचार्य रमानाथ झा लिखि गेल छथि जे आलोचना जें कि एक शास्त्र थिक, सर्वदा एकर लेखन विहित शब्दावली आ शैली मे कयल जाएब अनिवार्य थिक। जयधारी बाबूक मान्यता सेहो एहि सँ अलग नहि छनि। शास्त्रक बात कें बुझबाक लेल पूर्वबोध आवश्यक होइत छैक। जँ अहाँ कें ओहि विषयक आरंभिक ज्ञान नहि रहत तँ अहाँ विषय कें बुझि नहि पेबै वा ओकर पूरा आनंद नहि ल' सकबै। एम्हर आबि क' चलन मे आएल अछि जे जाहि विषय कें आलोचक लिखि रहल होइत छथि, तकर आवश्यक पूर्वबोधक उल्लेख सेहो क' दैत छथि, जाहि सँ आलोचना अधिकाधिक पाठकक लेल पठनीय आ उपयोगी बनि जाइत अछि। एकर चलनक श्रेय मोहन भारद्वाज कें जाइत छनि जे अपन आलोचना मे एहि चलन कें शुरू केलनि। रमानाथ झा आ जयधारी सिंह, दुनू गोटेक निबन्धक स्वभाव समान रूप सँ पूर्वबोधापेक्षी छनि।
जहाँ धरि आलोचकक दायित्वक प्रश्न छैक, ओकरा लेल संप्रेषण सँ बेसी आवश्यक छै रचनाक मर्मक उद्घाटन। जँ कोनो मूल्यवान रचनाक, मानि लिय' जे सात तह छैक, तँ आलोचकक दायित्व छैक ओहि सातो तह कें बेराबेरी खोलि क' समक्ष आनब। कोनो आयाम बचल नहि रहि जाय, तकरा देखब ओकर दायित्व छैक, ने कि ई जे हुनकर लिखल बात सब कें समझ आबि जाइन।
एहि बातक विश्लेषण करैत जयधारी बाबू संस्कृतक एक सुभाषित कें एकाधिक ठाम कोट केलनि अछि जाहि मे सहृदय आलोचकक विशेषता कें रोचक ढंग सँ कहल गेलैए। श्लोक थिक-- 'कविता-रसमाधुर्यं कविर्वेत्ति न तत्कवि:।/ भवानीभृकुटिभंगं भवो वेत्ति न भूधर:।।' कहल गेल छै जे कविताक रसमाधुर्य कें कोनो कविये बूझि सकैत अछि, मुदा ओ कवि तँ नहिये टा, जे एकरा लिखने छथि। मने जे कवि दू तरहक होइ छथि। एक, जे ई कविता लिखने छथि, आ दोसर ओ, जे कविता कें बुझलनि अछि। मने सातो तह खोलि क', सब आयाम मे। हम ओहि कवि कें द्वितीय स्थान देलियनि मात्र अइ लेल, जे आजुक पाठक कें समझ मे बात आबि सकनि। मूल सुभाषित मे हुनका प्रथम स्थान देल गेल छनि। आ, अलंकार मिला क' दृष्टान्त कते सटीक देने छथि, से देखियौ। पार्वती के भृकुटिभंग, मने कनखी कें महादेवे बुझि सकै छथि, ने कि पर्वतराज स्वयं जिनका कि पार्वती कें जन्म देबाक श्रेय छनि। बात तँ सही छै, कोनो स्त्रीक इशारा कें, चाहे ओ आनंदक हो कि रुष्टताक, ओकर प्रेमी बुझि सकैत अछि, जेना कि एतय महादेव। ओकर पिता, भने ओ जन्मदाताक गौरव धारण करैत होथि तैयो, ई बुझब पिताक बुत्ताक बात नहि थिक।
बड़का प्रश्न एतय ई छै जे सुभाषितकार स्वयं कवि कें एतेक अयोग्य किएक बुझै छथिन? हमर अनुमान अछि जे अयोग्य नहि, हुनको योग्ये बुझैत छथिन, मुदा दोसर अर्थ मे। पार्वती सन बेटी कें तैयार करब एकटा बड़ पैघ काज छियै। दोसरेक बेटी पार्वती किए नै भेलखिन जे हिनके बेटी भेलनि? योग्यता तँ छनि, पैघे छनि। मुदा एकर ई मतलब नै जे ओ पार्वतीक भृकुटिभंग कें सेहो बुझि जाथिन। ई हुनकर काज नहि छियनि। तात्पर्य ई छै जे लिखनिहार कवि कोनो एक आयाम कें बिचारि क' लिखने रहैत छथि। मुदा कविता जें कि एक कला थिक, ओहि कलारूप मे ई आयाम घटित होइते औरो और कते आयाम स्पर्शित भ' गेलैक, प्राय: तकर थाह स्वयं रचयिता कवि कें नहि रहैत छनि। सुभाषितकारक समाने जयधारी बाबूक सेहो ई मानब रहनि जे आलोचकक काज कवि सँ बेसी व्यापक काज छिऐक।
प्राय: यैह कारण थिक जे स्वयं प्राध्यापक होइतो जयधारी बाबू सब दिन मैथिलीक 'प्राध्यापकीय आलोचना' सँ असहमत रहलाह। साहित्यक तथ्य-सत्य बुझबाक लेल एहि पेशेवर लोकनि कें निहायत अक्षम मानलनि। एहि वर्गक सीमा कें देखार करैत आम पाठक सँ, आलोचको सँ, प्रश्न करैत छथि-- 'प्राध्यापकीय आलोचना मात्र मे कतेक दिन धरि घुरिआएल रहि जाएब, गनल-गूथल पाठ्यपुस्तक मात्र पर आलोचनाक आवृत्ति सँ मन कें अकछबैत रहि जाएब?'
रुचिक प्रश्न आलोचनाक एक प्रमुख पक्ष थिक। रमानाथ बाबू लिखलनि अछि जे कोनो आलोचक कोनो कवि कें कतेक प्रयोजनीय मानताह, से बात आलोचकक रुचि पर निर्भर करैत छैक। एहि बात मे जयधारी बाबू नब बात ई जोड़ैत छथि जे पाठकक रुचिक परिष्कार करब जँ आलोचकक एक महत्वपूर्ण कर्तव्य छैक, तँ ततबे महत्व एहू बातक अछि जे आलोचक अपनो रुचिक संवर्धन आ परिष्कार करैत चलथु। ई निश्चय एक व्यापक आ लोकतांत्रिक बात भेलैक। ओ मानैत छथि जे निरंतर नव-नव साहित्यक पठन सँ, पठनक अभ्यास सँ रुचिक संवर्धन आ परिष्कार होइत छैक। तहिना हुनकर इहो कहब छनि जे दू आरो प्रक्रिया सँ संवर्धन आ परिष्करण संभव होइत छैक-- अपूर्ववस्तु निर्माणक्षमा प्रज्ञा सँ, आ दोसर, संसारक व्युत्पत्ति सँ। संसारक व्युत्पत्ति सँ तात्पर्य छनि जे देश-विदेश मे जे किछु आइ घटित भ' रहल छैक तकर विश्लेषण करब। ई आम तौर पर आलोचकक ओते नहि जते कविक दायित्व मानल जाइत छैक। तहिना, जे अपूर्ववस्तु अछि-- आइ सँ पहिने कोनो कविक ध्यान ओहि वस्तु दिस नहि गेलनि अछि-- तेहन वस्तुक निर्माण करबाक क्षमता सँ परिपूर्ण प्रज्ञा। स्पष्ट रूप सँ ई सृजनात्मक लेखन केनिहार कविक कर्तव्य भेलै। मुदा, एक आलोचक सँ जखन ओ एहि गुण मे पटु हेबाक माँग करैत छथि, तँ निश्चित रूप सँ ई माँग आलोचना कें प्राध्यापकीय ढाँचा सँ बाहर निकालि एक सृजनात्मक विधाक दरजा देबाक माँग थिक। आगू मैथिली मे हमरा लोकनि देखल जे सृजनात्मक लेखन मे पटु लेखक-कविये बेसी नीक आलोचना लिखबा मे सफल भ' सकला। उदाहरण अनेको भेटि सकैत अछि। राज मोहन झा, भीमनाथ झा, कुलानंद मिश्र, हरे कृष्ण झा, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास आदि एकर स्पष्ट उदाहरण छथि। मुदा, जतय धरि एहि नव घटना कें पहिल-पहिल बेर विचारणीय बनेबाक प्रश्न अछि, तँ तकर श्रेय निश्चित रूप सँ जयधारी सिंह कें देल जेबाक चाही।
एहि विषय मे एहने एक आर महत्वपूर्ण प्रश्न ओ प्राचीन बनाम आधुनिक कविता कें ल' क' उठौलनि अछि। एहि ठाम कविताक तात्पर्य समुच्चा साहित्यिक कार्य कें बुझबाक चाही। मैथिलीक प्राचीन काव्य दृश्य-श्रव्य (audio-visual) होइत छल। कवि अपन रचना दरबार मे सुनबथि कि गोष्ठी वा मंडली मे, हरेक मामला मे यैह होइक जे साक्षात रूप सँ ओहि प्रस्तुति कें देखल-सुनल जाइत छल। प्रिन्टिंग प्रेसक आविष्कारक बाद मामला पूराक पूरा बदलि गेल। आब श्रोताक बदला एक नव वर्ग आएल जकरा पाठक कहल गेल। कविता आब केवल सुनबाक, वा देखबा-सुनबाक वस्तु नहि रहल, ओ पढ़बाक वस्तु सेहो भ' गेल। आधुनिक कविता सँ एतय तात्पर्य मुद्रित कविता सँ छैक। जयधारी बाबूक ध्यान एहि ठाम दू स्थिति दिस जाइत छनि। एक तँ ई भेल जे पहिनेक भावात्मक हेबाक सीमा आब बौद्धिक हेबाक दूरी धरि व्यापक भ' गेल। पुस्तक द्वारा बौद्धिक ज्ञान-विनिमय सुविधाजनक भ' गेल। किन्तु दोसर जे भेल, से नकारात्मक छल। स्वयं हुनके शब्द मे 'सहज काव्यानुभूति सन सुलभ अनुभूति बासि ज्ञानमय पुस्तकस्थ वर्णन द्वारा अनेक स्थल मे कठिनतरे बनि' गेल।' एहना स्थिति मे, साहित्यकार (जाहि मे कवि आ आलोचक दुनू अबैत छथि)क दायित्व ई भ' गेल जे 'पुस्तकीयहु रचना कें ततेक प्रसादमय बना देथि जे पढ़लहु सँ ओएह आनंद भेटए जे श्रवण वा दर्शन सँ भेटैत रहल अछि।' मुदा ई दायित्व-निर्धारण करितहु जयधारी बाबू एहि बात सँ सशंकित छथि जे ई आसान काज नहि थिक। जीवनजगत आ तकरा सँग मानवीय सम्बन्ध स्वयं मे ततेक रहस्यमय अछि जे एकरा एक सीमे धरि आसान वा प्रसादगुणमय बनाओल जा सकैत अछि। तहिना प्रकृति, ओकर वाह्य आ अंतरंग रूप, तकर मानव-हृदय संग सम्बन्ध-- ई सब कथू साहित्यक विषय थिक जे बहुत आसान नहि, रहस्यमय हेबाक कारण क्लिष्ट आ संश्लिष्ट अछि। एहन स्थिति मे हुनकर ध्यान नवीनतम वैज्ञानिक आविष्कार सभक दिस जाइत छनि। आडियो रिकाॅर्डिंग, वीडियो रिकाॅर्डिंग आदिक उल्लेख करैत ओ नवयुगक आवश्यकता बतबैत छथि जे पुन: साहित्य कें जतय धरि संभव हो, पुन: दृश्य-श्रव्य माध्यमक द्वारा प्रस्तुत कयल जाय। एक एहन आलोचक, जे अपना कें 'समालोचक' कहबेनाइ अधिक सुविधाजनक मानैत छथि, रमानाथ झाक शिष्य छथि जे अपन प्राचीनताक प्रति पक्षपात कें अपन स्पष्ट सीमा मानैत रहथि, नवीन आविष्कृत माध्यम सभक द्वारा भाव आ ज्ञान दुनूक विनिमयक पैरवीकार छथि, स्पष्टत: ई हुनकर आधुनिकता छियनि, जकरा हुनकर स्पष्ट भविष्य-दृष्टिक पहचान मानि सकैत छियनि, जखन कि ठीक यैह बात साफ-साफ हुनक गुरु रमानाथ झाक लेल नहि कहल जा सकैत अछि।
हमरा लोकनि अन्यान्यो ठाम, आनो आन प्रसंग मे हुनकर आधुनिकता आ भविष्य-दृष्टि कें देखि सकैत छी।
एहि पुस्तक मे विद्यापति पर लिखल हुनकर तीन टा निबन्ध प्रस्तुत कयल जा रहल अछि। तीनू अपन महत्व मे एका पर एक। एकटा निबन्ध छनि 'विद्यापतिक पद मे संगीतक सौरभ'। ई वस्तुत: एक रेडियो-वार्ता थिक, जकर प्रसारण आकाशवाणी, दरभंगाक 'सौरभ' कार्यक्रम मे दिनांक 8.1.1977 कें कयल गेल छल। एखने हमसब हुनकर आडियो-भिजुअल प्रस्तुतिक सम्बन्ध मे हुनकर विचार सुनि रहल छलहुँ। एहि निबन्धक खास बात ई अछि जे मूलत: श्रव्य (Audio) माध्यमक लेल लिखल गेल छल। एहि ठाम ओ देखबैत छथि जे विद्यापति-पदावलीक स्पष्टत: दू पक्ष अछि। एक पक्ष साहित्यिक अछि जे शब्द-अर्थ-शैली पर आधारित अछि। दोसर पक्ष अछि जे ई सांगीतिक राग-ताल-लय मे निबद्ध अछि, आ देशी राग-रागिणी मे गेयता रखैत अछि। तें, जखन ओ कहैत छथि जे कतबो अध्यवसायपूर्वक जँ हमरा लोकनि विद्यापति-गीतक विवेचन-विश्लेषण क' ली, तैयो वस्तुत: ई पचासे प्रतिशत मात्र गुण कें देखार क' सकत, अवशेष पचास प्रतिशत छुटले रहि जायत। ई बात बुझबा योग्य अछि। हमसब अवगत छी जे प्राचीन स्रोत सँ विद्यापतिक जतेक जे पद उपलब्ध अछि, सब ठाम राग-रागिणीक निर्देश कयल भेटैत अछि। परंपरा सँ इहो तथ्य श्रुत अछि जे जयत नामक एक कुशल गायक विद्यापतिक पद सब कें गाबि क' प्रस्तुत करैत छलाह। इहो बात जानिते छी जे लोचन देशी राग-रागिणीक विचारक क्रम मे जखन तालक निर्देश करैत छथि तँ दृष्टान्तक रूप मे विद्यापतिक पद कें उद्धृत करैत छथि। एहि ठाम जयधारी बाबू कहैत छथि जे स्त्रीगण लोकनिक विलंबित लय मे जे विद्यापतिक गीत गाओल जाइछ, ताहि मे आलापक अभाव, आ तालक अनियमितताक कारण संगीतज्ञ लोकनि असंतुष्ट रहैत छथि। एतय ओ किछु चयनित पद कें उठा-उठा क' विश्लेषण करैत छथि जे विद्यापति-गीतक सांगीतिक वैशिष्ट्य की सब अछि। स्वाभाविके जे ओहि पद सब कें ओ दुनू तरहें गाबि-गाबि क' प्रस्तुत करैत छथि, राग-ताल-लयाश्रित रूप मे सेहो आ स्त्रीगण लोकनिक विलंबित भास मे सेहो। एकर पूर्ण महत्व तँ तखने ख्यापित भ' सकत जखन एहि वार्ताक आडियो-रिकाॅर्डिंग हमरा सब कें भेटि जाय। ओ साफ कहैत छथि जे मिथिलाक लोक-भासक प्राण अछि सहजता, सरलता आ लोकसंवेदना। दृश्य-श्रव्यकलाक बदला जँ चाक्षुष कलाक बात करी तँ ठीक यैह विशेषता हुनका मिथिला चित्रकला मे सेहो देखाइत छनि। संगीतक संदर्भ मे ओ कहैत छथि जे 'जे संगीत शास्त्रीय अध्ययन नहि कयने छथि सेहो मैथिलानीक गीत सूनि भावात्मक आह्लादक अनुभव करैत छथि, प्रत्युत अधिक गंभीर रूप मे, अधिक अन्तर मे डूबल सन भ' जाइत छथि, एकाग्रता सँ सूनि सूनि कविक उद्देश्य जेना रहैत छैक, तहिना तहिना भाव उठय लगैत छनि।' एहि संग्रहक सीमा थिक जे गेय स्वरक कोनो अधिक तथ्यात्मक प्रतीक जें कि साहित्य मे प्रचलित नहि अछि, तें एहन स्थल पर 'सस्वर' मात्र लिखि क' संकेत क' देल गेलैक अछि।
हुनकर एक निबन्ध छनि-- 'कीर्तिलता मे पुरुषक आदर्श'। एकर पहिल विशेषता तँ यैह थिक जे एतय ओ अपन गुरु आचार्य रमानाथ झाक स्थापनाक विरुद्ध अपन अभिमत व्यक्त करैत छथि। हमरा लोकनि अवगत छी जे विद्यापतिक पुस्तक-लेखनक पूर्वापर क्रम निर्धारित करैत रमानाथ बाबू हुनकर तीन कृति क्रमश: कीर्तिलता, गोरक्षविजय आ पुरुषपरीक्षा कें हुनकर परिणतवय, अर्थात पूर्ण परिपक्व अवस्थाक रचना मानलनि अछि। यद्यपि आन अनेक तथ्य, यथा कवित्वक काँचपन, कीर्तिलता कें विद्यापतिक परिणतवयक रचना मानबाक विरुद्ध जाइत अछि। मुदा, एकर उतारा दैत रमानाथ झा एकरा मध्यकालीन लिपिकार लोकनिक अयोग्यता सँ जोड़लनि अछि, जे कि साधारण साक्षर हेबाक कारण, आ अवहट्ठक भाषा-काठिन्यक दुआरे सेहो, एकर अशुद्ध प्रतिलिपि तैयार केलनि, जाहि कारण सँ ई कृति एक तँ दुरूह भ' गेलैक अछि, दोसर विद्यापतिक कवि-वैशिष्ट्य कें परखबा मे बाधा उत्पन्न करैत अछि। आन अनेक विशेषज्ञ जकाँ रमानाथ बाबूक विपरीत, जयधारी बाबू ई मानैत छथि जे 'कीर्तिलता' विद्यापतिक आरंभिक रचना छियनि। एहि लेख मे 'पुरुष'क जे आदर्श वर्णित भेलैक अछि, तकर चरम निदर्शन हमरा लोकनि कें 'पुरुषपरीक्षा' मे भेटैत अछि। वीरता कें विद्यापति पुरुषक अनिवार्यतम गुण मानैत छला। हुनकर स्पष्ट मान्यता रहनि जे 'धैर्यपूर्वक साहस करब वीरता थिक।' जयधारी बाबू विद्यापतिक अभिप्रेत कें स्पष्ट करैत कहैत छथि जे धैर्य आ साहस मे जे बाधा उत्पन्न करैत अछि से थिक फल पेबाक उत्कट प्रवृत्ति। 'फल दैवह आअत पुरिस कम्म साहस करिज्जइ' विद्यापतिक एहि उक्तिक आशय हमरा लोकनिक संस्कृति मे व्याप्त ई मान्यता थिक जे कर्म पुरुषक अधिकारिताक वस्तु होइछ जखन कि फल दैवायत्त, भाग्यक अधीन होइत अछि।
विद्यापति-विषयक सब सँ महत्वपूर्ण लेख छनि 'दुर्गाभक्तितरंगिणी : दुर्गापूजा पद्धति।' एहि ठाम ओ किछु एहन विशिष्ट दृष्टान्त राखि क' बात करैत छथि जे सर्वथा नवीन अछि, आ पैघो पैघ विद्यापति-विशेषज्ञ कें एहि बातक जानकारी प्राय: नहि छनि। निबन्धक आरम्भ बंगाली विशेषज्ञ डाॅ. शीतांशु शेखर बागचीक सँग भेल एक चर्चा सँ होइत अछि, जिनका सँ लेखक कें असंदिग्ध सूचना भेटलनि जे बंगाल मे जे आइ दुर्गापूजा होइत अछि से विद्यापतिक एही पद्धतिक आधार पर, जखन कि मिथिला मे एहि पुस्तकक सम्मान नहि अछि, मिथिलाक दुर्गापूजा एहि पद्धतिक आधार पर नहि होइत अछि। यद्यपि हमरा लोकनि अवगत छी जे मिथिलाक विद्यापति-विशेषज्ञ लोकनि कें सेहो बंगाल आ मिथिला सँ सम्बन्धित ई तथ्य बूझल रहनि। आचार्य रमानाथ झा आ पं. गोविन्द झा दुनू गोटे एहि तथ्यक उल्लेख अपन लेख सब मे कयने छथि आ एकरा लेल दुख व्यक्त कयने छथि। अस्तु, जखन जयधारी बाबू कें एक बंगाली विद्वान सँ उपराग-पुरस्सर ई सूचना भेटलनि तँ पहिल काज तँ ओ ई केलनि जे बंगाल दुर्गापूजा पद्धति मँगौलनि, आ दुर्भाभक्तितरंगिणीक पटल आ विधान सब सँ ओकर जाँच केलखिन। आजुक समय प्रचलित बंगला पद्धति पं. चिन्ताहरण चक्रवर्तीक लिखल छियनि। एहि पुस्तक मे एहि बातक कतहु उल्लेख नहि छैक जे ई पद्धति विद्यापतिक बनाओल छियनि, अथवा एकर आदि प्रायोजक विद्यापति छलाह। मुदा, जयधारी बाबू ई पौलनि जे हँ, सही मे बंगाली पद्धति विद्यापतिक दुर्गाभक्तितरंगिणी सँ पूरा मेल खाइत छैक। मधुबनी ड्योढ़ी मे प्रत्येक वर्ष दुर्गापूजाक आयोजन उत्सवपूर्वक होइत एलैक छैक। हुनका ख्याल एलनि जे एहि ड्योढ़ीक पूजा कोन पद्धति सँ होइत छैक, तकर जाँच कयल जाय। पूजाक भंडारघर मे कपड़ाक पोट मे पद्धति बान्हि क' राखल जेबाक नियम रहैक। जखन ओहि पोट कें ओ खोलि क' देखलनि, ओहि मे तीन गोट पोथा रहैक। हालपोथा नागरी लिपि मे लिखल छल, जखन कि सब सँ पुरान पोथा तिरहुता मे, जाहि पर लिपिकारक नामोल्लेख सेहो रहैक। ताहि मोताबिक समय-निर्धारण केलनि जे सब सँ पुरान पोथा सवा सय वर्ष (आजुक हिसाब सँ पौने दू सय वर्ष) पहिनेक लिखल छलैक। ओकरा देखलनि तँ प्रथमे पृष्ठ पर हुनका उल्लिखित भेटलनि जे ई पद्धति विद्यापतिक आधार पर बनाओल अछि, जखन कि तकरा बादक बनाओल दुनू प्रतिलिपि मे विद्यापतिक उल्लेख नहि कयल गेल रहैक। जयधारी बाबूक ई खोज कते भारी खोज छलनि, से आइ हमसब बूझि सकैत छी। एहि सँ ई स्थापित होइत छलैक जे नहि, मिथिला मे प्रचलित समस्त पद्धति मे विद्यापतिक उपेक्षा कयल गेल होइन, ई बात सही नहि अछि। एहि पुस्तक मे संगृहीत निबन्ध मे दुर्गापूजाक पटल आ विधान सभक विस्तृत चर्चा भेलैक अछि। कालान्तर मे विद्यापतिक पद्धतिक उठाब किएक मिथिला मे भ' गेलैक, तकर मूल कारण जयधारी बाबू शाक्त तंत्र कें मानैत छथि। वाममार्गीय पद्धति विद्यापतिक पद्धति सँ भिन्न छैक, आ सैह मिथिला मे बेसी प्रचलित रहल। मुदा, कौलिक विधानपूर्वक जतय कतहु दक्षिणमार्गीय पद्धति सँ दुर्गापूजा होइत छैक ततय आइयो विद्यापतियेक मार्ग कें अपनाओल जाइछ, कारण देवीपुराण, मत्स्यपुराण, लिंगपुराण, कालिकापुराण, भविष्यपुराण आदि मे जतय कतहु दुर्गापूजाक विधान छैक, तकरा विद्यापति सेहो प्रमाणक रूप मे दुर्गाभक्तितरंगिणी मे उल्लेख कयनहि छथि।
एहि पुस्तक मे तीन गोट निबन्ध सिद्धसाहित्य पर सेहो छैक। एहि तीनू कें एक संग देखने ओहि युगक सम्पूर्ण चित्र आँखिक सोझा आबि जाइत छैक। एक निबन्ध मे ओ सिद्ध लोकनिक दार्शनिक विवेचना कयने छथि। एहि ठाम वज्रयानी सहजमार्गी लोकनिक सामाजिक दर्शन तथा रहस्यमय साधना-पद्धतिक सेहो उल्लेख कयने छथि। यथावसर ओ सिद्ध लोकनिक काव्यभाषा, जकरा सन्ध्याभाषा अथवा सन्धाभाषा कहल जाइछ, के अर्थ-प्रक्रिया पर सेहो गप केलनि अछि। सिद्धसाहित्यक तीनू भेद-- डाकार्णव, दोहाकोश एवं चर्यागीत-- पर विस्तृत रूपें प्रकाश देल गेलैक अछि। जयधारी बाबूक ई तर्क जे बौद्ध तंत्र लुप्त नहि भेल, अपितु ज्ञान-साधना आ सन्तसाहित्यक जे आगामी प्रक्रम सब घटित भेल, ओहि मे अपना कें निमज्जित क' देलक, उदार हृदय सँ विचारित एक सटीक तथ्य थिक। अपन निबन्ध सब मे ओ देखौलनि अछि जे कोना ओहि समयक मैथिली साहित्यक इतिहास, केवल मिथिलेक नहि, सम्पूर्ण पूर्वांचलीय प्रान्तक भावना आ बौद्धिकताक इतिहास बनि जाइत अछि। एक ठाम तँ ओ एतय धरि कहि जाइत छथि जे महाकवि विद्यापति मैथिलीक उपकार भने जते कयने होथि, अपकारो कम नहि केलनि अछि। अपकार एहि अर्थ मे जे हुनका सँ पहिने जे मैथिली काव्य-परम्पराक ठाठ छल, ताहि पर सँ लोकक ध्यान विद्यापतिक व्यामोह मे हटि गेलनि। ओ जोर द' क' आग्रह करैत छथि जे समस्त मैथिलीभाषी कें, मैथिलीक एहि महान धरोहर कें बेर-बेर पढ़बाक चाही, मनन आ विचारण करबाक चाही।
'मातृभाषाक माध्यम सँ शिक्षा: मैथिलीक सन्दर्भ मे' निबन्ध एक ऐतिहासिक महत्वक काज थिक। हमसब जनैत छी जे मिथिला-क्षेत्र मे कार्यरत विद्यालय सब मे मातृभाषाक माध्यम सँ प्राथमिक शिक्षा नहि देल जाइत अछि। मातृभाषा मैथिलीक माध्यम सँ शिक्षा देल जाय, एहि लेल हमर पुरखा लोकनि बहुतो वर्ष सँ संघर्ष करैत एलाह अछि। आइयो संघर्ष जारिये छैक। हमरो पीढ़ीक मैथिली आन्दोलनी लोकनि एहि दिशा मे अथक प्रयास केलनि अछि, एतय धरि कि बादोक। हमसब इहो जनैत छी जे ब्रिटिश अधिकारी हेबाक बादो जाॅर्ज ग्रियर्सन वर्नाकुलर पाठ्यक्रम मे मैथिली कें शामिल करबाक लेल अथक संघर्ष केलनि आ एहि क्रम मे अभूतपूर्व डाॅक्यूमेन्टेशनक काज केलनि। हम बुझैत छी जे मिथिला आ मैथिलीक लेल जे हुनका ममत्व रहनि तकर कारण हुनकर आइरिश मूलक होयब छल, कारण हुनकर मातृभूमि आयरलैंड तहिना ब्रिटेनक एक उपनिवेश छल जेना हमरा सभक भारत रहय। जयधारी बाबूक एहि निबन्ध मे तकर बादक, एकर आदिम इतिहास बताओल गेल अछि, जे कि कम्मे लोक कें बूझल हेतनि। आजादी सँ पहिनहि, सन् 1939 मे सरकार बिहार शिक्षासुधार समितिक गठन कयने छल, जकर उद्देश्य मातृभाषाक पहिचान करब छल जकरा माध्यमें बच्चा कें प्राथमिक शिक्षा प्रदान कयल जाय। एहि समितिक दू प्रमुख हस्ती डाॅ. अमरनाथ झा आ डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद छला। एहि दुनू महानुभावक प्रतिद्वन्द्विता कोन तरहें चलैत छल, तकर दृष्टान्त हिन्दी साहित्य सम्मेलनक अध्यक्ष पदक हेतु कयल गेल निर्वाचन थिक, जाहि मे डाॅ. झा भारी बहुमत सँ डाॅ. प्रसाद कें पराजित कयने छला। अस्तु, 7 मार्च 1939 कें बिहार शिक्षासुधार समितिक बैसार मे सर्वसम्मति सँ निर्णय लेल गेल छल जे बंगाली लोकनिक लेल बंगला तथा मैथिल लोकनिक लेल मैथिली प्राथमिक शिक्षाक माध्यम रहत। एकर अगिला बैसार मे कोनो कारणें डाॅ. झा उपस्थित नहि रहि सकला, आ डाॅ. प्रसाद मैथिलीक निर्णय कें बदलि क' हिन्दी क' देलनि। एकर विरोध मे जे डाॅ. झा असहमतिपत्र लिखने छला तकरा उद्धृत करैत जयधारी बाबू कैक गोट महत्वपूर्ण तथ्य रखने छथि। आजादीक बाद 1949 मे बिहार सरकार सैद्धान्तिक रूप सँ स्वीकार क' लेलक जे मैथिली, मिथिला-क्षेत्रक विद्यालय सब मे प्राथमिक शिक्षाक माध्यम रहत। ताहि दिन सँ आइ धरि एहि सैद्धान्तिक स्वीकृति कें व्यवहार मे उतारबाक संघर्ष चलि रहल अछि। एहि संघर्षक एक प्रमुख योद्धा डाॅ. जयकान्त मिश्र भेलाह। जयकान्त बाबूक एक प्रमुख सहयोगीक रूप मे काज करैत जयधारी बाबू, एहि संदर्भित जे किछु अख्यास केलनि तकरा एहि निबन्ध मे देखल जा सकैत अछि।
संग्रह मे किछु सांस्कृतिक निबन्ध सब सेहो अछि, जाहि मे मिथिलाक चित्रकला, संगीत, नृत्य आदिक विश्लेषण कयल गेल अछि। मिथिलाक लोककलाक आयाम सभक विवरण दैत महत्वपूर्ण बात ओ कहैत छथि जे विविध कलावस्तुक विन्यास के जे घटक सब अछि, विषय-प्रतीक-बिम्ब आदि, से की कहैत अछि, ओकर सूक्ष्म अभिप्राय की छैक, एहि विषय मे निरंतर शोध करबाक आवश्यकता छैक-- 'प्रयोजन अछि ओहि अनुसन्धान-दृष्टिक जे गाम घरक समस्त हस्तकला मे जहिना कलात्मक सर्जनाक रुचिरतम नमूना तकैत अछि तहिना समस्त संस्कार-निष्ठ जीवनक दार्शनिक ऊर्जाक रुचिरतम संकल्प-शक्ति।' एहि ठाम ओ इहो कहैत छथि जे समाज कलाक सुन्दरता सँ तँ मुग्ध होइत अछि, मुदा अधुनातन वैज्ञानिक विधि सँ विश्व-कलाक बीच मिथिला-कलाक प्रतिष्ठापन कयल जाय जाहि सँ एकर सौरभ संसार भरि मे पसरय, तकरा दिस बौद्धिको वर्ग कें उद्यमशील नहि देखैत छथि। प्रसिद्ध लेखक बच्चा ठाकुर जखन सौराठ मे प्रशासनिक अधिकारीक रूप मे पदस्थापित रहथि तँ 'मिथिला ललित संग्रहालय-सह-शोध-संस्थान'क स्थापना कयने रहथि। एहि मे जयधारी बाबूक सहयोग तँ रहबे करनि, किछु समय धरि ओ एहि संस्थाक निदेशक सेहो रहला। बाद मे जखन एहि संस्थानक सरकारीकरण भेल तँ एकर नाम 'मिथिला ललित संग्रहालय' क' देल गेल। एहि प्रकारें देखैत छी जे जाहि दिस समाजक प्रवृत्ति नहि अछि, से काज जँ क्यो शुरू केलनि तँ देखल गेल जे ओहि दिस सरकारोक प्रवृत्ति नहि अछि। जयधारी बाबू लिखैत छथि-- 'खेदक विषय थिक जे भारतवर्ष सँ बाहर कलाकृति सभक रहस्यपूर्ण अर्थ सभक अनुसंधान भ' रहल अछि, किन्तु देशक अपन सीमा मे, ताहू मे बिहार राज्यक सीमा मे शिक्षा-क्षेत्रक ह्रासक संगे स्नातकोत्तर-अनुसंधानहुक स्तर मे ह्रासे ह्रास देखल जाइत अछि।'
तहिना, एक निबन्ध मे मैथिली लोकगीतक प्रकार सब पर चर्चा करैत कतेको मूल्यवान गप कहि जाइत छथि। रागतरंगिणी मे कामोद रागिणी मे निबद्ध एक गीत भेटलनि जाहि मे 'गे माई' लागल छल। तात्पर्य जे एकहि गीत कें भिन्न-भिन्न भास मे गेबाक स्वतन्त्रता गायक-गायिका लोकनि कें अपन परम्परे सँ भेटल छलनि। विशेषत: शिवगीतक प्रसंग मे ई तथ्य अधिकाधिक प्रचलित भेटैत अछि। अपने ओ एकहि गीत कें अलग-अलग भास मे गाबि क' रेडियो पर सुनौने रहथिन। एहि निबन्ध मे मिथिला-संस्कृतिक अनेक विलक्षणता सब ठाम-ठाम उल्लिखित केलनि अछि। जेना, कृष्णक वियोग मे जखन गोपिका लोकनिक व्याकुलताक वर्णन मैथिली लोकगीत मे होइत अछि तँ 'प्रियतमहुक वियोगक परिकल्पना मे बेटीक सासुर जाएब सन अनुभूति परिकल्पित भेल अछि-- नारी कोमल हृदयक होइत छथि, सब सँ अधिक करुणा अपन जातिक रहबाक कारणें कन्याक वियोगहि मे होइत छनि, तें औपम्य भाव सँ कोनहु परिस्थिति मे पुरुषहुक वियोग मे ओहने उदास मन। वैह उदासी धुन।' एक ठाम कहैत छथि जे एहि संस्कृति पर एकेश्वरवादक गँहीर प्रभावक कारणहि सँ ई देखल जाइछ जे देवता कोन्नहु होथि, ओ परमात्मेक अवतार मानल जाइत छथि। फलस्वरूप सलहेसक प्रति मैथिल लोकनि तहिना श्रद्धालु पाओल जाइत छथि जेना रुद्रक प्रति, एतय धरि जे मोहर्रमक ताजियाक प्रति सेहो ताही प्रकारक भावना रहैत छनि। एक ठाम अणिमा सिंहक संचयन 'मैथिली लोकगीत'क बारे मे रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालयक तत्कालीन कुलपति रोमा चौधरीक कथन उद्धृत करैत बतबैत छथि जे लोकगीत तीन तरहें मनुख कें समृद्ध बनबैत अछि-- बुद्धिक प्रखरता, संवेगात्मक स्फूर्ति, आ संकल्पात्मक स्फूर्ति।
मिथिलाक अपन विशिष्ट नाट्यपरंपरा कीर्तनिञा पर एहि ठाम एकाधिक निबन्ध अछि। कीर्तनिञा नाच छल की नाटक, एहि विषय पर चलल विवाद कें सार रूप मे प्रस्तुत करैत जयधारी बाबू स्पष्ट करैत छथि जे मूलत: कीर्तनिञा नाच छल, मुदा फरमाइस भेला पर नाटक सेहो करैत छल। दरबारी दास आ विश्वनाथ मिश्रक नाच देखबाक हुनका अवसर भेटल छलनि, जकरा ओ मिथिलाक शास्त्रीय प्रकारक नृत्य मानैत छथि, ओतहि लोरिक, सलहेस, जट-जटिन आदि लोकनृत्य थिक। उमापतिक कीर्तनिञा नाटक 'पारिजातहरण'क भावपक्ष पर विस्तार सँ विश्लेषण करैत एहि निष्कर्ष पर पहुँचैत छथि जे नाटकक प्रधान रस सँ ल' क' संपूर्ण वातावरण भने शृंगारिक रहौक, मुदा नाटकक दौरान ई स्मृति सदा बनल रहैत अछि जे कथा वस्तुत: भगवानक भ' रहल छनि, अत: एहि भावना सँ कीर्तनिञाक वस्तु मे व्याप्त शृंगारक भीतर भक्ति सन्हिआयल भेटत। कवि हर्षनाथ झा कें एहि कीर्तनिञा परंपराक सबल उत्तराधिकारी मानैत हुनकहु पर एक निबन्ध एतय देल गेल अछि।
एहि निबन्ध मे सँ बहुलांश एहन रचनाक अछि जे एखन धरि अप्रकाशित छल। साठि-सत्तर वर्ष पहिने जयधारी बाबू अपन हस्तलिपि मे जे लिखने रहथि, से सीधे एहि संकलन द्वारा प्रकाशक मुँह देखि रहल अछि। एते दिन धरि एहि कागज सभक संरक्षा क' सकब सेहो अपना मे एक विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा थिक। हम हुनकर परिवारक संग कथाकार अशोक कें सेहो साधुवाद दैत छियनि जे एहि दिशा मे प्रयत्नशील रहला, जाहि उद्यम सँ ई वस्तु सब प्रकाशित भ' सकल।
1957-58 मे, जखन कि जयधारी बाबू आचार्य रमानाथ झाक गहन संपर्क-सामीप्य मे छला, शृंगारिक भक्तकवि गोविन्द दास पर 'गोविन्द-काव्यालोक' नाम सँ एक पुस्तिका लिखने छला। ओहि समयक चहल-पहल सँ मैथिलीक विद्वान लोकनि अवगत छथि, आ पं. गोविन्द झाक मोनोग्राफ 'गोविन्द दास' मे ओहि विषयक पर्याप्त संकेत सेहो देल गेल छैक। चहल-पहल ई जे चैतन्य भक्ति-धाराक एक महान कवि, जे मिथिला मे जनमल तँ जरूर छला, मुदा शिक्षा ग्रहण करय जे नवद्वीप गेला तँ ओतहिक भ' रहला, कहियो घूरि क' मिथिला नहि एलाह, ओहि भक्तिधाराक विशिष्ट भाषा ब्रजबुलि मे काव्य-रचना केलनि आ ओहि भक्तिपरंपराक एक महान साधकक रूप मे बंगाली जनमानस मे आदृत रहथि। नगेन्द्रनाथ गुप्तक संपर्क मे अयला पर जखन चन्दा झा एहि रचना सब सँ परिचित भेला तँ मुद्रित पदावली सँ गोविन्द दासक पद सब उतारि लेलनि। हुनकर हस्तलिपिक प्रतिलिपि डाॅ. अमरनाथ झा तैयार केलनि, आ रमानाथ झा ओकरा 'साहित्य-पत्र' मे 'शृंगार भजन' कहि छापि देलनि। एहि पाँच सय वर्ष मे मिथिला मे गोविन्द नामक कवि तँ कैक भेला, मुदा ओ समस्त कवि सब एहि गोविन्द दास सँ भिन्न लोक रहथि। प्राचीन संग्रह सब जेना लोचनक रागतरंगिणी, वा नेपालक भाषागीत-संग्रह आदि मे कत्तहु गोविन्द दासक पद संकलित नहि भेटैत अछि। हुनका मैथिल कवि सिद्ध करब, आ चैतन्य-धारा सँ तोड़ि मिथिलाक भक्ति-धारा मे समाहित करब मैथिलत्वक लेल जेना जातीय अस्मिताक प्रश्न बना देल गेल। बंगाली लोकनि जेना विद्यापति सँ मोह तोड़ि लेलनि तहिना गोविन्द दासहु सँ तोड़ि लेथु, ई ध्येय-वाक्य छल, जखन कि गोविन्द दासक जन्मे टा मिथिला मे भेल रहनि, सौंसे जनम बंगाल मे रहला आ ओतहि यश आ श्रद्धा पौलनि। एम्हर मिथिला मे हुनका क्यो जनैतो नहि रहनि।
जयधारी बाबूक एहि पुस्तिका पर एहि चहल-पहलक पर्याप्त छाया छनि, जखन कि अपना कें ओ काव्यशास्त्रीय विश्लेषण धरि सीमित रखने छथि। विश्लेषण जँ शास्त्रीय हो, भने काव्यशास्त्र सँ शासित हो वा समाजशास्त्र वा मानवशास्त्र सँ, ओकर एक तटस्थता, एक वस्तुपरकता होइत छैक, जे कि एक नीक बात थिक। स्थिति असहनीय भ' जाइत छैक तखन, जखन दोसर-दोसर इतिहासकार आ आलोचक लोकनि गोविन्द दास कें निछच्छ शृंगारिक कवि घोषित करबा पर तूलि जाइत छथि, तहिना जेना विद्यापति कें भक्तकवि साबित करबा पर। अरे महराज, एते सय वर्षक बाद अहाँ हुनका अपना रहल छियनि, अपनाउ। मुदा, हुनकर परिचिति कें तँ जीवित रहय दियौ। जे आदमी अपन संपूर्ण जीवन भक्ति कें समर्पित क' देलनि, हुनका अहाँ कहि रहल छियनि जे नहि, ई तँ घोर शृंगारिक छला। किएक? केवल एहि दुआरे जे हुनका माॅडल बला भक्ति कें स्थान देबाक लेल अहाँक संस्कृति मे वा परंपरा मे कोनो जग्गह नहि अछि। अपनाउ तँ एना अपनाउ जेना कि वास्तव मे ओ रहथि। निश्चय अछि जे ओ भक्त रहथि। ओ शृंगारिक गीत लिखलनि, तकर कारण जे हुनकर भक्ति-संहिता मे भक्तिक यैह प्ररूप मान्य छल, श्रेण्य छल, जकरा लेल अपन स्वतंत्र काव्यशास्त्र धरि लीखल गेल।
'गोविन्द-काव्यालोक' बहुतो दिन सँ अलभ्य बनल छल। एहि ठाम ओकरा शामिल क' लेने सँ शोधार्थी लोकनिक बेस उपकार हेतनि, से विचारि परिशिष्ट मे ओकरा देल जा रहल अछि।
जयधारी बाबू गँहीर शास्त्रज्ञ तँ रहबे करथि, विद्या-संसर्गे कें अपन संपूर्ण जीवन समर्पित क' देलनि। हुनका लग अहाँ आउ तँ कने झुकि क' कने जिज्ञासु भ' क' आउ। छुद्र आ उत्थर सोचक लेल हुनका लग कोनो जगह नहि छनि। हुनका लग आउ तँ तेना आउ जेना लोक ज्ञानक मंदिर मे प्रवेश करैत अछि। एतद्धि।
-तारानंद वियोगी
पटना, 10 जुलाइ, 2026


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