Wednesday, June 10, 2026

यात्री नागार्जुनक हिन्दी कविता


        हिन्दी मे नागार्जुनक जे नाम-यश छनि, ताहि मे पचहत्तर प्रतिशत हुनकर कविता, तथा पच्चीस प्रतिशत हुनकर उपन्यास आ अन्यान्य लेखन पर आधारित छनि। हिन्दीक प्रगतिशील काव्यधाराक वृहत्त्रयी मे हुनकर नाम अबैत छनि। अन्य दू कवि छथिन-- केदारनाथ अग्रवाल आ शमशेर बहादुर सिंह। जनवादी काव्यधाराक जँ अलग सँ बात कयल जाय तँ ओकर सर्वोच्च शिखर नागार्जुन कें मानल जाइत छनि। हिन्दीक, आगूक जे प्रगतिशील काव्यधारा चललैक तकर तँ मानू प्रमुख आदर्श नागार्जुन कें मानल जाइत छनि। यशस्वी कवि अरुण कमलक एक कथन एतय हमरा मोन पड़ैत अछि जतय ओ कहने छथि जे कविता मे अपन ज्येष्ठ कवि सब कें जखन ओ पढ़य लगला, आ जखन हुनकर भेंट नागार्जुनक कविता सँ भेलनि, तँ लक्ष्य साफ भ' गेलनि जे हुनका कोन दिशा मे जेबाक छनि, सब सँ बेसी आश्चर्य हुनका ई देखि क' लागल रहनि जे अपना चारूकात जे समाज ओ देखि रहल छला, तकर वस्तुस्थिति, स्वप्न आ सेहन्ताक ठीक-ठीक अनुगूंज हुनका नागार्जुनक कविता मे भेटल रहनि। आलोकधन्वा एही बात कें एहि तरहें कहै छथि जे नागार्जुनक आंगुर पकड़ि क' हमर पीढ़ी कविताक दिशा मे आगू बढ़ल छल।

            दोसर दिस, हिन्दी कविता मे जे हुनकर अवदान छनि तकरा अशोक वाजपेयी, जिनका संग नागार्जुनक मुखर विरोध जगजाहिर अछि, मानैत छथि जे बीसम शताब्दीक जँ दस टा सर्वश्रेष्ठ हिन्दी कविताक नाम गनल जाय तँ ओहि मे एक नागार्जुनक कविता 'अकाल और उसके बाद' राखल जाएत। ओ तँ एतय धरि गछैत छथि जे जँ ई सूची पाँच धरि सीमित करय पड़य तँ ओहू मे एहि कविता कें छोड़ब कठिन भ' जाएत। तेसर, हमसब देखैत छी जे प्रेमचंदक बाद जाहि रचनाकारक अवदान पर सब सँ बेसी शोध-आलोचनात्मक पुस्तक छपल अछि, ओ नागार्जुन छथि। हुनका पर एखन धरि दू सय सँ बेसी पुस्तक छपाओल गेल अछि, जाहि मे सँ डेढ़ सय हुनकर कविता पर केन्द्रित छनि। नागार्जुन कें अपना युगक कबीर कहल गेलनि। कबीरे सनक दू टूकपन, तिक्ख व्यंग्य, अथाह मानवपन, आ चूड़ान्त क्रान्तदर्शिता नागार्जुन मे पाओल गेलनि। हुनकर काव्यकलाक जँ बात हो तँ प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंहक ई कथन हमरा मोन पड़ैत अछि जे जते तरहक काव्यगत प्रयोग एसगर कवि नागार्जुन कयने छथि, हिन्दीक समस्त प्रयोगवादी कवि सभक कयल प्रयोग कें एकट्ठा शामिल क' लेल जाय, तैयो नागार्जुनक पलड़ा भारी रहतनि।

            पहिनहु एहि बातक चर्चा भ' चुकल अछि जे विद्यार्थी, वैदेह आ यात्रीक उपनाम सँ ओ अपन आरंभिक कविता सब मैथिली मे लिखलनि। लगभग 1941 धरि हुनकर काव्यरचनाक भाषा मैथिली आ गद्यलेखनक भाषा हिन्दी रहलनि। हुनकर पहिल कविता 1929 मे मैथिली मे छपल, जखन ओ अठारह बर्खक एक तरुण रहथि। अभ्यास-कालक हुनकर कविता सब, जाहि मे कि कथ्य आ शिल्प, दुनू मे बेस कांचपन देखाइत छैक, मैथिली मे लिखल भेटैत अछि। जहिया कहियो यात्री सँ पूछल गेलनि जे अहाँक पहिल प्रकाशित हिन्दी कविता कोन अछि, तँ ओ अपन एक प्राचीन कविता 'राम के प्रति' के जिक्र कयल करथि। एहि कविता कें 1934 मे प्रकाशित भेल मानल जाइत अछि। मुदा, आइ धरि ओ कविता किनको कतहु नहि भेटलनि अछि। एकरा बदला मे हुनकर हिन्दी मे प्रकाशित पहिल रचना एक गद्यलेख 'मृत्युंजय कवि तुलसीदास' उपलब्ध होइत अछि, जे 'दीपक' पत्रिकाक जनवरी 1934क अंक मे प्रकाशित भेल छल। ज्ञात हो जे 'दीपक' अबोहर सँ स्वामी केशवानंदक संपादन-व्यवस्थापन मे बहराइत छल। 'युगों का यात्री' मे एकर उल्लेख विस्तारपूर्वक भेल अछि जे कोना एही लेखक बदौलत स्वामी केशवानंदक संग हुनकर एहन निकटता बढ़ल जे 1934 सँ 1936 धरि ओ अबोहर मे रहि क' 'दीपक' के संपादन केलनि।

               हिन्दी मे जे हुनकर पहिल प्रकाशित कविता भेटैत अछि, से थिक-- 'निर्वासित'। ई कविता ठीक-ठीक ओही मनोदशाक थिक, जकरा वशीभूत ओ मैथिली कविता 'अंतिम प्रणाम' लिखने रहथि। एहन प्रतीत होइत अछि जे अबोहर सँ लंका-यात्रा पर बहाएल ओ काशी पहुँचल रहथि, तखनहि दुनू कविताक रचना प्राय: एक्के समय मे कयने रहथि। 'निर्वासित' विशाल भारत कें पठाओल गेल, जे एहि पत्रिकाक जून 1936क अंक मे प्रकाशित भेल, आ 'अंतिम प्रणाम' मिथिलामोद कें पठौलनि, जकर प्रकाशन माघ 1937क उद्गार 4 मे भेल। ज्ञात हो जे प्राय: 1941 धरि हिन्दी आ मैथिली दुनू भाषा मे हुनकर प्रकाशित रचना सब यात्रीक नाम सँ प्रकाशित भेल। एहि कालखंडक जे किछु सुप्रसिद्ध हिन्दी कविता सब अछि, ओहि मे 'कालिदास', 'उनको प्रणाम', 'बादल को घिरते देखा है', 'रजनीगंधा' आ 'रवि ठाकुर' थिक। काशी सँ रामेश्वरम यात्राक बीच मे कतहु 'कालिदास' लिखल गेल। संभवत: नागपुर शहरक लगीच रामटेक पर्वत पर विहारक क्रम मे, जकरा सम्बन्ध मे प्रचलित अछि जे राम अपन वनवास-कालक किछु समय एही ठाम व्यतीत कयने रहथि, आ दोसर, मेघदूतक शापित यक्ष एही पर्वत पर बनल आश्रम सब मे अपन वियोग-अवधि पूरा कयने रहय। एहि पर्वत पर प्राचीन राममंदिर सेहो अछि आ कालिदास-स्मारक सेहो। स्वयं कवि एहि कविता मे पर्वतक नाम 'चित्रकूट' देने छथि, तें इहो संभव जे मध्यप्रदेशक सतना जिला मे अवस्थित चित्रकूट ई स्थान रहल हो। जेना-तेना जखन ओ लंका पहुँचि गेला, मुदा सनातनी साधू सभक फेर मे पड़ि बाबा कल्याणपुरीक मठ मे बन्हकी लागल रहला। यात्रीक उद्देश्य विद्यालंकार परिवेण पहुँचि क' बौद्ध शास्त्र सभक अध्ययन करब छलनि, मुदा कल्याणपुरी मठ जे कि तमिल हिन्दू लोकनिक एक विख्यात धर्मस्थल छल, बला साधू सब जम्बूद्वीपक एक ब्राह्मण युवक विधर्मी सभक कुटी मे जा क' अपकारी विद्या अर्थात बौद्धशास्त्र पढ़थि, से नहि चाहैत रहथि। कथावाचक पुजेगरीक बाना मे रहैत लाचार यात्री ओहि ठामक विपरीत आबोहवाक कारण एक बेर तते बीमार पड़ि गेला जे जीवित बचबाक संभावना नहि रहलनि। स्वयं अपनहु ओ जीवन सँ असोथकित भ' गेल रहथि। एहि मनोदशा मे लिखल कविता थिक-- उनको प्रणाम। कविताक पहिल पांती छैक-- 'जो नहीं हो सके पूर्णकाम/ मैं करता हूँ उनको प्रणाम।' ठीक-ठीक एही समय आ मनोदशाक हुनकर मैथिली कविता छनि-- 'जन्मभूमि।' दूनू कविता डाक सँ पठाओल तँ गेल होयत संगहि, मुदा मैथिली कविता 'विभूति'क दिसंबर 1937 अंक मे छपि गेल जखन कि हिन्दी कविता 'विशाल भारत'क मइ 1939 अंक मे आबि क' छपल।

           विद्यालंकार परिवेण सँ नागार्जुन कें छुट्टी भेटल रहनि राहुल सांकृत्यायनक संग तिब्बत-यात्राक लेल। ओ राहुल जीक टीम संग विदा सेहो भेल रहथि, मुदा उपत्यका पर चढ़लाक किछुए दिनक बाद हुनका ज्वर आबय लागल रहनि। बाद मे ओ तते बीमार पड़ि गेला जे हुनका यात्रा स्थगित क' पाछू घुरय पड़लनि। एहि घुरती काल मे कतहु उपत्यकाक मेघाच्छन्न पर्वत कें देखि 'बादल को घिरते देखा है' कविता ओ यात्रीक नामें लिखने रहथि। ई 1938क बात थिक। ई कविता जखन 'सरस्वती'क अक्टूबर 1940क अंक मे छपल, तँ ओहि संग संपादकीय टिप्पणी छल-- 'यात्री महोदय भूटान के निवासी हैं और इनका राष्ट्रभाषा प्रेम सराहनीय है।' तिब्बतक असफल यात्रा सँ घूरि क' नागार्जुन स्वामी सहजानंद सरस्वतीक सीताराम आश्रम, बिहटा पहुँचला। समर स्कूल आफ पाॅलिटिक्सक मासव्यापी प्रशिक्षणक बाद ओ चंपारण जा क' किसान सभाक क्रान्तिकारी राजनीति मे सक्रिय भ' गेला। 1938क अक्टूबर मे राहुल जी तिब्बत सँ घुरला तँ ओहो किसान सभाक क्रियात्मक राजनीति मे सक्रिय भेला। छपराक अमवारी मे किसान सभाक नेतृत्व करैत नागार्जुन गिरफ्तार भेला। क्रमश: सीवान आ छपरा जेल सँ होइत हुनका हजारीबाग सेन्ट्रल जेल पठाओल गेलनि। 'रजनीगंधा' एही जेल मे 1939 मे लिखल गेल छल। 'रवि ठाकुर' कविता विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुरक निधन पर 1941 मे लिखल गेल छल। एही संग नागार्जुन निश्चित क' लेला जे अपन मैथिली कविता तँ ओ यात्रीक नाम सँ पूर्ववत लिखैत रहता मुदा अपन हिन्दी कविता, वा आनो वस्तु ओ नागार्जुनक नाम सँ लिखता। 'रवि ठाकुर' एक अत्यन्त मूल्यवान कविता थिक जकर महत्व हिन्दी मे लगभग ओतबे सिद्ध अछि जतबा ओही साल लिखल मैथिली कविता 'कविक स्वप्न'क महत्व मैथिली मे अछि। तखन, हमर सोच इहो अछि जे एहि मैथिली कविताक महत्व अपेक्षाकृत पहिने स्वीकारल गेल, ओम्हर हिन्दी मे 'रवि ठाकुर'क महत्व कें स्वीकार्य बनै मे समय लागल।

                 कहबे केलहुँ जे नागार्जुनक पहिल उपलब्ध हिन्दी कविता 1936 मे प्रकाशित भेल आ हुनकर अंतिम हिन्दी कविता 1997क लिखल भेटैत अछि। एहि तरहें देखल जाय तँ ओ लगातार छव दशक सँ बेसी समय धरि हिन्दी काव्य-लेखनक क्षेत्र मे सक्रिय रहला। ई सक्रियता निरंतरतापूर्ण रहल। हिन्दी मे ओ उपन्यास, निबंध, कथा, बालसाहित्य, डायरी-लेखन, अनुवाद आदि विधा मे सेहो पर्याप्त काज केलनि। मुदा, ई सब काज एक निश्चित समय-सीमा धरि जारी रहल। अलग-अलग कारण सँ एकरा ओ जीवनावधि निरंतर नहि राखि सकला। ई कविते छल जे निरंतर बनल रहल। हुनकर हिन्दी कविता नागार्जुन रचनावलीक खंड एक आ दू मे कुल 1059 पृष्ठ मे प्रकाशित अछि, जखन कि हुनकर सैकड़ो कविता एहन होयत जे लुप्त भ' गेल, आ पचासो कविता एहन जे कोनो वर्ष कतहु छपल, मुदा रचनावली-संपादक ओकरा ताकि नहि सकला। हुनका बारे में हिन्दीक दुनिया मे ई कहावत मशहूर छल जे 'बाबा कविताएँ बोते और खोते चलते हैं।' एहन अक्सरहां होइत छल जे ककरो आग्रह पर ओ कविता लिखलनि आ मूल प्रति ओही व्यक्ति कें द' देलनि। ओ जँ छपल तँ छपल, नहि छपल तँ से हुनकर स्मृतियो मे नहि रहलनि। हुनकर बहुतो कविता विद्यार्थी जीवन मे लिखल गेलनि। जखन ओ किसान सभाक क्रान्तिकारी राजनीति मे सक्रिय रहथि, ताहू समय मे ढेर कविता लिखलनि। ओ सब आब कतहु नहि भेटैत अछि, मानू ओ जनताक लेल लिखल गेल छल आ जनते कें समर्पित क' देल गेल। हुनकर पहिल कविता-संग्रह 'युगधारा'  1953 मे आबि क' छपलनि। संग्रहक प्रकाशकीय मे ओ लिखलनि-- 'इस प्रकार के चार संकलन और तैयार हो सकते हैं। उन्हें सँभालना नागार्जुन के लिए एक समस्या है... कुछ खो गयी हैं, कुछ खो जाने की स्थिति में हैं, कुछ मित्रों के पास बिखरी पड़ी हैं और बाकी इस यात्री कवि के थैले में दरभंगा-पटना-इलाहाबाद-दिल्ली, दिल्ली-इलाहाबाद-पटना-दरभंगा सफर करती फिरती हैं।' कहब आवश्यक नहि जे ई स्थिति हुनका संग जीवन भरि बनल रहलनि।

                 डाॅ. विजय बहादुर सिंह ठीक लिखने छथि जे नागार्जुनक कविता ओहि तीन चौथाइ हिन्दुस्तान सँ सम्बन्धित अछि जे राष्ट्रीय उत्पादन आ विकासक रीढ़ थिक। निश्चित रूप सँ वैह हुनकर जीवनक लक्ष्य रहलनि आ ओही समाजक दुख-सुख, राग-विराग, संघर्ष आ आन्दोलन, स्वप्न आ सेहन्ता सँ जुड़ल छल। यैह ओ जनता छल जकर जनकवि ओ अपना कें मानै छला आ ओकरे संग अपना कें प्रतिबद्ध, सम्बद्ध आ आबद्ध मानैत रहथि। हुनकर काव्य-विषयक विस्तार तते पैघ अछि जे हिन्दीक तमाम पैघ कवि सँ बेसी रकबा राखनिहार किसान-कवि हुनका मानल जाइत अछि। कोन विषय, कोन मुद्दा, कोन घटना पर हुनकर कविता नहि छनि, तकरा ताकि सकब लगभग असंभव अछि। डाॅ. नन्दकिशोर नवल हुनका बारे मे ठीक लिखलनि अछि जे 'नागार्जुन की कविता से गुजरना बीसवीं शती के प्राय: अंतिम साठ वर्षों के इतिहास से गुजरना है। यह इतिहास विशेष रूप से राष्ट्रीय है, सामान्य रूप से अन्तर्राष्ट्रीय। दूसरे, इस इतिहास में समाज और राजनीति ही नहीं, प्रकृति भी शामिल है।' अकारण नहि थिक जे 1994 मे जखन हुनका पूछल गेलनि जे की अहाँ आगू अपन आत्मकथा लिखबाक योजना रखैत छी, तँ निधोख भ' क' ओ जवाब देने रहथिन जे 'नहि, एहन कोनो योजना नहि अछि। हमर सबटा कविता कें मिला दियौ, हमर आत्मकथा भ' जाएत।' तात्पर्य जे तीन चौथाइ हिन्दुस्तानक एक साधारण प्राणी तहिना ओ अपनो कें मानैत रहथि, जेना हुनकर कविताक पात्र सब, कविता-वाचक सब। विश्वसाहित्य मे हमरा सब कें बिरले क्यो एहन कवि भेटता जिनका अपन कविता पर एतेक भरोस होइन जे ओही सब कें मिला देने अपन आत्मकथा भ' जेबाक विश्वास हो।

             यात्रीक आरंभिक मैथिली कविता सब मे जे नवसिखुआपन आ अभ्यास-कालीनता हमसब देखै छी, हुनकर आरंभिक हिन्दी कविता सब ताहि सँ सर्वथा भिन्न अछि। ई नवसिखुआपन 'अंतिम प्रणाम' सँ पहिनेक लिखल प्राय: सब कविता मे पाओल जा सकै छै, किन्तु हिन्दी कविता कें बाद मे, प्राय: समुचित परिपक्वता आबि गेलाक बाद ओ अपन अभिव्यक्तिक माध्यम बनेलनि, तकर परिणाम देखैत छी जे 'निर्वासित' सन कविता सँ ओ प्रारम्भ करै छथि जे कि 'अंतिम प्रणाम'क समतुल्य अछि। ठीक एही कालक लिखल छव पांतिक हुनकर एक कविता छनि-- 'बेकार'। कविता एना छै-- 'मानव होकर मानव के ही चरणों में मैं रोया/ दिन बागों में बिता रात को पटरी पर मैं सोया/ राजकीय ये उच्च डिग्रियां, ऐसा सुंदर मुखड़ा/ तो भी नहीं किसी ने सुनना चाहा मेरा दुखड़ा/ कभी घुमक्कड़ यार-दोस्त से मिलकर कभी अकेले/ एक-एक दाने की खातिर सौ-सौ पापड़ बेले।' सोझ-सोझ देखी तँ निजी आर्थिक दैन्यक मर्मवेधी कविता एकरा कहि सकै छियै। मुदा, दूटा बात विशेष ध्यान देबाक थिक। पहिल तँ ई जे जे नागार्जुन सदा-सर्वदा वस्तुनिष्ठ आ समाजनिष्ठ कविताक लेल जानल गेला, से एहन जकर जोड़ भेटब कठिन, आ से कवि अपन कविता-लेखनक आरंभ व्यक्तिनिष्ठ कवि रूप मे केलनि! जी हँ, सत बात यैह छैक। आ एतबे नहि, समस्त वस्तुनिष्ठताक अछैत ताजिनगी ओ एहन कविता सब लिखैत रहला जाहि मे फुटका क' अपन निजी सुख-दुख कें अभिव्यक्त केलनि, विकुंठ भाव सँ, बिनु कोनो परदा कयने। मोन पाड़ल जाय, नागार्जुनक जे परम प्रसिद्ध कविता छनि 'सिन्दूर तिलकित भाल' आ 'यह दंतुरित मुस्कान' सेहो एकर थोड़बे दिनका बादक लिखल थिक। हम एतय इहो मोन पाड़य चाहब जे अपन रचनाशीलताक गुण-धर्म बखान करैत जखन बहुत आगां चलि क' ओ 'प्रतिबद्ध हूँ' कविता लिखने छला, तँ ओहि मे आन अनेको प्रतिबद्धता देखेबाक संग-संग एहू प्रश्न कें बराबरी मे शामिल रखलनि-- 'अपने आप को भी व्यामोह से बारम्बार उबारने की खातिर/ प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ।' हिन्दी मे जखन हुनका दोसर कबीर कहल जाइत छनि तँ तकर एक कारण इहो बताओल जाइछ जे अपना आप पर तिक्ख व्यंग्य करबा सँ सेहो ओ नहि कतहु चुकैत छथि। नागार्जुनक एहि काव्यप्रवृत्ति सँ एक इहो तथ्य प्रतिपादित होइत अछि जे गहन व्यक्तिनिष्ठतेक उदर सँ अक्सरहाँ वस्तुनिष्ठताक जन्म होइत छैक। अथवा, एही बात कें अहुना कहल जा सकैत अछि जे गंभीर निर्वैयक्तिक हेबाक लेल नितान्त वैयक्तिक होयब कदाचित एक आरंभिक शर्त होइत अछि।  खैर, ओहि 'बेकार' कविता मे दोसर जे देखबाक वस्तु अछि से थिक छंद पर नागार्जुनक निस्सन पकड़, शब्द-प्रयोगक संतुलित विवेक, जखन कि ओहि समय मे नागार्जुन मात्र बाइस-तैस बरखक जुबक छला।

             'कालिदास' आ 'उनको प्रणाम'-- नागार्जुनक ई दुनू कविता हद सँ बढ़ि क' लोकप्रिय भेल। हजारो ठाम अइ दुनू कविता कें उद्धृत कयल गेल होयत। जखन नागार्जुन अस्सी बरखक बूढ़ भ' गेल छला, तखनो गोष्ठी सब मे हुनका सँ अनुरोध कयल जाइन जे 'कालिदास' सुनाउ, 'उनको प्रणाम' सुनाउ। एखनो यूट्यूब पर हुनकर वीडियो भेटि जायत, जतय ओ ई कविता सब सुनबैत देखाइत छथि। हिन्दीक दुनिया मे ई दुनू कविता एतेक प्रशस्त भेल जे एहि बात पर भरोस केनाइ कठिन लगैत छैक जे ई दुनू हुनकर आरंभिक कविता छियनि, जखन ओ केवल पच्चीस-तीसक उमेर मे छला। एहि दुनू कविताक कथ्य तते आधुनिक, तते क्रान्तदर्शी अछि जे से एहि भरोस कें आरो कठिन बनबैत छैक। 'कालिदास' एहि विषय पर लिखल गेल अछि जे रचना आ रचनाकार दुनू कें समरूप बुझबाक चाही। अज, रति आ यक्ष कालिदासक काव्य के पात्र सब छथि। एहि ठाम वर्ण्य विषय अछि दुख। दुख मे कयल गेल रोदन, विलाप। क्यो कवि जखन अपन पात्रक दुख कें वर्णित करैत अछि तँ जखन ओ दुख एहि तल धरि पहुँचि जाय जे ओ स्वयं कविक अप्पन भोगल दुख हो। कवि अन्तत: मानव आत्माक गुप्तचर होइत अछि। कविता मे आएल अछि-- 'पर-पीड़ा से पूर-पूर हो/ थक-थक कर औ चूर-चूर हो/ अमल-धवल गिरि के शिखरों पर/ प्रियवर, तुम कब तक सोये थे/ रोया यक्ष कि तुम रोये थे/ कालिदास, सच-सच बतलाना!' ई जे पर-पीड़ा सँ पूर-पूर होयब थिक, से मानू कविक नियति थिक-- एक नवतुरिया कविक ई स्थापना सत्ते कते विरल बुझाइत अछि। थोड़बे दिन बाद जखन नागार्जुन 'बादल को घिरते देखा है' कविता लिखलनि, हुनकर एक अद्भुत कविता थिक इहो, जतय ओ कल्पना आ यथार्थक अनमोल रसायन हिमालय-वर्णन मे केलनि अछि। ओहू ठाम कालिदास कें स्मरण कयल गेल छनि। दुर्गम बर्फानी घाटी मे शत-सहस्र फीट उंचाइ पर ओ पहुँचल छथि। कालिदासक वर्णन अनुसार धनपति कुबेरक अलकापुरी कें एतहि कतहु हेबाक चाही, से हुनका कतहु नहि देखाइत छनि। आकाशगंगाक पृथ्वी पर उतरबाक स्थान सेहो कतहु एही ठाम हेबाक चाही, सेहो कतहु नहि देखना जाइत छनि। मेघदूतक महामेघ तँ मानि लेल जे एतहि कतहु बरसि गेल होयत , मुदा की पता जे ई समस्त विवरण केवल कवि-कल्पित हो। तखन? पांती आएल छैक-- 'जाने दो, वह कवि-कल्पित था/ मैंने तो भीषण जाड़ों में/ नभचुंबी कैलाश-शीर्ष पर/ महामेघ को झंझानिल से/ गरज-गरज भिड़ते देखा है/ बादल को घिरते देखा है।' एतय जे 'देखब' छै, से कते विशेष छै, देखल जाय। संभव थिक जे विज्ञान-बुद्धि आ पर्यावरण-क्षति मिलि क' आगू आजुक बहुतो विद्यमान सत्य कें 'कवि-कल्पित' मानि लेबा पर बाध्य हुअय पड़य, मुदा, एहि तरहक 'देखब' तँ सब दिन काज आएत। मानू तँ ई कविता अपन पाठक कें अपना चौबगली विद्यमान यथार्थ कें देखबाक लूरि सिखबैत छैक।

            'उनको प्रणाम' के वितान आरो विस्तृत छैक। एकर केन्द्रीय विषय थिक जे जे व्यक्ति संघर्ष करैत रहलाक बादो हारि जाइत अछि, ओकर हारब नहि, ओकर संघर्ष सैह मूल्यवान होइत छैक। जखन कि दुनियाक रेबाज एकर ठीक उनटा अछि। एतय इतिहास केवल विजेता कें मोन रखैत छैक, समुच्चा पान-फूल विजेते कें चढ़ाओल जाइत छैक, समस्त जयजयकार विजेतेक होइछ। मुदा, एहि कविताक पहिले पांती थिक-- 'जो नहीं हो सके पूर्णकाम/ मैं उनको करता हूँ प्रणाम।' एहि घोषणा पर ध्यान देल जाय-- जे संघर्ष केलाह, मूल्य तिनकर छनि, ने कि अइ बात के कि ओ हारला कि जितला। जे कृत-कृत्य हेबाक बदला फांसी पर झूलि जाएब कें श्रेयस्कर बुझलनि। तकर एवज मे हुनका भेटलनि की? 'कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी/ यह दुनिया जिनको गयी भूल!/ -- उनको प्रणाम।' 37-38 के लिखल कविता थिक। स्वातंत्र्य समर उफान पर चलि रहल छल। आजादी एखन दूर छल। मुदा हजारो एहन युवा रहथि जे चाहितथि तँ कृत-कृत्य भ' सकै छला, मुदा ओ फांसी पर झूलि जाएब पसंद केलनि। 1857क शहीद सब सँ ल' क' रामफल मंडल आदि तमाम आजादीक दीवाना सभक चित्र एतय मूर्तिमान भ' उठैत अछि। दुनिया भने बिसरि जाइन, मुदा कवि कोना बिसरता? हुनकर प्रणाम तँ हुनके सभक लेल हेतनि। दुनिया आ कविक बीच मे फरक की होइत छैक, अइ ठाम बात तकरो उठाएल गेल छैक। एकटा पांती एलैए-- 'थी उग्र साधना, पर जिनका/ जीवन-नाटक दु:खान्त हुआ/ था जन्म-काल में सिंह लग्न/ पर कुसमय ही देहान्त हुआ/ --उनको प्रणाम।' हमरा सब मे सँ हरेक आदमी अपन आस-पास नियतिक ई खेल चलैत देखैत छी। निष्पक्ष भ' सोचब तँ सब तरहें लागत जे नहि, हिनका सन लोक कें तँ जरूर सफल हेबाक चाही छल, मुदा से नहि होइत अछि। तें कि ओ संघर्ष सेहो मिथ्या भ' जाएत जे कि ओइ आदमी द्वारा कयना गेल? एक-डेढ़ दशक बाद यैह यात्री कवि अपन मैथिली कविता 'परम सत्य' मे लिखने छला-- 'सत्य थिक संघर्षरत जनताक ई इतिहास/ सत्य धरती, सत्य थिक आकाश/ परम सत्य मनुक्ख अपनहि थीक।' हमसब साफ देखि सकै छी जे लगभग एही तरहक निष्कर्ष पर कवि एहू कविता मे पहुँचल देखना जाइत छथि। ताहि पर सँ की छै जे नागार्जुन संस्कृतक लोक रहथि, धर्मादि नाना वितंडाक ज्ञान अथ उत सँ च तु धरि हुनका रहनि। जखन कखनो हुनका अवसर भेटैत छलनि, एहि वितंडा कें एक ढाही मारने विना छोड़ि नहि सकैत छथि। एहू ठाम देखि सकै छी-- ज्योतिषक अनुसार सिंह लग्न मे जनमल जातक पराक्रमी हुअय, मुदा 'कुसमय ही देहान्त हुआ।'

                   एहि दुनू कविता कें पर्याप्त हियाब संग देखल जाय तँ एक परत आर खुलैत अछि। ई समय छल जखन यात्री अपन जीवन-संघर्षक मझधार मे छला। मोन राखी जे एखन धरि ओ विद्यालंकार परिवेणो धरि नहि पहुँचि सकला अछि, बद्धपरिकर भ' क' लेखक बनबाक निर्णय करथि, ताहि मे तँ एखन बहुत देरी रहनि। अइ कविता मे एकटा बंध एहन छै जे कविक जीवनक तत्कालीन परिस्थितिक अभिधात्मक विवरण दैत अछि-- 'एकाकी और अकिंचन हो/ जो भू-परिक्रमा को निकले/ हो गये पंगु, प्रति पद इतने/ अदृष्ट के दांव चले/ --उनको प्रणाम।' परत ई खुलैत अछि जे स्वयं अपन आत्मबल कें पुष्ट करक खातिर, स्वयं अपन कर्म कें इमानदार बनेबाक खातिर ओ बारंबार-बारंबार संकल्पित होइत चलैत छथि। अपना आप कें व्यामोह सँ बचबैत, दृढ़ आत्मदीप्ति कें जोगबैत।

            हजारीबाग जेल मे लिखल हुनकर कविता 'रजनीगंधा' आ लगले बाद लिखल 'बहती है जीवन की धारा'

कविता कें संग-संग पढ़ने स्पष्ट होइत छैक जे जीवन मे गहन रूप सँ डूबब, आ कात-करोट सँ उबडुब करैत रहबा मे की फरक छै। कविक परिस्थिति एहन छनि-- 'यह प्रहरी के बूटों की कर्कश टापें/ रह-रहकर बहुधा नींद तोड़ जाती हैं/ आँखें खुलतीं तो बस झुँझला उठता हूँ/ ये हृदयहीन! ये नर-पिशाच! ये कुत्ते!' मुदा, जीवन मे जे कन्ट्रास्ट रहैत छैक जकरा दुआरे विपरीतो परिस्थिति सहनीय बनैत छैक, तकर चित्र देखी-- 'यह जेल और यह सेल-नियंत्रित प्राणी/ इस आँगन में उस ओर तुम्हारा खिलना/ यह भीनी-भीनी सारी रात महकना।' आ दोसर दिस, कात-करोट रहि जिनगीक तमाशा बनेनिहार व्यक्तिक मादे दोसर कविता मे ओ कहैत छथि-- 'साँस-साँस पर थकने वाले/ पार नहीं जा सकने वाले/ उब-डुब उब-डुब करने वाले/ तुम्हें मिलेगा कौन सहारा?/ बहती है जीवन की धारा!' 

             नागार्जुनक हिन्दी कविताक प्रवृत्ति सब पर हम बात करी, ताहि सँ पहिने 1948 मे महात्मा गांधीक हत्या पर केन्द्रित कविता-सिरीज पर एक दृष्टि दियाब' चाहब। ई कविता सभ दू दृष्टि सँ महत्वपूर्ण छै। एक तँ आजादीक बाद जे हुनका पहिल बेर गिरफ्तार कयल गेलनि, तकर मुख्य कारण ई कविते सब छल। दोसर, गांधी जी कें तर्पण करैत ओ संप्रदायवादी दैत्य सभक प्रबल विरोध के जे प्रतिज्ञा केलनि, तकर रक्षा हुनकर संपूर्ण जीवन मे देखार रूप सँ कयल गेल देखाइत अछि। प्रसिद्ध अखबार 'जनशक्ति' जाहि मे ई कविता-सिरीज छपल छल, स्थिति ई भेलैक जे पहिने जतय एकर आठ सौ प्रति छपैत छल, आब चारि हजार पर पहुँचि गेल। अन्तत: तँ एहन भेलैक जे स्वयं सरकार कें छापामारी क' क' एहि अखबार कें बंद कराब' पड़लैक आ बहुतो कम्युनिस्ट बौद्धिकक संग नागार्जुन सेहो गिरफ्तार कयल गेला।

                    'तर्पण' कविता तँ गांधी जीक हत्याक दोसरे दिन 31 जनवरी, 1948 कें लिखल गेल। एहि कविताक आरंभे एहि प्रसंग सँ भेलैक अछि जे हे पिता, काल्हि जाहि बर्बर आतंकीक हाथें अहाँक खून कयल गेल, ओ 'मराठा हिन्दू' आ 'मूर्ख' वा कि 'पागल' नहि छल। कविताक पहिले पांती मे नागार्जुन स्वयम सरकार के पानि उतारि देलखिन, कारण सरकार ओहि कातिल कें एही सब नामें चिह्नित कयने छल, आकाशवाणी सँ सीधा प्रसारण चलि रहल छल। प्रश्न छल जे हत्यारा जँ ई सब नहि छल तखन फेर की छल? नागार्जुन कें ओहि बर्बरक पूरा वंशावली बूझल छलनि। ओ लिखलनि-- 'वह प्रहरी है स्थिर-स्वार्थों का/ वह जागरूक, वह सावधान।' मर्म बूझल जाय, गोडसे मात्र एक प्रहरी, एक रखबार छल। क्यो मालिक छलै स्थिर-स्वार्था प्रवृत्तिक, तकर ओ मात्र एक सेवक छल। कविता मे आगू कवि ओहि वर्गपति कें आ ओकर प्रहरी सब कें ओ एक संग मिला क' कहै छथि-- 'मानवताक महाशत्रु'-- 'जो कहते हैं उसको पागल/ वह झोंक रहे हैं धूल हमारी आँखों में/ वह नहीं चाहते परम क्षुब्ध जनता घर से बाहर निकले/ हो जायें ध्वस्त/ इन सम्प्रदायवादी दैत्यों के विकट खोह/ वे नहीं चाहते पिता, तुम्हारा श्राद्ध, ओह!' के जनताक आँखि मे 'धूल' झोंकि रहल  रहल अछि? के नहि चाहैछ जे गाँधी जीक श्राद्ध होइन? कविताक अनुसार, पटेल नहि चाहैत छला, नेहरू नहि चाहैत रहथि! आगूक पांती छै-- 'शैतान आएगा रह-रह हमको भरमाने/ अब खाल ओढ़कर तेरी सत्य-अहिंसा का'-- शैतान के? मजा के बात छै अपन ओही दिनका रेडियो प्रसारण मे सरदार पटेल देशक जनता सँ अपील कयने रहथि जे 'महात्मा जीक द्वारा देल गेल प्रेम आ अहिंसाक संदेश कें ग्रहण करै जाउ।' नागार्जुन नीक जकाँ बूझि रहल छला जे एक अराजनीतिक भ' चुकल महात्मा के हत्या के ई लोकनि राजनीतीकरण क' रहल छथि। ओ लिखलनि-- 'एकता और मानवता के/ इन महाशत्रों की न दाल गलने देंगे/ हम एक नहीं चलने देंगे।' सरकारक मुखिया लोकनि जे चाहि रहल छथि, तकरा अहाँ नहि होब' देबै? एहन मजाल? मानि जे नहि होब' देबै, मुदा तखन अहाँ करबै की? कविता मे पांती छै-- 

'मैदानों के कंकड़ चुन-चुन/पथ के रोड़ों को हटा-हटा/ तेरे उन अगणित स्वप्नों को/ हम रूप और आकृति देंगे/ हम कोटि-कोटि/ तेरी औरस सन्तान पिता!'

            तेरह दिनक राष्ट्रीय शोकक बाद दिल्लीक यमुना-तट पर गाँधी जीक श्राद्ध भेलनि। 'शपथ' कविता ओ ओही दिन लिखलनि। एहि मे तँ ओ साफ-साफ लिखलनि जे 'क्या करते थे दिल्ली में बैठे पटेल सरदार?/ जिसके घर में कोई घुसकर साधु को दे मार/ उस गृहपति को धिक्कार।' एहि कविताक अन्त मे नागार्जुन लेल संकल्प आयल अछि-- 'हिटलर के ये पुत्र-पौत्र जब तक निर्मूल न होंगे/ हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख फासिस्टों से न हमारी/ मातृभूमि यह जब तक खाली होगी/ सम्प्रदायवादियों के विकट खोह/ जबतक खण्डहर न बनेंगे/ तबतक मैं इनके खिलाफ लिखता जाऊँगा/ लौह-लेखनी कभी विराम न लेगी.....' लिखबाक सिवाय हुनका हाथ मे आर छलनिये की? मुदा हुनका जेल मे बन्द कयल गेलनि। ओ समय छल, जखन गाँधी हत्यारा गोडसे जेल मे बन्द छल, आ ठीक ओही समय गोडसे पर गोस्सा केनिहार नागार्जुन सेहो कोनो आन जेल मे बन्द छला। 'वाह गोडसे' एहि सिरीजक एक एहन कविता थिक, जाहि मे ओ जेल मे भेटै बला सुविधाक आधार पर ई आकलन करबाक प्रयास कयने छथि जे सरकारक सहानुभूति ककरा संग रहैक! पांती छै-- ' वाह गोडसे/ जिनको तुमपर गुस्सा आया/ उन्हें माफ नहीं सरकार करेगी/ पकड़कर बन्द कर दिया है हाजत में/  अजा मिलेगी कड़ी से कड़ी/  बड़भागी तुम, बने हुए हो शाही कैदी/  उन गुस्ताखों का बदमाशों में शुमार है/ तुम सुनते हो रोज रेडियो/ पर उनको तो/ मामूली अखबार भी न मिलता होगा।'

           एही स्वर आ त्वराक कविता नागार्जुन जिनगी भरि लिखैत रहला। आपातकाल सँ बहुत पहिनहि ओ इंदिरा गाँधीक तानाशाही मिजाज कें पकड़ि चुकल रहथि। जे नागार्जुन कहियो बैंक सभक राष्ट्रीयकरण आ प्रीवी पर्सक समाप्तिक कारण इंदिरा के प्रशंसा मे कविता लिखैत हुनका दुर्गा धरि कहि गेल रहथि, वैह आपात्कालक दौरान दर्जनो एहन कविता लिखलनि जाहि मे विद्रोही स्वर कें साफ सुनल जा सकैत छल-- 'इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको? सत्ता की मस्ती मे भूल गयी बाप को?' राजीव गाँधी, देवगौडा होथि आ कि नरसिंहाराव, जनताक हक के मुद्दा पर ओ ककरो नहि बकसलनि। 

           नागार्जुन जें कि जनान्दोलन सँ बहरायल कवि रहथि, हुनकर कविता सभक बुकलेट समय-समय पर प्रकाशित होइत रहल आ लाखो लाख जनताक बीच ओ बुकलेट सब पहुँचल, अपन एहन पुस्तिका सब कें ओ 'कितबिया' मने छोटकी किताब कहथि। एहि तरहक पुस्तिका मैथिली मे सेहो छपल रहय, संस्कृत मे सेहो जकर चर्चा भ' चुकल अछि। गाँधी जीक हत्याक प्रसंग मे लिखल कविता सभक पुस्तिका 'शपथ' नाम सँ 1948 मे छपल। तहिना, 1952क पहिल आम चुनाव मे हुनक काव्य-पुस्तिका 'चना जोर गरम' छपलनि। 1955 के छात्र-आन्दोलन, जे कि बी. एन. काॅलेजक छात्र सब पर पुलिस द्वारा गोली चलेबाक प्रतिक्रिया मे शुरू भेल छल, एहि समय हुनकर कविता-पुस्तिका 'खून और शोले' प्रकाशित भेलनि। तहिना, अकाल पर लिखल हुनकर मार्मिक कविता सभक पुस्तिका 'प्रेत का बयान' नाम सँ छपल छल। व्यवस्थित रूप सँ जकरा कविता-संग्रह कहल जाय, से 'युगधारा' नाम सँ 1953 मे छपल। ई हुनकर पहिल कविता-संग्रह छलनि।  1959 मे हुनकर दोसर कविता-संग्रह 'सतरंगे पंखोंवाली' प्रकाशित भेलनि। 1962 मे तेसर संग्रह 'प्यासी पथराई आँखें' अयलनि। एकर बाद, 1974 मे हुनकर संग्रह 'तालाब की मछलियाँ' प्रकाशित भेलनि। एकर बाद, 1980क दशक मे, जखन कि ओ बेस प्रख्यात भ' गेल रहथि, तखने हुनकर आन-आन संग्रह सब आबि सकल। हिन्दी मे हुनकर कुल तेरह टा कविता-संग्रह प्रकाशित भेलनि। आन-आन संग्रहक नाम छल-- 'तुमने कहा था' (1980), 'हजार-हजार बाँहोंवाली' (1981), 'पुरानी जूतियों का कोरस' (1983), रत्नगर्भ' (1984), 'ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या!' (1985), 'आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने' (1986), 'इस गुब्बारे की छाया मे' (1990), 'भूल जाओ पुराने सपने' (1994) आ हुनकर जीवन-कालकअंतिम कविता-संग्रह 'अपने खेत में' (1997)। एहि सभक अतिरिक्त, महाकवि कालिदासक 'मेघदूत'सृजनात्मक काव्यानुवाद (1953) एवं खंडकाव्य 'भस्मांकुर' (1970) प्रकाशित छनि। हुनकर सैकड़ो कविता हेरा गेलनि, अथवा ओ ककरो देलखिन आ हुनका लग तकर प्रति नहि बचल। एहन बहुतो रास कविता शोभाकान्तक उद्यम सँ रचनावली मे पहिल बेर प्रकाशित भेल। मुदा एखनो हुनकर सबटा कविता भेटिये गेलनि अछि, एहन दाबी क्यो नहि क' सकै छथि। हुनका बारे मे सबतरि कहबी प्रचलित छल-- बाबा कविता बोते और खोते चलते हैं। ई स्थिति नितान्त शुरुहे सँ ताहि तरहें व्याप्त छल जे अपन पहिल कविता-संग्रह 'युगधारा'(1953)क भूमिका मे ओ लिखने रहथि-- 'कुछ कविताएँ खो गयी हैं, कुछ खो जाने की स्थिति में हैं, कुछ मित्रों के पास बिखरी पड़ी हैं और बाकी इस यात्री कवि के थैले में दरभंगा-पटना-इलाहाबाद-दिल्ली, दिल्ली-इलाहाबाद-पटना-दरभंगा सफर करती फिर रही हैं।'

                जहाँ धरि हुनकर हिन्दी कविता सभक प्रवृत्तिक प्रश्न अछि, मुख्यत: आठ-दस कोटि-क्रम मे हुनकर कविता कें राखल जा सकैत अछि। पहिल तँ अछि जे हुनकर कविताक केन्द्र मे देशक ओ बहुसंख्यक जनता अछि जकरा बदौलत देशक उत्पादन आ अर्थतंत्र टिकल अछि। ओ श्रम सँ जुड़ल वर्ग थिक। वैह बहुसंख्यक जन बाजार कें गति दैत अछि आ ओकरे देल वोट पर कोनो नेता देशक शासन-तंत्र पर काबिज होइत अछि। देशक कल्याणक नाम पर देल गेल वचन वा कयल गेल कोनो प्रयास, जँ ओ ढकोसला मात्र नहि हुअय तँ असलियत मे एही वर्गक कल्याण कें सुनिश्चित करैत अछि। दोसर दिस, भारतक महान स्वतन्त्रता-संग्रामक आदर्श जँ सत्ते जीवित हो तँ निश्चय एही वर्गक कल्याण हेतैक। मुदा ई ढकोसला कोन स्तर धरि आजादीक बादे सँ शुरू भ' गेल रहैक, तकर ठोस आ स्पष्ट निसानी नागार्जुनक कविता मे भेटैत अछि। एहि वर्गक पहचान स्पष्ट करबाक लेल एतय हम हुनकर कविता 'पूरी आजादी का संकल्प'क अंश उद्धृत करब। ई उद्धरण एहू लेल उपयोगी छैक जे आमजनक भाषा मे आमजनक दुख-सुख लिखबाक लेल प्रतिबद्ध ई कवि कोना अपन काव्यभाषा कें जनभाषाक अत्यन्त लगीच धरि घीचि अनैत अछि। पंक्ति अछि--

बीज नहीं है, बैल नहीं है, वर्षा बिन अकुलाते हैं

नहर रेट बढ़ गया, खेत में पानी नहीं पटाते हैं

नहीं भूमि में कनमा-भर भी दाना उपजा पाते हैं

पिछला कर्ज चुका न सके, साहू की झिड़की खाते हैं

उतना ही फँसते, अपने को जितना अधिक बचाते हैं

भूखे रहकर, आधा खाकर दिन पर दिन दुबराते हैं

हड्डी छेद रहा है जाड़ा, बरबस दाँत बजाते हैं

दवा न कर पाते रोगों की, यम को पास बुलाते हैं

हरि-इच्छा या राम भरोसे अपने को समझाते हैं

मिलवाला मनमानी करता,ऊख अगर उपजाते हैं

खर्चा के डर से बच्चों को कुछ भी नहीं पढ़ाते हैं

चाँदी तो क्या, टलहा तक की औंठी नहीं गढ़ाते हैं

परब-तीज-त्यौहार नहीं तंगी के कारण भाते हैं

तबियत बहलाने की खातिर तुलसी के पद गाते हैं

             आँखि खोलि क' ताकी तँ देखैत छी जे ई जे उत्पादक श्रमजीवी वर्ग अछि, तकरे शिकार करबाक घात मे जाबन्तो राजनेता, पूजीपति, धर्मोपदेशक, व्यापारी, अधिकारी आदि वर्ग लागल अछि। हिसाब अस्सी आ बीस प्रतिशतक छै--अस्सी प्रतिशत शोषित आ बीस प्रतिशत शोषक। सरकार एहि दुनू वर्गक बीच ककर हित-चिन्तन पर एकाग्र अछि, नागार्जुन साफ लिखलनि अछि--

अस्सी प्रतिशत जनता की खातिर कृपाण है

बाकी लोगों की खातिर बस पुष्पवाण है

              एहि अस्सी-बीसक प्रसंग मे राहुल सांकृत्यायन द्वारा पूर्व-आधुनिक युगक एक हिसाब हमरा ध्यान मे अबैत अछि। अपन पुस्तक 'हिन्दी काव्यधारा'क अवतरणिका मे ओ लिखने छथि जे तहिया बीस प्रतिशत लोक (दास-दासी) तँ मात्र देखैए-सुनै मे मनुख-सन लगैत छल, वस्तुत: ओ अपन मालिकक जंगम सम्पत्ति होइत छल, जकर क्रय-विक्रय कोना होइ छल तकर विवरण स्वयं विद्यापतियेक रचना मे पाओल जाइत अछि। हिन्दू राष्ट्रक ई व्यवस्था एते बद्धमूल छल जे नेपाल मे सन् 1925 धरि चलन मे छल। शेष मे सँ पचास प्रतिशत किसान, दस प्रतिशत मजदूर आ दस प्रतिशत लोक शिल्पकार छला। साफ बुझि सकै छी जे देशक राष्ट्रीय आय कतय सँ अबैत छल आ एतेक रास उत्पादनक श्रेय किनकर छलनि। मुदा राहुल जीक शब्द मे-- 'वहाँ सारा शिल्प, सारा व्यवसाय, सारी कृषि मुट्ठी भर आदमियों के भोग के लिए होती थी। दूसरों को तो मुश्किल से सिर्फ जीने और ब्याने भर का अधिकार था।' आइ, विभिन्न कारण सँ प्रतिशत मे जे अन्तर आयल अछि, ताहि सँ परिस्थिति बदलि गेल हो सेहो बात नहि अछि। नागार्जुनक 'आम जनता' वा 'साधारण जन' के छल, से एहि प्रसंग सँ बुझल जा सकैत अछि।

        1949क स्वतंत्रता-दिवस पर अपन 'साधारण जन'क शक्ति आ भवितव्य कें अकानैत नागार्जुन 'जन-वन्दना' लिखलनि, जकर आरंभे मे ई पांती अबैत अछि--

'हे कोटिशीर्ष हे कोटिबाहु हे कोटिचरण!

युग की लक्ष्मी भव की विभूति कर रहीं तुम्हारा स्वयं वरण

तुम महिमामंडित परम्पराओं के वाहन

तुम साधारण, तुम निर्विशेष

निज जटाजाल में विद्युत की गतिविधि समेट

तुम सर्वग्रासी हिरणकशिपु का फाड़-फाड़कर विकट पेट

विज्ञान-कला-संस्कृति के शिशु प्रह्लादों को

-- दे रहे निरंतर अभयदान!!'

              एहि आम जनक शिकार करबा लेल घात लगौने सक्रिय राजनीति, धर्मतन्त्र आ पूजीतन्त्रक गठजोड़ षड्यंत्र कें नागार्जुनक कविता सदैव नांगट करैत चलैत अछि। कखनो व्यंग्य अथवा विरोध करबाक अवसर नहि चुकैत अछि। मानू यैह हुनक कविता-यात्राक मुख्य प्रतिज्ञा होइन। अपन प्रसिद्ध कविता 'प्रतिबद्ध हूँ' मे ओ स्पष्ट कहैत छथि--

'प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ

बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त--

संकुचित 'स्व' की आपाधापी के निषेधार्थ...

अविवेकी भीड़ की 'भेड़िया-धसान' के खिलाफ...

अंध-बधिर 'व्यक्तियों' को सही राह बतलाने के लिए...

अपने आपको भी 'व्यामोह' से बारंबार उबारने की खातिर...

प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ!'

                 'संकुचित स्व' की भेलै? ओ कविक व्यक्ति-हित भ' सकैए। वर्णहित अथवा वर्गहित भ' सकैए जे बहुजन समाज के विरुद्ध जाइत हो। तकर निषेध लेल प्रतिबद्ध। 'अविवेकी भीड़क भेड़िया-धसान' हमसब अपन चतुर्दिक देखि रहल छी। एकर विस्तार माॅब-लिंचिंग सँ ल' क' राष्ट्रीय अराजकता धरि जाइत छैक। कविक प्रतिज्ञा अछि जे ओ एकर खिलाफ रहत। 'अंध-बधिर' के भेला, आ से किएक एहन बनल रहैत छथि, स्पष्ट अछि जे वर्गशत्रुक शिकार भइयो क' हुनका अपन वास्तविकताक परिज्ञान नहि रहैत छनि, एहन लोक कें सही बाट पर घीचि आनब कविक काज थिक। मने कवि केवल लेखक नहि होइत अछि, ओ एक्टीविस्ट सेहो होइछ, जकर साक्ष्य नागार्जुनक कविता दैत अछि। कविक आगू अपन-परार के दुविधा बेर-बेर अयबाक संभावना रहैत छैक। मुदा ई व्यामोह कखनहु ओकरा अपन कर्तव्य-पथ सँ डिगेतै नहि, एहू लेल प्रतिबद्धता व्यक्त कयल गेलैए। अपन प्रतिबद्धता कें स्पष्ट करैत नागार्जुन स्वयं कहैत छथि-- 'वैचारिक प्रतिबद्धता को किसी पार्टी या राजनीति की परिधि में नहीं समझा जा सकता। वह धरती की तरह विराट और समुद्र की तरह गहरी होती है।' एहि प्रतिबद्धताक प्रतिज्ञा एहि पांती मे प्रकट भेलैक अछि, जतय कवि अपना कें 'जनकवि' कहैत अपन संपूर्ण दायित्व एकमात्र जनतेक प्रति व्यक्त करैत अछि--

'जनता मुझसे पू़छ रही है, क्या बतलाऊँ?

जनकवि हूँ मैं, साफ कहूँगा, क्यों हकलाऊँ?'

अथवा, 1950 मे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पर लिखल अपन कविता मे ओ कहैत छथि--

मैं न अकेला, कोटि-कोटि हैं मुझ-जैसे तो

सबको ही अपना-अपना दुख है वैसे तो

पर दुनिया को नरक नहीं रहने देंगे हम

कर परास्त छलियों को, अमृत छीनेंगे हम

                   आलोचक विजय बहादुर सिंह एक ठाम लिखने छथि जे 'नागार्जुन की कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम किसी बड़े परिवार के मुखिया की डायरी पढ़ रहे हों। और संयोग से वह मुखिया चित्रकार भी है। नागार्जुन अपने इस परिवार के सुख-दुख, राजी-खुशी, संघर्ष-प्रयत्न और सुबह-शाम तक की दिनचर्या से न केवल परिचित हैं बल्कि उसके भागीदार भी हैं।' एहि परिवारक विस्तार कतेक टाक अछि? खेत मे काज केनिहार खेतिहार मजदूर, किसान, महानगर मे रिक्शा-ठेला घिचनिहार पालक बोझ ढोनिहार मजूर, बस-ट्रामक ड्राइवर, फैक्टरी सभक चटकल मजदूर, धान कुटनिहारि किशोरी, फुटपाथ पर पड़ल भिखारि, बौक-बहीर-विकलांग लोक, असहाय बुढ़ारी काटनिहार वृद्धजन, हिमालयक बर्फ लादल पहाड़ पर देशक रक्षा लेल प्रतिबद्ध सैनिक, सामाजिक बर्बरताक शिकार होइत स्त्री लोकनि, अपन देह सँ कमाइ केनिहारि विज्ञापन-सुन्दरी लोकनि, कूड़ा-कचराक ढेर सँ भोज्य पदार्थक संग्रह केनिहार भुखाहल लोक सब-- आदि-आदि जतय धरि विस्तार पबैत हो, नागार्जुनक कविता ओतय धरि पसरल अछि। एहन-एहन समस्त लोक नागार्जुनक कविता-जगत मे हबगब बनेने रहैत छथि। साधारण जनक यैह हबगब नागार्जुनक आन्तरिक शक्तिक स्रोत छियनि। एहि तथ्य कें कतेको ठाम लिखित रूप मे स्वीकारलनि अछि जे 'संघर्षशील जनता का विपन्न बहुलांश ही मुझे शक्ति प्रदान करता है। कोटि-कोटि भारतीयों के वे निरीह, पिछड़े हुए, अकिंचन, दुर्बल समुदाय जो चाहने पर भी अपना मतपत्र नहीं डाल पाए, मेरी चेतना उनकी विवशताओं से ऊर्जा हासिल करेगी।'

                हुनक कविताक एक दोसर विस्तार ओहि दिस जाइत अछि जतय यथास्थिति कें बदलबाक लेल दुर्गम क्रान्तिक बाट पकड़निहार युवा लोकनि छथि। आजादी सँ पूर्वक सहजानंदक किसान-आन्दोलन हो, तेलांगनाक पचासक दशक के विद्रोह हो, साठि के दशकक नक्सलबाड़ी विद्रोह हो, सत्तर के दशकक आपातकालक विरोध मे उठल जेपीक आन्दोलन हो, नागार्जुन कें साक्षात रूप मे ओहि ठाम उपस्थित सेहो देखल जा सकैत अछि, एकर अतिरिक्त जे हुनकर कविता मे ई ऐतिहासिक घटना सब पूरा विस्तार मे आयल अछि। आ एतबे किएक, महाग उपेक्षित फल कटहर, आम तौर पर घृणापूर्वक स्मरण कयल जायब जीव सुग्गर, महाशय बेंग, चतुर बिज्जी, कनहा कुकूर, 'मटिया' नामें मशहूर किरासन तेल, कतहु नीमक कतहु बच्चा चिनारक गाछ-- आदि-आदि-- एहि सबटा कें नागार्जुनक कविताक नागरिकता भेटल रहैक। विचारला पर लगैत अछि जे सर्वहाराक सामाजिकता आ श्रम-परायणता सँ आत्मबुद्धि रखनिहार कवियेक दुनिया मे एहन ई सब होयब संभव भ' सकैत छल।

               नागार्जुन प्रगतिशील कवि रहथि। स्वयं अपनहु ओ कतेको ठाम प्रगतिशीलता कें परिभाषित केलनि अछि। कुल्लम बात यैह जे प्रगतिशीलता कें कोनो खास राजनीतिक दल वा विचारधारा सँ बान्हि कें नहि देखल जा सकैत अछि। ई किछुएक नारा वा निर्देशित विषय धरि सीमित नहि अछि। प्रगतिशीलता ने तँ कोनो 'विषय' थिक, ने कोनो 'शैली'। ई एक संपूर्ण जीवन-दृष्टि थिक जे समस्त विषय-वस्तु आ शिल्प-शैली मे अन्तर्निहित भ' सकैत अछि। नागार्जुनक प्रकृति-कविता मे एहि चीज कें बेसी स्पष्ट रूप मे देखल जा सकैत अछि, खास क' क' तखन, जखन हुनकर कविता कें अन्तश्चेतनावादी कवि लोकनि, यथा अज्ञेयक कविताक समानान्तर राखि क' देखल जाय। नागार्जुनक लग मे गर्मी-जाड़, रौद-छाँह, पानि-अकाल, आगि-पानि, पर्वत-रेगिस्तान आदि अब कथूक कविता अछि, आ से केवल आँखि देखल हो, ततबे टा नहि, हुनकर समस्त अभिव्यक्ति प्रत्यक्ष स्वानुभूति सँ जनमल अछि, जे कि कोनो पर्यटक कें नहि, ओहि सभक बीच जीवन जीनिहार मनुक्खे कें उपलब्ध भ' सकैत अछि। श्रम-परायणता कें विशिष्ट माननिहार कोनो सर्वहारा कविये के जीवन-दृष्टि मे ई वस्तु अर्जित भ' सकैत छैक।

                प्रगतिशीलताक संसार मे जतबे आवश्यक इतिहास-बोध होइत छैक, ततबे वैज्ञानिक बुद्धि। नागार्जुनक वैज्ञानिक बुद्धि पर कम बात होइत अछि, तें एकर किछु दृष्टान्त एतय राखय चाहब। 1960 के लिखल हुनकर एक कविता छनि-- 'दूर बसे उन नक्षत्रों पर'। स्मरण करी जे 1960 ओ वर्ष छल, जहिया सोवियत संघ अंतरिक्ष मिशनक आरंभ कयने रहय। प्रथम अंतरिक्ष-यात्री यूरी गगारिन के अंतरिक्ष-यात्रा तँ अप्रैल 1961 मे भेल, मुदा 1960क लगभग समुच्चा वर्ष सोवियत संघक एहि अभियानक चरचा आ उत्तेजना सँ भरल रहल। पृथ्वीग्रक वासी लोकनिक लेल ई बहुत पैघ समाचार छल। नगार्जुन एही विषय पर ई कविता लिखने रहथि। एहि कविता मे अतिशय रचनात्मक भ' क' ओमानव-जातिक सुन्दर भविष्यक एतय रूपरेखा रखलनि अछि। कविताक पांती छै--

दूर बसे उन नक्षत्रों पर

टहल-बूलकर

मानव वापस आ जाएँगे

ग्रह-उपग्रह अविजित न रहेंगे

अंतरिक्ष के उद्यानों में

निर्भय-निरातंक मानव-शिशु

निशिदिन मुक्त विहार करेंगे

कविताक बिच्चहि मे हुनका त्रिशंकुक मिथक मोन पड़ै छनि तँ कहैत छथि जे ओहू बेचारा कें आब जनम-जनम के अभिशाप सँ मुक्ति भेटि जेतैक। आब तँ जानि नहि कतेको कतेक विश्वामित्र जन्म लेता जे कतेको कतेक सृष्टि ठाढ़ करबा मे सफल हेता। विज्ञानक उद्यम सँ स्थान-कालक सीमा समाप्त होयत। कोन्नहु मौसमक फूल कोनो आनो मौसम मे फुला सकतै। दूर अंतरिक्षो मे आब दिव्यधाम वास्तविकता मे सुशोभित हेतै। ठीक एही ठाम हुनका महाकवि कालिदास स्मरण अबै छथिन जिनकर मेघदूत मे वर्णन भेलैक अछि जे अलकापुरी मे दुख नामक कोनहु वस्तु वा स्थितिक अस्तित्वे नहि छल। लिखैत छथि--

आँसू होंगे, सुख के होंगे

दुख के आँसू कहीं न होंगे

सारी उम्र जवानी होगी

छेड़छाड़‌ होंगे प्रियतम के

और प्रिया के

वर्ना यों तो जनजीवन में

कहीं कलह का नाम न होगा

-- आइ भने चरित्रहीन-नीतिविहीन नर-वानर राजनेता सब कविक एहि स्वप्न-- कहीं कलह का नाम न होगा-- कें साकार हेबा मे निरंतर बाधक बनल हो, मुदा मोन रखबाक चाही जे मनुष्यताक चरम लक्ष्य यैह थिक।

                एहि ठाम एक नजरि हुनकर कालजयी कविता 'अकाल और उसके बाद' मे आयल किछु दृश्य पर देब सहायक होयत। बुझले बात अछि जे कुल आठ पांतिक ई कविता दू बन्ध मे दृश्यांकित अछि, पहिल मे अकालक चित्र छैक आ दोसर मे ओकर बादक। अकालक बाद जखन पहिल बेर घर मे दाना एलैक अछि, तँ तकर दृश्य कें अंकित करबाक लेल कवि तीन टा चित्र खचित केलनि अछि। पूरा बन्धे देखल जाय--

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठीं घर भर की आँखें कई दिनों के बाद

कौए ने खुजलाईं पाँखें कई दिनों के बाद

            आँगन सँ ऊपरक दिस उठ' बला धुइयाँक दृश्य प्रसन्नतासूचक थिक। मुदा, ओहू सँ विशेष अछि कौआक पाँखि कुरियेबाक चित्र। बात स्पष्ट भ' रहलैक अछि जे कौआ बेचारा तँ रोज एहि अँगनाक ऊपर आबि क' बैसैत छल, मुदा भोजन-भातक कोनो लक्षण नहि पाबि क' निराश घुरि जाइत रहय। आइ ओ आँगनक ऊपर धुइयाँ उठैत देखलकै तँ बुझि गेल जे दाना एलैक अछि, किछु ने किछु गुंजाइश ओकरे लेल आइ जरूरे हेतै। एहि खुशी मे अपन लोल सँ ओ अपन पाँखि कें कुरिया रहल अछि। आलोचक नन्दकिशोर नवल लिखलनि अछि जे 'चमक उठीं घर भर की आँखें' धरि तँ कोनो दोसरो सुकवि पहुँचि सकै छला, मुदा तकरा बादक जे दृश्यांकन छै, 'कितने कवियों की पहुँच यहाँ तक होती है?'

           नागार्जुनक प्रकृति-कविताक बारे मे विजय बहादुर सिंह लिखलनि अछि जे ओ असकर एहन कवि छथि जिनका ओतय बेंग सभक कबदेबा सँ खिन्न कोइली राति-राति भरि कनैत अछि। बड़का गबैया भेलीहे, अपना कें बहुत काबिल नहि बरु सब सँ काबिल बुझैवाली। नागार्जुन एहि 'बहुत' कें छांटैत चलैत छथि। हुनका ओतय सबहक हैसियत बराबर अछि। क्यो ककरो सँ कम नहि, बेसियो नहि। यैह हुनकर कविताक साम्यवाद थिक आ यैह थिक हुनकर परिवार-दृष्टि। सौंसे संसार एही रूप मे एक परिवार थिक। यैह कारण थिक जे ओ 'मेरी भी आभा है इसमें' सन कविता लिखि पबैत छथि। एहि कविता मे पांती अबैत छैक--

भीनी भीनी खुशबू वाले

रंग बिरंगे

यह जो इतने फूल खिले हैं

कल इनको मेरे प्राणों ने नहलाया था

कल इनको मेरे सपनों ने सहलाया था


पकी सुनहली फसलों से जो

अबकी यह खलिहान भर गया

मेरी रग-रग के शोणित की बूँदें इसमें मुसकाती हैं


नये गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है

यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है

मेरी भी आभा है इसमें।

            बीसम शताब्दीक भारतीय साहित्य मे नागार्जुन सर्वाधिक यायावर साहित्यकार रहल छथि। एहि यायावरीक बहुतो लाभ हुनका कविता कें भेटलनि अछि। विषयक विविधता ततेक जे जाहि कोनो भावक चाहैत होइ, हुनका कविता मे उपलब्ध भेटत। तहिना भाषा-शैली, कतहु नारा जकाँ, कतहु गीत जकाँ, कतहु सम्यक् छन्दोबद्ध तँ कतहु विलक्षण लयात्मक गद्य-- नागार्जुनक भिन्न-भिन्न भाँतिक विविधता ततेक पसार लेने अछि जे चकित करैत अछि। 'मंत्र कविता' मे ओ कहैत छथि--

'ओम् दलों मे एक दल अपना दल, ओम्

ओम् अंगीकरण, शुद्धीकरण, राष्ट्रीयकरण

ओम् मुष्टीकर, तुष्टीकरण, पुष्टीकर

ओम् एतराज, आक्षेप, अनुशासन

ओम् गद्दी पर आजन्म वज्रासन

ओम् ट्रिब्यूनल, ओम् आश्वासन

ओम् गुटनिरपेक्ष सत्तासापेक्ष जोड़-तोड़

ओम् छल-छद्म, ओम् मिथ्या, ओम् होड़महोड़

ओम् बकवास, ओम् उद्घाटन

ओम् मारण-मोहन-उच्चाटन।'

आ, हुनकर ई प्रखरता 10 जुलाइ 1997 कें लिखल हुनकर अंतिम कविता 'मायावती-मायावती' मे ओहिनाक ओहिना देखल जा सकैए--

'जय-जय हे दलितेन्द्र

आपसे दहशत खाए केन्द्र

अगल-बगल हैं पंडित सुखराम

जिनके मुख में राम

सोने की ईंटों पर बैठे हैं

नरसिंह राव

राजा होंगे आगे चलकर

उनके पुत्र प्रभाकर राव।'

                नागार्जुनक कविताक विशेषता रहनि जे ओहि मे तत्कालीन देश-काल के पूरा-पूरा विवरण पाओल जा सकैत छल। ओ जनताक रोजमर्राक विकट समस्या सब कें अपन कविताक विषय बनाबथि। हड़ताल हो वा आन्दोलन, नागार्जुन कें जनताक मुद्दाक संग बनल देखल जा सकैत छल। ओ अपना कें जनान्दोलनक कवि मानथि, आ संतोषपूर्वक कहथि जे 'अगले पचास वर्षों बाद जब हिन्दी कविता की जीवन्तता के प्रमाण खोजे जाएँगे तो हमारी वे पंक्तियाँ उद्धृत की जाएँगी जो चलताऊ ढंग से आन्दोलनों को लक्ष्य करके लिखी गयी हैं।' मुदा, एकर एक दोसर पक्ष सेहो छल। हिन्दीक परंपरित आलोचना मे नागार्जुन-सन कविक मूल्यांकनक वास्ते कोनहु निर्धारित निकष नहि छल। दोसर, एहन-एहन संघर्षधर्मी गरीब-किसान-मजदूर-सर्वहाराक संकट कें व्यक्त करबाक लेल नागार्जुन जाहि यथार्थ, जाहि भाषा आ जाहि शिल्पक नित नवीन प्रयोग कयने चलल जाइत रहथि, ई सब मिलि क' हुनकर मूल्यांकन आरो बेसी कठिन बना दैत छल। तेसर बात इहो छल जे बहुत शुरुहे मे, 1958क जबाना मे, नागार्जुन आलोचक लोकनि कें उघार करैत, आ कवि-आलोचकक साहित्येतर गठजोड़ कें देखार करैत, 'कीर्ति का फल' शीर्षक कविता लिखने छला जे जतबे छोट छल, ततबे बेसी मारक। ओ कविता अछि--

नागार्जुनक कविता मे वर्तमान के बहुत महत्व छल, जखन कि कविता विधा कें आम तौर पर पश्चगामी मानल जाइत रहल अछि। वर्तमानक यथार्थ मे कैक स्थिति एहन होइत छैक जे निर्माणाधीन अवस्था मे रहैत छैक। ओहि अवस्था पर कविता-लेखन सँ सामान्यत: पैघ कवि सब परहेज करैत रहला अछि। मुदा, नागार्जुन कें कहियो एहि सँ एकदम्मे परहेज नहि रहलनि। कतेको कविता तँ ओ वर्तमाने नहि, तात्कालिक वर्तमानक विषय मे लिखलनि। एकर जे खतरा होइत छैक, तकर सामना नागार्जुन कें सब दिन करय पड़लनि। हुनका बारे मे कतेको गोटे एहन मत रखैत छला जे नागार्जुनक कोनो पक्का स्टैंड नहि होइत छनि। आइ जकर विरोध मे लिखलनि, संभव अछि काल्हि ओकर प्रशंसा मे लिखथि। एकर दू कारण छल। पहिल कारणक तह मे जाइ तँ हमसब देखब जे प्रधानमंत्री नेहरूक खिलाफ ओ एक सय सँ बेसी कविता लिखलनि। बहुलांश विरोधपरक। मुदा, अपन कविता मे जाहि राजनेताक ओ सर्वाधिक फज्झति केलनि, ओ इन्दिरा गाँधी छली। 'इन्दुजी, इन्दुजी क्या हुआ आपको?' तँ किछु कोमल लागत जँ इन्दिराक विरोध मे लिखल आन-आन हिन्दी-संस्कृत कविता कें संग क' क' देखल जाय। मुदा गौर करबाक बात छै जे वैह नागार्जुन एक समय मे इन्दिरा कें 'दुर्गाक अवतार' बता चुकल रहथि आ हुनकर प्रशंसा मे अनेक कविता लिखने रहथि। कारणक पड़ताल करी तँ पायब जे तहियाक बात भिन्न रहैक। हमसब पबैत छी जे 1969क राष्ट्रपति-चुनाव मे काँग्रेसक दक्षिणपंथी घाघ तबका, जकरा आइ-काल्हि 'स्लीपर सेल' कहल जाइत छैक, ओ अपन बड़ भारी दबाव बना लेने रहय, आ प्रधानमंत्री कें टेरै लेल तैयार नहि। मुदा, केवल नागार्जुने नहि, देशक समस्त लोकतांत्रिक सोच राखनिहार लोक कें ई देखि क' बहुत बल भेटल रहनि जे इन्दिरा  हिनका सब कें नथलनि, कदापि झुकली नहि आ अपना लेल समाजवादी बाट चुनलनि। हुनकर दूटा फैसला एहन भेलनि जे क्यो बहुत बहुत बहादुरे प्रधानमंत्री ई फैसला ल' सकैत रहथि। एहि मे सँ एकटा तँ छल बैंक सभक राष्ट्रीयकरण, आ दोसर, भूतपूर्व जमीन्दार सब कें प्रतिवर्ष देल जाइ बला प्रीवी पर्स, जे कि करमुक्त आय होइ छलै आ जकर प्रावधान संविधान मे कयल गेल छल, कें सदा-सर्वदाक लेल समाप्त करब। एकरा लेल इन्दिरा सरकार कें संविधानक छब्बीसम संशोधन करय पड़ल छल। नागार्जुन किसान सभाक जोरदार राजनीति मे भाग ल' चुकल छला। किसान सभाक प्रमुख माँग यैह रहैक जे जमीन्दारी उन्मूलन कयल जाय आ जमीन्दार लोकनि कें कोनो कोनो मुआवजा नहि देल जाय। पहिल माँग तँ पूरा भ' चुल रहै मुदा दोसर माँग पूरा करबाक हिम्मत ककरो नहि होइ छलै, जकरा इन्दिरा गाँधी आबि क' पूरा केलनि। नागार्जुन इन्दिराक प्रशंसा मे कविता लिखलनि--

नये हिन्द में आ धमका है नया जमाना

मुश्किल होगा इसको अब पीछे लौटाना

देख-देखकर इसकी गति-मति

हाथ मलेगा लगातार निक्सन का नाना

        एही समय नागार्जुन इन्दिरा मे दुर्गा-रूप देखने छला--

महिषमर्दनी के त्रिशूल का तगड़ा-तगड़म्

महीं चलेगी अगड़म-बगड़म्

         सिंडीकेटक घाघ काँग्रसी महाप्रभु सब पर ओ लिखने रहथि--

गाँधी-तिलक-सुभाष, सभी से परिचित उनकी आँत

वही इन्दिरा की गर्दन पर चले गड़ाने दाँत

          गौर कयल जाय, गाँधी-तिलक-सुभाष कें जमीन्दार लोकनि खा क' पचा गेल रहथि, तें तँ हिनका सभक अँतरी ओहि लोकनिक स्वाद सँ परिचित रहय। सही बात छै जे गाँधी लोकनि तँ जमीन्दारक मददगार छला, कारण हुनका सभक फंडिंग ओतहि सँ भ' रहल छल। दोसर, जमीन्दार सब खुलेआम घोषणा क' देने रहथि जे जँ हमरा सभक हक मारल गेल तँ जिम्मेदार नेता सब कें ओ लोकनि मारि क' गंगा मे बहौता। एम्हर, नागार्जुन तँ एहि मिजाजक रहथि जे 15 अगस्त 1947क मध्यरात्रि मे, जखन कि केवल देश आजाद भेल रहै, जमीन्दारी उन्मूलन नहि, अपन कविता मे अपन स्वप्न लिखने रहथि--

खाक बन गये सूर्यवंश-चन्द्रवंश के ठूँठ

तलवारें गल गयीं आँच में, बिकी रत्नमय मूँठ

             एते बात जनलाक बाद कोनो आश्चर्य नहि हेबाक चाही जे वैह कवि, ओही दशक मे, ओही इन्दिरा पर ई कविता लिखलनि--

ठगों-उचक्कों की मलिकाइन/ प्रजातन्त्र की ओ हत्यारी

अबके हमको पता चल गया/ है तू किन वर्गों की प्यारी

अपने भोलेपनके चलते/ माई, हम तो मात खा गये

तेरे पालित पशु फसलों की/ एक-एक पत्ती चबा गये

           बात की रहै? बात रहै जे 1971क चुनाव मे इन्दिरा भारी बहुमत ल' क' जीतल रहथि। सम्पूर्ण शक्ति इन्दिरा मे निमज्जित भ' गेल रहै-- इन्दिरा इज इंडिया। सरकारक कामकाज मे भारी भ्रष्टाचार व्याप्त रहै, कहल जाइत रहै जे अवैध उगाहीक अंश प्रधानमंत्री आवास धरि जाइत रहै, जकर मूल संरक्षक रहथि संजय गाँधी, इन्दिराक द्वितीय पुत्र। संजय लोकतन्त्रक लेल भारी खतरा बनि गेल रहथि, जखन कि हुनका लग कोनो संवैधानिक पद नहि रहनि। कुलदीप नैयर संजय गाँधीक दुस्साहसक विवरण दैत लिखने छथि जे जायज-नजायज पैरवी नहि सुनला पर संजय प्रधानमंत्री पर हाथ छोड़ि द' सकै छला, थापड़ चला सकैत रहथि। चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय-सन संस्था सब बेहिचक इन्दिरा कें लाभ पहुँचेबाक लेल तमाम मर्यादा तोड़ि सकैत छल। आमजन महँगाइ, कालाबजारी, बेरोजगारी आ निरंतर बढ़ैत अपराध सँ त्रस्त छल। आगू आपातकाल घोषित हेबाक रहै। एहि परिस्थिति मे नागार्जुन ई कविता लिखने रहथि। हुनकर बांकी कविता सब पर जँ ढुलमुल हेबाक आरोप लगैत हो तँ निस्तुकी करबाक लेल ओहि कविता सबहक पृष्ठभूमि मे जा क' देखबाक चाही।

            एहि विषयक दोसर आरोप ई कयल जाइत छैक जे जनान्दोलन आ राजनीतिविषयक हुनकर विचार समय-समय पर बदलैत रहल। एकर सब सँ पैघ उदाहरण देल जाइछ जे जेपीक सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन मे ओ सहयोगी बनला, जखन कि साम्यवादी पार्टी सब एहि सँ दूरी बनेने छल। ओ किएक एहि आन्दोलन मे शरीक भेल छथि, ताहि विषय पर हुनकर कथन आ कविता दुनू पर्याप्त तर्कसंगत छैक। मुदा, लगले देखल गेल जे एहि आन्दोलन सँ ई कहैत ओ अपना कें अलग क' लेलनि, जे हम गलत संगत मे चलि गेल छलहुँ आ एकर बोध भेला पर आब अपना कें एहि सँ अलग करैत छी। बोध ई छल जे एहि संपूर्ण पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघक कब्जा अछि जे अपन वैधता प्राप्त करबाक कोशिश मे छल। ई बोध हुनका जेल मे भेलनि, जकर पूरा विवरण 'युगों का यात्री' वा अन्यत्र देखल जा सकैत अछि। अपन गलतीक स्वीकार आ तकरा संशोधित करबाक जतन नागार्जुन पूरा जीवन निमाहलनि। एहि ठाम महान आलोचक रामविलास शर्माक एहि विश्लेषण, जे कि अजय तिवारी द्वारा लेल गेल एक इन्टरव्यू मे कहने रहथिन, के स्मरण अप्रासंगिक नहि होयत-- 'नागार्जुन की ये बहुत बड़ी विशेषता है कि उन्होंने हमेशा जन-आन्दोलनों के साथ चलने की कोशिश की है। सम्भव है कि जन-आन्दोलन के साथ चलने में वे बहुत जगह भटके हों। सवाल यह है कि जन-आन्दोलन के नेता भटके हैं कि नहीं? मेरा खयाल है कि नेताओं से नागार्जुन कम ही भटके हैं। जो उनका भटकाव है वह सहज है। वे समझ नहीं पाए हैं। उन्होंने बेईमानी की नीयत से कोई काम नहीं किया, जबकि जन-आन्दोलन के नेताओं के बारे में यह ईमानदारी के साथ कहना बहुत मुश्किल बात होगी।'

              नागार्जुनक कविता सभक एक बहुत पैघ महत्व एहि बात मे अछि जे ओ सदैव नवतुरिया कें संबोधित छथि। हरदम हुनका ई प्रयत्न करैत देखल जा सकैत अछि जे हुनकर जीवन आ कृतित्व नव पीढ़ीक हिम्मत आ मनोबल कें बढ़ा सकैक। एक जबाना छल जखन देशक सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय सभक जीनियस सामाजिक आ आर्थिक अन्यायक विरोध मे हथियार उठा लेने रहै। शासन-प्रशासनक नजरिया एहि बारे मे की आ केहन रहलैक अछि, से ककरो सँ नुकायल नहि अछि। मुदा, नागार्जुनक की नजरिया रहनि?  संबलपुर विश्वविद्यालयक छात्रावास मे श्रीकाकुलम के लड़ाका सब सँ भेंट भेला पर ओ ई कविता लिखने रहथि--

'मैं तुम्हारा ही पता लगाने के लिए

घूमता फिर रहा हूँ

सारा-सारा दिन : सारी-सारी रात

आगामी युगों के मुक्ति-सैनिक, कहाँ हो तुम? 

निपीड़ित-शोषित मानवता के उद्धारक, कहाँ हो तुम?

आओ, सामने आओ बेटे!

मैं तुम्हारा चुम्बन लूँगा

मैं तुम्हें अपना चुम्बन दूँगा।'

           मुदा हुनकर एहन कविता सभक एक पक्ष आर अछि। निर्बल कें बल दियय, हारल कें जितबाक भांज बताबय, भटकल कें दिशा देखाबय, हिया हारल कें आत्मीय उत्साह दियय-- सीधा-सीधा अभिधा मे-- एहनो कविता नागार्जुन लग मे बहुत छनि। एहने एकटा कविता सँ एहि अध्यायक समापन करब नीक हेतै-- 'ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या!'--

          'ऐसा भी तन क्या!/ ऐसा भी देह क्या!/ सह न सके--/ शीतातप-वृष्टि-उमस../ पुलक, पसीना/ प्रभंजनी वात्याचक्र/ चरम ठिठुरन, हड़कम्प/ लू के थपेड़े, विघूर्णन.../ सह न सके, आँतों की मरोड़/ ऐसा भी देह क्या!/ ऐसा भी तन क्या!

         ऐसा भी मन क्या!/ ऐसा भी बुद्धि क्या!/ कर न सके प्रपंचों का छेदन-भेदन.../ घबराए जरा-जरा बातों में/ अकारण बिदके, पग-पग पे रूठ जाए/ पहन ले दम्भ का मुकुट/ पचा नहीं पाए ग्लानि और अपमान/ ले नहीं पाए प्रतिशोध/ क्षमा ही क्षमा करता चला जाए.../ ऐसा भी बुद्धि क्या!/ ऐसा भी मन क्या!

         ऐसे भी हम क्या!/ ऐसे भी तुम क्या!/ रूठ जाएँ पग-पग पे/ पग-पग पे मान जाएँ/ सोंधते रहें जुगत भीतरघात की/ कदर नहीं करें दिन की, रात की/ पल-पल खोते चलें/ छिन-छिन रोते चलें/ औरों की सिद्धि पर सिर धुनें/ दूर की ढोल पर गप्प ही गप्प बुनें/ आज के काम टालें कल पर/ तर्क ही तर्क करें--/ सीप की चमक पर, छायामय जल पर/ ऐसे भी हम क्या!/ ऐसे भी तुम क्या!।'

       गौर करबाक बात छैक जे कविताक शुरू मे जे देह आ मन एलैए, से ककर थिक? ओ के थिक जकरा आदर्श मानि कहल गेलैए जे मनुक्ख कें ओहन हेबाक चाही। ओ श्रमशील सभ्यताक मनुक्ख थिक, जे देश के उत्पादक वर्ग थिक, कहल जाय जे वास्तव मे देश वैह थिक। कते विलक्षण, कते ठोस हकीकत के बात थिक जे बौद्धिक श्रमक समतुल्य शारीरिक श्रम कें नागार्जुन राखि रहल छथि आ श्रमिक वर्ग कें बौद्धिक वर्गक समतुल्य मनुष्यता के गरिमा स्थापित करैत छथि। एहि कविता मे देह, मन, बुद्धि आ जीवनशैली के आधार पर जकरा ओ आदर्श मानै छथि, असल मे वैह हुनकर अन्तर्तम छनि, वैह ओ स्वयं छथि। अपन सम्पूर्ण लेखन मे ओ ओकरे प्रमाण मानलनि अछि, ओकरे बात कहलनि अछि।



           

'अगर कीर्ति का फल चखना है

कलाकार ने फिर-फिर सोचा--

आलोचक को खुश रखना है


अगर कीर्ति का फल चखना है

आलोचक ने फिर-फिर सोचा--

कवियों को नाथे रखना है।'

-- तें, हमसब पबैत छी जे जाहि कालखंड धरि दिनकर वा अज्ञेय अपना-अपना मठक मठाधीश भ' चुकल रहथि, ताहू समय धरि नागार्जुन एक गाम-शहर सँ दोसर गाम-शहर मे बौआइत नवतूरक कवि लोकनि के संगोर करैत, प्रगतिशील कविताक मानक पर चर्चा-परिचर्चा करबैत, भिन्न-भिन्न जनान्दोलन मे सदेह शामिल भ' क' अपन जनान्दोलनी कविता सभक पाठ करैत देखल जा सकैत रहथि। हुनकर कविताक स्वभाव पर आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय जे लिखने छथि, तकरा ठीक सँ अख्यास करबाक जरूरति छैक-- 'सब कुछ भोगते हुए और सबसे बँधकर भी सबसे बाहर आ खड़े होने का साहस नागार्जुन में था। कविता की शाश्वतता की उन्हें चिन्ता नहीं रही। जो चीजें जनता को उलझातीं, भीरु बनातीं, शोषित-पीड़ित करतीं, नागार्जुन की कविताएँ उनका हिम्मत के साथ विरोध करती थीं। उनकी कविता का जो राग-पक्ष है, वह भी आत्म-राग न होकर लोक-राग है। उनके भीतर महाकरुणा का निवास है, जो आत्मवंचना से नहीं, आत्मपीड़न की पराकाष्ठा से ही संभव होता है।'

            

Thursday, April 16, 2026

हरिमोहन बाबूक स्मृतिकण


 .    डाॅ. भीमनाथ झा          

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       कठिन अछि हमरा लेल हुनक संस्मरणक दू-चारि टा बानगी देब। हुनक जीवनक अन्तिम एगारह वर्ष धरि हुनका हम देखलियनि– लगभग सभ दिन, दिनमे दुइयो बेर, तिनियो बेर– 1982 मे दरभंगा अयबासँ पूर्व धरि, पटनामे रहलापर।

       कहलहुँ– कठिन अछि। से, लगले गड़बड़ा गेलहुँ। “हुनका हम देखलियनि”-- कतेक भारी फूसि बजना गेल ! हुनका सन महान् लेखककेँ, पहुँचल दार्शनिककेँ, वाग्देवीक वरदपुत्रकेँ भला हमर कोन मोल अछि जे हम अभिमान करी ई कहबाक ज़े ‘हुनका देखलियनि।’ हम तँ ओहि विशाल वटवृक्षक छाहरिमे ओतबा दिन अपनाकेँ, अपन अस्तित्वकेँ देखैत रहलहुँ,नपैत रहलहुँ। देखैत रहलहुँ जे कोना-कोना हंस थाकल-ठेहिआयल मानसरोवरक ताकमे अबैत अछि आ जड़ि लग सुस्ताइत, सरस्वती-दुग्धक पान करैत उड़ि जाइत अछि ! कोना-कोना हाथी आ सांढ़, भेड़ा आ बकरा, गाय आ महीस, कोकिल आ सूगा, खढ़िया आ चुहचुहिया चारू दिससँ टघरल पहुँचैत अछि आ हलसल बहराइत अछि ! वटवृक्ष ओहिना चतरल-पसरल, ओहिना भरल-फड़ल, ओहिना डोलैत-झूमैत, हँसैत-खिलखिलाइत रहैछ। ऋतुक कोनो टा प्रभाव नहि– सभ दिन सदाबहार, एभर ग्रीन।

       फेर गड़बड़ ! एभर ग्रीन ओ अवश्य रहल होयत कहियो‌। ओकर हाड़-काट, ओकर ठाठ-बाट से कहैत छैक। ठोरक मुस्की अपन स्वर्णिम अतीतक अति मीठ कथा अनायासे सुना जाइत छैक। मुदा ओहि वटवृक्षक छाहरिमे हम जहिया गेलहुँ, तकर बादसँ जहिया धरि ओ ठाढ़ रहल– झंझावात बहैत रहलैक बेसी काल– कालक। ओकर जड़िकेँ झिकझोड़ि देलकैक, हिला देलकैक। जीवनी शक्तिक सीर खटाखट टूट’ लगलैक। माटि छोड़’ लगलैक। देखैत-देखैत ओ गाछ की-सँ-की भऽ गेल !

       की-सँ-की तँ भऽ गेल– मुदा से अपना लेल। अपन छाहरिमे आब’वला प्राणीकेँ ओहू स्थितिमे की-की ने देलक ओ ! जे केओ जे चाहलक, लेलक। जे जाहि कामना लऽकऽ पहुँचल, पूर भेलैक। जे निष्काम गेल, ओहो कृतार्थ भेल।

       अपना दऽ की कहू, हम तँ एगारह वर्ष, जे  केओ एगारह मिनट हरिमोहन बाबूक सान्निध्य लाभक सौभाग्य पौने होयता, कृतार्थ-कृतार्थ भेल होयता।

       हुनक हर्षक एक अवसरपर संग छलियनि– हुनक चारिम आ सभसँ छोट पुत्र भुवनजी (डा. मनमोहन झा---आब ओहो स्मृतिशेष)क विवाहक बरियातीमे सहरसा। मुदा, कष्टक पाँच-पाँच टा त्रासद क्षणक मर्मान्तक पीड़ाकेँ हुनका भोगैत काल लग रहियनि– एकमात्र बाल पौत्रकेँ मुखाग्नि देबा काल, मृत्युक मुँहमे जाकऽ बहरयबा काल, हुनक अहर्निश सेविका पत्नीक प्राण-वियोग काल, पहिल बेर पटनामे आंखिक आपरेशनक बाद मानसिक ओझरौटक स्थितिमे, दोसर बेर दरभंगामे आंखिक आपरेशनक बाद महायात्रा धरिक वेदना-घड़ीमे।


       — भीमजी, अहाँ हमर सुख-दु:ख दुनूमे संग रहैत छी। एकटा उपकार क’ दिय’। ई ‘जीवन-यात्रा’ कहुना पार लागि जाय, से उतार’ लेल एकटा नीक अक्षर लिखनिहारकेँ ताकि दिय’। हम उचित पारिश्रमिक देबै।

       – जी, तकबै। ता देल जाओ, थोड़े हमहीं उतारि दै छी।

       – नहि भीमजी, अहाँसँ नहि उतरबायब। अहाँ बड़ व्यस्त लोक छी। कोनो बेरोजगार लोककेँ ताकि दिय’।

       –जी, से जहिया भेटत तहिया। ता, थोड़ेक तँ हमहूँ कऽ सकै छी।

       – नहि -नहि, अहाँसँ ई काज नहि लेब।

       कमसँ कम एक दर्जन व्यक्ति हुनक ‘जीवन-यात्रा’क पाण्डुलिपिकेँ उतारने होयताह, विज्ञातसँ अज्ञात धरि। मुदा, हमरा एकोटा शब्द नहि उतार’ देलनि।

       हम कोना बुझबितियनि जे ओहिसँ बेसी जरूरी हमरा कोन व्यस्तता भऽ सकैत छल ? तर्कसँ हुनका के मना सकैत छल ?


       कहियो कालकऽ ‘मिथिला मिहिर’ हमरासँ सुनथि। से, परिचित-अपरिचितक ककरो कथा, ककरो कविता। सभसँ पराभवमे पड़ी नवकविता सुनयबा काल। कविता सुनि लैत छलाह, तखन पुछैत छलाह– एहि कविताक की अर्थ ?

       – कविकेँ कहबाक आशय छनि जे…

       – हम पुछैत छी जे कविता की कहैत अछि ?

       – जी, कविताक तात्पर्य छैक…

       – से कोना बुझैत छिऐक जे यैह तात्पर्य छैक ? एहि पांतीक माने की भेलैक ?

       – जी, नवकवितामे कोनो एक पांतीसँ अर्थ स्पष्ट नहि होइत छैक।

       – तँ दू पांतीसँ अर्थ स्पष्ट करू।

       – जी, दुइयो पांती…

       – तँ सभ पांती पढ़िकऽ अर्थ बुझा दिय’।

       –  ‘.....’

       – औ भीमजी, जँ अर्थ नहि बुझैत छिऐ तँ किए छपैत छिऐ ?

       – प्रतिष्ठित कवि छथि।

       – एहिसँ तँ हुनक प्रतिष्ठापर आघात लगैत छनि। नहि छापिए कऽ हुनक प्रतिष्ठाक रक्षा करबनि अहाँ।

       – रुष्ट भऽ जेता।

       – आ छपला उत्तर पाठक जँ रुष्ट भऽ जाय ?

       – ‘.....’

       – देखू भीमजी, अहाँ सम्पादक छी। जाहि वस्तुकेँ छापी, अर्थ बुझिकऽ छापी। पाठककेँ तँ उत्तर अहींकेँ देब’ पडत। हम ककरासँ पुछबैक ? कवि भेटितथि तँ हुनकेसँ पुछितियनि। ओ नहि छथि तँ अहाँसँ पूछब।

       – जी, आब बिना बुझने नहि छपबै।

       फेर, अगिलो सप्ताह कोनो-ने-कोनो एहन भेटिए जाइन आ फेर हम फेरमे पड़िए जाइ।


       किन्तु, ई सभ मनोरंजनार्थ करैत छलाह। नवका लेखकक प्रति जतेक स्नेह आ जेहन आह्लाद हुनकामे छलनि, नवीन पीढ़ीक प्रति प्रोत्साहनक भाव जतेक ओ रखैत छलाह, से कोनो पीढ़ीक वरिष्ठ लेखकमे दुर्लभ अछि।

       तिलकेँ ताड़ ओ बनबैत छलाह, मुदा खजूरकेँ बबूर बनबैत नहि देखलियनि। जनिकामे जे रहैत छलनि ताहिसँ बेसिए ओ कहैत छलथिन, बहुत बेसी। मुदा, ककरो कनियो कम कऽ कहैत नहि सुनलियनि। तनिक परोक्षोमे नहि।

       हुनक साहित्यिक उचाइक सम्बन्धमे की कहल जाय ? लोक अबैत रहत, जाइत रहत, हरिमोहन बाबूक साहित्य ओहिना चमकैत रहत। हुनक व्यक्तित्वक इन्द्रधनुषी कथा पसरैत रहत, बहुत-बहुत दिन धरि लोककेँ हँसबैत रहत‌।

       एखन बहुत दिन धरि बहुत गोटे रहताह जे हरिमोहन बाबूकेँ देखने होयताह, हुनकासँ गप्प कयने होयताह, हुनक लिखल चिट्ठी रखने होयताह।

       मुदा, एखनहुँ बहुत लोक नहि होयताह जनिका लग ‘कन्यादान’ होइन आ ‘कन्यादान’क लेखकक नीचाँ हरिमोहन बाबू स्वयं हस्ताक्षर कयने होथि। (ओकर फोटोकापी 23 फरवरीक अपन पोस्टमे देने छिऐ।)

       ‘कन्यादान’क लेखक– बापरे! कत्ते भारी लोक ! जेना सम्पूर्ण अतीत वर्तमान बनि गेल हो ! जेना वर्तमान अतीतमे हेड़ा गेल हो !

       हे भगवन्! हम सय वर्ष आर जीवी, से खाली एहि लेल जे ताहि दिनक लोककेँ जोर-जोरसँ कहिऐक– देख हमरा, ई मुँह प्रोफेसर हरिमोहन झासँ गप्प कयने अछि, ई हाथ हुनक चरण छूने अछि।

       आ, ताहि दिनक लोक हमर ठोरकेँ छुबिकऽ, हमर हाथकेँ दाबिकऽ तेहने सुख प्राप्त करत जेना ओ हरिमोहने बाबूसँ गप्प कऽ रहल हो, जेना ओ हुनके चरण छूबि रहल होइनि ! 

                        – भीमनाथ झा

                        (फरवरी, 1986)

Tuesday, January 6, 2026

हमरा लोकनिक भाइ साहेब: राज मोहन झा

                     पुण्य स्मरण

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--डाॅ. भीमनाथ झा

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       ई हमरा लोकनिक भाइ साहेब छला। उपेन्द्र दोषीक मुँहसँ हिनका प्रति अनायास बहरायल ई सम्बोधन मित्रमण्डलीमे लगले परिव्याप्त भ’ गेलनि। मैथिली साहित्यक पाठक आ प्रेमी लोकनि हिनका राज मोहन झाक नामसँ जनैत छथिन। मुदा, हिनक मूल नाम छलनि राम मोहन झा। ई नाम पितामहक राखल छलनि। एही नामसँ ई एम.ए. कयने रहथि एवं बिहार सरकारक श्रम एवं नियोजन विभागमे वरिष्ठ पदाधिकारी रहथि। राम मोहनकेँ राज मोहन पछाति ई स्वयं क’ लेने रहथि। ई हिनक साहित्यिक नाम थिकनि जाहिसँ ई विख्यात भेला। घर-परिवारमे पुकारक एक टा आर नाम रहनि, जेना अधिक गोटेकेँ रहै छै, हिनक रहनि– गोपालजी।

.     राज मोहन झा स्वनामधन्य छला। माने, हिनक परिचय लेल हिनक अपने कृतित्व पर्याप्त छलनि, पिता-पितामहक साहित्यिक यशस्विताक सोङरक प्रयोजन नहि छलनि। ओ अतिरिक्त गौरव छलनि हिनका लेल, जे कदाच कोनो विशिष्टे भाग्यशालीकेँ प्राप्त होइ छै।

.      भाग्यशाली तँ ई छलाहे। अपन समयक मैथिलीक शीर्षस्थ साहित्यकार पं. जनार्दन झा जनसीदनक पौत्र एवं आधुनिक युगक ‘गद्य-विद्यापति’ प्रो. हरिमोहन झाक ज्येष्ठ पुत्र होयब असाधारण भाग्यक बात थिकै। तकर हिनका गौरवो छलनि, ओहि प्रतिष्ठाक सुरक्षाक दायित्वबोधो छलनि, ओहि सम्पत्तिक संरक्षाक उद्योगो कयलनि, किन्तु अपन साहित्यिक व्यक्तित्वकेँ ओहि साम्राज्यक प्रभाव-क्षेत्रसँ आरम्भेमे मुक्त क’ लेलनि, बाहर आबि अपन रुचिक कलम लगौलनि, जकर फलकेँ ‘राजमोहन-खास’ कहि सकै छी। ओ कथा हो, निबन्ध समीक्षा हो, सामयिक टिप्पणी हो कि पत्र-सम्पादन हो, एत’ धरि जे चिट्ठी-पत्री वा वार्तालाप अथवा बहसे किए ने हो, सभमे ‘राजमोहन-खास’क भिन्ने सुवास भेटै छल। मैथिलीक पाठककेँ आगुओ ओ सुवास भेटैत रहत, जे आनसँ किछु फराक लगैत रहत।

.      हिनक व्यक्तित्व विरोधाभाससँ भरल छलनि। सामान्य लोक विरोधक अर्थमे विरोधाभासक प्रयोग करै छथि, जखन कि दुनूक अर्थ भिन्न-भिन्न थिक। विरोध थिक परस्पर विपरीत होयब– बातमे, विचारमे, स्वभावमे, उद्देश्यमे आदि-आदि। विरोधाभासमे विरोधक आभास टा होइ छै, वस्तुत: विरोध रहै नहि छै। होइ छै जे विरोध छै, मुदा वास्तवमे विरोध होइ नहि छै, अपितु पूर्वकथनक समर्थने होइ छै। तेँ साहित्यमे विरोधाभासकेँ अलंकार कहल गेलै अछि, उक्ति-चमत्कार मानल गेलै अछि।

.      भाइ साहेब एते श्रेष्ठ साहित्यिक परिवारक छला, अपनहुँ विशिष्ट लेखक रहथि, पैघ अफसर रहथि, बड़का-बड़का लोकसँ सम्पर्क रहनि, तथापि मामूलीसँ मामूली लोकसँ मित्रता राखथि, नवसँ नव लेखकसँ आत्मीयता जोड़थि, साहित्यमे नवप्रवेशियोक संग घंटा दू घंटा टहलि लेथि, संगहि जलपान-चाह करथि, ओकर जँ किछु नीक वस्तु लगनि तँ तकर व्यापक स्तरपर चर्चा करथि, नीक नहि लगनि तँ समक्षहुमे मिथ्या प्रशंसा नहि करथि, मार्गदर्शनो नहि करथि। अपन घनिष्ठ मण्डलीमे कदाच कखनो कटु भैयो जाथि, मुदा साहित्यिक कली लग हरदम मृदुले बनल रहथि। विषयकेँ कखनो हल्लुक ढंगे नहि लेथि, सभ खन अपेक्षित गम्भीरताक निर्वाह करथि। से गपोसपोमे, सामूहिक वार्तालापोमे, गोष्टी-संगोष्ठियोमे। युवातूरक संग तँ तते घुलि-मिलि जाथि जे ‘मान्य कथाकार राज मोहन झा’ लगले ‘भाइ साहेब’ भ’ जाथि, हिनक मित्र मण्डलीक ओ सदस्य बनि जाय। मुदा, जखन कखनो विषयपर लिखथि तँ ककरो ‘रोच’ नहि राखथि। उचित बात ने गोड़ि क’ राखथि, ने तोड़ि-मरोड़ि क’ बाजथि, साफ-साफ जोरसँ बाजथि, झिकझोड़ि देथि। तेँ कहलहुँ जे विरोधाभासी व्यक्तित्व रहनि। ई गुण विरल लोकमे पाओल जाइछ।

.      पटना बिहारक राजधानी रहलाक कारणे प्रदेशक राजनीतिक-सांस्कृतिक- साहित्यिक केन्द्र स्वत: भ’ गेल अछि। विश्वविद्यालय आ सचिवालय रहलासँ सभ दिन मिथिलोक बुद्धिजीवीक ओत’ जमघट रहल अछि। 1960 मे साप्ताहिक ‘मिथिला मिहिर’क पुन: प्रकाशन शुरू भेलाक बाद तँ मैथिली साहित्योक प्रधान केन्द्र मानल जाय लागल। उतार-चढावक दौड़ अस्वाभाविक नहि, ताहि हिसाबेँ 1970 आ 80क दशकक युवासाहित्यकारक जुटान आ सक्रियताक उठान-काल छल। प्रभासजी-गुंजनजी, प्रवासीजी-कुलानन्दजी, रमानन्द झा रमणजी-सुकान्तजी, मुखियाजी-बटुकभाइ (गौरीकान्त चौधरी कान्त- छत्रानन्द सिंह झा), शशिकान्तजी-पूर्णे्न्दुजी पहिनेसँ सक्रिय रहथि। राँचीसँ किछुए आगाँ-पाछाँ मोहन भारद्वाज आ उदयचन्द्र झा विनोद, राजमोहनजी (दिल्लीसँ, मुदा मानल जाथि ई राँचिए ग्रुपक) आ उपेन्द्र दोषी तथा हमहूँ पटना पहुँचि गेलहुँ। पटना क्रमश: अग्निपुष्प, विभूति आनन्द, केदार कानन आदिकेँ मैथिलीसँ जोड़ैत नव-नव परती तोड़ैत रहल।

.      भाइ साहेबक नोकरी बदलीवला रहनि। अस्सीक दशकमे ओ बोकारो, फेर दरभंगा गेला, पुन: पटनामे स्थापित भ’ गेला। ताहि सभसँ पहिने मुजफ्फरपुर, राँची, दिल्ली आदिमे सेहो पदस्थापित छला। भाइ साहेब जत’ रहला, सदा सक्रिय रहला, मैथिली लेल सोचैत रहला, चिन्तन करैत रहला, आन सभकेँ चरियबैत रहला, सभ टा गतिविधिक टटका जानकारी रखैत रहला, जत’ जरूरी बुझथि हस्तक्षेप करैत रहला। ओ जत’-कतहु रहला, अपन मित्रमण्डलीसँ पत्राचारक माध्यमे लगातार जुड़ल रहला, अपन गतिविधिक जानकारी दैत रहला, हुनक लैत रहला। जत’ आवश्यक बुझथि, टोकैत रहला। 

       भाइ साहेब आदर्श पत्रलेखक छला। हुनक पत्र बहुत आत्मीय, साफ-साफ, मैथिलीक अद्यतन गतिविधिक सूचनासँ सज्जित, प्राप्त जानकारीक संप्रेषण एवं नवीन जानकारी पयबाक उत्कंठासँ ओतप्रोत रहै छल। बहुतो मित्र लग हुनक बहुतो पत्र होयतनि। आब आवश्यक अछि जे हुनक उपलब्ध पत्रक संचय कयल जाय आ तकरा एक ठाम प्रकाशित क’ देल जाय। भाइ साहेबक बेछप व्यक्तित्व हुनक पत्रोमे साकार भ’ गेल अछि। हुनक पत्रक प्रकाशन ताहि समयक मैथिली जगतक सम्पर्क आ गतिविधिक ‘आँखि देखल’ विवरण तँ प्रस्तुत करबे करत, संगहि जकरा कहल जाइछ ‘पत्र-साहित्य’ (साहित्य पत्रमे), तकरो आदर्श रूप उपस्थित करत।


       हम राँची जीविकाक उदेसमे जहिया गेलहुँ, ताहिसँ किछु पहिनहि ई डेपुटेशनपर दिल्ली चल गेल रहथि। मुदा, राँचीक बसातमे हिनक व्यक्तित्वक सुवास गमगमाइत छ’ले। साहित्यकारक आन-जान पुस्तक भंडारक दोकानपर लगले रहै छल, उपेन्द्र दोषीक मुस्कानक संगहि ‘बचका’क जलपान, चाह-पान आ भाइ साहेबक कोनो-ने-कोनो आख्यान भेनहि। हमरो कान ताहि लेल लालायित रह’ लागल। किनको नाम हिनक पत्र अबनि तँ तकर वाचन होइ छलै, पुनि विश्लेषण चलै छलै। संभव थिक, क्यो जन बन्धु– दोषीजी कि विनोदजी कि मोहन भारद्वाजजी–  नवतुरिया मण्डलमे एक जन नवागन्तुकक प्रवेश द’ किछु लिखि देने छल होयथिन। तकर बादक हिनक पत्रसभमे हमरो विषयमे किछु जिज्ञासा, किछु उत्कंठा रह’ लगलनि। तथापि, हम अपनामे ई साहस नहि जुटा सकलहुँ जे हिनका पत्र लिखियनि, यद्यपि बन्धु लोकनि प्रेरित करथि। हमरा लोकनिक सहयोगी कविता-संकलन ‘धूरी’ राजमोहनेजीकेँ समर्पित भेल छनि।

       हम 1973 क आरम्भमे पटना ‘मिथिला मिहिर’मे आबि गेलहुँ। किछु नव करबाक उत्साहमे ‘मिहिर’मे एक विज्ञप्ति प्रकाशित भेलै, जाहिमे लेखक लोकनिसँ नव तरहेँ रचनाक आमन्त्रण कयल गेल छलनि। लगले दिल्लीसँ हमरा नामे राज मोहनजीक पत्र पहुँचल। पत्र लंबा छल, अनौपचारिक छल, आ जेना मन अछि, एना आरम्भ भेल छल–  जहिया सुनलहुँ जे अहाँ ‘मिथिला मिहिर’मे आबि गेलहुँ अछि, तहिया भेल जे आब मिहिरक स्वरूप बदलत, अहाँक अयने किछु नव बस्तु आओत, टटका स्वाद भेटत। आइ जखन अंक आयल अछि तँ ओहिमे एतबा परिवर्तन अवश्य देखलहुँ अछि जे लेखक लोकनिकेँ लिखबाक पाठ धरि नीक जकाँ पढ़ाओल गेलनि अछि। एना लिखू, एहन रचना लिखू, एतबाटा लिखू– माने सभ टा लेखके करय, सम्पादक किछु नहि करय! एकर अर्थ तँ ई भेल जे जँ हमर कहल नहि करब तँ मिहिर एहिना रहत! माने सम्पादक किछु नहि करता। एहिसँ स्पष्ट भ’ गेल जे अहूँ किछु नहि करब। मिहिर जहिना चलै अछि, तहिना चलैत रहत। आदि-आदि।

       एही आशयक छल हिनक पहिल पत्र। हमर तँ सिट्टी-पिट्टी गुम भ’ गेल। मुदा, एहिसँ एतबा तँ भेल जे धाख हमर छुटि गेल आ पत्र लिखबाक अवसर भेटि गेल। पत्राचारक क्रम चालू भ’ गेल। लगातार पत्र आब’ लागल। किछु मासक बाद स्वयं पटना आबि गेला। तकर प्राते मोहन भारद्वाजजीक डेरापर पहिल भेट भेल छल हिनकासँ।

                           (26. 4. 2016)

Monday, January 5, 2026

अपना-अपना ठाँव (मैथिली कहानी)


 मैथिली कहानी

तारानंद वियोगी

      

दुर्गापूजा की छुट्टी में मनोज गाँव आया था। पिछली रात को ही वह पहुँचा था। सुबह सोकर उठा तो घर-दुआर, बाड़ी-झाड़ी के मुआयने पर निकला। बाड़ी में काका ने गेन्दा और तीरा के फूल लगाये थे। पौधों की जड़ों में ढेर गंदगी जमा थी। सूखी-मुरझाई डाल-पत्तियाँ फूल के पौधों से लटकी पड़ी थीं। यह सब बगीचे के आकर्षण को कम करता था। मनोज ने खुरपी निकाली और पौधों की चौबगली सफाई करने लगा। कि तभी हड़बड़ाए हुए-से काका सामने आकर खड़े हो गये।

          'चलो-चलो, जरा दालान पर चलो।'-- काका बोले। काका बहुत घबराये हुए-से थे, जैसे कोई अनहोनी घटित हो गयी हो, इतने! मनोज समझ नहीं पाया कि आखिर बात क्या हो सकती है। काका से पूछा-- किसी को कुछ हुआ क्या? उसके स्वर में भी जैसे घबराहट भर आई थी।

            काका ने उसी घबराहट के साथ जवाब दिया-- 'नहीं नहीं, किसी को कुछ हुआ नहीं। वकील साहब आए हुए हैं।'

              यक-ब-यक मनोज समझ नहीं पाया कि कौन-से वकील साहब आए हैं कि काका इतनी घबराहट में हैं। गाँव में चार अलग-अलग वकील साहब थे। इनमें से एक से तो मनोज की दोस्ती भी थी। लेकिन वह अगर आये होते तो काका इस तरह घबराते क्यों? फिर भी मनोज ने पूछा-- सन्तू जी आए हैं क्या?

      -- 'नहीं नहीं, वो नहीं, पलिवार वाले वकील साहब आए हैं।'

            ओ....... लंबा खींचते हुए मनोज 'ओ' बोला। उसे भीतर कहीं से हँसी आई। फिर लगा कि नहीं, हँसने से काका को दुख हो सकता है। वह मुस्कुराकर रह गया।

            पलिवार वाले वकील साहब गाँव के नामी बेवकूफ, जिसे मिथिला में बूड़ि कहा जाता है, माने जाते थे, यानी हँसी के पात्र, बेढंगे। लोग उन्हें खिझाकर आनंद पाते। कभी वकील साहब रास्ते से गुजर रहे होते, गाँव के किसी लोफर की नजर उनपर पड़ी नहीं कि मामला उलझ जाता। कोई पूछ रहा होता-- 'आप अभी तक मरे नहीं वकील साहब?' वह कुछ जवाब देते कि इससे पहले दूसरा नौजवान टूट पड़ता-- 'अभी तक नहीं मरे, इससे क्या? अब नहीं बचेंगे, सो पक्का है। जाँच कर लो, जब ये चलते हैं तो टांगें आगे-पीछे आगे-पीछे होती रहती हैं! बोलिए न वकील साहब, ये सही बात है कि नहीं?'

                साक्षात यमराज सामने उपस्थित हों, तब भी वकील साहब शायद इतना नहीं डरते, जितना इन बेहूदों से डरते हैं। जान बचाने के लिए वह हारे हुए कुक्कुर के समान दांत चियार देते-- 'हां अओ! आपलोग उचित कहते हैं। देखा न जाए, भोजन करने के पश्चात मेरी भूख भी मर जा रही है। लक्षण तो स्वयं मुझको भी अच्छा नहीं दीखता। हें हें हें...'

           लेकिन वे बेहूदा लड़के वकील साहब की इस दांत-चियारी से बिलकुल भी न पसीजते। कोई उनकी आँखों का चश्मा छीन लेता। वकील साहब बड़े ऊँचे पावर का चश्मा पहनते थे। चश्मा के बगैर उन्हें कुछ दीखता नहीं। लड़के उनका चश्मा जमीन पर गिरा देते और उन्हें कहते कि खोज लें। रास्ते पर झुककर अपने दोनों हाथों से वह चश्मा ढूँढ़ने की कोशिश करते। वह रुआँसा हो जाते। लड़के फिर भी नहीं पसीजते। कोई उन्हें उँगलियां दिखाकर गिनने कहता तो कोई दूसरा पीछे से उनकी धोती का ढेका खोल देता। बहुत सारे लोग जमा हो जाते। सब मिलकर हुले हुले करते। सबको आनंद आता।

                तो, लुच्चे-लफंगों से वकील साहब बहुत दबकर रहते, बचकर निकलने की जुगत सोचा करते। लेकिन, ठीक यही महाशय जब भले आदमियों, पिछड़े-दलितों के सामने होते तो उन बेचारों पर हुकूमत चलाने के लाख-हजार गुर उन्हें मालूम थे। कमजोर वर्ग के लोग वकील साहब की नजरों से ठीक उसी तरह बचने की कोशिश करते, जैसा ये महाशय खुद लुच्चे-लफंगों से बचने के लिए करते थे। वकील साहब की खास विशेषता यही थी कि इस गाँव के मूल वाशिंदों के वंशधर थे। हरसिंहदेव के जमाने से आजतक उनका परिवार इसी गाँव में बना रहा, इसे बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। बाकी जो ब्राह्मण थे, अलग-अलग जमानों में वे अलग-अलग कारणों से अलग-अलग स्थानों पर जा बसे। इन निर्वासित हो चुके लोगों को वकील साहब बहुत गलियाते। इस गाँव के मूलवासी होने के कारण आज के जमाने में भी इस गाँव को वह अपनी जागीर समझते थे। कहा जाता था कि बीते जमाने में इस इलाके की जमीन्दारी भी इन्हीं लोगों के पास थी। मुगल बादशाह ने इस खान्दान की सेवा से प्रसन्न होकर 'चौधरी' की उपाधि प्रदान की थी। आज तक ये लोग चौधरी ही कहलाते हैं। वह कहा करते कि चाहे विद्या देखिये, या धन, या लाठी-- चौधरियों का परिवार ही आज भी विश्वविजयी है। यह अलग बात है कि उनका विश्व इस गाँव की चौहद्दी तक ही सीमित था।

               मनोज ने काका से पूछा-- 'किधर आए हैं वकील साहब?

            काका बोले-- 'चन्दा वसूलने।'

          -- किस बात का चन्दा?

           -- भगवती पूजा का।

     मनोज को बड़ा अचरज लगा। वह बोला-- भगवती पूजा का चन्दा? अपने लोगों से? अपने लोगों से तो कभी नहीं लिया जाता था।'

            -- हाँ, पहले तो कभी नहीं लिया गया। लेकिन, इस बार तो आए हैं!'

            बड़े ही पुराने जमाने से यह चलन चला आया था कि हरेक साल महाष्टमी की रात को भगवती मंदिर मे निशा-पूजा का विशाल आयोजन होता। गाँव के लोग इसे नशा-पूजा कहते। भगवती को दर्जन के दर्जन बोतल दारू का चढ़ावा चढ़ता। दारू के चखने चढ़ते। खस्सी, पाठा, भेड़, मुरगा, कबूतर, मछली, अंडा-- कुछ भी वहाँ चढ़ावे के लिए मना नहीं था। तांत्रिक पद्धति से देवी की पूजा होती, ऐसा जानकार लोग बताते थे। अगली सुबह महानवमी के रोज देवी के समक्ष पाठा, भेड़ और भैंसे की बलि चढ़ती। हजार की संख्या में छाग-बलि और दो-ढाई दर्जन के करीब महिष-बलि। दूर-दराज गांवों तक के श्रद्धालु मनौती करते। फल होता कि नवमी के दिन बलि-प्रदान के लिए मारा-मारी होती, घमासान मच जाता। लेकिन एक नियम सनातन से चला आता था। नियम यह कि सबसे पहली पूजा और बलि-प्रदान पलिवार की तरफ से होता। इस पूजा को लोग 'गमैया पूजा' कहते थे और बलिदान को गमैया छागर, गमैया पाड़ा। ऐसा लगता था मानो यहीं पर कहीं जागीरदारी की जड़ थी।

            अब चूँकि इतने बड़े आयोजन में खर्च भी बड़ा होता, तो सनातन से यह भी नियम चला आता था कि समूचा खर्च पलिवार के बाबू-भैया मिलकर वहन करते। जब कलियुग आया तो यह होने लगा कि पलिबार से बाहर के जो ब्राह्मण गाँव में निवास करते थे, उनसे चन्दा लिया जाने लगा। लेकिन, किसकी हिम्मत कि इस लिये जाने वाली चीज को चन्दा जैसे गंदे नाम से पुकारता? इसे 'बेहरी' कहते थे, जिसमें निमित्त खुद भगवती हो जाती थीं। पर इस बार तो अचंभा ही हो गया। कहाँ पलिवार का उज्ज्वल महावंश, और कहाँ इस दलित का दरवाजा! वकील साहब बेहरी मांगने स्वयं पहुँच गये थे।

              'समय परिवर्तनशील होता है'-- मनोज ने सोचा और जरा-सा मुस्कुराया। वह दालान पर आया। दालान की चौकी पर वकील साहब ओलड़ के बैठे थे, मतलब आधी चौकी भर जगह छेक कर। उनके साथ पलिवार के दो नौजवान भी थे। वकील साहब उन दोनों युवकों को सामाजिक पाठ पढ़ाने में व्यस्त थे। पाठ यह कि कैसे गाँव के मेन चौक पर कोई अनजान राहगीर इस गाँव के बारे में भद्दी बातें कर रहा था, और किस तरह वकील साहब ने उस राहगीर को मन-भर बेइज्जत किया था। असल में, वकील साहब-जैसे लोग अपने कुलशीलवान जीवन में कुल तीन ही काम के लायक होते हैं--- भोजन, विश्राम और गपसप। अभी वह गपसप कर रहे थे।

            मनोज आया और उसने बड़े ही व्यंग्यात्मक लहजे में कहा-- 'परनाम वकील साहब।' 'पर' बोलने के बाद एक लंबी तान भरते हुए 'नाम' कहा। इस तान का यही मतलब हो सकता था कि शब्द पर मत जाइये, भाव को पकड़िये कि अब आपका आदर नहीं किया जाएगा, अब लोग आपको प्रणाम नहीं करेंगे।

              लेकिन, वकील साहब मानो गहरे नशे में चूर थे। काहे को वह परनाम का जवाब देने या इसका भाव समझने की कोशिश करें, वह तो 'ही ही' करके हँसने लगे। उनकी इस पलिवारवादी हँसी को सुनकर मनोज सोचने लगा कि आखिर लोग इन्हें वकील साहब क्यों कहते हैं! वकालत तो इन्होंने कभी की नहीं। क्या सचमुच इन्होंने एल-एल.बी. की पढ़ाई की होगी?

             वकील साहब बोले-- 'की अओ विद्वान! बेहरी दियौ।'

            जिस टोन में वकील साहेब ने 'की अओ विद्वान' कहा था, उसकी स्पष्ट ध्वनि थी-- क्या रे शूद्र! बेकार ही लोग मानते हैं कि मैथिली एक मधुर भाषा है। इसके उच्चारण में जितने दाव-पेंच और जहर भरे होते हैं कि काहे को कोई दूसरी भाषा इसकी बराबरी कर सके। लेकिन, मनोज दूसरी बात सोच रहा था। सोच रहा था कि यह वकील साहब आखिर क्यों मनुष्य की भाषा नहीं बोल पाते! 'भ' जेतै', 'द'देतै' बोलेंगे। समूचे गाँव में एक इनकी भाखा बेछप होती है। क्यों? क्यों आम आदमी की तरह बात नहीं कर सकते? कौन इन्हें रोकता है?

            मनोज ने पूछा-- 'किस बात के लिए बेहरी?'

             इस मामूली-से प्रश्न से वकील साहब उत्तेजित हो गए-- 'ऐसी बात क्यों बोलते हैं अओ? मैंने तो पहले ही बालदेव को कह दिया कि बेहरी लगेगी।'

             पक्की बात है कि मनोज अगर सामने उपस्थित नहीं रहा होता, तो वकील साहब उनके सत्तर साल के पिता को बालदेव नहीं, बलदेबा बुलाते। मनोज को खयाल आया कि यह बात जो कही जाती है कि योग्य संतानें अपने पिता तक की प्रतिष्ठा को बढ़ाती हैं, यह बात यूँ ही नहीं कही जाती। लेकिन, तत्काल तो उसे यही दिखा कि ये महाशय अपने घमंड में कितने चूर हैं! 

             मनोज बोला-- 'एक बात पूछूँ वकील साहब?'

             वकील साहब चुप रहे। उन्होंने मनोज की ओर देखा।

             मनोज ने पूछा-- 'आप सिर्फ वकील साहब हैं या कि खुद आइपीसी हैं?'

                वकील साहब की समझ में कुछ भी नहीं आया। बोले-- ' पूछने का क्या तात्पर्य है? मैंने समझा नहीं।'

                  मनोज को गुस्सा आने लगा। बोला-- 'आप झूठ बोल रहे हैं। आप समझेंगे क्यों नहीं? खूब समझेंगे। और, अगर समझना ही नहीं चाहते, तो इसका तो कोई इलाज नहीं है।'

                 युवा मनोज की आवाज में उद्दंडता का भान होते ही पल भर के लिए वकील साहब भूल गये कि किसी दलित लड़के से बात कर रहे हैं। उन्हें भय हुआ। वह साकांक्ष हो गये और अपना चश्मा सँभालने लगे।

              मनोज बोला-- 'हम आपसे पूछते हैं कि क्या चीज की बेहरी, तो आप कहते हैं, हमने तो पहले ही कह दिया था,अब तो देना ही पड़ेगा। आप जरा ये बताइए कि वो सब बातें  जो आप पहले ही बोल चुके हैं, कानून हो गयी हैं क्या? अब लोगों को उसी के हिसाब से चलना पड़ेगा?'

                वकील साहब चुप हो गये। उनके साथ आए एक नवयुवक ने पूछा-- ' आप मास्सैब, बेहरी नहीं देना चाहते हैं क्या?'

                मनोज ने जवाब दिया-- ' बेहरी हम देंगे कि नहीं देंगे, ये तो आगे की बात हुई न बौआ? आप हमको पहले बताइएगा न कि क्या चीज की बेहरी मांगने आए हैं, या कि पहले ही फरमान जारी कर दीजिएगा?'

                 नवयुवक भी चुप हो गया।

                  फिर मनोज ही बोला-- 'बेहरी मांगने का काम कहीं पलिवार के लोगों से हो वकील साहब? यह तो एक सामाजिक काम है। इसके लिए तो पहले व्यक्ति को समाज बनना पड़ेगा न! खैर बताइए, क्या कह रहे थे?'

               वकील साहब फिर से ताल ठोककर खड़े हो गये-- 'हम स्वयं आपके दालान पर चलकर आए हैं, इसकी आपको  तनिक भी लाज नहीं? आप पलिवार को नहीं चीन्हते हैं?'

                 मनोज ने अपना सिर पीट लिया। वकील साहब पर उसे दया आई। लेकिन ऐसी दया की भी क्या जरूरत?-- उसने सोचा। बोला-- 'पलिवार को हम काहे नहीं चीन्हेंगे वकील साहब! और, जहाँ तक लाज लगने का सवाल है, लाज तो आप ही को लगनी चाहिए न, कि आपको हमारे दालान पर आना पड़ा। हमने तो आपको बुलाया नहीं था! पहले आप लोग पलिवार की तरफ से सब इन्तजाम करते थे। उससे नहीं हुआ तो दूसरे-दूसरे ब्राह्मणों से माँगना पड़ा। उससे भी नहीं हुआ तो अब सोलकन-दलित के दालान पर चढ़ना पड़ा। ये तो आप ही के लिए लाज लगनेवाली बात हुई।'

                 पलिवार के एक समझदार नवयुवक ने जवाब दिया-- 'नहीं, ऐसी बात नहीं है मास्सैब! हमलोगों का सिद्धान्त है कि सभी जाति के लोग समान हैं। गमैया पूजा है तो इसमें सभी ग्रामीणों का सहयोग होना चाहिए!'

             मनोज बोला-- 'यह जो बात आप बोले हैं, बहुत अच्छा बोले हैं बौआ! लेकिन एक बात बताइए, आपका तो यह सिद्धान्त है, ठीक बात है। लेकिन, मान लीजिए हमारा भी कोई सिद्धान्त हो तो इसको मानिएगा कि नहीं?'

              नवयुवक मुंडी हिलाने लगा-- 'हाँ-हाँ, क्यों नहीं? सबका अपना-अपना सिद्धान्त होता है।'

             मनोज कहने लगा-- 'आपको मालूम है बाबू? आठ-दस साल पहले की बात है, हमलोग भगवती-स्थान में धरना पर बैठे थे कि बलि-प्रथा बन्द होनी चाहिए। हमलोगों के लीडर थे विवेकानंद झा। मालूम है कि तब आपके पलिवार ने क्या किया था? हमीं लोगों को पकड़कर महिखा में बाँधने लगे कि इन्हीं लोगों का बलिदान दिया जाएगा। बड़ी मुश्किल से हम लोगों की जान बची थी। मालूम है?'

             नवयुवक चुप हो गया। मनोज ने आगे कहा-- 'आपलोगों का सिद्धान्त है तो हमलोगों का भी सिद्धान्त है। देखिये, इसी गाँव के बाहर एक और देवता हैं--कारू बाबा। नवमी को ही उनकी भी बड़ी पूजा होती है। जिस दिन कारूथान में दूध की नदी बहती रहती है, उसी दिन आपके मंदिर में खून की नदी बहती है। सिद्धान्त की अगर बात करिएगा तो यह भी सोचिएगा न कि ऐसा आखिर किस लिये होता है? किसने ऐसी प्रथा चलाई, और कौन इसे आज चला रहा है? इस मंदिर में तो भगवान बुद्ध की भी मूर्ति है न बौआ! बुद्ध के आगे खून की धार? छि: छि:।'

          मनोज उठकर खड़ा हो गया, और आँखों में पूरी कठोरता भरकर बोला-- 'बेहरी तो हम नहीं देंगे वकील साहब!'

        वकील साहब भी उठकर खड़े हो गये। बोले-- 'आपको भगवती का भी डर नहीं?'

          मनोज और भी कठोर हो गया। बोला-- 'नहीं, हमको किसी का भी डर नहीं।'

               इस बात पर वकील साहब क्या बोलते। वह चुपचाप उठे और वापस विदा हो गये।

            मनोज लौटकर आँगन गया। उसके हाथों में मिट्टी लगी हुई थी, कहीं गीली तो कहीं सूखी मिट्टी। उसने दोनों हाथ खोल लिये और देखने लगा। मुस्कुराया-- एह, यही मिट्टी है जो हमें और वकील साहेब को अलग करती है--उसने सोचा। और, यही मिट्टी है जो विवेका बाबू को हमारे साथ जोड़ती है और वकील साहब से अलग करती है-- उसने फिर सोचा।

               विवेका बाबू यानी विवेकानंद झा की याद आई तो वह दृश्य आँखों में नाच गया। धरने का नेतृत्व विवेका बाबू कर रहे थे। लेकिन उन दिनों रक्तबीजों की चलती मजबूत थी। पलिवार वालों ने हाथों हाथ उन्हें उठा लिया और महिखा (जमीन में गड़ा वह खंभा जिसमें पशुओं को बांधकर बलि दी जाती है) में बांधने लगे। एक कठमस्त युवक तलवार उठा लाया। बाप रे, ऐसा तो न कभी देखा था न सुना था। अपमानित होकर विवेका बाबू को अपना आन्दोलन बन्द करना पड़ा था। लेकिन, अभी-अभी जो घटना घटी थी, मनोज ने तय पाया कि रक्तबीजों का रुतबा अब कम पड़ा है। अभी अगर हो आन्दोलन, तो मजा आ जाएगा।

           मनोज ने अपने भीतर असीम जोश का अनुभव किया। उसने चापाकल पर जाकर हाथ धोया और कन्धे पर गमछा रखकर सीधे पुबारी टोले की ओर विदा हो गया। वह विवेका बाबू के घर जाएगा। जाकर उन्हें पूरा वाकया सुनाएगा और कहेगा कि सर, अब शुरू कीजिए संघर्ष। आन्दोलन का सही समय अब आया है।

              लेकिन, जब वह विवेका बाबू के घर पहुँचा तो पता लगा, वह कहीं बाहर निकले हैं।

             -- सर कहाँ गये हैं?-- विवेका बाबू की पत्नी से उसने पूछा।

             -- चमरटोली की तरफ गये हैं!

             --कब गये हैं?-- मनोज ने जानना चाहा कि कबतक लौटेंगे।

              विवेका बाबू की पत्नी बोलीं-- 'देखिये न, नवमी के दिन छाग-बलि की मनौती किए हुए हैं। अभी तक छागर का कोई इंतजाम ही नहीं हुआ है। छागर खरीदने ही निकले हैं। चमरटोली में नहीं मिला तो धनुकटोली की तरफ जाएंगे।'

             सुनकर मनोज को बड़ा अचंभा हुआ। वो विवेका बाबू! ये आठ-दस वर्ष का समय! और, आज वो खुद बलि का बकरा खरीदने गये हैं! वह चुप हो गया। चुप और उदास। लेकिन, क्षण भर बाद ही उसे खूब जोर से हँसने की इच्छा हुई। मगर वह हँस नहीं सकता था। उसकी हँसी सुनकर विवेका बाबू की पत्नी को दुख पहुँच सकता था।

(मैथिली से अनुवाद- स्वयं लेखक द्वारा)

        

Sunday, November 23, 2025

हमरा सभक युगक नचिकेता

 


         तारानंद वियोगी



कठोपनिषद् मे वर्णित नचिकेताक उपाख्यान सँ भारतीय ज्ञान-परंपराक संग जुड़ल सब गोटे परिचित छी। एकर निहितार्थ छै-- छोट उमर मे ज्ञान-पिपासाक अतिरेक। हमरा सभक कवि नचिकेताक संग यैह बात रहलनि। हुनकर परम चर्चित कविता-संग्रह 'कवयो वदन्ति' 1966 मे तहिया छपलनि जखन हुनकर उमर केवल पन्द्रह साल रहनि। मोन पाड़ल जाय, कवि-गुरु रवीन्द्रनाथक पहिल कविता-संग्रह 'भानुसिंह ठाकुरेर पदावली' ठीक एही उमर मे छपल छलनि। ज्ञानक जाहि-जाहि क्षेत्र मे नचिकेताक अधिकारिता छनि, जेहन पैघ-पैघ पद पर पदासीन रहि ओ अपन ज्ञानक सदुपयोग विश्व-हित मे केलनि अछि, जाहि तरहें विविध ज्ञान-क्षेत्र मे राखल गेल हुनकर स्थापना सब कें सौंसे संसारक विशेषज्ञ लोकनि गंभीरता सँ लैत अख्यास कयल करै छथि, तकर विवरण देल जाय तँ ई लेख तँ छोट पड़बे करत, पैघ-पैघ कतेको लेख लिखय पड़त। एहि ठाम कवि-गुरु रवीन्द्रक प्रसंग मे केवल यैह कहय चाहब जे हमर ई मैथिली कवि वैश्विक स्तर पर आइ, अपन आन अनेक ख्यातिक अतिरिक्त रवीन्द्रनाथक एक सुयोग्य अधिकारी विद्वान सेहो मानल जाइत छथि। योग्य माता-पिताक योग्यतर संतानक रूप मे सब अर्थें नचिकेता, जे अधिक ठाम उदय नारायण सिंहक नाम सँ जानल जाइत छथि, हमरा लोकनिक गौरव छथि।

            नचिकेताक व्यक्तित्व एहन विरल, जे विश्वास करब कठिन क' दैत छैक जे ई एक मैथिल थिका। योग्य लोक कें पाबि क' ईर्ष्याक स्थान पर स्नेह-श्रद्धा करब। मंच पर बाजब जते संतुलित आ सारगर्भित, एहन बजनिहार दोसर कोनो लोकक बाजल सुनब ताहू सँ बेसी उदग्र आ अनथक। अपन असहमतिक आखरी हद धरि जा क' सहमतिक तलाश करब, जँ किछु तथ्य आ तर्क सामने राखल जाय। अपन मूलभूत स्वभावे सँ परम लोकतांत्रिक, जेहन कि मैथिल बौद्धिकक हैब असंभव सन घटना बूझि पड़ैत अछि। समस्त सांसारिक अस्तित्व कें विज्ञान-सम्मत  ढंग सँ ग्रहण करब, आ ओकर दार्शनिक तह धरि प्रवेश क' जायब, ई हुनकर प्रकृतिये मे जनु शामिल होइन। कोनो काज कें ठीक ओही रूप मे कार्यान्वित करब, जेहन कि नियमावली मे विहित छै। अइ बातक लेल एक उदाहरण देब हमरा उचित बुझना जाइत अछि। नचिकेता एखन साहित्य अकादेमी मे मैथिलीक संयोजक छथि। अइ पद कें पाबि क' कतेको गोटे कते कते अनर्थ क' गेला, तकर इतिहास मे जायब तँ घृणा सँ मोन खिन्न हैत। बड़को बड़को लोक सब ई धतकरम केने छथि, क्षुद्र मानव-मानवीक तँ कथे कहब निरर्थक। साहित्य अकादेमी बहुतो प्रकारक पुरस्कार हरेक साल दैत अछि। संयोजकक हैसियत सँ नचिकेताक उचिते एहि सब मे महत्वपूर्ण भूमिका रहैत छनि। मुदा, कोनो पुरस्कारक जूरी मे के सब विद्वान छथि, नचिकेता कें बूझल नहि रहैत छनि, कारण प्रावधान सैह छैक। हरेक जूरीक मीटिंग मे ओ उपस्थित रहै छथि, मुदा प्रक्रिया मे ओ हस्तक्षेप करता, तकर कल्पनो धरि नहि कयल जा सकैछ। कारण, नियमावली मे यैह विहित छै।

            नचिकेताक अध्ययन तलस्पर्शीक संग-संग बहुव्यापक छनि। ओ देश-विदेशक कतेको भाषाक ज्ञाता छथि, आ ओहि भाषा सभक भाषिक आ साहित्यिक अध्ययन मूलभाषा मे जा क' क' सकै छथि। अपन अध्ययनक निचोड़ कें कोनो आन भाषा, आ विशेष रूपें अपन पितृभाषा मैथिली आ मातृभाषा बंगला मे प्रस्तुत क' सकै छथि।  हुनकर एहने दृढ़ पकड़ ग्रीक आ भारतीय मिथकशास्त्र पर छनि। तीन रूपें एकर लाभ मैथिली कें भेटलैक अछि। नचिकेताक लिखल कविता, नाटक आ निबंध रूप मे ई सब वस्तु बहुतो दिन सँ हमसब देखैत रहल छी। मोन पड़ैत अछि, अपन जीवन मे पहिल मैथिली नाटक जे हम 1980क जबाना मे, पटना मे देखने रही, ओ रहय 'एक छल राजा', जकर अभिनेता तँ छत्रानंद सिंह झा आ प्रेमलता मिश्र प्रेम रहथि, मुदा हमरा लेल नाटककार नचिकेता सँ पहिल परिचयक यैह अवसर छल।

               सृजनात्मक लेखनक क्षेत्र मे कविता आ नाटक, ई दू टा विधा थिक जाहि मे नचिकेता शुरुहे सँ काज करैत रहला अछि आ अपन काज कें एक उच्च धरातल पर स्थापित केलनि अछि। हुनकर साहित्य मे विविधता भरपूर छनि आ किनसाइते कोनो समकालीन मुद्दा हो जकरा ओ अपन संज्ञान मे नहि अनने होथि। हुनकर कयल काजक महत्व कें हमसब एही सँ अकानि सकै छी जे अपन पहिले काव्य-पुस्तक 'कवयो वदन्ति' मे ओ 'नव चेतनावाद'क प्रस्तावना केलनि आ अपन परंपरा कें यात्री संग जोड़लनि। ई किताब 'नव-चेतनावादक ज्योति-स्तम्भ' यात्रिये कें समर्पित कयल गेल छनि। हुनकर काव्य-लेखनक स्वभाव पहिले कविता-संग्रह सँ स्पष्ट हुअय लगैत अछि। विडंबनात्मक घटना-परिघटना खास तौर पर हुनकर विषय बनैत छनि। अप्रतिम ओज, साहस आ आत्मबल सँ परिपूर्ण कवि अपना समयक समस्त विषय-वितान कें पूरा दृढ़ताक संग पकड़ैत छथि। विषयक पूरा अभिज्ञान एक मनोवैज्ञानिक दार्शनिकताक संग उद्घाटित होइत छैक। 'कवयो वदन्ति' मे संकलित पहिले कविता थिक-- 'अग्रगति नहि हैत'। कविता छैक-- 'हमरा सभक अग्रगति नहि हैत!/ एकर अनेक कारण छैक/ हम सब सोझ पथें नहि जायब/ तखन त हमरा सभक आधुनिकता आ शिल्पबोध/ नष्ट भ' जायत।/ हम सब वक्र पथें नहि जायब/ तखन त हमरा सभक कलात्मकता/ क्लेद आ ग्लानिक परिचायक हैत/ हम सब वृत्ताकारहु नहि जायब/ तखन त सैह कालक गोरखधंधा मे/ घुरैत रहब/ हम सब सत्य-मिथ्या कें ध्रुव जनैत छी/ तें हम सब ध्रुव हैब!/अर्थात्......'।

             जेना आधुनिक मंचशिल्पक लेल नचिकेताक नाटक  सभक बेस सम्मान अछि, ठीक तहिना विरल शिल्प-प्रयोगक लेल मैथिलीक आधुनिक कविता मे हुनकर अपन बेछप पहचान छनि। मैथिली कविताक एक विलुप्त होइत शिल्प --दीर्घकविता-- कें अपन 'छाया' (कविता-पुस्तक) सँ एक गंभीर प्रस्थान रचैत छथि। जीवनक मर्म कोना तह-दर-तह अपन उन्मुक्तिक अभीप्सा रखैत अछि, आ एक समर्थ कवि सब तह कें पार करैत लक्ष्य धरि अन्तत: पहुँचिये जाइत अछि, एहि प्रयत्न कें देखबा लेल मैथिलीक ई एक माइलस्टोन काज थिक। बिम्ब, प्रतीक, रूपक, मिथक आ आख्यान कोना नाना रूप धारण कयने जीवनक महान महान आर्यसत्य कें उद्घाटित करैत अछि, से देखबा जोग अछि।

          मोन पड़ैत अछि, एक समय, प्राय: अस्सीक दशक मे 'मिथिला मिहिर' पत्रिका मे वरिष्ठ मैथिली रचनाकार लोकनिक बीच कैक मास धरि वाद-प्रतिवाद चलल छल जे मैथिलक जीवन-जगत मे 'प्रेम' के कोनो स्थान नहि छैक, तें एकर कविता वा कथा लिखबा जोगर भाषा आ शिल्प धरि विकसित नहि भ' सकल अछि। मैथिल जीवन-जगत मे जे चीज सर्वसुलभ छैक, से थिक-- 'छिनरपन', जकरा लेल काकु सँ ल' क' चिकारी धरि बहुतो बहुत प्रकारक भाषा-शिल्प विद्यमान छै। हमरा ई कहैत संतोष सँ बेसी गर्व होइत अछि जे मैथिली कवि नचिकेता ने मात्र सुन्दर आ देखनगर प्रेम-कविता सब लिखलनि, बरु एकर व्याप्ति कें बढ़बैत समान बौद्धिक धरातल पर जिबैत दू समानधर्मा स्त्री-पुरुषक बीच प्रेमक लेल ने केवल समुचित भाषा आ शिल्प अर्जित केलनि अछि, अपितु मैथिली कविता मे जे वस्तु अकथित रहि गेल छल, तकर कथन लेल मैथिली कें समर्थ बनौलनि अछि। कोनहु रचनाकारक जीवन के चरम सार्थकता की थिक? निश्चय यैह थिक जे जाहि भाषा मे ओ काज करैत हुअय, तकरा आर अधिक सबल, आर अधिक सक्षम बना सकय।

              नचिकेता अपन कर्मठ आ सार्थक जीवनक पचहत्तरि वर्ष पूरा केलनि। हुनका प्रति अनन्य प्रेम रखैत शुभकामना करै छी जे शतायु भ' ओहि समस्त काज कें ओ एही कर्मठता आ सार्थकताक संग पूर्ण करथि जे प्रकृति हुनका लेल विहित कयने छनि।

Sunday, June 1, 2025

रेणु आ यात्री नागार्जुन

 


तारानंद वियोगी


फणीश्वरनाथ रेणुक ओ फोटो संभव छै, कहियो अहाँक नजरि मे आयल होयत, औराही हिंगना बला, जाहि मे ओ खेतक कदबा कयल माटि मे अपन संगी-साथी संगें धान रोपबा लेल उतरल छथि। कुल जमा दस गोटे हेता। सभक हाथ मे बिचड़ाक पुल्ठी अछि, आ मोन मे किछु नब करबाक रोमांच। अपनें रेणु लुंगी कें दोहरा क' ढेका बान्हि लेने छथि। दू-तीन गोटे एहनो छथि जे अति उत्साह मे खेतक पेंक मे उतरि तँ गेल छथि, मुदा आब कपड़ा गन्दा हेबाक द्वन्द्व मे फँसल छथि। एखन फोटो सेशन चलि रहल छै। आब ओ लोकनि रोपनी शुरू करहे बला छथि। मुदा, एहि दस गोटे मे सँ एक एहनो छथि जे फोटो सेशनक बिनु कोनो परवाह कयने खेत मे झुकि चुकला अछि, एनमेन तहिना जेना कोनो किसान रोपनी करैत अछि। स्वाभाविके जे ओहि आदमीक चेहरा देखार नहि पड़ि रहलैए। ओ आधा धोती पहिरने छथि,आधा ढट्ठा ओढ़ि क' माथ कें झांपि लेने छथि। हुनकर संपूर्ण ध्यान रोपनी पर छनि। फोटो मे साफ देखाइ छै जे हुनकर दहिना हाथक अंगुरी सब बिचड़ाक जड़िक संग कदबाक वक्षस्थल मे ढुकल छनि। आदमी बुजुर्ग छथि आ रोपनी-कलाक पुरान ओस्ताद जकाँ लगैत छथि। के छथि ओ? ओ यात्री नागार्जुन छथि। औराही हिंगना मे रेणुक खेत मे एखन धान रोपि रहला अछि। तारीख थिक 29 जुलाइ 1973। यात्री रेणुक गाम आयल छथि जतय एखन रोपनीक सीजन चलि रहल छै। रेणु एहि तरहक हरेक सीजन मे गाम जरूर अबै छला। अक्सरहां तँ सहमना साहित्यिक जन सेहो एहि दिन मे उमड़ि आयल कहथि। एतय, इहो अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे एहि आइडियाक जनक सेहो यात्रिये होथि कि चलै चलू, आइ अपना सब धानक रोपनी करी। एहि आइडिया कें एक आर नब आयाम दैत रेणु फोटो सेशन आयोजित क' लेलनि अछि। जें कि फोटोग्राफर फोटो घीचि लेलनि, फोटो कें क्यो किताब मे छापि देलनि वा डिजिटल क' देलनि तँ बात हमरो अहाँ धरि पहुँचि गेल अछि।

              ठीक ओही राति नागार्जुन एकटा कविता लिखने छला। ओ कविता रेणुक गामक बारे मे अछि आ स्वयं रेणुक बारे मे। शीर्षक देलनि अछि-- 'मैला आंचल।' कविता देखल जाय---

पंक-पृथुल कर-चरण हुए चंदन अनुलेपित

बकी छवियां अंकित, सबके स्वर हैं टेपित

एक दूसरे की काया पर पांक थोपते

औराही के खेतों में हम धान रोपते

मूल गंध की मदिर हवा में मगन हुए हैं

माँ के उर पर, शिशु-सम हुलसित मगन हुए हैं

सोनामाटी महक रही है रोम-रोम से

श्वेत कुसुम झरते हैं तुम पर नील व्योम से

कृषकपुत्र मैं, तुम तो खुद दर्दी किसान हो

मुरलीधर के सात सुरों की सरस तान हो

धन्य जादुई मैला आंचल, धन्य-धन्य तुम

सहज सलोने तुम अपूर्व, अनुपम, अनन्य तुम।

              एहि अवसर पर सभक फोटोक अतिरिक्त स्वर सेहो टेप कयल गेल रहय, तकर सूचना हमरा लोकनि कें नागार्जुनक एहि कविते सँ प्राप्त होइत अछि। ओहि दिनक ओहि स्वर सब कें सूनि पाबी, तकर अवसर आब हमरा लोकनि कें साइत कहियो नहि भेटि पाओत। एहन प्रतीत होइत अछि जे ओहि दिनका संगत मे रेणु कोनो बहुत सुंदर गीत गौने हेता जे यात्री कें बहुत पसंद आयल हेतनि। एकर खबरि हमरा लोकनि कें कविताक पांती 'मुरलीधर के सात सुरों की मधुर तान तुम' सँ भेटैत अछि। रेणुक बारे मे जाननिहार लोकनि नीक जकाँ जनैत छथि जे रेणु बहुत मधुर गबैत छला। आ एतबे नहि, लोकगीत आ लोकगाथा सभक एक बड़ पैघ भंडार हुनका कंठ मे विराजै छल, हुनकर ठोर पर बसै छल। सारंगा सदाबृज आ लोरिकायन के तँ समुच्चा गाथे हुनका याद रहनि। नागार्जुन एतय रेणु कें 'दर्दी किसान' बतौलनि अछि, जखन कि इहो कोनो कम दर्दीला नहि अछि जे अपना कें केवल एक 'कृषकपुत्र' कहैत छथि, मने कि ओ, जकरा सँ दर्दी किसान हेबाक सौभाग्य एक पीढ़ी पहिनहि छीनि लेल गेल। औराही हुनका बहुत बहुत नीक लगलनि अछि। ओतय हुनका ओ 'मूल गंध' भेटलनि अछि, जाहि मे पृथ्वीक नेह ओकर उत्पादकता बनि क' प्रकट होइत अछि। ओतुक्का माटि 'सोना माटी' थिक। रेणुक खासियत ई छनि जे ई सोनामाटि हुनकर रोम-रोम सँ प्रकट भेलनि अछि। रेणु जे अपन उपन्यासक नाम 'मैला आंचल' राखने छला, तकरा पाछू एक गँहीर व्यंग्य छल। ओहि उपन्यास कें महान बनबै मे जाहि वस्तु सभक योगदान छैक ताहि मे सँ एक ई नाम सेहो थिक जकरा पाछू व्यंग्यक एक अचूक गहराइ छैक। ओ बात ठीक ओतहि सँ एहि कविता मे सेहो उतरि आयल अछि। नागार्जुन एकरा सिम्पली 'जादुई' बतबै छथि। रेणु, जे नागार्जुन कें 'बड़भाय' वा 'भैयाजी' कहै छला, हुनका प्रति कते प्रेम, कते वत्सलता नागार्जुनक हृदय मे छलनि, तकरो किछु पता एहि कविता सँ नीक जकाँ लगैत अछि। कवि नागार्जुनक कहब छनि एहि धरतीक नील व्योम सँ रेणुक ऊपर श्वेत कुसुम झहरैत अछि। यशक रंग श्वेत बताओल गेल अछि। फेर फेर ओ कहैत छथि-- 'सहज सलोने तुम अपूर्व, अनुपम, अनन्य तुम।' एतय प्रयोग कयल गेल हरेक विशेषण कोना विशेष अछि, तकर पता हमरा लोकनि कें नागार्जुनक ओहि लेख सँ लगैत अछि जे ओ रेणुक निधनक लगले बाद हुनका पर लिखने रहथि।

             रेणु आ यात्री नागार्जुनक सम्बन्ध बहुत पुरान छलनि। दुनू मिथिला समाज सँ अबै छला। दुनू धरती संग समान रूपेंदस जुड़ल, धरतीक धनी। आम जनताक संग दुनूक जुड़ाव एक्के रंग। लोकवृत्ति आ लोकविधा सब मे दुनूक मोन एक्के समान अनुरक्त। दुनू संघर्षधर्मा, सत्ताधारी पार्टीक आलोचक। दुनू गोटेक अपन-अपन राजनीतिक प्रतिबद्धता छलनि, जकरा विना सामाजिक सरोकार अधूरा पड़ैत छल। मध्यकाले सँ ई परंपरा चलैत आयल अछि जे मिथिला-भूमि सँ जे क्यो महान साहित्यकार भेला, अपन तमाम काजक अतिरिक्त मिथिलाक भाषा मैथिली मे ओ किछु ने किछु जरूर लिखलनि। रेणु सेहो मैथिली मे लिखलनि मुदा नागार्जुन बेसी लिखलनि। जीवन पर्यन्त हिनका दुनूक संलग्नता अपन भूमि आ भाषाक संग समान रूपें बनल रहलनि। रेणुक संलग्नता अपेक्षाकृत बेसी गँहीर छलनि, ई बात भिन्न जे दुनू गोटेक अभिव्यक्तिक माध्यम सेहो अलग-अलग छलनि। रेणु जहिना दर्दी किसान छला, ठीक तहिना मर्मी इन्सान। हुनकर ई मर्म अनेक अनेक आयाम मे प्रकट होइ छलनि। नागार्जुन अपन लेख मे कहने छथि-- 'रेणु लग मे ने तँ कथ्य-सामग्रीक कमी रहनि, ने शैलीक नमूना सभक अकाल। सामाजिक घनिष्ठता रेणु कें कहियो गुफानिबद्ध नहि होबय दैत रहनि। जतय कतहु ओ रहला, लोक हुनका घेरने रहैत छलनि। फारबिसगंज, पटना, इलाहाबाद, कलकत्ता-- जतय कतहु देखलियनि आ जहिया कहियो-- निर्जन एकान्त मे किनसाइते कहियो देखने हेबनि।'

               विद्यापतिक ओतय 'सुपुरुष'क बहुत माहात्म्य अछि। एकरे कतहु विद्यापति सुजन कहै छथि तँ कतहु सज्जन। हुनकर एक मशहूर काव्यपंक्ति छनि-- 'सज्जन जन सँ नेह कठिन थिक।' ई एक पांती मिथिलाक नब-पुरान पंडित लोकनि कें सैयो बरस सँ तेहन परेशान करैत रहलनि अछि कि पुछू नहि। आइ धरि हुनका लोकनिक बुद्धि मे अँटलनि नहि जे भाइ, सज्जन जन संग नेह करब कठिन कोना होयत, ई तँ आरो बेसी आसान आ विधेय हेबाक चाही। बात एतय धरि चलि आयल कि धृष्ट पंडित लोकनि विद्यापतिक पाठ मे संशोधन क' देलनि। अपन संकलन सब मे पाठ देलनि-- 'सज्जन जन सँ नेह उचित थिक।' 'कठिन' कें बदलि क' 'उचित' क' क' मानू ई लोकनि ई टंटे खतम क' देलनि जे कठिन अछि आ कि कठिन नहि अछि। मुदा, एहि बातक मर्म रेणु सन व्यक्ति बुझि सकैत छला।  नागार्जुन लिखलनि अछि-- 'लोकगीत, लोकलय, लोककला आदि जतेक जे कोनो तत्व लोकजीवन कें समग्रता प्रदान करैत अछि, ओहि समस्त तत्वक समन्वित प्रतीक छला फणीश्वरनाथ रेणु।' विद्यापतिक समय तँ आब रहल नहि, मुदा सुपुरुष, सुजन, सज्जनक मूर्त रूप हमरा लोकनि रेणुक साहित्य मे देखि सकै छी। अहाँ 'तीसरी कसम' के हीरामन कें मोन पाड़ू आ अख्यास करियौ जे ओहि आदमी, हीरामन पर ककर मोन नहि रीझि जायत, जेना ओहि नायिकाक सेहो मोन रीझि गेल रहै। मुदा, एहि नेह कें निरंतर बनौने राखि सकब, ओकरा संग निरंतर बनल रहि सकब आ निबाहि सकब कते कठिन छैक! कहल जाइछ जे व्यक्ति तँ जनम लैत आ मरैत रहैत अछि, मुदा 'लोक' अमर होइत अछि। नागार्जुन फेर कहै छथि-- 'बावनदास सँ ल' क' अगिनखोर धरि नहि जानि कतेको कैरेक्टर रेणु पाठकक सोझा रखलनि अछि। ओहि मे सँ एक-एक कैरेक्टर कें बहुत बारीकी संग तरासल गेल छैक। ढेरक ढेर प्राणवंत शब्दचित्र हमरा लोकनि कें गुदबुदाबितो अछि आ ग्रामजीवनक आंतरिक विसंगति सभक दिस ध्यानो आकृष्ट करैत चलैत अछि। छोट-छोट खुशी, तुनुकमिजाजीक नान्हि-नान्हि क्षण सब, राग-द्वेषक ओझरायल गुत्थी सब, रूप-रस-गन्ध-स्पर्श आ नादक छिटफुट चमत्कार सब-- आओर ने जानि कते की सब व्यंजना छलकैत चलैत अछि रेणुक कथाकृति सब मे।'

               रेणुक संग यात्री नागार्जुनक सम्बन्ध पुराने टा नहि, आत्मीय सेहो ततबे छल। दुनू गोटे जहिया जतय कतहु भेंट होइन, मैथिलिए मे गपसप करै छला। पत्राचारक भाषा सेहो मैथिलिये भेल करनि, तकर एक झलक हुनकर रचनावलियो मे आयल छनि। एक पत्रक हम एतय चर्च करब, जकर एक-एक शब्द सँ रेणुक आन्तरिकता झलकैत छनि। पत्र 18.12.1954(वा 1955)क लिखल थिक। लगले 'मैला आंचल' पैघ प्रकाशक ओतय सँ छपलनि अछि। रेणु गाम आयल छथि। आइ साइत ओ कोनो गुदरिया बबाजी सँ राजा भरथरीक गाथा सुनलनि अछि, से मगन छथि। लगैए, साधू जरूर बहुत मधुर, बहुत मार्मिक ढंग सँ गौने हेता। रेणु नोट क' लेलनि अछि। गाथाक एक नमहर अंश ओ नागार्जुन कें पत्र मे लिखने छथि, जे अद्भुत अछि। ओहि गीत मे संन्यासी बनलाक बारह बरखक बाद, सिद्ध जोगी बनि क' राजा भरथरीक अपन नगर पधारबाक वर्णन छैक। एहन प्रतीत होइत अछि मानू अपन पछिला पत्र मे नागार्जुन जिज्ञासा कयने होथि जे एम्हर राजा भरथरी, मने रेणु, लगातार चुप किएक छथि। तकर उतारा एहि ठाम अयलैक अछि। लिखै छथि-- 'जाहि दिन नग्र पधारयो राजा भरथरी/मजरल बगियन मे आम/ फुलवा जे फूले कचनार राजा/ लाली रे उड़य असमान/ लाल-लाल सेमली के बाग फूले/ धरती धरेला धेयान।' मने जे गामक पर्यावरण मोहक पर्यावरण राजा भरथरी कें तेना क' बान्हि लेने छनि जे चुप भेने विना कोनो रस्ते नहि बचलैक अछि।

            तखन, गाम-घरक बात सब बतबैत छथि। पहिल बात तँ यैह जे गाम अबैत रहब रेणु कें एहि लेल जरूरी छलनि जे पुरान वस्तु सब कें, धरोहर सब कें नष्ट हेबा सँ बचाओल जा सकय। कहब जरूरी नहि जे ई काज करब, आर्थिक अभाववश वा पयर मे घुरघुरा बान्हल रहबाक कारण, यात्री बुतें कहियो पार नहि लगलनि। यैह मुख्य कारण छै जे गाम छुटबाक, विस्थापनक पीड़ा सँ यात्री नागार्जुनक काव्य सब दिन आक्रान्त रहल। खैर, एतबा लिखबाक बाद रेणु अपना गामक ओहि नौजवान लड़काक जिक्र करैत छथि जे हुनका चैलेंज कयने रहनि जे गाम कें ध' क' रहब अहाँ बुते पार नहि लागत। ओ इहो बतबै छथि जे ओहि नौजवान कें उतारा की देलखिन। देलखिन जे हौ बाबू, गरदनि मे घैला बान्हि क' हम कुइयां मे पैसि गेलियहे, तें आब एतय सँ बहरेबाक उपाय नहि। तखन बतबै छथिन जे गामक जंगल के एक सियार बताह भ' गेलैए, तें आब लोक बिनु लाठी के घर सँ नहि बहराइत अछि। रेणु लग मे लाठी छलनि नहि, ककरो सँ मँगलखिन तँ जवाब देलकनि जे अहाँ अपन लाठी अपने बनाउ, अहाँ तँ गाम बसबा लेल आयल छी कि ने! एही क्रम मे हुनका अपन पिता मोन पड़लखिन जे रासि-रासि के लाठी रखबाक शौखीन छला। इहो लिखि जाइ छथि जे बांसक जंगल मे ढुकि क' सही लाठी बला बांसक पहिचान करब सेहो एक मेंही कला छिऐक। बतबै छथि जे मोन लायक लाठी प्राप्त करबाक लेल पिता केहन केहन लोक सभक संग दोस्ती जोड़ने रहथि। पछिला पत्र मे यात्री हुनका सुझाव देने रहथिन जे रेणु कें ओतय बन्दूक के लाइसेन्स ल' लेबाक चाहियनि। रेणु कें ई बात नहि जरूरी लगलनि, तकर उतारा दै छथिन जे विश्वकोशक चोर एखन धरि गाम तक नहि पहुँचल अछि। आ, जतय धरि शिकार करबाक बात छै तँ रेणुक गुलैंती चलेबाक 'पेराकटिस' तते जबर्दस्त छनि जे ओकरा आगू बन्दूक फेल छै। तखन, रेणु ओहि खंडकाव्य-- 'दो पीर: एक नदी'-- के प्लाॅट बतब' लागै छथिन जकरा लिखबाक विचार हुनका मोन मे एखन चलि रहल छनि। दू पीर-- मने ग्रामदेवता जीन पीर आ ग्रामरक्षक चेथरिया पीर। नदी दुलारी दाइ! नदी के गुण गाब' लगै छथि जे एहि समुच्चा इलाकाक बबुआन लोकनिक बबुआनी एही दुलारी दाइ के प्रताप पर निर्भर छनि। कोशी जहिया एहि इलाका सँ विदा हुअय लगली, हुनकर पांच बहीन रहनि, सब कें ओ बांझ बनबैत गेलखिन। सब सँ छोटकी एहि दुलारी दाइ पर हुनका बड़ करुणा रहनि, तें ई बेचारो बचल रहि गेली। अपन 'भैयाजी' सँ रेणु आशीर्वाद मँगै छथि जे एहि खंडकाव्य कें ओ पूरा लिखि सकथि आ से शुभ आ सुन्दर दुनू बनि पाबय। फेर ई सूचना दै छथिन जे पछिला किछु मास सँ मैथिली मासिक 'वैदेही' हुनका गामक पुस्तकालय मे आयब बन्न भ' गेलैए, मतलब जे प्रकाशक कें ई शिकाइत पहुँचा देल जाइन, आ सुझाव मँगै छथि जे 'आर्यावर्त'क ग्राहक बनल जाय कि नहि बनल जाय! पत्रक अन्त मे लतिका जी सँ मिलि क' सब समाचार बता देबाक अनुरोध छै, आ ई बात सेहो जे हुनका भरोस द' देल जाइन जे हुनकर हिदायत सभक पालन पूर्णत: करिते हम गामक जीवन जीबि रहल छी। मुदा, सब सँ अन्त मे लिखने छथिन जे 'हम जे मैथिली मे पांती लिखैक धृष्टता क' रहल छी-- से तकर की हैत?' एहि पत्र सँ दुनू गोटेक बीचक आत्मीयता आ सामीप्य-भावने टाक परिचय नहि भेटैछ, इहो साफ अछि जे दुनू गोटेक जीवनक प्राथमिकता सब की छलनि, कथी मे सुख छलनि, कथी मे दुख।

            सोचि क' देखी तँ ई आत्मीयता कोनो मामूली बात नहि छल। यात्रीक पहिल उपन्यास 'पारो' 1946 मे छपि क' आबि गेल छल। ई रचना छल मैथिलीक, मुदा ताहि सँ बहुत ऊपर जा क' बिहारक एक अद्भुत संभावनाशील उपन्यासकारक रूप मे हुनकर छवि देश भरि मे स्थापित भ' गेल छल। 1948 मे छपल 'रतिनाथ की चाची' हुनका स्थापित उपन्यासकारक पंक्ति मे आनि देने रहनि। मुदा, 'बलचनमा' (1952) छपलाक बाद तँ नागार्जुनक गणना हिन्दीक प्रथम श्रेणीक उपन्यासकारक रूप मे हुअय लागल छल। एहि उपन्यास मे आलोचक लोकनि 'प्रेमचन्दक परम्पराक स्पष्ट विकास' देखि रहल छला। 'आंचलिक' शब्द सेहो उपन्यासक विशेषणक रूप मे तहिये पहिल बेर प्रयोग मे आयल छल आ नागार्जुन हिन्दीक पहिल आंचलिक उपन्यासकार मानल गेल रहथि। एहि समस्त घटनाक बाद 'मैला आंचल' आयल छल।एहि उपन्यास कें ल' क' शुरुआती दिन मे तँ किछु संशय छल, मुदा किछुए समयक बाद 'मैला आंचल' हिन्दीक सर्वश्रेष्ठ उपन्यास सभक सूची मे शामिल क' लेल गेल। निस्सन्देह 'मैला आंचल'क सफलता 'बलचनमा' सँ बढ़ि क' रहय। रेणु नीक जकाँ जनै छला जे एहि उपन्यास कें लिखि क' ओ हिन्दी उपन्यासक क्षेत्र मे की क' गेला अछि।

                 एहना स्थिति मे दुनू लेखकक बीच प्रतिस्पर्द्धात्मक कटुता उत्पन्न हेबाक खतरा तँ भइये सकैत छल। ताहू मे तखन, जखन कि कोनो गप्पगोष्ठी मे नागार्जुन एना बाजि गेल छला जे हींग तँ कोनो खाद्य कें स्वादिष्ट बनेबाक लेल खोंटि क' बस कनेक टा प्रयोग कयल जाइत छैक, मुदा रेणु तँ मैला आंचल मे हींगक शरबत बना देलनि अछि। यद्यपि कि हींग सँ हुनक तात्पर्य स्थानीय मने मैथिलीक शब्दादि वा कथन-भंगिमा सँ छलनि। मुदा, रेणु धरि ई प्रतिक्रिया पहुँचलनि तँ ओ विना विचलित भेने मुस्किया क' रहि गेला। ई असल मे उपन्यास-कलाक मसला सँ जुड़ल बात छल, जे पारंपरिक समझ सँ भिन्न छल आ तें प्रथम श्रेणीक आलोचक जेना नामवर सिंह वा रामविलास शर्मा आदि नागार्जुनेक बातक समर्थक रहथि। रेणु एहि सब बखेड़ाक कोनो मोजर नहि देलखिन। 1955 मे ओ लिखलनि-- 'सही मायने में प्रेमचन्द की परंपरा को फिर से 'बलचनमा' ने ही अपनाया। नागार्जुन जी पर बहुत भरोसा है मुझे। मेरी स्थिति उस छोटे भाई-सी है, जो अपने बड़े भाई के बल पर बड़ी-बड़ी बातें करता है।'

             हिन्दी-संसार भने नागार्जुन कें आंचलिक उपन्यासकार कहि क' चिह्नित करनि, ओ सदा एहि बात सँ इनकार करैत रहला। जाहि मुद्दा सब कें ल' क' हुनकर उपन्यास सब लिखल गेल रहय, तकरा 'आंचलिक' कहि क' कोटिबद्ध करब हुनका सब दिन अनर्गल लगलनि। रेणुक स्थिति एहि सँ सर्वथा भिन्न छल। ओ स्वयं अपनो, अपन उपन्यास कें 'आंचलिक' कहलनि, आ आनो लोक सँ एहि कारण प्राप्त भेल विशेष कोटि हुनका सदा नीके लगैत रहलनि। नागार्जुन नीक जकाँ बुझि रहल छला जे उपन्यास सब मे ओ की क' रहलाह अछि, आ एहि सँ इतर रेणुक कयल काजक की महत्व छैक। एही दुआरे हमसब देखै छी जे 'मैला आंचल'क एलाक बादो हुनकर उपन्यास-लेखन कोनो तरहें प्रभावित नहि भेलनि। एक के बाद एक हुनकर उपन्यास सब अबैत रहलनि, आ कमोबेश ओकर मिजाज सेहो ओही ढर्रा पर बनल रहलैक। आगू चलि क' जँ हुनकर उपन्यास-लेखन छुटबो केलनि तँ तकर कारण व्यक्तिगत छल। चिर यायावर जकाँ हुनकर निरंतर यात्रा आ सदा जनाकीर्णता सँ घेरायल रहब हुनका एहि तरहें एकाग्रे होयब कठिन क' देलकनि, जकर जरूरति औपन्यासिक गद्य-लेखनक लेल अपरिहार्य रहैत छैक। दोसर ई जे 'भारतीय उपन्यास'क हुनकर समझ सदा हुनका पर सवार रहलनि। मने कि हिन्दी मे लिखल गेल एहन उपन्यास जाहि सँ भारतक यथार्थ के परत सब कें नीक जकाँ बूझल जा सकय। एही सभक दुआरे, समान भूमि, भाषा आ कथा-परिवेश रहलाक बादो दुनू गोटेक बीच परस्पर प्रीति अन्त-अन्त धरि बनल रहलनि।

                रेणुक लेखन कें नागार्जुन कोन तरहें महत्व दैत छथि? स्वाधीनता-प्राप्तिक बाद हिन्दी कथाकृति मे जे ढेर रास परिवर्तन सब आयल रहय, नागार्जुन तकरा संग जोड़ि क' रेणुक महत्व प्रतिष्ठापित करैत छथि। ओ लिखने छथि जे चिन्तन मे तँ ताजगीक नब-नब आभास प्रकट भेबे कयल, शब्द-शिल्पक नब-नब छवि सब सेहो तेजी सँ उभरल। एहि सब मे ताजगी आ अनूठापन अधिकाधिक उजागर हुअय लागल। कथाकार रेणु कें हुनकर समकालीन सभक अपेक्षा ओ एहि दुआरे बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि जे हुनकर कृति सभक बुनावट नितान्त घनगर रहनि, आ ढेर रास दुर्लभ आ बहुरंगी छवि सब कें मिला क' ओ एक बेहद ताजातरीन आ अनूप बात कहि जाइ छला। नागार्जुन लिखने छथि-- 'ऐसा उत्कट मेधावी युवक यदि कलकत्ता जैसे महानर में पैदा हुआ होता और यदि वैसा ही सांस्कृतिक परिवेश, तकनीकी उपलब्धियों का वही माहौल इस विलक्षण व्यक्ति को हासिल हुआ रहता तो अनूठी कथाकृतियों के रचयिता होने के साथ-साथ सत्यजित राय की तरह फिल्मनिर्माण की दिशा में भी यह व्यक्ति कीर्तिमान स्थापित कर दिखाता। रेणु की कथाकृतियों में ऐसे बीसियों पात्र भरे पड़े हैं।'

            लेकिन, सबटा सब किछु सपाटे सपाट हो, सेहो बात नहि छल। दुनू गोटेक बीच मतान्तर सेहो कम नहि छलनि। रेणुक प्राण भने औराहीक धनगर पेंक मे बसैत होइन, अथवा हुनकर मोन सब सँ बेसी ठेठ ग्रामीण समाजी लोकनिक संगति मे लगैत होइन, मुदा जखन ओ अपन व्यक्तिगत जीवन दिस घुरै छला तँ अपन दैहिक-मानसिक 'स्व' के प्रति नितान्त सजग भ' गेल करथि। ई चीज हुनकर पीन्हन-ओढ़न सँ ल' क' हुनका रहनी-सहनी धरि मे साफ देखाइत छल। ई सब चीज हुनकर अपना तरहक संभ्रान्तता छलनि। अपन नाम-नाम केश रखबाक सौखक बारे मे ओ स्वयं लिखने छथि-- 'लोग पौधों की देखभाल करते हैं, बालों की देखभाल मेरी हाॅबी है।' अपन एहि 'स्व सजगता' सँ रेणु कें लाभ छलनि जे उच्च बौद्धिक लोकनिक अभिजात आ संभ्रान्त समाज मे हुनका स्वीकार्य बनबै छलनि। ई अपना आप मे एक पैघ लाभ छल, मुदा नागार्जुन कें ई सब बात सदा सँ नापसंद रहनि। अपन आत्मपरिचय लिखैत 'आईने के सामने' मे ओ अपन मजाक उड़बैत रेणु कें सेहो लपेटा मे ल' लेने छथि-- 'ओ आंचलिक कथाकार, तुम्हारी आँखें सचमुच फूटी हुई हैं क्या? अपने अन्य आंचलिक अनुजों से इतना तो तुम्हें सीख ही लेना था कि रहन-सहन का अल्ट्रा माॅडर्न तरीका क्या होता है?' असल मे, रेणुक अपन खास जीवन-शैली छलनि जे नेनपने सँ निर्मित छल, आ जाहि मे नेपालक कोइराला-परिवार आ औराही हिंगनाक  सम्पन्न गृहस्थीक बराबर-बराबर के साझीदारी छल। रेणु एक किसान छला, जखन कि नागार्जुन मात्र एक कृषकपुत्र। ओतय व्यवस्था छल, एतय व्यवस्थाक प्रति विद्रोह। रेणु दर्दी किसान छला, से हुनका मे विशेष छलनि, मुदा छला किसाने।

                 रेणु कें सेहो नागार्जुन सँ कोनो कम शिकाइत होइन, सेहो नहि छल। सब सँ बेसी आपत्ति तँ हुनकर मुद्दा बदलैत रहबाक प्रवृत्ति पर छलनि। 1967 मे बिहारक संविद सरकार उर्दू कें द्वितीय राजभाषा बनेबाक निर्णय लेलक। एहि निर्णयक जोरदार विरोध भेलै। एहि घटना-क्रमक रेणु लगातार रिपोर्टिंग 'दिनमान' मे करैत रहला। स्वयं रेणुक रिपोर्ट सब साक्ष्य दैत अछि जे द्वितीय राजभाषाक पचड़ा मे पड़ब एक गैरजरूरी फैसला छल, आ ई केवल एक मुस्लिम नेता कें संतुष्ट करबाक लेल कयल गेल छल। मामला जें कि उर्दू सँ जुड़ल छल, हिन्दीक कोनो साहित्यकार विरोध मे नहि उतरला। मुदा, नागार्जुन कूदि पड़ला। आब जखन कि द्वितीय राजभाषाक प्रतिफल वा लाभ स्वयं उर्दुएक हक मे केहन- कोना रहल, ई बात नीक जकाँ स्पष्ट भ' चुकल अछि, हमसब आब नीक जकाँ बूझि सकै छी सही मे एहि पचड़ा मे पड़बाक ओ समय नहि छल। समाजवादी लोकनिक हाथ मे सत्ता आयल छलनि। पैघ-पैघ अनेको लक्ष्य ओहिना बचल के बचल पड़ल छल। तुलसी-जयन्तीक दिन गांधीमैदान, पटना मे जे सभा भेल छल, तकर रिपोर्टिंग करैत रेणु लिखने रहथि-- 'मंच पर साहित्य सम्मेलन के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा बैठे हैं-- डाॅ. लक्ष्मी नारायण सुधांशु(कांग्रेस), ठाकुर प्रसाद(जनसंघ) और...और.... नागार्जुन।...प्रस्ताव प्रस्तुत किया नागार्जुन जी ने। प्रस्ताव पढ़ते समय उनकी वाणी बौद्ध-भिक्षु जैसी ही थी। मगर जब प्रस्ताव पर बोलने लगे तो 'नागा बाबा' हो गये।' रेणुक आपत्ति अपना जगह पर जायज छल।

             आगां एहनो समय आयल जखन दुनू गोटे संग-संग राजनीति मे उतरलाह। ओ सम्पूर्ण क्रान्तिक दौर छल। ओहू मे हिन्दीक कोनो प्रगतिशील लेखक शामिल नहि भेल रहथि। बस यैह दू गोटे रहथि। हिन्दी मे नुक्कड़ कविताक आविष्कार सेहो तहिये भेल रहय, जे हद दरजाक परिवर्तन अनबा मे सफल भेल। एहि नुक्कड़ सभाक हिट कवि छला नागार्जुन। रेणु हरेक नुक्कड़ सभा मे जरूर उपस्थित होथि मुदा कविता नहि पढ़थि। हुनकर भूमिका अलग छलनि। सभा जखन खतम हुअय लागय, रेणु आ रामवचन राय गमछा पसारि क' श्रोता-दीर्घा मे घूमि जाथि। ओहि सँ जतबा टाका प्राप्त होइ, ताहि मे सँ लाउडस्पीकर आदिक किराया चुकाओल जाय, आ बांकी बचल पाइ बेगरतूत कवि लोकनि मे बांटि देल जाइन। एक बेगरतूत तँ नागार्जुन जरूरे भेल करथि। ई इमर्जेन्सीक दौर छल।  फेर ओ समय आयल जखन बक्सर जेल मे बन्द नागार्जुन भयंकर बीमार पड़ि गेला। हुनका बचबाक संभावना नहि रहल। ओ रेणुए छला जे बहु भाषाक लेखक लोकनिक दिस सँ प्रधानमंत्रीक नाम ज्ञापन तैयार करौलनि जे हुनका जेल सँ अविलम्ब मुक्त कयल जाइन। ई अलग बात थिक जे रेणु कें जरूरति भरि लेखक लोकनिक हस्ताक्षर भेटि नहि सकलनि, आ अन्तत: जेल-मुक्तिक लेल हाइकोर्टक सहारा लेल गेल। 

                आब मजेदार बात छै जे जाहि नागार्जुनक जबर्दस्त फज्झति रेणु हुनकर एहि बयानक लेल कयने छलनि जे 'हँ, द्वितीय राजभाषा मामलाक विरोध करब यदि जनसंघी होयब थिक तँ हम गछै छी, हम सौ बेर जनसंघी हेबाक लेल तैयार छी'--- ओही नागार्जुन कें जखन संपूर्ण क्रान्ति बला जेल-जीवन मे ई बोध भेलनि जे असल मे अपन वैधता प्राप्त करबाक लेल आर एस एस, सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन कें हाइजैक क' लेलक अछि, तँ नागार्जुन ओहि आन्दोलन सँ निकलि बहरेला, जखन कि रेणुक अपन राजनीतिक समझ रहनि जे अन्तो अन्त धरि ओ ओही आन्दोलनक संग बनल रहला। मुदा, जे कि सत्य सेहो छल, रेणुक निधन पर नागार्जुन लिखलनि-- 'प्रशासकीय तानाशाही के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनेवालों में रेणु अगली कतार में भी आगे ही खड़े रहे।' 

                  आ, जतय धरि रेणुक सम्भ्रान्तता आ जनान्दोलनी तेवरक बीच तारतम्यक प्रश्न अछि, हमरा एतय गोपेश्वर सिंहक लिखल संस्मरणक एक प्रसंग मोन पड़ैत अछि। एक दिन कहियो पटनाक कोनो फुटपाथ बला मजदूर होटल मे नागार्जुन आराम सँ बैसि क' रोटी-तरकारी खा रहल छला। गोपेश्वर जी देखलनि तँ भौचक्क रहि गेला। एखन हाले मे रेणुक देहान्त भेल छलनि। चारू दिस ओ चर्चा मे बनल रहथि। गोपेश्वर सिंह संग गपसप हुअय लगलनि तँ प्रसंगवश गोपेश्वर जी पूछि देलकनि-- 'बाबा, फणीश्वरनाथ रेणु यहाँ रोटी खाते या नहीं?' नागार्जुन तपाक सँ जवाब देलकनि-- 'नहीं। रेणु यहाँ रोटी नहीं खाते, लेकिन वे इन लोगों के लिए गोली जरूर खा लेते।'

(2020)










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