Tuesday, January 6, 2026

हमरा लोकनिक भाइ साहेब: राज मोहन झा

                     पुण्य स्मरण

                     ```````````


. ************

            

--डाॅ. भीमनाथ झा

         ...÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷

       ई हमरा लोकनिक भाइ साहेब छला। उपेन्द्र दोषीक मुँहसँ हिनका प्रति अनायास बहरायल ई सम्बोधन मित्रमण्डलीमे लगले परिव्याप्त भ’ गेलनि। मैथिली साहित्यक पाठक आ प्रेमी लोकनि हिनका राज मोहन झाक नामसँ जनैत छथिन। मुदा, हिनक मूल नाम छलनि राम मोहन झा। ई नाम पितामहक राखल छलनि। एही नामसँ ई एम.ए. कयने रहथि एवं बिहार सरकारक श्रम एवं नियोजन विभागमे वरिष्ठ पदाधिकारी रहथि। राम मोहनकेँ राज मोहन पछाति ई स्वयं क’ लेने रहथि। ई हिनक साहित्यिक नाम थिकनि जाहिसँ ई विख्यात भेला। घर-परिवारमे पुकारक एक टा आर नाम रहनि, जेना अधिक गोटेकेँ रहै छै, हिनक रहनि– गोपालजी।

.     राज मोहन झा स्वनामधन्य छला। माने, हिनक परिचय लेल हिनक अपने कृतित्व पर्याप्त छलनि, पिता-पितामहक साहित्यिक यशस्विताक सोङरक प्रयोजन नहि छलनि। ओ अतिरिक्त गौरव छलनि हिनका लेल, जे कदाच कोनो विशिष्टे भाग्यशालीकेँ प्राप्त होइ छै।

.      भाग्यशाली तँ ई छलाहे। अपन समयक मैथिलीक शीर्षस्थ साहित्यकार पं. जनार्दन झा जनसीदनक पौत्र एवं आधुनिक युगक ‘गद्य-विद्यापति’ प्रो. हरिमोहन झाक ज्येष्ठ पुत्र होयब असाधारण भाग्यक बात थिकै। तकर हिनका गौरवो छलनि, ओहि प्रतिष्ठाक सुरक्षाक दायित्वबोधो छलनि, ओहि सम्पत्तिक संरक्षाक उद्योगो कयलनि, किन्तु अपन साहित्यिक व्यक्तित्वकेँ ओहि साम्राज्यक प्रभाव-क्षेत्रसँ आरम्भेमे मुक्त क’ लेलनि, बाहर आबि अपन रुचिक कलम लगौलनि, जकर फलकेँ ‘राजमोहन-खास’ कहि सकै छी। ओ कथा हो, निबन्ध समीक्षा हो, सामयिक टिप्पणी हो कि पत्र-सम्पादन हो, एत’ धरि जे चिट्ठी-पत्री वा वार्तालाप अथवा बहसे किए ने हो, सभमे ‘राजमोहन-खास’क भिन्ने सुवास भेटै छल। मैथिलीक पाठककेँ आगुओ ओ सुवास भेटैत रहत, जे आनसँ किछु फराक लगैत रहत।

.      हिनक व्यक्तित्व विरोधाभाससँ भरल छलनि। सामान्य लोक विरोधक अर्थमे विरोधाभासक प्रयोग करै छथि, जखन कि दुनूक अर्थ भिन्न-भिन्न थिक। विरोध थिक परस्पर विपरीत होयब– बातमे, विचारमे, स्वभावमे, उद्देश्यमे आदि-आदि। विरोधाभासमे विरोधक आभास टा होइ छै, वस्तुत: विरोध रहै नहि छै। होइ छै जे विरोध छै, मुदा वास्तवमे विरोध होइ नहि छै, अपितु पूर्वकथनक समर्थने होइ छै। तेँ साहित्यमे विरोधाभासकेँ अलंकार कहल गेलै अछि, उक्ति-चमत्कार मानल गेलै अछि।

.      भाइ साहेब एते श्रेष्ठ साहित्यिक परिवारक छला, अपनहुँ विशिष्ट लेखक रहथि, पैघ अफसर रहथि, बड़का-बड़का लोकसँ सम्पर्क रहनि, तथापि मामूलीसँ मामूली लोकसँ मित्रता राखथि, नवसँ नव लेखकसँ आत्मीयता जोड़थि, साहित्यमे नवप्रवेशियोक संग घंटा दू घंटा टहलि लेथि, संगहि जलपान-चाह करथि, ओकर जँ किछु नीक वस्तु लगनि तँ तकर व्यापक स्तरपर चर्चा करथि, नीक नहि लगनि तँ समक्षहुमे मिथ्या प्रशंसा नहि करथि, मार्गदर्शनो नहि करथि। अपन घनिष्ठ मण्डलीमे कदाच कखनो कटु भैयो जाथि, मुदा साहित्यिक कली लग हरदम मृदुले बनल रहथि। विषयकेँ कखनो हल्लुक ढंगे नहि लेथि, सभ खन अपेक्षित गम्भीरताक निर्वाह करथि। से गपोसपोमे, सामूहिक वार्तालापोमे, गोष्टी-संगोष्ठियोमे। युवातूरक संग तँ तते घुलि-मिलि जाथि जे ‘मान्य कथाकार राज मोहन झा’ लगले ‘भाइ साहेब’ भ’ जाथि, हिनक मित्र मण्डलीक ओ सदस्य बनि जाय। मुदा, जखन कखनो विषयपर लिखथि तँ ककरो ‘रोच’ नहि राखथि। उचित बात ने गोड़ि क’ राखथि, ने तोड़ि-मरोड़ि क’ बाजथि, साफ-साफ जोरसँ बाजथि, झिकझोड़ि देथि। तेँ कहलहुँ जे विरोधाभासी व्यक्तित्व रहनि। ई गुण विरल लोकमे पाओल जाइछ।

.      पटना बिहारक राजधानी रहलाक कारणे प्रदेशक राजनीतिक-सांस्कृतिक- साहित्यिक केन्द्र स्वत: भ’ गेल अछि। विश्वविद्यालय आ सचिवालय रहलासँ सभ दिन मिथिलोक बुद्धिजीवीक ओत’ जमघट रहल अछि। 1960 मे साप्ताहिक ‘मिथिला मिहिर’क पुन: प्रकाशन शुरू भेलाक बाद तँ मैथिली साहित्योक प्रधान केन्द्र मानल जाय लागल। उतार-चढावक दौड़ अस्वाभाविक नहि, ताहि हिसाबेँ 1970 आ 80क दशकक युवासाहित्यकारक जुटान आ सक्रियताक उठान-काल छल। प्रभासजी-गुंजनजी, प्रवासीजी-कुलानन्दजी, रमानन्द झा रमणजी-सुकान्तजी, मुखियाजी-बटुकभाइ (गौरीकान्त चौधरी कान्त- छत्रानन्द सिंह झा), शशिकान्तजी-पूर्णे्न्दुजी पहिनेसँ सक्रिय रहथि। राँचीसँ किछुए आगाँ-पाछाँ मोहन भारद्वाज आ उदयचन्द्र झा विनोद, राजमोहनजी (दिल्लीसँ, मुदा मानल जाथि ई राँचिए ग्रुपक) आ उपेन्द्र दोषी तथा हमहूँ पटना पहुँचि गेलहुँ। पटना क्रमश: अग्निपुष्प, विभूति आनन्द, केदार कानन आदिकेँ मैथिलीसँ जोड़ैत नव-नव परती तोड़ैत रहल।

.      भाइ साहेबक नोकरी बदलीवला रहनि। अस्सीक दशकमे ओ बोकारो, फेर दरभंगा गेला, पुन: पटनामे स्थापित भ’ गेला। ताहि सभसँ पहिने मुजफ्फरपुर, राँची, दिल्ली आदिमे सेहो पदस्थापित छला। भाइ साहेब जत’ रहला, सदा सक्रिय रहला, मैथिली लेल सोचैत रहला, चिन्तन करैत रहला, आन सभकेँ चरियबैत रहला, सभ टा गतिविधिक टटका जानकारी रखैत रहला, जत’ जरूरी बुझथि हस्तक्षेप करैत रहला। ओ जत’-कतहु रहला, अपन मित्रमण्डलीसँ पत्राचारक माध्यमे लगातार जुड़ल रहला, अपन गतिविधिक जानकारी दैत रहला, हुनक लैत रहला। जत’ आवश्यक बुझथि, टोकैत रहला। 

       भाइ साहेब आदर्श पत्रलेखक छला। हुनक पत्र बहुत आत्मीय, साफ-साफ, मैथिलीक अद्यतन गतिविधिक सूचनासँ सज्जित, प्राप्त जानकारीक संप्रेषण एवं नवीन जानकारी पयबाक उत्कंठासँ ओतप्रोत रहै छल। बहुतो मित्र लग हुनक बहुतो पत्र होयतनि। आब आवश्यक अछि जे हुनक उपलब्ध पत्रक संचय कयल जाय आ तकरा एक ठाम प्रकाशित क’ देल जाय। भाइ साहेबक बेछप व्यक्तित्व हुनक पत्रोमे साकार भ’ गेल अछि। हुनक पत्रक प्रकाशन ताहि समयक मैथिली जगतक सम्पर्क आ गतिविधिक ‘आँखि देखल’ विवरण तँ प्रस्तुत करबे करत, संगहि जकरा कहल जाइछ ‘पत्र-साहित्य’ (साहित्य पत्रमे), तकरो आदर्श रूप उपस्थित करत।


       हम राँची जीविकाक उदेसमे जहिया गेलहुँ, ताहिसँ किछु पहिनहि ई डेपुटेशनपर दिल्ली चल गेल रहथि। मुदा, राँचीक बसातमे हिनक व्यक्तित्वक सुवास गमगमाइत छ’ले। साहित्यकारक आन-जान पुस्तक भंडारक दोकानपर लगले रहै छल, उपेन्द्र दोषीक मुस्कानक संगहि ‘बचका’क जलपान, चाह-पान आ भाइ साहेबक कोनो-ने-कोनो आख्यान भेनहि। हमरो कान ताहि लेल लालायित रह’ लागल। किनको नाम हिनक पत्र अबनि तँ तकर वाचन होइ छलै, पुनि विश्लेषण चलै छलै। संभव थिक, क्यो जन बन्धु– दोषीजी कि विनोदजी कि मोहन भारद्वाजजी–  नवतुरिया मण्डलमे एक जन नवागन्तुकक प्रवेश द’ किछु लिखि देने छल होयथिन। तकर बादक हिनक पत्रसभमे हमरो विषयमे किछु जिज्ञासा, किछु उत्कंठा रह’ लगलनि। तथापि, हम अपनामे ई साहस नहि जुटा सकलहुँ जे हिनका पत्र लिखियनि, यद्यपि बन्धु लोकनि प्रेरित करथि। हमरा लोकनिक सहयोगी कविता-संकलन ‘धूरी’ राजमोहनेजीकेँ समर्पित भेल छनि।

       हम 1973 क आरम्भमे पटना ‘मिथिला मिहिर’मे आबि गेलहुँ। किछु नव करबाक उत्साहमे ‘मिहिर’मे एक विज्ञप्ति प्रकाशित भेलै, जाहिमे लेखक लोकनिसँ नव तरहेँ रचनाक आमन्त्रण कयल गेल छलनि। लगले दिल्लीसँ हमरा नामे राज मोहनजीक पत्र पहुँचल। पत्र लंबा छल, अनौपचारिक छल, आ जेना मन अछि, एना आरम्भ भेल छल–  जहिया सुनलहुँ जे अहाँ ‘मिथिला मिहिर’मे आबि गेलहुँ अछि, तहिया भेल जे आब मिहिरक स्वरूप बदलत, अहाँक अयने किछु नव बस्तु आओत, टटका स्वाद भेटत। आइ जखन अंक आयल अछि तँ ओहिमे एतबा परिवर्तन अवश्य देखलहुँ अछि जे लेखक लोकनिकेँ लिखबाक पाठ धरि नीक जकाँ पढ़ाओल गेलनि अछि। एना लिखू, एहन रचना लिखू, एतबाटा लिखू– माने सभ टा लेखके करय, सम्पादक किछु नहि करय! एकर अर्थ तँ ई भेल जे जँ हमर कहल नहि करब तँ मिहिर एहिना रहत! माने सम्पादक किछु नहि करता। एहिसँ स्पष्ट भ’ गेल जे अहूँ किछु नहि करब। मिहिर जहिना चलै अछि, तहिना चलैत रहत। आदि-आदि।

       एही आशयक छल हिनक पहिल पत्र। हमर तँ सिट्टी-पिट्टी गुम भ’ गेल। मुदा, एहिसँ एतबा तँ भेल जे धाख हमर छुटि गेल आ पत्र लिखबाक अवसर भेटि गेल। पत्राचारक क्रम चालू भ’ गेल। लगातार पत्र आब’ लागल। किछु मासक बाद स्वयं पटना आबि गेला। तकर प्राते मोहन भारद्वाजजीक डेरापर पहिल भेट भेल छल हिनकासँ।

                           (26. 4. 2016)

Monday, January 5, 2026

अपना-अपना ठाँव (मैथिली कहानी)


 मैथिली कहानी

तारानंद वियोगी

      

दुर्गापूजा की छुट्टी में मनोज गाँव आया था। पिछली रात को ही वह पहुँचा था। सुबह सोकर उठा तो घर-दुआर, बाड़ी-झाड़ी के मुआयने पर निकला। बाड़ी में काका ने गेन्दा और तीरा के फूल लगाये थे। पौधों की जड़ों में ढेर गंदगी जमा थी। सूखी-मुरझाई डाल-पत्तियाँ फूल के पौधों से लटकी पड़ी थीं। यह सब बगीचे के आकर्षण को कम करता था। मनोज ने खुरपी निकाली और पौधों की चौबगली सफाई करने लगा। कि तभी हड़बड़ाए हुए-से काका सामने आकर खड़े हो गये।

          'चलो-चलो, जरा दालान पर चलो।'-- काका बोले। काका बहुत घबराये हुए-से थे, जैसे कोई अनहोनी घटित हो गयी हो, इतने! मनोज समझ नहीं पाया कि आखिर बात क्या हो सकती है। काका से पूछा-- किसी को कुछ हुआ क्या? उसके स्वर में भी जैसे घबराहट भर आई थी।

            काका ने उसी घबराहट के साथ जवाब दिया-- 'नहीं नहीं, किसी को कुछ हुआ नहीं। वकील साहब आए हुए हैं।'

              यक-ब-यक मनोज समझ नहीं पाया कि कौन-से वकील साहब आए हैं कि काका इतनी घबराहट में हैं। गाँव में चार अलग-अलग वकील साहब थे। इनमें से एक से तो मनोज की दोस्ती भी थी। लेकिन वह अगर आये होते तो काका इस तरह घबराते क्यों? फिर भी मनोज ने पूछा-- सन्तू जी आए हैं क्या?

      -- 'नहीं नहीं, वो नहीं, पलिवार वाले वकील साहब आए हैं।'

            ओ....... लंबा खींचते हुए मनोज 'ओ' बोला। उसे भीतर कहीं से हँसी आई। फिर लगा कि नहीं, हँसने से काका को दुख हो सकता है। वह मुस्कुराकर रह गया।

            पलिवार वाले वकील साहब गाँव के नामी बेवकूफ, जिसे मिथिला में बूड़ि कहा जाता है, माने जाते थे, यानी हँसी के पात्र, बेढंगे। लोग उन्हें खिझाकर आनंद पाते। कभी वकील साहब रास्ते से गुजर रहे होते, गाँव के किसी लोफर की नजर उनपर पड़ी नहीं कि मामला उलझ जाता। कोई पूछ रहा होता-- 'आप अभी तक मरे नहीं वकील साहब?' वह कुछ जवाब देते कि इससे पहले दूसरा नौजवान टूट पड़ता-- 'अभी तक नहीं मरे, इससे क्या? अब नहीं बचेंगे, सो पक्का है। जाँच कर लो, जब ये चलते हैं तो टांगें आगे-पीछे आगे-पीछे होती रहती हैं! बोलिए न वकील साहब, ये सही बात है कि नहीं?'

                साक्षात यमराज सामने उपस्थित हों, तब भी वकील साहब शायद इतना नहीं डरते, जितना इन बेहूदों से डरते हैं। जान बचाने के लिए वह हारे हुए कुक्कुर के समान दांत चियार देते-- 'हां अओ! आपलोग उचित कहते हैं। देखा न जाए, भोजन करने के पश्चात मेरी भूख भी मर जा रही है। लक्षण तो स्वयं मुझको भी अच्छा नहीं दीखता। हें हें हें...'

           लेकिन वे बेहूदा लड़के वकील साहब की इस दांत-चियारी से बिलकुल भी न पसीजते। कोई उनकी आँखों का चश्मा छीन लेता। वकील साहब बड़े ऊँचे पावर का चश्मा पहनते थे। चश्मा के बगैर उन्हें कुछ दीखता नहीं। लड़के उनका चश्मा जमीन पर गिरा देते और उन्हें कहते कि खोज लें। रास्ते पर झुककर अपने दोनों हाथों से वह चश्मा ढूँढ़ने की कोशिश करते। वह रुआँसा हो जाते। लड़के फिर भी नहीं पसीजते। कोई उन्हें उँगलियां दिखाकर गिनने कहता तो कोई दूसरा पीछे से उनकी धोती का ढेका खोल देता। बहुत सारे लोग जमा हो जाते। सब मिलकर हुले हुले करते। सबको आनंद आता।

                तो, लुच्चे-लफंगों से वकील साहब बहुत दबकर रहते, बचकर निकलने की जुगत सोचा करते। लेकिन, ठीक यही महाशय जब भले आदमियों, पिछड़े-दलितों के सामने होते तो उन बेचारों पर हुकूमत चलाने के लाख-हजार गुर उन्हें मालूम थे। कमजोर वर्ग के लोग वकील साहब की नजरों से ठीक उसी तरह बचने की कोशिश करते, जैसा ये महाशय खुद लुच्चे-लफंगों से बचने के लिए करते थे। वकील साहब की खास विशेषता यही थी कि इस गाँव के मूल वाशिंदों के वंशधर थे। हरसिंहदेव के जमाने से आजतक उनका परिवार इसी गाँव में बना रहा, इसे बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। बाकी जो ब्राह्मण थे, अलग-अलग जमानों में वे अलग-अलग कारणों से अलग-अलग स्थानों पर जा बसे। इन निर्वासित हो चुके लोगों को वकील साहब बहुत गलियाते। इस गाँव के मूलवासी होने के कारण आज के जमाने में भी इस गाँव को वह अपनी जागीर समझते थे। कहा जाता था कि बीते जमाने में इस इलाके की जमीन्दारी भी इन्हीं लोगों के पास थी। मुगल बादशाह ने इस खान्दान की सेवा से प्रसन्न होकर 'चौधरी' की उपाधि प्रदान की थी। आज तक ये लोग चौधरी ही कहलाते हैं। वह कहा करते कि चाहे विद्या देखिये, या धन, या लाठी-- चौधरियों का परिवार ही आज भी विश्वविजयी है। यह अलग बात है कि उनका विश्व इस गाँव की चौहद्दी तक ही सीमित था।

               मनोज ने काका से पूछा-- 'किधर आए हैं वकील साहब?

            काका बोले-- 'चन्दा वसूलने।'

          -- किस बात का चन्दा?

           -- भगवती पूजा का।

     मनोज को बड़ा अचरज लगा। वह बोला-- भगवती पूजा का चन्दा? अपने लोगों से? अपने लोगों से तो कभी नहीं लिया जाता था।'

            -- हाँ, पहले तो कभी नहीं लिया गया। लेकिन, इस बार तो आए हैं!'

            बड़े ही पुराने जमाने से यह चलन चला आया था कि हरेक साल महाष्टमी की रात को भगवती मंदिर मे निशा-पूजा का विशाल आयोजन होता। गाँव के लोग इसे नशा-पूजा कहते। भगवती को दर्जन के दर्जन बोतल दारू का चढ़ावा चढ़ता। दारू के चखने चढ़ते। खस्सी, पाठा, भेड़, मुरगा, कबूतर, मछली, अंडा-- कुछ भी वहाँ चढ़ावे के लिए मना नहीं था। तांत्रिक पद्धति से देवी की पूजा होती, ऐसा जानकार लोग बताते थे। अगली सुबह महानवमी के रोज देवी के समक्ष पाठा, भेड़ और भैंसे की बलि चढ़ती। हजार की संख्या में छाग-बलि और दो-ढाई दर्जन के करीब महिष-बलि। दूर-दराज गांवों तक के श्रद्धालु मनौती करते। फल होता कि नवमी के दिन बलि-प्रदान के लिए मारा-मारी होती, घमासान मच जाता। लेकिन एक नियम सनातन से चला आता था। नियम यह कि सबसे पहली पूजा और बलि-प्रदान पलिवार की तरफ से होता। इस पूजा को लोग 'गमैया पूजा' कहते थे और बलिदान को गमैया छागर, गमैया पाड़ा। ऐसा लगता था मानो यहीं पर कहीं जागीरदारी की जड़ थी।

            अब चूँकि इतने बड़े आयोजन में खर्च भी बड़ा होता, तो सनातन से यह भी नियम चला आता था कि समूचा खर्च पलिवार के बाबू-भैया मिलकर वहन करते। जब कलियुग आया तो यह होने लगा कि पलिबार से बाहर के जो ब्राह्मण गाँव में निवास करते थे, उनसे चन्दा लिया जाने लगा। लेकिन, किसकी हिम्मत कि इस लिये जाने वाली चीज को चन्दा जैसे गंदे नाम से पुकारता? इसे 'बेहरी' कहते थे, जिसमें निमित्त खुद भगवती हो जाती थीं। पर इस बार तो अचंभा ही हो गया। कहाँ पलिवार का उज्ज्वल महावंश, और कहाँ इस दलित का दरवाजा! वकील साहब बेहरी मांगने स्वयं पहुँच गये थे।

              'समय परिवर्तनशील होता है'-- मनोज ने सोचा और जरा-सा मुस्कुराया। वह दालान पर आया। दालान की चौकी पर वकील साहब ओलड़ के बैठे थे, मतलब आधी चौकी भर जगह छेक कर। उनके साथ पलिवार के दो नौजवान भी थे। वकील साहब उन दोनों युवकों को सामाजिक पाठ पढ़ाने में व्यस्त थे। पाठ यह कि कैसे गाँव के मेन चौक पर कोई अनजान राहगीर इस गाँव के बारे में भद्दी बातें कर रहा था, और किस तरह वकील साहब ने उस राहगीर को मन-भर बेइज्जत किया था। असल में, वकील साहब-जैसे लोग अपने कुलशीलवान जीवन में कुल तीन ही काम के लायक होते हैं--- भोजन, विश्राम और गपसप। अभी वह गपसप कर रहे थे।

            मनोज आया और उसने बड़े ही व्यंग्यात्मक लहजे में कहा-- 'परनाम वकील साहब।' 'पर' बोलने के बाद एक लंबी तान भरते हुए 'नाम' कहा। इस तान का यही मतलब हो सकता था कि शब्द पर मत जाइये, भाव को पकड़िये कि अब आपका आदर नहीं किया जाएगा, अब लोग आपको प्रणाम नहीं करेंगे।

              लेकिन, वकील साहब मानो गहरे नशे में चूर थे। काहे को वह परनाम का जवाब देने या इसका भाव समझने की कोशिश करें, वह तो 'ही ही' करके हँसने लगे। उनकी इस पलिवारवादी हँसी को सुनकर मनोज सोचने लगा कि आखिर लोग इन्हें वकील साहब क्यों कहते हैं! वकालत तो इन्होंने कभी की नहीं। क्या सचमुच इन्होंने एल-एल.बी. की पढ़ाई की होगी?

             वकील साहब बोले-- 'की अओ विद्वान! बेहरी दियौ।'

            जिस टोन में वकील साहेब ने 'की अओ विद्वान' कहा था, उसकी स्पष्ट ध्वनि थी-- क्या रे शूद्र! बेकार ही लोग मानते हैं कि मैथिली एक मधुर भाषा है। इसके उच्चारण में जितने दाव-पेंच और जहर भरे होते हैं कि काहे को कोई दूसरी भाषा इसकी बराबरी कर सके। लेकिन, मनोज दूसरी बात सोच रहा था। सोच रहा था कि यह वकील साहब आखिर क्यों मनुष्य की भाषा नहीं बोल पाते! 'भ' जेतै', 'द'देतै' बोलेंगे। समूचे गाँव में एक इनकी भाखा बेछप होती है। क्यों? क्यों आम आदमी की तरह बात नहीं कर सकते? कौन इन्हें रोकता है?

            मनोज ने पूछा-- 'किस बात के लिए बेहरी?'

             इस मामूली-से प्रश्न से वकील साहब उत्तेजित हो गए-- 'ऐसी बात क्यों बोलते हैं अओ? मैंने तो पहले ही बालदेव को कह दिया कि बेहरी लगेगी।'

             पक्की बात है कि मनोज अगर सामने उपस्थित नहीं रहा होता, तो वकील साहब उनके सत्तर साल के पिता को बालदेव नहीं, बलदेबा बुलाते। मनोज को खयाल आया कि यह बात जो कही जाती है कि योग्य संतानें अपने पिता तक की प्रतिष्ठा को बढ़ाती हैं, यह बात यूँ ही नहीं कही जाती। लेकिन, तत्काल तो उसे यही दिखा कि ये महाशय अपने घमंड में कितने चूर हैं! 

             मनोज बोला-- 'एक बात पूछूँ वकील साहब?'

             वकील साहब चुप रहे। उन्होंने मनोज की ओर देखा।

             मनोज ने पूछा-- 'आप सिर्फ वकील साहब हैं या कि खुद आइपीसी हैं?'

                वकील साहब की समझ में कुछ भी नहीं आया। बोले-- ' पूछने का क्या तात्पर्य है? मैंने समझा नहीं।'

                  मनोज को गुस्सा आने लगा। बोला-- 'आप झूठ बोल रहे हैं। आप समझेंगे क्यों नहीं? खूब समझेंगे। और, अगर समझना ही नहीं चाहते, तो इसका तो कोई इलाज नहीं है।'

                 युवा मनोज की आवाज में उद्दंडता का भान होते ही पल भर के लिए वकील साहब भूल गये कि किसी दलित लड़के से बात कर रहे हैं। उन्हें भय हुआ। वह साकांक्ष हो गये और अपना चश्मा सँभालने लगे।

              मनोज बोला-- 'हम आपसे पूछते हैं कि क्या चीज की बेहरी, तो आप कहते हैं, हमने तो पहले ही कह दिया था,अब तो देना ही पड़ेगा। आप जरा ये बताइए कि वो सब बातें  जो आप पहले ही बोल चुके हैं, कानून हो गयी हैं क्या? अब लोगों को उसी के हिसाब से चलना पड़ेगा?'

                वकील साहब चुप हो गये। उनके साथ आए एक नवयुवक ने पूछा-- ' आप मास्सैब, बेहरी नहीं देना चाहते हैं क्या?'

                मनोज ने जवाब दिया-- ' बेहरी हम देंगे कि नहीं देंगे, ये तो आगे की बात हुई न बौआ? आप हमको पहले बताइएगा न कि क्या चीज की बेहरी मांगने आए हैं, या कि पहले ही फरमान जारी कर दीजिएगा?'

                 नवयुवक भी चुप हो गया।

                  फिर मनोज ही बोला-- 'बेहरी मांगने का काम कहीं पलिवार के लोगों से हो वकील साहब? यह तो एक सामाजिक काम है। इसके लिए तो पहले व्यक्ति को समाज बनना पड़ेगा न! खैर बताइए, क्या कह रहे थे?'

               वकील साहब फिर से ताल ठोककर खड़े हो गये-- 'हम स्वयं आपके दालान पर चलकर आए हैं, इसकी आपको  तनिक भी लाज नहीं? आप पलिवार को नहीं चीन्हते हैं?'

                 मनोज ने अपना सिर पीट लिया। वकील साहब पर उसे दया आई। लेकिन ऐसी दया की भी क्या जरूरत?-- उसने सोचा। बोला-- 'पलिवार को हम काहे नहीं चीन्हेंगे वकील साहब! और, जहाँ तक लाज लगने का सवाल है, लाज तो आप ही को लगनी चाहिए न, कि आपको हमारे दालान पर आना पड़ा। हमने तो आपको बुलाया नहीं था! पहले आप लोग पलिवार की तरफ से सब इन्तजाम करते थे। उससे नहीं हुआ तो दूसरे-दूसरे ब्राह्मणों से माँगना पड़ा। उससे भी नहीं हुआ तो अब सोलकन-दलित के दालान पर चढ़ना पड़ा। ये तो आप ही के लिए लाज लगनेवाली बात हुई।'

                 पलिवार के एक समझदार नवयुवक ने जवाब दिया-- 'नहीं, ऐसी बात नहीं है मास्सैब! हमलोगों का सिद्धान्त है कि सभी जाति के लोग समान हैं। गमैया पूजा है तो इसमें सभी ग्रामीणों का सहयोग होना चाहिए!'

             मनोज बोला-- 'यह जो बात आप बोले हैं, बहुत अच्छा बोले हैं बौआ! लेकिन एक बात बताइए, आपका तो यह सिद्धान्त है, ठीक बात है। लेकिन, मान लीजिए हमारा भी कोई सिद्धान्त हो तो इसको मानिएगा कि नहीं?'

              नवयुवक मुंडी हिलाने लगा-- 'हाँ-हाँ, क्यों नहीं? सबका अपना-अपना सिद्धान्त होता है।'

             मनोज कहने लगा-- 'आपको मालूम है बाबू? आठ-दस साल पहले की बात है, हमलोग भगवती-स्थान में धरना पर बैठे थे कि बलि-प्रथा बन्द होनी चाहिए। हमलोगों के लीडर थे विवेकानंद झा। मालूम है कि तब आपके पलिवार ने क्या किया था? हमीं लोगों को पकड़कर महिखा में बाँधने लगे कि इन्हीं लोगों का बलिदान दिया जाएगा। बड़ी मुश्किल से हम लोगों की जान बची थी। मालूम है?'

             नवयुवक चुप हो गया। मनोज ने आगे कहा-- 'आपलोगों का सिद्धान्त है तो हमलोगों का भी सिद्धान्त है। देखिये, इसी गाँव के बाहर एक और देवता हैं--कारू बाबा। नवमी को ही उनकी भी बड़ी पूजा होती है। जिस दिन कारूथान में दूध की नदी बहती रहती है, उसी दिन आपके मंदिर में खून की नदी बहती है। सिद्धान्त की अगर बात करिएगा तो यह भी सोचिएगा न कि ऐसा आखिर किस लिये होता है? किसने ऐसी प्रथा चलाई, और कौन इसे आज चला रहा है? इस मंदिर में तो भगवान बुद्ध की भी मूर्ति है न बौआ! बुद्ध के आगे खून की धार? छि: छि:।'

          मनोज उठकर खड़ा हो गया, और आँखों में पूरी कठोरता भरकर बोला-- 'बेहरी तो हम नहीं देंगे वकील साहब!'

        वकील साहब भी उठकर खड़े हो गये। बोले-- 'आपको भगवती का भी डर नहीं?'

          मनोज और भी कठोर हो गया। बोला-- 'नहीं, हमको किसी का भी डर नहीं।'

               इस बात पर वकील साहब क्या बोलते। वह चुपचाप उठे और वापस विदा हो गये।

            मनोज लौटकर आँगन गया। उसके हाथों में मिट्टी लगी हुई थी, कहीं गीली तो कहीं सूखी मिट्टी। उसने दोनों हाथ खोल लिये और देखने लगा। मुस्कुराया-- एह, यही मिट्टी है जो हमें और वकील साहेब को अलग करती है--उसने सोचा। और, यही मिट्टी है जो विवेका बाबू को हमारे साथ जोड़ती है और वकील साहब से अलग करती है-- उसने फिर सोचा।

               विवेका बाबू यानी विवेकानंद झा की याद आई तो वह दृश्य आँखों में नाच गया। धरने का नेतृत्व विवेका बाबू कर रहे थे। लेकिन उन दिनों रक्तबीजों की चलती मजबूत थी। पलिवार वालों ने हाथों हाथ उन्हें उठा लिया और महिखा (जमीन में गड़ा वह खंभा जिसमें पशुओं को बांधकर बलि दी जाती है) में बांधने लगे। एक कठमस्त युवक तलवार उठा लाया। बाप रे, ऐसा तो न कभी देखा था न सुना था। अपमानित होकर विवेका बाबू को अपना आन्दोलन बन्द करना पड़ा था। लेकिन, अभी-अभी जो घटना घटी थी, मनोज ने तय पाया कि रक्तबीजों का रुतबा अब कम पड़ा है। अभी अगर हो आन्दोलन, तो मजा आ जाएगा।

           मनोज ने अपने भीतर असीम जोश का अनुभव किया। उसने चापाकल पर जाकर हाथ धोया और कन्धे पर गमछा रखकर सीधे पुबारी टोले की ओर विदा हो गया। वह विवेका बाबू के घर जाएगा। जाकर उन्हें पूरा वाकया सुनाएगा और कहेगा कि सर, अब शुरू कीजिए संघर्ष। आन्दोलन का सही समय अब आया है।

              लेकिन, जब वह विवेका बाबू के घर पहुँचा तो पता लगा, वह कहीं बाहर निकले हैं।

             -- सर कहाँ गये हैं?-- विवेका बाबू की पत्नी से उसने पूछा।

             -- चमरटोली की तरफ गये हैं!

             --कब गये हैं?-- मनोज ने जानना चाहा कि कबतक लौटेंगे।

              विवेका बाबू की पत्नी बोलीं-- 'देखिये न, नवमी के दिन छाग-बलि की मनौती किए हुए हैं। अभी तक छागर का कोई इंतजाम ही नहीं हुआ है। छागर खरीदने ही निकले हैं। चमरटोली में नहीं मिला तो धनुकटोली की तरफ जाएंगे।'

             सुनकर मनोज को बड़ा अचंभा हुआ। वो विवेका बाबू! ये आठ-दस वर्ष का समय! और, आज वो खुद बलि का बकरा खरीदने गये हैं! वह चुप हो गया। चुप और उदास। लेकिन, क्षण भर बाद ही उसे खूब जोर से हँसने की इच्छा हुई। मगर वह हँस नहीं सकता था। उसकी हँसी सुनकर विवेका बाबू की पत्नी को दुख पहुँच सकता था।

(मैथिली से अनुवाद- स्वयं लेखक द्वारा)

        

Sunday, November 23, 2025

हमरा सभक युगक नचिकेता

 


         तारानंद वियोगी



कठोपनिषद् मे वर्णित नचिकेताक उपाख्यान सँ भारतीय ज्ञान-परंपराक संग जुड़ल सब गोटे परिचित छी। एकर निहितार्थ छै-- छोट उमर मे ज्ञान-पिपासाक अतिरेक। हमरा सभक कवि नचिकेताक संग यैह बात रहलनि। हुनकर परम चर्चित कविता-संग्रह 'कवयो वदन्ति' 1966 मे तहिया छपलनि जखन हुनकर उमर केवल पन्द्रह साल रहनि। मोन पाड़ल जाय, कवि-गुरु रवीन्द्रनाथक पहिल कविता-संग्रह 'भानुसिंह ठाकुरेर पदावली' ठीक एही उमर मे छपल छलनि। ज्ञानक जाहि-जाहि क्षेत्र मे नचिकेताक अधिकारिता छनि, जेहन पैघ-पैघ पद पर पदासीन रहि ओ अपन ज्ञानक सदुपयोग विश्व-हित मे केलनि अछि, जाहि तरहें विविध ज्ञान-क्षेत्र मे राखल गेल हुनकर स्थापना सब कें सौंसे संसारक विशेषज्ञ लोकनि गंभीरता सँ लैत अख्यास कयल करै छथि, तकर विवरण देल जाय तँ ई लेख तँ छोट पड़बे करत, पैघ-पैघ कतेको लेख लिखय पड़त। एहि ठाम कवि-गुरु रवीन्द्रक प्रसंग मे केवल यैह कहय चाहब जे हमर ई मैथिली कवि वैश्विक स्तर पर आइ, अपन आन अनेक ख्यातिक अतिरिक्त रवीन्द्रनाथक एक सुयोग्य अधिकारी विद्वान सेहो मानल जाइत छथि। योग्य माता-पिताक योग्यतर संतानक रूप मे सब अर्थें नचिकेता, जे अधिक ठाम उदय नारायण सिंहक नाम सँ जानल जाइत छथि, हमरा लोकनिक गौरव छथि।

            नचिकेताक व्यक्तित्व एहन विरल, जे विश्वास करब कठिन क' दैत छैक जे ई एक मैथिल थिका। योग्य लोक कें पाबि क' ईर्ष्याक स्थान पर स्नेह-श्रद्धा करब। मंच पर बाजब जते संतुलित आ सारगर्भित, एहन बजनिहार दोसर कोनो लोकक बाजल सुनब ताहू सँ बेसी उदग्र आ अनथक। अपन असहमतिक आखरी हद धरि जा क' सहमतिक तलाश करब, जँ किछु तथ्य आ तर्क सामने राखल जाय। अपन मूलभूत स्वभावे सँ परम लोकतांत्रिक, जेहन कि मैथिल बौद्धिकक हैब असंभव सन घटना बूझि पड़ैत अछि। समस्त सांसारिक अस्तित्व कें विज्ञान-सम्मत  ढंग सँ ग्रहण करब, आ ओकर दार्शनिक तह धरि प्रवेश क' जायब, ई हुनकर प्रकृतिये मे जनु शामिल होइन। कोनो काज कें ठीक ओही रूप मे कार्यान्वित करब, जेहन कि नियमावली मे विहित छै। अइ बातक लेल एक उदाहरण देब हमरा उचित बुझना जाइत अछि। नचिकेता एखन साहित्य अकादेमी मे मैथिलीक संयोजक छथि। अइ पद कें पाबि क' कतेको गोटे कते कते अनर्थ क' गेला, तकर इतिहास मे जायब तँ घृणा सँ मोन खिन्न हैत। बड़को बड़को लोक सब ई धतकरम केने छथि, क्षुद्र मानव-मानवीक तँ कथे कहब निरर्थक। साहित्य अकादेमी बहुतो प्रकारक पुरस्कार हरेक साल दैत अछि। संयोजकक हैसियत सँ नचिकेताक उचिते एहि सब मे महत्वपूर्ण भूमिका रहैत छनि। मुदा, कोनो पुरस्कारक जूरी मे के सब विद्वान छथि, नचिकेता कें बूझल नहि रहैत छनि, कारण प्रावधान सैह छैक। हरेक जूरीक मीटिंग मे ओ उपस्थित रहै छथि, मुदा प्रक्रिया मे ओ हस्तक्षेप करता, तकर कल्पनो धरि नहि कयल जा सकैछ। कारण, नियमावली मे यैह विहित छै।

            नचिकेताक अध्ययन तलस्पर्शीक संग-संग बहुव्यापक छनि। ओ देश-विदेशक कतेको भाषाक ज्ञाता छथि, आ ओहि भाषा सभक भाषिक आ साहित्यिक अध्ययन मूलभाषा मे जा क' क' सकै छथि। अपन अध्ययनक निचोड़ कें कोनो आन भाषा, आ विशेष रूपें अपन पितृभाषा मैथिली आ मातृभाषा बंगला मे प्रस्तुत क' सकै छथि।  हुनकर एहने दृढ़ पकड़ ग्रीक आ भारतीय मिथकशास्त्र पर छनि। तीन रूपें एकर लाभ मैथिली कें भेटलैक अछि। नचिकेताक लिखल कविता, नाटक आ निबंध रूप मे ई सब वस्तु बहुतो दिन सँ हमसब देखैत रहल छी। मोन पड़ैत अछि, अपन जीवन मे पहिल मैथिली नाटक जे हम 1980क जबाना मे, पटना मे देखने रही, ओ रहय 'एक छल राजा', जकर अभिनेता तँ छत्रानंद सिंह झा आ प्रेमलता मिश्र प्रेम रहथि, मुदा हमरा लेल नाटककार नचिकेता सँ पहिल परिचयक यैह अवसर छल।

               सृजनात्मक लेखनक क्षेत्र मे कविता आ नाटक, ई दू टा विधा थिक जाहि मे नचिकेता शुरुहे सँ काज करैत रहला अछि आ अपन काज कें एक उच्च धरातल पर स्थापित केलनि अछि। हुनकर साहित्य मे विविधता भरपूर छनि आ किनसाइते कोनो समकालीन मुद्दा हो जकरा ओ अपन संज्ञान मे नहि अनने होथि। हुनकर कयल काजक महत्व कें हमसब एही सँ अकानि सकै छी जे अपन पहिले काव्य-पुस्तक 'कवयो वदन्ति' मे ओ 'नव चेतनावाद'क प्रस्तावना केलनि आ अपन परंपरा कें यात्री संग जोड़लनि। ई किताब 'नव-चेतनावादक ज्योति-स्तम्भ' यात्रिये कें समर्पित कयल गेल छनि। हुनकर काव्य-लेखनक स्वभाव पहिले कविता-संग्रह सँ स्पष्ट हुअय लगैत अछि। विडंबनात्मक घटना-परिघटना खास तौर पर हुनकर विषय बनैत छनि। अप्रतिम ओज, साहस आ आत्मबल सँ परिपूर्ण कवि अपना समयक समस्त विषय-वितान कें पूरा दृढ़ताक संग पकड़ैत छथि। विषयक पूरा अभिज्ञान एक मनोवैज्ञानिक दार्शनिकताक संग उद्घाटित होइत छैक। 'कवयो वदन्ति' मे संकलित पहिले कविता थिक-- 'अग्रगति नहि हैत'। कविता छैक-- 'हमरा सभक अग्रगति नहि हैत!/ एकर अनेक कारण छैक/ हम सब सोझ पथें नहि जायब/ तखन त हमरा सभक आधुनिकता आ शिल्पबोध/ नष्ट भ' जायत।/ हम सब वक्र पथें नहि जायब/ तखन त हमरा सभक कलात्मकता/ क्लेद आ ग्लानिक परिचायक हैत/ हम सब वृत्ताकारहु नहि जायब/ तखन त सैह कालक गोरखधंधा मे/ घुरैत रहब/ हम सब सत्य-मिथ्या कें ध्रुव जनैत छी/ तें हम सब ध्रुव हैब!/अर्थात्......'।

             जेना आधुनिक मंचशिल्पक लेल नचिकेताक नाटक  सभक बेस सम्मान अछि, ठीक तहिना विरल शिल्प-प्रयोगक लेल मैथिलीक आधुनिक कविता मे हुनकर अपन बेछप पहचान छनि। मैथिली कविताक एक विलुप्त होइत शिल्प --दीर्घकविता-- कें अपन 'छाया' (कविता-पुस्तक) सँ एक गंभीर प्रस्थान रचैत छथि। जीवनक मर्म कोना तह-दर-तह अपन उन्मुक्तिक अभीप्सा रखैत अछि, आ एक समर्थ कवि सब तह कें पार करैत लक्ष्य धरि अन्तत: पहुँचिये जाइत अछि, एहि प्रयत्न कें देखबा लेल मैथिलीक ई एक माइलस्टोन काज थिक। बिम्ब, प्रतीक, रूपक, मिथक आ आख्यान कोना नाना रूप धारण कयने जीवनक महान महान आर्यसत्य कें उद्घाटित करैत अछि, से देखबा जोग अछि।

          मोन पड़ैत अछि, एक समय, प्राय: अस्सीक दशक मे 'मिथिला मिहिर' पत्रिका मे वरिष्ठ मैथिली रचनाकार लोकनिक बीच कैक मास धरि वाद-प्रतिवाद चलल छल जे मैथिलक जीवन-जगत मे 'प्रेम' के कोनो स्थान नहि छैक, तें एकर कविता वा कथा लिखबा जोगर भाषा आ शिल्प धरि विकसित नहि भ' सकल अछि। मैथिल जीवन-जगत मे जे चीज सर्वसुलभ छैक, से थिक-- 'छिनरपन', जकरा लेल काकु सँ ल' क' चिकारी धरि बहुतो बहुत प्रकारक भाषा-शिल्प विद्यमान छै। हमरा ई कहैत संतोष सँ बेसी गर्व होइत अछि जे मैथिली कवि नचिकेता ने मात्र सुन्दर आ देखनगर प्रेम-कविता सब लिखलनि, बरु एकर व्याप्ति कें बढ़बैत समान बौद्धिक धरातल पर जिबैत दू समानधर्मा स्त्री-पुरुषक बीच प्रेमक लेल ने केवल समुचित भाषा आ शिल्प अर्जित केलनि अछि, अपितु मैथिली कविता मे जे वस्तु अकथित रहि गेल छल, तकर कथन लेल मैथिली कें समर्थ बनौलनि अछि। कोनहु रचनाकारक जीवन के चरम सार्थकता की थिक? निश्चय यैह थिक जे जाहि भाषा मे ओ काज करैत हुअय, तकरा आर अधिक सबल, आर अधिक सक्षम बना सकय।

              नचिकेता अपन कर्मठ आ सार्थक जीवनक पचहत्तरि वर्ष पूरा केलनि। हुनका प्रति अनन्य प्रेम रखैत शुभकामना करै छी जे शतायु भ' ओहि समस्त काज कें ओ एही कर्मठता आ सार्थकताक संग पूर्ण करथि जे प्रकृति हुनका लेल विहित कयने छनि।

Sunday, June 1, 2025

रेणु आ यात्री नागार्जुन

 


तारानंद वियोगी


फणीश्वरनाथ रेणुक ओ फोटो संभव छै, कहियो अहाँक नजरि मे आयल होयत, औराही हिंगना बला, जाहि मे ओ खेतक कदबा कयल माटि मे अपन संगी-साथी संगें धान रोपबा लेल उतरल छथि। कुल जमा दस गोटे हेता। सभक हाथ मे बिचड़ाक पुल्ठी अछि, आ मोन मे किछु नब करबाक रोमांच। अपनें रेणु लुंगी कें दोहरा क' ढेका बान्हि लेने छथि। दू-तीन गोटे एहनो छथि जे अति उत्साह मे खेतक पेंक मे उतरि तँ गेल छथि, मुदा आब कपड़ा गन्दा हेबाक द्वन्द्व मे फँसल छथि। एखन फोटो सेशन चलि रहल छै। आब ओ लोकनि रोपनी शुरू करहे बला छथि। मुदा, एहि दस गोटे मे सँ एक एहनो छथि जे फोटो सेशनक बिनु कोनो परवाह कयने खेत मे झुकि चुकला अछि, एनमेन तहिना जेना कोनो किसान रोपनी करैत अछि। स्वाभाविके जे ओहि आदमीक चेहरा देखार नहि पड़ि रहलैए। ओ आधा धोती पहिरने छथि,आधा ढट्ठा ओढ़ि क' माथ कें झांपि लेने छथि। हुनकर संपूर्ण ध्यान रोपनी पर छनि। फोटो मे साफ देखाइ छै जे हुनकर दहिना हाथक अंगुरी सब बिचड़ाक जड़िक संग कदबाक वक्षस्थल मे ढुकल छनि। आदमी बुजुर्ग छथि आ रोपनी-कलाक पुरान ओस्ताद जकाँ लगैत छथि। के छथि ओ? ओ यात्री नागार्जुन छथि। औराही हिंगना मे रेणुक खेत मे एखन धान रोपि रहला अछि। तारीख थिक 29 जुलाइ 1973। यात्री रेणुक गाम आयल छथि जतय एखन रोपनीक सीजन चलि रहल छै। रेणु एहि तरहक हरेक सीजन मे गाम जरूर अबै छला। अक्सरहां तँ सहमना साहित्यिक जन सेहो एहि दिन मे उमड़ि आयल कहथि। एतय, इहो अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे एहि आइडियाक जनक सेहो यात्रिये होथि कि चलै चलू, आइ अपना सब धानक रोपनी करी। एहि आइडिया कें एक आर नब आयाम दैत रेणु फोटो सेशन आयोजित क' लेलनि अछि। जें कि फोटोग्राफर फोटो घीचि लेलनि, फोटो कें क्यो किताब मे छापि देलनि वा डिजिटल क' देलनि तँ बात हमरो अहाँ धरि पहुँचि गेल अछि।

              ठीक ओही राति नागार्जुन एकटा कविता लिखने छला। ओ कविता रेणुक गामक बारे मे अछि आ स्वयं रेणुक बारे मे। शीर्षक देलनि अछि-- 'मैला आंचल।' कविता देखल जाय---

पंक-पृथुल कर-चरण हुए चंदन अनुलेपित

बकी छवियां अंकित, सबके स्वर हैं टेपित

एक दूसरे की काया पर पांक थोपते

औराही के खेतों में हम धान रोपते

मूल गंध की मदिर हवा में मगन हुए हैं

माँ के उर पर, शिशु-सम हुलसित मगन हुए हैं

सोनामाटी महक रही है रोम-रोम से

श्वेत कुसुम झरते हैं तुम पर नील व्योम से

कृषकपुत्र मैं, तुम तो खुद दर्दी किसान हो

मुरलीधर के सात सुरों की सरस तान हो

धन्य जादुई मैला आंचल, धन्य-धन्य तुम

सहज सलोने तुम अपूर्व, अनुपम, अनन्य तुम।

              एहि अवसर पर सभक फोटोक अतिरिक्त स्वर सेहो टेप कयल गेल रहय, तकर सूचना हमरा लोकनि कें नागार्जुनक एहि कविते सँ प्राप्त होइत अछि। ओहि दिनक ओहि स्वर सब कें सूनि पाबी, तकर अवसर आब हमरा लोकनि कें साइत कहियो नहि भेटि पाओत। एहन प्रतीत होइत अछि जे ओहि दिनका संगत मे रेणु कोनो बहुत सुंदर गीत गौने हेता जे यात्री कें बहुत पसंद आयल हेतनि। एकर खबरि हमरा लोकनि कें कविताक पांती 'मुरलीधर के सात सुरों की मधुर तान तुम' सँ भेटैत अछि। रेणुक बारे मे जाननिहार लोकनि नीक जकाँ जनैत छथि जे रेणु बहुत मधुर गबैत छला। आ एतबे नहि, लोकगीत आ लोकगाथा सभक एक बड़ पैघ भंडार हुनका कंठ मे विराजै छल, हुनकर ठोर पर बसै छल। सारंगा सदाबृज आ लोरिकायन के तँ समुच्चा गाथे हुनका याद रहनि। नागार्जुन एतय रेणु कें 'दर्दी किसान' बतौलनि अछि, जखन कि इहो कोनो कम दर्दीला नहि अछि जे अपना कें केवल एक 'कृषकपुत्र' कहैत छथि, मने कि ओ, जकरा सँ दर्दी किसान हेबाक सौभाग्य एक पीढ़ी पहिनहि छीनि लेल गेल। औराही हुनका बहुत बहुत नीक लगलनि अछि। ओतय हुनका ओ 'मूल गंध' भेटलनि अछि, जाहि मे पृथ्वीक नेह ओकर उत्पादकता बनि क' प्रकट होइत अछि। ओतुक्का माटि 'सोना माटी' थिक। रेणुक खासियत ई छनि जे ई सोनामाटि हुनकर रोम-रोम सँ प्रकट भेलनि अछि। रेणु जे अपन उपन्यासक नाम 'मैला आंचल' राखने छला, तकरा पाछू एक गँहीर व्यंग्य छल। ओहि उपन्यास कें महान बनबै मे जाहि वस्तु सभक योगदान छैक ताहि मे सँ एक ई नाम सेहो थिक जकरा पाछू व्यंग्यक एक अचूक गहराइ छैक। ओ बात ठीक ओतहि सँ एहि कविता मे सेहो उतरि आयल अछि। नागार्जुन एकरा सिम्पली 'जादुई' बतबै छथि। रेणु, जे नागार्जुन कें 'बड़भाय' वा 'भैयाजी' कहै छला, हुनका प्रति कते प्रेम, कते वत्सलता नागार्जुनक हृदय मे छलनि, तकरो किछु पता एहि कविता सँ नीक जकाँ लगैत अछि। कवि नागार्जुनक कहब छनि एहि धरतीक नील व्योम सँ रेणुक ऊपर श्वेत कुसुम झहरैत अछि। यशक रंग श्वेत बताओल गेल अछि। फेर फेर ओ कहैत छथि-- 'सहज सलोने तुम अपूर्व, अनुपम, अनन्य तुम।' एतय प्रयोग कयल गेल हरेक विशेषण कोना विशेष अछि, तकर पता हमरा लोकनि कें नागार्जुनक ओहि लेख सँ लगैत अछि जे ओ रेणुक निधनक लगले बाद हुनका पर लिखने रहथि।

             रेणु आ यात्री नागार्जुनक सम्बन्ध बहुत पुरान छलनि। दुनू मिथिला समाज सँ अबै छला। दुनू धरती संग समान रूपेंदस जुड़ल, धरतीक धनी। आम जनताक संग दुनूक जुड़ाव एक्के रंग। लोकवृत्ति आ लोकविधा सब मे दुनूक मोन एक्के समान अनुरक्त। दुनू संघर्षधर्मा, सत्ताधारी पार्टीक आलोचक। दुनू गोटेक अपन-अपन राजनीतिक प्रतिबद्धता छलनि, जकरा विना सामाजिक सरोकार अधूरा पड़ैत छल। मध्यकाले सँ ई परंपरा चलैत आयल अछि जे मिथिला-भूमि सँ जे क्यो महान साहित्यकार भेला, अपन तमाम काजक अतिरिक्त मिथिलाक भाषा मैथिली मे ओ किछु ने किछु जरूर लिखलनि। रेणु सेहो मैथिली मे लिखलनि मुदा नागार्जुन बेसी लिखलनि। जीवन पर्यन्त हिनका दुनूक संलग्नता अपन भूमि आ भाषाक संग समान रूपें बनल रहलनि। रेणुक संलग्नता अपेक्षाकृत बेसी गँहीर छलनि, ई बात भिन्न जे दुनू गोटेक अभिव्यक्तिक माध्यम सेहो अलग-अलग छलनि। रेणु जहिना दर्दी किसान छला, ठीक तहिना मर्मी इन्सान। हुनकर ई मर्म अनेक अनेक आयाम मे प्रकट होइ छलनि। नागार्जुन अपन लेख मे कहने छथि-- 'रेणु लग मे ने तँ कथ्य-सामग्रीक कमी रहनि, ने शैलीक नमूना सभक अकाल। सामाजिक घनिष्ठता रेणु कें कहियो गुफानिबद्ध नहि होबय दैत रहनि। जतय कतहु ओ रहला, लोक हुनका घेरने रहैत छलनि। फारबिसगंज, पटना, इलाहाबाद, कलकत्ता-- जतय कतहु देखलियनि आ जहिया कहियो-- निर्जन एकान्त मे किनसाइते कहियो देखने हेबनि।'

               विद्यापतिक ओतय 'सुपुरुष'क बहुत माहात्म्य अछि। एकरे कतहु विद्यापति सुजन कहै छथि तँ कतहु सज्जन। हुनकर एक मशहूर काव्यपंक्ति छनि-- 'सज्जन जन सँ नेह कठिन थिक।' ई एक पांती मिथिलाक नब-पुरान पंडित लोकनि कें सैयो बरस सँ तेहन परेशान करैत रहलनि अछि कि पुछू नहि। आइ धरि हुनका लोकनिक बुद्धि मे अँटलनि नहि जे भाइ, सज्जन जन संग नेह करब कठिन कोना होयत, ई तँ आरो बेसी आसान आ विधेय हेबाक चाही। बात एतय धरि चलि आयल कि धृष्ट पंडित लोकनि विद्यापतिक पाठ मे संशोधन क' देलनि। अपन संकलन सब मे पाठ देलनि-- 'सज्जन जन सँ नेह उचित थिक।' 'कठिन' कें बदलि क' 'उचित' क' क' मानू ई लोकनि ई टंटे खतम क' देलनि जे कठिन अछि आ कि कठिन नहि अछि। मुदा, एहि बातक मर्म रेणु सन व्यक्ति बुझि सकैत छला।  नागार्जुन लिखलनि अछि-- 'लोकगीत, लोकलय, लोककला आदि जतेक जे कोनो तत्व लोकजीवन कें समग्रता प्रदान करैत अछि, ओहि समस्त तत्वक समन्वित प्रतीक छला फणीश्वरनाथ रेणु।' विद्यापतिक समय तँ आब रहल नहि, मुदा सुपुरुष, सुजन, सज्जनक मूर्त रूप हमरा लोकनि रेणुक साहित्य मे देखि सकै छी। अहाँ 'तीसरी कसम' के हीरामन कें मोन पाड़ू आ अख्यास करियौ जे ओहि आदमी, हीरामन पर ककर मोन नहि रीझि जायत, जेना ओहि नायिकाक सेहो मोन रीझि गेल रहै। मुदा, एहि नेह कें निरंतर बनौने राखि सकब, ओकरा संग निरंतर बनल रहि सकब आ निबाहि सकब कते कठिन छैक! कहल जाइछ जे व्यक्ति तँ जनम लैत आ मरैत रहैत अछि, मुदा 'लोक' अमर होइत अछि। नागार्जुन फेर कहै छथि-- 'बावनदास सँ ल' क' अगिनखोर धरि नहि जानि कतेको कैरेक्टर रेणु पाठकक सोझा रखलनि अछि। ओहि मे सँ एक-एक कैरेक्टर कें बहुत बारीकी संग तरासल गेल छैक। ढेरक ढेर प्राणवंत शब्दचित्र हमरा लोकनि कें गुदबुदाबितो अछि आ ग्रामजीवनक आंतरिक विसंगति सभक दिस ध्यानो आकृष्ट करैत चलैत अछि। छोट-छोट खुशी, तुनुकमिजाजीक नान्हि-नान्हि क्षण सब, राग-द्वेषक ओझरायल गुत्थी सब, रूप-रस-गन्ध-स्पर्श आ नादक छिटफुट चमत्कार सब-- आओर ने जानि कते की सब व्यंजना छलकैत चलैत अछि रेणुक कथाकृति सब मे।'

               रेणुक संग यात्री नागार्जुनक सम्बन्ध पुराने टा नहि, आत्मीय सेहो ततबे छल। दुनू गोटे जहिया जतय कतहु भेंट होइन, मैथिलिए मे गपसप करै छला। पत्राचारक भाषा सेहो मैथिलिये भेल करनि, तकर एक झलक हुनकर रचनावलियो मे आयल छनि। एक पत्रक हम एतय चर्च करब, जकर एक-एक शब्द सँ रेणुक आन्तरिकता झलकैत छनि। पत्र 18.12.1954(वा 1955)क लिखल थिक। लगले 'मैला आंचल' पैघ प्रकाशक ओतय सँ छपलनि अछि। रेणु गाम आयल छथि। आइ साइत ओ कोनो गुदरिया बबाजी सँ राजा भरथरीक गाथा सुनलनि अछि, से मगन छथि। लगैए, साधू जरूर बहुत मधुर, बहुत मार्मिक ढंग सँ गौने हेता। रेणु नोट क' लेलनि अछि। गाथाक एक नमहर अंश ओ नागार्जुन कें पत्र मे लिखने छथि, जे अद्भुत अछि। ओहि गीत मे संन्यासी बनलाक बारह बरखक बाद, सिद्ध जोगी बनि क' राजा भरथरीक अपन नगर पधारबाक वर्णन छैक। एहन प्रतीत होइत अछि मानू अपन पछिला पत्र मे नागार्जुन जिज्ञासा कयने होथि जे एम्हर राजा भरथरी, मने रेणु, लगातार चुप किएक छथि। तकर उतारा एहि ठाम अयलैक अछि। लिखै छथि-- 'जाहि दिन नग्र पधारयो राजा भरथरी/मजरल बगियन मे आम/ फुलवा जे फूले कचनार राजा/ लाली रे उड़य असमान/ लाल-लाल सेमली के बाग फूले/ धरती धरेला धेयान।' मने जे गामक पर्यावरण मोहक पर्यावरण राजा भरथरी कें तेना क' बान्हि लेने छनि जे चुप भेने विना कोनो रस्ते नहि बचलैक अछि।

            तखन, गाम-घरक बात सब बतबैत छथि। पहिल बात तँ यैह जे गाम अबैत रहब रेणु कें एहि लेल जरूरी छलनि जे पुरान वस्तु सब कें, धरोहर सब कें नष्ट हेबा सँ बचाओल जा सकय। कहब जरूरी नहि जे ई काज करब, आर्थिक अभाववश वा पयर मे घुरघुरा बान्हल रहबाक कारण, यात्री बुतें कहियो पार नहि लगलनि। यैह मुख्य कारण छै जे गाम छुटबाक, विस्थापनक पीड़ा सँ यात्री नागार्जुनक काव्य सब दिन आक्रान्त रहल। खैर, एतबा लिखबाक बाद रेणु अपना गामक ओहि नौजवान लड़काक जिक्र करैत छथि जे हुनका चैलेंज कयने रहनि जे गाम कें ध' क' रहब अहाँ बुते पार नहि लागत। ओ इहो बतबै छथि जे ओहि नौजवान कें उतारा की देलखिन। देलखिन जे हौ बाबू, गरदनि मे घैला बान्हि क' हम कुइयां मे पैसि गेलियहे, तें आब एतय सँ बहरेबाक उपाय नहि। तखन बतबै छथिन जे गामक जंगल के एक सियार बताह भ' गेलैए, तें आब लोक बिनु लाठी के घर सँ नहि बहराइत अछि। रेणु लग मे लाठी छलनि नहि, ककरो सँ मँगलखिन तँ जवाब देलकनि जे अहाँ अपन लाठी अपने बनाउ, अहाँ तँ गाम बसबा लेल आयल छी कि ने! एही क्रम मे हुनका अपन पिता मोन पड़लखिन जे रासि-रासि के लाठी रखबाक शौखीन छला। इहो लिखि जाइ छथि जे बांसक जंगल मे ढुकि क' सही लाठी बला बांसक पहिचान करब सेहो एक मेंही कला छिऐक। बतबै छथि जे मोन लायक लाठी प्राप्त करबाक लेल पिता केहन केहन लोक सभक संग दोस्ती जोड़ने रहथि। पछिला पत्र मे यात्री हुनका सुझाव देने रहथिन जे रेणु कें ओतय बन्दूक के लाइसेन्स ल' लेबाक चाहियनि। रेणु कें ई बात नहि जरूरी लगलनि, तकर उतारा दै छथिन जे विश्वकोशक चोर एखन धरि गाम तक नहि पहुँचल अछि। आ, जतय धरि शिकार करबाक बात छै तँ रेणुक गुलैंती चलेबाक 'पेराकटिस' तते जबर्दस्त छनि जे ओकरा आगू बन्दूक फेल छै। तखन, रेणु ओहि खंडकाव्य-- 'दो पीर: एक नदी'-- के प्लाॅट बतब' लागै छथिन जकरा लिखबाक विचार हुनका मोन मे एखन चलि रहल छनि। दू पीर-- मने ग्रामदेवता जीन पीर आ ग्रामरक्षक चेथरिया पीर। नदी दुलारी दाइ! नदी के गुण गाब' लगै छथि जे एहि समुच्चा इलाकाक बबुआन लोकनिक बबुआनी एही दुलारी दाइ के प्रताप पर निर्भर छनि। कोशी जहिया एहि इलाका सँ विदा हुअय लगली, हुनकर पांच बहीन रहनि, सब कें ओ बांझ बनबैत गेलखिन। सब सँ छोटकी एहि दुलारी दाइ पर हुनका बड़ करुणा रहनि, तें ई बेचारो बचल रहि गेली। अपन 'भैयाजी' सँ रेणु आशीर्वाद मँगै छथि जे एहि खंडकाव्य कें ओ पूरा लिखि सकथि आ से शुभ आ सुन्दर दुनू बनि पाबय। फेर ई सूचना दै छथिन जे पछिला किछु मास सँ मैथिली मासिक 'वैदेही' हुनका गामक पुस्तकालय मे आयब बन्न भ' गेलैए, मतलब जे प्रकाशक कें ई शिकाइत पहुँचा देल जाइन, आ सुझाव मँगै छथि जे 'आर्यावर्त'क ग्राहक बनल जाय कि नहि बनल जाय! पत्रक अन्त मे लतिका जी सँ मिलि क' सब समाचार बता देबाक अनुरोध छै, आ ई बात सेहो जे हुनका भरोस द' देल जाइन जे हुनकर हिदायत सभक पालन पूर्णत: करिते हम गामक जीवन जीबि रहल छी। मुदा, सब सँ अन्त मे लिखने छथिन जे 'हम जे मैथिली मे पांती लिखैक धृष्टता क' रहल छी-- से तकर की हैत?' एहि पत्र सँ दुनू गोटेक बीचक आत्मीयता आ सामीप्य-भावने टाक परिचय नहि भेटैछ, इहो साफ अछि जे दुनू गोटेक जीवनक प्राथमिकता सब की छलनि, कथी मे सुख छलनि, कथी मे दुख।

            सोचि क' देखी तँ ई आत्मीयता कोनो मामूली बात नहि छल। यात्रीक पहिल उपन्यास 'पारो' 1946 मे छपि क' आबि गेल छल। ई रचना छल मैथिलीक, मुदा ताहि सँ बहुत ऊपर जा क' बिहारक एक अद्भुत संभावनाशील उपन्यासकारक रूप मे हुनकर छवि देश भरि मे स्थापित भ' गेल छल। 1948 मे छपल 'रतिनाथ की चाची' हुनका स्थापित उपन्यासकारक पंक्ति मे आनि देने रहनि। मुदा, 'बलचनमा' (1952) छपलाक बाद तँ नागार्जुनक गणना हिन्दीक प्रथम श्रेणीक उपन्यासकारक रूप मे हुअय लागल छल। एहि उपन्यास मे आलोचक लोकनि 'प्रेमचन्दक परम्पराक स्पष्ट विकास' देखि रहल छला। 'आंचलिक' शब्द सेहो उपन्यासक विशेषणक रूप मे तहिये पहिल बेर प्रयोग मे आयल छल आ नागार्जुन हिन्दीक पहिल आंचलिक उपन्यासकार मानल गेल रहथि। एहि समस्त घटनाक बाद 'मैला आंचल' आयल छल।एहि उपन्यास कें ल' क' शुरुआती दिन मे तँ किछु संशय छल, मुदा किछुए समयक बाद 'मैला आंचल' हिन्दीक सर्वश्रेष्ठ उपन्यास सभक सूची मे शामिल क' लेल गेल। निस्सन्देह 'मैला आंचल'क सफलता 'बलचनमा' सँ बढ़ि क' रहय। रेणु नीक जकाँ जनै छला जे एहि उपन्यास कें लिखि क' ओ हिन्दी उपन्यासक क्षेत्र मे की क' गेला अछि।

                 एहना स्थिति मे दुनू लेखकक बीच प्रतिस्पर्द्धात्मक कटुता उत्पन्न हेबाक खतरा तँ भइये सकैत छल। ताहू मे तखन, जखन कि कोनो गप्पगोष्ठी मे नागार्जुन एना बाजि गेल छला जे हींग तँ कोनो खाद्य कें स्वादिष्ट बनेबाक लेल खोंटि क' बस कनेक टा प्रयोग कयल जाइत छैक, मुदा रेणु तँ मैला आंचल मे हींगक शरबत बना देलनि अछि। यद्यपि कि हींग सँ हुनक तात्पर्य स्थानीय मने मैथिलीक शब्दादि वा कथन-भंगिमा सँ छलनि। मुदा, रेणु धरि ई प्रतिक्रिया पहुँचलनि तँ ओ विना विचलित भेने मुस्किया क' रहि गेला। ई असल मे उपन्यास-कलाक मसला सँ जुड़ल बात छल, जे पारंपरिक समझ सँ भिन्न छल आ तें प्रथम श्रेणीक आलोचक जेना नामवर सिंह वा रामविलास शर्मा आदि नागार्जुनेक बातक समर्थक रहथि। रेणु एहि सब बखेड़ाक कोनो मोजर नहि देलखिन। 1955 मे ओ लिखलनि-- 'सही मायने में प्रेमचन्द की परंपरा को फिर से 'बलचनमा' ने ही अपनाया। नागार्जुन जी पर बहुत भरोसा है मुझे। मेरी स्थिति उस छोटे भाई-सी है, जो अपने बड़े भाई के बल पर बड़ी-बड़ी बातें करता है।'

             हिन्दी-संसार भने नागार्जुन कें आंचलिक उपन्यासकार कहि क' चिह्नित करनि, ओ सदा एहि बात सँ इनकार करैत रहला। जाहि मुद्दा सब कें ल' क' हुनकर उपन्यास सब लिखल गेल रहय, तकरा 'आंचलिक' कहि क' कोटिबद्ध करब हुनका सब दिन अनर्गल लगलनि। रेणुक स्थिति एहि सँ सर्वथा भिन्न छल। ओ स्वयं अपनो, अपन उपन्यास कें 'आंचलिक' कहलनि, आ आनो लोक सँ एहि कारण प्राप्त भेल विशेष कोटि हुनका सदा नीके लगैत रहलनि। नागार्जुन नीक जकाँ बुझि रहल छला जे उपन्यास सब मे ओ की क' रहलाह अछि, आ एहि सँ इतर रेणुक कयल काजक की महत्व छैक। एही दुआरे हमसब देखै छी जे 'मैला आंचल'क एलाक बादो हुनकर उपन्यास-लेखन कोनो तरहें प्रभावित नहि भेलनि। एक के बाद एक हुनकर उपन्यास सब अबैत रहलनि, आ कमोबेश ओकर मिजाज सेहो ओही ढर्रा पर बनल रहलैक। आगू चलि क' जँ हुनकर उपन्यास-लेखन छुटबो केलनि तँ तकर कारण व्यक्तिगत छल। चिर यायावर जकाँ हुनकर निरंतर यात्रा आ सदा जनाकीर्णता सँ घेरायल रहब हुनका एहि तरहें एकाग्रे होयब कठिन क' देलकनि, जकर जरूरति औपन्यासिक गद्य-लेखनक लेल अपरिहार्य रहैत छैक। दोसर ई जे 'भारतीय उपन्यास'क हुनकर समझ सदा हुनका पर सवार रहलनि। मने कि हिन्दी मे लिखल गेल एहन उपन्यास जाहि सँ भारतक यथार्थ के परत सब कें नीक जकाँ बूझल जा सकय। एही सभक दुआरे, समान भूमि, भाषा आ कथा-परिवेश रहलाक बादो दुनू गोटेक बीच परस्पर प्रीति अन्त-अन्त धरि बनल रहलनि।

                रेणुक लेखन कें नागार्जुन कोन तरहें महत्व दैत छथि? स्वाधीनता-प्राप्तिक बाद हिन्दी कथाकृति मे जे ढेर रास परिवर्तन सब आयल रहय, नागार्जुन तकरा संग जोड़ि क' रेणुक महत्व प्रतिष्ठापित करैत छथि। ओ लिखने छथि जे चिन्तन मे तँ ताजगीक नब-नब आभास प्रकट भेबे कयल, शब्द-शिल्पक नब-नब छवि सब सेहो तेजी सँ उभरल। एहि सब मे ताजगी आ अनूठापन अधिकाधिक उजागर हुअय लागल। कथाकार रेणु कें हुनकर समकालीन सभक अपेक्षा ओ एहि दुआरे बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि जे हुनकर कृति सभक बुनावट नितान्त घनगर रहनि, आ ढेर रास दुर्लभ आ बहुरंगी छवि सब कें मिला क' ओ एक बेहद ताजातरीन आ अनूप बात कहि जाइ छला। नागार्जुन लिखने छथि-- 'ऐसा उत्कट मेधावी युवक यदि कलकत्ता जैसे महानर में पैदा हुआ होता और यदि वैसा ही सांस्कृतिक परिवेश, तकनीकी उपलब्धियों का वही माहौल इस विलक्षण व्यक्ति को हासिल हुआ रहता तो अनूठी कथाकृतियों के रचयिता होने के साथ-साथ सत्यजित राय की तरह फिल्मनिर्माण की दिशा में भी यह व्यक्ति कीर्तिमान स्थापित कर दिखाता। रेणु की कथाकृतियों में ऐसे बीसियों पात्र भरे पड़े हैं।'

            लेकिन, सबटा सब किछु सपाटे सपाट हो, सेहो बात नहि छल। दुनू गोटेक बीच मतान्तर सेहो कम नहि छलनि। रेणुक प्राण भने औराहीक धनगर पेंक मे बसैत होइन, अथवा हुनकर मोन सब सँ बेसी ठेठ ग्रामीण समाजी लोकनिक संगति मे लगैत होइन, मुदा जखन ओ अपन व्यक्तिगत जीवन दिस घुरै छला तँ अपन दैहिक-मानसिक 'स्व' के प्रति नितान्त सजग भ' गेल करथि। ई चीज हुनकर पीन्हन-ओढ़न सँ ल' क' हुनका रहनी-सहनी धरि मे साफ देखाइत छल। ई सब चीज हुनकर अपना तरहक संभ्रान्तता छलनि। अपन नाम-नाम केश रखबाक सौखक बारे मे ओ स्वयं लिखने छथि-- 'लोग पौधों की देखभाल करते हैं, बालों की देखभाल मेरी हाॅबी है।' अपन एहि 'स्व सजगता' सँ रेणु कें लाभ छलनि जे उच्च बौद्धिक लोकनिक अभिजात आ संभ्रान्त समाज मे हुनका स्वीकार्य बनबै छलनि। ई अपना आप मे एक पैघ लाभ छल, मुदा नागार्जुन कें ई सब बात सदा सँ नापसंद रहनि। अपन आत्मपरिचय लिखैत 'आईने के सामने' मे ओ अपन मजाक उड़बैत रेणु कें सेहो लपेटा मे ल' लेने छथि-- 'ओ आंचलिक कथाकार, तुम्हारी आँखें सचमुच फूटी हुई हैं क्या? अपने अन्य आंचलिक अनुजों से इतना तो तुम्हें सीख ही लेना था कि रहन-सहन का अल्ट्रा माॅडर्न तरीका क्या होता है?' असल मे, रेणुक अपन खास जीवन-शैली छलनि जे नेनपने सँ निर्मित छल, आ जाहि मे नेपालक कोइराला-परिवार आ औराही हिंगनाक  सम्पन्न गृहस्थीक बराबर-बराबर के साझीदारी छल। रेणु एक किसान छला, जखन कि नागार्जुन मात्र एक कृषकपुत्र। ओतय व्यवस्था छल, एतय व्यवस्थाक प्रति विद्रोह। रेणु दर्दी किसान छला, से हुनका मे विशेष छलनि, मुदा छला किसाने।

                 रेणु कें सेहो नागार्जुन सँ कोनो कम शिकाइत होइन, सेहो नहि छल। सब सँ बेसी आपत्ति तँ हुनकर मुद्दा बदलैत रहबाक प्रवृत्ति पर छलनि। 1967 मे बिहारक संविद सरकार उर्दू कें द्वितीय राजभाषा बनेबाक निर्णय लेलक। एहि निर्णयक जोरदार विरोध भेलै। एहि घटना-क्रमक रेणु लगातार रिपोर्टिंग 'दिनमान' मे करैत रहला। स्वयं रेणुक रिपोर्ट सब साक्ष्य दैत अछि जे द्वितीय राजभाषाक पचड़ा मे पड़ब एक गैरजरूरी फैसला छल, आ ई केवल एक मुस्लिम नेता कें संतुष्ट करबाक लेल कयल गेल छल। मामला जें कि उर्दू सँ जुड़ल छल, हिन्दीक कोनो साहित्यकार विरोध मे नहि उतरला। मुदा, नागार्जुन कूदि पड़ला। आब जखन कि द्वितीय राजभाषाक प्रतिफल वा लाभ स्वयं उर्दुएक हक मे केहन- कोना रहल, ई बात नीक जकाँ स्पष्ट भ' चुकल अछि, हमसब आब नीक जकाँ बूझि सकै छी सही मे एहि पचड़ा मे पड़बाक ओ समय नहि छल। समाजवादी लोकनिक हाथ मे सत्ता आयल छलनि। पैघ-पैघ अनेको लक्ष्य ओहिना बचल के बचल पड़ल छल। तुलसी-जयन्तीक दिन गांधीमैदान, पटना मे जे सभा भेल छल, तकर रिपोर्टिंग करैत रेणु लिखने रहथि-- 'मंच पर साहित्य सम्मेलन के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा बैठे हैं-- डाॅ. लक्ष्मी नारायण सुधांशु(कांग्रेस), ठाकुर प्रसाद(जनसंघ) और...और.... नागार्जुन।...प्रस्ताव प्रस्तुत किया नागार्जुन जी ने। प्रस्ताव पढ़ते समय उनकी वाणी बौद्ध-भिक्षु जैसी ही थी। मगर जब प्रस्ताव पर बोलने लगे तो 'नागा बाबा' हो गये।' रेणुक आपत्ति अपना जगह पर जायज छल।

             आगां एहनो समय आयल जखन दुनू गोटे संग-संग राजनीति मे उतरलाह। ओ सम्पूर्ण क्रान्तिक दौर छल। ओहू मे हिन्दीक कोनो प्रगतिशील लेखक शामिल नहि भेल रहथि। बस यैह दू गोटे रहथि। हिन्दी मे नुक्कड़ कविताक आविष्कार सेहो तहिये भेल रहय, जे हद दरजाक परिवर्तन अनबा मे सफल भेल। एहि नुक्कड़ सभाक हिट कवि छला नागार्जुन। रेणु हरेक नुक्कड़ सभा मे जरूर उपस्थित होथि मुदा कविता नहि पढ़थि। हुनकर भूमिका अलग छलनि। सभा जखन खतम हुअय लागय, रेणु आ रामवचन राय गमछा पसारि क' श्रोता-दीर्घा मे घूमि जाथि। ओहि सँ जतबा टाका प्राप्त होइ, ताहि मे सँ लाउडस्पीकर आदिक किराया चुकाओल जाय, आ बांकी बचल पाइ बेगरतूत कवि लोकनि मे बांटि देल जाइन। एक बेगरतूत तँ नागार्जुन जरूरे भेल करथि। ई इमर्जेन्सीक दौर छल।  फेर ओ समय आयल जखन बक्सर जेल मे बन्द नागार्जुन भयंकर बीमार पड़ि गेला। हुनका बचबाक संभावना नहि रहल। ओ रेणुए छला जे बहु भाषाक लेखक लोकनिक दिस सँ प्रधानमंत्रीक नाम ज्ञापन तैयार करौलनि जे हुनका जेल सँ अविलम्ब मुक्त कयल जाइन। ई अलग बात थिक जे रेणु कें जरूरति भरि लेखक लोकनिक हस्ताक्षर भेटि नहि सकलनि, आ अन्तत: जेल-मुक्तिक लेल हाइकोर्टक सहारा लेल गेल। 

                आब मजेदार बात छै जे जाहि नागार्जुनक जबर्दस्त फज्झति रेणु हुनकर एहि बयानक लेल कयने छलनि जे 'हँ, द्वितीय राजभाषा मामलाक विरोध करब यदि जनसंघी होयब थिक तँ हम गछै छी, हम सौ बेर जनसंघी हेबाक लेल तैयार छी'--- ओही नागार्जुन कें जखन संपूर्ण क्रान्ति बला जेल-जीवन मे ई बोध भेलनि जे असल मे अपन वैधता प्राप्त करबाक लेल आर एस एस, सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन कें हाइजैक क' लेलक अछि, तँ नागार्जुन ओहि आन्दोलन सँ निकलि बहरेला, जखन कि रेणुक अपन राजनीतिक समझ रहनि जे अन्तो अन्त धरि ओ ओही आन्दोलनक संग बनल रहला। मुदा, जे कि सत्य सेहो छल, रेणुक निधन पर नागार्जुन लिखलनि-- 'प्रशासकीय तानाशाही के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनेवालों में रेणु अगली कतार में भी आगे ही खड़े रहे।' 

                  आ, जतय धरि रेणुक सम्भ्रान्तता आ जनान्दोलनी तेवरक बीच तारतम्यक प्रश्न अछि, हमरा एतय गोपेश्वर सिंहक लिखल संस्मरणक एक प्रसंग मोन पड़ैत अछि। एक दिन कहियो पटनाक कोनो फुटपाथ बला मजदूर होटल मे नागार्जुन आराम सँ बैसि क' रोटी-तरकारी खा रहल छला। गोपेश्वर जी देखलनि तँ भौचक्क रहि गेला। एखन हाले मे रेणुक देहान्त भेल छलनि। चारू दिस ओ चर्चा मे बनल रहथि। गोपेश्वर सिंह संग गपसप हुअय लगलनि तँ प्रसंगवश गोपेश्वर जी पूछि देलकनि-- 'बाबा, फणीश्वरनाथ रेणु यहाँ रोटी खाते या नहीं?' नागार्जुन तपाक सँ जवाब देलकनि-- 'नहीं। रेणु यहाँ रोटी नहीं खाते, लेकिन वे इन लोगों के लिए गोली जरूर खा लेते।'

(2020)










@

           

Sunday, May 18, 2025

फणीश्वरनाथ रेणुक मैथिली कथा


 

तारानंद वियोगी


रेणुक समकालीन, हुनकर कनिष्ठ मित्र लोकनि मे सँ एक भारतीभक्त (मैथिली पत्रिका 'सोनामाटि'क यशस्वी संपादक) अपन एक संस्मरण-लेख मे लिखने छथि-- 'आकाशवाणीक पटना केन्द्र सँ रेणु जीक मैथिली कहानी सब प्रसारित भेल रहैक, कुल छौ वा आठ। गंगेश गुंजन एवं छत्रानंदक सहयोग सँ हुनकर दूटा कथा हमरा उपलब्ध भ' सकल रहय-- 'जहां पमन को गमन नहि' आ 'अगिनखोर'।शेष पांडुलिपि सभक कोनो पता नहि लागल। ओ पांडुलिपि सब आइयो धरि अनुपलब्ध अछि। उपर्युक्त दू मे सँ पहिल 'सोनामाटि' मे छपल, दोसर छपियो क' नहि छपि सकल-- मने सोनामाटि बिच्चे मे दम तोड़ि बैसल आ ओ कथा छपल फार्मा सभक ढेर मे दबल-पिचायल रहि गेल।'

                 मुदा, वास्तविकता थिक जे ओ दोसर कहानी 'अगिनखोर' प्रेस मे दबल-पिचायल नहि रहि गेल रहय। ओकर पांडुलिपिक रफ प्रति रेणु अपना संग राखि लेने रहथि। यात्री-राजकमल आ रेणुक, अपन रचना सभक रख-रखाव-पद्धति मे बहुत अंतर रहय। हमसब पाबै छी जे जखन ई कथा मैथिली मे नहिये छपि सकल तँ रेणु ओकरा एक बेर फेर सँ हिन्दी मे लिखलनि आ ई कहानी 'धर्मयुग' (5-12 नवंबर,1972) मे प्रकाशित भेल। ई बात हम शुरुए मे कहि दी जे मैथिली मे जहिया कहियो रेणु किछु लिखलनि, आग्रह-अनुरोधे पर लिखलनि, आत्म-प्रेरणा सँ नहि, आ इहो बात रहै जे कोनो मैथिली पत्रिका कें ओ अयाचित रचना नहि पठा सकैत छला। तखन ई अवश्य जे जे क्यो हुनका सँ याचना केलनि, तकरा लेल अवश्य लिखलनि।

        हम गंगेश गुंजन कें पुछलियनि-- 'की रेणु जी मैथिली मे छौ टा वा आठ टा कथा लिखने हेता?' ओ ओहि दिनक स्मृति मे घुरैत उतारा देलनि-- 'नहि, अगब कहानी तँ एते नहि हेतनि, मुदा संस्मरण-वार्ता आदि सबटा कें जँ शामिल क' ली तँ एतबे किएक, एहि सँ बहुत बेसी हेतनि। असल मे आकाशवाणीक दूटा मैथिली प्रोग्राम-- 'भारती' आ 'बाटे-घाटे'--हमरा हाथ मे रहय, जाहि मे हुनका समय-समय पर बजबैत रहै छलहुँ, आ रेणु जी सेहो हमरा सभक आमंत्रण सब बेर स्वीकार करथि। अहाँ सब कें बूझल हो वा नहि, मैथिली लिखबा मे रेणु जी कें ने कहियो कोनो संकोच होइन, ने कोनो असुविधा। हमसब हुनकर एहि उदारताकक खूब लाभ उठाबी।'

       -- मुदा, ओ पांडुलिपि सब?

       -- 72 के बाद हम तँ पटना मे रहलहुँ नहि। बाद मे जखन घूरि क' अयलहुँ तँ पता लागल जे 1975क बाढ़ि मे सबटा वस्तु नष्ट भ' गेलैक।'

          फेर अचानक गुंजन जी कें लागल होइन जे कहीं हम रेणु कें मैथिली लेखक सिद्ध करबाक उत्साह मे तँ नहि छी, ओ बजला-- 'मैथिली मे लिखबाक प्रति हुनका मे कोनो उत्कण्ठा नहि छलनि। व्यक्तिगत पत्र आदिक अलावे किनसाइते ओ कहियो अपना मोनें मैथिली मे लिखने हेता। तखन हँ, ई जरूर रहय जे हमर गुरु मधुकर गंगाधर जेना मैथिली-विरोधी रहथि, रेणु जी मे से भावना कहियो नहि रहलनि।'

           रेणु कें मैथिली लेखक साबित करबाक खगतो कहाँ छै! मैथिली आ मिथिला हुनकर रचना सब में तेना टनटन बजैत अछि, अपन ओहि तमाम आरोह-अवरोहक संग, जे अइ सँ पहिने दुनिया एक विद्यापतियेक साहित्य मे एहन भाषाक उत्सव देखने छल। विद्यापति जे रेणुक एतेक प्रिय रहथिन, से ओहिना नहि। आइ जखन मैथिल लोकनि अपन संकीर्णताक कारण मैथिली कें दू जिला मे समेटि लेलनि अछि, पैघ-पैघ भाषाविद् लोकनि चिन्ता करैत छथि जे विद्यापति द्वारा प्रयुक्त सैकड़ो शब्द आइ दरभंगा-मधुबनी मे प्रचलित नहि अछि, जखन कि अररिया, मुंगेर, बेगूसराय, गोड्डा मे अपन संपूर्ण कलरव, अशेष गूंजक संग विद्यापतिक ओ भाषा-वितान मौजूद अछि।

             गुंजन जी सँ बहुत दिन पहिने मायानन्द मिश्र पटना रेडियो मे कम्पीयर छला, जखन थोड़बा दिन लेल रेणु पटना रेडियो मे अधिकारीक रूप मे पदस्थापित भेल रहथि। रेणु जीक संग अपन पहिल मुलकातक वर्णन माया बाबू एहि शब्द मे केलनि अछि-- 'ओहि दिन रेडियो मे हम हुनका टेबुल पर गेलहुँ, आ मैथिली मे अपन नाम आ अपन काजक बारे मे बतौलियनि। संगहि 'मैला आँचल' पढ़बाक, सराहबाक बातक संग हुनका सँ भेंटक प्रति उत्सुकताक गप सेहो कहलियनि। ओ ओत्तहि अपन तात्कालिक काज रोकि देलनि। ऊठि क' ठाढ़ होइत अति प्रसन्न भाव आ आन्तरिकताक संग बजला-- 'अरे वाह, अहीं छी! हमहू अहाँ सँ भेंट करबाक लेल बहुत उत्सुक रही।' (असल मे, मायानन्द मिश्र ओहि समय मे दैनिक चौपाल कार्यक्रम मे अबैत छला आ मैथिली बजबाक अपन खास छटा आ अदाक लेल बहुत चर्चित रहथि।) .....आ, हमर हाथ पकड़नहि ओ कैन्टीन दिस बढ़ि गेला। ई स्वयं हमरा लेल आ पटना रेडियोक लेल एक अप्रत्याशित घटना छल। हमरा लेल एहि दुआरे जे एतेक पैघ लेखक हमर पूर्वपरिचित छथि, भने लेखकीय स्तर पर नहि सही। आ, रेडियो लेल एहि दुआरे जे ताहि दिन मे रेडियोक कोनो अफसरक एक अदना-सन स्टाफ आर्टिस्टक हाथ पकड़ि क' चलबाक बात सोचलो नहि जा सकैत छल, आ कैन्टीन मे संग बैसि क' चाह पीबाक बात तँ असंभवे घटना छल। ओहि दिन हुनका संग बहुत रास गपसप भेल। घर-परिवार, कोशी, सहरसा, पूर्णिया आदिक विषय मे। उठैत काल ओ फेर हमर हाथ पकड़ि लेलनि, बजला-- देखू, पटना मे अपन मातृभाषा मे गप केनिहार, कम-सँ-कम हमरा सँ, अहाँ पहिल आदमी छी। हम तँ एतय अपन मातृभाषाक लेल तरसि गेल छी, बुझू।' एहि घटनाक बाद हुनका दुनू गोटेक भेंटघांट लगातार जारी रहलनि।  

                   बाद मे, सन् 1960 मे, जखन रेणु आकाशवाणीक नौकरी छोड़ि चुकल छला, आ स्वतंत्र रूप सँ पढ़बा-लिखबाक काज धरि अपना कें सीमित क' लेने रहथि, मायानंद मिश्र मैथिली मे एक द्वैमासिक पत्रिका 'अभिव्यंजना' नाम सँ निकालब शुरू कयने रहथि, रेणु जीक संपर्क-सामीप्यक लाभ उठबैत हुनका सँ भेंट क' मैथिली कहानीक मांग क' देलनि। माया बाबू स्वयं लिखलनि अछि-- 'हम जनैत रही जे हमर ई आग्रह आग्रह नहि, दुराग्रह थिक, कारण नौकरी छोड़लाक बाद आब ओ पूर्णत: कलमजीवी भ' चुकल रहथि। मुदा, हमर एहि आग्रह पर ओ चौंकलाह। मैथिलिये मे कहलनि-- 'मैथिली कहानी? एहन आग्रह तँ आइ धरि हमरा सँ क्यो नहि कयने छला। हम देब। हम अहाँ कें जरूर देब।' रेणु जे कहानी मायानंद कें देने रहथिन, वैह कथा थिक-- 'नेपथ्यक अभिनेता', जे मैथिली मे हुनकर पहिल कहानी छियनि। मायानंद मिश्र लिखने छथि जे कथा जखन रेणु हुनका देने रहनि, ओ शीर्षकहीन छल। 'नेपथ्यक अभिनेता' मायानंदक देल नाम छल, जे रेणु कें बहुत पसंद पड़लनि। मायानंद जे कि अपनो मूलत: कथाकारे रहथि, एहि कथा कें 'बेस जमल कथा' बतौलनि अछि। 'अभिव्यंजना'क दोसर अंक मे ई कथा छपल, जे कि माया बाबूक शब्द मे 'ओहि अंक कें एक अन्य ऐतिहासिकता प्रदान करैत अछि।'

                ध्यान देबाक बात छै जे मैथिली मे छपल दुनू कथा कें रेणु हिन्दी मे नहि छपबौलनि। हुनकर कुल्लम तिरसठ हिन्दी कहानी सब मे ई दुनू कथा शामिल नहि छै। बहुत बाद मे आबि क' भारत यायावर एहि दुनू कथाक हिन्दी अनुवाद करबौलनि। 'अगिनखोर' जें कि मैथिली मे छपि क' बाहर आबिये नहि सकल तें एकर पुनर्लेखन रेणु हिन्दी मे केलनि। 'अगिनखोर'क रेडियो प्रसारण कें स्मरण करैत गंगेश गुंजन कें रेणुक एक आर मैथिली कथा मोन पड़ि गेलनि। एहि कथा मे रामकृष्ण परमहंसक एक प्रसंग अबैत छल आ रामकथाक एक क्षेपक सेहो। ओकर शीर्षक गुंजन जी मोन नहि पाड़ि सकला। ओ कहानी कतहु छपबो नहि कयल, ने मैथिली मे, ने हिन्दी मे। कते खेदक बात थिक, ओही पटना सँ साप्ताहिक 'मिथिला मिहिर' नियमित बहराइत छल, जतय रेणु रहैत छला। जहिया कहियो हुनका सँ क्यो मैथिली कथा लिखबाक आग्रह केलखिन, ओ कहियो टारलनि नहि। स्पष्ट अछि जे अपन मैथिली लेखनक प्रति हुनका मे उत्कण्ठा भने नहि होइन, मुदा निष्ठा पर्याप्त रहनि। जँ से नहि होइतनि तँ अपन मैथिली कहानी कें ओ एक बेर फेर सँ हिन्दी मे लिखि पारिश्रमिक प्राप्त क' सकैत रहथि। हुनकर कहल ओ आश्चर्य-मिश्रित बात-- 'मैथिली कहानी? मुदा एहन आग्रह तँ आइधरि क्यो हमरा सँ नहि कयने छला। हम देब। जरूर देब।'-- मानू तँ ताहि दिनक मैथिली पत्रकारिताक ललाट पर अंकित कलंक-लेख थिक। किए भाइ? एते पैघ लेखक मैथिली लिखबाक आग्रह नहि टारैत छथि, से बूझल अछि सब कें। मुदा हुनका आग्रह नहि करबनि, कारण ओ ब्राह्मण नहि छथि, वा हिन्दी लेखक छथि तें अछूत छथि। मैथिली कें संकुचित करबा मे कते-कते युग सँ कते-कते महारथी सब लागल छथि, अहाँ अनुमान क' सकै छी। 

             रेणुक मैथिली कथाक सब सँ पैघ विशेषता ई छनि जे ओ सब मुख्यधाराक कहानी थिक। जेहन आ जाहि स्तरक कहानी रेणु हिन्दी मे लिखलनि, ठीक-ठीक तेहने मैथिली मे। कहब जरूरी नहि जे हरेक भाषाक लेल/ भाषा के, लेखकक मोन मे एक स्पष्ट आभामंडल बनल होइत अछि। जखन लेखक कोनो खास भाषा मे लिखि रहल होइत अछि तँ एहि आभामंडल सँ आवश्यक रूपें घेरायल रहैत अछि। कोनो भाषाक प्रति जँ लेखकक दृष्टि कमतर रहैत अछि तँ जाहिरा तौर पर से ओकर लिखल वस्तुक कथ्य आ ट्रीटमेन्ट दुनू मे प्रतिध्वनित होयबे करैत अछि। जेना, अपन आखिरी दिन मे नंदकिशोर नवल यात्रीपरक अपन एक संस्मरण मे लिखलनि जे मैथिली मे तँ एखनो महाकाव्ये लिखल जाइत अछि, महाकाव्येक युग चलि रहल अछि। मैथिल भाइलोकनि कें भने ई बात खराब लागनि, मुदा चौबगली देखू तँ नवल जीक कथन निरर्थक नहि लागत। एहना स्थिति मे ओहि भाषाक जे पाठक हेता, ओहो ओही स्तरक हेता। एहना स्थिति मे कोनो पैघ आधुनिक लेखक जँ मैथिली मे लिखत तँ एहि आभामंडल सँ तँ जरूर ओकर पल्ला पड़तै। अहाँ कें साइत भरोस करब मोश्किल होयत जे मैथिलीक महान आलोचक रमानाथ झा जखन अंग्रेजी लिखि रहल होथि तँ टी.एस.इलियट कें अपन आदर्श मानैत गजब के वस्तुनिष्ठ विश्लेषक नजरि आबथि, मुदा वैह आचार्य अपन मैथिली-लेखन मे प्राचीन ब्राह्मणवादी आदर्शे धरि अपना कें सीमित राखब मैथिली-लेखनक लेल पर्याप्त मानैत छला। राजकमल चौधरी सेहो अपन हिन्दी आ मैथिली लेखन मे अलग-अलग चीन्हल जा सकैत छथि, ओना दुनू जगह अपना-अपना तरहक नवता आ प्रयोगशीलता मौजूद छनि। यात्री नागार्जुन एहि मे सब सँ अलग छथि आ हुनका लेखन मे ई फांक लगभग गायब अछि। रेणु के मैथिली-लेखन मे सेहो हमसब यैह बात पबैत छी। लेखक जँ सही मे पैघ हुअय तँ अपन मेधा सँ कोनो खास भाषाक बनल-बनाएल लीक कें, ओकर आभामंडल कें तहस-नहस क' दैत छैक। एहि सब सँ भाषाक औरदा आ ओकर ओज बढ़ैत छैक। 

              उदाहरणक संग गप कयल जाइ तँ बात बेसी साफ होयत। 'नेपथ्यक अभिनेता' ठीक ओही संकट पर लिखल गेल कथा थिक जे कि रेणुक दू अन्य हिन्दी कथा 'ठेस' आ 'रसप्रिया' मे आयल अछि। ने सिरीचन हारि मानबा लेल तैयार अछि, ने मिरदंगिया। एहि कथाक अभिनेता सेहो हारबा लेल तैयार नहि अछि। एम्हर समय तते तेजी सँ बदलि रहल अछि जे एहि कलाकार सभक जीयब कठिन कयने अछि।  'लोक' के युग-युग व्यापी संस्कृति विलुप्ति के कगार पर अछि। अधखिज्जू आधुनिकता आ देखावटी लोकतंत्र पाबि क' पूंजी आरो अधिक बलिष्ठ, आरो बेसी घातक भ' चुकल अछि, जे धरोहर सभक सत्यानाश क' देबा पर तुलल अछि। काल्हि धरि जाहि आसन पर सामंत लोकनि छला, ओही आसन पर आइ पूंजीपति अछि आ राजनीति तँ बुझू ओकर खबासिन छियै। ओकरा लेल कथी थिक संस्कृति, कथी थिक धरोहर? सब गोटे जनैत छी जे 'लोक'क जीवंत संस्कृति सँ लगातार दूरी बरतनिहार एहि 'गोबरपट्टी' सँ रेणु कते आहत रहैत छला। लोक-धरोहर सभक उजड़ैत जेबाक जेहन दारुण चिन्ता हमरा सब कें रेणु लग मे भेटैत अछि, एक रहू कारण सँ ओ अपन समकालीन भारतीय भाषा सभक लेखक मे अन्यतम छथि। 

              'ठेस'क सिरीचन एहि कारण सँ उजड़ैत अछि जे आब प्लास्टिक बाजार मे आबि गेल छै आ प्लास्टिकक बनल शीतलपाटी लोक कें सस्ते टा नहि, आकर्षको लागय लगलैक अछि। मिरदंगिया विदापत नाच के मूलगैन रहल अछि। मूलगैन होयब कते पैघ बात भेलै, से जाननिहार जानिते हेता। विदापत नाच आब बीतल जबानाक बात बनि क' रहि गेल, जकर कलाकार सब आब संभ्रान्त बाबू-बबुआन सँ भीखो धरि पेबाक हकदार नहि रहल। किएक? एहि दुआरे जे विदापत नाच आब पछड़ल आ जाहिल समुदाय के मनोरंजनक वस्तु बनि क' रहि गेल। जें कि तथाकथित लोकतंत्र आब आबि गेल छै, तें पछड़ल-जाहिल समुदाय सेहो अपना कें पछड़ल-जाहिल मानबा लेल तैयार नहि अछि। एहि कारण सँ जाहि समुदाय विशेषक ई धरोहर छल, ओहो आब एहि परंपरा कें आगू ल' जेबाक लेल तैयार नहि अछि। रेणुक रेखाचित्र 'विदापत नाच'(1941) कें ध्यान मे राखि क' देखी तँ रेणु अपन रचनाशीलताक आरंभे एही चिन्ता सब सँ कयने रहथि। 

            नेपथ्यक ई अभिनेता पारसी थियेटरक विख्यात अभिनेता रहल अछि। देशक चुनौटा पन्द्रह टा थियेटर कंपनी मे ओ काज क' चुकल अछि। अपना जबाना मे ओकर लोकप्रियता एहन रहै जे लोक ओकर एक झलक पाबै लेल भीड़ लगा दैत छल। भारत मे सिनेमा आयल तँ थियेटर कें उजाड़ि देलक। सबटा कंपनी सब बेराबेरी बन्द भ' गेलै। मिरदंगिये जकाँ ई अभिनेता सेहो रोड पर आबि गेल। बदलल माध्यम आ माहौल के संग एडजस्ट करबाक कोशिश ओ नहि कयने हो, सेहो नहि। एहि मामला मे ओ सिरीचन आ मिरदंगिया दुनू सँ आगू बढ़ल नायक थिक। कहानी सँ पता लगैत अछि, सिनेमाक चला-चलती देखि क' ओ फिल्मनगरी बंबई धरि सेहो गेल, मुदा ओहि ठामक रेवाज आ कल्चर तते अलग रहै जे ओतय ठठब ओकर मोन नहि मानलकै। ओ गर्दिश के मारल जरूर अछि मुदा हारल नहि अछि। आब ओ एक बिलकुल नब विधा मे काज शुरू केलक अछि। आब ओकरा अटैची मे तरह-तरह के मुखौटा भरल रहैत अछि, आ एकटा करिया लुंगी, जकर उपयोग ओ ग्रीनरूम के रूप मे करैए। ओ मुखौटा सब ओहि-ओहि ड्रामाक मशहूर नायक सभक छियै, जकर करतब देखबाक कद्रदान एखनो बहुत ठाम बचल छै। अपना लुंगी सँ ओ मुँह झंपैत अछि, आ भीतर खट द' मुखौटा बदलि, लुंगी हटबैत अपन मुखौटाक अनुरूप ड्रामा सभक डायलाॅग बाज' लगैत अछि, उचित वाचिक-आंगिक अभिनयक संग। ढेर रास लोक जमा भ' जाइत छैक। ओ पुरान दिन लोक सभक आँखि मे जिन्दा भ' उठैत छैक। बच्चा सँ ल' क' बूढ़-बुढ़ानुस धरिक भरपूर मनोरंजन होइत छैक आ, कार्यक्रमक अन्त मे अपन टोपी कें भिक्षापात्र बना क' ओ दर्शक सब सँ आना-दू आना मांगि लैत अछि। बंबइ भने ओकर सब किछु छीनि लेने हो मुदा एक कला छै जे ओ बंबइये मे सिखलक अछि-- पूरा आत्मविश्वास संग फूसि बजबाक कला। आब ओ ककरो सँ बेझिझक कहि सकैत अछि-- 'साब, एक्सक्यूज मी, फाॅर लास्ट टू डेज आइ एम हंग्री, वेरी हंग्री, मांगने की हिम्मत नहीं होती किसी से।' एहि स्थिति मे अभिव्यंजना-संपादक माया बाबूक कहल ई बात तँ ठीक छै जे ई कथा नौटंकीक प्रख्यात पात्रक अंतिम समयक आर्थिक तंगी आ उपेक्षाक कथा थिक, जकर एक झलक पयबाक लेल ओहि बीतल समय मे लोक, बच्चा सँ बूढ़ धरि, तरसैत छल। मुदा तैयो ई मानबाक संगति हम नहि देखैत छी जे कलाकार आब रिटायर्ड भ' गेल अछि। नहि, रिटायर्ड नहि भेल अछि, ओ तँ पूरा जुझारूपनक संग जीवनसंघर्ष मे शामिल अछि आ कलासाधना मे सेहो। एहि कलाक माध्यम आ रूप-रंग भने बदलि गेल हो, मुदा ओकरा रोजी-रोटी देबा मे आइयो कले काज आबि रहल अछि।

               सुदूर इलाका सँ चलि क' कलाकार फारबिसगंज आयल अछि, जतय के बारे मे ओकर समझ छै जे 'मिथिला देस में आज भी नाटक के काफी शौकीन लोग हैं।' मजा के बात छै जे साठि-पैंसठ बरस पहिने फारबिसगंज के गनती मिथिला देस मे रहै, से स्वयं रेणु जी लिखलनि अछि। मुदा आइ बीच मे एहन राजनीति आबि गेल छै जे साइत रेणु जीक धियोपुता कें से मानबा मे असुविधाक बोध होइन। एकटा दोसर सत्य इहो छै जे एहि कथा कें लिखल जेबाक बादो कम सँ कम चालीस साल धरि मिथिला मे, एकर गाम-गाम मे नाटक जिन्दा छल। से नाटक सब लगभग ओही ढब-ढांचा के, जेहन कि नौटंकी कंपनी सब मे भेल करैत छल। एकरा लोक उत्तर बिहारक ग्रामीण रंगमंच कहल करै छथि। एहि कला कें चालीस बरस बादो धरि सिनेमा नहि खा सकल छल। सिनेमाक गाना सब जखन निच्चां उतरि क' आर्केष्ट्राक रूप मे गाम-गाम पहुँचल, तखनहि एहि ग्रामीण रंगमंचक अंतिम खात्मा भेलैक। 

          एहि कथा मे कला-समीक्षकक सेहो आगमन भेलैक अछि। ई देखब रोचक अछि जे सामान्यत: समीक्षा-दृष्टिक बल पर बांहि पुजौनिहार लोकनि कते पश्चगामी होइत छथि। सांप के भागि गेलाक बाद लाठी पिटपिटेनहार जमातक 'लोक' मे बहुत खिल्ली उड़ाओल जाइत छैक। रेणुक कला-समीक्षक कें एहि सँ कनेको कम नहि मानल जाय। हुनकर आनो अनेक रचना सब मे एहन लोकक बारे मे हुनकर यैह नजरिया प्रकट भेल अछि। तात्पर्य पश्चगामिता सँ अछि, जकरा समीक्षा-सिद्धान्तक रूप मे महिमा-मंडित करबाक चलन रहल अछि। वास्तविकता ई थिक जे मामला चाहे सृजनात्मक साहित्यक हो कि स्वयं व्यक्तिक जीवनक मार्मिकता-- हमसब पबैत छी जे एकर मर्म ठीक-ठीक पकड़बाक काज मे समीक्षक लोकनि बहुधा असफल रहैत छथि। एहि कथा मे तकरो एक प्रसंग अयलैक अछि। 

            आठ-नौ बरखक उमर रहल हेतै कथावाचकक, जखन ओ गुलाबबागक मेला मे पहिल बेर कोनो थियेटर देखने छल, आ ओही पहिल शो मे एहि अभिनेता कें सेहो देखने छल-- नेपथ्यक एहि अभिनेता कें, जकर की नाम रहै, तकर चर्चा रेणु एक्को बेर नहि कतहु कयने छथि। ओ छुट्टीक समय छल। स्कूल जखन खुलल, तँ थियेटरक एहि अतीन्द्रिय अनुभव कें बालक लोकनि एक दोसर कें सुनाइये रहल छला कि एही बीच समीक्षकक आगमन भेल। ओ आर क्यो नहि, कथावाचकेक सहपाठी बकुल बनर्जी छल, जकर उमर सेहो आठे-नौ बरस रहै। रेणु लिखैत छथि-- 'बड़ चंसगर, जन्मजात आर्टक्रिटिक, ओकरा कथनानुसार अइ नकली कंपनी मे-- पछिला बरस नागेसरबाग मेला मे ऐल असली कंपनीक छटुआ लोक सब छलै।' कोनो एक कंपनी मे काज केनिहार कलाकार जँ ओकरा छोड़ि क' दोसर कंपनी मे चलि जाय, तँ ओ (दोसर) कंपनी नकली कोना भ' गेल? मुदा रेणु बतबैत छथि जे केवल कलाकारे जन्मजात नहि होइछ, समीक्षक सेहो जन्मजाते होइत अछि। समीक्षकक एक तेसर मुद्रा सेहो होइ छै, ओकरो रेणु एतय उठा अनने छथि। एते मजा के चीज कें नकली ठहरेबा सँ जखन कथावाचक उदास भ' जाइत अछि, तँ अपन मित्रक प्रीत्यर्थ समीक्षक झट अपन मुद्रा बदलि लैत अछि-- 'तोव एक ठो बात हाइ-- ईस कंपनी में जिस मानुस ने रेलवे पोर्टर का पार्ट ये किया है, वह नागेसरबाग में आया कंपनी में भी यही पार्ट करता था, उसको तो नकली नेही कहने सोकते।' मतलब, जकरा हमसब समीक्षा-सिद्धान्त कहैत छियै, ओकरो प्रावधान सब सुविधा आ परिस्थितिक हिसाब सँ बदलि जेबाक लेल अभिशप्त रहैत अछि‌।

                 अन्त मे आबि क' कथा जतय अपन सर्वाधिक मार्मिक स्थल पर पहुंचैत अछि, मने कि बूढ़ा कलाकारक ई कथन-- 'साब, एक्सक्यूज मी, फाॅर लास्ट टू डेज आइ एम हंग्री, वेरी हंग्री-- संयोग कहियौ जे बकुल बनर्जी ओतय उपस्थित छल। रेणु लिखैत छथि-- 'जन्मजात आर्ट क्रिटिक हमर सहपाठी बकुल बनर्जी आइयो कला आ कलाकार कें चिन्हबाक धंधा ओहिना करैत अछि, सब दिन ओ एके रहल। हमरा दिस तकैत बकुल बाजल-- तू भी इसका बात मे फँस गये, मुझसे काल यह कह रहा था-- फाॅर टू डेज आइ एम हंग्री....!'

          एकटा विन्दु अबैत छैक जखन मार्मिकता आ समीक्षाक बीच सीधा मुठभिड़ान सँ बचब संभव नहि रहि जाइछ। यैह बात एहि कथाक अन्त मे आबि क' भेलैए। कथावाचक कें बकुलक कहल ई बात बहुत ओछ, बहुत तुच्छ लगलै। दुखी भ' क' ओ बकुल कें पुछैत अछि-- 'ठीक-ठीक बताना बकुल, इसके डोलते काया के पिंजड़े में जो पंछी बोल रहा है, उसकी बोली को सुनकर तुमको कुछ नहीं लगा?'

             -- 'कुछ नहीं लागता तो काल्ह ठो सारा दिन इसके साथ भीख मांगता? चोन्दा तो भीख ही हुई!'-- ई बकुल थिक जे अपन समीक्षाक सीमा स्वीकार क' रहल अछि।तखन एक दीर्घ नि:श्वासक संग ओ सीमा नांघि जाइत अछि। कहैत अछि-- 'क्या बताएं-- कैसा लगा! लगा, तुम्हारे अथवा मित्रगणों के साथ रात भर भागकर थियेटर देखने गया हूँ, हाॅस्टल से।' कथावाचकक प्रतीति सेहो किछु एहने अछि-- 'हाँ बकुल, मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा।' अनुभूतिक ई एकता समीक्षा-दम्भ के धराशायी भेलाक बादे संभव अछि, जकर तात्पर्य भेल जीवनक मार्मिकताक स्वीकार। एहि तरहें देखी तँ एहि कथाक विषय, सामने देखार पड़ि रहल दृश्य सब सँ कतहु बेसी गहन, अधिक व्यापक अछि।

            जेना कि पहिने कहि चुकल छी, भाषाक प्रश्न रेणुक लेल दोयम भेल करनि। मुख्य प्रश्न वस्तुक छल आ ओकर रूप-विन्यास के, जकर एते पैघ सिद्ध कलाकार एतय आर क्यो नहि भेला। जें कि जे कोनो वस्तु ओ लिखलनि भने ओ हिन्दिये मे हो, मुदा ओ सबटा मिथिलाक बारे मे अछि, ओतहि के कहन मे, ओतहि के गढ़न, ओत्तहि के दिलक पतियेबा मे, अत: स्वाभाविक रूप सँ हिन्दी आ मैथिली मे लिखल वस्तु सब अलग-अलग स्केल पर नहि देखाइछ। कते आश्चर्यजनक बात थिक जे 'अगिनखोर' सन कहानी ओ मैथिली मे लिखने छला, जखन कि तहिया हिन्दियो मे एहि तरहक वस्तु लिखब चलन मे नहि छल, मैथिलीक तँ बाते छोड़ू।

                   'जहां पमन को गमन नहि' हुनकर दोसर मैथिली कथा छियनि, एकटा एहन विषय पर, मानू जे समुच्चाक समुच्चा रेणु-साहित्य जेना एक एही आशयक विस्तार होइक। एकर केन्द्र मे गाम छै। सौभाग्यवश ओ गाम नहि, जाहि मे जीबा लेल हम-अहां आइ अभिशप्त छी, अपितु ओ गाम जे पचास बरस पहिने ठीक एही रकबा पर मौजूद छल, जकरा छोड़ि क' हमसब आब बहुत आगू आबि गेल छी। आजुक तँ हाल छै जे की गाम, की शहर, सब ठाम एक्के रंग विषकुम्भ। टीवीक चैनल, हरेक हाथ मे मोबाइल, हरेक दिमाग मे गोबर भरबाक अभियान। पचास बरस पहिने मिथिलाक गाम केहन रहै, तकरे वृत्तान्त सब कें तँ लिखि क' रेणु एते पैघ लेखक बनि गेला। मैथिलीशरण गुप्तक ओ प्रसिद्ध पांती एतय मोन पड़ैत अछि जतय ओ राम कें कहने छनि जे तोहर नामे अपना आप मे काव्य छह, तें राम-गुण गौनिहार क्यो कवि बनि जाय से सहज संभाव्य छै। मोन मानबाक बात छै, रेणुक शब्द मे कही तँ दिल पतियेबाक। हम रामक बदला ई संभाव्यता गाम मे पाबै छी, हमरा लग से मानबाक बहुतो रास उदाहरण अछि। पहिल उदाहरण तँ स्वयं रेणुए छथि, यद्यपि कि ओ बहुत प्रतिभाशाली, बहुत सृजनक्षम लेखक छला। 'जां पमन को गमन नहि' कथा बहुत मार्मिक छै। एकर आरंभे एना भेल छै जे जखन कथावाचक गाम सँ घुरैत छथि तँ हरेक बेर हुनकर मित्र लोकनि पुछै छनि-- 'की यौ! कत' जा क' डूबि जाइत छी?' बीच मे ई कहि दी जे ई कथा बेस लालित्यपूर्ण भाषा आ कहन मे लिखल गेल अछि, जकरा पढ़ैत पाठक कतेको ठाम मुस्कियेने विना नहि रहता। से, रेणुक लेल गाम जायब, डूबि जायब कोना छल, तकर विस्तार एहि ठाम देखल जा सकैए। ओ स्वयं कहै छथि-- 'मने हमरा जँ कहियो डुबबाक मोन होइत अछि तँ हम गाम दिस विदाह होइत छी।' डुबबाक की अर्थ? शहर मे जाबे धरि अखबार नहि आबि जाय तँ 'दीर्घ वा लघु की, कोनो शंकाक निवारण सरलता सँ संभव नहि। मुदा गाम पहुँचितहि अखबारक दिशा अपनहि टूटि जाइत अछि।' दिशा शब्द कें ध्यान दी, जकर प्रयोग पुबारि मिथिला मे शौच-निवृत्तिक अर्थ मे होइत छैक। गाम मे रहनिहार पाँच-सात सौ लोकक लेल दुनियाक कोनो बखेड़ा, जे कि अक्सरहां मीडियाक माध्यम सँ अबैत छैक, ओकर निर्भय-नि:शंक जीवन कें बाधित नहि क' सकैत अछि। गामक दुनिये एक अलग दुनिया छिऐक। लिखै छथि-- 'तें, एक्को सप्ताह गाम सँ भ' अबैत छी तँ लगैत अछि-- सूखल मोन फेर पनिया गेल।जेना कान,आँखि आओर नाक, सब नव भेटि गेल हो।' दोसर बात ई छै जे जहिया-जहिया गाम सँ घुरै छथि, किछु ने किछु नव ल' क' अबिते टा छथि। कोनो बेर नव चूड़ा, नव चाउर, नव गूड़, आर कोनो बेर नव शब्द। कहै छथि-- 'बिनु डुबने एहन नव वस्तु-- शब्दमोती-- ककरो नहि भेटतनि।' एहि बेरुक यात्रा मे जे वस्तु अनलनि अछि, से यैह शब्दमोती सब छैक। बरसात के समय छै। गामक नबका नहरि कोनो ठाम टुटि गेलैए, तें सगरो जलामय अछि। एहि स्थिति कें गाम मे उजहिया कहल जाइ छै, मने मत्स्योत्सव। अघोरीदास हरबाह छथि। हुनका पुछै छथिन कतय टुटलै हौ, तँ उतारा भेटै छै-- ' टूटल नहि छै। कनेक सन 'बिरचि' गेल छै। कतय? दस आरडी लग। कथाक पांती छै-- 'के पतिआओत जे एहन घनघोर गामक ई अघोरीदास हरबाहा-- बासि भातक संग हरियर मरिचाइ जकाँ-- एकहि संग दुइ गोट हरियरे अंग्रेजी शब्द कचरि गेल।' एतबे नहि ने, पुछै छथिन--अपन हर कतय बहैत छहु? मैनरक ओहि पार, साइफन सँ उत्तर-- भीसीक भिठबा पर। तों एम्हर कत' जाइत छह बरद हांकने? अही ठाम कलवर्ट पर जायेब। ई तँ संयोग कहियौ जे कथावाचक कें एक दिन गामक ओहि अहद्दी छौंड़ा सँ मुलकात भ' गेलनि, जे आब सिंचाइ विभागक 'पेट्रोल' भ' गेल अछि। तखन हुनकर बुद्धिवर्द्धन भेलनि जे आरडी भेल रिड्यूस्ड डिस्टैन्ट। मैनर माने माइनर। साइफन आ कलवर्ट मे की अन्तर छै, सेहो बुझलनि। भीसी भेलै-- विलेज चैनल। भारी वर्षा आ बाढ़ि कें देखि एक गोटेक कहब भेलै जे 'एहन बाढ़ि रहल तँ एहि बेर फेर धानक कमीशन।' कमीशन की? ओ नहि जे सब क्यो बुझैत छियै। कमीशन के मतलब भेल अभाव। कथा मे पांती छै-- 'एहन बहुतो विदेशी-देशी शब्द अछि, जकरा हमर गाम बला सुखा क' माछक सुंगठी जकाँ उपयोग करैत अछि।' उदाहरण देने छथि-- अनबन, झगड़ादन, बोला-भुक्की बन्द-- एहि समस्त वस्तुस्थितिक लेल गौआं लोकनि आब एके टा शब्द सँ काज चला लैत अछि-- कनटेस। वाक्य देखू-- आइकाल्हि फलना सँ हुनका कनटेस (कनटेस्ट) चलैत छनि-- फलना बाबू  हुनक सपोट (सपोर्ट) कोना करता! जहाँधरि पोटेसे (प्रोटेस्ट) करता।          

             कथा मे एकठाम अबैत छैक-- 'हमरा गामक कोनो-ने-कोनो टोल मे, कालान्तर मे-- एकाध एहन आदमी फरैत रहला अछि, जे सब अपन-अपन युग मे नव-नव शब्द, नव-नव गारि ओ एक सँ एक बिकटाह कहबी गढ़ि क' हमरा गामक सरस्वती कें 'मुनहर' मे जमा क' गेलाह।' ध्यान राखल जाय-- एहि किसिमक लोक जनमैत नहि छथि, आम-जामुन जकाँ फरैत छथि। एही प्रसंग मे एकटा शब्द-निर्माणक खिस्सा कथावाचक कें मोन पड़ि जाइन छनि। हुनकर एक कविमित्र छलखिन जे गामेक एक भद्र व्यक्तिक सार छला। 'हमरा गाम मे एखनो एहन प्रिय 'कुटुम कें सार्वजनिक सम्पत्ति बूझल जाइत छनि।' से, कविमित्र कें एक बोनिहार एक दिन चुटकी लैत पुछि देलकनि जे बाबू, अपने तँ इसलोक-दुहा-कवित्त बनबैत छी, हमरा एकर अर्थ बुझा दिय' जे 'जहाँ पमन को गमन नहि, रवि ससि उगे न भान/ जो फल बरमाह रचौ नही, सो अबला मांगे दान'-- कहू जे ई कोन फल भेलै? जखन कविजी कें कोनो जवाब नहि फुरलनि तँ वैह बोनिहार कूट करैत बाजल-- की हौ कुटुम? सब 'सोनपिपही' सटकि गेल? स्वाभाविक जे तकरा बाद एक जोरदार पिहकारी पड़ल हेतै। ई शब्द-- सोनपिपही-- की भेलै, ओ केहन होइए? होइतो अछि की नहि? मुदा, गामक सरस्वतीक मुनहर मे एक नव शब्द ओहि दिन आबि क' शामिल भ' गेलैक। कवि महोदय अपन नबका कथा-संग्रहक नामे राखि लेलनि-- सोनपिपही। बाद मे आबि क' जखन ई शब्द ख्यात भेलैक तँ शब्दकोश सब मे एकर अर्थ बताओल गेल-- 'उत्तर बिहार तथा नेपाल तराइ दिस बाज' बला वाद्ययंत्र।'

          एहिना, कृषिविज्ञानक एक शब्द कोना प्रचलन मे आएल रहै, तकर खिस्सा। भेलै ई जीप पर सवार भ' कोनो हाकिम गाम बाटें जाइ छला। देखलनि जे एक बुढ़ा अपन खेत मे मड़ुआ रोपै छला। जीप रोकि क' हाकिम बुढ़ा कें पुछलखिन-- बूढ़ा, धान छोड़कर मड़ुआ क्यों रोपता है? अपन झुकल डांड़ कें सोझ करैत बुढ़ा बजला-- बाबू, अपनेक गाड़ी तँ चारिये गोट पहिया सँ चलैत अछि-- ई पांचम पहिया पाछां दिस किए खोंसि लैत छी? जवाब सुनि हाकिम अकबका गेला। बुढ़ा बजला-- जेना अपनेक ई पांचम पहिया, तहिना हमरा सभक ई मड़ुआ। धान, गहूम, जौ-मकइ हुसि गेल तँ हुसि गेल-- मुदा ई मड़ुआ नहि हुसै बला। हाकिम बेचारे एहि गाम सँ ई शब्द अपन विभाग मे ल' गेला आ नबका शब्द बनलै--'स्टेपनी क्राॅप'।

            यद्यपि कि ई कथा शब्दे सभक बारे मे अछि, तें ई नहि बूझल जाय जे बस एतबे कथा छै, अथवा एकहारा कथा छै। एक एक क' क' गामक अनेक दृश्यावली एहि कथा मे एलैए। भूमिका एकरा बूझल जाय-- 'भगवान तथा भगवतीक सम्मिलित कृपा सँ हमर गाम आइयो धरि घोर गामे अछि। हमरा गाम मे ककरो पढ़ब-लिखब नहि धारैत छैक। धार-साजक गप्प! ककरो पानक लत्तरि लगायब नहि धारैत छैक तँ ककरो नारियर रोपब आ ककरो कुकुर पोसब।तें, हमरा गामक जे केओ दुइयो आखर लिखि लेताह-- से सब गाम छोड़ि विदाह होइत जेताह।' सही मे, 'धार-साज' बला बात कते मार्मिक छै! थोड़-बहुत पढ़ल-लिखल लोक अपन गाम छोड़ैत अछि, बेसी पढ़ल लोक अपन राज्य छोड़ैत अछि आ जँ कायदा सँ पढ़ल हो तँ अपन देशे छोड़ि दैत अछि!

                  जे गाम सँ विदा भ' गेला तिनकर तँ बात छोड़ू। एहि कथा मे ओहि लोक सभक वृत्तान्त एलैए जे गाम कें धयने छथि। नहरि टुटला सँ गाम मे बाढ़ि आयल छै। गामक समस्त लोक उजगहिया मे माछ मारै लेल बहरायल छथि, जाहि मे कथावाचक अपनो छथि। माछ मारबाक वा पकड़बाक औजार की सब? धाँसा-धिम्मरि, टापी, जाल, कोयना आदि। जुवकक तँ बाते की नेनाभुटका सभक सेहो बुट्टी-बुट्टी चमकि रहल अछि एहि मत्स्यक्रीड़ाक उत्साह मे। धाँसा-धिम्मरि मे जखन पोठी-चुन्नी-टेंगरा-पैना आदि नन्हका माछ सब फँसैए तँ केहन लगैत अछि? --'धाँसा-धिम्मरि मे सोनाचानीक लाबा-फरही फुटैत जकाँ।' कोनो धाँसा मे एकाध टा अमेरिकन कबैय देखि क' एक गोटे बजैए-- 'जा-जा, ले अल्हुआ! फोचाय बाबूक पोखरि सेहो उमटाम भेलो रे!' अमेरिकन कबैय फोचाय बाबुए टा के पोखरि मे पोसाइत अछि, तें ओहि कहबैका के अनुमान सोड़हो आना सत्य छै। ता, एक दिस माछ बझौनिहार सभक दल मे कोलाहल भेल-- गंगाजीक माछ! कथावाचक उत्सुकतावश जा क' देखलनि तँ एक गोटेक टापी मे हिलसा माछ फँसल छल। अमेरिकन कबैय कें चिन्हनिहार माछबुझक्कड़ कें आब दोसरे फिकिर ध' लेलकै। ओ चिन्तित स्वर मे बाजल-- 'ओह, ससुरारि दिसुक सब गाम-घर गंगाजी मे भसिया गेल।'

एक इलाकाक मछबाह कें कोनो दोसर इलाकाक माछ देखार पड़ि गेल तँ ओहि इलाकाक जलमग्न हेबाक अनुमान स्वाभाविक रूप सँ भ' जाइत छैक। आ ओहि ठाम तँ तरह-तरह के लोक। क्यो बाजि देलक जे गंगाजीक की बात करै छह, आब तँ बुझह समुद्रोक माछ एतहि भेटि सकै छह! एहि बात पर 'माछक शिकारी सभक रसना एकहि संग सरसरा क' सरस भ' गेल-- एह! समुद्रक माछ? सुनै छियै जे समुद्रक माछ मे नोन देबाक कोनो प्रयोजन नहि। ठीके हौ?' मने बूझि लिय'। गामक जीता-जागता बहुरंगी छवि किताब पर उतारि देने छथि रेणु। एहि कथा मे जे 'शब्दमोती'क उल्लेख भेलैए, तकरे बिछबाक हुनर रहनि रेणु मे, आ ताही लेल ओ गाम जा क' डूबि जाइत छला, आ यैह ओ नेओ थिक जाहि पर रेणु-साहित्यक समुच्चा संवेदना-संसार ठाढ़ छै।