Friday, July 2, 2021

मैथिली आलोचना: स्थिति आ अपेक्षा


 तारानंद वियोगी



मैथिली आलोचनाक आइ की स्थिति अछि आ एकरा सं लोकक की अपेक्षा छै, ताहि पर हम गप करी, एहि सं पहिने कने एक नजरि एहि दिस देखि लेबय चाहब जे एहि आलोचनाक बारे मे आम लोकक समझ केहन छनि। आम लोक माने आम साहित्यक लोक, कारण शुद्ध रूप सं जकरा आम लोक कहल जाय ओकर प्रवेश आलोचना धरि हेबाक प्रश्ने कहां, आम साहित्यिक लोक सेहो आलोचना सं कनछी कटैत, हांजी हांजी करैत कहुना आगूक बाट पकड़ि बढ़ि जाय चाहैत रहैत अछि। आलोचना ककरा चाही? पुरस्कार सब पर जिनकर नजरि छनि तिनका लेल आलोचना बेकार, कारण पुरस्कार कोनो आलोचना पढ़ि क' नहि देल जाइत अछि।  जे स्वान्त:सुखाय लिखै छथि हुनका आलोचना सं काजे की? जे पकिया लेखक छथि हुनको आलोचना सं बहुत मतलब नहि कारण अपन रचनाशीलता कें आलोचना सं दग्ध हेबाक अवकाश ओ नहि छोड़य चाहैत छथि। 

       कतेक लोक दोसरो बात कहै छथि। कहै छथि जे माटि सं जुड़ल भाषा-समाज सब मे आलोचनाक लेल स्पेस कम रहैत छैक। ओतय हृदयधर्मी आपकताक चलन पाओल जाइत छैक, जखन कि आलोचना एक बौद्धिक  उपक्रम थिक। एहि तरहक सोच रखनिहार लोक सब निश्चिते कोनो भाषा मे ओकर आलोचनाक विकास कें ओहि समाजक बौद्धिक विकास सं जोड़ि क देखबाक आग्रही छथि। हमरा मुदा, एहू आग्रह मे कोनो दोष नहि देखाइत अछि। मैथिली माटिक भाषा छी। माटिक भाषा मे लोकक प्रकृत संस्कार सब सं बेसी घनगर रहैत छैक। लोक शिक्षा आ युगीनता बाहर सं सिखैत अछि। साक्षर हेबाक बादो लोक युगीनता कें सिखबा सं इनकार क सकै छथि, सेहो होइ छै।

         अपन स्थिति देखैत छी तं मोन पड़ैत अछि जे मैथिली आलोचनाक संग हमर संबंध कते पुरान अछि। 1982 मे, जखन कि हम एक सद्य:नवागंतुक कवि रही, ओही साल पटना मे नवतुरिया लेखक सम्मेलन आयोजित भेल रहै, आ ओहि मे साहित्यक प्रमुख विधा कविता पर आलोचना-सत्र मे लेख पढ़बाक जिम्मा हमरे पर छल। ओहि प्रसंग छत्रानंद बटुक भाइक ओ बात मोन पड़ैत अछि। पुछने रहथि की करै छी? उत्साह सं उत्तर देने रहियनि, राजकमल कान्वेन्ट स्कूल मे प्रिंसिपल छी। बाजल रहथि, ऐं यौ, तखन तं अहां स्कूलक मास्टर सब एखन धरिये पहिरैत हेता!  मतलब, मैथिली आलोचना मे हमर रुचि अत्यन्त प्राचीन अछि। तें लगभग चालीस वर्षक आलोचना कें निकट सं देखलाक बाद हम आलोचना सं अपेक्षाक बारे मे दू-चारिटा गप कहब आ उम्मीद करब जे एकर जे स्थिति छै से स्वाभाविके रूप सं एहि मे आबि जाएत।

         मैथिली आलोचनाक बारे मे आम राय की अछि? राय अछि जे एकर विकास नहि भ सकल। कि मैथिली मे आलोचना एकदम अवनत दशा मे अछि। जकरा देखू सैह आलोचना पर थुम्हा भरि थूक फेकैत नजर एता जे धुह, ई कोनो जोगरक नहि भ सकल। जे मैथिली आलोचनाक विकास सं सर्वथा अनजान छथि सेहो एहन कहैत भेट जेता जे मैथिली मे आलोचना एखन अपन बाल्यकाल मे अछि। उचिते, एहि तरहक स्थापना देबाक लेल एकमात्र अज्ञानते सं आत्मविश्वास भेट सकैत अछि।

         मुदा प्रश्न अछि जे आम राय एहन किएक अछि? मिथिला-समाज कें अहो रूपं अहो ध्वनि: चाहिऐक, आलोचना नहि चाहिऐक, की बात एतबे अछि आ कि एहि मे मैथिली आलोचनाक अपनो किछु दोख अछि? निश्चिते अपनो दोख अछि। से जं नहि होइत तं कोनो कारण नहि छल जे जाहि भाषा मे रमानाथ झा सन अतंद्र विद्वान आद्य आलोचक भेला, काञ्चीनाथ झा किरण सन तत्वदर्शी विचारक भेला, किसुन जी आ रामानुग्रह झा सन अध्येता समीक्षक, कुलानंद मिश्र आ मोहन भारद्वाज सन पक्षधर विमर्शकार भेला, राजमोहन झा आ जीवकान्त सन दूटूक टिप्पणीकार काज केलनि, अवसर एला पर यात्री जी आ राजकमल चौधरी सन यशस्वी लेखक आलोचनाक पक्ष मे ठाढ़ भेला, कोनो कारण नहि छल जे से आलोचना थूक फेकबा जोग स्थिति मे मानल जाय। तें दोख तं एहि मे आलोचनाक अपनो अछि।

         रमानाथ झाक आलोचनाक एक अध्ययन हम वर्ष 2006 मे प्रकाशित करौने रही। ओहि ठाम हम देखौने रही जे आलोचनाक उच्च मानदंड रचितो रमानाथ बाबू मैथिली आलोचना कें ताहि रूपें प्रतिष्ठापित करबा मे किए असफल रहला, जखन कि हुनके सन स्थिति मे होइतो रामचंद्र शुक्ल हिन्दी आलोचना कें प्रतिष्ठापित करबा मे सफल भेला। असल मे रमानाथ बाबू अतीत गौरवक निस्सन पक्षपाती रहथि आ हुनका लेल प्रयुक्त शब्द 'हंसवृत्ति' अथवा 'नीरक्षीरविवेकी' आदि सनातन जुमलाबाजी सं बेसी महत्वक बात नहि छल। आश्चर्यक बात छल जे टी एस इलियट कें अपन आदर्श मानितो ओ अतीतमुखिये बनल रहला आ युगीन लेखन सं लगभग निरपेक्ष आ असहमत बनल रहला। मैथिली आलोचना कें एकटा स्वरूप द क ओ ठाढ़ तं जरूर केलनि मुदा आलोचना-पुरुषक आंखि ओकर पीठ दिस निरमाओल गेलै, जकर रूपक एखनहु पं गोविन्द झा अपन आत्मकथा मे व्यवहार करै छथि। रमानाथ बाबू आलोचक मे पाओल जाइ बला गुण आ ओकर कार्यप्रणालीक दमदार मार्गदर्शिका बनौलनि आ वैचारिक गद्यलेखन कें शोध आ आलोचनाक रूप मे दू अलग अलग अनुशासन मे विभक्त केलनि। देखय चाही तं हमरा लोकनि देखि सकै छी जे रमानाथ बाबूक आलोचकीय मानदंड तते उच्च छलनि जे हुनक विशाल शिष्यमंडलीक होइतहु हुनका परंपराक क्यो आलोचक नहि भ सकला, जे भेला से विद्वान आ शोधप्रज्ञे भेला। हुनकर सीमा पाठ्यपुस्तक, विश्वविद्यालय आ पुरस्कार-प्रतिष्ठान धरि घेरायल रहल। आइ विश्वविद्यालय सभक मैथिली शोध विभागक की हाल अछि से ककरो सं नुकाएल नहि अछि।

         आधुनिक अर्थ मे जकरा ठीक ठीक आलोचना कहल जाय, तकर शुरुआत मैथिली मे किरण जीक लेखनक संग होइत अछि। मुदा, किरण जीक आक्रोशी आ विद्रोही स्वर अंत अंत धरि हुनका मे बनल रहलनि, एतय धरि जे अपन एक कविता मे, मृत्यु पर्यन्त ई स्वर हुनकर बनल रहनि तकर ओ कामना करैत सेहो देखल गेला। विद्यापति, उमापति, चंदा झा, किरतनिञा नाच, लोकपरंपरा आदि कतेको विषय छल जाहि पर रमानाथ बाबू सं किरण जीक घोर मतभेद छल आ तकरा ओ साफ साफ धारदार भाषा मे लिखबो केलनि। मुदा ओहि जुगजबानाक नायक रमानाथ झा रहथि आ तें किरण जी कें खलनायकक हैसियत भेटलनि आ हुनकर काज कें परिभाषित करबाक लेल एकटा नब शब्द क्वाइन कयल गेल--प्रत्यालोचना। गंहीर नजरि सं देखू तं आश्चर्य लागत जे एते भारी लोक आ सिद्धान्तकार भेलाक बादो मिथिला आ मैथिली कें ल क रमानाथ बाबूक भविष्यदृष्टि किरण जी जकां साफ नहि छलनि। तकर कतेको उदाहरण अछि। मुदा, जाहि तरहें विद्वत्समाज किरण जीक जीताजी हुनकर मूल्यांकन केलनि, ई बात सामने आएल जे 'प्रत्यालोचना' संभ्रान्त समाजक मान्यता आ शास्त्रसम्मत साहित्यदृष्टि के विरोधी चीज थिक। कहब जरूरी नहि जे जकरा ओ लोकनि प्रत्यालोचना कहि रहल छला, वस्तुत: वैह मैथिली आलोचना छल।

         रमानाथ बाबू अपन प्रभावशाली धीर-गंभीर व्यक्तित्व  आ कर्मठ ज्ञानकुशलताक कारण, अनेक प्रभावी शिष्यमंडली सं सुशोभित हिमालयक कठिन शिखर जकां अलंघ्य मानल जाइत रहथि। हुनकर सघन प्रभाव मैथिली साहित्य पर पड़ब अवश्यंभावी छल। मैथिली आलोचना एहि सं दीर्घकालिक रूपें प्रभावित भेल। एहि प्रभाव कें हम आइयो धरि घनगर बनल देखि सकै छी। दूटा दृष्टान्त। मैथिली आलोचनाक मूलस्वभाव अतीतगामी अछि। जे बीति चुकल छै, मैथिली आलोचना कें तकरे चिन्ता करैत देखबै। ओना तं आलोचना विधे अपन स्वभाव मे साहित्यक पश्चगामी होइत अछि, मुदा ओकर पयर अपना जुगक जमीन पर ठाढ़ रहै छै। बुझनिहार बूझि सकै छथि जे अतीतगामी हेबाक बात जे हम कहि रहल छी से एहि सं भिन्न बात थिक। दोसर, मानक भाषाक बहुत आग्रही रमाथ बाबू छला। आलोचनाक अपन विशिष्ट भाषा होइक तकर ओ व्यवस्था देलनि आ एहि व्यवस्था मे आलोचना आबद्ध बनल रहल। हमरा लोकनि आगूक विकास कें देखि चकित भ सकै छी। कुलानंद मिश्र मैथिली आलोचनाक दोसर पैघ सिद्धान्तकार भेला। ओ रमानाथ बाबूक समानान्तर आलोचनाक एक प्रतिरूप ठाढ़ केलनि। ओतय वर्गविभाजित समाज मे साहित्य कें भौतिकताक नजरि सं देखबाक आग्रह छल। समाजार्थिक आधार कोना साहित्य आ साहित्यकार कें उपयोगी आ कालजयी बनबैत छैक, तकरा ओहि ठा देखल जा सकैत छल। आठम-नवम दशक मे कुलानंद जी काज क रहल छला मुदा हुनकर विचारक अवधि आजादी बादक पांचम-छठम दशकक साहित्य छल। मुश्किल तं ई छल जे मानदंड मे रमानाथ बाबूक प्रतिरूप रचितो कुलानंद जीक आलोचना-भाषा रमानाथ बाबूक अनुगामी छल। हुनकर भाषाक जादू सं ओ बाहर नहि निकलि सकलाह। एहि भाषाक जादू कें तोड़ैत हमरा लोकनि मोहन भारद्वाज कें देखै छियनि। कदाचित यैह हुनकर सब सं पैघ देन छनि, यद्यपि कि क्षेत्रीय इतिहास आ स्थानीय समाजशास्त्र कें आधार बना ओ साहित्यालोचनाक एक नव परिपाटी विकसित केलनि। मजा के बात छै जे कि राजमोहन झा आ जीवकान्त अपन आलोचनात्मक लेखन मे अतीतगामिता आ मानक भाषिकता--एहि दुनू अपाय सं कहिया ने बहरा गेल छला। मुदा, हिनका लोकनिक मूल स्वर असहमतिमूलक छल, जकर तात्र्य जे मुख्यधारा ओ कोनो आन पद्धति कें मानि रहल छला, आ एहि तरहें इज्जति उतारितो मानि ओ ओकरे द रहल रहल छला। फलस्वरूप कोनो प्रतिरूप नहि रचि पाबि रहल छला।



              मैथिलीक आम समुदाय मे आलोचक कें नीक नजरि सं नहि देखल जाइछ। प्रकारान्तर सं ईहो वैह बात थिक जे एतय आलोचना कें कोनो जोगरक नहि मानल जाइछ। सामाजिक छविक दृष्टि सं जं विचार करी तं देखब जे कविताक चलन भने सब सं बेसी होउक मुदा कविक छवि कोनो निरस्तुकी पोख्ता छवि नहि अछि। कुलानंद मिश्र सन नास्तिको कवि छथि आ प्रदीप मैथिलीपुत्र सन आस्तिको। कथाकार अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति मे छथि मुदा नितान्त प्रतिगामी सोच रखनिहारो अनेक अयुगीन लोकक प्रवेश कथा-क्षेत्र मे छैक। एहि समस्त लेखक समुदाय मे सं एक आलोचके छथि जिनकर पोखता सामाजिक छवि बनि सकल अछि। परंपरित मैथिल मानदंडक हिसाब सं आलोचक आधुनिक होइत छथि, जिनका साबिक मे अंग्रेजिया कहल जाइन लगभग तेहने। अधिक तं संभावना जे ओ नास्तिक होथि, आ जं से नहियो तं पूजापाठ, धर्मकर्म नुका क, एकान्त मे करैत छथि। धर्मक विचार ओकरा मे नहि पाओल जाइछ। आचार विचार सं अपवित्र, अभक्ष्य खेनिहार, अविहित बरतनिहार। ऊपर सं भारी दोख ई जे राजनीतिक विचार सेहो रखैत अछि। सेहो कोन तं अधिकतर वामपंथी। 'बुद्ध अ इसन अन्हार' रट'बला मैथिल समाज एहि आलोचक समुदाय पर कोना भरोस क सकैत अछि? तें लोक थूक फेकैत छथि आ बजै छथि जे आलोचना कोनो जोगरक नहि भ सकल।

              जं आलोचकक पोख्ता छवि छैक तं अकानबाक विषय थिक जे एकर मने आलोचनाक कोनो तेहन उपलब्धि छैक की नहि? एखन हाल मे हम फेसबुक पर मिथिला स्टुडेन्ट यूनियनक एक विद्यार्थी आदित्य मोहनक एक पोस्ट देखैत रही। कोनो मित्र हुनका हरिमोहन बाबूक पुस्तैनी घर के वीडियो पठौने रहनि। ओहि घरक उजड़ल-उपटल अवस्था देखि क आदित्य बहुत दुखी रहथि आ अपील केने रहथि जे एहि महान साहित्यकारक घर मिथिलाक तीर्थस्थान थिक आ तें आउ, हम सब सामाजिक सहयोग सं एकर पुनर्निर्माण करी। सत्य पूछी तं आदित्यक ई पोस्ट पढ़ि क हमरा मैथिली आलोचनाक ताकत के अनुमान भेल छल। जेठजन कें मोने हेतनि जे एखन हाल तक हरिमोहन बाबू कें 'हास्यरसावतार' कहल जाइत छलनि। हुनका संबंध मे विद्वान लोकनिक राय की रहनि? पहिलुका जुग मे एकवाक्यीय आलोचनाक चलन रहै। जेना उपमा कालिदासस्य,जेना मुरारेस्तृतीयो पन्था:, जेना सूर सूर्य तुलसी शशी। तहिना हरिमोहन बाबू आ यात्री जी पर रहनि-'स्वच्छंद प्रोफेसर टांग-हाथ, दंतावलि पूर्वहि तोड़ि देल। दुर्भाग्य सं संप्रति मैथिलीक 'पारो' कपारो फोड़ि देल।'  प्राचीन परंपराक एहि आलोचकीय स्थापना सं हमरा लोकनि बूझि सकैत छी आजुक युगक दू प्रमुख शलाकापुरुषक बारे मे हुनका लोकनिक राय की रहनि। आइ जे हिनका लोकनिक प्रति समाजक सहमति-भाव छैक, से मैथिली आलोचनाक एक देन थिक। किरण जीक थोड़-बहुत शिकायत कें छोड़ि देल जाय तं हम सब देखब जे मैथिली आलोचनाक समस्त उपक्रम हरिमोहन झा कें समर्थन देबा मे एकमत अछि। किरण जीक जे शिकायत रहनि सेहो हुनकर व्यंग्य पर नहि, हुनकर हास्य पर रहनि आ तकरा द्वारा हुनकर आरोप रहनि जे हरिमोहन बाबू मे करुणाक अभाव रहनि। किरण जीक शिकायत मे सेहो सार रहनि कारण हम सब देखल जे प्रतिपक्षी जखन हुनका रफा-दफा केलकनि तं हास्यरसावतारे कहि क केलकनि। स्वयं राजकमल चौधरीक प्रतिष्ठा सेहो एहने उपक्रमक प्रमाण थिक। आइ जे हमरा लोकनि पढ़ैत छी जे पचासक दशक मे ललित-राजकमल आदिक कथा-युग मैथिली साहित्य मे आधुनिक युगक श्रीगणेश छल, ने कि अंधकार-कालक आरंभ, मोन रखबाक चाही जे एहि मे आलोचनाक केहन भूमिका छैक। दोसर दिस, आलोचना जे नहि क सकल से काज हेबा सं कोना छुटले रहि गेल तकरो दर्जनो उदाहरण हमरा सब लग अछि। जेना महाप्रकाशक कथा-साहित्य। आलोचनाक नजरि एखनहु नहि पड़ल अछि। जहिया पड़त तं पता लागत जे विश्वसाहित्यक दुर्लभ दृष्टान्त कोना मिथिलामिहिरक पन्ना मे हेरायल छै। मैथिलीक  मैनेजर लोकनि जरूरे आलोचनाक एहि ताकत सं वाकिफ छथि तें हमरा लोकनि देखैत छी जे राजकमल चौधरी पर जखन लिखबाक अवसर अबैत छैक तं ओ लोकनि प्राचीन विश्वविद्यालयीय विद्वत्ताक मूर्ति दिनेश झा कें आगू अनैत छथि, जाहि सं नीक जकां राजकमलक श्राद्ध केल जा सकय। आ से ई कोनो दुर्घटना नहि थिक, सुनियोजित कार्यप्रणाली थिक। एहि सं आलोचना पर लगातार थूक फेकैत रहबाक सुविधा बरकरार रहै छै।

              प्राचीन परिपाटीक विद्वान आ आधुनिक आलोचकक दृष्टिकोण मे जे अंतर छै, प्रसंगवश ताहू बारे मे हमरा लोकनि कें किछु गप करबाक चाही। रमानाथ बाबू भने एकाध ठाम अपना कें आलोचक कहि गेल होथि, मुदा ओ मूलत: विद्वाने छला आ सैह कहबाएब हुनका पसंद रहनि। हुनकर जे लेखनशैली अछि सेहो विद्वाने बला अछि। ओहि ठाम लोकतांत्रिक ढंग सं विमर्शक गुंजाइस नहि छैक, एकर बदला ज्ञाता हेबाक ठसक छै आ ताहि कारणें लहजा उपदेशात्मक छै। निरुपाय भेने आधुनिक लोकनि अपन प्रथम आलोचक के रूप मे रमानाथ बाबूक नाम लैत छथि। आ प्राचीन लोकनि कें आधुनिकक सामना करैत जखन निरुपाय भ जाय पड़ैत छैक तं ओ लोकनि रमानाथ बाबू कें बीच मे ठेलि अनैत छथि। पछिला तमाम वर्ष मे यैह खेल चलैत रहल अछि। मुदा, दृष्टिकोण? रमानाथ बाबू पांच सय सं बेसी पृष्ठ मे अपन विद्यापति संबंधी अध्ययन प्रकाशित करौलनि। ओहि मे विद्यापतिक कुलगोत्र-देवता-गुरु-आश्रय दाता आदि समस्त विषयक विशाल अध्ययन छैक। विद्यापति पर किरण जी सेहो लिखलनि आ रमानाथ बाबूक  अध्ययन मे झोल सेहो देखौलनि। हुनक कहब भेलनि जे विद्यापति कें देखबा लेल मैथिल आंखि चाही। मने इहो जे रमानाथ बाबू मे तकर अभाव छनि। ई 'मैथिल आंखि' शब्द आगू आलोचनाक एक विशिष्ट पारिभाषिक शब्द बनि गेल। ई आंखिबला मैथिल निश्चये रमानाथ बाबूक मैथिल सं भिन्न छल। ओतय जूगल कामति, छीतन खबास कें प्रामाणिक मैथिल मानबाक आग्रह छल। रमानाथ बाबू विद्यापति संगीत पर सेहो काज केलनि। ओ समय छल जहिया मिथिला कें नब नब विद्यापति भेटल रहनि आ सौंसे दुनियां पसरबाक गहमागहमी सं मैथिली समाज भरल छल। पचगछिया घरानाक मांगनलाल खबास गायकीक क्षेत्र मे सौंसे देश मे धूम मचेने छला। मांगनलाल विद्यापति कें सेहो गाबथि, आ से बेस प्रशंसित भ रहल छल। ओ पहिल गायक रहथि जे विद्यापति-गीत कें सोलो गेबा जोग धुन मे बन्हने छला, ने तं एहि सं पहिने स्त्रीगण उत्सव आदि मे आ नटुआ नाच मे एकरा जखन गाबथि, कोरस गाबैत छला। मांगनलाल के देखादेखी रामचतुर मल्लिक सेहो गाबय लागल छला। ग्रामोफोन रेकर्ड पहिल पहिल शारदा सिन्हा के बहरेलनि, से मोन रखबाक चाही जे शारदा जी पचगछिया घरानाक शिष्या रहल छथि। अस्तु। एक विशेषज्ञ अध्येताक रूप मे जखन रमानाथ बाबू लग ई प्रश्न उपस्थित भेलनि जे विद्यापति-संगीतक संरक्षण कोना हो, ओ व्यवस्था देलखिन जे विद्यापतिक गीत कखनहु सोलो नहि गाओल जेबाक चाही आ सदति कोरसे गेबाक चाही। वैद्यनाथ धामक पंडा लोकनि किरतन मे जेना विद्यापति गीत गबै छला तकरा ओ आदर्श रूप मानलनि आ तकर संरक्षणक जरूरत बतेलनि। ऊपर हम रमानाथ बाबूक भविष्य-दृष्टिक बात केने रही। तकर हुनका मे कोना अभाव छलनि से एहि ठाम बूझल जा सकैत अछि। सामाजिक प्रोत्साहनक अभाव मे विदापत नाच लुप्त भ गेल आ स्त्रिगणक कोरस निमुन्न मे पतराइत गेल। वैदनाथ धामक गीत ओकर अपनो किरतन सं समयक अनुसार गायब होइत गेल। आइ विद्यापति संगीत जं बचल अछि तं सोलो गायके लोकनिक उद्यम पर बचल अछि। दोसर दिस 'मैथिल आंखि' के अवधारणा समयक संग भकरार होइत गेल अछि आ हरेक युगक मिथिला अपन आदर्श एहि आंखि ल क ताकि लेत, ततबा पर्याप्त अर्थव्यंजना एहि मे भरल छैक। 



          एहि साल मैथिलीक प्रमुख आलोचक लोकनि मे सं एक मोहन भारद्वाज निधन भेलनि, तं तहिया सं मैथिली आलोचनाक प्रति विवेकी जनक हृदय मे बहुत चिन्ता होइत हमरा लोकनि देखि रहल छी। भारद्वाज जी पूर्णकालिक आलोचक रहथि आ मैथिली आलोचनाक इतिहास मे कैकटा नब स्थापना आ नब आलोचना-भाषाक लेल जानल जाइत रहथि। प्राय: दू दशक पहिने ओ 'सांस्कृतिक चेतना'क अवधारणा निरूपित कयने रहथि, जाहि पर सुभाष चंद्र यादव हुनका पर कटु आलोचना लिखने रहथि। समय साबित केलक जे सांस्कृतिक चेतनावादक अवसान दक्षिणपंथी अधिनायकवादे पर जा क होइत अछि आ एहि तरहें सुभाष जीक चिन्ता बेसी सही साबित भेल। मुदा, ई एक सिद्धान्तक बात भेल। अपन दू प्रमुख आलोचना पुस्तक  मे सं दुनू ओ श्रमजीवी मैथिल संस्कृतिक प्रतिष्ठापन मे लिखलनि। हुनकर लेख सब नब समाजार्थिक संदर्भ मे साहित्य कें देखबाक दृष्टि दैत छल। तें चिन्ता स्वाभाविक अछि कारण ओहि तरहक क्यो आलोचक आइ उपलब्ध नहि छथि। मुदा, हियासि क हमरा लोकनि देखी तं पायब जे जेना भारद्वाज जीक अपन खास विशेषता, खास ध्वनि छलनि, तहिना आनो अनेक लोक अपन अपन खास विशेषताक संग मैथिली आलोचना मे सक्रिय रहल छथि। भीमनाथ झा पुरान परंपराक लोक छथि मुदा अपन खास अंदाज मे नब रचनाशीलता कें जाहि तरहें परिभाषित आ मूल्यांकित करबाक काज ओ केलनि अछि सेहो फेर आन ठाम दुर्लभ अछि। हरे कृष्ण झा आलोचनाक क्षेत्र मे लगभग निष्क्रिय छथि मुदा कहियो कदाल जे हुनकर लेख सब अबैत अछि जे तेहन पारंगामी पाठालोचनात्मकता सं लैस रहैत अछि जे तकरो अन्य उदाहरण दुर्लभ अछि। तहिना सुभाष चंद्र यादव। असल मे, आजादी बादक तमाम समय मे जहिया सं मैथिली साहित्य मे आधुनिकताक प्रतिष्ठापन भेलैक अछि, मैथिलीक तमाम विधा मे काज केनिहार काबिल लेखक सब मे आलोचनात्मक विवेक पूरा प्रस्फुटित भेल भेटैत अछि। कहब जरूरी नहि जे जाहि आलोचनात्मक विवेक कें ल क क्यो लेखक दुनियांक यथार्थ मे सं अपन रचनाक लेल वस्तु तकैत अछि, एक नीक आलोचना लिखबाक लेल सेहो ओही आलोचनात्मक विवेक के खगता रहैत छैक। तें हमरा लोकनि देखैत छी जे मूलतः जे कवि छथि जेना सुकान्त सोम, नारायण जी, वा मूलतः जे कथाकार छथि जेना अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, वा जे कवि-कथाकार छथि जेना विभूति आनंद, देवशंकर नवीन, हुनका लोकनिक आलोचना युगीन ऊष्मा सं  भरपूर तं रहिते अछि, आलोचनात्मक विवेक सेहो प्रखर रहैत अछि। जखन कि विश्वविद्यालयक पेशेवर विद्वान सब मे एहि चीजक सिरे सं अभाव भेटत।

          रमानंद झा रमण एहि सब गोटे मे सब सं अलग छथि। ओ एखनुक समय मे एकमात्र पूर्णकालिक सक्रिय आलोचक छथि। हुनकर विषय विस्तार बहुत व्यापक छनि। प्रमुख क्षेत्र मुदा अतीते छियनि। जेना रमानाथ बाबू मध्यकालक अनेक अज्ञात, अचर्चित कवि सभक उद्धार केलनि, रमण जी अनेक आधुनिक अचर्चित अल्पचर्चित रचनाकार सभक कृति आम पाठक धरि सुलभ केलनि। हुनकर काज मे निरंतरता सेहो रहल अछि जे हुनकर अवदान कें पैघ बनबैत अछि। अतीतोन्मुखताक बन्हन कें तोड़ि क ओ युगीन रचनाशीलता कें विश्लेषित करबाक प्रयास सेहो केलनि अछि जकरा हुनकर दर्जनो निबंध मे देखल जा सकैत अछि। मुदा रमण जीक दूटा सीमा छनि जाहि कारणें ओ बन्हन तोड़ि क' बहरा नहि पाओल छथि। एक तं नव रचनाशीलताक प्रति अधिक काल असहमतिक स्वर, दोसर अपन रुचि कें अंतिम प्रमाण मानि लेब। एहि पर विस्तार सं कहियो गप हो तं नीक।

          आइ स्थिति एहन देखाइत अछि जे पूर्णकालिक आलोचकक भरोसें मैथिली आलोचना कें तहिना नहि छोड़ल जा सकैत अछि जेना विश्वविद्यालयीय पेशेवर आलोचनाक भरोसें नहि छोड़ि सकैत छी। हम देखैत छी जे आलोचनाक रैखिक विकास तं खूब भेल अछि, क्षैतिज विकास मे अवश्य कमी अछि। आलोचना मे कोनो एक नवीन अवधारणा एलाक बाद अनेक दृष्टि सं, अनेक आयाम कें ल क ओकर बारंबार व्याख्याक जरूरत रहैत छैक। अक्सरहां असहमति आ विवादक विना कोनो अवधारणा अपन पूर्ण प्रस्फुटन पर नहि पहुंचि सकैत अछि। एहि सब काजक लेल अनेक व्यक्ति चाही। तकर अभाव अवश्य अछि। एक सं एक स्थापना अबैत छैक आ से किताबक, पत्रिकाक पन्ना मे दबल रहि जाइत छैक

           जे लोकनि हल्ला करैत छथि जे आलोचना एखनो नाबालिग अछि से जं हल्ला करबाक बदला ओहि स्थापनाक विरुद्ध एक टिप्पणी लिखि क प्रकाशित करौने  रहितथि आ सैह आनो लोक करतथि तं कहिया ने ई बालिग भ गेल रहैत। वैह बात अछि। हमही सब एकरा अपन अकर्मण्यता सं नाबालिग बनेने छियैक आ हमही सब भोकरै छी जे ई नाबालिग अछि।

           मैथिली आलोचना कोन तरहें अपन स्पष्ट छवि आ शाफ स्वरूप बना चुकल अछि तकर दृष्टान्त लेल हम नवतुरिया लोकनिक लेखन दिस संकेत करब। जाहि नवागंतुक लोकनिक दृष्टि एखन साफ नहि भेलनि अछि आ ने पक्ष मजगूत, ओहो  जखन वैचारिक गद्य लिखै छथि तं आधुनिक आवाज मे, आलोचनाक शैली आ शब्दावली अपनाबैत बजबाक कोशिश करैत छथि। ई अपना आप मे एकटा साक्ष्य थिक जे मैथिली आलोचनाक स्थिति ओते दुर्गत नहि अछि जते भाइ लोकनि प्रचारित करैत छथि।

           एतय हम एकटा सूची राखय चाहै छी जाहि मे आजुक समयक चुनौती कें उठा सकबा मे सक्षम किछु लोकक नाम छैक। पहिल पंचक मे रमानंद झा रमण छथि, जिनकर अतंद्र अन्वेषकता कैक बेर हमरा लोकनि कें रमानथ बाबूक स्मरण करा जाइत अछि। विभूति आनंद छथि जे एक नब तरहक आलोचना-भाषा, संस्मरणात्मक आलोचना-भाषाक अन्वेषक आ प्रयोक्ता छथि। संपूर्ण ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मे युगीन साहित्य कें बुझबाक हो तं अशोक छथि, जे मैथिल आंखिक व्यापकताक संधानी छथि। युगीन परिवेश कें रचना कोना अपना संग जज्ब केने रहैत छैक आ तकरा अपन अभिप्राय मे परिणत करै छै, ताहि पर देशंकर नवीनक काज देखबा जोग अछि। तहिना, रचनाक मूल पाठ अपना भीतर कोना हजारो तरहक सामाजिक संवेदना आ तकर अन्तर्कथा धारण केने रहैत छैक ताहि पर शिवशंकर श्रीनिवासक मूल्यवान काज अछि। मैथिलीक ओ पहिल आलोचक छथि जे मूलतः कथालोचकक पहचान बना सकल छथि। दोसर सूची मे पांचटा एहन युवा रचनाकार छथि जे आन आन विधा मे काज करितो समय समय पर अपन आलोचनात्मक लेखन सं आश्वस्त करै छथि। एहि मे छथि पंकज पराशर, श्रीधरम, कमलमोहन चुन्नू, रमण कुमार सिंह आ अजित आजाद। सारंग कुमार आदि सेहो एहि मे शामिल भ सकै छथि जे पहिनेक अपन लेखन सं अपन आलोचकीय क्षमताक प्रति आश्वस्त केने छथि। कहल जाय तं चुनौती उठेबाक असली जिम्मेवारी हिनके लोकनि पर छनि। तेसर सूची मे पांचटा एहन नाम छथि जे मैथिलीक नवागंतुक रचनाकार छथि, आन आन विधा मे लिखै छथि आ जिनकर आलोचकीय क्षमता दिस हमर ध्यान गेल अछि। एहि मे छथि अरुणाभ सौरभ, चंदन कुमार झा, रघुनाथ मुखिया, विकास वत्सनाभ आ ।  ई युवा लोकनि जं अपन आलोचनात्मक क्षमता संग जं जतन करथि तं अपना जे रचनात्मक लाभ हेतनि से तं हेबे करतनि, मैथिली आलोचनाक सेहो गहमागहमी बढ़तैक। 



         अपेक्षाक जहां धरि बात छै, से कोनो अलग सं होइत हो से हमरा नहि बुझाइत अछि। स्थिति जे अछि से सैह अपेक्षा दिस इशारा करैत रहैत छैक। जतय स्थिति कमजोर देखै छी, ओतय सब गोटें मिलि क जोर लगा दियैक, सैह भेल अपेक्षा। अपेक्षा तं हमर सब सं पहिल यैह अछि जे मैथिली आलोचनाक अतीतगामिताक स्वभाव कें हम सब बदली। किछु गोटे के अतीत मे गेनाइ सार्थक होइत छैक। जेना मोहन भारद्वाजक डाकवचन लग गेनाइ। मुदा, मात्र एही लेल हम अतीत मे जाइ जे आलोचनाक टूल्स तहियेक बनल छै, आगूक बनले नहि छै, एकरा हम पथभ्रष्टता बुझैत छी। यदि निकष(टूल्स) के नमूना उपलब्ध नहि छै, तं हमरा बनेबाक चाही। असगरे बनायब जं पार नहि लगैत हो तं जतबा बना सकै छी, बना क अगिला कें बढ़ा देबाक चाही। 

         दोसर बात जे हमरा सब कें ई अपसोच मोन सं निकालि देबाक चाही जे मैथिली मे पूर्णकालिक आलोचक नहि अछि। असल मे युग एहि हिसाब सं मोड़ लेलक अछि जे आगू पूर्णकालिक आलोचक होयबो मुश्किल अछि। क्रिएटिव राइटिंग बेसी चोख भेलैए आ से प्रतिभाशाली सब कें सिद्दत सं आकर्षित करै छनि। आलोचना के कोनो शिक्षा नहि छै। एते एते विश्वविद्यालय मे एते एते शिक्षक मैथिली पढ़ा रहल छथि मुदा ढंग के एकटा आलोचक नहि तैयार भ' सकल। जे अबैत छथि तिनकर साहित्यक समझ क्रिएटिव राइटक स्तर सं बहुते बहुत नीचां रहैत छनि। दोसर छै जे आलोचना लेखन मे लेखक कें बरक्कति नहि छैक। आलोचक कें नापसंद कयल जाइ छै। आलोचना विधा कें द्वितीय श्रेणीक विधा मानल जाइछ। ओहि मे सम्मान नहि छै। देखबे केलहुं जे मोहन भारद्वाज सन के आलोचक कें साहित्य अकादेमी अन्तो अन्त धरि पुरस्कार नहिये देलक आ अपन नकारापन के, नासमझी के सुंदर उदाहरण प्रस्तुत केलक। मोहन भारद्वाजक परोक्ष भेला सं चिन्तित तं सब क्यो छी, मुदा हमरा सभक भाषाई प्रबंधन कोन तरहें सुधरय से नहि क्यो क पाबि रहल छी।     

           ई एक बात। दोसर जे हरेक क्रिएटिव लेखक कें आलोचना सेहो जरूर लिखबाक चाही। नहि लिखबाक पाछू भय रहैत छैक अपना छुटि जयबाक। अपन नाम लिय' तं सेल्फ प्रोमोशन जकां, तुच्छ काज जकां लगै छै। नहि करियौ तं अपना प्रति अपने कयल अन्याय जकां लगै छै। तें ई भय बहुत वाजिब थिक। मुदा हम तैयो कहब जे लिखबाक चाही कारण आलोचना लिखबाक सुख एक अलग तरहक सुख होइत छैक। ई सुख छै जे हम अपन युग कें देखि रहल छी। द्रष्टा छी हम तं हमरा अपने ओहि दृश्य मे किएक हेबाक हेबाक चाही? ई सुख हमरा आलोचना द सकैए। बाकी आगूक लोक जखन देखता तं अपन सुधारि क देखता। ई हुनक टेन्सन छियनि। हमरा लिखबाक चाही।

           नब सं नबो लोक कें आलोचना लिखबाक चाही। बाधा जे पैदा करैत अछि से से छी अल्पज्ञताक भय। आलोचना लिखबा सं पहिने खूब पढ़ि लेबाक मोन करै छी। आब झंझट ई छै जे पढ़बाक आनंद एक अलगे संप्रदाय के आनंद थिक। ओकरा सामने मे लिखनाइ तुच्छ। एहि प्रकारें अल्पज्ञताक भय आलोचनाक उत्साह कें ध्वस्त क दैत छैक।  तें युवा कें अपना पीढ़ीक बारे मे लिखबाक चाही। ओतय अल्पज्ञताक खतरा न्यून रहै छै। एहि सं असली फैदा ई छै एहि सं आलोचनाक वातावरण सुरभित लगै छै। क्यो आइ पर लिखि रहलाहे, क्यो पछिला दशक पर, क्यो क्यो अतीतो मे आवाजाही बनौने छथि। एखन जे मुरदनी छाएल छै तकर एहि सं निस्तार होयत। 

           तहिना, पुरान प्रतिष्ठित कैक गोट रचनाकार एम्हर फेर सं सक्रिय भेल छथि जेना ललितेश मिश्र, महेन्द्र, गंगानाथ गंगेश आदि। हिनका लोकनिक आलोचकीय क्षमता अचूक छनि। रामदेव झा अपन लेखन आब स्थगित क चुकल छथि। मुदा, कतेक नीक होइत जे क्यो गोटे तैयारी क क हुनकर आ हुनका सन आनो लोकक इन्टरव्यू करितथि। हमरा सभक जबाना मे नब लेखक पुरान रचनाकार सब सं बराबर इन्टरव्यू लेथि, तकर प्रकाशन सं सबहक उपकार होइत छल। सुभाष चंद्र यादव, सुकान्त सोम आ हरे कृष्ण झा आइ लिखि नहि पाबि रहल छथि तं अपेक्षा अछि जतबे होइन लिखथु।

           मोहन भारद्वाज एक समय मे 'मैथिली आलोचना' नाम सं एक पत्रिका निकालब शुरू कयने रहथि, से मोन पड़ैत अछि तं होइत अछि जे एहि खगता कें सेहो क्यो गोटे उठाबथु।

           मैथिली आलोचना कें बेकार आ आलोचक कें पूर्वाग्रही कहब बहुत आसान छै। ततबे आसान जतबा गांधी जी कें बैमान कहब। क्यो उनटि क' उपराग देबय नहि आओत, ने गांधी जी दिस सं ने आलोचना दिस सं। मुदा, मोन राखल जाय, यैह समय होइ छै जखन विवेकी जन कें मूल जड़ि पकड़य पड़ैत छै आ अपन भूमिका तय करय पड़ैत छैक।

Tuesday, June 29, 2021

बाबा नागार्जुन का अपना शहर


 बाबा नागार्जुन का अपना शहर


तारानंद वियोगी


जेठ पूर्णिमा के दिन बाबा नागार्जुन का जन्म हुआ था। 1911 ईस्वी की यह पूर्णिमा 11 जून को पड़ी थी। लेकिन वह ताउम्र अपना जन्मदिन, 11 जून को नहीं, जेठ पूर्णिमा को ही मनाते। अलग-अलग वर्षों में यह अलग-अलग तारीखों को पड़ती थी। यायावर आदमी थे। भारत के कितने ही शहरों में उनके प्रेमियों ने उनका जन्मदिन उनकी संगत में मनाया होगा। सबसे ज्यादा बार अपने जन्मदिन पर यदि वह किसी एक शहर में उपलब्ध रहे भी, तो वह हिमालय का सुदूरवर्ती कस्बा जहरीखाल था, जहां उनके अत्यन्त प्रिय वाचस्पति रहते थे। लेकिन, वह भी उनका अपना शहर नहीं था। खास अपना जिसे कहा जा सके वह शहर दरभंगा भी नहीं था। दरभंगा से उन्हें कई शिकायतें थीं। महानगरों में उन्हें कलकत्ता पसंद था। लेकिन, अपना शहर जिसे कहा जाए वह तो पटना ही था।

               पटना का जुड़ाव नागार्जुन के जीवन की  लगभग समस्त मोड़ों से रहा है। जब वह एक बौद्धभिक्षु के भेस में आकर स्वतंत्रता-संग्राम की एक अपर धारा, किसान आन्दोलन से जुड़े, सहजानंद सरस्वती और राहुल सांकृत्यायन के साथ सक्रिय राजनीति में उतरे, तब भी इन सब कार्यों की आधारभूमि पटना शहर ही थी। यहीं से वह राहुल जी के साथ अमवारी भी गये थे, सुभाषचन्द्र बोस के साथ लगभग सारे बिहार घूमकर उनकी सभाएं करवाई थीं, यहां तक कि आजादी के बाद पहली बार जब गांधी जी की हत्या पर कविता-सिरीज लिखने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया तो पटना जेल में ही बंद किए गये। दूसरी ओर, बिहार का सर्वोच्च सम्मान राजेन्द्र शिखर सम्मान मुख्यमंत्री के हाथों जहां उन्हें प्रदान किया गया वह जगह भी पटना ही था।

               1940 के ही दशक में जब नागार्जुन ने सक्रिय राजनीति के स्थान पर साहित्य-लेखन को अपना प्रधान कार्य बनाया, उन्होंने अपने रहने की जगह इलाहाबाद चुनी। लेकिन परिवार गांव में रहता था जहां से इलाहाबाद दूर पड़ता था। उन्होंने व्यावहारिक निर्णय लिया कि ऐसी जगह रहें जहां से कुछ घंटों के सफर से गांव पहुंचा जा सके। वह जगह पटना था।  अक्सर वह भारत भर की यात्रा करते रहते थे, लेकिन अपना एक डेरा पटना में जरूर रखते। पटना के बारे में उनकी राय थी कि यहां समूचा बिहार बसता है। बिहार के सभी सांस्कृतिक क्षेत्रों की भाषाएं, रहन-सहन, खान-पान यहां एकाकार दिखता था। वह खुद भी जैसी भोजपुरी बोलते, वैसी ही मगही। जबकि उनकी मातृभाषा मैथिली थी। मैथिलों की प्रतिनिधि संस्था चेतना समिति की स्थापना उन्होंने पटना में की, जिसके लिए जाने कितने संघर्ष उन्हें करने पड़े। वह कहते थे-- पटना क्या है? बिहार का एक विशाल गांव है। 

               वह जमाना पटना के इतिहास में भी साहित्यिक सक्रियता का स्वर्णकाल था। राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाएं पटने से निकलती थीं। कई महारथी थे जिनके पास अपना सुविधासंपन्न प्रेस था और वे साहित्यिक पत्रिकाएं ही निकालते थे। 'बालक' समूचे देश में बाल-साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित पत्रिका थी, जिसके नागार्जुन आगे चलकर संपादक भी हुए थे। ऐसी ही एक पत्रिका 'अवंतिका' थी। इन सब में नागार्जुन नियमित लिखते जो उनकी आय का एकमात्र स्रोत होता था। ग्रन्थमाला कार्यालय यहां उनका ठिकाना बना और इसी के संचालक रामदहिन मिश्र ने पहली बार उनसे उपन्यास लिखवाया था। मिश्र जी हिन्दी के लेखक-प्रकाशक थे जबकि नागार्जुन अपना पहला उपन्यास मैथिली में लिखना चाहते थे। रामदहिन मिश्र नागार्जुन के भीतर छिपे एक बड़े उपन्यासकार को देख पा रहे थे। उन्होंने पहली बार उस मैथिली किताब को छापा जिसकी सारी प्रतियां चंद महीनों में बिक गयीं। उधर मिथिला में तो इस  उपन्यास ने हाहाकार ही मचा दिया था। वह 'पारो' था। 

               15 अगस्त 1947 को, आजादी के दिन नागार्जुन पटने में थे, और उस दिन उन्होंने एक यादगार कविता लिखी थे। अपने पार्टी-लाइन से अलग जाकर स्वतंत्रता दिवस के इस पहले सूर्योदय को उन्होंने बहुत उम्मीद से देखा था। दूसरे लोग जहां काला दिवस मना रहे थे, नागार्जुन ने इस अवसर को उत्सव की तरह लिया था, मिठाई बंटवाई थी। सत्ता के वह लगातार अतन्द्र आलोचक बने रहे। यही कारण है कि आगे जब लोकतंत्र को कुचलने का प्रयास हुआ, बिहार से ही संपूर्ण क्रान्ति का आह्वान किया गया। जयप्रकाश नारायण ने अपने आन्दोलन में बौद्धिकों और संस्कृतिकर्मियों, साहित्यिकों की भागीदारी मांगी। पार्टी-लाइन से बाहर जाकर नागार्जुन एक बार फिर से आन्दोलन में कूद पड़े थे। गांधी मैदान में आयोजित जेपी की वह जो ऐतिहासिक सभा थी, जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि उतने लोगों का एक साथ जुटान आज तक कभी गांधी मैदान में न हो सका, जेपी ने अपने भाषण की शुरुआत इन्हीं संबोधन शब्दों से की थी, 'आदरणीय नागार्जुन जी, फणीश्वरनाथ रेणु जी....'

               पटना की गली-गली को नागार्जुन पहचानते थे, और गलियां उन्हें पहचानती थीं। आज जब वह नहीं हैं और आधा पुराना आधा नया पटना अपनी नयी पहचान के लिए उतावला बना हुआ है, नागार्जुन की बातें शिद्दत से याद आती हैं।

Sunday, June 27, 2021

बंगट गवैया: मिथिला का एक अचीन्हा जीनियस



 बंगट गवैया: मिथिला का एक अचीन्हा जीनियस


तारानंद वियोगी


पिछले दिनों महिषी की एक विलक्षण विभूति का अवसान हो गया। उनका नाम ताराचरण मिश्र था लेकिन सदा से सब उन्हें बंगट गवैया कहते थे। गरीब ब्राह्मण थे, और उदार भी। अंत-अंत तक उनकी गरीबी और उदारता दोनों बनी रहीं। 

        तारास्थान परिसर के निवासी और संगीत-मंडलियों के समाजी होने के कारण बचपन से ही मुझे उनकी संगत मिली। बचपन से ही हम यह अचरज करना सीख गये थे कि उनके गले में सरस्वती का वास है। उनके पास जो गीतों का चयन था वह भी बहुत आश्चर्यजनक था। वह निराला, पंत, दिनकर, गोपाल सिंह नेपाली के दुर्लभ गीत गाते। दिनकर का यह गीत 'माया के मोहक वन की क्या कहूं कहानी परदेसी' या फिर नेपाली का यह गीत 'बदनाम रहे बटमार मगर घर को रखवालों ने लूटा' तो उनसे सुना कई लोगों के स्मरण में होगा। एक यह गजल भी वह बहुत ही जानदार गाते थे-- 'न आना बुरा है न जाना बुरा है\  फकत रोज दिल का लगाना बुरा है।' यह सब लेकिन, अधिकतर गुणिजनों की महफिल में होता जहां कई बार मुझे भी शरीक होने का अवसर मिला था। चन्दा झा की रामायण का गायन भी पहली बार मैंने उनसे ही सुना था। विद्यापति को तो इतनी तरह से गाते कि वह अलग ही चकित करता था। ठीक यही बात कबीर के पदों की गायकी के साथ थी। उनका जन्म 1940 के आसपास का रहा होगा। एक बार उनसे मैंने जानना भी चाहा था कि इस धुर देहात में ये सब गुण उन्होंने कहां सीखे? बताते थे कि बचपन में ही नाटक-मंडलियों के साथ लग गये थे और बाद में पंचगछिया घराने के कुछ संस्कारी गुरुओं की संगत में रहे थे। 

        विद्यापति के गीत 'पिया मोर बालक' को वह कुछ इस तरह गाते कि स्त्री की पीड़ा के नजरिये से देखें तो रुलाई आने लगती थी। द्रुत और विलंबित का एक ऐसा समीकरण बनाते कि मेरे पास उस अनुभव को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं। शायद संगीतशास्त्र के जानकार ही उसे व्यक्त कर पाएं। मैंने यह गीत कई गवैयों, यहां तक कि पं. रामचतुर मल्लिक से भी, सुना था। उनके और इनके गायन में मुझे गोचर होने योग्य अंतर दीखते। एक बार मैंने जिज्ञासा की कि काका, ये क्या है? बताया तो उन्होंने काफी देर तक, लेकिन मेरी स्मृति में बस यही है कि यह अंतर घराने (अमता और पंचगछिया) की गायकी-शैली के कारण है। विद्यापति संगीत के आधुनिक रूप को वह पंचगछिया घराने का अवदान मानते थे।

        एक बार पं. मांगनलाल खवास के बारे में बात चली तो पता चला कि मांगन जी के लड़के लड्डूलाल जी की संगत में रहे थे और उन्हें गुरुस्थानीय मानते थे। मांगनलाल का काफी यश सुना था और उनकी ढेर सारी कहानियां उनके पास थीं। बताने लगे-- गायक तो परमात्मा का दुलारा और अपना बादशाह आप होता है न! उसे क्या परवाह कि बड़े लोग उसे किस नजर से देखते हैं। वह दरअसल उस प्रसंग की ओर इशारा कर रहे थे कि लहेरियासराय की एक संगीतसभा में मांगनलाल जी ने आग्रह-दुराग्रह में पड़कर अपनी प्रस्तुति दे दी और यह बात उनके आश्रयदाता को इतनी बुरी लगी कि केवल इसी अपराध पर राजकुमार विश्वेश्वर सिंह ने उन्हें अपने दरबार से निकाल दिया था।

        गरीबी ने बंगट जी को समझौते के लिए बाध्य किया। बाद में वह राधेश्याम कथावाचक की रामायण गाने लगे जिसे हमारे इलाके में विषय-कीर्तन कहा जाता था। लेकिन इससे भी महिषी में उनका गुजारा संभव नहीं हुआ। उनका लगभग समूचा उत्तर-जीवन सिंहेश्वरस्थान, मधेपुरा में बीता जहां के लोगों में उदारता भी अधिक थी और वहां तीर्थयात्री भी अधिक आते थे। वह स्पष्ट बताते थे कि जितनी गुणग्राहकता और श्रद्धा उन्हें यादव और बनियों से मिली, उतनी ब्राह्मणों से नहीं। वह नाभिनाल बद्ध शाक्त थे। कहते-- शक्ति का उपासक वर्ण और लिंग का भेद नहीं जानता। उसके लिए क्या शौच, क्या अशौच, सब केवल महामाया की विविध छवियां हैं। तंत्रसाधक होने का गौरव भी उन्हें पूरा था, लेकिन मैथिलों की परंपराप्रियता पर कभी खीजते तो अपने को 'कुजात ब्राह्मण' बताते थे और उदाहरण के लिए राजकमल चौधरी का नाम ले आते थे, जिन्हें वह अपना आदर्श पुरुष बताते थे।।

         नवरात्र और होली के मौके पर वह गांव जरूर आते। यह मातृभूमि का प्रेम तो था ही, उनका परिवार भी हमेशा गांव में ही रहा। कभी आर्थिक जरूरत होती तो बेटा जाकर पैसे ले आता था। मूडी आदमी थे। कोई गाने का आग्रह कर दे और वह तुरंत गाने को तैयार हो जाएं, ऐसा कम ही होता था। हारमोनियम जब सम्हालते, तब भी अपनी रौ तक पहुंचने में उन्हें वक्त लगता था। लेकिन उनकी अपनी भी कुछ चाहतें थीं। हमारे गांव में होली के एक सप्ताह पहले से ही संगीत-गोष्ठियों का दौर शुरू हो जाता था। यह ज्यादातर किसी व्यक्तिविशेष के दालान पर होता था। वह गांव में होते तो इन गोष्ठियों में जरूर पहुंचा करते थे। कभी तो ऐसा होता था कि उन्हें आया देख गृहपति सकुचा जाता--अरे, गवैया जी। हमें तो पता ही नहीं था कि आप गांव में हैं। लेकिन वह तो अपनी चाहत के रौ में होते थे।

          महिषी की आज की जो युवापीढ़ी है, उसने कभी न कभी साधनालय में बंगट गवैया का विषय-कीर्तन जरूर सुना होगा। किसी में गुण हो तो वह उसके किये सभी कार्यों में प्रतिध्वनित होता है। वह आत्यन्तिक रूप से दीक्षित शाक्त थे, और वैष्णव किसी भी तरह नहीं। तांत्रिकों की गुरु-परंपरा के पूरे पालनकर्ता थे। रामकथा के साथ उनका कोई पुराना वास्ता भी नहीं था। लेकिन, एक बार जब इसे अपना लिया तो इतनी महीनी और हार्दिकता उसमें भर दी कि एक दिन कोई उन्हें सुन ले तो वर्षों तक उस अनुभव को भूलना कठिन रहता था। गायकी की उनकी गुणवत्ता अंत अंत तक बनी रही। छूटी तो गायकी ही छूट गयी, गुणवत्ता नहीं। कभी कभी हम जो चैती महोत्सव करते, या फिर युवा गायकों की गायन-प्रतियोगिता जिसमें उन्हें निर्णायक के रूप में बुलाते थे, वह खुशी खुशी शामिल होते थे। कभी-कभी अगर दबंग घरों के लड़के बेईमानी के लिए दबाव बना दिया करते, वह अड़ जाते थे। उनका अड़ना हमें बहुत ताकत देता था।

        राजकमल चौधरी जब अपने आखिरी दिनों में गांव में रहने आए, उनकी अत्यन्त विश्वस्त युवा-वाहिनी में बंगट गवैया भी एक थे। इन सबके बारे में अनेक लोगों ने जहां तहां लिखा है। हमारे मित्र देवशंकर नवीन तो उस किस्से को बहुत ही रोचक ढंग से सुनाते हैं कि कैसे जब एक बार बाहर के बहुत सारे लेखक राजकमल के मेहमान हुए तो उन्होंने शाम का कार्यक्रम बंगट गवैया का गायन तय किया था। लेकिन, ऐन मौके पर बंगट फरार। लाख खोजे जाने पर भी वह कहीं नहीं मिले तो लाचारी में प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ा। दूसरे दिन की सुबह बेंत लेकर राजकमल बंगट को खोजने निकले तो सबको यकीन था कि बंगट का हाल बेहाल होना आज तय है। लेकिन, खोजते खोजते जब वह तारास्थान परिसर में पाए गये, राजकमल ने उन्हें पकड़ लिया और बाबूजी बड़ई की दुकान पर आ धमके। कहा--आज इसे नाक तक दही-चूड़ा-पेड़ा खिलाइये। यही इस अभागे का दंड है। कभी बात उठे तो वह खुद भी राजकमल के एक से एक दुर्लभ प्रसंग बड़ी तल्लीनता से सुनाते थे। एक दिन मैंने पूछा था कि उस रोज आप कहां चले गये थे कि फूलबाबू को इतनी तरद्दुद उठानी पड़ी। कहने लगे-- असल में शाम के प्रोग्राम की बात ही हम भूल गये थे। कोशी इलाके में एक खास जगह पहुंचने का आग्रह बहुत दिन से हो रहा था, शाम को वहीं चले गये थे। उन्हें कहां मिलते?

        पिछले कई वर्षों से मैं उनकी गायकी पर एक डाक्यूमेन्ट्री के लिए उन्हें तैयार कर रहा था। लेकिन, काफी दिनों से उनका स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था। दुख है कि मेरी यह साध पूरी नहीं हुई।

        इस चित्र में उनकी गायकी की एक मुद्रा दिखेगी। गीत का अगला पद अब वह गानेवाले हैं। आंखें बंद कर ली हैं। भीतर कुछ जनम रहा हो जैसे, वह आभा चेहरे पर है। उन्हें सुन चुके लोग जानते हैं कि यह उनकी पसंदीदा मुद्रा थी। यह चित्र 2015 के चैती महोत्सव का है जो महिषी के पाठक बंगले पर आयोजित हुआ था।

Monday, January 11, 2021

धूमकेतुक नवोपलब्ध उपन्यास 'सरहद'


 


तारानंद वियोगी

बीसम शताब्दीक मिथिला मे किछु गनल-गुथल एहन लेखक भेलाह जे मातृभाषा मैथिली टा मे लिखितहु विश्व-स्तरक साहित्य-निर्माण क' सकलाह। एहने एक लेखक धूमकेतु(1932-2000) रहथि। हुनकर अविस्मरणीय ख्याति कथाकारक रूप मे छनि। हुनक निधनक बाद हुनकर एक महागाथात्मक उपन्यास 'मोड़ पर' नवंबर 2000 मे प्रकाशित भेल, मुदा ताधरि ओ अपने एहि संसार सं विदा भ' चुकल छलाह। एहि तरहें, हुनकर उपन्यासकारक रूप सं मैथिली पाठकक परिचय हुनकर निधनक बादे भ' सकलै। ओना, केदार काननक आग्रह पर 'सन्निपात' नामक उपन्यास 1998 सं ओ लिखब शुरू कयने छलाह। हुनका जिबैत जी एकर एकेटा अंश 'भारती मंडन' अंक चारि मे 1998 मे प्रकाशित भ' सकल रहनि। दोसर किश्त अंक सात मे जा जा प्रकाशित होइतनि, ओ विदा भ' चुकल छलाह। कुल मिला क' एकर ओ पांच अध्याय लिखि सकल रहथि। एखन धरि लोक हुनकर एही दुनू उपन्यास कें जनैत अछि।

हाल मे हुनकर तेसर उपन्यास 'सरहद' हुनकर पुरान डायरी मे लिखल भेटल अछि। इहो एक अपूर्ण उपन्यास थिक। 1989 इस्वीक डायरी मे एकरा ओ डिक्टेट क' क' लिखेने छला। जेना कि हुनकर पाठक अवगत छथिन, अनेको वर्ष सं धूमकेतु अपने लिखबा मे असुविधा महसूस करथि आ डिक्टेशन लेबाक काज हुनकर ज्येष्ठ पुत्री स्वर्णा सम्हारैत छली। मार्च सं जून 1989 मासक कुल  उनचालीस गोट डायरी-पेज मे ई उपन्यास लिखल भेटल अछि। मुदा, ई डायरिये टा 1989क थिक। एकर लेखन ओ बहुत बाद मे आबि क' कयलनि अछि, एहि सम्बन्ध मे एकटा सुस्पष्ट साक्ष्य अछि। वर्ष 1998-99 मे 'संधान'-संपादक कथाकार अशोकक द्वारा लेल गेल एक इन्टरव्यू मे, ई पुछला पर जे 'एहि बीच मे की सभ अहां पढि-लिखि रहल छी?', धूमकेतु उतारा देने छलखिन-- 'एकटा नेपाली जनजीवनक औपन्यासिक प्रयास मे लागल छी। रचबोक स्कोप तं अपना मातृभाषा मे कम्मे सम छै, आ कि नहि, भाइ?' हुनकर ई इन्टरव्यू संधान-4 मे 2000 ई. मे छपल, जाहि साल हुनकर निधन भेलनि।

'सरहद' अर्थात सिमान। मने कि भारत-नेपालक सिमान। नोमेन्स लैंड, जकरा धूमकेतु 'चालीसगज्जा' कहैत छथि, के अइ पार एकटा सभ्यता छैक जे ओइ पार धरि बहुत दूर तक पसरल छै, तें स्वाभाविक जे लोक-समाजक स्मृति मे 'पायाक अइ पार, ओइ पार' के कोनो खास महत्व नहि छैक, राजनीति मे भने होअओ। ओइ पारक जे सभ्यता छै जकरा सामान्यत: मधेसी कहल जाइत छैक, एकरा धूमकेतु मोगलानी कहैत छथि जे कि एकर परंपरागत प्राचीन नाम थिक। बहुत आगां जा क' एकटा आर सभ्यता शुरू होइछ जकरा ओ किराती कहलनि अछि।  ब्राह्मणधर्म संग पूर्णत: अनुकूलित सभ्यता मोगलक नाम पर मोगलानी किएक कहौलक आ इलाका मोगलान, तकर अलग वृत्तान्त भ' सकैत अछि। मुदा, मुख्य बात ई थिक जे दुनू सभ्यताक बीच धरती-अकासक अंतर छै। ततेक भिन्न जे देखने चकबिदोर लागत।

धूमकेतुक कथा-साहित्य सं जे क्यो अवगत छथि, नीक जकां जनै छथि जे हुनकर प्रिय कथा-विषय स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध छलनि। एकर व्याप्ति ओ तते पैघ देखै छला जे जनु एही एक बिन्दु कें फरियौने जीव-जगतक बहुतो रास रहस्य खुलि सकैत रहय। वर्जित क्षेत्र मे जा जा क' ओ कथा-प्रयोग कयलनि। स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध एहू उपन्यासक मूल वस्तु थिक। कुलीन आ संपन्न परिवार मे जनमलि शकुन मौसीक बियाह पन्द्रह बर्खक अवस्था मे एकटा प्रख्यात डाक्टरक संग भेल रहनि। बियाहक बादे ओ पतिक संग चलि गेल छली, जिनकर पोस्टिंग एक आदिवासी ग्रामीण अस्पताल मे छलनि। डाक्टर पत्नीक खूब ख्याल राखथि, मुदा ओ अपन मेडिकल रिसर्चक पाछू बेहाल छला आ शकुन अपना कें हुनका सामने अत्यन्त लघु, अत्यन्त तुच्छ अनुभव करथि। मनोवैज्ञानिक एकाकीपन सं घटनाक आरंभ भेल छल मुदा एकर परिणति बहुत पैघ, कदाचित भयावह भेल जे एक दिन शकुन डाक्टर कें छोड़ि क' ओइ नेपाली चपरासीक संग भागि गेली, जकर नियुक्ति डाक्टर साहेब हुनकर सेवा-टहल लेल कयने रहथि। ओहि कुलीन परिवार कें जे अपमान बोध भेल हेतनि तकर अनुमान कयल जा सकैत अछि। मुदा, समय सब सं पैघ चिकित्सक थिक। एहि घटना कें बारह बर्ख बीति गेलै आ शकुन मौसीक कुश-श्राद्ध क' देल गेलनि। सब क्यो हुनका नीक जकां बिसरि गेला।

मुदा, ई उपन्यासक कथावस्तु नहि थिक, मात्र एकर कथावस्तुक पृष्ठभूमि थिक। एहि उपन्यासक कथाभूमि नेपालक राजधानी काठमांडू थिक, जाहि मे दिलमाया, डम्मर आ नगीना राई एकर पात्र सब थिका, आ सहायक पात्र चन्द्रे दाइ(वा कि चन्द्रे भाइ) थिका जिनकर आवाजाही दुनू सभ्यता, मोगलानी आ किरातीक बीच छनि, कारण हुनका लोकनिक रोजगारे ताही तरहक छनि। ओ नेपालक सत्ताधारी राजनेता सभक पेशेवर दलाल थिका। चाहे कोनो पार्टीक सरकार हो, ने हुनकर धंधा मे मंदी अबै छनि ने ऐश मे कमी। हुनकर पुरान परिचय कथावाचकक संग छनि, जे कि काठमाडू मे प्रोफेसर नियुक्त भ' क' एलाह अछि। उपन्यास मे काठमांडूक इतिहास, संस्कृति, लोकाचार, स्थान आ लोक सभक तते मेंही डिटेल छैक जे निश्चिते आंखिक देखल तं जरूरे, सद्य: भोगल होयब सेहो संभाविते नहि, तर्कसंगतो लगैए।

नेपालक संग धूमकेतुक बहुत पुरान सम्बन्ध रहनि। अगस्त 1957 सं नवंबर 1973 धरि ओ जनकपुर मे अर्थशास्त्रक प्राध्यापक रहला आ एहि बीच रा. रा. ब. क्याम्पसक प्राचार्य सेहो भेलाह। हुनकर रचनाशीलताक ई स्वर्णकाल छलनि, अपन अधिकांश महत्वपूर्ण कथा ओ ओतहि लिखलनि आ अपन उपस्थिति सं जनकपुर कें सदा गुलजार कयने रहला। मुदा, आगू एहनो समय आएल जखन विचार सं मार्क्सवादी आ प्रवृत्ति सं नवाचारी धूमकेतु नेपाल सरकार कें असह्य भ' गेलखिन आ हुनका भारत घुरय पड़लनि। मुदा, थोड़बे दिन मे समय फेर बदलल आ 1980 मे हुनका त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू मे अर्थशास्त्रक एसोशिएट प्रोफेसरक पद पर नियुक्त क' लेल गेलनि। ई हुनकर दोसर नेपाल-प्रवास छल, मुदा जकर परिणाम नीक नहि रहल। काठमांडूक आबोहवा हुनका स्वास्थ्यक लेल सर्वथा विपरीत साबित भेलनि आ चारि वर्ष बितैत-बितैत ओ आस्टो-आर्थराइटिस रोग सं भयंकर प्रभावित भ' गेला। अन्तत: 1984 मे ओ फेर देश घुरि अयलाह। मुदा, नेपालक नेह जेना तखनहु कम नहि भेल होइक, 1997 मे, तेसर बेर फेर हुनका रा. रा. ब. क्याम्पस, जनकपुर मे सम्मानित विशिष्ट प्रोफेसर(मौद्रिक अर्थशास्त्र) मे नियुक्ति भेटलनि, जतय ओ जीवनक अंतिम समय धरि बनल रहला। हमरा लोकनि बूझि सकैत छी जे 'सरहद'क अनुभव हुनकर काठमांडू-प्रवास संग जुड़ल हेतनि, यद्यपि कि नेपालक गह-गह सं तं ओ सुरुहे सं परिचित छला। हमरा लोकनि बूझि सकैत छी जे एहि उपन्यासक यथार्थ सं हुनक टकराव दोसर नेपाल-प्रवासक अवधि मे भेल हेतनि। एकरा लिखलनि ओ बाद मे, जेना कि पहिनहि कहलहुं।

उपन्यास मे, होइत छैक एना जे एक दिन कथावाचक प्रोफेसर काठमांडूक असन चौक पर घुमय गेलाह अछि आ ओतय हठात हुनकर भेंट चन्द्रे दाइ(वा कि भाइ) सं भ' जाइत छनि। पुरान परिचित चन्द्रे बड़ पसन्न होइत हुनका अपना संग क' लैत छनि। संझुका पहर थिक जकरा बारे मे कहबी छैक जे सूर्य अस्त नेपाल मस्त। चन्द्रेक मस्तीक अड्डा 'भाउजो रेस्त्रां' थिक, जकर संचालिका थिकी दिलमाया। एही ठाम सं उपन्यास शुरू होइत छैक। दिलमाया कें देखितहि प्रोफेसर कें लगैत छनि जे अरे, ई तं शकुन मौसी थिकी। भारी उधेड़बुन मे ओ पड़ल रहैत छथि, नाना प्रकारक तर्क-वितर्क मे। तकर वर्णन सं उपन्यास भरल अछि। शकुन मौसी छली तं प्रोफेसरक मायक मामाक बेटी, मुदा बालविधवा हुनकर माइक संग हुनको प्रतिपाल हिनके कुलीनता-मर्यादित घर मे भेल भेल छलनि। दुनू संग-संग नेना सं जुआन भेल रहथि। उपन्यास मे प्रसंग आएल अछि जे नेनपन सं दुनू संग-संग खेलथि-धूपथि, मुदा जहिना कि शकुन मे कैशौर्यक चेन्ह सब प्रकट हुअय लागल छल, एहि खेलकूद सब पर प्रतिबन्ध लगा देल गेल छलैक। कुलीन घरक बालिकाक जाबन्तो शील-मर्यादा मे बान्हलि शकुन सब तरहें एक सुशीला कन्या रहथि। जखन कि ई दिलमाया किराती सभ्यता मे पूरे रंगलि, शराबखानाक संचालिका, खने खन घोंट-घोंट शराब सगरो दिन पिबैत रहयवाली, बड़का-बड़का मोंछबला सब कें अपन आंगुरक इशारा पर नचा सकबा मे दक्ष।

धूमकेतुक स्त्री-विमर्शक एकटा विशेषता छनि जे जाहि स्त्री संग पुरुषक शारीरिक वा भावनात्मक सम्बन्ध रहल होइक, बखत पड़ला पर पुरुष ओकर उपकारक लेल अपन सर्वस्व समर्पित क' सकैत अछि। 'मोड़ पर' मे हमरा लोकनि सदाशिव कें गुना लेल ई करैत देखि चुकल छी। एहि उपन्यासक जतबा अंश भेटल अछि, लगभग वैह स्थिति एतय शकुन मौसी लेल प्रोफेसरक छैक, जकर सम्बन्ध-सूत्र भावनात्मक छैक। प्रोफेसर एकठाम कहै छथि-- 'शकुन सं सम्बन्ध जे छल हो, मुदा भावनाक एक सम्बन्ध जरूर छल, जे लागल, हुनकर खोज अवश्य एकटा उपलब्धि होयत।'  की शकुने दिलमाया थिकी, की क्यो आन थिक-- एकर पता लगाएब प्रोफेसरक जीवनक उद्देश्य भ' गेलैक अछि। रहस्य जल्दिये खुलि जाइत अछि जे वास्तव मे शकुने दिलमाया छली। ई बात साफ भेलाक बादो बहुत पैघ समस्या छैक जे ओ शीलवती कन्या कोना एहि सार्वजनिक स्त्री मे आबि क' रूपान्तरित भेली। उचिते छै जे एकर खिस्सा बड़की टाक हेतैक-- 'जीवन सरिपौं खिस्सो पिहानी सं बेसी अद्भुत होइत अछि।'। हमर अनुमान अछि जे एहि उपन्यासक जे योजना धूमकेतुक मोन मे रहल हेतनि, ताहि मोताबिक एकरा तीन सौ मुद्रित पृष्ठक लकधक हेबाक छल। ततबा पैघ एहि रूपान्तरणक खिस्सा अछि। ई ठीक-ठीक कहल नहि जा सकैए जे एकरा ओ पूरा किएक नहि क' सकला। एहि बारे मे ओ अपनहु कतहु कोनो चर्च नहि कयने छथि। कोनो छोटो कारण भ' सकैत अछि, जेना स्वास्थ्य संग नहि देब जेना कि हुनका संग होइतो रहलनि, इहो संभव जे हुनकर निधन भ' गेने ई उपन्यास अधूरा रहि गेल हो। मुदा कोनो पैघो कारण भ' सकैत अछि, जेना नगीना राई के व्यक्तित्व मे कोनो एहन छोटपना हुनका देखार पड़ि गेल होइन जकर तर्कसंगत निस्तार हुनका अंतोअंत धरि ताकने नहि भेटल छल होइन, आ ओ तते इमानदार लेखक छला जे मोनक ओझरी कें नुका क' किछु लिखि जाथि से हुनका बुते संभव नहि छल।। दोसर दिस छलि दिलमाया, जकरा लेल नगीना राई एतेक महान पुरुष छल जेहन कि क्यो आन भइये नहि सकैत छल। के छल नगीना राई? डाक्टर साहेबक वैह चपरासी, जकरा संग शकुन भागल छलि। आब ओ संसार मे नहि अछि। बहुत बीहड़ जीवन रहलैक ओकर। एक दिस जं ओ सरहद पारक जायज-नजायज व्यवसाय सं अकूत धन कमेलक, तं दोसर दिस अंगरेज सरकार आ ओकर पिट्ठू देशी साहेबक खिलाफ सशस्त्र संघर्षो कयलक, क्रान्तिक दौरान, जाहि मे कि ओ मारलो गेल। नगीनाक बारे मे जनबाक प्रोफेसरक कौतूहल पर दिलमायाक कहब छैक-- 'ओ व्यक्ति सोलह आना हमर छल। नगीना एखनो हमरा मोनक नगीना भेल आत्मा मे जड़ल अछि। बिसरि जैतय तं नीक। मुदा जे हमरे टा ल' क' अइ दुनियां मे रहल ओकरा बारे मे मुंह खोलनाइ की? बहुत निजी, बहुत आत्मीय सम्बन्धक व्याख्यान दुनियां कें सुनाएब की?' नगीना मरि गेल, मुदा दिलमाया विधवा नहि छथि। तेसर पति छथिन डम्मर श्रेष्ठ, नगीना राईक संघर्षक दिनक एक साथी, जे गैंडा सन छथि, बहुत बूढ़ भ' गेला अछि, बीमार रहैत छथि आ दिलमाया कें कटु वचन कहैत रहै छनि। मुदा ओहि पुरुषक सौ खून माफ छै, ओकर सेवा-बरदास एखन दिलमायाक सब सं पैघ जीवन-लक्ष्य छैक। जखन कि दोसर दिस, अपना बल पर अरजल धन दिलमाया कें ततबा छैक जे एक बेर सजि-संवरि क' प्रोफेसर संग ओ दक्षिणकाली मंदिर जे गेल छलि तं ओकरा देह पर दू-अढाइ किलो सोनाक गहना लटकल रहै। तेसर समस्या ई अछि जे दिलमाया कें जे दूटा बेटा छनि, मने नगीना राई सं, एकटा तं क्लास वन आफिसर, इंजीनियर थिक मुदा दोसर बेरोजगार आ तेहन बहसल जे एक नमरी(सौ टाका)क लेल श्रेष्ठ जीक पिटाइ क' सकैत अछि आ सबटा संपति कें बेचि क' फिल्म-निर्माण करय चाहैत अछि। आ, क्रान्तिक एक नायक ई डम्मर जी केहन छथि जे छौंड़ाक पिटाइ के प्रतिकार करबाक प्रश्न पर कहै छथि--'बात छै जे धिया-पुता संगे भिरियो गेनाइ तं ठीक नै ने!' तखन, इहो एक बात अबैत छैक जे नगीना, जकरा ओ अपन वास्तविक पति परम गुरु मानैत छथि आ हुनकर बड़का फ्रेम कयल फोटो सदिखन अपन बेडरूम मे लगेने रहल अछि, हरेक संकट अयला पर ओकरे दिस टुकटुक तकैत समाधान पबैत अछि, वैह दिलमाया ओहि नगीना सं जनमल दुनू बेटा सं घोर घृणा करैत अछि।

मने, ओहू सभ्यताक जे पीढ़ीगत, कालगत, आदर्शगत विचलन सब, परिवर्तन सब घटित भेल छैक, से एहि उपन्यासक विषय बनल अछि। मुदा, लेखक लग जे सब सं ओझराएल प्रश्न रहलैक अछि, जकरा सोझरेबा मे ओ पूरे जतनशील लगैत छथि, से ई थिक जे एहि मरदे गैंडा डम्मर के जखन एते बरदास्त कइये रहल छथि शकुन, तं ओहि डाक्टरे मे की खराबी छलै? एते ई सब किए? मुदा, दिलमायाक कहब छनि-- 'स्त्री एक बेर अपना कें जाहि पुरुष कें समर्पित करैत अछि, पति वैह होइत छैक। आत्मा सं ओकरे सं सम्बन्ध होइत छैक। डाक्टर साहेबक उंचाइ धरि हमर समर्पण पहुंचिये नहि सकैत छल, तें हुनका प्रति हम कहियो समर्पित भेबे नहि केलियनि।' एहि हिसाब सं तं हुनकर पति भेलखिन नगीना राई, मुदा ई गैंडा, अथबल, दुर्वचन कहनिहार डम्मर? ई के थिक? बस, एकरा ओ पोसने छथि, अपन आश्रय देने छथि, एहि नारीत्वक जेना ई एक गरिमा, एक महिमा होइक, एक संतोष। डाक्टर ब्लड कैंसर सं मुइलाह, नगीना पुलिसक गोली सं, डम्मर अथबल अछि, मुदा दिलमाया? प्रोफेसर के सबटा केस, माथोक दाढ़ियोक, पाकि गेलनि, शकुन हुनका सं छव‌ मास-बरख दिन जेठे छलि, मुदा ई दिलमाया जखन फेंटा कसि क' रेस्त्रां चलबैत रहैत अछि तं लोक कें राजा रवि वर्माक स्त्री-चित्र(शकुन्तला) सन मोहक आ मनभावन लगै छथि। स्वयंसिद्धा आ आत्मदीप्ति सं भरपूर स्त्री थिकी दिलमाया, जे कि अपन अतल अन्तर्मन मे हरेक स्त्री हुअय चाहैत अछि। आ, दिलमायाक बौद्धिक स्तर? ओ प्रोफेसर कें एक ठाम कहै छनि-- 'दिलमाया मे शकुन कें नहि खोजी।'
-- असल मे हमरे टा आंखि ने दिलमाया मे शकुन कें देख' सकै छनि।
-- से देखितनि तं चन्द्रेक मारफत किएक दिलमायाक देह धरि अबितनि?
प्रोफेसर निर्वाक।
-- होइ की छै जे अहां त' जे होइत जाएब से पछिलाक परिणाम। अहां के छी, से बूझै लेल जे टोहियाब' लागब तं दिलमाया सं शकुन धरि जाय पड़त। एक सं दोसर कटि नै ने सकैए!
-- शकुन मौसी, ई आत्मज्ञान! आ तखनि अहांक भटकन?
-- भटकने सं ने आत्मज्ञान अबै छै! आ, भटकन तं अहां कहै छी। हमर तं ई सुख थिक, संतोष थिक।'

अपना देशक लगभग सब भाषा मे ई संस्कृत कहबी प्रचलित अछि जे 'स्त्रियाश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्य:।' एहि कहबी मे दिक्कत एतबी अछि जे एहि ठाम स्त्रीक चरित्र कें आथाह मानल गेल अछि जखन कि  पुरुषक भाग्य कें। पुरातनपंथी लोकनि कें ई कहबी बड़ प्रिय। एहि मे स्त्री कें संदिग्ध क' क' देखल गेल अछि तें पितृसत्तात्मक व्यवस्था लेल सेहो ई अत्यन्त सटीक। एहि शास्त्रीय कुतर्क सं स्त्रीक हीन दरजा सुनिश्चित कयल जाइत रहल अछि आ ओकर आत्मविश्वास कें तोड़बाक लेल एकरा एक हथियार जकां इस्तेमाल कयल जाइत रहल अछि। एक चिन्तक-विचारकक रूप मे धूमकेतु सदा एकर विरोधी रहला। हुनकर साहित्य मे लिंगक आधार पर विभेदीकरण के मुखर विरोध सबतरि व्यक्त भेल अछि। एहि उपन्यास मे तं मानू सुरुहे मे हुनकर प्रतिज्ञा-वाक्य सामने आबि गेल अछि। पन्द्रह बरखक उमेर मे शकुन मौसीक बियाह भेलनि, आ जखन ओ सासुर जाय लगली, अपन पिता तं छलखिन नहि, हुनको पालक पिता प्रोफेसरेक पिता छलखिन, कुलीन परिवारक कोनो पिता जतबा परंपरावादी भ' सकैत अछि, सैह ओहो छला। विदा होइ काल तं ओ शकुन कें कहने रहथिन-- 'जाउ। आब दुख अहांक दूर भेल। अहां सन भाग भगवान सब कें देथुन।' मुदा, शकुनक मोटर जखन विदा भ' गेल, कथावाचक कें पिताक कहल ओ बात स्मरण एलनि जे ओ निरंतर बजथिन, आ कदाचित ओहू क्षण बाजल हेता-- 'चरित्र आ भाग्य ने दैव जनै छथि ने मनुख। से एक गोटेक नहि, स्त्री-पुरुख, दुनूक।' एहि उपन्यास कें जेना एहि प्रतिज्ञा-वाक्यक संपुष्टि होयबाक छलैक। जीवन कोना कोनो खिस्सो सं बेसी आश्चर्यजनक भ' सकैत अछि, एहि वाक्य कें ओ एतय अलग अलग शब्द मे बेर-बेर दोहरबैत रहला अछि। ने केवल पुरुषक, स्त्रयोक ओतबे।

कुल्लम दस परिच्छेद मे लिखबाओल गेल ई उपन्यास असमाप्त अछि। वास्तविकता तं ई थिक जे एखन तं एकर केवल पेनिये छानल गेल छल। मुदा, ध्यान देब तं पायब जे जे मोटा-मोटी समुच्चा खिस्सा एहि मे आबि गेल छै। ई बात भिन्न जे एतबी खिस्सा लिखब हुनकर उद्देश्य ने छलनि ने भ' सकैत छलनि। संस्कृतिक नितान्त गंहीर प्रश्न सब धरि हुनका पहुंचबाक रहनि। मनुक्ख कोना अविजेय अछि आ ओकर इतिहास आ संस्कार कोना एक लघु सीमे धरि ओकर बाट छेकि पबैत छैक। आदि-आदि। अंत मे जा क' विस्तारपूर्वक सचित्र वर्णन शुरू भेलैक अछि जे आखिर कोना ई संभव भेल जे धीर-गंभीर कुलीन विवाहिता कें अपन पतिक मामूली चपरासी सं प्रेम भ' गेलैक! लगनशील डाक्टर एहि रहस्यक खोज क' रहल छथि जे आखिर आदिवासी सभक दांत एते मजगूत किएक होइत अछि? कोन वनस्पति ओकरा सभक दिनचर्या मे, भोजन-विधान मे शामिल छै जकरा कारण एहन मजगूत दांत संभव होइत अछि! ओ अपन रिसर्चक पाछू ठीकमठीक ओहिना भूत बनल अछि जेना किंवदन्ती मे हमरा लोकनि वृद्ध वाचस्पतिक मादे सुनैत छी। मुदा, शकुन भामती नहि थिकी, हुनकर भवितव्य दिलमाया थिक। उपन्यास बिच्चहि मे रुकि गेल अछि, हम सब सहज अनुमान क' सकै छी जे एहि खिस्सा कें एखन बहुत दूर धरि चलबाक छल हेतैक।

अपन जाहि विशिष्ट शैलीक कारण धूमकेतु 'कथाकारक कथाकार' कहल जाइत छथि, तकर भरपूर दरस हम सब एतय पाबि सकै छी। कस्सल-कस्सल वाक्यावली, प्रगाढ़ बिम्ब, विदग्ध कथनानुकथन, ललित गद्यक चिर स्मरणीय वितान, सब किछु। गद्यक गठन तते तथ्यात्मक जे बीच के दुइयो वाक्य मिस भेने अहांक कथा-बोध भसिया सकैत अछि। निस्सन्देह, एहि उपन्यासक प्रकाशन मैथिली कथा-साहित्यक लेल एकटा घटना थिक।

@पटना, 6.8.2020

Tuesday, January 5, 2021

युवा कवयित्री रोमिशाक कविता: एक टिप्पणी


 तारानंद वियोगी


मिथिलाक किछु गनल-गुथल परिवार अछि जतय साहित्य आ कविता विरासत आ धरोहर जकां बरकरार अछि आ प्राय: सब पीढ़ी मे पढ़निहार-लिखनिहार लोक अबैत रहल छथि। रोमिशाक परिवार सेहो एहने एक सारस्वत परिवार थिक। कविताक  दरस-परस नेनपने सं हुनका जीवन मे शामिल रहलनि। औपचारिक रूप सं कविता लिखब जकरा कहल जाय, से ओ बहुत देरी सं शुरू केलनि। मुदा, साइत एहने मामला लेल ई कहबी बनल होइ जे देर आयद दुरुस्त आयद, रोमिशाक कविता एकदम साफ साफ, गंहीर संवेद्यता सं भरल, विचारशील, बिंब आ वर्णन दुनूक सधल संतुलन सं भरल पाठकक हृदय मे उतरि जाइत अछि। हम जखन हुनकर आरंभिक कविता पढ़ि रहल छलहुं तखनहु हमरा लेल ई विश्वास करब कठिन छल जे ई कोनो नवतुरिया कविक रचना थिक।

         रोमिशाक कविता पढ़ब जेना अपने जिनगीक आरपार देखब होइक, ओ अधिकतर गंहीर हार्दिकता मे पाठक कें उतारि दै छथि। ओहुना जीवन कें सतह परक घटना सभक भरोसें सही सही नहि बुझल जा सकैत अछि। सतह परक घटना बेसी सं बेसी एकटा तथ्य भ' सकैत अछि मुदा, 'जीवन' नहि जानि, एहन एहन कतेको रास तथ्य सब सं बनैत छैक। इहो जं कहब जे जीवन मात्र तथ्य थिक, सेहो नहि। तखन इंगित कें कतय राखबैक? आ काकु कें? आ कि कल्पनाशीलता कें? वा एहने एहन हजारो टा चीज कें, जे हमरा रोमिशाक कविता सब मे भेटैत अछि। जखन अपन कविता मे ओ कहैत छथि जे हम सब कोनो मृतात्माक बौक गीत सुनैत जिबैत छी, अथवा कहैत छथि जे घरक देबाल सब ठाढ़ रहैत रहैत अगुता गेल अछि, तं बुझनिहार बुझि सकैत छथि जे सभ्यताक आगू ओ केहन भारी महाप्रश्न ठाढ़ करैत छथि।

         हुनक प्रधान विषय छियनि जीवन, जकरा अधिकतर ओ स्त्रीक कोण सं देखैत छथि। हुनक स्त्री सौंसे सभ्यताक पता राखैवाली जागरूक स्त्री थिकी। यात्री जी कहल करथि जे नव कविक असली परीक्षा ओकर साहस सं होइत छैक। कारण, पढ़ि गुनि क' समर्थ भेला पर अपन सबटा कमी तं ओ दूर क' लेत, मुदा साहस कतय सं आनत? रोमिशा जे प्रश्न सब अपन कविता मे ठाढ़ करैत छथि ततय धरि कोनो युवा कवि प्रबल साहसिकताक बिना कखनहुं नहि पहुंचि सकैत अछि। हमरा पक्का भरोस अछि जे हुनकर कविता मैथिल स्त्रीविमर्श कें एकटा नब मोड़ पर पहुंचाओत।

         मैथिली मे मुक्तछंद प्रकृतिक कविताक चलन आब पचासो बर्ख सं ऊपर भेल। एतबा दिन मे ई आधुनिक शैली मैथिली मे पूरेपूरी घरबारी भ' चुकल अछि। अनेक कवि मैथिली कविताक कहन-शैली कें एहि कविताक बाना मे उतारि दमदार प्रयोग क' चुकल छथि। प्रयोग दमदार वैह जकरा पाठक स्वीकार करय। हमरा ई कहैत खुशी अछि जे मैथिली कविताक एहि नवीन उपलब्धि कें रोमिशा सेहो नीक जकां आत्मसात कयने छथि। पाठक कें चाही संप्रेषणीयता, जाहि सं कविक कहल बात ठीकमठीक ओकरा हृदय धरि उतरि जाय। एहि मामला मे हम रोमिशा कें पूरा सफल देखै छी जे जे बात हुनका कहबाक रहैत छनि से बहुत साफ साफ, बिना एको रती लटपटेने कि बामदहीन कयने कहि जाइत छथि। ई आत्मविश्वास कविक बड़ पैघ बल होइत छैक। कतेक बेर ओ विचार सं अपन बात शुरू करै छथि आ ओकरा बुद्धिमानीक संग कविता मे रूपान्तरित क' लैत छथि। किछु ठाम वर्णन सं तं कतहु बिंब सं शुरू करैत शब्द सभ मे डबडब कविता भरि दैत छथि। कहब जरूरी नहि जे एना क' पाएब तखनहिटा संभव जं कवि अपन अपन कथ्यक संग पूरा मानसिक साहचर्य बनौने हो आ से ओकर अनुभूति मे पूरा घुलि मिलि गेल हो। हुनकर बहुतो रास कविता सब एतय हमरा मोन पड़ैत अछि जे कि हमरा नीक लागल अछि आ हमर विश्वास अछि जे मैथिली कविताक हरेक साकांक्ष पाठक कें ई नीक लगतनि।

         रोमिशाक पहिल कविता-संग्रह आबि रहल छनि। एक यादगार अवसर थिक ई, रोमिशाक लेल आ मैथिली कविताक लेल सेहो। हमर बधाइ।

कोसीक जलप्रान्तर मे हेल-डूब


 ।।कोसीक जलप्रान्तर मे हेल-डूब।।


         तारानंद वियोगी


            पंकज पराशरक उपन्यास 'जलप्रांतर' ओहि किताब सभक बीच एकटा यादगार प्रकाशन थिक जे पछिला तीन-चारि साल के भीतर कोशी आ ओकर परिसरक बारे मे छपल अछि। उपन्यास एकटा गामक बारे मे अछि। ई गाम कोशी कातक एकटा गाम, यथा महिषी थिक। आस-पड़ोस के बहुतो गाम--बनगांव, चैनपुर, पड़री, बरियाही आदि आदि अपन सही-सही पृष्ठभूमिक संग आएल अछि। मुदा, बात ततबे नहि छैक। गाम अपन बहुत व्यापक विस्तार मे अछि। से भूगोल आ इतिहास दुनू मे।विषय जे छैक कोशी बान्हक निर्माण सं ल' क' ओकर परिणाम धरि, से जं एक दिस तीन सौ सं ऊपर रिवर-साइड के आ ताहि सं कतहु कैक गुना बेसी कंट्री-साइडक गामक नियति कें दूर धरि प्रभावित करै छै। एक। दोसर, आजादी बादक भारतक जे विकास-माडल रहलैक, तकर दूरगामी फलाफल कोना देशक जन कें प्रभावित-संतापित केलक, ताहि ईश्यू के अध्ययन एहि ठाम देखल जा सकैत अछि। तें गाम कोन अछि वा तकर नाम की थिक, एकर एतय कोनो खास महत्व नहि छैक। ततबे छैक जेना कि स्वयं पंकज एहि उपन्यास मे एक ठाम लिखने छथि--'कोनो गाम दिस सं जं कोसी जाइत अछि तं कोन-कोन तबाही मचबैत अछि, तकर मादे वैह कहि सकैत अछि जे ओहि दारुण स्थिति कें भोगने हुअए।' तें एतय गाम ओ सब आएल छैक जाहि सं पंकज जुड़ल छथि।


                     उपन्यास मे एकटा पढ़ुआ कका छथि। हुनकर मौअति कोशीक एही बन्हटुट्टा जलप्रलय मे होइत छैक। पढ़ुआ ककाक की नाम छलनि से कतहु नहि आएल अछि। ई साभिप्राय थिक आ एहि अवतरण के औपन्यासिक दृष्टि चकित करैत अछि। जं हुनका सही सही चिन्हबाक कोशिश करी तं हम सब चीन्हि सकै छी जे ओ भारतक महान स्वाधीनता आन्दोलनक, देश लेल सोचनिहार ज्वलित देसी मेधाक प्रतीक छथि। संपन्न घरक पढ़ुआ कका अपना जबाना मे इलाहाबाद रहै छला। ओ आजादीक निर्णायक युद्धक समय छल। गांधी जी हुनका व्यक्तिगत रूपें जनैत छलखिन, नेहरूक संग ओ राजनीति मे सक्रिय छला। इलाहावाद यूनिवर्सिटी मे डा. अमरनाथ झा हुनकर गुरु रहथिन। बी. ए. आ एम. ए. मे प्रथम स्थान पौने छला आ गुरु हुनका वि. वि. मे अध्यापक बहाल बहाल केने रहनि। सब छोड़ि छाड़ि क' ओ आजादीक संघर्ष मे सक्रिय रहला। देशक आजादीक बाद कांग्रेसक राजनीति जे पाटि पकड़लक, से सब देखि पढ़ुआ कका सक्रिय राजनीति सं चुपचाप एकात भ' गेला। ओ देखलनि जे 'जे लोकनि सैंतालिस सं पूर्व अंग्रेजी सत्ता के विरोध मे छला, शोषण आ अन्याय के प्रतिरोध करैत छला, सैह सब सत्ता पाबि क' मदोन्मत्त हाथी जकां अपन पयर तर मे देश कें रगड़ि रहल छथि। एहि देशक गरीब लोक सं किनको दरेग नहि।' विपक्षक राजनीति करथि से हुनका सं पार नहि लगलनि। पचासो बरस सं आब ओ कोसी कातक अपन गाम मे रहैत छथि, आ 'द हिन्दू', 'नेशनल हेराल्ड' आ 'हिन्दुस्तान टाइम्स' मे कोसी इलाका पर लेख आदि लिखैत छथि। 'विलेज डायरी' नाम सं हुनक किताब अंतर्राष्ट्रीय महत्वक प्रकाशक सब छपैत अछि। हुनका कोशीक जाबन्तो इतिहास बूझल छनि। हुनका  आंखिक सामने नेहरूक आजाद सरकार कोशी कें बान्हलक अछि, जकर खतरा कें देखैत गुलामीक दिन मे पराया सरकारो से करबाक हिम्मत नहि जुटा सकल छल। उपन्यासक एक पात्र कहैत छैक--'अंग्रेज सब कें कोसीक स्वभाव बूझल छलनि। एहि इलाका के भौगोलिक संरचना सं अवगत छला। बान्हक नफा-नोकसान के अनुमान रहनि, तें ओ सब बान्ह बनेबाक निर्णय कें टारैत रहला।' एहना ठाम तं ओ बुझू अंगरेज सरकार आ देशी सरकार, जकरा ओ कैक ठाम 'रंगरेज सरकार' के उपाधि प्रदान केलनि अछि, दुनू के पूरा गोत्र-विश्लेषण क' क' राखि देलनि अछि। एकटा प्रसंग बरियाही कोठीक छै जतय सीनियर विलियम राबर्ट जान कें कहने रहथि--'कोसीक पानिक रंग बदलैत रहैत अछि। लोक चाहय तं पानिक रंग के विश्लेषण सं एहि नदीक स्वभाव कें जानि सकैए। पानिक रंग सं एहि बातक भविष्यवाणी क' सकैए जे आगां ई नदी कोन रूप धारण करय जा रहल अछि।' दोसर दिस, विधान सभा मे लहटन चौधरी हिसाब देने रहथिन जे 'कोसी बान्ह के दू-तीन माइल धरि के क्षेत्र कें बेनीफिटेड मानल जा सकैए', जखन कि सहरसाक कलक्टरक रिपोर्ट रहैक जे 'बान्ह के बाहरक तीन किलोमीटरक एरिया जलजमावक कारण खेतीक लेल अनुपयुक्त भ' गेल अछि।' एहि सब तरहक खुलाखेल अन्हरमारि के अनेक संदर्भ एहि ठाम आएल छैक। उपन्यासक अंत मे होइ छै जे बान्ह टुटै छै आ कोशीक संग जीवन मरण के रिश्तेदारी निमाहै बला पढुआ कका ओहि जलप्रलय मे मारल जाइत अछि।


                 पंकजक ई उपन्यास सूचना सब सं लबालब भरल अछि। किछु बेसिये जे कतोक बेर छिलकि धरि जाइत अछि। मुदा, एक पाठकक रूप मे ई हमर समस्या भ' सकैत अछि। पंकज असल मे एहिना करय चाहला अछि। उपन्यास मे एकटा प्रसंग अबैत अछि जे 'नेशनल हेराल्ड' मे छपल पढुआ ककाक कोनो लेख, निश्चिते ओहो कोशियेक बारे मे छल, प्रधानमंत्री नेहरू पढ़ने छला आ हुनका चिट्ठी लिखने रहथिन जे 'अहांक लेख बहुत सूचनात्मक होइत अछि'। से प्राय: पंकजक उपन्यासकारक स्वभावे छनि। कतोक ठाम हुनक वस्तुनिष्ठ आलोचक हुनकर उपन्यास पर चढल देखाइत अछि।


।।दू।।


उपन्यासक मूल कथा मुदा, एक गरीब, कहू कि दरिद्रछिम्मड़ि ब्राह्मण परिवारक कथा थिक। परिवारक मुखिया बीसो झा आ हुनकर किशोरी बेटी अनमना कुमारी के कथा मुख्य रूप सं एलैक अछि। बीसो झा किए गरीब छथि, एतय धरि जे अपने गाम-समाजक पचपनियां परिवारो सं बेसी दुर्गत किए छथि, तकर पूरा रामकहानी उपन्यास मे एलैक अछि। क्यो ब्राह्मण भ' क' मजदूरी कोना क' सकैए, अथवा हर कोना जोति सकैत अछि, बीसो झा ताहि सामाजिक पृष्ठभूमिक लोक छथि। मिथ्याचार सं परिपूरित जीवनचर्या छनि। उदार नहि छथि। तकरा बदला कही कि अव्वल दरजाक कृपण छथि। पूर्वी तटबंधक जखन माटि भराइ हुअय लगलै, नीक दर पर मजदूरी रहैक, काजक कमी नहि रहै। तं आने किछु ब्राह्मण जकां ओहो मटिकट्टी मे मजदूरी करय जाइत छथि। ताहि लेल भिनसरबा राति मे बहराइ छथि आ दिनदेखार होइत होइत घर घुरि अबैत छथि जाहि सं इज्जति बचल रहय। ई फराक बात जे गाम मे आएल कोनो परिवर्तन नुकाएल नहि रहैत छैक। यैह बीसो झा बान्हक विरोध मे उकबा उठला पर जखन विरोधो मे आगुए आगू रहै छथि, तं एही गामक वाशिंदा मनसुख सदा हुनकर मिथ्याचार पर चुटकी लैत छनि--'अहां बान्ह के मटिकट्टी मे एतेक टाका हंसोथलियै, तैयो टनटन बोलै छियै बीसो बाबू! जेनही देखै छियै दही, तेनही कहै छियै सही?'

               मुदा, ओतय महत्वपूर्ण इहो अछि जे मटिकट्टी मे जे हुनकर काउन्टरपार्ट छनि, से हुनकर बेटी अनमना थिकी। ओ माटि काटने जाइ छथि आ बेटी छिट्टा उठा क' फेकने जाइत अछि। ओहि ठाम तं इहो बात आएल छैक जे मालजाल जे ओ पोसने छथि, तकर चरबाही सेहो हुनकर यैह बेटी करैत छनि।

            अनमना बड़ काजुल आ सब गुनक आगर। मुदा, अभावग्रस्त बीसो झा अपन एहू बेटी के बियाह ओहिना टाका ल' क' करय चाहै छथि जेना जेठकी के केने छला। बनगांव मे ताधरि, मने 55-57 धरि वैवाहिक सभा जारी छल। तकर वर्णन उपन्यास मे आएल अछि। एक साल हुसितो अगिला साल ओ रामपुरक कुटूम सं पांच सौ गनेबा मे सफल रहै छथि। एहि सं हम सब अवगत होइ छी जे मैथिल जातिक हृदयहीनता, नारीक प्रति, कोना गंहीर उपभोक्ता-मनोविज्ञान तक स्वभावतया व्याप्त छल;  एहि तमाम तथ्यक बावजूद जे ओ किशोरी कोन हद धरि एहि बीसो बाबूक कुलखान्दान लेल उपकारी अस्तित्व रखै छलि।

            कथाक एक भिन्न पाठ रामपुर गामक छै, जतय अनमनाक बियाह होइत अछि। ओहो कंट्री साइड के एक गाम थिक जे कोसीक हहारो सं बराबर के पीड़ित अछि। अनमनाक भाग्ये एकरा कहल जेतै जे ओ अपने सन श्रमशील पति पबैत अछि जे भविष्यक जीवनगति कें सम्हारि लैत छैक आ आगू ल' चलैत छैक। अनमनाक दियादनीक सेहो ओतय एक चरित्र आएल छैक जे विध्वंसक तं नितान्त अछि, मुदा मिथिला समाजक लेल अपरिचित किन्नहु नहि अछि। पंकजक अध्ययन कें पकड़ि क' कही तं एहि सब मे 'जाति' सेहो एकटा पैघ फैक्टर छैक। अर्थात कुलीनता। महादेव झा पांजिक तं एकाध ठाम ओ नामो लेलनि अछि। संकेत छैक जे जे जते पैघ कुलीन अछि से ततबे बेसी असामाजिक अछि, विध्वंसक अछि।

            उपन्यास मे चीनयुद्धक संदर्भ आएल छैक। ओहि मे रामपुरक एक बेटाक लगभग शहादतक जिक्र छैक। आ नेहरूक निधनक समाचार सेहो, एकर जनप्रभावक संग। ई सब अवान्तर प्रसंग जा जा क' नेहरूक विकास माडल सं भिड़ंत लैत छैक आ एहि जलप्रान्तर के कलहन्त कें आरो सघन करैत छैक। अनमनाक पति सदाशिव झा कटैया बिजलीघर के निर्माण मे जा क' अनस्किल्ड लेबरक काज करैत अछि, आ रोजगारक सुरक्षा अपन एहि गुणक कारणें प्राप्त क' लैत अछि जे असगरे ओ चारि लेबरक बराबर कर्मठता सं लैस अछि। एहनो कर्मठ लोक कें विवाह लेल पांच सौ टाका गनय पड़ल छल, ताहि सं हम सब बूझि सकै छी जे एखन हालसाल धरि कुलीनताक तुलना मे एतय कर्मठता कते तुच्छ छल।

            प्रसंगवश आरो कतेक रास बात सब जहां तहां आएल छै। ओही ठाम कटैयाक परदेसी मजदूर समाजक बीच हम सब देखै छी जे मैथिल लोक आ भोजपुरिया लोक मे की फरक छै। मैथिल अपन मैथिलीभाषी समाज मे जातीय उच्चताक बल पर तं जरूर शेर होइत छथि मुदा अनतय सामाजिकताक संस्कार-बल पर दोसरे लोक सब आगू रहैत एला अछि। से एहू ठाम अप्रतिभ सदाशिव कें भोजपुरिये लोकनि आगू बढ़बाक बाट देलकनि अछि, जखन कि 'अप्पन मैथिल भाइ' गाछ चढ़ा क' छव मारलकनि, मने अनभुआर सदाशिव कें सहरसा स्टेशन पर बजा क' अपने गुम भ' गेला।

            उपन्यासक एक पात्र फूल बाबू छथि जिनका बोरिस पास्तरनाक के उपन्यासक अनुवाद करैत देखाओल गेल अछि। ओ राजकमल चौधरी भ' सकैत छथि। तहिना एक पात्र पंडित गंगाधर झा छथिन, जिनका सत्यनारायण कथा बांचैत देखाओल गेल गेल अछि। आरो एहन अनेक लोक छथि। ई लोकनि महिषीक ऐतिहासिक व्यक्ति सब छथिन, मुदा हिनका लोकनिक चरित्र जगजगार भ' क' उपन्यास मे अपन अभिज्ञान कायम क' सकय ताहि मे पंकजक उत्साह नहि रहलनि अछि। कदाचित तकर आवश्यकतो नहि छल। बस एतबे बुझाएब पर्याप्त अछि जे पढ़ल-लिखल, पंकजक शब्द मे कही तं 'चेतार' लोकनिक ई विपन्न गाम थिक।


।।तीन।।


जलप्रांतर' मे भने कोसीक सांस्कृतिक पक्ष, जेना कोसीगीत आ अनेको अनेक मिथक नहि आएल हो, मुदा कोसी पर नियंत्रणक लेल कयल गेल मानवीय प्रयासक जाबन्तो इतिहास एहि मे आबि गेल अछि। फिरोज शाह तुगलकक सेना कोना कोसी कें पार क' क' पहिल बेर एहि दिसका भूभाग कें आक्रान्त केने छल, कोना लक्षमणसेन कि हरिसिंहदेव एकरा बन्हबाक पहिल संकल्प मे जोश सं भरि क डेग उठौने छला, कोसीक अध्येता लोकनि, बुकानन-फर्गुसन सं ल' क' भूपेन्द्रनारायण मंडल आ परमेश्वर कुमर धरि अलग अलग समय पर कोन अपन अपन निष्कर्ष पर पहुंचल छला, कोना नेहरू सरकार जखन एकरा बन्हबाक शासनपूर्वक आयास केलक तं कोन कोन लोकक की सब आकलन छलनि, बान्ह बनि क' तैयार भेलाक बाद जखन पहिल पहिल बेर परिणाम सामने आएल छल तं कोना बान्हक संगहि विकासक मिथक टूटल आ तखन कोना सशस्त्र बल एहि लोकक मुंह बंद केलक---बहुतो रास बात छैक जकरा काल्हि जखन क्यो जानय चाहता तं हुनका पंकजक एहि उपन्यास धरि पहुंचय पड़त।

             पंकजक लग मे तमाम तरहक ऐतिहासिक तथ्य सब छनि आ तकरा ओ बहुत आत्मविश्वासपूर्वक एहि ठाम प्रस्तुत केलनि अछि। हुनक आत्मविश्वास कें देखैत तथ्यक विश्वसनीयताक प्रश्न कतहु पृष्ठभूमि मे ससरि जाइत छैक। यद्यपि कि औपन्यासिक कृति हेबाक कारण उपन्यासकार कें  तथ्यात्मकताक मामला मे छूट पेबाक अधिकार बनैत छनि मुदा पंकजक आत्मविश्वास एहि छूट सं नासकार जाइत देखाइत छथि। ओ अपना पर जिम्मेवारी लेबाक हद धरि विश्वस्त भाषाक प्रयोग करैत देखल जाइत छथि। लंबा लंबा ऐतिहासिक प्रसंग सब वृत्तान्तक रूप मे परस्पर वार्तालापक क्रम मे आएल अछि, जकर औपन्यासिक औचित्यक जस्टीफिकेशन मे पंकजक कहब छनि जे हुनकर कैकटा पात्र 'लेक्चर बड़ दैत अछि।'


।।चारि।।


हम पहिनहु कतहु कहने छी जे मैथिली उपन्यास अपन महान इतिहास हेबाक बादो पछिला किछु समय सं पतनशीलताक दौर सं गुजरि रहल अछि। रहस्य, रोमांच, कैरियरिज्म, अध्यात्म आदिक महिमामंडन करैत, लोकोपयोगिता आ लोकप्रियताक नाम पर आत्मदंभक महागाथा लिखि क' पाइक बलें ओकरा प्रकाशित भने बारंबार करबैत चलल जाय, हमरा सभ कें नहि बिसरबाक चाही जे उपन्यासक यदि सामाजिक सरोकार नहि छैक तं ओ रचना सुच्चासुच्ची एक आत्मरति थिक। एहना मे एहि किताबक प्रकाशन निश्चिते एक उल्लेखनीय प्रसंग थिक। मिथिलाक संग कयल गेल सरकारी वंचनाक सब सं भीषण उदाहरण कोसी बान्ह थिक आ तकर पृष्ठभूमि एहि उपन्यासक विषय बनल छैक, ई निश्चिते पंकजक कृति कें एक आरंभिक सफलताक द्योतक थिक।

           तखन छै जे उपन्यासकलाक दृष्टि सं एकरा अवश्ये एक पछुआएल कृति मानल जाएत। एहि उपन्यासक रचनाकार अपन शिल्प मे जाहि ठाम छथि तकर तुलना साइत कोनो पछुआएले उपन्यास संग कयल जा सकय, जखन कि सामाजिक सरोकारक प्रश्न पर ई कतहु बेस आगूक वस्तु थिक। विषयक बारे मे बहुत रास तथ्य हुनका बूझल छनि, तकरा पठनीय बनेबाक लेल ओ एक कथा परिपाटी विकसित क' लेलनि अछि आ बहुत कौशल संग तथ्य कें कृति रूप मे परिणत केलनि अछि। फल भेल अछि जे मार्मिकता सं भरल सूचना तं उपन्यास मे खूब छैक मुदा स्वयं मार्मिकताक अभाव अछि, कारण जीवन जीबाक एतय सूचना अछि स्वयं जीवन कें जीयल जाइत नहि चित्रित कयल जा सकल अछि। एकर पता स्वयं उपन्यासकारो कें छनि आ ओ अपन सीमा कें गछितो छथि। कहै छथि--'कथाकारक लेल आवश्यक अछि जे ओ अपन कथाक पात्र सं नीक जकां परिचित होथि। हम जतेक परिचित होइत छी, ततेक कथाक कोसी-धार मे हेल-डूब कर' लगैत छी।' अथवा ई जे 'हम कवि छी, कथाकार नहि।' मुदा, जतबा ई जीवन आएल अछि, उदाहरण लेल अनमना आ सदाशिवक प्रसंग सब मे, से अविस्मरणीय बनि पड़ल अछि। एहि रचना कें मोन राखल जेबाक लेल इहो कोनो कम नहि छैक।

           तखन इहो बात छै जे पंकज अपन ई उपन्यास लगैए, अनेक दवाबक बीच लंबा समय लगा क' लिखलनि अछि आ एकर संपादन मे जतेक परिश्रम करबाक चाहिऐक सेहो नहि क' सकला अछि। तकर फल भेल अछि जे अनेक बात, दृष्टान्त, बिंब, एतय धरि जे शब्दावली आ कहबी धरि बेवजह के दोहराओल गेल अछि। एकरो उदाहरण कैक ठाम छै जे जे बात वाचक पहिने कहि चुकल रहैत छैक, ठीक वैह बात पात्रक मुंहे फेर सं दोहराओल जाइत छैक। कहि सकै छी जे ई दोहराव बातक वजन पर जोर देबा लेल कयल गेल हो, मुदा ताहि लेल जे औपन्यासिक रचाव हेबाक चाही, तकर हम सब एतय अभाव देखै छियनि।

         असल मे, एहि उपन्यासक असली ताकत कोसी कें उपन्यासक रूप मे रचबा मे नहि, ओकरा एक जरूरी ईश्यू बना क' आगामी पीढीक सामने पेश करबा मे छै। व्यक्ति-रूप मे स्वयं एक कोसी-पुत्र हेबाक नातें एहि काज कें जेना ओ अपन एक कर्तव्य बुझलनि अछि। भूमिका, जे किताबक बीच मे आएल छैक, मे ओ कहै छथि--'दू लाख जनसंख्याक चारि लाख हाथ ऊपर दिस घिचबाक याचना करैत देखार पड़ैत अछि। अपन जन्मो सं पहिने जा क' हम हुनका सभक हाथ पकड़ि लेबय चाहैत छी। हुनका सभक नोर अपन गमछी सं पोछि देब' चाहैत छी, मुदा समय के सरकार हमर ठोंठ मोकि दैत अछि।'

               से, हमरो लगैत अछि जे अपन रचना-भूमिक प्रति ई हुनक ऐतिहासिक दाय छलनि जकरा निश्चिते एहि रचनाक संग एक यादगार रूप ओ द' सकला अछि।


धराशायी हेबाक समय: कविता मे कोरोना-काल


 ।।बाजलि सपना।।


आउ मीत, आउ

हम सब खूब गहिया क' करी गराजोर 

बिसरी कि मानवीय स्पर्श खतरनाक छै कोरोना-काल मे

अनठाबी जे हमरा सं पटि सकैए अहां कें

कि अहीं सं हमरा


कते दिन पर भेल अछि भेंट

तरसैत रहल छी अइ तमाम समय

ओइ मीत लेल

जकर भेटनाइ समय कें दैत हुअय चेहरा

स्पर्श नै, संवाद नै

तं कथी छी जीवन?


कते विद्रूप छै ई समय

जखन लोक लग लोक नै

जखन कते जड़मति करैत विलाप

--ठीक छल पूर्वजक बनाओल अस्पृश्यता नियम, ठीक छल

जखन दिल मे आह

मुदा आह के राजदार नै


बहुत जिबिये क' की करब मीत हम-अहां

जखन कि देखि रहल छी

बेकसूर सब कें नित्तह जाइत मरघट


आउ आउ

शाश्वत होइ कनी

गहिया क' करी गराजोर।


।।नुक्काचोरी।।


अपने घर मे अपने नुकाएल छथि जोगीलाल

घर मे रहता बंद तं जमराज कें पहुंचब कठिन रहतै!


चारू दिस छै प्रचार

पैंसठ पार के आब बचब मश्किल

उमर देखि घेरै छै कोरोना

योद्धो लोकनि नवतुरिये कें बचबै छथिन

रहलै सुविधा तं देखल जेता बुढ़ानुस


जोगी कें तेसरें पैंसठ पार भ' गेल छनि

मश्किल छनि आब


ओ पोता संग खेलाएब धरि छोड़ि देने छथि

बेटा संग गपियाएब धरि

भरि भरि दिन पड़ल रहता ओछाओन पर

करैत रहता आंह-ओह

बेटो आब पुतहुए मारफत जनै छनि कुसल छेम


जमराज तं मारतनि, जहिया पकड़तनि

जोगी कें तं पैंसठे मारि देलकनि अछि कोरोना मे!


।।प्रवासीक विलाप।।


यौ जी, हमरा ढाठू नै एना

परदेस रहै छी तं‌ ई नै मतलब जे हमर ई गां नै छी

आ, अहां की हमरा रोकै छी भोला कका

हमर बाप अहांक इयार नै रहथि

कुश्ती नै लड़ी अहां दुनू पंडीजी पोखरि पर

एको मिनट बितैत रहय दुनू इयार बिना?

आइ एना करै छी

चिन्हल कें अनचिन्ह करै छी!


आ हौ नुनू, तों हमरा की रोकबह

तोहर बापे हमर संगी

मैट्रिक हम सब संगे कयने रही

संगे कमांड केने रही सौंसे अलजेबरा

अइ हिसाबें देखह तं हम तोहर पित्ती


यौ, नै मोन मानैए 

तं हमरा अहां सब कोरेन्टीन मे राखि दिअ' परिवार समेत

क्यो नै आबथि पन्द्रह दिन हमरा आंगन

हमहू सब आंगन सं कखनो बहराएब नै

जे वाजिब छै, से करू

मुदा, ई की जे गामे नै ढुकय देब

ई गाम हमरो गाम छी यौ

हमरो घर अछि अही गाम


एहन अन्याय नै करू मुखिया जी

कते मश्किल सं जान बचबैत घुरलहुंए गाम,

आब कतय जाएब

हे राम, आब कतय जाएब?


।।ग्लोबल विलेज।।


इटलीक सीमा फ्रांस लेल बन्न

फ्रांसक सीमा जर्मनी लेल

जर्मनीक सीमा अमेरिका लेल

अमेरिकाक सीमा सभक‌ लेल बन्न


सब अपना अपना घर मे कैद

पहिने जखन ककरो किछु होइ तं सब दौड़य

सब पठबय अपन अपन संसाधन

आब सभक सीमा सभक लेल बन्न

सब अपना अपनी मे सीमित

अपने कानै मे सभक दिन-राति पार


सैह देखियौ

ई ई भारी भरकम ग्लोबल विलेज तं 

पचीसो साल‌ नै टिकि सकल!


।।सब सं नीक बात।।


दुख कतबो भोगय पड़य गरिबहा कें


भोगले देह भोगि सकैए दुक्खो

जतेक भटकय पड़य दर-दर

जत्तेक निछावर करय पड़य प्राण

सब सं नीक बात ई

जे कोरोना बीमारी गरिबहा संगे पैदल नहि आएल

आएल हवाइ जहाज सं

मोटका मोटका आंखि बला सब धोधि बला सब अनलनि कोरोना


बात बात मे कहथि मठोमाठ

--गरीब रहैए गंदा, पटाबैए बीमारी

गरीब सौंसे देस लेल कलंक थिक

तेना कहथि मठोमाठ 

मानू देस अंबानीक फैक्ट्री मे बनल कोनो हाइटेक माल हो


करेजगर सं करेजगर कें जे थरथरा दियय

काज तं एहन करैत रहला सब दिन गरिबहे

मुदा, सब सं नीक बात ई

जे कोरोना आनल गेल हवाइ जहाज सं।


।।मनुक्ख जनैत अछि अपन अंत।।


इतिहास उनटा क' देखू

बरु आब तं इतिहासो उनटेबाक नहि काज

गूगल कहि देत समुच्चाक समुच्चा खिस्सा


सौ बरस पहिने ई भेल छल, ओ भेल छल

चलल छल प्लेग, चलल छल आरो अनेक अहिना सर्वत्र

प्लेगक मार्मिक मार्मिक अनुभव 

जहां तहां साहित्य मे छिड़ियाएल भेटत

अहिना निरर्थक भेल छल चिकित्सा-तंत्र

अहिना शासन-प्रशासन आएल छल पेश

अहिना असहाय रहय मनुक्ख, निरवलंब


एहि सौ बरस मे कते बदलल समय

आइ चिकित्सा अपन विजयक डंका पिटैत अपनहि

आइ सौभाग्यशाली देश विश्वगुरु

आइ लोकक हाथ मे दूटा पाइ, रहबा लेल घर

मुदा आइयो मनुक्ख असहाय ओहिना

मनुक्ख निरवलंब ओहिना


कहै जाइ छथि वेत्ता लोकनि

सौ साल पर अबैत रहल अछि एहने महामारी

अइ बातक अपन साक्ष्यो छै,

मुदा इहो कहै जाइ छथि वेत्ता लोकनि

आब हरेक दस साल पर आएत,

मोन राखू, हरेक दस साल पर।

साक्ष्य नै छै एहि भविष्यवाणीक, ने छै तर्क

मुदा एक एक मनुक्ख कें लागि रहलैए पक्का

जे वेत्ता लोकनि ठीक कहि रहल छथि


सत्य जे, तकरा जनैत अछि मनुक्ख

भने क' नहि पाबय स्वीकार स्वार्थवश कि प्रमादवश

थिक तं ओ ब्रह्माण्डेक एक पिंड

जनैत जरूर अछि अपन अंत

थरथर कंपैत अछि।