Sunday, October 2, 2022

होना देवशंकर नवीन के संग-साथ



तारानंद वियोगी


नवीन से दोस्ती के अब चालीस साल पार हो चुके हैं। यह यात्रा इतनी लंबी है, और समय इस बीच इतनी तेजी से बदलता चला गया है कि कई बार लगता है, वह सब जैसे युगों पुरानी बात हो।

            मेरे गांव महिषी में नवीन का ननिहाल है। उसकी जैसी मां थीं प्रेममयी, भावमयी, इतनी भोली कि पराया कोई लगे ही न। वह मानो कोशी-किनारे की जंगम पैदाइश थीं। उसके नाना और मेरे पिता दोनों ही अपने जमाने के बहादुरों के बहादुर गिने जाते। कहते हैं, हैजे की महामारी जब चली थी, एक मुरदे को जबतक जला आए, पता चला, कोई फिर मर गया है। कई-कई दिनों तक अनथक अविरल दाहसंस्कार करनेवाले सामाजिकों में वे थे, जबकि हमने इस कोरोना-युग में देख ही लिया है कि अपना जनमाया बच्चा भी ऐसे वक्त में कैसे विराना हो जाता है।  वह भूपी झा(नवीन के नाना) और मेरे पिता बद्री महतो ही थे, जिन्होंने उन्हीं महामारी के दिनों में यह बड़ा फैसला लिया था कि गांव के पूर्वी किनारे बहनेवाली नदी के पार, जो तब श्मसान-भूमि के रूप में ही प्रसिद्ध थी, घर बनाकर बसने का तय किया था। पहले दोनों एक टोले के थे, अब इधर आकर पड़ोसी हो गये। यही श्मसानभूमि का इलाका है, जहां तारा का मंदिर है, जिनके बारे में राजकमल चौधरी ने कविता लिखी थी कि तेरह हजार बरस पहले मेरुदंड पर्वत की काली चट्टानों से तराशकर निकाली गयी तेरह साल की लड़की हैं वह, जो उनके लिए न उग्र है न तारा है, बस उग्रतारा है। और, यही वह डीह है जहां सदियों पहले पलिवार महिषी मूल के आदि वाशिंदा ब्राह्मण निवास करते थे। यह वही कुल था जिसमें बाद को डा. सर गंगानाथ झा और उनके कृतकार्य पुत्रों--अमरनाथ झा, आदित्यनाथ झा वगैरह हुए। इस वंश की मूल वासभूमि यही जगह थी जो अब श्मसानभूमि के रूप में परिणत थी। काल भी कैसे-कैसे करतब दिखाता है! हम बड़े गर्व कहते, और स्वयं नवीन भी कि पलिवार महिषी कुल का जो मात्र एक घर ब्राह्मण इस गांव में बचा रह गया था, वह नवीन के नाना भूपेन्द्र उर्फ भूपी झा थे। बचपन से ही नवीन का यहां आना-जाना बना रहा। नवीन की परवरिश में सारा का सारा मोहनपुर ही नहीं था, उसमें महिषी भी बहुत गहराई तक पैठी थी।

            मुझसे नवीन की दोस्ती हुई, इसके कई बरस पहले मेरे पिता के साथ उसकी दोस्ती हो चुकी थी। बात यह थी कि नवीन का गांव मोहनपुर मेरी बुआ की ससुराल थी। पिता कभी-कभार अपनी बहन के घर आया-जाया करते। ऐसा ही एक अवसर था जब वे मोहनपुर से महिषी लौट रहे थे। पांव-पैदल। रास्ते में उन्हें एक लड़का मिला जो मस्त होकर गाना गाते बढ़ता चला जा रहा था। यह नवीन था। परिचय हुआ तो वह उनके मित्र का नाती निकला, जो ननिहाल के सफर पर था। पिता बताते थे, उस दिन दो घटनाएं हुईं। एक तो यह कि रास्ते में एक बैलगाड़ी वाला इधर ही चला आ रहा था। पिता ने गाड़ीवान से आग्रह किया कि इस बच्चे को बिठा लीजिये। नवीन गाड़ी पर जा बैठे और गाना गाकर सुनाते रास्ता कटा। दूसरी घटना जो हुई उसकी पृष्ठभूमि बताना जरूरी होगा। मैं जब आठवीं कक्षा में पढ़ता था, अपने एक ग्रामीण कवि की देखादेखी फिल्मी धुनों की पैरोडी पर तारा की स्तुति के गीत लिखने लगा था। थोड़े ही दिनो में वे गीत इतने लोकप्रिय हुए कि गांव की हर कीर्तनमंडली में गाये जाने लगे। फिर यह हुआ कि हमारे सहपाठियों ने आपस में चंदा करके सोलह गीतों की एक पुस्तिका छपवा दी। मेरे पिता न के बराबर पढ़े-लिखे थे लेकिन लिखा-पढ़ी के काम के प्रति उनके मन में इतना सम्मान था कि यह आश्चर्य करने-जैसी बात लगती थी। किसी का बेटा हाइस्कूल की उमर में कविताई करने लगे तो आम तौर पर यह पिता के लिए दुख मानने की बात हुआ करती थी। मेरे पिता के साथ इसके बिलकुल उलट बात थी। मेरे गीत छपने से वह अपने को गौरवान्वित महसूस करने लगे थे। और उस पुस्तिका की कुछ प्रतियां तो हमेशा अपने साथ लेकर चलते थे। उस दिन भी उनकी जेब में वह थी। उन्होंने नवीन से कहा-- आप गाना अच्छा गाते हैं विद्यार्थी। इसमें से किसी गीत को गाइये। और, यह गायन रास्ते भर होता चला। बैलगाड़ी पर बैठे बालक नवीन, और गाड़ी के पीछे-पीछे पैदल चलते मेरे पिता। (नवीन को वह सदा 'नवीन बाबू' बुलाते थे।)  नवीन को तो ये दोनों प्रसंग याद हैं ही, संयोग की बात कि जिस दिन पिता यह कहानी मुझे और मयंक को सुना रहे थे, हम टेपरिकार्डर पर इसे रिकार्ड कर रहे थे। अब भी मेरे पास उनकी, मां की भी, आवाजें हैं, मेरी बड़ी-बड़ी दौलतों में वे एक हैं।

            इसके बरसों बाद, सहरसा में आयोजित विद्यापति-पर्व का अवसर था जब हम पहली बार मिले थे। सहज और स्वाभाविक मैत्री उभर आई थी। हम एक जैसे संघर्षशील थे, एक जैसे कोशी की गीली पांक को आत्मा में धारण किये दुनिया भर घूम‌ आने का ख्वाब देखते थे। नवीन उन दिनों सहरसा कालेज में एम.ए.(मैथिली) कर रहे थे, और मैं महिषी के संस्कृत कालेज में शास्त्री का विद्यार्थी था। उन दिनों के जो एपिसोड्स थे, मैंने तो कहीं-कहीं लिखा भी है, पूरी कहानी बयान की जाए तो एक मुकम्मल किताब बनेगी। राजकमल चौधरी की खोज, महीनों महीना राजकमल की स्मृति के तरंगों को ढ़ूंढ़ते, लिपिबद्ध करते, आम लोगों तक उसकी खुशबू पहुंचाने के आयोजन करते, पत्रिकाओं के विशेषांक प्रायोजित करते, प्रकाशकों की खोज करते-- इन सब की एक लंबी शृंखला है। कमाल यह था कि व्यक्तिगत रूप से हम दोनों ही उन दिनों साधनहीन थे। पास में जो पूंजी थी, वह केवल मन का उत्साह और तन का परिश्रम ही था। 

            सहरसा हमारा जिला मुख्यालय था। वहां साहित्य के कई दिग्गज बसते थे लेकिन साहित्यिक गतिविधियां शून्य के करीब थीं। हमने तमाम अग्रजों को साथ जोड़ा। उनमें एक ओर मायानंद मिश्र, महाप्रकाश, सुभाष चन्द्र यादव थे, तो दूसरी ओर गीतकार नवल, रामचैतन्य धीरज, शेखर कुमार झा वगैरह भी थे। इस अनौपचारिक मंच का नाम 'अनवरत' था, जिसके लिए नवल ने यह गीत लिखा था-- 'नगर-नगर, गाम-गाम, गली ओ गली/ अनवरत के लेल हम तं अनवरत चली।' तब हम तीन हुआ करते थे, हमदोनों के अतिरिक्त मेरा लंगोटिया दोस्त मयंक मिश्र, जिससे नवीन की कभी न पटी। लेकिन हां, हमारी गतिकी पर इसका कभी असर भी न पड़ा। मयंक मुझे साइकिल पर लादकर महिषी से लाता, सारी गतिविधियां करके वापस हम महिषी लौट जाते, कभी-कभी तो रात के दो बजे। शेखर झा के डेरे पर महीनों साथ रहकर छेदी झा द्विजवर पर रिसर्च करने का भी एक रोचक अध्याय है। कभी-कभी जो अति रोचक घटनाएं घटीं, जैसे एक उस रात तय करके हमलोग मायानंद मिश्र के गीत-गजल रिकार्ड करने बैठे। ओह, पता भी न चला कि वह समूची रात किस तरह बीत गयी थी। पीने-पिलाने का सिलसिला चलता रहा था और सारी रात माया बाबू अपने गीत-गजल गाते रहे। उस गोष्ठी में महाप्रकाश थे हमारे साथ, और शशिकान्त वर्मा भी, सतीश वर्मा के पिता। उस रात के फोटोग्राफ्स तो मुझे याद आते हैं, लेकिन कैसेट? वह शायद मैंने केदार(कानन) को दिया था।

            केदार हमारी मित्रमंडली के सबसे मजबूत स्तम्भ थे। और, इस वजह से सुपौल हमारी दूसरी राजधानी। चौथे दोस्त के रूप में आगे प्रदीप बिहारी का आगमन हुआ तो हमने बाकायदा 'चतुरंग' की घोषणा कर दी। प्रदीप ने इतिहास के इस अध्याय को यूं अविस्मरणीय बना दिया कि अपने प्रकाशन का नाम ही चतुरंग प्रकाशन रख लिया। नवलेखन को मैथिली साहित्य के इतिहास में प्रतिष्ठापित करने का तब हमारा जुनून ऐसा था कि 'चतुरंग' का लक्ष्य-वाक्य मैंने इस तरह लिखा था-- 'साजि चतुरंग सैन, जंग जीतन कें चलल छी'।और जानते हैं, इस प्रकाशन की पहली किताब कौन-सी थी? वह मेरी गजलों किताब 'अपन युद्धक साक्ष्य' थी। उस किताब की छपाई में हम सब ने जो पापड़ बेले थे, ओह, आज वे कितने स्वादिष्ट लगते हैं! 

            दरभंगा से साहित्याचार्य की पढ़ाई पूरी कर जब मैं पटना विश्वविद्यालय से एम.ए. करने पहुंचा, तबतक नवीन डालटनगंज के एक कालेज में प्राध्यापक लग गये थे। बिहार तब एक था और पटना से डालटनगंज को पलामू एक्सप्रेस जोड़ता था। अब होने यह लगा कि पांच दिन वहां रहकर नवीन हर शनिवार को पटना आ जाता और सप्ताहान्त हम साथ बिताते थे। वह नवीन की सृजनशीलता के उन्मेष का दौर था। समूचे मैथिली-संसार में तबतक 'योजना-मास्टर' के रूप में मेरी प्रसिद्धि हो चुकी थी। जब भी हम मित्रगण मिलते, हमेशा नयी-नयी योजनाएं बनतीं और उन्हें कार्यरूप देने में हम जुट जाते। सच कहा जाए तो अपने होने और लिखने से जितना जो कुछ मैं समकालीन मैथिली साहित्य को प्रभावित कर पाया, वह सब इन्हीं योजनाओं में से पांच प्रतिशत अंश का प्रसाद था। यही वह दौर था जब बाबा नागार्जुन पटना में, मेरे बगलवाले मकान (हरिहर प्रसाद जी के आवास) में ठहरे हुए थे। इसकी समूची कथा 'तुमि चिर सारथि' में आ चुकी है। नवीन के लेखन की गति तब इतनी तेज थी कि जितना लोग महीनों में न लिख पाएं उतना वह पांच दिन में लिख जाता था। वह लगभग उन सभी विधाओं में काम कर रहा था, जिनमें मैंने किया था। कई विधाएं तो प्रकृति से ही विद्रोहात्मक थीं। जैसे मैथिली में गजलें। लघुकथाएं। एक-से-एक सुंदर गजलें और लघुकथाएं नवीन ने उन दिनों लिखी थीं और हलचल मचा दिया था।  आलोचना भी उनमें एक विधा थी लेकिन उसके यहां मुख्य स्थान कविता को प्राप्त था। एक शनिवार की वह सुबह भुलाये नहीं भूलती कि जब मेरे कमरे में चारों तरफ नवीन की नयी रचनाएं पसरी थीं और वह तल्लीन होकर मुझे सुना रहा था कि इसी बीच लाठी ठकठकाते बाबा आ धमके। कविताएं चल रही हैं, यह जानकर उनका मूड बन गया। नवीन से कहा-- सुनाइये कविताएं। कितनी बड़ी बात थी! कविता का शीर्ष एक नवोदित कवि को उसकी कविताओं के लिए आमंत्रित कर रहा था। नवीन यदि सचमुच के नवोदित होते तो कोई मुश्किल नहीं थी, झटपट सुना डालते। मगर, वह मेरा मुंह ताकने लगे। जितनी मैंने अबतक सुनी थी, अपने जानते बेस्ट की उन्हें याद दिलाई और संकोच से भरे नवीन ने वह कविता बाबा को सुनाई। इसके बाद जो हुआ था, सारथि पढ़ चुका हर पाठक जानता है। घंटों तक बाबा उस कविता की व्याख्या करते रहे, किस तरह कोई एक अच्छी कविता लिख सकता है, इसके सारे सूत्र बाबा ने उसी कविता से निकालने शुरू किये। जाहिर है, उसमें आलोचना ही अधिक थी, लेकिन यह एक ऐसा सुअवसर था जो हमें या हमारे मित्रों में केवल नवीन को नसीब हुआ था। हां, बाद को जब हमने 'श्वेतपत्र' छापा तो बाबा ने प्रदीप बिहारी की कहानी पढ़ी थी और उसकी पीठ ठोकते हुए यह कहा था कि यह मैथिली कहानी में विश्वशिशु की पैदाइश है।

            यहां एक-दो बातें और न कह दी जाएं तो हमारे उन दिनों का स्वभाव पूरा खुलेगा नहीं। बड़े-बड़े महापुरुष ही जो काम कभी अतीत में कर पाये थे, हमने अपनी तरुणाई में ही उसे कर दिखाया था। यह था-- संप्रदाय की स्थापना। हमारे संप्रदाय का नाम 'कलाकार संप्रदाय' था। कलाकार से यह न समझियेगा कि तबला-हारमोनियम या रंग-कूचियों से हमारा कोई वास्ता था। ग्रामीण रंगमंचों पर तरह-तरह के पार्ट हमने खेले थे जरूर, लेकिन यहां वह भी नहीं था। कला यानी कि खुशनुमा जीवन की कला। तमाम अभावों, अनीतियों, संघर्षों के बावजूद। जाहिर है, इस संप्रदाय में जाति-धर्म जैसे परंपरित ढकोसलों की कोई जगह न थी। आपस में या अन्यों के साथ भी हम अक्सर ऐसे करतब करते रहते कि सारी उदासीनता दूर हो जाए और आदमी हंस पड़े, संलग्न हो जाए। इस संप्रदाय के एक मजबूत स्तम्भ हमारे प्राचीन मित्र आशुतोष झा थे। और मयंक मिश्र तो थे ही। हुआ क्या कि आजीवन कलाकारी करते-करते जबतक मैं पटना वि. वि. से एम.ए. करूं तबतक आशुतोष की नौकरी हाइस्कूल में लग गयी। उनकी पहली और अंतिम भी, पोस्टिंग गढ़वा में हुई जो डालटनगंज का पड़ोसी शहर है। अब ये दोनों कलाकार साथ हो गये। नवीन की प्राथमिकता साहित्य थी, जिसके कारण हफ्ते-हफ्ते वह पटना आता। ऐसा कुछ आशुतोष के साथ नहीं था। पर, छुट्टियां जब होतीं, जैसे गरमियों की, तो दोनों साथ ही गांव आते थे।

            एक बार का वाकया है कि दोनों ने पटना आकर सहरसा की ट्रेन पकड़ी। छोटी लाइन की उन रेलों में सहरसा-रूट में जिन लोगों ने यात्राएं की होंगी, केवल वही बता सकते हैं कि भेड़-बकरियों की तरह ठूंसना किसे कहते हैं और यह भी कि लाठी-बल के सामने बाकी सभी संस्थाएं और कानून किस तरह ध्वस्त हो जाते हैं यह केवल आज की सचाई नहीं हो सकती है। तो, रास्ते में आशुतोष ने दर्जन-भर केले खरीदे तो नवीन को एक नयी कलाकारी सूझ गयी। उसने आशुतोष का रुमाल मांगा। मिस पड़ती भीड़ में भी अगर कोई अर्जेन्ट सिचुएशन आ जाए तो रेल के यात्री परस्पर मिलकर जगह बना ही देते हैं। नवीन ने ऐसा माहौल बनाया कि आस-पास बैठे यात्री जरा-जरा खिसक गये और रुमाल को नवीन ने सीट पर फैला दिया। किसी की समझ में कुछ न आया। आगे यह हुआ कि दोनों केले खाने लगे और नवीन छिलकों को रुमाल पर जमा करता रहा। बात कुछ जरूर है लेकिन वह क्या बात है, यह आशुतोष भी न समझ पाये और अपने रुमाल की दशा पर खिन्न बने रहे। सारे केले जब खत्म हुए, नवीन ने रुमाल को बांधकर पोटली बना ली। आस-पास के तमाम यात्रियों के लिए यह दृश्य आकर्षण का केन्द्र था। सोच रहे होंगे कि जरूर कोई विशेष गुण है छिलके का, लेकिन यह तो देख लिया जाए कि आगे ये बन्धु करते क्या हैं तब पूछा जाएगा। पैकिंग की कला में नवीन यूं भी उस्ताद है। रुमाल की पैकिंग उसने जिस तरह की उसका भी अपना एक आकर्षण था। जब वह पोटली को अपने बैग के अंदर रखने लगा तो आशुतोष का धैर्य जवाब दे गया। उसने पूछा-- यह क्या? नवीन ने अपनी आवाज में अतिरिक्त गंभीरता भरकर उत्तर दिया-- अरे कुछ नहीं, तारानंद की बकरी के लिए ले जा रहा हूं। तारानंद कौन है, उस डिब्बे में किसी को पता नहीं था, लेकिन सबकी हंसी छूट गयी। आशुतोष का तो हंसते-हंसते बुरा हाल था। बात केवल इतनी थी कि गांव में मेरी मां एक दुधारू बकरी पालती थी और चाय हम उसी के दूध की पीते थे।

            नवीन ने अपने जीवन का सफर जिस तरह पूरा किया है, जो भी मुकाम पाया है, सारा का सारा उसका खुद का अरजा है। उसके सारे काम, सारी उपलब्धियां जैसे खुद के भीतर की पुकार है, जिसे उसने कार्यरूप दिया। उसकी अपनी कुछ समझदारियां रही हैं। पैसे का उपयोग बहुत सोच-समझकर ही करेगा। नयी पीढ़ी को कभी सिर नहीं चढ़ाएगा, औकात में रखेगा। स्त्री को उत्साह में आकर ही सही, कभी बराबरी का मान दे दे, इसमें सदा सावधानी बरतेगा। गैरजरूरी लोगों से, मुद्दों से सदा परहेज रखेगा। उसके लिए काम प्यारा है चाम नहीं। जिन दोस्तों से वास्ता रखेगा उसके परिवार-भर से जुड़ा रहेगा। साहित्य से हमेशा बड़ा उसने जीवन को माना है, इसलिए सम्बन्ध का निर्वाह कोई उससे सीखे। यह सब चीजें उस भूमि, उस पर्यावरण, अभाव-अभियोग के उन अध्यायों की देन है, जिसने हमेशा नवीन को ऊर्जा से लवरेज रखा है। 

            उसकी जीवनकथा बहुत कुछ इस शेर के तर्ज पर चलती है कि 'मंजिल तो खैर कब थी हमारे नसीब में/ जो मंजिल पर पहुंचे तो मंजिल बढ़ा ली।' लेकिन, आगे वह दिल्ली गया तो दिल्ली का ही होकर रह गया, जैसे तारकोल की पांक में जाकर कोई फंस गया हो। आगे गांव-घर से, मिथिला से, मिथिला के आमजन और बौद्धिकों से उसकी अनगिन शिकायतें रहीं जो समय के साथ बढ़ती ही गयीं। इसके वाजिब कारण भी थे, इसे मुझसे ज्यादा कौन समझ सकता है? लेकिन कहना होगा कि इन शिकायतों ने बाद में परायेपन की एक ठोस शक्ल ले ली। अपनी पसंद के लोगों से जुड़ा रहा वह जरूर, लेकिन उसी तरह जैसे कर्नाटक या आस्ट्रेलिया के मित्रों से जुड़ा रहा। मिथिला के लिए मैं इसे एक बड़ी दुर्घटना मानता हूं और पाता हूं कि इसमें दोष जितना मिथिला का था उससे कहीं ज्यादा दिल्ली का और नवीन की महत्वाकांक्षाओं का था। जो भूमि खुद ही अबतक सामंती मठाधीशों से पददलित कराहती रही है, उसे किसी सृजेता की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने का अवकाश कहां मयस्सर होगा! कहना होगा कि दिल्ली ने मिथिला के इस सपूत को उपलब्धियां भले जितनी दी हो, उसके भीतर की सुंदरता छीन ली, उसे खराब किया।

            मैथिली में नवीन ने बहुत काम किया है, अनेक विधाओं में। उसका मूल्यांकन अबतक कायदे से हो नहीं सका है। यह मैथिली का दुर्भाग्य है कि उससे भी सीनियर, उससे भी बड़े लेखकों का मूल्यांकन नहीं हो सका है। नवीन ने अपने सृजनात्मक लेखन में हाशिये के लोगों का संघर्ष उठाया है। उसकी कथाएं और लघुकथाएं संभ्रान्त समाज पर एक करारा तमाचा हैं। उसकी कविताएं और गजलें उम्मीद की लौ जगानेवाली रचनाएं हैं। पीढ़ियों तक ये कृतियां संघर्षशील युवाओं के काम आएंगीं। वह ताउम्र बाबा नागार्जुन से जुड़ा रहा और अपने लेखन से उनके किये काम को विस्तार देता रहा।

             उसकी रचनात्मक जिद बहुत बलशाली है। कुछ तय कर ले तो कठोर परिश्रम तबतक जारी रख सकता है जबतक उसकी जिद ठोस आकार न ले ले। राजकमल चौधरी पर किया गया उसका काम इसी का प्रतिफल है, वरना उससे पहले कई वीर आए और थककर छोड़ भागे थे। इस चीज ने जरूर उसे अकेला बनाया है। सृजन का हर पथिक एक पड़ाव पर आकर अकेला हो ही जाता है, स्वयं राजकमल यह बात कह गये हैं। मैं अपने इस दोस्त के इसी अकेलेपन को प्यार करता हूं। मुलाकातें तो अब बेहद कम हो गयी हैं लेकिन जब भी हम मिलते हैं, बीच के चालीस साल को चीरकर ठीक उसी जगह आ जमने में पल भर भी नहीं लगता।

Sunday, September 18, 2022

इन्टरव्यू:: भारतीय साहित्य बीच मैथिली साहित्य (संजीव सिन्हा संग तारानंद वियोगीक वार्ता)




*संजीव सिन्हा--भारतीय साहित्य मे मैथिली साहित्यक कतेक प्रतिष्ठा अछि?

• ता न वि--जकरा पंडीजी लोकनि मैथिली साहित्य कहै छथिन, आ जकरा पुरस्कार-प्रतिष्ठान सब पुरस्कृत करैत अछि, आ जकरा प्रोमोट करबा लेल विश्वविद्यालय सब, मैथिली प्रतिष्ठान सब हलकान रहै छथि, ताहि मैथिली साहित्यक कोनो प्रतिष्ठा नहि अछि। उनटे निन्दा होइत अछि। नियमसंगत बात छै जे जकरा अहां पुरस्कृत करबै ओकरे अनुवाद भ' क' बाहर जाएत आ ओही पर प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा निर्भर करत।

        हिन्दी आलोचक नंदकिशोर नवल जखन पछिला दशक मे एकठाम लिखलनि जे मैथिली मे एखनो महाकाव्ये युग चलि रहल अछि तं मैथिल लोकनि हुनका भरि पोख गरियेलखिन। जखन कि तथ्य की अछि? डा. भीमनाथ झाक आकलन छनि जे दस बरस मे मैथिली मे बीस टा महाकाव्य छपि रहल अछि। दोसर दिस, हमर महान आलोचक रमानाथ झाक मान्यता रहलनि जे मैथिली मे प्राचीन काल सं आइ धरि दुइये टा युग भेल-- विद्यापति सं हर्षनाथ झा धरि कृष्णयुग, आ चंदा झा सं आइ धरि रामयुग। एहि सौ बरस मे दुनिया कते बदलि गेल आ मैथिली जं आइयो एही ठाम अछि तं भला एकर की प्रतिष्ठा भ' सकै छै?

           मुदा दोसर दिस, जाहि रचनाकार लोकनि कें पंडीजी सब गरियाबै छथिन, जिनका लेल ने कोनो पुरस्कार अछि ने कोनो प्रतिष्ठान, विना कोनो प्रोत्साहनक कोना आ किएक ई लेखक लोकनि आइयो मैथिली मे लिखि रहल छथि अन्त:प्रेरणा कें छोड़ि दी, तं एकर जवाबो ताकब रहस्यमय लागत-- भारतीय साहित्य मे जं आइ मैथिलीक कोनो प्रतिष्ठा अछि तं से एहने लेखक सभक दुआरे अछि। यात्री जी, राजकमल चौधरी, धूमकेतु, कुलानंद मिश्र सं ल' क' सुभाष चंद्र यादव धरि आ हुनका बादो ई क्रम जारी अछि। हमरा सदति आश्चर्य लगैत रहल अछि जे हरेक पीढ़ीक संग एहि कोटिक दू-चारि गोट लेखक आइयो मैथिली मे कोना, कोन प्रभाववश चलि अबैत छथि! एकरा अहां मैथिली साहित्यक सौभाग्य कहि सकै छियै।


*संजीव सिन्हा--एखन मैथिली साहित्यक केहन परिदृश्य अछि?

• ता न वि--गुहमा-गीज मचल अछि। मैथिली साहित्यक स्तर कें अठारहम शताब्दीक राजदरबार मे लिखल जाय बला साहित्यक रूप मे ढालबाक सघन प्रयास चलि रहल छै। नेतृत्व एहन लोकक हाथ मे छै जे साहित्यक सी अक्षर नहि बुझैत अछि मुदा समस्त सम्मान अरजि क' मठाधीश बनल अछि। मिथिलाराज, जे कि एखन नहि भेटल अछि, तकरा लेल युवावर्ग आंदोलित छथि, मुदा विश्वविद्यालय कि प्रतिष्ठान, जे कि पहिनहि सं मैथिली कें भेटल अछि, तकर वर्चस्ववादी धतकरम स्वयं मिथिलेक लोक कें एहि सभक प्रति निस्पृह आ निरपेक्ष बना रहल अछि। युवावर्गक ध्यान एम्हर नहि जाइए तं की एकर अर्थ ई नहि भेल जे हिनका सब कें जं मौका भेटि जाय, तं इहो सब सैह करता?

            जेना कि हम पहिने कहलहुं, अपन अंत:प्रेरणा सं आ अपन भाषा-भूमिक नेहवश जे प्रतिभाशाली लोक सब एकान्तवास क' साहित्यसृजन मे लागल छथि, मैथिली साहित्यक समुच्चा भविष्य हुनके सब पर टिकल अछि। मुदा परिदृश्य पर हुनकर कोनो पकड़, कोनो नियंत्रण नहि अछि। जिनकर नियंत्रण छनि हुनका ने मिथिला सं कोनो मोह छनि ने मैथिलीक प्रति कोनो ममता। अर्धमृत मैथिलीक मासु नोचि-नोचि कांच चिबेनिहार ई लोकनि अपन लाभ-लोभ छोड़ि आर कथूक चिन्ता नहि करैत छथि। कइये नहि सकै छथि।


*संजीव सिन्हा--मैथिली साहित्य मे कोन-कोन वाद, विमर्श, आंदोलन चलल अछि? संप्रति कोन साहित्यिक प्रवृत्तिक प्रधानता अछि?

ता न वि.--इतिहासकार सभक संकीर्णता सं बाहर आबि क' जं बात करी तं मैथिली साहित्य मे कुल्लम दुइये प्रकारक वाद चलल अछि-- प्राचीनतावाद आ आधुनिकतावाद।

       प्राचीनतावादक की अर्थ अछि? सनातन धर्मक कर्मकांडी स्कूलक मान्यताक पृष्ठपोषण। हम सब जनै छी जे सनातन धर्म मे बहुतो संप्रदाय अछि, वैष्णव संप्रदाय सेहो अछि, मुदा मैथिलीक प्राचीनतावाद मे एकरा प्रति घोर घृणा देखबै। आश्चर्यक बात ई अछि जे बारह सौ बरस पुरान अपन मैथिली साहित्यक परंपरा मे उत्स अहां कें आधुनिकतावादक भेटत, प्राचीनतावादक नहि। संसार भरिक अध्येता सब कैक अर्थ मे स्वयं विद्यापति कें आधुनिक माने छथि। दोसर दिस, मैथिली मे लेखनक जे आविष्कार भेल छल सैह संस्कृतक प्रतिरोध मे शूद्र वर्गक द्वारा भेल छल। छंद मे कविता लिखब मैथिलीक काव्य-परंपरा मे कहियो मान्य नहि रहल, राग-ताल-लय मे सं कोनो एक वा दू वा तीनू सब दिन मान्य रहलै। मैथिली जहिया सं वर्चस्ववादी लोकनिक शिकार भेल तहिये सं, उनैसम शताब्दीक अंत सं, एहि मे छंदक चलाचलती भेल। आइ जे ब्लैंक वर्स मे कविता लिखल जा रहल रहल अछि तकर परंपरा अहां ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकर मे पाबि सकै छी। प्रसंगवश कहि दी जे वर्णरत्नाकर एक काव्यपुस्तक छी आ स्वयं ज्योतिरीश्वरो एकरा काव्ये कहने छथि।

         आधुनिकताक प्रसार-क्रम मे अनेक आन्दोलन समय-समय पर चलैत रहल अछि। बीसम शताब्दीक आरंभिक बेला कें मोन पाड़ियौ। अंग्रेज हिन्दू-मुसलमान मे विभाजन पैदा करबाक लेल फारसीक स्थान पर हिन्दी कें प्रश्रय देलक आ मिथिलानरेश तं अंग्रेजक सदा सं अनुगामी चाकर, तें तहिया मैथिली साहित्य मे राष्ट्रीय चेतनाक कविता लिखब, मिथिला आ मैथिली कें विकसित करबाक स्वप्न देखब एक आन्दोलन छल। सामाजिक सड़ांध के प्रतिकार मे हरिमोहन झाक कन्यादान वा खट्टर काकाक तरंग कि यात्री जीक पारो आधुनिक मनोनिर्माणक दिशा मे मैथिली साहित्यक सर्वाधिक प्रभावी आन्दोलन छल। मैथिली साहित्यक प्रधान विधा सब दिन सं कविता रहल अछि। कविताक सीमा सब कें तोड़बाक, ओकरा आर अधिक अन्तर्गामी, आर अधिक यथार्थमुखी बनेबाक दिशा मे राजकमल आ हुनकर साथी कवि सभक आन्दोलन एक दिशानियामक अवदान साबित भेल। कविता लेल अबल-निबल लोकक पक्ष मे ठाढ़ हेबाक जे प्रतिश्रुति छै, तकर प्रतिष्ठापन लेल जं एक दिस यात्री जीक चलाओल काव्यान्दोलनक महत्व अछि तं दोसर दिस अग्निजीवी आन्दोलनक सेहो कम नहि, जकर सर्वश्रेष्ठ परिणाम हमरा लोकनि हरे कृष्ण झाक कविता मे पबैत छी।

         मैथिली साहित्य मे समकालीन विमर्श मुख्यत: दूटा प्रभावी रूप सं हस्तक्षेपकारी साबित भेल अछि-- स्त्री-विमर्श आ दलित-विमर्श। आइ एही दुनू विमर्शक रचनाशीलता सर्वाधिक प्राणवन्त, सर्वाधिक ध्यानाकर्षक रूप मे सामने आबि रहल अछि।

         

*संजीव सिन्हा--मैथिली साहित्यक समक्ष की समस्या-चुनौती अछि?

ता. न वि-- सब सं पैघ तं यैह अछि जे प्रतिभाशाली रचनाकार सभक आत्म-बलिदानी पीढ़ी आगुओ एतय कोना जनमैत रहय। एकरा लेल कोनो कतहु माहौल नहि अछि। हमर भरोस एखनहु धरि मरल नहि अछि जे वर्चस्वी लोकनिक क्षुद्र स्वार्थक दबोच सं कहियो मैथिली साहित्य मुक्त हेतै आ एहि अनागत प्रतिभा सभक लेल एतहु एक स्वस्थ पर्यावरण बनतै।

            चुनौती अछि जे एहन साहित्य मिथिला मे लिखल जाय जकर धमक विश्व भरि मे सुनाइ पड़ि सकै। चुनौती अछि जे जाहि हिसाबें नव-नव रचना-प्रवृत्ति सब मैथिली मे विकसित भ' रहल छै, तकरा देखबाक आंखि पहिने तं आलोचक लोकनि मे तखन पाठक लोकनि मे विकसित भ' सकै।

            चुनौती अछि जे श्रेष्ठ साहित्य लिखबाक अभीप्सा राखनिहार युवा लोकनि कोना पुरस्कारक मोह सं बचल रहि सकथि आ एकरे बहुत मानथि जे एहनो अंधकारकाल मे ओ साहित्यक साधना लेल जीवनक महत्वपूर्ण समय खर्च क' पाबि रहल छथि। समय चूंकि सर्वथा विपरीत छै तें मैथिली साहित्यक स्तर, जतय धरि कि आइ ई पहुंचि चुकल अछि, एकरा जीवित बनौने राखिये सकब सब सं पैघ चुनौती छै।


*संजीव सिन्हा--मिथिलाक अन्य भाषा- अंगिका, बज्जिकाक लेखक सँ मैथिली लेखकक संवाद केहन अछि?

• तान वि--कोनो संवाद नहि अछि। अथवा कहू जे घृणा करबाक सम्बन्ध अछि, मानू शुतुरमुर्ग आंखि बन्न क' लेत तं संकट टलि जेतै। रामदेव भावुक आखिरी कवि छला जे अइ पार-ओइ पारक बीच एक पुल छला। आइ समस्त पुल तोड़ल जा चुकल अछि। जेना बेंगक लेल ओकर संपूर्ण संसार इनारे होइ छै तहिना आइ मैथिल लोकनिक लेल संपूर्ण संसार दू जिला-- दरभंगा आ मधुबनी अछि। हं, मंच पर भाषण देबाक जखन बात रहत, बड़का-बड़का बात सुनबै, जेना हाथीक देखावटी दांत। हमरा भय अछि, मैथिल सभक संकीर्णता कहीं  समस्त भविष्यक बलिदान करैत मैथिलियो कें ओही साहित्यिक स्तर पर ने आनि पटकय जतय आइ अंगिका-वज्जिका अछि। एहिना जं सब किछु दस-बीस बरस चलैत रहल तं से निश्चिते भ' क' रहत। आ अहां भारतीय साहित्य बीच एकर प्रतिष्ठाक बात करै छी?

           प्रसंगवश इहो कहि दी जे अंगिका-वज्जिकाक विभाजन वास्तविकता सं कतहु बेसी मैथिल सभक संकीर्णताक प्रतिरोध छियै। कते आश्चर्यक बात छी जे हम सब आइ ओतय पहुंचि गेल छी जतय आठम-नवम शताब्दी मे संस्कृत छल आ संस्कृतेक प्रतिरोध मे मैथिली साहित्यक जन्म भेल छल। लगभग सैह प्रतिरोध आइ अंगिका वज्जिका दिस सं आबि रहल अछि।


*संजीव सिन्हा--मैथिली साहित्य मे नव लेखक लेल कोन तरहक अवसर आ संभावना अछि?

ता न वि--दू तरहक अवसर छै। एक तं कहुना एकटा किताब छपबा लिय' विना अइ बातक परवाह केने कि ओकर स्तर केहन अछि। तकर बाद, गनल-चुनल लोक छथि जानल-मानल, हुनका सभक सेवा मे लागि जाउ, यथाशक्ति तथाभक्ति। जाहि योग्य सेवा रहत, ताहि अनुपातक कोनो पुरस्कार, सम्मान घीचि आनू। मिथिला मे विद्वान लोकक सदा सं बहुत कदर। विद्वानक पहचान यैह जे अहां कें कोनो पुरस्कार भेटल हुअय। आर नहि किछु तं मिथिला विभूति। एतबे मे अहां अपन पुरखा-पति धरि के आत्मा कें तृप्त क' सकै छियनि, समाज मे आदरणीय स्थान पाबि सकै छी। ई पहिल।

                   दोसर जे अवसर छै ताहि लेल हमरा युवा दलित कवि रामकृष्ण परार्थीक एक कविता मोन पड़ि आएल अछि जतय ओ कहै छथि जे मैथिली लिखबा मे हमरा स्वतंत्रता-संग्राम मे सीधा उतरि क' लड़बा सन के तृप्ति भेटैत अछि। इतिहास कें मोन पाड़ी। हुनका सब कें की भेटलनि जे स्वतंत्रता लेल लड़ला आ मरला! सोचबा सोचबाक बात छी। अहां कें लागि सकैए जे अरे, इहो कोनो बात भेलै! स्वतंत्रता तं जाइत-अबैत रहै छै। आइ धरिक इतिहास मे कतेको बेर ई देश गुलाम बनल, फेर आजाद भेल, फेर गुलाम बनल। असल चीज छी व्यक्तिगत लाभ, से अहां सोचि सकै छी। तकरो अवसर कम नै छै। प्रतिष्ठान आ विश्वविद्यालय तं पहिनहु सं रहै, आब तं नेतागिरी आ दलाली मे सेहो मैथिली सेवनो सं कोनो कम लाभ नै छै।

Wednesday, September 14, 2022

'गुलो'क अन्तर्कथा आ सुभाष चन्द्र यादव

 


तारानंद वियोगी



          सब गोटे जनैत छी जे 1948 मे जखन यात्री जी सं हुनकर प्रकाशक, मने हिन्दी-प्रकाशक, उपन्यास लिखबाक अनुरोध कयने रहनि, तं यात्री जी जिद पकड़ि लेने रहथि जे ओ उपन्यास तं लिखता जरूर मुदा मैथिली मे लिखता। प्रकाशको हुनकर गद्यकला पर तेहन मुग्ध जे मानि गेल छला आ एहि तरहें आयल रहय 'पारो'। मैथिली मे हेबाक बादो ओकर सबटा प्रति छबे मास मे बिकि गेल रहै से तं एक बात, पैघ बात ई जे मैथिली उपन्यासक नियति कें ई उपन्यास बदलि क' राखि देलक रहय। एकर बाद एक हिन्दी तं दोसर मैथिली, एही हिसाब सं हुनकर किताब सब अबैत रहल। मुदा, हमरा कहबाक अछि जे यात्री जी मैथिली मे उपन्यास लिखब छोड़ि किएक देलथि? कहिया छोड़लथि? कोन एहन घटना भेलै जे हिन्दी मे तं हुनकर उपन्यास अबैत रहल मुदा मैथिली मे उपन्यास लिखब ओ बंद क' देलथि।

          एहि प्रसंगक सीधा सम्बन्ध सुभाष चन्द्र यादव लिखित उपन्यास 'गुलो'क संग अछि।

          'नवतुरिया' आ 'बलचनमा' एहन उपन्यास रहै जकरा यात्री जी मैथिली आ हिन्दी मे अलग-अलग लिखने रहथि। 1952 सं 1955 धरि ओ प्रमुखत: एही काज मे लागल रहल छला। हिन्दी मे 'बलचनमा' छपि गेलाक बादो ओ मैथिली 'बलचनमा'क आभा मे डूबल रहला। ई हुनकर स्वप्न आ सेहन्ताक मिथिला रहय। अपन समुच्चा अस्मिता मे जे आदर्श ओ अपन जुझारू जीवन सं अर्जित कयने रहथि, जे मैथिली हुनका प्राण मे सुवास जकां विराजित छली, ई से छल। अन्तत: जखन ई उपन्यास हुनका परिकल्पनाक एनमेन मुताबिक कागज पर उतरि अयलै, 15 फरबरी 1955 कें ओ हरिनारायण मिश्र कें लिखलनि: 'हौ हरि, मैथिली बलचनमा हिन्दी बला सं नि:सन्देह सुंदर भ' गेलैक अछि। अनावश्यक विस्तार आ बन्धुरतो एतय नहि छैक। ओकर धड़कन कैक गुना अइ मे बढ़ि गेलैक अछि, की कहियह!'

          मुदा, दुर्भाग्य देखू जे ई उपन्यास छपबाक लेल यात्री जी एकटा मैथिली संस्था-- मिथिला सांस्कृतिक परिषद्, कलकत्ता-- कें देलखिन, जखन कि हुनका लग तहियो प्रकाशकक कोनो कमी नहि रहनि। मैथिली-संस्था सब, से चाहे सोसाइटी हुअय कि सरकारी, आइ पैंसठ बरखक बादो, कोनो ब्राह्मणजातीय-संगठन सं अलग किछु किनसाइते होइत अछि, भने नाम संग संस्कृति जोड़ल रहय कि चेतना। तहिया केहन परिस्थिति रहल हेतै तकर अनुमान सहजे क' सकै छी। जखन कि 'बलचनमा' की छल? एक शूद्रक संघर्षक कथा छल। एतबे नहि ने। ओ बलचनमेक भाषा मे लिखलो गेल छल, जकर नाम यात्री जी देने रहथिन-- 'शूद्र मैथिली'। आब कहू, ई चीज कतहु मैथिली संस्था छापय? ओ सब यात्री जीक खेखनी तं करै छला एहि लेल जे बड़ पैघ लेखक छी तं किछु मैथिली संस्थो पर दया करियौ। ई के जनै छल जे ओ शूद्र मैथिली मे लिखि क' पठा देता?

           12 बरस धरि जखन संस्था 'बलचनमा' कें नहि छापलक तखन यात्री जी उग्र भेला। मुदा ताधरि पांडुलिपि पूर्णत: नष्ट भ' चुकल रहै। यात्री जीक अपन देशव्यापी प्रतिष्ठा रहनि, तें संस्था पर दवाबो चारूभर सं बनि गेलै। हिन्दी बलचनमा ताधरि हिन्दीक प्रथम श्रेणीक उपन्यास-रूप मे मान्यता प्राप्त क' लेने रहय। लाचार संस्था कोनो अज्ञात अछरकटुआ सं एकर अनुवाद करौलक आ अन्तत: 1967 मे प्रकाशित क' देलक। मूल कृति मुदा विलुप्ते भ' गेलै। मोहन भारद्वाजक मानब छलनि जे अइ किताब पर जे 'मूल लेखक नागार्जुन' छपल रहै, से संस्थाबला सभक खचरपनी छल, मुदा हमर मानब अछि जे खचरपनी नहि, ई हुनका लोकनिक ईमानदारी रहनि। सत्य कें ओ लोकनि लिखित रूप मे स्वीकार क' लेने रहथि। अस्तु, यात्री जीक यैह आखिरी उपन्यास साबित भेलनि जे कि अपन मूल स्वरूप मे छपियो नहि सकल छल।

          ब्राह्मण लोकनि 'शूद्र' कहैत अयलनि अछि मुदा शूद्र लोकनि अपना कें अदौ सं 'पचपनिया' कहै छथि। पचपनिया अर्थात पचपन जाति, जकर वास्तविक अर्थ थिक बहूतो जातिक समुदाय। एही पचपनिया मैथिली मे 'गुलो' छपल अछि।

          एहि तरहें, साठि वर्ष पहिने यात्री सन महामना लेखकक हारल एक अभियान कें हमरा लोकनि सुभाष चन्द्र यादवक एहि उपन्यास मे आकार लैत देखैत छी। एकरा कोनो छोट घटना, जेना थोकक हिसाबें मैथिली मे किताब बहराइत अछि, कोना मानल जा सकैत अछि? जें कि सुभाष सन के विरल सिद्धहस्त लेखक के लिखल ई रचना थिक, (तखनहि तं यात्री-प्रसंग संग एहि ठाम तुलनीय मानलो गेल अछि,) केवल भाषे धरि बात नहि रहल। कलाक एक एहन दुर्लभ नमूना मैथिली उपन्यास कें हासिल भेलैक जाहि पर बहुत युग धरि गर्व कयल जा सकैए। 

          यात्री जी सन पैघ लेखक बुते जे काज 1955 मे करब पार नहि लागल छलनि से काज 2015 मे सुभाष क' सकला, एकर एक अर्थ इहो भ' सकैत अछि जे अइ साठि बरस मे मिथिला समाज बदलि गेल। कतबा बदलल? कोनहु भाषाक सृजेता लोकनि तं तहिना समाजक शीर्ष होइत छथिन जेना गाछ मे फुलायल फूल। ओ परिष्कृत परिशोधित होइत छथि आ अपन जीवनक एक उल्लेख्य भाग अपना कें डिकास्ट आ डिक्लास्ड करै मे लगबै छथिन। तें हुनका लोकनिक व्यवहार सं अहां सकल समाजक स्थितिक सही-सही मापन प्राप्त नहि क' सकै छी, एतय धरि कि मैथिली संस्थाक संचालक लोकनिक वा पुरस्कार वा लाभ-लोभ (अर्थ अछि चारू प्रकारक लाभ-- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सं लिखनिहार लेखको धरिक स्वास्थ्यक सही पता नहि पाबि सकै छी। 

          असल मे, सुभाष अपन उपन्यास 2014 मे पूरा क' लेने रहथि आ 'मिथिलादर्शन'क अक्टूबर-नवंबर 2014क अंक मे ई प्रकाशितो भ' गेल रहैक। अइ बीच मे दूटा मुख्य घटना घटलैक। एक तं ई जे उपन्यास पूरा कयलाक बहुत समय बादो धरि सुभाष अपन रचनात्मक आवेग सं बाहर नहि निकलि पाबि रहल छला। पैघ रचनाक सृजनोत्तर आवेगो पैघ होइत छैक। एही निकलबाक प्रयत्न मे ओ 'पचपनिया मैथिली' नामक अपन लेख लिखि लेलनि। ई लेख प्रकाशित होयबा सं पहिनहि एकर एक अंश सोशल मीडिया पर प्रकाशित कयल गेल छल। बिखिन्न-बिखिन्न प्रतिक्रियाक धर्रोहि लागि गेल। बाद मे ई संपूर्ण लेख 'पूर्वोत्तर मैथिल'क अंक मे प्रकाशित भेल। संपादकीय विमतिक प्रायोजना-स्वरूप कही कि स्वाभाविक धर्मरक्षा-स्वरूप, पैघ-पैघ प्रतिक्रियाक धर्रोहि ओतहु लागि गेल। अइ सब सं असलियत बूझल जा सकैत छल जे सकल समाज कतबा बदलल अछि आ कि केहन बदलल अछि। 

          दोसर घटना ई भेल जे 2015क भूकंपक समय मे कथानायक गुलो मंडल के देहान्त भ' गेलनि। सुभाष आ केदार गुलो मंडलक संग कोना जुड़ल छला, तकर प्रसंग केदार काननक एक लेख मे आयल छैक। गुलोक मरब सुभाषक लेल एक पैघ घटना छल आ ई अनेक तरहें हुनका प्रभावित केलकनि। एक प्रभाव तं छल जे एहि बातक प्रकरण उपन्यास मे आनब हुनका जरूरी क' देलकनि। समापित आ प्रसारित उपन्यासक गीरह फेर सं खोलल गेल, किछु तहिना जेना सारा मे गाड़ल गुलोक लहास कें फेर सं खोदि क' निकालल गेल छल। किसुन संकल्पलोक सं जे 'गुलो' छपल अछि, ताहि मे ई समुच्चा अंश अछि जखन कि 'मिथिलादर्शन'क पाठ मे ई नहि अछि। किनको लागि सकै छनि जे एहि अंश कें जोड़ब उपन्यासकलाक हिसाबें गैरजरूरी छल, जखन कि कोनो दोसर गोटे कें जरूरियो लागि सकैत छनि। असल मे अपन कथानायकक संग उपन्यासकारक संलिप्तता आ तादात्म्य कोन रूपक छनि, ई प्रश्न ताहि पर निर्भर करैत अछि। वाजिबे थिक जे एकर संपूर्ण अधिकार सुभाष कें छलनि जकर यथेप्सित उपयोग ओ क' सकैत रहथि।

          मैथिली साहित्य मे सुभाषक महत्व पर विचार करैत प्रसिद्ध आलोचक कुलानंद मिश्र कहियो लिखने छला-- 'मैथिली कथाक क्षेत्र मे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक बादे आरंभ भेल।' बुधियार कें इशारा काफी बला अंदाज मे अपन बात कहैत कुलानंद जी ओतय साफ नहि कयने रहथि जे ई 'एकटा निश्चित सीमा' की छल आ सुभाष कोन तरहें एकर 'अतिक्रमण' केलखिन। आब हमसब इतिहासक एहि पार आबि क' देखैत छी तं बूझि सकैत छी। 'मैथिली-साहित्य' जकरा हमसब कहै छी, विश्वास करू ओ विशुद्ध 'ब्राह्मण-साहित्य' नहि थिक जेना कि किछु लोक अपन लेखन सं आ अधिकतर अपन रणनीतिक(?) व्यवहार सं साबित करैत रहैत छथिन। ई जं कहबै जे तमाम विविधताक बादो मैथिली साहित्य अन्तत: जीवन-जगत कें देखबाक एक ब्राह्मण-दृष्टि मात्र थिक, सेहो कहब उचित नहि। जं किनको लगैत होइन जे नहि, यैह उचित थिक तं हुनका मैथिली लिखब छोड़ि क' कठिन प्रयत्नपूर्वक अपना कें कुसंस्कारमुक्त हेबाक साधना करबाक चाही।

         

Friday, September 2, 2022

राजकमल चौधरी का हिन्दी और मैथिली लेखन


 ।।राजकमल चौधरी का हिन्दी और मैथिली लेखन।।

तारानंद वियोगी से सुजीत वत्स का संवाद


सुजीत वत्स-- राजकमल चौधरी के अधिकृत विद्बानों में से आप एक हैं।साथ ही आपने उनकी मैथिली कविताओं के साथ -साथ हिंदी कविताओं का भी सूक्ष्म अध्ययन किया है। आपसे मेरा पहला प्रश्न है कि आप राजकमल की हिन्दी कविताओं और मैथिली कविताओं के संवेदनात्मक स्वरूप में क्या अन्तर महसूस करते हैं।


तारानंद वियोगी-- राजकमल ने जब मैथिली में कविताएं लिखनी शुरू कीं, उनका स्वर और शैली बिलकुल पारंपरिक थे। युवापीढ़ी के साथ जो नया उत्साह और नया तेवर आता है, वही केवल था और वह दुनिया को बदल डालना चाहते थे।

    पर जब उनकी आरंभिक हिन्दी कविताओं को देखें तो तो वहां भी हमें यही चीजें देखने को मिलती हैं।

    फर्क आगे जाकर पड़ा जब उनकी मैथिली कविताएं ग्रामीण सौन्दर्यबोध में पगी देखने को आईं और हिन्दी कविताएं नागरबोध में। शाक्ततंत्र का उन्हें अच्छा ज्ञान था, जो दोनों ही भाषाओं की कविताओं में जगह जगह पूरे फैलाव के साथ आए हैं। दूसरे यह कि मैथिली की काव्यपरंपराओं में यहां की सामाजिक मान्यताओं के अनुरूप ही कई वर्जनाओं को पूज्यभाव से देखा जाता था। इन्हें राजकमल ने निर्दयतापूर्वक तोड़ा। इसलिए उनकी मैथिली कविताओं ने मिथिला के काव्य परिदृश्य में काफी हाहाकार मचाया। हिन्दी के काव्यपरिदृश्य के लिए यह चीज उस तरह नई नहीं थीं। यहां उन्होंने दूसरी कई चीजें तलाश लीं। 

    राजकमल का कवितावाचक एक बौद्धिक युवा है। यह मैथिली के लिए नई चीज थी। यात्री का कवितावाचक ग्रामीण किसान था। हिन्दी में बौद्धिक कवितावाचक का प्रवेश काफी पहले हो चुका था।

   भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जो महान आदर्श थे, उसने दूर तक राजकमल के कविव्यक्तित्व को प्रभावित किया था। लेकिन, उन आदर्शों के टूटने बिखरने की धमक राजकमल की तमाम कविताओं में पाई जाती है। इसलिए उनका जो कवितावाचक है, वहां एक टूटन भी है और दिशाहारापन भी, भले ही वह दुनिया को बदल डालने की मंशा रखता है। राजनीति उनकी कविताओं का एक जरूरी एंगल है। यह अलग बात है कि उनमें विचारधारागत स्पष्टता का अभाव है। यह हमें उनकी हिन्दी कविताओं में ज्यादा साफ दिखता है। अपनी मैथिली कविताओं में वह एक उप राष्ट्रीयता भी रखते पाये जाते दीखते हैं, जो कि उनका मैथिलत्व है।



सुजीत वत्स-कवि के साथ-साथ राजकमल को एक कथाकार के रूप भी जाना जाता है।एक कवि या फिर एक कथाकार दोनों  में से  किस विधा में  उनकी रचनाएँ ज्यादा  सशक्त है?


तारानंद वियोगी-- हिन्दी और मैथिली दोनों ही भाषाओं में काफी लोग ऐसे हैं जो राजकमल को एक कथाकार के रूप में ही ज्यादा सफल मानते हैं। यह मानने के अपने कारण भी हैं। याद रखने की बात है कि कहानी में सिद्धता के अपने अलग मानदंड हैं, और वे कविता से अलग हैं। कोई अच्छा कवि हो तो केवल इसी से यह तय नहीं हो जाता कि कहानीकार भी वह अच्छा होगा। कहना चाहिए कि राजकमल ने इन दोनों ही विधाओं में अलग-अलग सिद्धि प्राप्त की।

      अपनी जिस आवेगभरी भाषा के लिए वह जाने जाते हैं, वह गद्य और कविता दोनों में ही अपना कमाल दिखाती है। सामाजिक सरोकार उनकी कहानियों में ज्यादा स्पष्ट हैं। सामंतवाद का विरोध भी, और लैंगिक गैरबराबरी के खिलाफ गुस्सा भी। कहानियों के विषय उन्होंने ऐसे चुने जो समकालीन साहित्य की एक बड़ी रिक्ति भरते थे, और पाठक को एक नये संसार के सामने ला खड़ा करते थे। एक ऐसा संसार, जिसके बारे में या तो बहुत कम जानता होता था, या फिर इस तरह कभी सोचा तक नहीं होता था। 

      राजकमल की कही वह बात मुझे नहीं भूलती कि इतने लोगों ने कहानियां लिख लीं और लिख रहे हैं कि नया या मौलिक कथानक तो हमें अब मिलने से रहा। अब तो शैली ही एक बच गयी है जो हमें अपने समकालीनों में अलग दिखा सकेगी। अपनी आवेगमय भाषा में शैली का उन्होंने ऐसा चमत्कार रचा कि उन लोगों की बात को यूं ही उड़ा देना आसान नहीं है, जो राजकमल को कहानीकार के रूप में ज्यादा सफल पाते हैं।



सुजीत वत्स-राजकमल ने अपनी हिन्दी कविताओं में मिथकों का बहुत ही अधिक प्रयोग किया है।क्या मैथिली कविताओं में भी उन्होंने मिथकों का प्रयोग  उसी अनुपात में प्रयोग  किया है?एक प्रखर प्रतिरोधी कवि की कविताओं में मिथकों का इतना अधिक प्रयोग कविता की सम्पेषणीयता में बाधा तो नहीं है??


तारानंद वियोगी- हां, ये सही है कि अपनी कविताओं में मिथकों का प्रयोग उन्हें प्रिय था। और, यह हिन्दी और मैथिली दोनों ही भाषाओं की कविताओं में समान रूप से किया गया है। ब्राह्मणशास्त्रीय प्राचीन मिथक उन्हें प्रिय थे। इनका उपयोग अक्सर वह अपनी अभिव्यक्ति को धार देने के लिए करते। यह उनके कथ्य को अतिरेक में ले जाता था। अतिरेक में होना उनकी अपनी विशेषता थी और इसके लिए तरह तरह के प्रयोग करते रहते। कई बार तो बस चौंकाने या सामनेवाले को आक्रान्त कर जाने के लिए मिथकों को घसीट लाते। लेकिन, अध्येताओं ने पाया है, और गौर करें तो हम भी देख सकते हैं कि कि ये मिथक उनकी आत्मा की बेचैनी और मन की दुराशंकाओं की सटीक व्याख्या कर जाते थे। उनकी एक मैथिली कविता 'महावन' में आए पुराने पाकड़ वृक्ष की धोधर में बैठे पुरातन गिद्ध के रंग को कविता में देखने के बाद मणिपद्म ने यह आशंका व्यक्त की थी कि इस कवि की मृत्यु अब सन्निकट है। और आश्चर्यजनक रूप से यह आशंका सच साबित हुई थी। मतलब यह कि जो भी प्रयोग वह करते उसमें उनका आत्म गहरे तक निमज्जित रहता था।

Saturday, July 16, 2022

स्वतंत्रता संग्राम आ मैथिलीक संत साहित्य

 


तारानंद वियोगी

भारतीय स्वतंत्रता संग्रामक आदिस्रोत 1857क महाविद्रोह थिक। हम सब अवगत छी जे भारतक अनेको राजा-रजवाड़ा एहि संग्राम मे अंग्रेज (कंपनी) सरकारक विरुद्ध विद्रोह कयने छला। दिल्लीक बादशाह बहादुर शाह जफर तं एकर नायके रहथि। रानी लक्ष्मीबाइक कथा सब गोटे जनैत छी। इहो बात सब गोटे जनैत छी जे मिथिलाक महाराजा एहि विद्रोह मे अंग्रेजक पक्ष मे ठाढ़ छला। पक्षे टा मे नहि, विद्रोह कें दबेबाक लेल जे कंपनी सरकार कें मदति चाहियैक छल, हाथी-घोड़ा-सैनिक-हथियार-नगदी सब किछु सं अंग्रेजक सहायता कयने छला। मने भारतक एहि पहिल स्वतंत्रता-संग्राम मे मिथिला शामिल नहि छल। मुदा, की ई बात कहब सही हेतै? किन्नहु नहि। राजा आ प्रजा मे अंतर होइ छै, एहि ठाम तं शोषक आ शोषितक अंतर सेहो छल। साधारण प्रजाक लेल शोषकक एक रंग जं 'गोरा' छल तं दोसर रंग 'काला', जकरा आम भाषा मे अंग्रेज सब 'यू बस्टर्ड ब्लैक इंडियन' कहैक। मुदा, मिथिलाक महाराजोक तं यैह रंग छलनि।
             तिरहुत के इलाका मे जे एहि महाविद्रोहक असर रहलैक तकर दस्तावेजी विवरण आब 358 पृष्ठ मे प्रकाशित छैक। (गदर इन तिरहुत: ए डाक्यूमेन्टेशन, लेखक अशोक अंशुमान/श्रीकान्त, 2009) प्रसिद्ध मैथिल इतिहासकार डा. विजय कुमार ठाकुर अपन लेख 'तिरहुत मे 1857क आन्दोलन एवं तकर वर्गीय आधार: एक विश्लेषण' मे लिखैत छथि-- 'एहि विद्रोही व्यक्ति सब (जाहि मे सं अधिकांश कें फांसी वा कालापानीक सजाइ भेटलैक) मे सब सं धनवान जे व्यक्ति छला तिनका लग 150 टाका 4 आना मूल्यक संपत्ति छलैक। एहि सं ई स्पष्ट भ' जाइत छैक जे ई सब विद्रोही लोकनि समाजक कमजोर आर्थिक वर्गक सदस्य छलाह। एहि संदर्भ मे ई ध्यान रखबाक योग्य तथ्य अछि जे एहि क्षेत्रक सामन्त एवं राजा लोकनि ब्रिटिश शासनक तरबा चटैत रहलाह एवं 1857क स्वतंत्रता संग्राम कें दबेबा मे ब्रिटिश सरकार कें पूर्ण मददि देलथिन। एहि सं स्पष्ट भ' जाइत अछि जे एहि आन्दोलनक जड़ि समाजक निम्न आर्थिक वर्ग सं जुड़ल छलैक, नहि कि राजा-महाराजा एवं सामन्त सं। 1857क भारतीय स्वतंत्रताक प्रथम संग्रामक ध्वनि तिरहुत मे सेहो सुनल गेल जकर आधार छल कमजोर वर्ग एवं एकर दुश्मन छल तत्कालीन ब्रिटिशक पिछलगुआ सामन्त एवं महाराज लोकनि।' (मैथिली अकादमी पत्रिका, जनवरी-दिसंबर 2007)
             हमरा लोकनि कें ई नहि बिसरबाक चाही जे जकरा हम सब मैथिली साहित्य कहैत छिएक, तकर स्पष्टत: दूटा धारा अछि। एक तं ओ जकरा पंडित, इतिहासकार आ आलोचक लोकनि मैथिली साहित्य मध्य स्थान देलखिन, जकरा इतिहासबद्ध कयल गेल। दोसर इतिहास-वंचित धारा, जे मिथिलाक जन बीच तं पूरे पल्लवित-पुष्पित होइत रहल मुदा विद्वान लोकनिक आंखि ओहि दिस सं सदा मुनायल रहलनि। नव युगक जे अंखिगर मैथिली अध्येता लोकनि छथि तिनका लोकनिक अस्सल पुरुषार्थ एही इतिहास-वंचित जनसाहित्य कें उद्घाटित करब थिक।
             एकटा दृष्टान्त रखला सं बात बेसी फड़िच्छ होयत। ऐतिहासिक स्रोत सं हम सब अवगत छी जे जखन ब्रिटिश सरकार विद्रोह कें दबेबा मे सफल भ' गेल, तं विद्रोही सभक ऊपर जे बदला लेबाक कार्रवाइ शुरू भेल ताहि मे फिरंगी सेनाक द्वारा बीस लाख भारतीय प्रजाक हत्या कयल गेल छल। फिरंगी सेना द्वारा बदला लेबाक ई कार्रवाइ कोना कयल जाइत छल? चिह्नित गाम वा चिह्नित समूह पर अचानक सिपाही सभक धावा होइक आ जे पकड़ल जाय तकरा मारि दैक वा जिंदा पकड़ा गेल तं गामक कोनो उंचगर गाछ ताकि क' खुलेआम फांसी लगा दैक जाहि सं अंग्रेजक अकबाल जुग-जुग धरि बरकरार रहय, प्रजा भय मानय। जं हम कही जे मैथिली मे किछु कविता एहनो उपलब्ध छै जाहि मे एहि कार्रवाइक आंखिक देखल वर्णन कयल गेलैए तं अहां आश्चर्य सं भरि सकै छी।
             लक्ष्मीनाथ गोसांइ परसरमा गामक निवासी रहथि। हुनके गाम लग एक गाम अछि बैरो। ओहि गामक निवासी रहथि रंगलाल दास। दुनू समकालीन रहथि। दुनू वैष्णव संत रहथि। अंतर यैह रहल जे गोसांइ जी ब्राह्मण रहथि जखन कि दास जी यादव। तें मैथिली साहित्यक इतिहास मे लक्ष्मीनाथ गोसांइक बारे मे तं हम सब खूब पढ़ै छी मुदा बेसी लोक एहने हेता जे रंगलाल दासक नाम पहिले बेर सुनैत हेथिन। जखन कि एहि दुनू गोटेक बीच नीक संपर्क रहनि जकर साक्ष्य दुनू गोटेक रचनावली मे भेटैत अछि। 1857क विद्रोह ई दुनू गोटे देखने तं रहबे करथि, अपना-अपना तरहें एहि मे अपन योगदान सेहो देने रहथि। गोसांइ जीक प्रसंग आगू कहब, पहिने रंगलाल दास।
             एहन प्रतीत होइत अछि जे ब्रिटिश सिपाही सभक बदलाक टारगेट संत लोकनिक समूह बनैत छल। किएक बनैत छल होयत? जाहिर बात अछि जे ओ सब सरकारक किछु बिगाड़ने हेता। की बिगाड़ने हेथिन? संतक शक्ये कतेक? मुदा नहि। ओहि समय मे मिथिलाक जते संत लोकनि छला, सभक अपन-अपन भजनमंडली होइत छलनि। गोसांइ जीक अपन मंडली छलनि आ रंगलाल दासक सेहो। सरकारक खुफिया सूत्र ई कहैत छल जे जतय-जतय ई लोकनि भ्रमण करथि, ब्रिटिशक विरुद्ध विद्रोह लेल जनसमूह कें भड़कबैत छला। सब गोटे अवगत छी जे गोसांइ जीक एक शिष्य क्रिश्चियन जौन स्वयं ब्रिटिश छला। एहन कोनो कनेक्शन रंगलाल कें नहि छलनि। रंगलाल दासक भजनमंडली पर जे ब्रिटिश सिपाही सभक हमला भेल छल, ताहि बारे मे ओ एक मार्मिक गीत लिखने छथि। प्राय: ओ हुनकर अंतिमे रचना होयत। ओहि गीत मे पांती अबैत छैक--'हाय रे अल्ला, किदन भेला मीयां कहां दन गेला/ मनु सुतिहार पच्छिम गेला, फोचाइ गेला उत्तर को/ तबला सारंगी ढनमन भेला, ठीठर पड़ला अनमन मे/ जे जे आए फिरि फिरि जावे, जग मे रहिहें कोइ नांही/ सब शिष्य मिलि एकमत होइहें, रंगलाल सुमरहु मन मांही।' (रंगमाला भजनावली/ संपादक जगदीश यादव, 1972) रंगलाल दासक जीवनावधि 1802-1858 बताओल जाइत अछि। एहन प्रतीत होइत अछि जे अंग्रेज सिपाही सभक हमला मे स्वयं रंगलाल आ हुनकर शिष्य ठीठर पकड़ल गेला, आ शहीद भेला। गुमनाम शहीद। बीस लाख मे सं क्यो एक।
             एहि पांती सं एक बात इहो स्पष्ट होइत अछि जे वैष्णव संप्रदायक हिन्दू भक्त रंगलाल दासक एक प्रमुख शिष्य मुसलमान रहथिन। आइ ई बात विचित्र लागि सकैत अछि, मुदा स्मरण रखबाक चाही जे इतिहासबद्ध संतकवि लक्ष्मीनाथ गोसांइक चारि प्रमुख शिष्य सब मे सं एक मोहम्मद गौस खां सेहो मुसलमाने छला। ई प्रसंग अनेक किताब सब मे लिखल भेटत। सत्य यैह छल। समाज एहिना संग-संग मिलि क' जिबैत छल। मुसलमानक अवतारी पुरुष मीरा साहेब, बालापीर आदिक मैथिली गाथा अछि आ हिनका सभक पूजा हिन्दुओक घर मे होइत अछि, आइयो। भारतीय स्वतंत्रता-संग्रामक जे सब सं पैघ आदर्श छल से यैह हिन्दू-मुस्लिम एकता छल। 1858 सं ल' क' 1947 धरि अंग्रेज शासक कोना एहि एकता कें तोड़बाक प्रयास करैत रहल आ अंतत: सफल भेल, तकर कथा आधुनिक भारतक इतिहास सब मे भरल पड़ल अछि।
             आर्य समाजक संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वतीक सम्बन्ध मे ई बात जगजाहिर अछि जे गदर के समय मे ओ लगातार तीन वर्ष धरि भूमिगत रहि क' अवधक इलाका मे किसान सभक बीच विद्रोहक बीज वपन करैत रहला। आगू जं ओ बचल रहला तं तकर कारण हुनकर मौन आ कार्य-परिवर्तन छलनि। ठीक यैह बात हमरा लोकनि लक्ष्मीनाथ गोसांइक संग देखैत छी। ऐतिहासिक दृष्टि अपना क' वास्तविक जीवनी जकरा कहल जाय से तं मिथिला मे लिखले नहि गेल। समुच्चा जीवन-प्रसंग कें मिथक, किंबदन्ती, दन्तकथा आ चमत्कारकथा सं भरि देल गेल। आब तं ओ समय तते दूर आ तिमिराच्छन्न भ' गेल अछि अछि जे वास्तविक तथ्य धरि पहुंचब असंभव भ' गेल अछि। लक्ष्मीनाथक रचना सब कें देखी तं ई बात स्वत: स्पष्ट छैक जे ब्रिटिश शासन-व्यवस्थाक ओ आलोचक रहथि। अपन एक पद मे ओ अंग्रेज शासक लेल 'पामर' शब्दक प्रयोग केलनि अछि-- 'पामर राज करत एहि पुर पर।' तहिना, अंग्रेजक पिछलगुआ जमींदार सभक विरुद्ध हुनकर अनेको पद मे निंदात्मक कथन कयल गेल अछि।
             'लक्ष्मीनाथ गीतावली'क संपादक पं. छेदी झा द्विजवर अपन भूमिका मे गोसांइ जीक चमत्कारकथा सभक भरपूर वर्णन करितो ई बात लिखबा सं अपना कें नहि रोकि सकला जे गोसांइ जी कें जहलक सजाइ भेल छलनि। यद्यपि कि ओ एहि घटना कें नेपाल मे घटित भेल बतबैत छथि, मुदा इहो बात संग-संग लिखैत छथि जे भारत मे ओहि समय मे महाविद्रोह मचल छल। गोसांइ जीक जेल जायब आ जेल सं छूटब आइ महा चमत्कारिक कथा जकां सुनाओल जाइत अछि। मुदा, एहि बातक अनुमान करब कठिन नहि जे ओ विद्रोहे भड़कबैत पकड़ल गेल छल हेता आ अपन अंग्रेज शिष्य जौन साहेबक प्रयास सं जमानत पर छूटल हेता।
             1857क स्मृति कोना मिथिलाक जन-समाज मे विविध रूप लय जीवित रहल तकर एक प्रसंग राम प्रकाश शर्मा अपन पुस्तक 'मिथिला का इतिहास' मे लिखने छथि। लिखलनि अछि जे समस्तीपुर जिलाक बालक लोकनि कबड्डी खेलैत काल एखनो एहि पदक प्रयोग करैत छथि। एक दल अंग्रेज बनैत अछि। ओ दल पद पढ़ैत अछि-- 'अमर सिंह के कमर टूटलनि, कुंवर सिंह कें बांहि/ पुछियनु ग' दलभंजन सिंह सं आब लड़ता कि नांहि।' बालक सभक दोसर दल राष्ट्रभक्त विद्रोही बनैत अछि। ओ उतारा दैत अछि-- 'हाथी बेचब, घोड़ा बेचब, सिपाही कें खुआयब/ लड़ब नै तं करब की, नाम की हंसायब?' तहिना, इतिहासकार डा. रत्नेश्वर मिश्र अपन पुस्तक मे पूर्णियां जिला मे प्रचलित एक कबड्डी-फकड़ाक चर्च कयने छथि। ओहि मे अबैत छैक-- 'चल कबड्डी आरा/ सुलतानगंज को मारा।' रत्नेश्वर बाबू एहि फकड़ाक सम्बन्ध विद्रोही लोकनिक द्वारा सुलतानगंज(भागलपुर) मे अंग्रेज सैनिक पर विजय प्राप्त करबाक संग जोड़ैत बाबू कुंवर सिंहक सहायता लेल आरा दिस प्रस्थान करबाक आह्वान संग जोड़लनि अछि। एहि सं हम सब बूझि सकै छी जे एहि ठामक प्रजाक स्टैन्ड राजा-महाराजाक स्टैन्ड सं कोना भिन्न छल।
             चन्दा झा कें मैथिलीक आधुनिक साहित्यक प्रवर्तक कहल जाइत छनि। स्वतंत्रता संग्रामक संदर्भ लैत जं देखी तं चन्दा झा अपना युगक असगर कवि छला जे एहू विषय पर लिखबाक साहस केलनि। हुनकर प्रसिद्ध पद सब गोटे जनैत छी जे
             न्यायक भवन कचहरी नाम
             सब अन्याय भरल तेहि ठाम
             सत्य वचन बिरले जन भाख
             सब मन धनक हरण अभिलाख
                     ई अंग्रेजक न्यायव्यवस्थाक यथातथ्य वर्णन अछि, जखन कि संभ्रान्त लोकक नजरि मे अंग्रेज एक न्यायप्रिय जाति होइ छल। ओ लिखलनि- 'गैया जगतक मैया हे भोला, कटय कसैया हाथ/ हाकिम भेल निरदैया हे भोला, कतय लगायब माथ?' ई हाकिम लोकनि अंग्रेज सरकारक अमला छला, जे भ्रष्टाचार मे आ बदला लेबाक कार्रवाइ मे आकंठ मग्न छला। मुदा इहो मोन रखबाक चाही जे हुनकर एहन कविता सब हुनकर पोथा मे बन्न रहल आ हुनका जिबैत जी प्रकाशित नहि भेल छल। अपन हिन्दी कविता मे तं ओ एहू सं आगू धरि बढ़ला, मुदा ओहो सब आइयो धरि अप्रकाशित अछि। हुनकर सीमा छलनि जे ओ दरभंगाराजक चाकर छला आ दरभंगाराज अंग्रेज सरकारक। मैथिलीक मुख्यधाराक काव्यपरिदृश्य मे हमरा लोकनि सब सं आगू धरि छेदी झा द्विजवर कें जाइत देखैत छियनि जे 1923 मे 'कोइली दूती' प्रकाशित करौने छला।  तकर दंडस्वरूप अंग्रेज सरकार जे हुनकर दशा केलकनि से एक भिन्न प्रसंग थिक, मुदा सब सहैतो सब सं आगू धरि बढ़ला वैह। 'कोइली दूती' मे हरिपुर इलाका, जतय अंग्रेज कोठीपति सभक बास छल, के वर्णन करैत द्विजवर लिखै छथि--
             उजर उजर बक बसइछ बड़ बद
             लगहि दछिन खलपति हे कोइलिया।
             तकरा सड़क पर धरब चरण नहि
             नहि तं होयत दुरगति हे कोइलिया।।
                        बीच मे मोन पाड़ि दी, ई 1923 ईस्वीक लिखल पांती छी जखन खास-खास स्थलक लेल कानून रहैक जे इंडियन्स एंड डाग्स आर नाट एलाउड। एम्हर खून खौलैत छनि एहि युवा कविक--
             कियो तिय करथि प्रसव नहि वीरपुत्र
             ओहि देश ओहि पुर प्रान्त हे कोइलिया।
             जनिका सं ओहि खलपतिक हृदयमद
             होइन्ह सकलविधि शान्त हे कोइलिया।।
                       द्विजवर कें हम सब सं आगू बढ़ल कवि एहि लेल कहैत छियनि जे अंग्रेजक बारे मे जे रेखा चंदा झा घीचि देलनि-- विचारो बाबू, राजा है अंगरेज/ चलो ऐन ओ न्याय-धरम से, करो मिजाज न तेज/ कितना अन्यायी को दीन्हों कालापानी भेज/ रक्षा-दक्षा पुलिस खड़ी है, सदा रखो परहेज।' -- यैह मानू मिथिलाक संभ्रान्त कवि-समाजक सीमारेखा भ' गेल। मैथिल महासभाक नीति-निर्देशक सिद्धान्त सब मे पहिले नंबर पर छल-- राजभक्ति। एहि राजभक्ति कें बनौने रखैत तत्कालीन मैथिल कवि लोकनि भरि-भरि मोन अपन देशक महानताक गीत गबैत रहला। देश, जकर दूटा अर्थ छल-- पहिल तं मिथिला, दोसर किछु गोटे लेल भारत।
                       आब एक बेर फेर हमरा लोकनि मैथिलीक संतसाहित्य दिस उनटि क' ताकी। किछु गनल-चुनल महात्मा कें भने मैथिली साहित्यक इतिहास मे शामिल क' लेल गेल हो, मुदा कुल्लम राय यैह बनैत अछि जे कर्मकांडी रंग मे रंगल मैथिली लग वैष्णवभक्तिक लेल कोनो स्थापित निकष नहि छलैक। एकर कारण सब पर चर्चा करी तं विषयान्तर होयत। ताहि सं नीक जे संतसाहित्य मे जे स्वतंत्रताक छटपटाहटि व्यक्त भेलैक अछि, तकर किछु आर रंग सब देखाबी। 1857क महाविद्रोहक समय एक आर संतकवि मैथिली मे लिखि रहल छला। मधुरा गामक निवासी रामसिनेही दासक जीवनकाल 1819-1906 छनि। हुनकर अनेको रचना मे अंग्रेजी दासताक प्रति वैह उत्कट घृणा, वैह प्रबल विद्रोह देखाब दैत अछि जकर एक रूप हम सब द्विजवर जीक आरंभिक रचना मे पबैत छी।
                       रामसिनेही दासक एहि गीत कें देखल जाय जाहि मे ने केवल ब्रिटिश राजक अनीति-अत्याचारक वर्णन भेल अछि अपितु दरभंगा महराज पर सेहो शानदार कटाक्ष कयल गेल अछि--
        सीतापति रामचंद्र कोसल रघुराई।।
        विप्र वेद धेनु संत दुखित सकल जीव जंत
        मैथिल नृप ज्ञानवंत विपति-घटा छाई।।
        ब्रिटिश राज करत पाप जनगण बीच बढ्यो दाप
        आबि आब हरहु ताप सत्वर सुखदाई।।
        सबल सुअन भयो मंद देश को दय फटक फंद
        मुंह कान करयो बंद गोरा कटकाई।।
        कहत रामसिनेही दास मारहु खल श्रीनिवास
        हरहु त्रास एक आस चरण केर सांई।।
                     ध्यान राखल जाय जे यैह ओ समय छल जखन मिथिला मे आ मैथिली साहित्य मे रामभक्तिक प्रचलन आरंभ भेल छल। मोहन भारद्वाज अपन एक लेख मे ओहि परिस्थिति सभक व्यापक अध्ययन प्रस्तुत कयने छथि। जमींदार लोकनि तं अपन शोषणमूलक सत्ता कें अनामति रखबाक लेल ठाकुरवाड़ीक स्थापना कयने रहथि, मुदा संत लोकनि रामभक्ति कें अपन सर्वस्व किएक बनाओल? अंग्रेजक अन्यायी शासन अभेद्य आ अच्छेद्य छल। के एकर अंत करितथि? संत लोकनिक तं अपन सीमा होइत छनि। हुनका सब सं स्फुरणा आ प्रेरणा ग्रहण क' सोच तं बदलत समाजक, क्रान्ति तं करता युवा लोकनि, मुदा अपने ओ तं सबटा निवेदन भगवान रामे सं करथिन। अहां देखि सकैत छी जे मैथिली साहित्यक ऐतिहासिक विकास कें रेखांकित करबाक लेल ई कविता कतेक बेसी महत्वपूर्ण अछि। मुदा, बहुत खेद होयत ई देखि क' जे एकर चर्चा कतहु नहि, कोनो संकलन मे ई शामिल नहि, एतय धरि जे स्वतंत्रते पर एकाग्र कवितासंग्रह 'स्वातंत्र्य-स्वर' (संपादक चंद्रनाथ मिश्र अमर) मे सेहो नहि।
                     अपन एक दोसर कविता मे रामसिनेही कहैत छथि--
         राम कहैत रहू, राम कहैत रहू, राम कहैत रहू भाई
         गोरा म्लेच्छ विधर्मी बढ़लै, चहुंदिस खल समुदाई।
         एहि कलिकाल और किछु साधन चलतै नै चतुराई
         निशिवासर सीतावर सुमिरहु रावणारि रघुराई।।
                      राम कें जे एतय रावणारि कहल गेल छनि, हम  ध्यान दियाब' चाहब जे रामक यैह रूप मैथिली मे रामभक्ति-साहित्यक प्रादुर्भाव के प्रस्थानविंदु थिक। गीतक अंतिम पांती मे तं ओ साफ कहै छथि-- 'से शासन बिनसाबथि श्रीपति अपनहि आबि सहाई।'
                      एक एहन तिमिराच्छन्न समाज मे, जतय राजा स्वयं अन्यायी-अत्याचारीक वशवर्ती बनल हो, आ संभ्रान्त समाज अंग्रेजक यशगान करैत अपन मिथिला देश कें महान घोषित करबा मे अपस्यांत हो, मिथिलाक संत लोकनिक द्वारा अंग्रेजी शासनक कटु निन्दा करब, आ ओकर विनाश लेल आह्वान करब एक पैघ बात थिक। ई विषय जें कि साहित्येतिहास मे उपेक्षित रहल अछि, तें नव-नव दृष्टिक अध्येता लोकनि कें एहि दिस प्रवृत्त हेबाक चाहियनि।

Tuesday, July 12, 2022

ओ तीनू कथा (मुक्ति, फुलपरासवाली आ रंगीन परदाक संग-संग अध्ययन)

 


तारानंद वियोगी


मैथिली कथा-साहित्य मे आधुनिकताक आलोड़न-विलोड़न मे एहि तीनू कथाक युगान्तरकारी प्रभाव अछि-- ललितक कथा 'मुक्ति', राजकमल चौधरीक कथा 'फुलपरासवाली' आ लिली रेक कथा 'रंगीन परदा'। मुक्ति आ फुलपरासवाली वैदेही मे 1955 मे छपल, जखन कि ठीक अगिला साल ओही पत्रिका मे लिली रेक 'रंगीन परदा' प्रकाशित भेल। 'मुक्ति' जं सेर बनि क' आयल छल तं 'रंगीन परदा' सेर पर सवा सेर साबित भेल। सबतरि हाहाकार मचि गेल छल। मैथिली कथा मे स्त्री तं शुरुहे सं आबि रहल छली, व्यक्तित्ववान स्त्रीक सेहो आगमन भ' चुकल छल। मुदा आधुनिक स्त्री-विमर्शक जाहि नैरेटिव ल' क' लिली रे आयल छली ओ अभूतपूर्व रहय। एहि संभाव्य हाहाकारक पक्का अंदेशा स्वयं लिली रे कें सेहो छलनि आ तें एकर प्रकाशन ओ कल्पना शरणक छद्मनाम सं करौने रहथि। कथा एते प्रभावशाली रहय जे ओहि युगक सभक सब सिद्ध-प्रसिद्ध प्रयोगवादी लेखक लोकनि एहि अज्ञात नामधारी लेखिका कें पत्र लिखि संवर्द्धना केलखिन। ई सब पत्र आब प्रकाशित अछि।

              ललितक कथा मुक्ति मूलत: स्त्रीक यौन-आकांक्षा(Libido)क कथा थिक। सब माने मे नीक व्यक्तित्व, उत्तम कुलशील, सम्यक संस्कार वाली स्त्री शेफाली एहि कथाक नायिका थिकी। पूर्णयौवना, मुदा जनमरोगी पति हुनकर यौनाकांक्षा कें पूरा करबा मे असमर्थ। तथापि पति-पत्नीक बीच स्नेह, सद्भाव आ विश्वास उत्तम। मुदा, अवसर भेटला पर शेफाली एकटा बदनाम आ असंस्कृत रसिक, जे कि मामूली दरबान थिक, ओकरा संग पड़ा जाइत अछि। भागबाक काल ओ जे अपन पति कें पत्र लिखैत अछि, से ई-- 'स्वामी, एखन तं सरिपहुं छोड़ि क' जा रहल छी... मुदा जं कहियो लौटक आकुलता हएत तं प्राय: अहां कें अपना लेल फूजल पाएब।-शेफाली।'

              एकटा बात एतय साफ क' दी जे 'मुक्ति' स्त्रीविमर्शक कथा नहि थिक, जेना कि बहुतो गोटे मानैत रहलाह अछि। कोनो रचना कें स्त्रीविमर्शक रचना हेबाक लेल न्यूनतम शर्त थिक जे ओ स्त्री-दृष्टिक पक्षकार हो। एहि कथा मे तं एकर साफ उनटा अछि। ई पुरुष-दृष्टि सं लिखल गेल, स्त्री-पुरुष-सम्बन्धक परिप्रेक्ष्य मे पुरुष कें उदार आ वफादार आ स्त्री कें स्वार्थी आ बेवफा साबित करैत कथा थिक। कथावाचक जे छथि से स्वयं एक लोलुप पुरुष थिका जिनका मनोलोक कें बेर-बेर यैह बात मथैत रहैत छैक जे शेफाली कें जं परपुरुषे चाहिऐक छलै तं ओ एते लो प्रोफाइलक ओहि चौबे दरबान कें किएक चुनलक, हाइ प्रोफाइल बला एहि कथावाचक महोदय कें ने किएक अवसर देलक। ई तं केवल स्त्री जनैत अछि जे जे चीज ओकरा चाहिऐक से कोन पुरुष लग भेटि सकैत अछि। जं ई कथा स्त्री-दृष्टि सं लिखल जाइत तं एहि प्रश्नक उत्तर एहि मे जरूर भेटैत, एहि तरहें महाप्रश्न बनि क' ई बात सौंसे कथा बीच घुरियाइत नहि रहैत जे आखिर वैह 'असभ्य' चौबे किएक शेफाली कें पसंद छलनि?

              असल मे एहि कथाक महत्व दोसर कारण सं अछि। हम सब अवगत छी जे फ्रायड आ मार्क्स, एहि दुनू दार्शनिक महापुरुषक सिद्धान्तक मैथिली साहित्य मे आगमन छठम दशक मे भेल। एहिठाम प्रसंगवश इहो कहि दी जे बीसम शताब्दीक विश्व कें आमूलचूल बदलि देनिहार चारि महापुरुष-- मार्क्स, फ्रायड, गांधी आ आइंस्टीन-- मे सं फ्रायड एक महत्वपूर्ण व्यक्ति छला जिनका आधुनिक मनोविज्ञानक जनक कहल जाइत छनि। हुनके एक सिद्धान्त छनि--लिबिडो अर्थात यौनेच्छा। फ्रायड देखौलनि अछि जे यौनेच्छा एक अनिवार्य जैविक आवश्यकता थिक जे ओना तं सामाजिक सांस्कृतिक आर्थिक आदि स्थिति पर अवश्य निर्भर करैत अछि मुदा ई स्वयं मे तते बलशाली ऊर्जा होइछ जे सभ्यता-संस्कृति आदिक डंटा सं एकर निवारण कदापि संभव नहि भ' सकैत अछि। फ्रायड यद्यपि अपन व्याख्या मे एकरो संभावना देखौलनि जे ई यौनेच्छा दमित (suppressed) सेहो भ' सकैत अछि आ उदात्तीकृत (sublimated) सेहो। मुदा, से भिन्न वस्तु होइछ आ एहि कथाक प्रसंग मे तकर कोनो सोह नहि छैक। लिबिडो कोन तरहें काज करैत अछि आ सबटा संस्कृति-सभ्यता कें पल भरि मे मटियामेट कोना क' दैत अछि, 'मुक्ति' मे तकर खिस्सा आयल अछि। मिथिलाक संस्कृति मे 'नीच' पुरुष संग यौन-सम्बन्ध बनौनिहारि अथवा ओकरा संग उढ़रि जाइ वाली स्त्री शेफाली कोनो पहिल स्त्री नहि छलीह। एहि ठाम तं एकटा उक्तिकविता (फकड़ा) प्रसिद्ध रहल अछि, जकर महत्वपूर्वक उल्लेख काञ्चीनाथ झा किरण कयने छथि जे 'बाबूक धियापुता बाधबोन बौआय/ बौआसिनक धियापुता मचिया बैसि अगराय।' मैथिल संस्कृतिक थाह नहि रखनिहार लोक कें ई कविता सुनि क' नहि समझ मे अयतनि जे बाबू आ बौआसिन जखन पति-पत्नी थिका तं दुनूक संतान तं एक्के भेलै, तखन ओकर भवितव्य अलग-अलग किए बताओल गेल छै! यैह लिबिडोक कमाल थिक। बाबू जं अपन यौनतृप्ति खवासिन सं पबैत छथि तं बौआसिन सेहो सुविधापूर्वक अपना काजक योग्य खवास ताकि लैत अछि। एहना मे तं स्वाभाविक जे बाबूक धियापुता कें खवासिन जन्म देत आ ओकर भवितव्य खवासक स्थिति सं प्रभावित रहतैक, तहिना खवासक संतान कें बौआसिन जन्म देती आ ओ मचिया बैसल अगरायत। गौर करी, 'मुक्ति' कथा मे सेहो एक प्रमुख पात्र कुंजी खवास छथि, मुदा ओ बूढ़ छथि, बीसो बाबू कें कोरा कांख खेलेने छथि, एतय धरि जे बीसो बाबू कें हुनके टा डर होइत छनि, हुनकर कहल ओ नहि टारि सकै छथि। एहि सब कारण सं लिबिडोक परिदृश्य सं ओ बाहर छथि।

              एहिठाम डाकक एक वचन मोन पड़ैत अछि-- 'उढ़री बहु ले जे नर रोबय/ धोकड़ी मारि भूमि पर सोबय/ बाट चलैत ताकय नहि घूरि/ कहय डाक ई तीनू बूड़ि।' जानि नहि, कै शताब्दी सं ई कविता मिथिला मे प्रचलित छै। उढ़री बहु लेल नहि कनबाक चाही। कथानायक बीसो बाबू नहि कनैत छथि। बरु प्रसन्न होइ छथि जे अस्पताल मे भरती भ' क' इलाज करेबाक बंधन सं आब मुक्त भेला। मुदा, ओ जे शेफाली विदा कालक पत्र मे अंतिम वाक्य लिखने छली, 'जं कहियो लौटक आकुलता भेल तं अहां कें प्राय: अपना लेल फूजल पायब', आश्चर्यजनक छै जे ओ अपन पति कें बिलकुल ठीक चिन्हने छली। स्त्री अधिकतर पुरुष कें ठीके चिन्हैत अछि, पुरुषे बीच बाट मे अपन पंथ बदलि लैत अछि, तकर साक्ष्य विद्यापतिक स्त्री-विषयक गीत सब मे भरल अछि। बीसो बाबू इलाज छोड़ि देता आ कुपथ्य करता तं छव मासक बाद जीवित बचल रहता की नहि, कहब मुश्किल। मुदा, ओ कथावाचक कें, विदा होइत काल कहै छथिन-- 'आलूक दम्म जं खेबाक हो हुनका(शेफालीक) हाथें, तं छव मासक पश्चात दरसन दी। गाम हमर स्टेशनक भिड़ले अछि।' माने एहू मरदे कें बूझल छै जे ओहन बुद्धिशालिनी कें चौबे छव मास सं बेसी छेकि क' नहि राखि सकत। बरु इहो बात निस्तुकी छै जे शेफाली जं घुरि क' अयती तं ई बीसो बाबू राजा राम जकां ओकरा सीता-वनवास नहि देथिन, नैका बनिजारा जकां सप्रेम अपनेथिन। बीसो बाबूक व्यक्तित्व औदार्य आ औदात्य सं भरल अछि। जानि नहि किए, स्त्रीक लिबिडो कें जगजगार करबाक हेतु ललित कें पुरुषक व्यक्तित्व कें एते ऊंच उठायब जरूरी लगलनि! संभव जे सर्वथा नव आ विद्रोही विचार कें हाहाकार मचा दैबला तरीका सं व्यक्त करबाक लेल हुनका ई चीज जरूरी लागल होइन। जेना उजरा बैकग्राउन्ड पर करिया रंग बेस फबैत छैक।

              मुदा, यैह चीज राजकमल चौधरी कें नापसंद भेलनि। राजकमल घोर प्रतिक्रिया मे आबि गेला आ एकर प्रतिकार करैत ओ जे कथा लिखलनि, सैह 'फुलपरासवाली' छल। 'फुलपरासवाली' मे बात आयल छैक जे नहि, पुरुष महान नहि भ' सकैत अछि, खास क' क' स्त्री-पुरुष-सम्बन्धक मामला मे तं किन्नहु नहि। कहबाक लेल भने पुरुष पंडित-पुत्र हो, जेना कि एहि कथाक नायक अछियो, मुदा थोड़बे अवसर आ सुविधा भेने ओ पतित, अति पतित भ' जाइत अछि, जेना कि एहि कथा मे भेल अछि। एहि कथा मे राजकमलक कहब छलनि जे महान स्त्री होइत अछि, जेना कि फुलपरासवाली भौजी छली। रिक्शाचालक बिलट भाइ दारूक निशां मे अपन साथी रिक्शावला कें छूरा भोंकि दैछ, पुलिस ओकरा पकड़ि लैत छैक आ सात वर्षक सजाइ मे ओ जेल चलि जाइत अछि। भौजी पटना नगर मे एसगर बचि गेली अछि आ कथावाचकक घर मे रहै छथि। मुदा, बात तं होइ छल लिबिडो के। लिबिडो एहि मे कतय छै? असल मे कथावाचक अपन स्त्री संगे रहै छथि। हुनका स्त्री कें फुलपरासवाली संगें बहुत मेल। मुदा, थोड़ दिन बितैत-बितैत होइत ई छै जे फुलपरासवाली कथावाचकक प्रति आकृष्ट हुअय लगैत अछि। हरदम नजरि मे बनलि रहय, हरदम हिनका मुग्ध कयने रही, ताहि तरहक ओकर चेष्टा रहैत छैक। कथावाचक एहि बात कें गमि जाइत अछि आ एहि मे ओकरा कोनो हरजो नहि बुझना जाइछ जे हुनकर परवरिश ई करथि आ तकरा बदला मे ओ यौनसुख प्रदान करथि। ओ अपन डेग आगू बढ़बैत एक दिन ओकरा गंगाकातक एकान्ती मे ल' जाइत अछि। मने सब तय-तसफिया भइये जाय। ओतय जे होइत छैक, से सबटा आशाक विपरीत। ओ कहैत अछि-- 'अहांक भाइक लेल सात बरख की सात युग हम प्रतीक्षा मे बिता देब।' तखन ओ सब की छल? एकसर राति मे परपुरुषक निकट एबाक कामना? ओ कहैत अछि-- 'ओ सब क्षणिक दुर्बलता छल।' आखिर होइत ई छैक जे भौजी पटना नगर छोड़ि क' देहातक अपन गाम घुरि जेबाक निर्णय करै छथि। कथाक अंत मे राजकमलक निष्कर्ष छनि-- 'जाबत फुलपरासवाली जीबैत छथि, बीसो बाबूक स्त्री शेफालीक जन्म नहि भ' सकैत अछि। जं शेफाली कें जन्मेबाक हो तं मिथिलाक गाम-गाम मे प्रतीक्षाक नोर खसबैत असंख्य फुलपरासवालीक हत्या कर' पड़त।'

              राजकमलक एहि कथा मे तर्कसंगतिक स्पष्ट अभाव देखना जायत। ओ एहि ठाम पवित्र मैथिल संस्कृतिक संरक्षक बनल तहिना देखाइ दैत छथि जेना अपन लोकप्रिय कथा 'ललका पाग' मे। असल मे, ई बात हम 'जीवन क्या जिया' मे लिखनहु छी जे राजकमलक पक्ष-निर्धारणक ओ अनस्थिरताक दौर छल आ तें जे राजकमल अन्तत: अपन स्त्री-दृष्टिक लेल विख्यात छथि, ई दुनू कथा(फुलपरासवाली आ ललकापाग) तकर प्रतिकूल अछि। कहल जाय जे हुनकर संपूर्ण लेखनक बीच ई दुनू कथा हुनकर 'विचलन' थिक। एना किएक भेल, तकर कारण छल जे ठीक ओही समय मे ओ मैथिली मे कथा लिखब शुरू कयने छला। सब भाषाक साहित्य-लेखनक अपन-अपन आभामंडल होइ छै जाहि सं बाहर ओकर लेखक नहि जा पबैत अछि, वा जं तकर विस्तार कइयो सकय तं से परिपक्व भेलाक बादे होइत छैक। नवागन्तुक कथाकार कें ई कथा लिखैत एहि मलाल सं भरल देखल जा सकैत अछि जे ई सब अनर्गल चीज जं होइतो हो तं से मिथिलाक बाहरे भ' सकैत अछि।

              कथाकारक मनोलोक कें बुझबाक चेष्टा करी तं लिबिडो के जं ओ विरोध करै छथि तं आखिर समर्थन कथीक करै छथि? लिबिडो तं, फ्रायडक अनुसार, तते प्रबल ऊर्जा छैक जे ओकर विरोध करबाक कोनो अर्थे नहि बनैत अछि। सुरुहे मे कहने रही जे फ्रायड दूटा स्थिति बतौने रहथि--सप्रेशन आ सब्लिमेशन, जाहि मे लिबिडो परिवर्तित भ' सकैत अछि। सब्लिमेशन तं तते ऊंच बात भेलै जे तकर कल्पनो एतय अनर्गल होयत। तखन तं सप्रेशन, काम-ऊर्जाक दमन। स्त्री कें भूत लगतैक, ओकरा पर देवी सवार हेतै, ओ हिस्टीरियाग्रस्त होयत, बताहि होयत, ओ आत्महत्या करत। जं से नहि तं बेर-बेर बलात्कारक शिकार बनैत रहत। मिथिलाक संस्कृति पवित्र अछि। एतय ई सब चलि सकैत अछि, मुदा मुक्ति मे जेना ललित देखौलनि, से नहि भ' सकैत अछि। राजकमल तं साफ लिखलनि अछि जे मुक्ति पढ़ि क' ओ तते आवेग मे आबि गेला जे वैदेहीक अंक(जाहि मे मुक्ति छपल छल) हुनका हाथ सं छूटि नीचां सिमटी पर खसि पड़ल। ई आम मैथिल संभ्रान्त संस्कृतिक आग्रह छल जकर राजकमल प्रतिनिधित्व क' रहल छला।

              लिली रेक कथा 'रंगीन परदा' एहि दुनू कथा सं सर्वथा भिन्न अछि। ई मैथिली कथाक इतिहास मे, स्त्री-विमर्श पर सुस्पष्ट रूप सं लिखल पहिल कथा छल। स्त्रीक दृष्टि ओकर अपन दृष्टि होइत छैक जे सदति पुरुष-दृष्टिक पिछलगुए बनि क' चलय तकर गारंटी नहि रहैत छैक। ओकर अपन व्यक्तित्व होइछ आ से कतेको बेर पितृसत्ता सं टकराइत छैक। स्त्रीक देह ओकर अप्पन संपति छिऐक, ओहि पर पुरुषक दावेदारी सदा सं संभ्रान्त संस्कृति मानैत आयल अछि। स्त्री चाहय तं एहि दावेदारी कें चकनाचूर क' सकैत अछि। स्त्रीक संसार जे होइत छैक से पुरुषक संसार सं भिन्न होइत छैक। हमर एक कविता मे ई पंक्ति अबैत छैक-- 'स्त्रीक एक दुनिया ओकरा भीतर/ एक दुनिया ओकरा बाहर/ भीतर किसिम-किसिम के फूल फुलबाड़ी/ बाहर एक-एक डेग संकट सं भारी।' ई स्त्रीक कंडीशनिंग पर निर्भर करैत छैक जे एहि दुनू दुनियाक बीच संतुलन बना क' ओ कोना चलैत अछि। 'रंगीन परदा' मे एहि सब कथू कें हमरा लोकनि ठाम-ठाम रूपायित भेल देखि सकै छी।

              'रंगीन परदा' मे स्त्री-अनुभूतिक जे प्रामाणिकता छैक से आन कथा सं एकरा अलग करैत अछि। निपट किशोरावस्था मे जे पुरुष मालती कें संसार मे सर्वश्रेष्ठ लागल रहैक से मोहनजी छला। प्रेम ककरा कहैत छैक, तकर मालती कें किछु नहि पता, मुदा मोहनजीक सामने आबितहि सुधि-बुधि हेरा जाइन, जखन कि हुनकर विवाह आन वर संग तय भ' गेल छलनि। मोहनजी बेचारे कें सेहो ई कन्या तहिना मन मोहने। पहिल बेर जे चुंबन लेने छलनि, तकर वर्णन देखल जाय-- 'मालती कठपुतरी जकां ओही दिस देख' लगलीह। पूर्ण प्रस्फुटित कमलक फूल। हृदय-पराग उभरि आयल छलैक--भरल मधु सं लबालब। ओकर प्रत्येक पुष्पक पत्र-दल जेना कोनो सैनिक, रक्ताभ श्वेत वस्त्र मे मधु कें भ्रमर सं बचेबा लेल प्रस्तुत रहैक। चतुर भ्रमर उपरहि सं ओहि मे पैसि गेल।... वैह देखू भ्रमर! जनैत छी, भ्रमर कमल पर किएक आयल अछि?... मालती मूक भेल नकारात्मक भाव सं मूड़ी झुलौलनि।... किएक तं कमल सुन्दर छैक--अहीं जकां।... ई कहैत-कहैत मोहनजी मालतीक अधर पर अपन अधर राखि देलनि। मालतीक सौंसे देह झनझना उठलनि। जड़ता नष्ट भ' गेलनि आ ई नवीन चेतना सं हुनक सर्वांग कांपि उठल। ओ एक झटका मे मोहनजी सं अपन हाथ छोड़ा हवेली दिस भगलीह।'

              मनोभावक सूक्ष्मतापूर्वक अवलोकन आ तकरा तरह-तरहें व्यक्त करबाक कला तं एतय स्पष्टे अछि। संगहि मोहनजीक प्रगल्भता आ मालतीक पवित्रकुमारि-जन्य यौन-अबोधता सेहो स्पष्ट अछि। ओहि दिन जखन मोहनजी कहने रहनि जे अहां हमरा सं बियाह क' लिअ' आ एतहि रहि जाउ, तं एहि बातक की जवाब भ' सकैए, कोनो जवाब भैयो सकैत अछि कि नहि, मालतीक समझ मे किछु नहि आयल छलनि। 

              मोहनजी सामंत घरक राजकुमार थिका आ मालती एक गरीब भलमानुसक बेटी, जकर कौलिक सम्बन्ध तं जरूर एहि राजपरिवार मे छैक, मुदा सुंदरता आ उठैत यौवन छोड़ि क' मालती लग आरो किछुओ नहि छैक जे बराबरीक बात सोचल जा सकय। मिथिलाक सामंत लोकनि केहन होइ छला, से एहि कथा मे सगरो देखि सकै छी। ओ भ्रमर होइ छथि जिनका नव-नव कमल-पुष्प बराबर चाहियनि। मोहनजी कें भला कोन कमी कमल-पुष्पक? मुदा, एहि कन्या मे किछु एहन वस्तु छैक जे जनम अवधि ओ एकर आकर्षण सं मुक्त नहि भ' पबैत छथि।

              बरसो बरस बादक बात थिक जे मालती विवाह तं कहिया ने भेलनि, आब हुनकर बेटी बारह बरखक भ' गेलि अछि आ पति ओकर विवाह लेल चिंतित रहय लगला अछि। एम्हर मोहनजीक पत्नी मरि जाइत छनि। एखन हुनकर उमेर तीस बरख छनि। सौन्दर्यक नव-नव आमद होइत रहय तकरा लेल पत्नी सभक मरैत रहब सेहो सामंत-परिवार लेल एकटा जरूरी चीज होइत रहैक। आब होइत ई छैक जे पत्नीक मृत्युक छबे मासक भीतर मोहनजीक नव विवाहक चर्चा अछि आ मालतीक पति पूरा जप-तप सं जोर लगौने छथि जे हुनकर बेटी मोहिनी संग मोहनजीक विवाह भ' जाइन। एहना स्थिति मे मालती की करै छथि। हुनका आंखिक आगू जेना पूरा भविष्य नाचि जाइत छनि।

              ओ अपन असम्मति व्यक्त करै छथि-- 'हमरा बुझैत मोहिनी ओइ वर लेल बड़ बच्चा छथिन।' मुदा नहि। पति लग हुनकर एक नहि चललनि। लिली रे कहैत छथि जे अपन सम्पूर्ण वैवाहिक जीवन मे ई प्रथमे अवसर छल जखन मालती अपन पतिक मत कें काटबाक प्रयास कयने रहथि। स्त्री-मनक इहो एक यथार्थ थिक जे बिसरल अध्याय कें ओ बिसरले रहय देबाक प्रयास करैत अछि। मोहनजीक स्थिति ओम्हर ई अछि जे केवल आ केवल मालती लेल, मालतीक संग यौन-सुखक लेल ओ ई विवाह करब गछैत छथि।

              एखने हम कहने रही जे स्त्रीक दूटा दुनिया होइत छैक। जखन पतिक आगू मालतीक एक नहि चललनि, मालतीक दुनिया बदल' लगैत छनि। लिली रेक कथा-भाषा देखी-- '...फुलबाड़ीक सुखायल दूबि मे जेना फेर सं प्राण आबि गेल हो। पोखरिक जल मे नहुं-नहुं कंपन होब' लगलैक। पादप झूमि उठल जेना अपन अंग मे भास्करक भय सं नुकायल लता कें झकझोरैत कहैत हो-- उठ, आब फेर समर्थ हो, फेर फुलाह आ फेर परिमल बिखारह। मेघ आबि गेलैक अछि। मेघक संकेत पबितहिं पिंजड़ा मे बंद मयूर नाचि उठल। पानि मे हंस कलरव करय लागल। हवा अपन ऊष्णता त्यागि शीतल भ' गेल। आकाशमंडल पर मंद-मंद मेघ छापि रहल छलैक आ ओकर स्वागतक हेतु समस्त वन पुलक भरि झूमि रहल छल।' 

             एतय लिली रेक लाजवाब प्रतीकात्मक भाषा छनि। सब सं कमाल अछि ई देखब जे वैध यौन-सम्बन्ध आ अवैध यौन-सम्बन्धक एतय कोनो ओझरी नहि छैक। ओझरी की, चिंतना तक नहि छैक जे कोनो सम्बन्ध कदाचित अवैधो भ' सकैत अछि! जी हं, स्त्रीक दुनियाक यथार्थ यैह छिऐक। स्त्री एही तरहें सोचैत अछि। 'अवैध सम्बन्ध' नामक अवधारणा पितृसत्ताक अवदान थिक।

             एहि कथा मे हत्या होइत अछि। सेहो कोनो आनक नहि, स्वयं मालतीक पति के। कथाक आरंभे एहि घटना सं भेलैक अछि। मुदा, गौर करी तं पायब जे हत्या असल मे मोहनजीक हेबाक छलनि। महाकान्त(मालतीक पति) तेना क' हुनकर नरेठी चांपि देने रहनि जे आंखि तं उनटिये गेल रहनि, किछु सेकंड मे आब प्राणान्ते टा होयब बांकी छल। मुदा, ठीक ओही काल मे ओहिठाम मालती पहुंचली आ ई भीषण दृश्य देखि क' ओ कुहरि उठली--आह। महाकान्तक ध्यान मालती दिस चलि गेलनि, हाथक पकड़ ढील भेलनि, आ एतबे मे मोहनजी हुनकर नरेठी धेलनि आ प्राणान्त। कहल जा सकैत अछि जे पितृसत्ताक न्यायानुसार ई अधिकार महाकान्त कें छलनि, मुदा मालतीक कुहरब पितृसत्ताक स्पष्ट खिलाफ अछि, आ तते प्रभावी जे परिणाम कें उनटा देबा धरि मे समर्थ अछि। ई स्त्री-मनक न्याय-प्रक्रिया, निर्णय-प्रक्रिया थिक, जकर धार आगू हमरा लोकनि स्वयं मोहनोजीक ऊपर चलैत देखैत छी।

             पुरुष, स्त्रीक मन मोहबाक, लगातार मोहने रखबाक अनेक कला जनैत अछि। इहो पितृसत्तेक देन थिक। मुदा स्त्री जे कोनो पुरुषक प्रति अनुरक्त होइ अछि, आ अनुरक्त बनल रहैत अछि, एहि मे प्रधान भूमिका पुरुषक मोहन-कलाक नहि होइछ। प्रधान भूमिका स्वयं स्त्रीक निर्णय-प्रक्रियाक रहैत अछि। वैध-अवैधक सीमा के पार, कोन पुरुषक संग स्त्री कें यौन-सम्बन्ध बना क' रखबाक छैक, ई निर्णय स्त्रीक हाथ मे रहैत अछि। तें अहां देखबै, एहि कथाक अंत मे जखन मालतीक आंखि परहक रंगीन परदा हटैत अछि, ओ मोहनजी कें कोन तरहें नकारि दैत छथि। ने हुनका आब पाइ चाही ने  रुतबा, मिथ्या पुरुषत्वक आश्रय सेहो नहि। ओ ओहि आदमीक भीतरक लंपट कें चीन्हि गेली अछि। चिन्हबा मे देरी भेलनि, मुदा चीन्हि लेलाक बाद निर्णय लेबा मे नहि। मोहिनी मालतीक सब सं जेठे टा नहि, सब सं प्रिय संतान सेहो रहनि। मोहनजी सन खेलाड़ लोकक पत्नीक मरैत रहब जरूरी तें मोहिनी सेहो एक दिन मरि गेली। मरबा काल अपन माय मालती लेल ओकर अंतिम अस्फुट शब्द रहैक--पतित। एहि शब्द सं मालती कांपि उठली मुदा मोहनजी लेल धनि सन। आब ओ अगिला विवाह करता, मुदा मालती कें नहि छोड़थिन, छेकि क' रखने रहता। 

             असली समस्या एतहि छैक। पुरुष अपने नहि ठमकय चाहैत अछि मुदा उमेद करैत अछि जे स्त्री ओकरा लेल ठमकल रहती। ऊपर जे हम कविता-पंक्ति उद्धृत कयने रही, ओहि कविता मे आगू ई पांती अबैत छैक-- 'हौ बाबू जोगीलाल, तोरा जकां एक दुनियां नै हेतै ओकर/ जे ओकरा ले' ठमकि क' चलत, से हेतै ओकर।' मोहनजी मालतीक नहि भ' सकैत छथि। ओ कोन्नहु स्त्रीक नहि भ' सकैत छथि। प्रेमक महान ऊर्जा सं बसल ई पृथ्वी प्रेमक अभव मे आइ नरक भेल अछि। एहि मे पुरुषजातिक प्रधान भूमिका छैक, ई कथा से कहैत अछि। 

             मोहनजीक पसारल रंगीन परदाक फांस सं जखन मालती बहरेली, अपन चारू-पांचो संतान सभक प्रति एहि पछिला तमाम वर्षक भीतर जे हुनकर बदलल मनोवृत्ति रहलनि, तकरा बारे मे लिली रे लिखैत छथि-- 'मालती कें भान भेलनि जे जहिया सं मोहिनीक विवाह भेल छलनि, तहिये सं ओ कहियो एहि प्रकारें बिल्टू कें दुलार नहि कयने होथि। यद्यपि हुनकर व्यवहार मे कहियो कोनो परिवर्तन नहि आयल छलनि, तथापि भीतर मे जेना ओ सब सं दूर भ' गेल होथि। अपन सब सं प्रिय संतान मोहिनी सं तं सब सं अधिक। ओ बिल्टू कें आओर सटा लेलथिन, हृदय मे जेना किछु बरकि रहल छलनि आ से आंखिक मार्गें बाहर भेल जाइत छलनि। बरकैत-बरकैत जेना सब किछु बाहर भ' गेलनि। कनैत-कनैत आंखि बहरा गेलनि। मुदा हृदय मे एक प्रकारक हल्लुकपना व्याप्त भ' गेलनि जेना बहुत दिनक जमा कादो बहरा गेल होइन।' 

             एक हिसाबें देखी तं तथ्य आ सामर्थ्य मे भिन्न-भिन्न होइतो एहि तीनू कथा मे समानता छैक जे तीनू स्त्रीक आंखि पर टांगल रंगीन परदाक कथा थिक। एकटाक परदा तुरन्ते हटि जाइत छैक। दोसरक छव मास मे हटैत छैक। तेसर कें अनेक वर्ष लागि जाइछ आ अनेक घटनावलीक झंझावात सं गुजरय पड़ैत छैक। मुदा असल बात ई थिक जे परदा हटलाक बाद तीनू स्त्री पहुंचैत कतय अछि? पितृसत्तेक शरणागत होइछ कि ओकर दुनियो किछु बदलैत छैक? आत्मदीप्त स्त्रीक आगमन हमसब जतय होइत देखैत छी से कथा लिली रेक छनि।

             'रंगीन परदा' वैदेहीक कथाविशेषांक 1956 मे छपल छल। एहि कथा कें मैथिली मे लिखि सकबाक साहस आ प्रेरणा लिली रे कें 'पारो' सं भेटल हेतनि, से तं स्पष्ट होइत अछि मुदा स्वयं संभ्रान्त परिवारक हेबाक कारण वा एहि कारणें जे एकर कथानक ओ निकट सम्बन्धी लोकनिक जीवन-प्रसंग सं लेने हेती, एकरा ओ छद्मनाम सं प्रकाशित करौलनि। आगू लिली रेक कथा-कलाक बहुत विकास भेलनि, तकर साक्ष्य हुनकर रचनावली थिक। मुदा दू कारण सं हुनकर एहि आरंभिके कथाक अत्यधिक महत्व, आधुनिक कथा-साहित्यक इतिहास मे अछि। एक तं हुनकर वातावरण-निर्माण, जे लघु गातक परंपरित मैथिली कथा लेल एक नव बात छल। दोसर, यथार्थवादी कथा-भाषा, जकर विकासक श्रेय तं आम तौर पर ललित कें देल जाइत रहलनि अछि, मुदा एकर आरंभ कर' वाली लेखिका लिली रे छली।

Monday, May 16, 2022

इन्टरव्यू:: विद्यापति कें सही-सही देखि सकय, ताहि आंखिक एखनो प्रतीक्षे अछि


 तारानंद वियोगीक संग किसलय कृष्णक संवाद


● साहित्य लेखन मे अहाँक आगमन कहिया आ कोना भेल ?


ता न वि-- अपन गामक संस्कृत स्कूल मे प्राय: पूर्व मध्यमाक विद्यार्थी रहल होयब, जखन काव्यलेखन दिस हमर प्रवृत्ति भेल। सरड़ा गामक पं. इन्दुनाथ ठाकुर हमर गुरु रहथि जे मैथिली लेखन लेल हमरा प्रेरित केलनि। हाइ स्कूलेक विद्यार्थी छलहुं जखन मिथिला मिहिर मे हमर कविता, लेख आ कथा पहिल बेर छपल।

           लेखनक दुनिया मे हमर प्रवेश किताबक दुनिया सं, किताब पढ़ैत भेल। ओही उमेर मे हम हजारो किताब पढ़ि गेल रही। हम कतहु लिखनहु छी जे राजकमल जीक पित्ती मांगनि चौधरी-सन अजूबा पढ़ाकू बुजुर्ग संग हमर दोस्ताना छल। हजार पेजक किताब पढ़बा मे हुनका मुश्किल सं तीन घंटा लागनि। हुनके दुआरे राजकमलक पुश्तैनी सरस्वती पुस्तकालय मे हमर प्रवेश भेल छल। एहन पढ़ाकू सब आरो हमरा गाम मे कैक गोटे रहथि। ओइ दिन मे ट्यूशन सं जे हम कमाबी लगभग सबटा पाइ किताब किनबा मे उड़ा दिऐक। तें हिनका लोकनि संग हमर सम्बन्ध बराबरी पर छल। ओ नव किताब हमरा पढ़य देथि तं हमहूं नव-नव किताब हुनका सब कें देबाक स्थिति मे रहै छलहुं।

           एहू समय सं पहिनेक बात छी जे हम सब बमपार्टी नाम सं एक कीर्तन-मंडली तारास्थान मे कायम केने रही। अनेक गीतकारक गीत सब गाबियनि। ताही बीच हमरा एक दिन पता लागल जे हमरे गौआं थिका कपिल जी, मने कपिलेश्वर मिश्र, जिनकर लिखल गीत हम सब गाबै छी। ओ हमरा सं तीन-चारि साल सीनियर छला। हुनका सं भेंट करय गेलहुं तं बहुत आश्चर्य लागल छल आ भेल जे जं ई लिखि सकै छथि तं हमहू लिखि सकै छी। ओहि समयक बहुतो रास हमर गीत एहन अछि जकर साहित्य मे कोनो हिसाब नै छै मुदा हमरा इलाका मे एकरा एखनो अहां गाओल जाइत सुनि सकै छी।


● मैथिली साहित्य मे कोन लेखक/कविक रचना सँ प्रभावित भेलहुँ अहाँ ?


ता न वि-- मैथिली पढ़बा दिस हमर प्रवृत्ति कने बाद मे जा क' भेल। मधुप जीक झांकार, योगा बाबूक नाटक मुनिक मतिभ्रम, श्यामसुंदर झाक उपन्यास दाम्पत्य-सौरभ, रमानाथ बाबूक उदयनकथा, बलदेव मिश्रक रामायणशिक्षा-- ई सब किताब हमरा कोर्स मे छल। प्राय: तखने हमरा समझ मे इहो बात आबि गेल छल जे अपना समयक सर्वश्रेष्ठ कृति सब जे होइए तकरा कोर्स सं बाहरे रहबाक रहै छै। तें, मोन पड़ैए--यात्री जीक कविता जखन हम पहिल बेर पढ़ने रही, पन्द्रह-सोलह के रहल होयब तहिया, एकटा अननुभूत काव्य-संसार मानू हमर प्रतीक्षा मे छल, जकर द्वार एहि घटनाक संगहि हमरा लेल अनावृत्त भ' गेल छल। एहन किछु कविता सीताराम झा लग मे सेहो भेटल छल, द्विजवर जीक कोइलीदूती मे सेहो। मुदा, राजकमल कें जखन पढ़लियनि तकरा बाद तं हम वैह नै रहि गेल रही जे पहिने, मने तरुणावस्था मे रही।


● एकदिसि बिहार सरकारक व्यस्ततम सेवा आ दोसर दिसि साहित्य सृजन ! समयक संतुलन कोना बनबैत छी ?


ता न वि-- हम अपना जीवन मे जे किछु प्राप्त क' सकलहुं किसलय, शपथपूर्वक कहै छी जे ई सब साहित्यक बदौलत छल। मोन पड़ैए, बीपीएससी मे चयनक बाद जखन एक पत्रकार हमरा पुछने रहथि जे एकर श्रेय ककरा दै छियै आ हम कहने रहियै जे कविता कें, तं बेचारे कें लागल रहनि जे कविता नामक कोनो महिला हेती। जखन कि ई असल मे एके साधै सब सधे के उदाहरण मात्र छल।हम अपन जीवन साहित्य कें देलियै, बांकी जीवनक सब जरूरति साहित्य पूरा केलक। साहित्य छोड़ि क' आन कोनो महत्वाकांक्षा कहियो नै रहल, तें समयक संतुलन बनेबाक समस्ये कहियो पैदा नै भेल। काजक बेर मे काज आ बांकी समय मे लिखापढ़ी, एहि क्रम मे कहियो गंभीर व्यवधान आएल हो, से कहियो नै भेल। हं तखन, अइ मे सब सं पैघ योगदान जं ककरो कहबै तं से हमर परिवार छल। अहां कें आश्चर्य लागत, आन-आन लोकक गार्जियन जतय अइ बातक लेल अक्सरहां दुखी होइ छथि, हमर कविता-लेखन सं हमर पिता अपना कें गौरवान्वित महसूस करथि। मिहिरक कोनो अंक मे हमर किछु छपय तं तकरा बरसो बरस बाद धरि पिताक सिरमा तर मे ओ अंक सब राखल देखल जा सकै छल। पिताक बाद यैह स्थान हमर पत्नी ल' लेलनि।


● मैथिली साहित्य मे बेर बेर ब्राह्मण - गैर ब्राह्मणक प्रश्न उठैत अछि । आरोप इहो लगैत अछि, जे एकटा क्षेत्र विशेषक सवर्ण साहित्यकार लोकनि मैथिली केँ हथिया कय रखने अछि । अहाँक अनुभव एहि सन्दर्भ मे की कहैत अछि ?


ता न वि-- हमर जे अनुभव अछि से अहांक बातक समर्थन करैत अछि। कथनी आ करनी मे फरक कें सब सभ्यता मे खराब बात मानल गेल अछि। मुदा, अपना ओतय बुझू जे यैह चीज संस्कारवान हेबाक प्रमाण होइत छैक। मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, ई बात ब्राह्मणे लोकनि स्थापित केने रहथि। मने मैथिल महासभा मे मैथिली कें ग्रसि क'। गोप महासभा जखन दावा केलकै जे भाइ, मैथिली तं हमरो सभक भाषा छी, ताहि मोताबिक तं हमरो सब कें महासभाक सदस्यता भेटबाक चाही। अपना सभक इतिहास कते गंदा अछि, तकर की चर्चा करी! मानक मैथिलीक फंदा ऊपर सं लादल अछि। आइ अहां मठोमाठ लोकनिक मुंहें सुनब, मैथिली तं सबहक भाषा छियै। मुदा, ई मात्र हुनकर कथनी छी। करनी जखन देखबै तखन असलियत पता लागत। अंगिका-बज्जिका आन्दोलन असल मे की छी? एही हथियेबाक विरुद्ध स्वाभिमानक संघर्ष छी। एहन घटनाक्रम आगू अहां और देखबै जं हथियेबाक ई हुंठ षड्यंत्र बंद नै भेल। एकरा बंद हेबाक कोनो लक्षण अइ दुआरे हमरा नै देखाइए जे आइ जते जे क्यो मैथिलीक ठिकेदार सब छथि, किनको मे ने तं भाषा आ भूमिक प्रति कोनो भविष्यदृष्टि छनि, ने मैथिल संस्कृति के वास्तविक समझ। अपन कथनी मे जे सब सं पैघ मातृभक्त क' क' बांहि फड़कबैत देखल जेता, करनीक विश्लेषण करब तं संभव जे हुनके सब सं पैघ मातृहन्ताक स्थान पर राखय पड़य।

             


● की अहाँ केँ नहि लगैत अछि जे विद्यापतिक लेखन खाँटी मैथिली लोकभाषा मे भेलन्हि, जे एखनहुँ समाजक एकटा पैघ हिस्सा मे प्रयुक्त होइत अछि , मुदा विद्यापतिक बाद ओ लोकभाषा केँ रचनाकार लोकनि संस्कृतनिष्ठ करैत गेलाह आ एकटा सीमित क्षेत्र आ वर्ग मे प्रयुक्त शैली केँ मानक घोषित करैत शेष मिथिला पर लादि देल गेल ?


ता न वि-- हरेक भाषिक भूगोलक अपन-अपन जातीय कविता होइ छै किसलय। ई चीज खाली लैटिन कि चीनी, तमिल कि बंगले के हेतै, से नहि। ई चीज मिथिला के सेहो हेतै। दुर्भाग्यक बात छी जे आइ धरि ने कोनो इतिहासकार के ध्यान अइ दिस गेलनि ने आलोचक के। फल भेल जे मिथिलाक जातीय कविता रूप सब कें नौजवान कवि सब की बुझितथि जे ओ आन-आन देशीय जेना जापानक जातीय कविता(जेना हाइकू) कें बुझबा मे अपस्यांत रहला। कते बात तं उनटे बुझैत रहला। जेना, छंद मैथिली कविताक जातीय वस्तु नहि थिक विजातीय वस्तु थिक। एकर बदला जातीय वस्तु लय छी। मुदा पंडी जी लोकनि उनटे बतौता। विद्यापतिक कविता लय मे छनि, छंदक हिसाबें देखबनि तं हजार गलती भेटत। मुदा, ताहि सं की?

           विद्यापति पहिल व्यक्तिकवि छला जे मिथिलाक जातीय कविता कें लिखबा योग्य भाषा मे ग्रथित केलनि। स्वाभाविक छल जे हुनकर कविता मे कथनशैली, शब्दावली, अभिव्यक्ति-भंगिमा सब कथू ठेठ मैथिल छल। जातीय साहित्यक स्वभाव होइ छै जे रचना तं कालान्तर मे बचल रहि जाइत अछि मुदा रचनाकार तिरोहित भ' जाइत अछि। सैह विद्यापतियोक संग भेलनि। हुनकर भणिता तं तते सर्वव्यापी भेल जे सैकड़ो कवि हजारो पद भनहि विद्यापति लगा क' लिखलनि। मुदा, विद्यापति स्वयं आदमी सं मिथक मे परिवर्तित भ' गेला। उगना आ गंगा आदिक किंबदन्ती एकर प्रमाण छी। अहां देखबै जे 1860, जकरा इतिहासकार लोकनि आधुनिक युगक आरंभ मानैत छथि, अबैत-अबैत विद्यापतिक व्यक्तित्वक जाबन्तो परिचिति मिथिलाक बुद्धिजीवी लोकनि कें विस्मृत भ' चुकल छलनि। तकर प्रमाण अहां बिहारीलाल फितरत के इतिहास-पुस्तक 'आइना-ए-तिरहुत' (1881) मे पाबि सकै छी जतय हुनका बड़ भारी नैयायिक बताओल गेलनि अछि आ एही ख्याति सं बिसफी गाम दान मे पबैत देखाओल गेल अछि। वास्तविकता ई अछि जे विद्यापति न्याय पढ़लनि वा लिखलनि तकर कतहु कोनो साक्ष्य नै अछि, स्वयं पं. गोविन्द झा सं पूछि लियनु। दोसर दिस अहां देखबै जे रमानाथ बाबू आदिक सब सं बेसी उद्यम अइ बातक लेल भेलनि जे विद्यापतिक व्यक्तित्व ठाढ़ कयल जाय। ई की छल? 'लोक' के संपति कें छीनि क' शास्त्रीयताक कठघरा मे बंद करबाक मानक प्रयास छल।

           स्थिति ई अछि जे जकरा ओ लोकनि 'मानक मैथिली' कहै छथि, स्वयं विद्यापतिये ओइ मे अंटि नै पबै छथि, हुनकर कोनो ने कोनो अंग ओइ सांचा सं बाहर भ' जाइत छनि। किछु विद्वान तं एहनो धृष्टता कइये चुकल छथि जे विद्यापतिक प्रयोग कें अशुद्ध मानि क' ओकर शुद्धीकरण धरि क' चुकलाहे। हम पुछै छी, मानक क्षेत्रक कोन ब्राह्मण पुरुष अपन स्त्री सं अइ भाषा मे गप करै छथि जे 'तोहें जे कहै छह गौरा नाचय, हम कोना नाचब हे'? आ कि पंचग्रामक कोन स्त्री कुदृष्टिक विरोध करैत एना कहि सकै छथि जे 'जञो दिठियौलए, ई मति तोर/ पुनु हेरसि हो खापड़ि मोर'। मोन राखू, चोट भने पनही सं पिटला पर बेसी लगैत हो, मुदा स्त्री-हाथक खापड़ि जं चानि पर पड़ि जाय तं पुरुषसत्ताक मानमर्दन बेसी ठीक ढंग सं होइ छै। खापड़ि कोन स्त्रीक अस्त्र छिऐक, मोन पाड़ि लिय'।

           की कहू, विद्यापति पर तं पचीस हजार पेज सं ऊपरक सामग्री विद्वान लोकनि लिखि चुकला अछि, मुदा विद्यापति कें सही-सही देखि सकय, ताहि आंखि के एखनो प्रतीक्षे अछि। आ एहि बेचारी मैथिलीक तं ई दशा भेल जे जकरा सिद्ध लोकनि, गैरब्राह्मण कलाकार लोकनि संस्कृतक प्रतिरोध मे आविष्कृत केने छला तकर पर्यवसान संस्कृतक पिछलगुआ भ' क' भ' रहल अछि। पंडित कवि लोकनि तं साफ-साफ लिखने छथि-- भाषा-सौन्दर्यक गति न आन। पिछलगुआ बनने बिना मैथिलीक कोनो आन गति नै छै।


● मैथिली साहित्यक वर्तमान परिदृश्य केँ कोन रुपेँ देखैत छी, खासकय सोशल मिडिया माध्यमें धर्रोहि लागि रहल रचना संसार केँ ?


ता न वि-- कहबी छै जे अज्ञानी के हजार अपराध माफ रहैत अछि। जं क्यो मैथिली मे लिखैत छथि तं हुनका लेल सब सं जरूरी अछि जे हुनका लग मिथिलाक अपन एक विस्तृत समझ हेबाक चाही। दोसर जे मैथिली साहित्यक परंपरा, पृष्ठभूमि आ विशिष्ट लेखन सं घनिष्ठता हेबाक चाही। सोशल मीडिया कें अइ अर्थ मे तं हम बहुत उपयोगी मानै छी जे अभिव्यक्ति कें लोकतांत्रिक बनेलक अछि। मुदा, प्रश्न अछि जे अहां लग बात की अछि, ओ बात समाज आ साहित्यक लेल मूल्यवान कते अछि? आइ धरि जे मैथिली लेखक लोकनि लेखन क' चुकल छथि, ताहि मे अहां नवीन की क' रहल छी?

           मुदा दुखक बात ई अछि जे मैथिलीक माहौल एते गंदा बना देल गेलैए जे अइ सब बात कें सोचब आउटडेटेड भ' गेल छै। कचड़े लिखने सं जं किनको यश, सम्मान आ पुरस्कार भेटैत हुअय, तं अहां कहू जे के अभागल हेता जे एते तैयारीक संग साधनापूर्वक मैथिली लिखबा लेल उद्यम करता?


● कथा, कविता, समीक्षा आ इतिहास मे समानांतर अहाँक कलम चलैत रहल अछि । सभ सँ प्रिय विधा कोन थिक ?


ता न वि-- हम अपना कें मूलत: कवि मानै छी। बांकी समस्त लेखन कें अहां हमर कवि-कर्मक विस्तार मानि सकै छी।


● साहित्य अकादमी आ आन छोट पैघ पुरस्कार प्रक्रिया केँ कोन रुप मे देखैत छी ?


ता न वि-- मैथिलीक स्थिति कें देखैत बात करी तं श्रेष्ठ लेखन आ पुरस्कार दुनू बिलकुल अलग-अलग विपरीत ध्रुवक चीज छी, आ अधिकतर एक दोसरक विरोधी दिशा मे चलैत अछि। दस बरस पहिने कहियो एहनो भ' जाइ जे श्रेष्ठ कृति कें सेहो पुरस्कार भेटि गेल करैक। आइ तं सपनो मे अहां एकर कल्पना नै क' सकै छी। एकर कारण थिक दोषपूर्ण चयन-प्रक्रिया जकरा जानि-बूझि क' अपनाओल जाइत अछि। असल मे पुरस्कार जकरा हाथ मे रहै छै से अपने तं सृजनात्मक होइत अछि नहि, तें लेखनक गुणावगुण कें परखबाक कोनो दृष्टियो ओकरा मे नै होइछ। एकर स्थान पर ओ तुच्छ मनोवृत्ति सब सं संचालित होइछ आ पुरस्कार एक व्यवसाय मे बदलि जाइछ जकर जं बहुतो गंहिकी होइ छथि तं उखाड़-पछाड़ के ओकर अपन स्वतंत्र राजनीति होइ छै। 

            अकादमी आ संस्था सभक पुरस्कारक संग जं ई संकट छै तं दोसर दिस व्यक्तिगत प्रयास सं जे पुरस्कार संचालित होइत अछि तकरो स्थिति अहां ठीक नहि कहि सकै छियै। हुनका सब लग श्रेष्ठ लेखन कें खोजि सकबाक ने हुनर रहै छनि ने इच्छाशक्ति, तें अधिकतर अहां देखबै जे एहन पुरस्कार सब मैथिलीक श्रेष्ठ लेखनक विकास मे अपन कोनो योगदान नै रचि पबैत अछि। यात्री जी बड़ बढ़ियां कहथिन जे पुरस्कार की छी? गोबरक चोत छी। गाय कें की पता जे घरबे कोनो कर्मक छथि कि नहि, ओ तं धप सं अपन चोत खसा देत, सैह हाल अइ पुरस्कार सभक अछि। नीक बात ई थिक जे एहि दुष्चक्र कें तोड़बाक कोशिश सेहो भ' रहल छै। लक्ष्मी-हरि उपन्यास सम्मान कें अहां एकर दृष्टान्तक रूप मे देखि सकै छी।


● मैथिली मे पाठकीयताक संकटक की कारण देखैत छी ?


ता न वि-- दशको सं ई सर्वसम्मत बात मानल जाइत अछि जे भारत मे साहित्यक सब सं बेसी पाठक बिहार मे बसै छथि आ बिहार मे मिथिला-क्षेत्र एहि मे सर्वोपरि अछि। मुदा, दुखक बात जे ई मैथिल पाठक लोकनि आन-आन भाषाक साहित्यक हाथें बन्हकी लागल छथि। उन्नत स्तरक जे साहित्यिक पाठक छथि, एक तं हुनका मैथिली पढ़ब ओरियाइत नै छनि, दोसर घटिया लेखनक दबाव मैथिली पर तेहन भारी छै जे एक किताब उनटा गेलाक बाद फेर हुनकर प्रवृत्ति मैथिली पढ़बा दिस हेतनि तकर कोनो संभावना नै बचैत अछि। दोसर दिस, मैथिली मे लेखन केनिहार लोकनि अपने सेहो तते बापुत छथि जे पाठकीयताक दुर्बलता दूर क' सकै छथि। मुदा, जे अपने मैथिलीक लेखक छथिहे से एकर पाठको किए हेता? आ जे स्वयं शिक्षके छथि मैथिलीक, हुनका फेर सं मैथिली पढ़बाक कोन काज? एहनो स्थिति मे मुदा आशाक किरण छथि ओ पाठकवर्ग, जे अपन अस्मिताक खोजवश मैथिली पढ़बा सं जुड़ला अछि। उन्नत बौद्धिक स्तरक यैह पाठकवर्ग भविष्य थिका, मुदा हुनका टारगेट क' लिखैत अहां कें कम्मे मैथिली लेखक भेटता।


● नवागन्तुक रचनाकार सभ लेल की कहय चाहबनि ?


ता न वि-- एकटा खिस्सा सुनबय चाहबनि। गुलशन नंदा कें एक बेर तेख चढ़लनि जे एहन पोपुलर राइटर छथि ओ, लाखो पाठक छनि, दर्जनो फिल्म छनि मुदा साहित्यकार वर्ग मे हुनकर कोनो गिनतिये नहि छनि। हिन्दीक वरिष्ठ लेखक सब सं भेंट क' क' ओ अलख जगेबाक प्रयास मे लगला। दिनकर जी तं हुनका सं गप्पो करब स्वीकार नै केलखिन, डांटि क' भगा देलखिन। मुदा, हजारीप्रसाद द्विवेदी लग गेला तं नीक स्वागत भेलनि। पुछलखिन-- हम एते लिखने छी, मुदा हमरा क्यो साहित्यकार मानिते नहि छथि, जखन कि अहां कें लोक बड़ पैघ लेखक मानै छथि। एना किएक? हजारी बाबू कहलखिन-- असली कारण तं प्राय: हमरो नै बूझल अछि तखन भ' सकैए जे यैह कारण हो जे अहां बेसी लिखने छी जखन कि हम बेसी पढ़ने छी।

               दोसर बात हम कहबनि, जं वास्तव मे साहित्य-क्षेत्र मे किछु पैघ करबाक होइन तं पुरस्कारक बदला मे निन्दा आ विरोध के उम्मीद राखि क' चलथि। हरेक जड़ समाज जाग्रत-जीवन्त लोकक विरोधे करैत आएल अछि। तकर उदाहरण मिथिला समाज मे सेहो कोनो कम नै छैक। काल्हियो, आइयो।

               कोनो लेखक अपन चरम सार्थकता कखन प्राप्त करैत अछि? तखन, जं हुनकर लिखलाहा सं ओइ भाषाक रकबा पैघ हुअय, ओकर सामर्थ्य बढ़य, ओकरा मे नवीन क्षमता उत्पन्न हुअय। स्वाभाविक बात छै जे जखन अहां कें बुझल रहत जे मैथिलीक लेखक लोकनि कोना-कोना मैथिलीक सामर्थ्य बढ़ौलनि अछि, तखने अहां लग ओ बात उद्घाटित होयत जे ओ कोन वस्तु छै जकरा आइयो धरि क्यो नै क' सकला, आ अहां तकरे करबाक लेल कलम उठेने छी। नवागन्तुक लोकनि कें एहि तरहें सोचबाक चाहियनि।


● मैथिली पत्रकारिताक वर्तमान स्वरूप केहेन हेबाक चाही ? दैनिक 'मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश'क प्रकाशन पर किछु कहबैक ?


ता न वि-- लोकल आ ग्लोबल के समाहार बैसबैत कोना सत्यक संग भेल जा सकैत अछि, सैह आइ पत्रकारिताक सब सं पैघ चैलेंज छैक। मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश ठीक दिशा मे अपन यात्रा क' रहल अछि। एक सुझाव जे हम देबय चाहबनि, एहि मारुख समय मे सकारात्मक होयब तं जरूर कठिन छै लेकिन संपादक लोकनि ख्याल राखथु जे कोनो दिनका अखबार अपन सकल प्रभाव मे अपना पाठक कें कहीं आरो बेसी अवसादग्रस्त तं नै करैत अछि!


● सम्प्रति कोन विषय वस्तु पर लेखन चलि रहल अछि ?


ता न वि-- एखन हम अपन पुस्तक 'मैथिली कविताक हजार वर्ष' कें अंतिम रूप देबा मे लागल छी। ई किताब अंतिका प्रकाशन सं दू खंड मे आबि रहल अछि। एकरा संग हम अपन पहिल उपन्यासक तैयारी मे सेहो लागल छी। ई महान शास्त्रीय गायक पंडित मांगनलाल प्रसिद्ध मांगनि खवासक बारे मे अछि जे विद्यापति गीत कें चलन मे अनबाक लेल ओ कतेक भारी संघर्ष केलनि आ कतेक विरोधक हुनका सामना करय पड़लनि। बीसम शताब्दीक लगभग आरंभिक पचास वर्षक मिथिलाक गति-कुगति एहि मे आओत।


● अपन व्यस्ततम समय मे सँ समय देबाक लेल आभार आ आइ जन्मदिनक अवसर पर मैपुप्र परिवार दिस सँ आत्मीय शुभकामना ।


ता न वि-- सादर आभार।