Saturday, December 15, 2018

अक्षर कविता

।।अक्षर कविता।। तारानंद वियोगी क कम्मल ओढ़ि क' सूतल बौआ खोंता मे अछि नन्हकू कौआ जौं जौं कौआ कारी ह'एत तौं तौं बौआ और मोटाएत ख खा क' पी क' इसकुल जाउ सब बच्चा कें दोस बनाउ पढ़ू लिखू आ गाबू गाना सब सं बढ़ियां घर के खाना ग गाम गाम मे मचलै सोर कुकुर पकड़लक दूटा चोर एक चोर छल नेता भाइ दोसर चोरबा हुनक जमाइ घ घर घर आसन, घर घर पानि नीक वचन आ उचितन मानि भला लोक, भल भाषा भेस ई अप्पन छी मिथिला देस च चान सुरुज सं बरसय मोती तै सं मनुखक जीवन-जोती घर सं निकलू सांझ-परात गाछ-बिरिछ संग करियनु बात छ छागर कें अछि दूटा सींग बूढ़ सपेरा बजबय बीन जौं जौं सपरू भागल जाय तौं तौं छगरू सींग देखाय ज जामुन खाइ लेल दैया गेली सौंसे जीह रंगा क' एली बौआ बजला-- काली माय लाल कहां छै?-- पुछलनि दाय झ झमझम बरसय बरखा रानी छत्ता ल' क' चलली नानी सनसन बहलै हवा-बयार उनटल छत्ता दांत चियार ट टमटम मे घोड़ा के शान रिक्शा चढ़ि आबथि मेहमान बस पर चढ़ि क' इसकुल जाउ रेल चढ़ू तं धक्का खाउ ठ ठाम-ठाम पर गाछ-बिरीछ तै सं धरती लागय नीक जन्मदिवस पर रोपू गाछ जा क' देखियौ धारक माछ ड डर-भय के कोन्नो नै काज सब सं बढ़ियां अपन समाज लोकबेद सं नाता जोड़ू डर-भय कें एकदम्मे छोड़ू ढ ढनढन मेघ बजाबय बाजा अनहा गां मे कनहा राजा पानि पड़त तं बाजत बेंग पिपही बजबय करिया भेम्ह त ताल तलैया पानिये पाइन माछ-काछु के लाइने लाइन बंसी खेलथि बुरबक नाथ एक माछ नै आबनि हाथ थ थारी, बाटी आर गिलास मम्मी जी के खासम खास थारी मे परसै छथि भोजन भरल गिलासक बहुते ओजन द देश हमर छी भारत देश रंग-बिरंगक सुंदर भेस विन्ध, हिमाचल, यमुना, गंगा चरण पखारथि जलधि तरंगा ध धरती के काया छै गोल तै पर जीव-जन्तु के घोल तै पर सनसन बहय बसात तै पर मह-मह सांझ-परात न नाम हिनक थिक गोनू झाह हंसा हंसा क' करथि तबाह गोनू झा के अलगे रस्ता हे-हें क' क' हरदम हंसता प पापा पापा, इम्हर आउ सुइया मे तागा पैसाउ बिन चश्मा नै पैसत मूरी आंखिक रक्षा परम जरूरी फ फक्का-फुक्की मुरही चूरा कोठिक चाउर मे लागल सूरा फटकू फटकू रौद देखाउ फट द' कोठिक मूंह मुनाउ ब बमबम भोला, बमबम भोला सब कमरथुआ पिन्हलनि चोला चलला सब क्यो बाबा धाम ई बम, ओ बम, सब बम नाम भ भारी काज करथि से वीर सबल बना क' राखु शरीर रोज करू कसरत हे दाइ भागत सबटा रोग-बलाइ म म सं मम्मी, म सं मैया मां के बल पर कुदकथि भैया मां के ममता बड़े अनूप मां धरती पर ईश्वर-रूप य यौ अंडित, पंडित के भाइ सौन मास भांटा नै खाइ अदना लेल कहै छी जैह अपनो बाबू, करियौ सैह र राम-रहीम दुनू छथि एक झील कहू कि कहियौ लेक जिनकर रहल भावना जैसन प्रभु-मूरत से देखलनि तैसन ल लाल बबा के ललका धोती सब अंगुरी मे मूंगा, मोती तरह तरह के मंत्र जनै छथि तखन किए नै ग्रेट बनै छथि श श्याम कहाबथि किसन कन्हैया बंसुरी बजबथि, चरबथि गैया जिनकर मोन बसय बड़ दूर तिनकर आस विधाता पूर स घर पर लीखल शुभ ओ लाभ नारिकेर फल कहबय डाभ थिक अनार आ नाम बेदाना मौसी गाबथि फिल्मी गाना ह हमर अहां के दोस्ती पक्का नै क्यो भातिज, नै क्यो कक्का जे पढ़ता से बढ़ता आगू नियम भेल छै सब पर लागू

Wednesday, December 5, 2018

मैथिली आलोचना:स्थिति आ अपेक्षा

तारानंद वियोगी ///// मैथिली आलोचनाक आइ की स्थिति अछि आ एकरा सं लोकक की अपेक्षा छै, ताहि पर हम गप करी, एहि सं पहिने कने एक नजरि एहि दिस देखि लेबय चाहब जे एहि आलोचनाक बारे मे आम लोकक समझ केहन छनि। आम लोक माने आम साहित्यिक लोक। कारण, शुद्ध रूप सं जकरा आम लोक कहल जाय ओकर प्रवेश आलोचना धरि हेबाक प्रश्ने कहां छै, आम साहित्यिक लोक तं सेहो आलोचना सं कनछी कटैत, हांजी हांजी करैत कहुना आगूक बाट पकड़ि बढ़ि जाय चाहैत रहैत अछि। आलोचना ककरा चाही? पुरस्कार सब पर जिनकर नजरि छनि तिनका लेल आलोचना बेकार, कारण पुरस्कार कोनो आलोचना पढ़ि क' नहि देल जाइत अछि। जे स्वान्त:सुखाय लिखै छथि हुनका तं आलोचना सं काजे की? ओ तं अपन बस लिखता आ सखा-सहोदर सब सं वाह वाह सुनता। जे पकिया जिनियस लेखक छथि हुनको आलोचना सं बहुत मतलब नहि कारण अपन रचनाशीलता कें आलोचना-दुरालोचना सं दग्ध हेबाक अवकाश ओ नहि छोड़य चाहैत छथि। कतेक लोक दोसरो बात कहै छथि। कहै छथि जे माटि सं जुड़ल भाषा-समाज सब मे आलोचनाक लेल स्पेस कम रहैत छैक। ओतय हृदयधर्मी आपकताक चलन पाओल जाइत छैक, जखन कि आलोचना एक बौद्धिक उपक्रम थिक। एहि तरहक सोच रखनिहार लोक सब निश्चिते कोनो भाषा मे ओकर आलोचनाक विकास कें ओहि समाजक बौद्धिक विकास सं जोड़ि क' देखैत छथि। हमरा मुदा, एहू आग्रह मे कोनो दोष नहि देखाइत अछि। मैथिली माटिक भाषा छी। माटिक भाषा मे लोकक प्रकृत संस्कार सब सं बेसी घनगर रहैत छैक। लोक शिक्षा आ युगीनता बाहर सं सिखैत अछि। साक्षर हेबाक बादो लोक युगीनता कें सिखबा सं इनकार क' सकै छथि, सेहो होइ छै। मिथिला मे तं से खूब होइत अछि। आदि आदि। अपन स्थिति देखैत छी तं ख्याल अबैत अछि जे मैथिली आलोचनाक संग हमर संबंध कते पुरान अछि। 1982 मे, जखन कि हम एक सद्य: आगंतुक कवि रही, ओही साल पटना मे नवतुरिया लेखक सम्मेलन आयोजित भेल रहै। ओकर आयोजक छला विभूति आनंद आ केदार कानन। ओहि सम्मेलनक आलोचना-सत्र मे युवा कविता पर लेख पढ़बाक जिम्मा हमरे छल। ओहि दिनका प्रसंग छत्रानंद बटुक भाइक ओ बात मोन पड़ैत अछि। पुछने रहथि, की करै छी? उत्साह सं उत्तर देने रहियनि, राजकमल कान्वेन्ट स्कूल मे प्रिंसिपल छी। बाजल रहथि, ऐं यौ, तखन तं अहां स्कूलक मास्टर सब एखन धरिये पहिरैत हेता! मतलब, मैथिली आलोचना मे हमर रुचि अत्यन्त प्राचीन अछि। तें लगभग चालीस वर्षक आलोचना कें निकट सं देखलाक बाद हम आलोचना सं अपन अपेक्षाक बारे मे दू-चारिटा गप कहब आ उम्मीद करब जे एकर जे स्थिति छै से स्वाभाविके रूप सं एहि मे आबि जाएत। मैथिली आलोचनाक बारे मे आम राय की अछि? राय अछि जे एकर विकास नहि भ' सकल, मैथिली मे आलोचना एकदम अवनत दशा मे अछि। जकरा देखू सैह आलोचना पर थुम्हा भरि थूक फेकैत नजर एता जे धुह, ई कोनो जोगरक नहि भ' सकल। जे मैथिली आलोचनाक विकास सं लगभग अनजान छथि सेहो एहन कहैत भेटि जेता जे मैथिली मे आलोचना एखन अपन बाल्यकाल मे अछि। मुदा प्रश्न अछि जे आम राय एहन किएक अछि? मिथिला-समाज कें अहो रूपं अहो ध्वनि: चाहिऐक, आलोचना नहि चाहिऐक, की बात एतबे अछि आ कि एहि मे मैथिली आलोचनाक अपनो किछु दोख अछि? हमरा लगैत अछि, अपनो दोख अछि। से जं नहि होइत तं कोनो कारण नहि छल जे जाहि भाषा मे रमानाथ झा सन अतंद्र विद्वान आद्य आलोचक भेला, काञ्चीनाथ झा किरण सन तत्वदर्शी विचारक भेला, किसुन जी आ रामानुग्रह झा सन अध्येता समीक्षक, कुलानंद मिश्र आ मोहन भारद्वाज सन पक्षधर विमर्शकार भेला, राजमोहन झा आ जीवकान्त सन दूटूक टिप्पणीकार काज केलनि, अवसर एला पर यात्री जी आ राजकमल चौधरी सन यशस्वी लेखक आलोचनाक पक्ष मे ठाढ़ भेला, कोनो कारण नहि छल जे से आलोचना थूक फेकबा जोग स्थिति मे मानल जाइत। तें, दोख तं एहि मे आलोचनाक अपनो अछि। आचार्य रमानाथ झाक आलोचना पर अपन एक अध्ययन हम वर्ष 2006 मे प्रकाशित करौने रही। ओहि ठाम हम देखौने रही जे आलोचनाक उच्च मानदंड रचितो रमानाथ बाबू मैथिली आलोचना कें पूर्ण रूपें प्रतिष्ठापित करबा मे किए असफल रहला, जखन कि हुनके सन स्थिति मे होइतो रामचंद्र शुक्ल हिन्दी आलोचना मे सफल भेला। असल मे, रमानाथ बाबू कें भविष्य सं कोनो नीक आशा नहि छलनि आ ओ अतीत-गौरवक निस्सन पक्षपाती भ' गेल रहथि। एहना मे हुनका लेल प्रयुक्त शब्द 'हंसवृत्ति' अथवा 'नीरक्षीरविवेकी' आदि शब्द कौखन संदिग्ध लगैत अछि। आश्चर्यक बात छल जे टी एस इलियट कें अपन आदर्श मानितो ओ अतीतमुखिये बनल रहला आ युगीन लेखन सं लगभग निरपेक्ष आ असहमत बनल रहला। मैथिली आलोचना कें एकटा स्वरूप द' क' ओ ठाढ़ तं जरूर केलनि मुदा आलोचना-पुरुषक आंखि ओकर पीठ दिस निरमाओल गेलै, जकर रूपक एखनहु पं गोविन्द झा अपन आत्मकथा मे व्यवहार करै छथि। रमानाथ बाबू आलोचक मे पाओल जाइ बला गुण आ ओकर कार्यप्रणालीक दमदार मार्गदर्शिका बनौलनि आ वैचारिक गद्यलेखन कें शोध आ आलोचनाक रूप मे दू अलग अलग अनुशासन मे विभक्त केलनि। हुनकर आलोचकीय मानदंड तते उच्च छलनि जे विशाल शिष्यमंडली होइतहु हुनका परंपराक क्यो आलोचक नहि भ' सकला, जे भेला से विद्वान आ शोधप्रज्ञे भेला। हुनकर सीमा पाठ्यपुस्तक, विश्वविद्यालय आ पुरस्कार-प्रतिष्ठान धरि घेरायल रहल। आइ विश्वविद्यालय सभक मैथिली शोध विभागक की हाल अछि से ककरो सं नुकाएल नहि अछि। आधुनिक अर्थ मे जकरा ठीक ठीक आलोचना कहल जाय, तकर शुरुआत मैथिली मे किरण जीक लेखनक संग होइत अछि। मुदा, किरण जीक आक्रोशी आ विद्रोही स्वर अंत अंत धरि हुनका मे बनल रहलनि, एतय धरि जे अपन एक कविता मे, ओ कामना करैत देखल गेला जे मृत्युपर्यन्त हुनकर ई विद्रोही स्वर एहने बनल रहनि। विद्यापति, उमापति, चंदा झा, किरतनिञा नाच, लोकपरंपरा आदि कतेको विषय छल जाहि पर रमानाथ बाबू सं किरण जीक घोर मतभेद छल आ तकरा ओ साफ साफ धारदार भाषा मे लिखबो केलनि। मुदा ओहि जुगजबानाक नायक रमानाथ झा रहथि आ तें किरण जी कें खलनायकक हैसियत भेटलनि आ हुनकर काज कें परिभाषित करबाक लेल एकटा नब शब्द प्रचलन मे आनल गेल--प्रत्यालोचना। मुदा, गंहीर नजरि सं देखू तं आश्चर्य लागत जे एते भारी लोक आ सिद्धान्तकार भेलाक बादो मिथिला आ मैथिली कें ल' क' रमानाथ बाबूक भविष्यदृष्टि किरण जी जकां साफ नहि छलनि। एहि बातक कतेको उदाहरण अछि। मुदा, जाहि तरहें विद्वत्समाज किरण जीक जीताजी हुनकर मूल्यांकन केलकनि, ई बात सामने आएल जे 'प्रत्यालोचना' वस्तुत: अपन स्वभावे सं संभ्रान्त समाजक मान्यता आ शास्त्रसम्मत साहित्यदृष्टि के विरोधी चीज थिक। कहब जरूरी नहि जे जकरा ओ लोकनि प्रत्यालोचना कहि रहल छला, वस्तुत: वैह मैथिली आलोचना छल। रमानाथ बाबू अपन प्रभावशाली धीर-गंभीर व्यक्तित्व आ कर्मठ ज्ञानकुशलताक कारण, अनेक प्रभावी शिष्यमंडली सं सुशोभित, हिमालयक कठिन शिखर जकां अलंघ्य मानल जाइत रहथि। हुनकर सघन प्रभाव मैथिली साहित्य पर पड़ब अवश्यंभावी छल। मैथिली आलोचना एहि सं दीर्घकालिक रूपें प्रभावित भेल। एहि प्रभाव कें हम आइयो धरि घनगर बनल देखि सकै छी। दूटा दृष्टान्त। मैथिली आलोचनाक मूलस्वभाव अतीतगामी अछि। जे बीति चुकल छै, मैथिली आलोचना कें तकरे चिन्ता करैत देखबै। ओना तं आलोचना विधे अपन स्वभाव मे साहित्यक पश्चगामी होइत अछि, मुदा ओकर पयर अपना जुगक जमीन पर ठाढ़ रहै छै। बुझनिहार बूझि सकै छथि जे अतीतगामी हेबाक बात जे हम कहि रहल छी से एहि सं भिन्न बात थिक। दोसर, मानक भाषाक बहुत आग्रही रमानाथ बाबू छला। आलोचनाक अपन विशिष्ट भाषा होइक तकर ओ व्यवस्था देलनि आ एहि व्यवस्था मे आलोचना आबद्ध बनल रहल। हमरा लोकनि आगूक विकास कें देखि चकित भ' सकै छी। कुलानंद मिश्र मैथिली आलोचनाक दोसर पैघ सिद्धान्तकार भेला। ओ रमानाथ बाबूक समानान्तर आलोचनाक एक प्रतिरूप ठाढ़ केलनि। ओतय वर्गविभाजित समाज मे साहित्य कें भौतिकताक नजरि सं देखबाक आग्रह छल। समाजार्थिक आधार कोना साहित्य आ साहित्यकार कें उपयोगी आ कालजयी बनबैत छैक, तकरा ओहि ठाम देखल जा सकैत छल। आठम-नवम दशक मे कुलानंद जी काज क' रहल छला मुदा हुनकर विचारक अवधि आजादी बादक पांचम-छठम दशकक साहित्य छल। मुश्किल तं ई छल जे मानदंड मे रमानाथ बाबूक प्रतिरूप रचितो कुलानंद जीक आलोचना-भाषा रमानाथ बाबूक अनुगामी छल। हुनकर भाषाक जादू सं ओ बाहर नहि निकलि सकलाह। एहि भाषाक जादू कें तोड़ैत हमरा लोकनि मोहन भारद्वाज कें देखै छियनि। कदाचित यैह हुनकर सब सं पैघ देन छनि, यद्यपि कि क्षेत्रीय इतिहास आ स्थानीय समाजशास्त्र कें आधार बना ओ साहित्यालोचनाक एक नव परिपाटी विकसित केलनि। मजा के बात छै जे कि राजमोहन झा आ जीवकान्त अपन आलोचनात्मक लेखन मे अतीतगामिता आ मानक भाषिकता--एहि दुनू अपाय सं कहिया ने बहरा गेल छला। मुदा, हिनका लोकनिक मुश्किल छल जे हिनकर स्वर असहमतिमूलक छल। उचित बात अपने कहितो ओ मुख्यधारा कोनो आन व्यक्ति कें, आन पद्धति कें मानि रहल छला, आ एहि तरहें ओकर इज्जति उतारितो ओ मानि ओकरे द' रहल रहल छला। फलस्वरूप कोनो प्रतिरूप नहि रचि पाबि रहल छला। मैथिलीक आम समुदाय मे आलोचक कें नीक नजरि सं नहि देखल जाइछ। प्रकारान्तर सं ईहो वैह बात थिक जे एतय आलोचना कें कोनो जोगरक नहि मानल जाइछ। सामाजिक छविक दृष्टि सं जं विचार करी तं देखब जे कविताक चलन भने सब सं बेसी होउक मुदा कविक छवि कोनो निरस्तुकी पोख्ता छवि एखनहु नहि अछि। कुलानंद मिश्र सन नास्तिको कवि छथि आ प्रदीप मैथिलीपुत्र सन आस्तिको। कथाकार अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति मे छथि मुदा नितान्त प्रतिगामी सोच रखनिहारो अनेक अयुगीन लोकक प्रवेश कथा-क्षेत्र मे छैक। एहि समस्त लेखक समुदाय मे सं एक आलोचके छथि जिनकर पोख्ता सामाजिक छवि बनि सकल अछि। परंपरित मैथिल मानदंडक हिसाब सं आलोचक आधुनिक होइत छथि, जिनका साबिक मे अंग्रेजिया कहल जाइन लगभग तेहने। अधिक तं संभावना जे ओ नास्तिक होथि, आ जं से नहियो तं पूजापाठ, धर्मकर्म नुका क', एकान्त मे करैत होथि। धर्मक विचार हुनका मे नहि पाओल जाइछ। आचार विचार सं अपवित्र, अभक्ष्य खेनिहार, अविहित बरतनिहार आदि आदि। ऊपर सं भारी दोख जे ई राजनीतिक विचार सेहो रखैत छथि। अधिकतर वामपंथी। 'बुद्ध अइसन अन्हार' सं संस्कारित मैथिल समाज एहि आलोचक समुदाय पर कोना भरोस क' सकैत अछि? तें लोक थूक फेकैत छथि आ बजै छथि जे आलोचना कोनो जोगरक नहि भ' सकल! एहना मे देखबाक चाही जे आलोचकक जं पोख्ता छवि छनि तं तकरा बराबरी मे कोनो तेहन उपलब्धियो छनि की नहि? तकर एक प्रसंग। एखन हाल मे हम फेसबुक पर मिथिला स्टुडेन्ट यूनियनक एक विद्यार्थी, आदित्य मोहनक एक पोस्ट देखैत रही। कोनो मित्र हुनका हरिमोहन बाबूक पुस्तैनी घर के वीडियो पठौने रहनि। ओहि घरक उजड़ल-उपटल अवस्था देखि क' आदित्य बहुत दुखी रहथि आ अपील केने रहथि जे एहि महान साहित्यकारक घर मिथिलाक तीर्थस्थान थिक आ तें आउ, हम सब सामाजिक सहयोग सं एकर पुनर्निर्माण करी। सत्य पूछी तं आदित्यक ई पोस्ट पढ़ि क' हमरा जे भावना भेल से तं भेल, मैथिली आलोचनाक ताकत के सेहो अनुमान भेल छल। जेठजन कें मोने हेतनि जे एखन हाल तक हरिमोहन बाबू कें 'हास्यरसावतार' कहल जाइत छलनि। हुनका संबंध मे विद्वान लोकनिक राय की रहनि? बुझले अछि जे पहिलुका जुग मे एकवाक्यीय आलोचनाक चलन रहै। जेना उपमा कालिदासस्य,जेना मुरारेस्तृतीयो पन्था:, जेना सूर सूर्य तुलसी शशी। तहिना हरिमोहन बाबू आ यात्री जी पर रहनि-'स्वच्छंद प्रोफेसर टांग-हाथ, दंतावलि पूर्वहि तोड़ि देल। दुर्भाग्य सं संप्रति मैथिलीक 'पारो' कपारो फोड़ि देल।' प्राचीन परंपराक एहि आलोचकीय स्थापना सं हमरा लोकनि बूझि सकैत छी आजुक युगक दू प्रमुख शलाकापुरुषक बारे मे हुनका लोकनिक राय की रहनि। आइ जे हरिमोहन बाबू कि यात्री जीक प्रति समाजक सहमति-भाव छैक, से रचनाक ताकत तं छैके, मैथिली आलोचनाक सेहो एक देन थिक। किरण जीक थोड़-बहुत शिकायत कें छोड़ि देल जाय तं हम सब देखब जे मैथिली आलोचनाक समस्त उपक्रम हरिमोहन झा कें समर्थन देबा मे एकमत अछि। किरण जीक जे शिकायत रहनि सेहो हुनकर व्यंग्य पर नहि, हुनकर हास्य पर रहनि आ आरोप रहनि जे हरिमोहन बाबू मे करुणाक अभाव छनि, विपरीत रस हेबाक कारण। किरण जीक शिकायत मे सेहो सार रहनि कारण, हम सब देखल जे प्रतिपक्षी जखन हरिमोहन बाबू कें रफा-दफा केलकनि तं हास्यरसावतारे कहि क' केलकनि। स्वयं राजकमल चौधरीक प्रतिष्ठा सेहो आलोचनाक एहने उपक्रमक प्रमाण थिक। आइ जे हमरा लोकनि पढ़ैत छी जे पचासक दशक मे ललित-राजकमल आदिक युग मैथिली साहित्य मे आधुनिक युगक श्रीगणेश छल, मने अंधकार-कालक आरंभनहि छल, मोन रखबाक चाही जे एहि मे आलोचनाक बहुत प्रमुख भूमिका छैक। दोसर दिस, आलोचना जे काज नहि क' सकल से काज हेबा सं कोना छुटले रहि गेल तकरो दर्जनो उदाहरण हमरा सब लग अछि। जेना महाप्रकाशक कथा-साहित्यक मुल्यांकन। आलोचनाक नजरि एहि पर एखनहु नहि पड़ल अछि। जहिया पड़त तं पता लागत जे विश्वसाहित्यक दुर्लभ दृष्टान्त कते दिन मिथिलामिहिरक पन्ना मे हेरायल रहलै। मुदा, मजा के बात थिक जे मैथिलीक मैनेजर लोकनि जरूरे आलोचनाक एहि ताकत सं वाकिफ छथि तें हमरा लोकनि देखैत छी जे राजकमल चौधरी पर जखन लिखबाक अवसर अबैत छैक तं ओ लोकनि प्राचीन विश्वविद्यालयीय विद्वान देवेन्द्र झा कें आगू अनैत छथि, जाहि सं नीक जकां राजकमलक श्राद्ध कयल जा सकय। आ से ई कोनो एकटा दुर्घटना भ' गेल हो सेहो नहि थिक, सुनियोजित कार्यप्रणालिये यैह थिक। एना कयला सं आलोचना पर लगातार थूक फेकैत रहबाक सुविधा बरकरार रहै छै। प्राचीन परिपाटीक विद्वान आ आधुनिक आलोचकक दृष्टिकोण मे जे अंतर छै, प्रसंगवश ताहू बारे मे हमरा लोकनि कें किछु गप करबाक चाही। रमानाथ बाबू भने एकाध ठाम अपना कें आलोचक कहि गेल होथि, मुदा ओ मूलत: विद्वाने छला आ सैह कहबाएब हुनका पसंद रहनि। हुनकर जे लेखनशैली अछि सेहो विद्वाने बला अछि। ओहि ठाम लोकतांत्रिक ढंग सं विमर्शक गुंजाइस नहि छैक, एकर बदला ज्ञाता हेबाक ठसक छै आ ताहि कारणें लहजा उपदेशात्मक छै। निरुपाय भेने आधुनिक लोकनि अपन प्रथम आलोचक के रूप मे रमानाथ बाबूक नाम लैत छथि। आ प्राचीन लोकनि कें आधुनिकक सामना करैत जखन निरुपाय भ' जाय पड़ैत छैक तं ओ लोकनि रमानाथ बाबू कें बीच मे ठेलि अनैत छथि। पछिला तमाम वर्ष मे यैह नूरा कुश्ती चलैत रहल अछि। मुदा, दृष्टिकोण? तकर एकटा दृष्टान्त। रमानाथ बाबू पांच सय सं बेसी पृष्ठ मे अपन विद्यापति संबंधी अध्ययन प्रकाशित करौलनि। ओहि मे विद्यापतिक कुलगोत्र-देवता-गुरु-आश्रयदाता आदि समस्त विषयक विशाल अध्ययन छैक। विद्यापति पर किरण जी सेहो लिखलनि आ रमानाथ बाबूक अध्ययन मे झोल सेहो देखौलनि। हुनक कहब भेलनि जे विद्यापति कें देखबा लेल मैथिल आंखि चाही। एकर मने इहो जे रमानाथ बाबू मे तकर अभाव छनि। ई 'मैथिल आंखि' शब्द आगू आलोचनाक एक विशिष्ट पारिभाषिक शब्द बनि गेल। ई आंखिबला मैथिल निश्चये रमानाथ बाबूक मैथिल सं भिन्न छल। ओतय जूगल कामति, छीतन खबास कें सेहो प्रामाणिक मैथिल मानबाक आग्रह छल। दोसर, रमानाथ बाबू विद्यापति संगीत पर सेहो काज केलनि। ओ समय छल जहिया मिथिला कें नब नब विद्यापति भेटल रहनि आ सौंसे दुनियां पसरबाक गहमागहमी सं मैथिली समाज भरल छल। पचगछिया घरानाक मांगनलाल खबास गायकीक क्षेत्र मे सौंसे देश मे धूम मचेने छला। मांगनलाल विद्यापति कें सेहो गाबथि, आ से बेस प्रशंसित भ' रहल छल। ओ पहिल गायक रहथि जे विद्यापति-गीत कें सोलो (एकल) गेबा जोग धुन मे बन्हने छला, ने तं एहि सं पहिने स्त्रीगण उत्सव आदि मे तं कोरस मे गबिते छी, नटुआ लोकनि नाच मे एकरा जखन गाबथि, कोरसे गबैत छला। मांगनलाल के देखादेखी रामचतुर मल्लिक सेहो सोलो गाबय लागल छला। ग्रामोफोन रेकर्ड पहिल पहिल शारदा सिन्हा के बहरेलनि, से मोन रखबाक चाही जे शारदा जी पचगछिया घरानाक शिष्या रहल छथि। अस्तु। एक विशेषज्ञ अध्येताक रूप मे जखन रमानाथ बाबू लग ई प्रश्न उपस्थित भेलनि जे विद्यापति-संगीतक संरक्षण कोना हो, ओ व्यवस्था देलखिन जे विद्यापतिक गीत कखनहु सोलो नहि गाओल जेबाक चाही आ सदति कोरसे गेबाक चाही। वैद्यनाथ धामक पंडा लोकनि किरतन मे जाहि तरहें विद्यापति गीत गबै छला तकरा ओ आदर्श रूप मानलनि आ तकर संरक्षणक जरूरत बतेलनि। ऊपर हम रमानाथ बाबूक भविष्य-दृष्टिक बात केने रही। तकर हुनका मे कोना अभाव छलनि से एहू दृष्टान्त सं बूझल जा सकैत अछि। सामाजिक प्रोत्साहनक अभाव मे विदापत नाच लुप्त भ' गेल आ स्त्रिगणक कोरस निमुन्न मे पतराइत गेल। वैद्यनाथ धामक गीत ओकर अपनो किरतन सं समयक अनुसार गायब होइत गेल। आइ विद्यापति संगीत जं बचल अछि तं सोलो गायके लोकनिक उद्यम पर बचल अछि। दोसर दिस हम सब देखैत छी जे 'मैथिल आंखि' के अवधारणा समयक संग भकरार होइत गेल अछि आ हरेक युगक मिथिला अपन आदर्श एहि आंखि कें ल' क' ताकि लेत, ततबा पर्याप्त अर्थव्यंजना एहि मे भरल छैक। एहि साल मैथिलीक प्रमुख आलोचक लोकनि मे सं एक मोहन भारद्वाज निधन भेलनि, तं तहिया सं मैथिली आलोचनाक प्रति विवेकी जनक हृदय मे बहुत चिन्ता होइत हमरा लोकनि देखि रहल छी। भारद्वाज जी पूर्णकालिक आलोचक रहथि आ मैथिली आलोचनाक इतिहास मे कैकटा नब स्थापनाक लेल आ नब आलोचना-भाषाक लेल जानल जाइत रहथि। प्राय: दू दशक पहिने ओ 'सांस्कृतिक चेतना'क अवधारणा निरूपित कयने रहथि, जाहि पर सुभाष चंद्र यादव हुनका पर कटु आलोचना लिखने रहथिन। समय साबित केलक जे सांस्कृतिक चेतनावादक अवसान दक्षिणपंथी अधिनायकवादे पर जा क' भ' सकैत अछि आ एहि तरहें सुभाष जीक चिन्ता बेसी सही साबित भेल। मुदा, ई तं मात्र एक सिद्धान्तक बात भेल। पैघो लोक बुते गली होइ छै तकर उदाहरण लेल। बांकी अपन दू प्रमुख आलोचना पुस्तक मे सं दुनू ओ श्रमजीवी मैथिल संस्कृतिक प्रतिष्ठापन मे लिखलनि। हुनकर लेख सब नब समाजार्थिक संदर्भ मे साहित्य कें देखबाक दृष्टि दैत छल। तें चिन्ता स्वाभाविक अछि कारण ओहि तरहक क्यो दोसर आलोचक आइ उपलब्ध नहि छथि। मुदा, हियासि क हमरा लोकनि देखी तं पायब जे जेना भारद्वाज जीक अपन खास विशेषता, खास ध्वनि छलनि, तहिना आनो अनेक लोक अपन अपन खास विशेषताक संग मैथिली आलोचना मे सक्रिय रहल छथि। भीमनाथ झा पुरान परंपराक लोक छथि मुदा अपन खास अंदाज मे नब रचनाशीलता कें जाहि तरहें परिभाषित आ मूल्यांकित करबाक काज ओ केलनि अछि सेहो फेर आन ठाम दुर्लभ अछि। हरे कृष्ण झा आलोचनाक क्षेत्र मे लगभग निष्क्रिय छथि मुदा कहियो कदाल जे हुनकर लेख सब अबैत अछि जे तेहन पारंगामी पाठालोचनात्मकता सं लैस रहैत अछि जे तकरो अन्य उदाहरण दुर्लभ अछि। तहिना सुभाष चंद्र यादव। असल मे, आजादी बादक तमाम समय मे जहिया सं मैथिली साहित्य मे आधुनिकताक प्रतिष्ठापन भेलैक अछि, मैथिलीक तमाम विधा मे काज केनिहार काबिल लेखक सब मे आलोचनात्मक विवेक पूरा प्रस्फुटित भेल भेटैत अछि। कहब जरूरी नहि जे जाहि आलोचनात्मक विवेक कें ल' क' क्यो लेखक दुनियांक यथार्थ मे सं अपन रचनाक लेल वस्तु तकैत अछि, एक नीक आलोचना लिखबाक लेल सेहो ओही आलोचनात्मक विवेक के खगता रहैत छैक। मने आलोचना सेहो एक खास प्रकारक सृजने थिक। तें हमरा लोकनि देखैत छी जे मूलतः जे कवि छथि जेना सुकान्त सोम, नारायण जी, वा मूलतः जे कथाकार छथि जेना अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, वा जे कवि-कथाकार छथि जेना विभूति आनंद, देवशंकर नवीन, हुनका लोकनिक आलोचना युगीन ऊष्मा सं भरपूर तं रहिते अछि, आलोचनात्मक विवेक सेहो प्रखर रहैत अछि। जखन कि विश्वविद्यालयक पेशेवर विद्वान सब मे एहि चीजक सिरे सं अभाव भेटत। रमानंद झा रमण एहि सब गोटे मे सब सं अलग छथि। ओ एखनुक समय मे एकमात्र पूर्णकालिक सक्रिय आलोचक छथि। हुनकर विषय विस्तार बहुत व्यापक छनि। प्रमुख क्षेत्र मुदा अतीते छियनि। जेना रमानाथ बाबू मध्यकालक अनेक अज्ञात, अचर्चित कवि सभक उद्धार केलनि, रमण जी सेहो अनेक आधुनिक अचर्चित अल्पचर्चित रचनाकार सभक कृति आम पाठक धरि सुलभ केलनि आ एहि तरहें हुनक उद्धार केलनि। हुनकर काज मे निरंतरता सेहो रहल अछि जे हुनकर अवदान कें पैघ बनबैत अछि। अतीतोन्मुखताक बन्हन कें तोड़ि क' ओ युगीन रचनाशीलता कें विश्लेषित करबाक प्रयास सेहो केलनि अछि जकरा हुनकर दर्जनो निबंध मे देखल जा सकैत अछि। मुदा रमण जीक दूटा सीमा छनि जाहि कारणें ओ बन्हन तोड़ि क' बहरा नहि पाओल छथि। एक तं नव रचनाशीलताक प्रति अधिक काल असहमतिक स्वर, दोसर अपन रुचि कें अंतिम प्रमाण मानि लेब। ई समस्या रमानाथो बाबूक लेखन मे छनि। एहि पर विस्तार सं कहियो गप हो तं नीक। आइ स्थिति एहन देखाइत अछि जे पूर्णकालिक आलोचकक भरोसें मैथिली आलोचना कें तहिना नहि छोड़ल जा सकैत अछि जेना विश्वविद्यालयीय पेशेवर विद्वानक भरोसें नहि छोड़ि सकैत छी। हम देखैत छी जे आलोचनाक रैखिक विकास तं खूब भेल अछि, क्षैतिज विकास मे अवश्य कमी अछि। आलोचना मे कोनो एक नवीन अवधारणा एलाक बाद अनेक दृष्टि सं, अनेक आयाम कें ल' क' ओकर बारंबार व्याख्याक जरूरत रहैत छैक। अक्सरहां असहमति आ विवादक विना कोनो अवधारणा अपन पूर्ण प्रस्फुटन पर नहि पहुंचि सकैत अछि। एहि सब काजक लेल अनेक व्यक्ति चाही। गहमागही चाही। तकर अभाव अवश्य अछि। एक सं एक स्थापना अबैत छैक मुदा से किताबक, पत्रिकाक पन्ना मे दबल रहि जाइत छैक। जे लोकनि हल्ला करैत छथि जे आलोचना एखनो नाबालिग अछि से जं हल्ला करबाक बदला ओहि स्थापनाक विरुद्ध एक टिप्पणी लिखि क' प्रकाशित करौने रहितथि आ सैह आनो लोक करितथि तं नाबालिगक हालत ठीक भ' गेल रहैत। वैह बात अछि। हमही सब एकरा अपन अकर्मण्यता सं नाबालिग बनेने छियैक आ हमही सब भोकरै छी जे ई नाबालिग अछि। मैथिली आलोचना कोन तरहें अपन स्पष्ट छवि आ साफ स्वरूप बना चुकल अछि तकर दृष्टान्त लेल हम नवतुरिया लोकनिक लेखन दिस संकेत करब। जाहि नवागंतुक लोकनिक दृष्टि एखन साफ नहि भेलनि अछि आ ने पक्ष मजगूत, ओहो जखन वैचारिक गद्य लिखै छथि तं आधुनिक आवाज मे, आलोचनाक शैली आ शब्दावली अपनाबैत, बजबाक कोशिश करैत छथि। पैघ बात थिक ई। ई अपना आप मे एकटा साक्ष्य थिक जे मैथिली आलोचनाक स्थिति ओते दुर्गत नहि अछि जते भाइ लोकनि प्रचारित करैत छथि। एतय हम एकटा सूची राखय चाहै छी जाहि मे आजुक समयक चुनौती कें उठा सकबा मे सक्षम किछु लोकक नाम छैक। पहिल पंचक मे रमानंद झा रमण छथि, जिनकर अतंद्र अन्वेषकता कैक बेर हमरा लोकनि कें रमानाथ बाबूक स्मरण करा जाइत अछि। विभूति आनंद छथि जे एक नब तरहक आलोचना-भाषा, संस्मरणात्मक आलोचना-भाषाक अन्वेषक आ प्रयोक्ता छथि। संपूर्ण ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मे युगीन साहित्य कें बुझबाक हो तं अशोक छथि, जे मैथिल आंखिक व्यापकताक संधानी छथि। युगीन परिवेश कें रचना कोना अपना संग जज्ब केने रहैत छैक आ तकरा अपन अभिप्राय मे परिणत करै छै, ताहि पर देशंकर नवीनक काज देखबा जोग अछि। तहिना, रचनाक मूल पाठ अपना भीतर कोना हजारो तरहक सामाजिक संवेदना आ तकर अन्तर्कथा धारण केने रहैत छैक ताहि पर शिवशंकर श्रीनिवासक मूल्यवान काज अछि। मैथिलीक ओ पहिल आलोचक छथि जे मूलतः कथालोचकक पहचान बना सकल छथि। दोसर सूची मे पांचटा एहन युवा रचनाकार छथि जे आन आन विधा मे काज करितो समय समय पर अपन आलोचनात्मक लेखन सं आश्वस्त करै छथि। एहि मे छथि पंकज पराशर, श्रीधरम, कमलमोहन चुन्नू, रमण कुमार सिंह आ अजित आजाद। सारंग कुमार आदि सेहो एहि मे शामिल भ' सकै छथि जे पहिनेक अपन लेखन सं अपन आलोचकीय क्षमताक प्रति आश्वस्त केने छथि। कहल जाय तं चुनौती उठेबाक असली जिम्मेवारी हिनके लोकनि पर छनि। तेसर सूची मे पांचटा एहन नाम छथि जे मैथिलीक नवागंतुक रचनाकार छथि, आन आन विधा मे लिखै छथि आ जिनकर आलोचकीय क्षमता दिस हमर ध्यान गेल अछि। एहि मे छथि अरुणाभ सौरभ, चंदन कुमार झा, रघुनाथ मुखिया,बालमुकुंद आ गुंजन श्र । ई युवा लोकनि अपन आलोचनात्मक क्षमताक संग जं लगातार जतन करथि तं अपना जे रचनात्मक लाभ हेतनि से तं हेबे करतनि, मैथिली आलोचनाक सेहो गहमागहमी बढ़तैक। अपेक्षाक जहां धरि बात छै, से कोनो अलग सं होइत हो से हमरा नहि बुझाइत अछि। स्थिति जे अछि से सैह अपेक्षा दिस इशारा करैत रहैत छैक। जतय स्थिति कमजोर देखै छी, ओतय सब गोटें मिलि क' जोर लगा दियैक, सैह भेल अपेक्षा। अपेक्षा तं हमर सब सं पहिल यैह अछि जे मैथिली आलोचनाक अतीतगामिताक स्वभाव कें हम सब बदली। किछु गोटे के अतीत मे गेनाइ सार्थक होइत छैक। जेना मोहन भारद्वाजक डाकवचन लग गेनाइ। मुदा, मात्र एही लेल हम अतीत मे जाइ जे आलोचनाक टूल्स तहियेक बनल छै, आगूक बनले नहि छै, एकरा हम पथभ्रष्टता बुझैत छी। यदि निकष(टूल्स) के नमूना उपलब्ध नहि छै, तं हमरा बनेबाक चाही। असगरे बनायब जं पार नहि लगैत हो तं जतबा बना सकै छी, बना क' अगिला कें बढ़ा देबाक चाही। दोसर बात जे हमरा सब कें ई अपसोच मोन सं निकालि देबाक चाही जे मैथिली मे पूर्णकालिक आलोचक नहि अछि। असल मे युग एहि हिसाब सं मोड़ लेलक अछि जे आगू पूर्णकालिक आलोचक होयबो मुश्किल अछि। क्रिएटिव राइटिंग बेसी चोख भेलैए आ से प्रतिभाशाली सब कें सिद्दत सं आकर्षित करै छनि। आलोचना के कोनो शिक्षा नहि छै। एते एते विश्वविद्यालय मे एते एते शिक्षक मैथिली पढ़ा रहल छथि मुदा आइ धरि ढंग के एकटा आलोचक नहि तैयार भ' सकल। जे अबैत छथि तिनकर साहित्यक समझ क्रिएटिव राइटक स्तर सं बहुते बहुत नीचां रहैत छनि। दोसर छै जे आलोचना लेखन मे लेखक कें बरक्कति नहि छैक। आलोचक कें नापसंद कयल जाइ छै। आलोचना विधा कें द्वितीय श्रेणीक विधा मानल जाइछ। ओहि मे सम्मान नहि छै। देखबे केलहुं जे मोहन भारद्वाज सन के आलोचक कें साहित्य अकादेमी अन्तो अन्त धरि पुरस्कार नहिये देलक आ अपन नकारापन के, नासमझी के सुंदर उदाहरण प्रस्तुत केलक। मोहन भारद्वाज जा जीला ककरो नहि गुदानलखिन आ अंत मे लोक हुनको नहि गुदानलकनि। हुनक परोक्ष भेला सं चिन्तित तं सब क्यो छी, मुदा हमरा सभक भाषाई प्रबंधन कोन तरहें सुधरय से क्यो नहि क' पाबि रहला अछि। तेसर, हमर ख्याल अछि जे हरेक क्रिएटिव लेखक कें आलोचना सेहो जरूर लिखबाक चाही। नहि लिखबाक पाछू भय रहैत छैक अपना छुटि जयबाक। अपन नाम लिय' तं सेल्फ प्रोमोशन जकां, तुच्छ काज जकां लगै छै। नहि करियौ तं अपना प्रति अपने कयल अन्याय जकां लागै छै। तें ई भय बहुत वाजिब थिक। मुदा हम तैयो कहब जे लिखबाक चाही कारण आलोचना लिखबाक सुख एक अलग तरहक सुख होइत छैक। ई सुख छै जे हम अपन युग कें देखि रहल छी। द्रष्टा छी हम तं हमरा अपने ओहि दृश्य मे किएक हेबाक चाही? ई सुख हमरा आलोचना द' सकैए। बांकी आगूक लोक जखन देखता तं अपन सुधारि क' देखता। ई हुनक टेन्सन छियनि। हमरा लिखबाक चाही। नब सं नबो लोक कें आलोचना जरूर लिखबाक चाही। बाधा जे पैदा करैत अछि से छी अल्पज्ञताक भय। आलोचना लिखबा सं पहिने खूब पढ़ि लेबाक मोन करै छै। आब झंझट ई जे पढ़बाक आनंद एक अलगे संप्रदाय के आनंद थिक। ओकरा सामने मे लिखनाइ तुच्छ। एहि प्रकारें अल्पज्ञताक भय आलोचनाक उत्साह कें ध्वस्त क' दैत छैक। तें हमर विचार जे युवा लेखक कें अपना पीढ़ीक बारे मे लिखबाक चाही। ओतय अल्पज्ञताक खतरा न्यून रहै छै। मुदा, एहि सं असली फैदा ई छै एहि सं आलोचनाक वातावरण भकरार लगै छै। क्यो आइ पर लिखि रहलाहे, क्यो पछिला दशक पर, क्यो क्यो अतीतो मे आवाजाही बनौने छथि। एखन जे मुरदनी छाएल छै तकर एहि सं पक्का निस्तार होयत। तहिना, पुरान प्रतिष्ठित कैक गोट रचनाकार एम्हर फेर सं सक्रिय भेल छथि जेना ललितेश मिश्र, महेन्द्र, गंगानाथ गंगेश आदि। हिनका लोकनिक आलोचकीय क्षमता अचूक छनि। रामदेव झा अपन लेखन आब स्थगित क' चुकल छथि। मुदा, कतेक नीक होइत जे क्यो गोटे तैयारी क' क' हुनकर आ हुनका सन आनो लोकक इन्टरव्यू करितथि। हमरा सभक जबाना मे नब लेखक पुरान रचनाकार सब सं बराबर इन्टरव्यू लेथि, तकर प्रकाशन सं सबहक उपकार होइत छल। तहिना, सुभाष चंद्र यादव, सुकान्त सोम आ हरे कृष्ण झा आइ आलोचना लिखि नहि पाबि रहल छथि तं अपेक्षा अछि जतबे होइन लिखथु। मोहन भारद्वाज एक समय मे 'मैथिली आलोचना' नाम सं एक पत्रिका निकालब शुरू कयने रहथि, से मोन पड़ैत अछि तं होइत अछि जे एहि खगता कें सेहो क्यो गोटे उठाबथु। मैथिली आलोचना कें बेकार आ आलोचक कें पूर्वाग्रही कहब बहुत आसान छै। ततबे आसान जतबा गांधी जी कें बैमान कहब। क्यो उनटि क' उपराग देबय नहि आओत, ने गांधी जी दिस सं ने आलोचना दिस सं। मुदा, मोन राखल जाय, यैह समय होइ छै जखन विवेकी जन कें मूल जड़ि पकड़य पड़ैत छै आ अपन भूमिका तय करय पड़ैत छैक।

Wednesday, September 26, 2018

मैथिली कविताक वर्तमान परिदृश्य

तारानंद वियोगी


एहि शताब्दीक आरंभ मे हम 'देशज2001' नाम सं मैथिली कविताक एक विशेषांक प्रकाशित कयने रही। ओकर नामो किछु एहने रहै--'शताब्दीक आरंभ मे मैथिली कविता'। कविताक क्षेत्र मे तहिया जे पीढ़ी सक्रिय छल, जे विचारधारा अपन चमक मे रहय वा संघर्ष मे शामिल छल, कविताक जे उपविधा सब चलन मे रहय, सब कें समेटबाक कोसिस छल। ओतय वरिष्ठ पीढ़ीक चंद्रनाथ मिश्र अमर, मायानंद मिश्र, जीवकान्त, भीमनाथ झा रहथि, तं गंगेश गुंजन, महाप्रकाश, उदयचंद्र झा विनोद सेहो। आ ई क्रम पंकज पराशर, रमण कुमार सिंह, अजित आजाद धरि चलि अबैत छल जे तहिया कविताक क्षेत्र मे सद्य: नवागंतुक रहथि। नव शताब्दीक कविता पर ओतय लेख रहैक, साक्षात्कार सेहो आ एकटा तं बेस लंबा चौड़ा परिचर्चा रहै जाहि मे बहुत आपकताक संग कवि-आलोचक लोकनि शताब्दीक आरंभिक कविता पर विस्तारपूर्वक गप कयने रहथि।


तें आइ जखन 'कविताक वर्तमान' पर विचार करबाक प्रश्न होइए तं ओ संकलन हमरा मोन पड़ि जाइत अछि। हमरा लगैत अछि जे 'वर्तमान' पर जं विचार करबाक बात हो तं ओकरा कालबद्ध सेहो हेबाक चाही। एकर अपन फैदा छै।  एक खास कालक भीतर कतेको तरहक प्रवृत्ति चलायमान रहै छै। किछु जं प्रमुखता मे रहल तं बांकी अपन प्रमुखता देल दाबी ठोकैत रहैत अछि, संघर्ष करैत रहैत अछि। वर्तमान पर विचार कयने ई सबटा प्रवृत्ति पर कान बात देब संभव भ' पबैत छैक। ई कतहु बेसी लोकतांत्रिक थिक। 'समकालीनता' एकटा अलग स्थिति थिक। ओहि ठाम प्रासंगिकताक प्रश्न प्रमुख होइछ। एक खास धाराक निरंतरता मे जे कथू प्रासंगिक रहल, से सबटा एकर परिधिक भीतर आबि जाइत छैक। एकरा लेल आलोचक कालबाह्य भ' क' सेहो विचार करैत छथि। से कयनहि सं प्रासंगिक धारा अपन पूरा खिलावट प्राप्त क' पबैत छैक। एकर सेहो अपन महत्व छैक, बरु कहबाक चाही जे बेसी महत्व छै, कारण एही दृष्टिकोण सं देखने सं विधाक विकास आकार ल' पबैत छैक। वर्तमानक विचार एहि सं अलग चीज छी। ई अपना कालक प्रति सचेतन होयब थिक। एहि सं अधलाहक चुनौती आ नीकक स्वास्थ्य बेसी सही तरीका सं सामने आबि पबैत छैक।


।।दू।।


पहिने कविताक माध्यम पर बात करी। 2001 मे कविता प्रमुखत:  दू माध्यम सं अपन पाठक वा श्रोता धरि पहुंचै छल-- किताब-पत्रिकाक माध्यम सं छपि क', आ दोसर कविगोष्ठी वा रेडियो सं वाचिक रूप मे। ई परंपरागत माध्यम छल जे अनेक दशक पाछू सं चलि आबि रहल छल। आइ सोशल मीडिया आबि क' जुड़ि गेल अछि। तहिया चौपाड़ि वा बैसकी सन अनौपचारिक मंच कविता लग मे नहि छल, जखन कि कथा लग मे एहन मंच 'सगर राति' छल। आइ ई अनौपचारिक मंच सब बेस प्रभावी भूमिका निमाहि रहल अछि।

       जेना हरियाणा गहूम उपजेबा लेल नामी अछि, बुझले बात थिक जे तहिना मिथिला अपन ज्ञानात्मक-संवेदनात्मक उपजा लेल नामी अछि। कविता एहि मे प्रमुख अछि। बेगरता पड़ला पर हरेक पढ़ल-लिखल मैथिल दू-चारिटा कविताक रचना क' सकैत अछि। आब ई संपादक आ आलोचकक जिम्मेवारी छियैक जे ओ नीक आ अधला कें बेराबय। यैह सब दिन सं एतय चलैत रहलै। अपना ओतय गाम गाम मे कवि छथि। किछु जिल्ला मे नाम क' जाइत छथि। किछु एहनो होइत छनि जिनकर किताब छपैत छनि। आ, मैथिली भाषाक ताकत ओहि ठाम देखार पड़त जखन एही कविवर्ग मे सं क्यो कविताक राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिमान रचि जाइत छथि। ओहि सं मैथिलीक नाम होइत छैक, प्रतिष्ठा बढ़ैत छैक।

      सोशल मीडिया के अयने सं संपादकक भूमिका समाप्त भ' गेलै। एतय हरेक कवि अपन निर्णायक स्वयं अछि। एक अर्थ मे ई बहुत नीक अछि जे अभिव्यक्तिक अबाध अधिकार दैत अछि। आब क्यो संपादक कोनो होनहार कविक गरदनि नहि मोचाड़ि सकैत अछि। से बेस

 मुदा साहित्य मे, आ कि कथू मे, कायदाक काज लेल पूर्वबोध तं अवश्ये चाहियैक। से नहि भेने स्थिति की बनैत छैक तकरो हम सब फेसबुक पर देखिते रहैत छी। हम कतहु पहिनहु ई बात कहने छी जे माध्यम बदलने सं की विधाक इतिहास मेटा जाइत छैक? ओकरा फेर सं अ आ सं शुरू करय पड़तैक? आइ फेसबुक पर हमरा लोकनि कमोबेस मैथिली कविता कें एक सौ बरख पाछू देखि सकैत छी। मोद-युग मे साधारण कवि लोकनि एहिना लिखैत रहथि।

       दोसर, कहबी छै जे नैया जं डगमगाबय तं मांझी पार लगाबय। मने कवि कें टिप्पणीकार लोकनि सम्हारि सकै छथि। मुदा कविता सन बौद्धिक उत्पाद ओतय बतकुच्चनि आ आरोप-प्रत्यारोप पर आबि क' थस्स ल' लैत अछि। तें साधारण कवियश:प्रार्थी लेल भने सोशल मीडिया अभिव्यक्तिक अबाध माध्यम हो, कवि आ ओकर भाषाक विकास लेल एकर उपादेयता बहुत कम छै। तखन, एकर उपादेयता एहि अर्थ मे तं पूरे उत्साहजनक छै जे आइ हमरा लोकनि कें अपना जुगक कतेको सिद्ध कवि लोकनिक रचना सोशल मीडियेक दुआरे संभव आ उपलब्ध भ' पबैत अछि। युवक लोकनि मे सं सेहो कतेको तेजस्वी आ प्रखर कवि सभक रचना पहिने हमरा फेसबुके पर देखबा मे अबैत अछि, तकर बादे ओकरा छपल देखि पबैत छी।


।।तीन।।


वर्तमान समय मे मैथिली कविताक छव अलग अलग पीढ़ीक कवि एक्कहि संग रचनारत छथि। स्वाभाविक थिक जे हुनका सभक काव्यबोध आ यथार्थ-दृष्टि अलग अलग छनि। हुनकर शक्ति आ सीमा सेहो एहि मे साफ देखाब दैत छैक। एहि समय मे जं एक दिस चंद्रनाथ मिश्र अमर लिखि रहल छथि तं भीमनाथ झा, उदयचंद्र झा विनोद, गंगेश गुंजन, शेफालिका वर्मा सेहो। कहियो सुकांतक कविता सामने आबि जाइत अछि, कहियो हरेकृष्णक, नचिकेताक। तखन विभूति आनंद, रमेश, नारायणजी, केदार कानन, कुमार मनीष अरविंद छथि। पंकज पराशर, रमण कुमार सिंह, अजित आजादक कविता-लेखनक ई महत्वपूर्ण चरण चलि रहल छनि। तखन अरुणाभ सौरभ, रघुनाथ मुखिया, मनोज शांडिल्य, चंदन कुमार झा, निशाकर आदिक एकटा विशाल वाहिनी अछि, जे नब नब तेबरक संग एहि शताब्दी मे मैथिली कविताक क्षेत्र मे प्रवेश केलनि अछि आ जिनका सभक दिस मैथिली साहित्य बहुत हियाब संग देखि रहल अछि।

      नवागंतुक पीढ़ी कें छोड़ि क' देखी तं पुरनका कवि कें देखबाक कसौटी की होयत? दूटा नजरिया भ' सकैत अछि। एक तं ई जे आइ जे ओ लिखि रहला अछि से हुनक  पछिला लिखलाहा सं आगू अछि कि नहि? मने कवि अपन विकास मे आगू बढ़लाह अछि कि ठामक ठामहि छथि? दोसर भ' सकैत अछि जे ओ काव्यभूमिक कोनो नब परती तोड़लनि अछि कि नहि? अक्सरहां दुनू बात एक्के संग नै होइत छैक। या तं अहां ओही पथ पर चलैत आगू बढ़ैत छी जेना राजकमल कि महाप्रकाश कि कुलानंद जाबत जीला ओही पथ पर आगू बढ़ैत रहला। दोसर उदाहरण जीवकांत छथि जे समय समय पर अपन रस्ता बदलैत रहला आ नब नब उपविधा जेना बालकविता कें पकड़ैत नब नब परती तोड़ैत रहला। ई प्रवृत्ति आइ हमरा लोकनि उदयचंद्र झा विनोद आ विभूति आनंद मे देखै छियनि। बांकी जे अपन सोझ बाट पकड़ने   बढ़ि रहल छथि, एहन मे विद्यानंद झा हमरा पहिल नाम देखार पडैत छथि जे पाछू लिखलाहा सं निस्संदेह आगूक लिखि रहल छथि। मुदा यैह बात हम कोनो दोसर कविक बारे मे एते निस्तुकी भ' क' नहि कहि सकैत छी।

       अपन एहि लेख मे जें कि हम वर्तमान परिदृश्यक एक आकलन टा मात्र राखि रहल छी, एतय आलोचनाक विस्तार मे जेबाक अवकाश नै अछि। हेबाक ई चाही जे बजाफ्ता समीक्षाक टूल्स ल' क' एक एक सचेतन कविक परीक्षण कयल जाय आ तखन आगू-पाछूक सबटा बात सामने आबय। मैथिली मे दिक्कत ई रहलै जे कवितापीढ़ी तं जरूर आयल मुदा अपना संग कर्तव्यनिष्ठ आलोचक कें ओ नहि आनि सकल। जे एलाह से अधिकतर प्रकृत विषय सं विषयान्तर भ' जाइत गेला। पत्र-पत्रिका मे व्यवस्थित समीक्षाक कालम नहि रहलै, रहलै तं कर्तव्यनिष्ठ ओकर नजरिया नहि रहलै। प्राध्यापकीय आलोचना एहि सब बात कें बुझबा सं साफे अपना कें एकात केलक। एहि बीचक प्रमुख आलोचक लोकनि पछिले विवाद कें फरियेबा मे व्यस्त रहि गेला। पछिलो विवाद कें फरियाएब आलोचनाक एक जरूरी काज छिऐक। अपना ओतक साहित्य मे ओकर बहुत महत्व छै, कारण एतय तं जीवितकवेराशयो न वर्णनीय:, जे कवि एखन जिबिते छथि हुनका मादे निर्णय नहि हेबाक चाही। इमनदारी सं कही तं कखनो कखनो हमरो ई बात ठीक लगैत अछि। ठीके निर्णय नहि हेबाक चाही। जिनका काज करबाक छनि से काज करथु, जिनका पुरस्कार लेबाक होइन से पुरस्कार लौथु। दुनू अपन अपन काज मे लागल रहथु। साहित्यक विकास एहि सं संतुलित बनल रहैत छैक।

           असल मे अपना ओतय जतेक संख्या मे आलोचक हेबाक चाही, से कहियो नहि भेल, ने आइये अछि। तकर कारण छै। आलोचक एकटा एहन प्राणी थिक जकरा सं लोक घोर घृणा करैत अछि। जकरा देखबै सैह मैथिली आलोचना पर एक थुम्हा थूक फेकैत विदा हैत जे धु: ई कोनो जोगरक नहि भ' सकल। कियै हौ बाबू तं कारण यैह जे ओ असंतुष्ट छथि। कखनो कखनो तं हम ई सोचै छी जे मैथिल जातियेक मनोनिर्माण आलोचनाक प्रतिकूल भेल छैक आ कि एहि मे स्वयं आलोचनोक कोनो दोख छै!

         कखनो हमरा सब कें इहो सोचबाक चाही जे आलोचनाक जरूरत ककरा छै? कवि कें तं नहि छै कारण पुरस्कार जे भेटैत अछि से कोनो आलोचना पढ़ि क' नहि भेटैत अछि। ओकर अपन स्वतंत्र राजनीति छै। यश जं कवि कें भेटैत अछि तं ओहू मे आलोचनाक योगदान नहिये जकां रहैत अछि, कारण रचना स्वयं अपने अपना लेल यश अरजैत अछि। प्रतिष्ठान सब कें सेहो आलोचनाक जरूरत नहि होइत छैक, कारण ओ जे निर्णय करय चाहैत अछि ताहि मे साधक हेबाक बदला आलोचना अधिकतर बाधके होइत अछि। एहना मे हमरा बुझाइत अछि जे आलोचना मात्र हुनका टा लेल उपयोगी होइत अछि जे अपन भाषा-साहित्यक विकास चाहैत छथि अथवा तकरा जानय चाहैत छथि।

।।चारि।।

पछिला दू दशक मे छपल मैथिली पोथी सब पर यदि एक नजरि दी तं सब सं बेसी संख्या मे छपल किताब कविते विधाक भेटत। मैथिली कविताक संग ई विचित्र विडंबना अछि जे ई सब सं बेसी लिखल जाइत अछि मुदा सब सं कम पढ़ल जाइत अछि। कविताक मादे जे राजशेखरक ई उक्ति अछि जे 'एकस्य तिष्ठति सुहृद् भवनानि यावत्', कि कविक कविता कतय धरि पहुंचैत अछि तं मित्रक घर धरि। एतबा पहुंच के लेल कविताक मुद्रित होयब कोनो जरूरी नहि छैक, इन्टरनेटक एहि युग मे तं आरो नहि। मुदा, हमरा लोकनि देखैत छी जे इन्टरनेटक तमाम लाभ उपलब्ध होइतो मैथिली कविता अधिकाधिक संख्या मे पछिला दशक मे प्रकाशित होइत रहल अछि। तकर कारण एक दिस जं कवि लोकनिक आर्थिक स्थिति नीकतर होयब थिक तं दोसर दिस  मुद्रण तकनीकक उत्तरोत्तर सस्त आ सुलभ होयब सेहो थिक। दस हजारक लागत मे आब सय पृष्ठक संग्रह सय प्रति मे छपि जा रहल छै।
          सामान्य पाठक, जकर रुचि मैथिलीक श्रेष्ठ लेखन मे छैक वा जे छपल किताबक माध्यमें भाषाक विकास कें अकानय चाहैत अछि, तकरा लेल सही किताब कें चुनब एक पैघ चुनौती होइत अछि। एहना मे आलोचकक खगता पड़ैत छैक हम सब अनुभव क' सकैत छी जे ओकर काज कतेक कठिन होइत छैक।
                मैथिली कविताक एक कार्यकर्ता हेबाक नातें हम जेना देखल, पछिला दू दशक मे अनेक एहन प्रकाशन भेल अछि जे मैथिली कविताक वर्तमान कें समृद्ध बनौलक अछि। यात्री जीक संपूर्ण कविता एक जिल्द मे 'यात्री समग्र' नाम सं आएल, यद्यपि कि एहि मे कवितेतर विधाक हुनक अन्य रचना सेहो छलनि। तेहने एक महत्वपूर्ण घटना 'कविताधन'क प्रकाशन थिक जाहि मे भीमनाथ झाक संपूर्ण काव्यरचना संकलित छनि। अपना युगक आनो वरिष्ठ कविलोकनिक एहि कोटिक रचना-समग्र बहार होइक, तकर महत्व बुझाइत अछि। साहित्य अकादेमी रचना-संचयन छपलक अछि, तकर महत्व रचनाकार कें व्यापकता मे बुझबा लेल जरूर अछि मुदा कविताक दृष्टि सं नेशनल बुक ट्रस्टक 'कविता संचयन'(संपादक गंगेश गुंजन) आ 'अक्खर खम्भा'(संपादक देवशंकर नवीन)क महत्व कतहु बेसी अछि। ई दुनू संकलन आधुनिक मैथिली कविताक विविध रंग, ध्वनि आ रूप कें बुझबा लेल बहुत उपयोगी थिक। एहि सभक अतिरिक्त पछिला दू दशक मे छपल कविता-संग्रह सब मे सं महत्वक दृष्टि सं पचीस टा संकलनक एक सूची हम अपना उपयोगार्थ बनाओल अछि, तकरा अहूं सब एक नजरि देखि सकै छियैक। एहि सूचीक आधार हमर व्यक्तिगत काव्यरुचि अछि। तें सूचीक लेल कोनो दावा नहि अछि।बेसी संख्याक सूची बनत तं उचिते हमरो सूची नमहर होयत। देखल जाय--1.संग समय के (महाप्रकाश)2.एना तं नहि जे(हरे कृष्ण झा) 3.बौकी धरतीमाता(जीवकान्त)4.एकटा हेरायल दुनिया(कृष्णमोहन झा)5. अथ उत्तरकथा(उदय चंद्र झा विनोद)6. मेटायल पता पर अबैत चिट्ठी(महेन्द्र)7. विलंबित कैक स्वर मे निबद्ध(पंकज पराशर) 8. पराती जकां(विद्यानंद झा) 9. धरती पर देखू(नारायण जी) 10. फेर सं हरियर(रमण कुमार सिंह) 11. काव्यद्वीपक ओहि पार(रमेश) 12. जिनगीक ओरियाओन करैत कविता(कुमार मनीष अरविंद) 13. युद्धक विरोध मे बुद्धक प्रतिहिंसा(अजित आजाद) 14. एतबेटा नहि(अरुणाभ सौरभ) 15. जहलक डायरी(नचिकेता) 16. ग्लोबल गाम सं अबैत हकार (कृष्णमोहन झा मोहन) 17. सबद मितारथ धाय्या(अरविंद ठाकुर) 18. गंगनहौन(निशाकर) 19. बनिजाराक देस मे(दिलीप कुमार झा) 20. स्त्रीक मोन(निवेदिता झा) 21. गेल्ह सब झाड़ैत अछि पांखि(मेनका मल्लिक) 22. विसर्ग होइत स्वर(प्रणव नार्मदेय) 23. खंड खंड बंटैत स्त्री(कामिनी) 24. सुरुजक छाहरि मे(मनोज शांडिल्य) 25. धरती सं अकास धरि(चंदन कुमार झा)


।।पांच।।


मैथिली कविताक वर्तमान कें एक नजरि देखी तं स्थिति निराशाजनक नहि लगैत अछि। तकर कारण थिक युवा लोकनिक विशाल संख्या, जाहि मे अबढंगाह लिखनिहारक संख्या तं अवश्ये बेसी अछि मुदा नीक लिखनिहारोक संख्या एतबा जरूर अछि जतबा पछिला पीढ़ी सब लग नहि छल। नीक कविता आ अधला कविता मे भेद अनैत अछि ओकर काव्यभाषा। काव्यभाषाक विविधता तं एम्हर खूब देखार देलक अछि, कैक युवा अपन बेहतर अभिव्यक्ति लेल नब नब काव्यशैली कें सेहो पकड़लनि अछि। गजल आ गीतक आकि हाइकू सन लघुकविता उपविधा सभक भाषा-प्रयोग सेहो कतेको ठाम ध्यान आकृष्ट करै योग्य भ' क' आएल अछि। भाषाक ओझरौटक समस्या बेसी मुक्तछंदक कविताक संग छै। पछिला पचास बरस सं मैथिली कविता एहि समस्या सं जूझि रहल अछि। मने समुच्चा कविता अहां कें एकटा बयान जकां लागत। आक्रोश, प्रतिरोध सबटा भने होउक मुदा कविताक भाषा जखन कविता सन के नहि हो तं किछुओ बात नहि बनैत छैक। युवा कवि दीप नारायण विद्यार्थीक शब्द मे कही तं 'जिनका कविता मे\जतेक अछि कविता\ओ समय के ततेक पैघ कवि छथि।' मुदा, एहि मर्मक बोध बहुतो कें नहि छनि जाहि दुआरे आइ कविताक नाम पर लिखल जा रहल सत्तर प्रतिशत बयान कचड़ा थिक।

        युवा कवयित्री शारदा झाक एकटा कविता छनि 'आत्मबोध'। एहि मे स्त्री-जीवनक किछु गंहीर विडंबना सब वर्णित भेल छै। स्त्रीक मूल पूजी थिक ओकर देह। से जखन पुरान हुअय लगैत छै, अनेक तरहक तनाव कें जन्म दैत अछि। ई कविता तकरा बारे मे अछि। स्त्री एकर सामना कोना करैत अछि? नब समाज ताकि क'। 'जीवनक एक नमहर समय बिता चुकल स्त्री/भ' जाइत अछि स्वावलंबी/ सभ संग आ साथ सं फराक/ ताकि लैत अछि अपना कें/ भीड़ मे हेरायल नेना जकां।' वैश्वीकरणक एहि जटिल समय मे समाजक महत्व नब तरह सं परिभाषित हेबाक ओतय बात छै। मुदा, आजुक काव्य-परिदृश्य कें देखू तं सामाजिकताक, समूहगत सोचक अलबत्त अभाव भेटत। भने तं अजित आजाद अपन एक कविता मे कवि-समुदायक चित्र लिखलनि अछि-- 'किछु नमस्य कें छोड़ि/ आत्मलीनक एकटा पतियानी धरि अछि अवश्य'। तं सैह। हमर सोच अछि जे कविता मे जं सामाजिक सरोकार नहि हो, एहन सरोकार जाहि सं ओ कोनो दोसरो आदमीक काज आबि सकय तं ओकरा एकटा ठीक कविता कहबा मे सब दिन हमरा संकोच होयत। मुदा स्थिति की अछि? अपन एकान्त आत्मलीनता कें कवि लोकनि शब्द पहिरा क' ठाढ़ करैत छथि आ कहै छथि कविता लिखलहुंए। चंदन कुमार झा अपन एक कविता मे एक साधारण आदमीक बाजब कें चिडै़क बाजब संग उपमा करैत छथि, ओहि ठाम चिड़ैक निष्पक्षताक प्रति एकटा प्रशंसा भाव सेहो अछि। मुदा बात मार्मिक छै। निष्पक्षता जं सामाजिक क्रिया-कलापक संदर्भ मे हो, जेना कविता लिखबा मे, तं सनातन रूप सं ओ एक भीषण कमजोरी थिक। आ कमजोर कविता सं चिरजीवी हेबाक उम्मीद नहि कयल जा सकैत अछि। एकटा दृष्टान्त सं हमर गप बेसी फड़िच्छ होयत। खास आजुक राजनीतिक कुस्थिति पर, साधारण जनक पराभव पर मैथिली मे अनेक कविता लिखल गेल अछि। मुदा अहां गौर करू तं देखब जे एहन कविता सब सीनियर पीढ़ीक कवि लोकनि लिखलनि अछि। युवा कविता एहि बारे मे या तं मौन अछि अथवा तोतराइत अछि। किछु ठाम जं एहन चित्र अबितो छै तं पता चलैत अछि जे ओ तं सीरिया, इरान आदिक संदर्भ मे आएल छैक। की कहल जेतै एकरा? कविताकामिनी कें राजनीतिक झंझावात सं सुरक्षित रखबाक सौन्दर्यशास्त्र? आ कि सामाजिक सरोकारक प्रशिक्षणक अभाव? जे हो, अभाव तं ई अछि आ से एकर आभा कें कम करैत अछि।

       पक्ष-निष्पक्षक बात हो तं कने एहू दिस देखि लेबाक चाही जे कविताक स्वभाव की थिक? अपना ओतक परंपरा मे क्रौंचवधक मर्माहतता सं कविताक आरंभ मानल जाइत छैक। मने कविता पीड़ित पक्षक प्रति पक्षधरता थिक। आधुनिको युग मे कविता सं 'बेजुबान के जुबान' बला काज लेल जाइत रहलैक अछि। मैथिली कविता मे जे कवितावाचक होइत अछि, से के होइत अछि? ओ या तं यात्री जीक गमैया किसान होइत अछि अथवा राजकमल चौधरीक पढ़ल-लिखल बौद्धिक। आन कवि लोकनिक जे कवितावाचक भेलाह अछि से एही दुनूक बीच मे सं कतहु होइत एलाह अछि। एम्हरे आबि क' हम देखि रहल छी जे कविता विजेताक अट्टहास सेहो भ' सकैए, आ कवितावाचक ओकर प्रवक्ता।

      मुदा, युवा कविताक बहुतो विशेषता हमरा खास तौर पर प्रशंसनीय लगैत अछि। एक तं एकर विस्तार। ततेक रास जीवनानुभव आबि रहलैए जे हबगब बनल देखाइत अछि। खूब अन्न उपजल हो आ घर दुआरि पूरा भरल पुरल देखार दियय, ओहि किसानक अहां कल्पना करियौ। नब विषय, नब संवेदना, एहन एहन जगह पर मैथिली कविता कें ल' चलब जतय ओ पहिने कहियो नहि गेल छल, ई सब बात आजुक कविताक दौर मे संभव भेल देखाइत अछि। बिभा कुमारीक एकटा कविता छनि 'कोन दोख'। ओइ मे की छै जे ककरो घर मे एकटा थर्ड जेंडर के बच्चा पैदा भ' गेलैक अछि आ आब ओ जबान भ' गेलैए। ओ ने लड़का थिक ने लड़की, ओहि परिवारक तनाव, ओहि बच्चाक वेदना, सामाजिकताक तानाबाना सब कथू ओहि कविता मे आएल छै। एहि विषय पर पहिनो कोनो कविता लिखल गेल हो, हमरा नहि देखाइत अछि। तहिना, एकटा कविता छनि निवेदिता झाक। शीर्षक तं छै 'मातृभाषा' लेकिन बात-विचार सबटा माय बला छै। एकठाम ओ मां कें संबोधित करैत कहै छथि-- 'हमरा बनेलौं मां अहां मनुक्ख/कर्मक्षेत्र मे जेना पठबै छै चिड़ै'। एहि मे की नब छै? मां कें संबोधित एहन कविता तं घनेरो लिखल गेल अछि। मुदा, मोन पाड़ल जाय, ओ सबटा कविता पुरुष कविक लिखल छल। बेटा एना कहै छै, कारण कर्मक्षेत्र मे चिड़ै जकां मैथिल मां अपन बेटे कें छोड़ैत रहलैक अछि। आ ई एकटा बेटीक लिखल कविता थिक जे कर्मक्षेत्र मे अपन मां कें स्मरण करैत अछि।

     प्रसंगवश हम इहो कहि जे आइ मैथिलीक युवा स्त्री कविता हमरा अपेक्षाकृत बेसी प्रखर बुझा रहल अछि। संभव जे जेना पढ़ाइ-लिखाइ मे बेटी लोकनि प्राय: सब साल आगू देखाइत रहली अछि तकर विस्तार मैथिली कविता धरि चलि अबैत हो। एम्हरका स्त्री कविता मे आत्मदया वा आत्मतिरस्कार वा नि:सहाय खौंझीबला रोष कम भेलैक अछि, भावुकता भरल विगलित-विगलित सन आख्यान सेहो आब नहि छैक। ओकरा स्थान पर अहां देखबै, अपना सं बाहर भ' क' स्त्री एकटा भव्य व्यापकताक दिस बढ़ली अछि। ओतय समाज संग जुड़बाक, दस लेल किछु करबाक उत्साह छै। ओहि ठाम जं प्रकृतियो आएल छै तं समष्टि चेतनाक अंग बनि क'। रोमिशाक एकटा कविता छनि 'उच्छ्वास'। ओहि मे चान के धरती पर उतरबाक दृश्य छै। दूपहर राति मे चान एखन नीमक डारि पर लटकल अछि आ बिचारि रहल अछि जे कोन अंगना उतरी। ओ जतय देखैए ततय या तं 'देहक जाति लिखल जा रहल छै' या फेर 'हताश घर फकसियारी काटि रहलैए'। चानक चिंता ओतय व्यक्त भेलैए आ ओकर असमंजस सेहो जे कोन अंगना उतरी‌ जाहि ठाम सं देखि क' निस्तुकी कयल जा सकय जे धरती एखनो धरि सौरमंडलक संतान छियै कि नहि!

मेनका मल्लिकक एकटा कविता मे गामक ओहि बेटी सभक दृश्य एलैक अछि जकरा आगू पढ़बाक, आगू बढ़बाक अनुमति ओकरा परिवार सं भेटल छै। कहै छथि-- 'माघक ठिठुरैत जाड़ मे/ ललनाक झुंड उष्णताक गप करैत/ बढ़ल जा रहल अछि/ .....झूमि रहल अछि गाछ बिरीछ'। प्रकृति आ स्त्री ओतय एकमएक छै। अनुप्रियाक एकटा कविता एसिड एटैक सं जनम भरिक लेल घायल भेलि स्त्रीक मादे छै, जकर एहि संकल्पक पर्याप्त तर्क ओतय छै जे 'अपना भीतरक आंच सं/ दुनियांक कोनो कोन मे/ सुनगा देब जीबाक लेल आगि'। एकटा सद्य: नवागंतुक कवयित्री रुचि स्मृतिक चारि पांच टा कविता कतहु कतहु हमरा पढ़बा मे आएल अछि। ई सब अपन अभिव्यक्ति मे ततेक विशेष अछि जे आगू रुचि एकटा कीर्तिमान ठाढ़ क' सकै छथि, से लगैत अछि। हमरा आश्चर्य लागल जे एही उमर मे हुनका एहि बातक कते सटीक अवगति छनि जे कविता मे कवि कें अपना खुद कतबा रहबाक चाही, कोन मात्रा धरि आ कतय अलग भ' जेबाक चाही। बांकी तं जखन एक युवा कवयित्री मीना झा अपन एक कविता मे कहै छथि जे 'जकर ने भूत छै ने भविष्य/ बस छै तं निष्प्रयोजन वर्तमान मनमौजीपन', तं मानू भर्चुअल दुनियां मे जीनिहार सौंसे युवा वर्ग कें नांगट क' दैत छथि। मुदा, नांगट होयब सेहो आसान नहि। रोमिशाक एक कविता मे आएल अछि--'पुरनका लोक कें एखनहु नांगट बनब नहि अबैत अछि/ ओ बाट तकैत छथि/ कहियो कोनो दिन सब चिड़ै घुरत खेत दिस / शहरक विकासक कटकी मुंह मे दबौने/ गाम मे खोता सजेबाक लेल'। कहब जरूरी नहि जे एहि ठाम नांगट बनबाक अर्थ थिक अप्रिय भवितव्य कें स्वीकार करबाक साहस, जकर अभाव बताओल गेल अछि। गाम फेरो बसतै एक दिन, सोचू जे एही भरोस पर हम सब जीबि रहल छी, एही भरोस पर अधिकांश युवा लोकनि पाग, माछ, मखान पर कविता लिखि रहल छथि आ मिथिलावासी कें जगा रहल छथि। रोमिशा कहै छथि हिनका लोकनि मे सच कें स्वीकारबाक हिम्मत नहि छनि।

         दोसर दिस, युवा कविताक किछु विशेषता तं हमरा खूबे मुग्ध करैत अछि। जेना बालमुकुंदक बिंब-संयोजन, जेना निवेदिता झाक काव्य-मुद्रा, जेना विकास वत्सनाभक काव्योक्ति-गठन, जेना अरुणाभ सौरभ आ दिलीप कुमार झाक दृश्य-वितान, जेना गुंजनश्रीक सौम्यता आ अंशुमान सत्यकेतुक पौरुष, जेना रघुनाथ मुखियाक दूटूकपन, निशाकरक विरल आपकता।


।।छव।।


वर्तमान समय मे आबि क' हमरा लोकनि प्रबंधात्मक काव्य-लेखन मे अवश्य ह्रास देखि रहल छी। जे महाकाव्य कि खंडकाव्य सब अयबो कयल अछि, आ तकरो संख्या एक दर्जन सं कम की हेतै, पुरनके लोक सभक लिखल छियनि। पछिला चारि पीढ़ी सं मुख्यधाराक कवि लोकनि द्वारा एहि तरहक लेखन बंद छै। हम अख्यासबाक कोसिस केलहुं जे एकर कारण की थिक? भ' सकैए जे एकर कारण अहां कें काव्य-बोधक उत्तरोत्तर विकसित होयब बुझना जाय। से हमरो लेल आश्वस्तिक बात होयत। मुदा, हम देखैत छी जे एकर प्रधान कारण ताहि लायक कवि लोकनिक अल्पप्राण होयब थिक। महाकाव्यक लेल चाही महाप्राण कवि, जिनका परंपराक गंहीर बोध होइन, पात्र सभक संग लगातार जीबाक कल्पनाशीलता होइन, अतुलित धैर्य होइन जे तमाम छिड़ियाएल कें एकतान मे गतानि सकथि। एकर ह्रास भेल अछि।तें एम्हर अपना सब देखैत छी जे जिनका महाकाव्य लिखबाक चाहै छलनि, से लोकनि भक्ति-गजल लिखि रहल छथि। मुदा, एकरो हम मैथिली कविताक एक विशेषते मानैत छी। भारतीय कविता मे साइते कोनो एहन भाषा हेतै, जकरा लग 'भक्ति-गजल' नामक अपन स्वतंत्र उपविधा होइक।

    गजलक बात चलल तं मोन पड़ल, आइ मैथिली गजलक क्षेत्र  मे एक सं एक प्रखर कवि सब योगदान क' रहल छथि। राजीव रंजन मिश्र एहि मे सब सं खास छथि। मनोज शांडिल्य, दीप नारायण विद्यार्थी, सदरे आलम गौहर, महाकान्त आदि बहुतो नाम छथि। बहुत दिनका बाद सारंग कुमार फेर सं सक्रिय भेलाह अछि, तं अपन दोसर पारीक शुरुआत गजले सं केलनि अछि। इहो आश्वस्तिक बात जे वरिष्ठ लोकनि मे सं सेहो कैक गोटे खूब सक्रिय छथि। बुद्धिनाथ मिश्र, सियाराम सरस, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, सुरेन्द्रनाथ आ जगदीश चंद्र ठाकुर खास तौर पर मोन पड़ैत छथि। गीतक क्षेत्र मे सेहो वरिष्ठक संग संग युवा लोकनि बेस सक्रिय छथि। बालकविता सेहो अपन उठान पर अछि। नवलश्री पंकज आ अमित मिश्र खास तौर पर मोन पड़ैत छथि। वरिष्ठ कवि विभूति आनंदक बालकविता-संग्रह छपल अछि।


।।सात।।


युवा पीढ़ीक जखन बात चलैत अछि, यात्री जीक ई लाइन बेर-बेर दोहराओल जाइत अछि जे 'नवतुरिये आबौ आगां'। एतेक बेर दोहराओल गेल अछि जे किनसाइते क्यो मैथिली मे रुचि रखनहिहार लोक एहि लाइन सं अपरिचित होथि। मुदा, हम मोन पाड़य चाहब, जहिया यात्री जी नवतुरिया रहथि, पचीस बरखक उमर रहनि, देश छोड़ि क' लंका विदा भेल रहथि, रस्ते मे ओ कविता लिखने रहथि 'अंतिम प्रणाम', आ 'मिथिलामोद' कें पोस्ट क' देने छलखिन। अपने तं ओ गेला, छपल कविता देखियो नहि सकला। मुदा, जखन ओ कविता छपि क' आयल, कोन तरहें मर्माहत केलक मिथिलाक जाबन्तो पढ़ल-लिखल लोक कें, कोना मिथिलाक स्मृति के अनिवार्य हिस्सा ओ कविता बनि गेल, कोना यात्री जी ओही कविता ल' क' एक पैघ कवि मानि लेल गेला, कोना मैथिली साहित्यक तत्कालीन मैनेजर लोकनि परेशान रहला, ताहि सब बातक एकटा बड़का इतिहास अछि। कांचीनाथ झा किरण कहथि--यौ, की छला तहिया यात्री जी? एकटा गरीब, टूटल झमारल टुग्गर ब्राह्मण, सैह कि ने? तहिया गरीबी आ शोषणक एहन मारि रहैक जे गाम गाम मे लोक सालेसाल गुदरिया बबाजी बनि क' निकलि जाइ छल। ककर कथा पत्रिका मे छपैक? मुदा, यैह तं थिक प्रतिभा। एकटा ओ कविता बनेलनि आ तकरा पत्रिका मे पठा देलखिन!

    से, हम कहैत रही जे नवतुरिया आगू आबौ, ई कोनो कहबाक बात नहि थिक, करबाक काज थिक। संभव जे एहन जं क्यो नवतुरिया बहरेता तं हुनकर विरोध होइन, हुनका पसंद नहि कयल जाइन, हुनका लेल मैथिली लग कोनो सम्मान नहि होइन। मुदा, मातृभाषा लेल किछु करबाक पुरुषार्थ तं एहने ठाम छै। आ, युवा लोकनिक एते भारी वाहिनी देखि क' हमरा आशा होइत अछि जे से साइत भ' सकतैक।

(साहित्य अकादेमी द्वारा दिल्ली मे 25.9.2018 कें आयोजित 'अखिल भारतीय मैथिली काव्योत्सव' मे व्यक्त विचार)

Friday, January 26, 2018

।।मांगनलाल।।
तारानंद वियोगी

(मिथिलाक प्रसिद्ध दलित गायक(1900-1045), जे विद्यापति-गीत कें पहिल बेर स्वरबद्ध क' एकल गेलनि, मुदा जिनकर स्वरक अवशेष आब बांकी नहि अछि)

कहथि बाबा साहेब--
झुकह, किएक तं झुकब थिक
मनुष्यताक चरम अहोभाग्य,
मुदा एतेक नहि झुकह
कि मालिक तोरे रीढ़ पर सवार भ'
कहाबथि नरवाहन, करथि सात पुस्तक उद्धार,
आ तोरा लेल पिपरो तर मे बास नहि--
कहथि बाबासाहेब भीमराव

से मुदा, अहां लेल नहि कहथि
ओ एकटा अनागत भविष्य लेल कहै छला
भविष्य तं जहिया अबितय तहिया
अहां कोना क' सकै छलहुं इनकार मांगनलाल
कि अहांक रीढ़ नहि थिक मालिकक वाहन
कि अहां आर अधिक झुकबा सं नासकार जाइ छी,
अहां कोना बाजि सकै छलहुं ठांहि-प-ठांहि बोल?

आदमी छलहुं तते मृदुल तते लुरगुज
जे सिरमा जकां माथ तर लै जोग छलहुं
लय जे गूंजय अहांक भीतर अहोरात्र
तकर छिटका तुहिनकण जकां चारूभर सदिखन बिदमान
गंगा नहाइ लेल लोक की जैतथि
गप क' लीतथि अहां संग दू पद जीवनक भास,
ध्वनि सं बनल जेना कोनो कलरव आकार!
अहां कोना कहि सकै छलहुं तरुआरि सं
जे हम नै कटबौ, जो छिटक
अहां कोना क' सकै छलहुं इनकार?

सभ्यता, जाहि मे लगहरि गाय कहाबथि माता
आ बिसुकल कसाइ हाथें बेचल जाथि,
क्यो कोना विश्वास क' सकै छथि
जे अहां करितहुं इनकार
आ से हुनका सहन भ' जैतियनि
ओ वैह करितथि जे कि ओ केलनि
ओ खुंडी खुंडी फोड़ि क'
मटिया तेल सं जरबितथि
अहांक जाबन्तो ग्रामोफोन मास्टर रेकर्ड
जे कि ओ वास्तव मे केलनि।

अहां तं जीलहुं मात्र संगीतक औरदा
कोनो बेहुसल नै कहियो केलहुं
संगीत-सन चाहलहुं अपन चौबगली समस्वरता
जखन कि ओ सब चीत्कार सुनबाक व्यसनी रहथि,
झ'र पड़ल जं लय मे तं कनी एकात भ' गेलहुं
नै नै, लोक तं एना मे देश छोड़ि दै छथि मांगन,
अहां तं बस दरबार छोड़लहुं।
हम, एहि देश के एक जिम्मेवार कवि
हाथ उठा क' कहै छी
अहां कोनो अपराध नहि केलहुं।

एकात भेलहुं कनी समस्वरता-हित
तखन तं ओ सब ई केलनि
जं कदाच इनकार केने रहितहुं
तखन ओ अहां कें कोना क' मारितथि
औ पंडित मांगनलाल?

संस्कृति, जाहि मे जनौधारी पद सं हक तौलल जाइत हो,
संगीत केवल अबल-दुबल के बेजुबान सलामी थिक
प्रभु-पद माथ पर बनल रहौ तदर्थ जयगान,
एम्हर अहां मनुष्यताक अस्मिता बनौने घुम' चाहैत रही चारू धाम
ओ कोना क' लीतथि बरदासक नाम?

विद्यापति कें गाबियनि अहां
जे कि ताधरि मौगिये मेहरारू मे छला आबाद कि दलित मे
जकरा पर कान-बात देनिहार क्यो नहि
स्त्रिगण जं गबितथि--
मोरे रे अंगनमा चंदन केर गछिया
तं ओ सुनियो सकै छला रभस के आह्लादवश
कि चमन लागै छै आंगन
मुदा, अहां कोना गाबि सकैत रही?
अहां तं राड़-रोहिया खवास धानुक
अहां के तं अंगनमा मालिक केर जुतबा
अहां कोना चाहि सकैत रही चनन घन गछिया?

उत्पीड़ित समुदाय के
अंतिम शरणस्थली होइ जनु संगीत
जे ओकरा जिया क' रखतै
टूट' भहर' देतै नहि जीवनराग,
भोर तं जहिया जा क' हेतै तहिया
आ सेहो ककरो कहियो ककरो कहियो
राति जं हो कनेको दिपमान
तं उचिते भोर के बढ़ै छै उजास
जेना देखू जे अहांक वंशधर
आइ प्रदेशक प्रमुख पत्रकार छथि,
एही भोरक अहां राति छलहुं दिपमान
जे कि अहांक राग के छिटका सं भिजैत छल

अहां गाबी राग तिरहुत मे
राधा रानीक वेदना
तं लगैए जेना पुल बनबी
एहि पार ओहि पारक बीच,
हिस्सक लगबी संग संग चलबाक
मरणमुख सभ्यता कें झमारि क' जगबी,
पुल बनबैत रही आबाजाहीक
तं बुझू सभ्य बनबैत रही मिथिला कें मांगन!

मुदा, तान कें नि:शब्द मे करैत अनूदित
अहां बिसरि जाइ
जे शिष्ट कें नै बनाओल जा सकैछ सभ्य
मानू पाग पर नहि बैसि सकैत होइ माछी
नहि बन' देलनि ओ पुल
अहां जेना कोनो नि:शब्द मे भेलहुं व्यतीत।

बीतल ओ निस्सन शताब्दी
जाहि मे अहां भेलहुं
आ भेला गांधी जी संविधान समेत
बीतल ओ शताब्दी हाक्रोश करैत
पूरे जुग कें खोधि खोधि
फोंकिल बेरबाद केलनि दन्तार मकुना सब

अधबनल लाधल अछि
अहांक निरमाएल पाया
आ सुगबुग सुगबुग करैएअनागत काल
ई शताब्दी अहां सं स्पर्शित हो
मांगनलाल!

Sunday, December 8, 2013

।।जीवन के रास्ते।।



मैथिली कवि जीवकान्त की कविता

नहीं, ज्यादा रंग नहीं
बहुत थोडा-सा रंग लेना
रंग लेना जैसे बेली का फूल लेता है शाम को
रंग लेना बस जितना जरूरी हो जीवन के लिए
रंग लेते हैं जितना आम के पत्ते
नए कलश में।

नहीं, ज्यादा गंध नहीं
गंध लेना बहुत थोडा-सा
बहुत थोडा-सा गंध जितना नीम-चमेली के फूल लेते हैं
गंध उतना ही ठीक जितना जरूरी हो जीवन के लिए
गंध जितना आम के मंजर लेते हैं।

नहीं, बहुत शब्द नहीं
जोरदार आवाज नहीं
आवाज लेना जितनी गोरैया लेती है अपने प्रियतम के लिए
जरूरी हो जितनी जीवन के लिए
आवाज उतनी ही जिसमें बात करते हैं पीपल के पत्ते हवा से,
थोडी-सी आवाज लेना
जितनी कि आंगन का जांता गेहूं के लिए लेता है।

जीवन के रास्ते हैं बडे सीधे
दिखावा नहीं, बिलकुल दिखावा नहीं
बरसता-भिंगोता बादल होता है जीवन
बरसते बादल में लेकिन रंग होते हैं बहुत थोडे
ध्वनि भी होती है तो साधारण
गंध भी होता है उसमें
विरल गंध।
(अनुवाद--तारानन्द वियोगी)

Wednesday, December 4, 2013

तारानन्द वियोगीक कविता

।।करह चर्चा।।

हरेक चौक पर, चौराहा पर
बथान मे, अखराहा पर
हमरे चर्चा।
हमरे चर्चा कंसार मे, बैसार मे
कनफुसकी मे, तरघुसकी मे
हमरे चर्चा।
हमरे चर्चा ताल मे, चौताल मे, झपताल मे।

वाह रे हम
जोगीलाल,
वाह रे हम।

चर्चा की तं खूब नाक कटलनि
चर्चा की तं खसलनि माथ परहक पाग।
बड काबिल बनै छला, बुझा पडलनि
नै सूझै छलियनि हम सब, सुझा पडलनि।
चर्चा की तं पढलाहा सब मानि नै ककरो दैए
आर की तं आशीष नै मठाधीशक लैए....

वाह रे हम
जोगीलाल,
करह चर्चा जते करबह
हौ बूडि,
हम जं मरलियह तं तहूं मरबह।

हौ, हमहूं जं कोनो असली पढलाहा हएब
तं तोरो बेटा-बेटी कें अपने-सन बनाएब...

करह चर्चा।



।।कने हमरो लाज करू दोस।।

मलिकिनी कनैत रहै छथि
दहो-बहो नोर,
आ हमरा ततबो पलखति नहि
जे हुनकर नोर कने तेना क' पोछियनि
जे आगू थोडे दिन फेर नहि कानथि।

कते दिन भ' गेल जे आफियत सं बैसी कने अलसाएल,
आ बिचारी जे हम सुखी छी कि सुखी नै छी।
अतीत के टुकडी सब कें
घुरा-घुरा आनी अवचेतन सं
, गाय-जकां पाजु करी,
हमरा ततबो पलखति नहि
जे अंटियाबी भविष्य कें--
--एना जं भेल ई करब,
--ओना जं भेल तं ओ करब।
हमरा ततबो पलखति नहि।

,
अहां एम्हर महराज,
जुलुम कोहराम मचौने छी--
--बुझलहुं दोस की, फलनमा लूझि लेलक सेसर पुरस्कार
--चिलनमा कहैए सब चोर छै, सब चुहार
--भुलना-राज मे खूब भुलल भुलक्कड भुलान,
--झुलना-राज मे झुलैत रहथु झूला निक-निक विद्वान।

आखिर की कहए चाहै छी अहां दोस?
बड अन्हेर भ' रहल अछि
तें हम  छोडि दी अपन काज?
हमहूं मटियाइये दी मटियाएल जाइत कें--
की अहां से कहै छी?

हे, कने हमरो लाज करू दोस,
हमरो।

मानि लिय' छोडिये जं हम दी अपन काज,
तं जा क' मलिकिनी के नोर नै पोछबनि ग' यौ,
जे फलनमा आ चिलनमा के छिद्र मे पैसब।

कने हमरो लाज करू दोस।



Tuesday, August 27, 2013

मोन पड़ैए

नद्दी कातक आमक गाछी मोन पड़ैए

एकपेरिया मे बूलैत बाछी मोन पड़ैए

बड़का बाबा के तड़बा कुड़ियाबैत छलियै

आमक महिना सभतरि माछी मोन पड़ैए