Wednesday, July 5, 2023

लोक-आस्थाक समांग: प्रदीप बिहारी

 


         तारानन्द वियोगी


प्रदीप बिहारी जीवनक बहुरंगी संभावनाक गहींर पारखी कलाकार छथि। अपन लेखनक आरंभिके काल सं कथासाहित्य कें ओ अपन सृजनक दिशा बनेलनि। कथासाहित्यक जतेक जे कोनो विधा छैक-- कथा, उपन्यास, लघुकथा, कथेतर गद्य-- सब विधा मे प्रदीप लेखन केलनि अछि आ ओहि-ओहि विधा मे सफलता हासिल कयलनि अछि। ई सब विधा शुरुहे सं हुनक अभिरुचिक केन्द्र मे रहल। दोसर दिस, हुनकर अवलोकनक क्षेत्र सेहो बेस व्यापक रहल अछि। नि:स्व भिखमंगा सं ल' क' सर्वसाधनसंपन्न उच्चवर्गीय लोकक जीवन-प्रसंग धरि समान रूप सं हुनकर साहित्यक विषय बनल अछि। हुनकर लेखनक प्रधान जीवनमूल्य रहलनि करुणा, जे एक दिस तं हुनकर अवलोकन मे गहराइ अनलक तं दोसर दिस जीवनक विडंबना सब सेहो अपूर्व व्यंजनाक संग हुनकर कथासाहित्य मे उतरल अछि। जीवनक एक-एक खण्ड हुनक कथा मे आबि क' तेना पुनर्सृजित होइत चलैत छैक, जे बहुधा यैह लगैत अछि जे प्रदीप अपने कथा नहि लिखैत छथि, अपितु हुनकर कथा स्वयं अपना कें लिखैत अछि।

      प्रदीप सहज कथा-रचनाक आग्रही छथि। हुनका कतहु छुच्छ प्रयोग लेल प्रयोग करैत नहि देखबनि। ओ कोनो प्रसंग कें अपन पात्र सभक संग सीधा साफ ढंग सं उठबैत छथि आ आगू बढ़ल चलि जाइत छथि। जीवनक अपन जटिलता छैक सेहो हुनकर कथा मे पूरे विस्तारपूर्वक अबैत अछि। मुदा एकरा प्रदीपक कला-कौशल कहल जाय जे समस्त जटिलता हुनकर रचना मे आबि क' सुसंवेद्य सरलता मे ग्रथित भेटैत अछि। एकर शक्ति हुनका भेटैत छनि अपन कहन-शैली सं जे नितान्त यथार्थवादी गद्यक एक सहज वितान बनबैत अछि। अपन ई शैली ओ निश्चिते अपन एकाग्र कथा-साधना सं प्राप्त केलनि अछि। ओ मैथिलीक आधुनिक कथा-परंपरा मे ललितक धाराक विकास केलनि अछि। हुनक कथा सभ अत्यधिक सोझ आ तें आत्यन्तिक रूपें संवेद्य होइत छनि। सहृदयता आ सहजता- जे प्रदीपक व्यक्तित्वक पोर-पोर मे विद्यमान छैक, एही तरहें हुनक कथो सभ मे अनुस्यूत देखाइत छैक।

      प्रदीप लोक-आस्थाक समांग छथि। लोक अपन सम्पूर्ण गतिमयता आ विविधताक संग हुनक कथा सभ मे चाह मे दूध जकां तेना मिझराओल छैक, जे हुनक कथा सभ सं गुजरैत कत्तहु अहां कें निस्संगता आ एकान्त होयबाक बोध नहि होयत। हुनकर कथा-संसार बहुत व्यापक अछि। एक साधारण मजूर सं ल' क' सत्ता-संचालनक शक्तिशाली समूह धरि, गरीब महादलित सं ल' क' कुलाभिमानी धनीक धरि, बिनु कोनो भेदभाव के सब धर्म, सब जाति, सब लिंग के मनुक्ख कें हुनकर साहित्य मे समान रूप सं नागरिकता प्राप्त छैक। मुदा, हुनकर हमेशा इष्ट रहलनि अछि-- जे काज आ आचरण मनुष्यताक लेल उपकारक अछि तकर समर्थन, आ जे मनुष्यता-द्रोही अछि तकर विरोध। अपन कथा-साहित्य मे ओ अपन पात्रक भीतर बहुत गंहीर धरि उतरैत छथि आ बहुत दूर धरि ओकर पीछा करै छथि। फल होइत अछि जे जकरा समाज मे भव्य-भाव्य मानल जाइछ से अधिकतर छोटहा साबित होइत अछि। आ तहिना, जाहि लोक कें आम तौर पर छोट मानल जाइछ तकरा भीतर जे मनुष्यताक चेतना रहैत छैक से बहुत पैघ होइत अछि। उच्चवर्गक चित्रण करैत प्रदीप कें अहां अधिकतर गंहीर व्यंग्य-भाव सं भरल देखबनि जखन कि हुनकर कथा अपन अपेक्षित गतिये मे निर्णायक विन्दु दिस गमन करैत देखायत। सोचल जाय तं एते सरल शिल्प मे एहन जटिल सामाजिक सत्यक उद्घाटन करबा मे प्रदीप बिहारी मैथिलीक एक विरल कथाकार छथि।

      प्रदीप बिहारी हौसलाक लेखक छथि, आ तें ओ भविष्यक लेखक सेहो छथि। लाख दुख आ संघर्षक अछैत लक्ष्यविन्दुक संधान मे बढ़ैत जायब- प्रदीपक केन्द्रीय स्वर थिकनि। हुनकर पात्र सब कें अधिकतर अहां जुझारू बनल देखबनि। मामूली धंधा करय बला श्रमिक सं ल' क' स्वावलंबी स्त्री धरि समान रूप सं हुनकर कथाक पहुंच छनि। दोसर जे हुनकर कथा-साहित्य एखन धरि कहियो कालबाधित नहि भेल अछि। जेना-जेना समय, देश आ समाज बदलल, प्रदीपक कथा-साहित्य मे एहि समस्त बदलाव के दृश्य आ गूंज कें ओकर सम्पूर्ण असार-पसारक संग सगरे पसरल देखब। ने हारब स्वयं हुनका पसंद छनि ने हुनकर कोनो पात्र कें। जीवन जेहन अछि ताहि सं ओकरा बेहतर हेबाक चाही, प्रदीपक केन्द्रीय लेखन-आयोजना एही बातक संकल्प थिक।