मैथिली कहानी
तारानंद वियोगी
दुर्गापूजा की छुट्टी में मनोज गाँव आया था। पिछली रात को ही वह पहुँचा था। सुबह सोकर उठा तो घर-दुआर, बाड़ी-झाड़ी के मुआयने पर निकला। बाड़ी में काका ने गेन्दा और तीरा के फूल लगाये थे। पौधों की जड़ों में ढेर गंदगी जमा थी। सूखी-मुरझाई डाल-पत्तियाँ फूल के पौधों से लटकी पड़ी थीं। यह सब बगीचे के आकर्षण को कम करता था। मनोज ने खुरपी निकाली और पौधों की चौबगली सफाई करने लगा। कि तभी हड़बड़ाए हुए-से काका सामने आकर खड़े हो गये।
'चलो-चलो, जरा दालान पर चलो।'-- काका बोले। काका बहुत घबराये हुए-से थे, जैसे कोई अनहोनी घटित हो गयी हो, इतने! मनोज समझ नहीं पाया कि आखिर बात क्या हो सकती है। काका से पूछा-- किसी को कुछ हुआ क्या? उसके स्वर में भी जैसे घबराहट भर आई थी।
काका ने उसी घबराहट के साथ जवाब दिया-- 'नहीं नहीं, किसी को कुछ हुआ नहीं। वकील साहब आए हुए हैं।'
यक-ब-यक मनोज समझ नहीं पाया कि कौन-से वकील साहब आए हैं कि काका इतनी घबराहट में हैं। गाँव में चार अलग-अलग वकील साहब थे। इनमें से एक से तो मनोज की दोस्ती भी थी। लेकिन वह अगर आये होते तो काका इस तरह घबराते क्यों? फिर भी मनोज ने पूछा-- सन्तू जी आए हैं क्या?
-- 'नहीं नहीं, वो नहीं, पलिवार वाले वकील साहब आए हैं।'
ओ....... लंबा खींचते हुए मनोज 'ओ' बोला। उसे भीतर कहीं से हँसी आई। फिर लगा कि नहीं, हँसने से काका को दुख हो सकता है। वह मुस्कुराकर रह गया।
पलिवार वाले वकील साहब गाँव के नामी बेवकूफ, जिसे मिथिला में बूड़ि कहा जाता है, माने जाते थे, यानी हँसी के पात्र, बेढंगे। लोग उन्हें खिझाकर आनंद पाते। कभी वकील साहब रास्ते से गुजर रहे होते, गाँव के किसी लोफर की नजर उनपर पड़ी नहीं कि मामला उलझ जाता। कोई पूछ रहा होता-- 'आप अभी तक मरे नहीं वकील साहब?' वह कुछ जवाब देते कि इससे पहले दूसरा नौजवान टूट पड़ता-- 'अभी तक नहीं मरे, इससे क्या? अब नहीं बचेंगे, सो पक्का है। जाँच कर लो, जब ये चलते हैं तो टांगें आगे-पीछे आगे-पीछे होती रहती हैं! बोलिए न वकील साहब, ये सही बात है कि नहीं?'
साक्षात यमराज सामने उपस्थित हों, तब भी वकील साहब शायद इतना नहीं डरते, जितना इन बेहूदों से डरते हैं। जान बचाने के लिए वह हारे हुए कुक्कुर के समान दांत चियार देते-- 'हां अओ! आपलोग उचित कहते हैं। देखा न जाए, भोजन करने के पश्चात मेरी भूख भी मर जा रही है। लक्षण तो स्वयं मुझको भी अच्छा नहीं दीखता। हें हें हें...'
लेकिन वे बेहूदा लड़के वकील साहब की इस दांत-चियारी से बिलकुल भी न पसीजते। कोई उनकी आँखों का चश्मा छीन लेता। वकील साहब बड़े ऊँचे पावर का चश्मा पहनते थे। चश्मा के बगैर उन्हें कुछ दीखता नहीं। लड़के उनका चश्मा जमीन पर गिरा देते और उन्हें कहते कि खोज लें। रास्ते पर झुककर अपने दोनों हाथों से वह चश्मा ढूँढ़ने की कोशिश करते। वह रुआँसा हो जाते। लड़के फिर भी नहीं पसीजते। कोई उन्हें उँगलियां दिखाकर गिनने कहता तो कोई दूसरा पीछे से उनकी धोती का ढेका खोल देता। बहुत सारे लोग जमा हो जाते। सब मिलकर हुले हुले करते। सबको आनंद आता।
तो, लुच्चे-लफंगों से वकील साहब बहुत दबकर रहते, बचकर निकलने की जुगत सोचा करते। लेकिन, ठीक यही महाशय जब भले आदमियों, पिछड़े-दलितों के सामने होते तो उन बेचारों पर हुकूमत चलाने के लाख-हजार गुर उन्हें मालूम थे। कमजोर वर्ग के लोग वकील साहब की नजरों से ठीक उसी तरह बचने की कोशिश करते, जैसा ये महाशय खुद लुच्चे-लफंगों से बचने के लिए करते थे। वकील साहब की खास विशेषता यही थी कि इस गाँव के मूल वाशिंदों के वंशधर थे। हरसिंहदेव के जमाने से आजतक उनका परिवार इसी गाँव में बना रहा, इसे बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। बाकी जो ब्राह्मण थे, अलग-अलग जमानों में वे अलग-अलग कारणों से अलग-अलग स्थानों पर जा बसे। इन निर्वासित हो चुके लोगों को वकील साहब बहुत गलियाते। इस गाँव के मूलवासी होने के कारण आज के जमाने में भी इस गाँव को वह अपनी जागीर समझते थे। कहा जाता था कि बीते जमाने में इस इलाके की जमीन्दारी भी इन्हीं लोगों के पास थी। मुगल बादशाह ने इस खान्दान की सेवा से प्रसन्न होकर 'चौधरी' की उपाधि प्रदान की थी। आज तक ये लोग चौधरी ही कहलाते हैं। वह कहा करते कि चाहे विद्या देखिये, या धन, या लाठी-- चौधरियों का परिवार ही आज भी विश्वविजयी है। यह अलग बात है कि उनका विश्व इस गाँव की चौहद्दी तक ही सीमित था।
मनोज ने काका से पूछा-- 'किधर आए हैं वकील साहब?
काका बोले-- 'चन्दा वसूलने।'
-- किस बात का चन्दा?
-- भगवती पूजा का।
मनोज को बड़ा अचरज लगा। वह बोला-- भगवती पूजा का चन्दा? अपने लोगों से? अपने लोगों से तो कभी नहीं लिया जाता था।'
-- हाँ, पहले तो कभी नहीं लिया गया। लेकिन, इस बार तो आए हैं!'
बड़े ही पुराने जमाने से यह चलन चला आया था कि हरेक साल महाष्टमी की रात को भगवती मंदिर मे निशा-पूजा का विशाल आयोजन होता। गाँव के लोग इसे नशा-पूजा कहते। भगवती को दर्जन के दर्जन बोतल दारू का चढ़ावा चढ़ता। दारू के चखने चढ़ते। खस्सी, पाठा, भेड़, मुरगा, कबूतर, मछली, अंडा-- कुछ भी वहाँ चढ़ावे के लिए मना नहीं था। तांत्रिक पद्धति से देवी की पूजा होती, ऐसा जानकार लोग बताते थे। अगली सुबह महानवमी के रोज देवी के समक्ष पाठा, भेड़ और भैंसे की बलि चढ़ती। हजार की संख्या में छाग-बलि और दो-ढाई दर्जन के करीब महिष-बलि। दूर-दराज गांवों तक के श्रद्धालु मनौती करते। फल होता कि नवमी के दिन बलि-प्रदान के लिए मारा-मारी होती, घमासान मच जाता। लेकिन एक नियम सनातन से चला आता था। नियम यह कि सबसे पहली पूजा और बलि-प्रदान पलिवार की तरफ से होता। इस पूजा को लोग 'गमैया पूजा' कहते थे और बलिदान को गमैया छागर, गमैया पाड़ा। ऐसा लगता था मानो यहीं पर कहीं जागीरदारी की जड़ थी।
अब चूँकि इतने बड़े आयोजन में खर्च भी बड़ा होता, तो सनातन से यह भी नियम चला आता था कि समूचा खर्च पलिवार के बाबू-भैया मिलकर वहन करते। जब कलियुग आया तो यह होने लगा कि पलिबार से बाहर के जो ब्राह्मण गाँव में निवास करते थे, उनसे चन्दा लिया जाने लगा। लेकिन, किसकी हिम्मत कि इस लिये जाने वाली चीज को चन्दा जैसे गंदे नाम से पुकारता? इसे 'बेहरी' कहते थे, जिसमें निमित्त खुद भगवती हो जाती थीं। पर इस बार तो अचंभा ही हो गया। कहाँ पलिवार का उज्ज्वल महावंश, और कहाँ इस दलित का दरवाजा! वकील साहब बेहरी मांगने स्वयं पहुँच गये थे।
'समय परिवर्तनशील होता है'-- मनोज ने सोचा और जरा-सा मुस्कुराया। वह दालान पर आया। दालान की चौकी पर वकील साहब ओलड़ के बैठे थे, मतलब आधी चौकी भर जगह छेक कर। उनके साथ पलिवार के दो नौजवान भी थे। वकील साहब उन दोनों युवकों को सामाजिक पाठ पढ़ाने में व्यस्त थे। पाठ यह कि कैसे गाँव के मेन चौक पर कोई अनजान राहगीर इस गाँव के बारे में भद्दी बातें कर रहा था, और किस तरह वकील साहब ने उस राहगीर को मन-भर बेइज्जत किया था। असल में, वकील साहब-जैसे लोग अपने कुलशीलवान जीवन में कुल तीन ही काम के लायक होते हैं--- भोजन, विश्राम और गपसप। अभी वह गपसप कर रहे थे।
मनोज आया और उसने बड़े ही व्यंग्यात्मक लहजे में कहा-- 'परनाम वकील साहब।' 'पर' बोलने के बाद एक लंबी तान भरते हुए 'नाम' कहा। इस तान का यही मतलब हो सकता था कि शब्द पर मत जाइये, भाव को पकड़िये कि अब आपका आदर नहीं किया जाएगा, अब लोग आपको प्रणाम नहीं करेंगे।
लेकिन, वकील साहब मानो गहरे नशे में चूर थे। काहे को वह परनाम का जवाब देने या इसका भाव समझने की कोशिश करें, वह तो 'ही ही' करके हँसने लगे। उनकी इस पलिवारवादी हँसी को सुनकर मनोज सोचने लगा कि आखिर लोग इन्हें वकील साहब क्यों कहते हैं! वकालत तो इन्होंने कभी की नहीं। क्या सचमुच इन्होंने एल-एल.बी. की पढ़ाई की होगी?
वकील साहब बोले-- 'की अओ विद्वान! बेहरी दियौ।'
जिस टोन में वकील साहेब ने 'की अओ विद्वान' कहा था, उसकी स्पष्ट ध्वनि थी-- क्या रे शूद्र! बेकार ही लोग मानते हैं कि मैथिली एक मधुर भाषा है। इसके उच्चारण में जितने दाव-पेंच और जहर भरे होते हैं कि काहे को कोई दूसरी भाषा इसकी बराबरी कर सके। लेकिन, मनोज दूसरी बात सोच रहा था। सोच रहा था कि यह वकील साहब आखिर क्यों मनुष्य की भाषा नहीं बोल पाते! 'भ' जेतै', 'द'देतै' बोलेंगे। समूचे गाँव में एक इनकी भाखा बेछप होती है। क्यों? क्यों आम आदमी की तरह बात नहीं कर सकते? कौन इन्हें रोकता है?
मनोज ने पूछा-- 'किस बात के लिए बेहरी?'
इस मामूली-से प्रश्न से वकील साहब उत्तेजित हो गए-- 'ऐसी बात क्यों बोलते हैं अओ? मैंने तो पहले ही बालदेव को कह दिया कि बेहरी लगेगी।'
पक्की बात है कि मनोज अगर सामने उपस्थित नहीं रहा होता, तो वकील साहब उनके सत्तर साल के पिता को बालदेव नहीं, बलदेबा बुलाते। मनोज को खयाल आया कि यह बात जो कही जाती है कि योग्य संतानें अपने पिता तक की प्रतिष्ठा को बढ़ाती हैं, यह बात यूँ ही नहीं कही जाती। लेकिन, तत्काल तो उसे यही दिखा कि ये महाशय अपने घमंड में कितने चूर हैं!
मनोज बोला-- 'एक बात पूछूँ वकील साहब?'
वकील साहब चुप रहे। उन्होंने मनोज की ओर देखा।
मनोज ने पूछा-- 'आप सिर्फ वकील साहब हैं या कि खुद आइपीसी हैं?'
वकील साहब की समझ में कुछ भी नहीं आया। बोले-- ' पूछने का क्या तात्पर्य है? मैंने समझा नहीं।'
मनोज को गुस्सा आने लगा। बोला-- 'आप झूठ बोल रहे हैं। आप समझेंगे क्यों नहीं? खूब समझेंगे। और, अगर समझना ही नहीं चाहते, तो इसका तो कोई इलाज नहीं है।'
युवा मनोज की आवाज में उद्दंडता का भान होते ही पल भर के लिए वकील साहब भूल गये कि किसी दलित लड़के से बात कर रहे हैं। उन्हें भय हुआ। वह साकांक्ष हो गये और अपना चश्मा सँभालने लगे।
मनोज बोला-- 'हम आपसे पूछते हैं कि क्या चीज की बेहरी, तो आप कहते हैं, हमने तो पहले ही कह दिया था,अब तो देना ही पड़ेगा। आप जरा ये बताइए कि वो सब बातें जो आप पहले ही बोल चुके हैं, कानून हो गयी हैं क्या? अब लोगों को उसी के हिसाब से चलना पड़ेगा?'
वकील साहब चुप हो गये। उनके साथ आए एक नवयुवक ने पूछा-- ' आप मास्सैब, बेहरी नहीं देना चाहते हैं क्या?'
मनोज ने जवाब दिया-- ' बेहरी हम देंगे कि नहीं देंगे, ये तो आगे की बात हुई न बौआ? आप हमको पहले बताइएगा न कि क्या चीज की बेहरी मांगने आए हैं, या कि पहले ही फरमान जारी कर दीजिएगा?'
नवयुवक भी चुप हो गया।
फिर मनोज ही बोला-- 'बेहरी मांगने का काम कहीं पलिवार के लोगों से हो वकील साहब? यह तो एक सामाजिक काम है। इसके लिए तो पहले व्यक्ति को समाज बनना पड़ेगा न! खैर बताइए, क्या कह रहे थे?'
वकील साहब फिर से ताल ठोककर खड़े हो गये-- 'हम स्वयं आपके दालान पर चलकर आए हैं, इसकी आपको तनिक भी लाज नहीं? आप पलिवार को नहीं चीन्हते हैं?'
मनोज ने अपना सिर पीट लिया। वकील साहब पर उसे दया आई। लेकिन ऐसी दया की भी क्या जरूरत?-- उसने सोचा। बोला-- 'पलिवार को हम काहे नहीं चीन्हेंगे वकील साहब! और, जहाँ तक लाज लगने का सवाल है, लाज तो आप ही को लगनी चाहिए न, कि आपको हमारे दालान पर आना पड़ा। हमने तो आपको बुलाया नहीं था! पहले आप लोग पलिवार की तरफ से सब इन्तजाम करते थे। उससे नहीं हुआ तो दूसरे-दूसरे ब्राह्मणों से माँगना पड़ा। उससे भी नहीं हुआ तो अब सोलकन-दलित के दालान पर चढ़ना पड़ा। ये तो आप ही के लिए लाज लगनेवाली बात हुई।'
पलिवार के एक समझदार नवयुवक ने जवाब दिया-- 'नहीं, ऐसी बात नहीं है मास्सैब! हमलोगों का सिद्धान्त है कि सभी जाति के लोग समान हैं। गमैया पूजा है तो इसमें सभी ग्रामीणों का सहयोग होना चाहिए!'
मनोज बोला-- 'यह जो बात आप बोले हैं, बहुत अच्छा बोले हैं बौआ! लेकिन एक बात बताइए, आपका तो यह सिद्धान्त है, ठीक बात है। लेकिन, मान लीजिए हमारा भी कोई सिद्धान्त हो तो इसको मानिएगा कि नहीं?'
नवयुवक मुंडी हिलाने लगा-- 'हाँ-हाँ, क्यों नहीं? सबका अपना-अपना सिद्धान्त होता है।'
मनोज कहने लगा-- 'आपको मालूम है बाबू? आठ-दस साल पहले की बात है, हमलोग भगवती-स्थान में धरना पर बैठे थे कि बलि-प्रथा बन्द होनी चाहिए। हमलोगों के लीडर थे विवेकानंद झा। मालूम है कि तब आपके पलिवार ने क्या किया था? हमीं लोगों को पकड़कर महिखा में बाँधने लगे कि इन्हीं लोगों का बलिदान दिया जाएगा। बड़ी मुश्किल से हम लोगों की जान बची थी। मालूम है?'
नवयुवक चुप हो गया। मनोज ने आगे कहा-- 'आपलोगों का सिद्धान्त है तो हमलोगों का भी सिद्धान्त है। देखिये, इसी गाँव के बाहर एक और देवता हैं--कारू बाबा। नवमी को ही उनकी भी बड़ी पूजा होती है। जिस दिन कारूथान में दूध की नदी बहती रहती है, उसी दिन आपके मंदिर में खून की नदी बहती है। सिद्धान्त की अगर बात करिएगा तो यह भी सोचिएगा न कि ऐसा आखिर किस लिये होता है? किसने ऐसी प्रथा चलाई, और कौन इसे आज चला रहा है? इस मंदिर में तो भगवान बुद्ध की भी मूर्ति है न बौआ! बुद्ध के आगे खून की धार? छि: छि:।'
मनोज उठकर खड़ा हो गया, और आँखों में पूरी कठोरता भरकर बोला-- 'बेहरी तो हम नहीं देंगे वकील साहब!'
वकील साहब भी उठकर खड़े हो गये। बोले-- 'आपको भगवती का भी डर नहीं?'
मनोज और भी कठोर हो गया। बोला-- 'नहीं, हमको किसी का भी डर नहीं।'
इस बात पर वकील साहब क्या बोलते। वह चुपचाप उठे और वापस विदा हो गये।
मनोज लौटकर आँगन गया। उसके हाथों में मिट्टी लगी हुई थी, कहीं गीली तो कहीं सूखी मिट्टी। उसने दोनों हाथ खोल लिये और देखने लगा। मुस्कुराया-- एह, यही मिट्टी है जो हमें और वकील साहेब को अलग करती है--उसने सोचा। और, यही मिट्टी है जो विवेका बाबू को हमारे साथ जोड़ती है और वकील साहब से अलग करती है-- उसने फिर सोचा।
विवेका बाबू यानी विवेकानंद झा की याद आई तो वह दृश्य आँखों में नाच गया। धरने का नेतृत्व विवेका बाबू कर रहे थे। लेकिन उन दिनों रक्तबीजों की चलती मजबूत थी। पलिवार वालों ने हाथों हाथ उन्हें उठा लिया और महिखा (जमीन में गड़ा वह खंभा जिसमें पशुओं को बांधकर बलि दी जाती है) में बांधने लगे। एक कठमस्त युवक तलवार उठा लाया। बाप रे, ऐसा तो न कभी देखा था न सुना था। अपमानित होकर विवेका बाबू को अपना आन्दोलन बन्द करना पड़ा था। लेकिन, अभी-अभी जो घटना घटी थी, मनोज ने तय पाया कि रक्तबीजों का रुतबा अब कम पड़ा है। अभी अगर हो आन्दोलन, तो मजा आ जाएगा।
मनोज ने अपने भीतर असीम जोश का अनुभव किया। उसने चापाकल पर जाकर हाथ धोया और कन्धे पर गमछा रखकर सीधे पुबारी टोले की ओर विदा हो गया। वह विवेका बाबू के घर जाएगा। जाकर उन्हें पूरा वाकया सुनाएगा और कहेगा कि सर, अब शुरू कीजिए संघर्ष। आन्दोलन का सही समय अब आया है।
लेकिन, जब वह विवेका बाबू के घर पहुँचा तो पता लगा, वह कहीं बाहर निकले हैं।
-- सर कहाँ गये हैं?-- विवेका बाबू की पत्नी से उसने पूछा।
-- चमरटोली की तरफ गये हैं!
--कब गये हैं?-- मनोज ने जानना चाहा कि कबतक लौटेंगे।
विवेका बाबू की पत्नी बोलीं-- 'देखिये न, नवमी के दिन छाग-बलि की मनौती किए हुए हैं। अभी तक छागर का कोई इंतजाम ही नहीं हुआ है। छागर खरीदने ही निकले हैं। चमरटोली में नहीं मिला तो धनुकटोली की तरफ जाएंगे।'
सुनकर मनोज को बड़ा अचंभा हुआ। वो विवेका बाबू! ये आठ-दस वर्ष का समय! और, आज वो खुद बलि का बकरा खरीदने गये हैं! वह चुप हो गया। चुप और उदास। लेकिन, क्षण भर बाद ही उसे खूब जोर से हँसने की इच्छा हुई। मगर वह हँस नहीं सकता था। उसकी हँसी सुनकर विवेका बाबू की पत्नी को दुख पहुँच सकता था।
(मैथिली से अनुवाद- स्वयं लेखक द्वारा)


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