Thursday, August 18, 2011

कल्हुका स्वप्न बुनल जाए तं आगि जनमै अछि

गजल

तारानन्द वियोगी


(हमर एक युवा मित्र किसलय कृष्ण, हमर एकटा पुरान गजल मोन पाडलनि। हुनका लग ई छलैनियो नहि। 1983 मे लिखने रही। भेल जे अजुका हालात मे तं एकर बिम्ब आरो जगजियार देखाइत छै, तें, मित्र लोकनि कें सेहो सुनाएल जाय। सुनल जाय----)


दर्द जं हद कें टपल जाए तं आगि जनमै अछि

बर्फ अंगार बनल जाए तं आगि जनमै अछि


ओहिना भूख, दुक्ख, त्रास बाट नै छोडत

कल्हुका स्वप्न बुनल जाए तं आगि जनमै अछि


माटिक लोक केहन यातना मे मुइल, मरय

लोकक दोख बुझल जाए तं आगि जनमै अछि


शोषणक चक्र, सहन-शक्ति, राजनीति बनए

मगजक नस जं तनल जाए तं आगि जनमै अछि


लोकक वोट गनल गेल, राजकुल जनमल

लोकक शक्ति गनल जाए तं आगि जनमै अछि

Tuesday, July 19, 2011

मैथिलीक बोली


मैथिलीक बोली

डा० एम०जे०वारसी (मोहम्मद जहांगीर वारसी) वाशिंगटन विश्वविद्यालय मे भाषाविज्ञानक प्राध्यापक छथि। मैथिल छथि। कुशेश्वरस्थान(दरभंगा) निवासी थिकाह। अपन मूल शिक्षण-कार्यक अतिरिक्त विश्वविद्यालयक किछु आनो प्रोजेक्ट सब पर काज ' रहल छथि, जे भारतीय भाषा सभक अध्ययन सं संबंधित अछि। हुनकर कैकटा लेख नेट पर सेहो उपलब्ध अछि। एखन हाल मे हमरा हुनकर एकटा मुद्रित टिप्पणी पढबाक अवसर भेटल। टिप्पणी मिथिला मे बाजल जाइ बला एक बोलीक अध्ययनक संबंध मे अछि। हुनकर विश्लेषण संकल्प हमरा नीक लागल।

डा० वारसी कहै छथि जे मिथिलाक कैक जिला मे रहनिहार अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय एक एहन बोलीक प्रयोग करै छथि, जकर एखन धरि कोनो नाम नहि राखल गेल छै। एहि क्षेत्रक मूल भाषा संचारक मुख्य माध्यम मैथिली थिक। मुदा, एतुक्का मुस्लिम लोकनि जखन आपस मे एक दोसराक संग गप करै छथि तं मैथिली सं अलग एक बेनाम बोली बजै छथि, जकर वाक्य-संरचना मैथिली, उर्दू हिन्दी तीनू सं फराक अछि। एहि बोलीक अपन कोनो लिपि नहि छै ने लिखित साहित्य। तें एखन धरि भाषावैज्ञानिक लोकनिक ध्यान एहि दिस नहि गेलनि अछि।

डा० वारसीक नेनपन मिथिला मे बितलनि। बाहर जा ' भाषाविज्ञानक उच्चतर अध्ययन केलनि। देश सं दूर रहि ' अपन क्षेत्रक बोली के भाषावैज्ञानिक अध्ययन करबाक खगता संकल्प हुनका भेलनि, बहुत नीक बात थिक। हमर समझ अछि जे मिथिला-क्षेत्रक बोली सभक व्यवस्थित अध्ययन सं हमर भाषा(मैथिली) आयाम विस्तृत हएत, गरिमा बढत।

ठीक एही तरहें मैथिलीक एक आर बोली अछि जे दरभंगा-मधुबनीक पिछडा-अतिपिछडा समुदायक लोक सब आपसी संचार मे व्यवहार करै छथि। दरभंगा-मधुबनीक माछ बजार, तरकारी बजार मे अहां एहि बोली के विलक्षण ठाठ भंगिमा सं परिचित ' सकै छी। एहि दुनू जिला मे तं देखल जाइए जे एके गाम मे जं दू टोल अछि तं एक टोलक लोक मैथिली भाषा बजै छथि जखन कि दोसर टोलक लोक बेनाम बोली। एकरो कोनो साहित्य नहि छै। मुदा, मैथिली साहित्य मे उपर्युक्त दुनू बोलीक घनेरो रोचक नमूना हमरा लोकनि कें भटैत अछि, उपन्यास मे, कथा मे नाटक मे। नाटककार महेन्द्र मलंगिया तं एहि दुनू बोलीक प्रयोग के मास्टर छथि--बोधक स्तर पर सेहो संवेदनाक स्तर पर सेहो। आरो अनेक लोक छथि। असल मे, आधुनिक मैथिली साहित्य के जमीन सं जुडल रहबाक सांस्कृतिक जागरूकता सेहो, उदाहरण थिक।

मुदा, बोलीक भाषावैज्ञानिक अध्ययन एहि सं सर्वथा फराक चीज थिक। एहि अध्ययन सं मिथिलाक कतेको अनछुअल समाजार्थिक रहस्य सभक उद्घाटन ' सकैत अछि। एहि अध्ययनक बहुत आवश्यकता अछि। से बहुत जल्दी। कारण, संस्कृताइजेशन ग्लोबलाइजेशनक कारण बोली सब कालक गाल मे समाएल जा रहल अछि।

भाषाविज्ञानक युवा अध्येता लोकनि सं एहि दिस नजरि तकबाक अपेक्षा करै छी।

Thursday, June 30, 2011

चवन्नी


कुछ लोग मर तो जाते हैं बहुत पहले मगर दफनाए बहुत बाद में जाते हैं। जैसे चवन्नी। रघुवर को अचरज लग रहा था-- आज आकर मरी है चवन्नी? गजब करते हो साहब, मुझे तो पांच बरस से उसके दर्शन नहीं हुए। मैंने कहा--घबराओ मत रघू, ये अठन्नी और टकही भी जल्द ही जाएगी, क्योंकि राज तो ये सलामत रहना ही रहना है। दिक्कत न हनुमान जी को हुई है,न पंडित जी को। उनके लिए तो अच्छा हुआ कि सवा रुपये के पचडे से पिंड छूटा। दिक्कत गरीब को हुई है कि किफायत बरतने का एक स्वीकृति-प्राप्त जरिया उनसे छिन गया। दिक्कत मुझे हुई है कि अपनी गौरी की चवनियां मुस्कान के लिए कोई दूसरा शब्द खोजे से नहीं मिल रहा। तुम ही नहीं मरी हो चवन्नी, तुम्हारे साथ-साथ गरीब की औकात भी थोडी-थोडी मर गई है।

यात्री-स्मरण




काल्हिखन नामवर सिंह यात्री जीक बारे मे एकटा बड सुन्दर बात कहलखिन। ओ एकटा टी०वी० चैनल पर साहित्यिक कार्यक्रम मे बाजिो रहल छला। अवसर छल--केदारनाथ अग्रवाल जन्मशताब्दी-वर्ष। ओ कहलखिन जे चारिटा महान कविक ई जन्मशताब्दी-वर्ष थिक--अज्ञेय, शमशेर, केदार आ नागार्जुन। एहि चारूगोटे मे बहुत अन्तर। अज्ञेय शुरू मे छला जन-सरोकारी, लेकिन आगू चलि क' बडका लोकक लोक बनि गेला आ ज्ञानपीठ पौलनि। शमशेर जबर्दस्त कविता लिखलनि मुदा सब कें सदा प्रसन्न रखलनि आ ककरो दुश्मन नहि बना सकला। केदार तेहन विरल कवि भेला जे जिबिते-जी दुनियां हुनका बिसरि गेलनि। बचला नागार्जुन। ओ अपन ततेक बेसी, ततेक बेसी दुश्मन बनौलनि जे लोक हुनकर नाम नहि सुन' चाहैए। (लोक माने सत्ताधारी, साम्राज्यवादी, पाखंड-जीवी लोक) ओ तं धन्य अछि मिथिला, मैथिल आ मैथिली जे हिन्दी-पट्टी कें हुनका मोन पाडबाक लेल विवश करैत रहैत अछि।

हम सोच' लगलहुं जे वाह वाह, बाहर तं हमर सभक ई जस अछि, मुदा घर के हाल की अछि? जनिते छी जे मैथिलीक इन्टरनेट-पत्रिका जन्म-शताब्दीक वर्षो भरि अल्लड-बल्लड लिखि क' यात्री जीक कद छोट करबाक अभियान मे लागल रहल। अहां कें हंसी लागत मुदा हमरा दया लागैए। असल मे बाबू सब कें विश्वसे नहि भ' रहल चनि जे हाड-मासु के बनल एहनो क्यो चिर नवीन प्रोग्रेसिव मिथिला मे जनमि सकैए। हौ नुनू, फुच्ची ल' क' समुद्र नाप' जयबह तं आखिर कोन निष्कर्ष पर पहुंचबह?

लक्ष्मीनाथ गोसांइ के खोज


लक्ष्मीनाथ गोसांइ के खोज मे लागल छी। खोज माने ई जे ओ असल मे की छला। मिथिला मे हुनका देवता बना क', मंदिर मे स्थापित क' क' पूजल जाइ छनि। मिथिलाक सन्त-परंपराक ओ शिखर थिका। मुदा हम देखै छी जे ओ उनैसम शताब्दी मे व्यापल भारतीय नवजागरण मे मिथिलाक प्रतिनिधि रहथि। धार्मिक आ पंथगत समन्वय, तर्कसंगति, मातृभूमिक प्रति अनन्य प्रेम, एकजुटताक आह्वान, कम्पनी-राजक प्रति घोर घृणा आ आक्रोश आ विद्रोह, देश-वासी कें दुर्गत अवस्था सं बाहर निकालबाक दृढ संकल्प---सभ कथू छनि लक्ष्मीनाथ मे, जे हुनका नवजागरणक नायक साबित करै छनि। १८५७ के क्रान्ति मे ओ प्रत्यक्ष रूप सं भाग लेने रहथि। उत्तर बिहारक क्षेत्र मे ओ भूमिगत रूप सं ठीक ओहिना सक्रिय रहथि जेना अवध के इलाका मे स्वामी दयानन्द सरस्वती सक्रिय रहथि। दयानन्द सरस्वतीक काज आसान रहनि, कारण जे स्थानीय शासन दिस सं झमेला नहि रहनि। लक्षीनाथक काज बड कठिन रहनि, कारण दरभंगा-राज कम्पनी-सरकारक सपोर्ट मे रहए आ क्रान्ति कें कुचलैक वास्ते सैनिक, हाथी-घोडा आ नगदी ल' क' कम्पनीक संग ठाढ छल आ गारंटी केने छल जे मिथिला मे क्रान्ति के बसात नहि ढुक' देत। एहना स्थिति मे लक्षीनाथ कें पकडल गेल छल आ ओ जेल ढुकाओल गेल छला। सजा होइतनि तं कि तं फांसी लटकाओल जाइतथि अथवा कालापानी पठाओल जाइतथि। एहन प्रतीत होइत अछि जे अपन एक अंग्रेज शिष्य अब्राहम जॅानक उद्यम सं ओ रिहा भेला। जॅान जमींदार आ नील-फैक्टरीक मालिक रहथि। आध्यात्मिक रुझानक व्यक्ति ओ मैथिली मे भक्ति-पदक रचना सेहो केने छथि। लक्ष्मीनाथक चारि प्रधान शिष्य मे सं एक जॅान क्रिश्चियन, दोसर मोहम्मद गौस खां मुसलमान, तेसर राजाराम शास्त्री कान्यकुब्ज आ चारिम रघुवर गोसांइ मैथिल छला। लक्ष्मीनाथ कीर्तन-मंडली चलबथि। नेपाल सं ल' क' उत्तर भारतक कैक प्रान्त मे हुनक प्रभाव-क्षेत्र छलनि। हुनक यैह तरीका रहनि विद्रोह कें हवा देबाक। मुदा, मिथिला-राजक लेल ई भेल महापाप, घोर खिधांसक बात। तें एहि बात कैं झांपल-तोपल गेल।लक्ष्मीनाथक देहान्त १८७३ मे भेलनि। हुनक भक्ति-पद सब कें ध्यान सं पढू तं ई सब बात झक-झक देखार पडत। अपन एक पद मे ओ कहै छथि--'पामर राज करत एहि पुर पर' माने जे एहि देश पर दुष्ट शैतान सब राज क' रहल अछि। मिथिलाक बुद्धिजीवी लोकनि आइ दुख करै छथि जे नवजागरणक लहर मिथिला मे फोंक गेल, १८५७ मे हम सब किछु नहि क' सकलहुं। गलत बात अछि। मुदा, समझ मे आएत कोना? मंदिर मे बन्द क' क' हम सब अपन महापुरुष के खाली पूजा करैत रहबै तं अपन रीयल विरासत समझ मे आएत कोना?

Friday, June 24, 2011

एना फूसि के बयार बहत तं कोना बचत मैथिली?

मैथिलीक सुप्रसिद्ध लेखक डा० विभूति आनन्द आइ बहुत दुखी ' ' हमरा फोन केलनि। भाव-विह्वल छला ताहि संगे आक्रोशित जकां सेहो। हम पुछलियनि-- भाइ, की बात? बेर-बेर कहथि-- 'अहां कें एना नहि बजबाक-लिखबाक चाही।' हम चकित रही जे आखिर एहन कोन बात हम बजलहुं वा लिखलहुं जाहि सं हमर आदरणीय लेखक एहि तरहें दुखी छथि।

बात जे कहलनि, ताहि सं हम बुझलहुं जे हुनकर क्यो अपेक्षित हुनका कहलकनि जे तारानन्द वियोगी 'विदेह' (मैथिली इन्टरनेट पत्रिका एवं फेसबुक-ग्रुप) मे कहलखिन जे विभूति आनन्द कें जे साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटलनि, से बेटाक मृत्युक सान्वना-स्वरूप। हमर देह सिहरि गेल जे हे भगवती, लीला। एहि बात सं तं हम निश्चिन्त रहबे करी जे एहि तरहक घटिया बात हम आइ तं की जे कहियो बाजिये नहि सकै छी। मोन मे यैह आएल जे गजेन्द्र ठाकुर हमरा सं दुश्मनी निमाहैत-निमाहैत की आब एते पतित ' गेला? पछिला तीस बरस सं साहित्य मे हमर बहुत दुश्मन भ' चुकलाह अछि। हमरा खिलाफ मे जते लिखल गेल अछि, तकरा जं पुस्तकाकार छपाओल जाय तं पांच सौ पृष्ठक विशाल ग्रन्थ ' जेतै। एकरा हम कहियो बेजाय नै मानलियै, उनटे अपन सौभाग्य मानलहुं जे जीबन्त-जागन्त लोक छी तं वैचारिक विरोध तं हेबे करत। तकरा सब कें पढबाको फुरसत हमरा नै रहैए। अपन काज करी कि घून-सून लेने घुरी? मुदा कहलनि तं हम कने ताक-झांक केलहुं।

एतबा बात तं प्रायः सब गोटे कें बूझल हएत जे इन्टरनेट पर वा फेसबुक मे सैकडोक संख्या मे फरजी एकाउन्ट छै, जे साइबर-युद्ध मे नकली सेनाक काज करै छै। कतेक बेर तं डिसाइड करब कठिन ' जाइ छै जे के असली के नकली। जे किछु। एहने एक कोनो बन्धु बहुत उद्दंड भाषा मे लिखलनि अछि जे बात हम तहिया कहने रही, जहिया विभूति जी कें अकादमी पुरस्कार भेटल रहनि साक्ष्य के तौर पर 'समय-साल' पत्रिका के उल्लेख कएल गेल छै। गजेन्द्र जी एहि कथन कें अपन स्वीकृति प्रदान केलनि अछि।

हम विभूति जी कें सब बात कहलियनि। पुछलियनि---'की अहां कें मोन पडैए जे हम तहिया बात कहने रहियै?' मुदा, हुनको बात अविश्वसनीय लगलनि। अन्त मे 'समय-साल' निकाललनि। सरिया ' देखलनि। अन्त मे फेर वैह हमरा फोन ' ' सूचित केलनि जे अहांक बात कहबाक तं कतहु कोनो जिक्र नहि अछि। हमरा पर दुखी भेल छला, ताहि लेल अपसोच प्रकट केलनि। फेर गप भेल जे हमरा एहि बातक खंडन प्रकाशित करबाक चाही।

हम भारी छगुन्ता मे छी जे की खंडन प्रकाशित करी? अनजान मे गलती हो तं आदमी सुधरि सकैए। एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।

खंडन केने सं की हएत? हम पहिनो खंडन ' चुकल छी। मुदा सब अपन खुट्टा ठामे पर गाडने रहला। उनटे बकथोथनि करए लगलाह।

तैयो, विभूति जीक सम्मानार्थ हम इन्टरनेट सं जुडल मैथिलीक पाठक-लेखक-एक्टिविस्ट लोकनि कें सावधान करै छियनि जे 'विदेह' मे छपल कोनो बातक विश्वसनीयता अत्यन्त संदिग्ध होइ छै। छौडा-मारडि के खेती छिऐक, नै उपजल तं अथी सती..... जं कोनो कारण सं विश्वास करब बहुत जरूरी हो तं साक्ष्य के परीक्षण स्वयं ' लेथि (19.6.11)

Wednesday, April 13, 2011

कुछ तो गहरा हो यार

मिथिला के कुछ लडके इनदिनों फेसबुक पर मैथिली लेखकों से लड रहे हैं। मुझे तो पता भी नहीं था, देवेश ने आग्रह किया तो लडाई देखने मैं भी उनके आंगन गया था। मजा नहीं आया। लडके इस तरह विवस्त्र होकर लड रहे थे कि शामिल होने का मन भी नहीं किया।

लडाई की कुल जमा वजह यही दिखी कि लडके (और, उनके बुजुर्ग) मैथिली साहित्य में अपना स्थान चाहते हैं। यश और सम्मान। वाजिब बात है। यह उनको मिलना चाहिए। इसके लिए कई तरीके आजमाए जाते रहे हैं। एक पुराना तरीका है--सही-गलत मुद्दे खोज-खोजकर अपने सीनियर की कटु आलोचना करना और जहां तक बन पडे उन्हें गालियां देना। ये हर जगह होता है, हर पीढी में होता है।

लेकिन, इसके साथ-साथ अच्छा लिखना भी पडता है। ये लडके इन्टरनेट की विस्तृति और व्यापकता का गहरा ज्ञान रखते हैं। हथियार के तौर पर इसके उपयोग की समझ भी उनमें है। पर, ये अच्छा लिख नहीं पा रहे हैं। गहराई इनमें नहीं है। संवेदना के स्तर पर ज्ञान के स्तर पर। इसका जतन भी वे नहीं कर पा रहे हैं। पर, हडबडी है।............देखकर दुख होता है।

सीनियर के तौर पर गलियाने के लिए मुझे भी चुना गया है। खुशी हुई कि चलो, इस लायक समझा गया, 'नन-मैथिल' होने के बावजूद। मगर, दुख भी हुआ कि ये लडके ब्रह्म-वाक्य भाखने का दम्भ तो रखते हैं पर वास्तविक तथ्यों के बारे में कितना कम और अधूरा जानते हैं।देखिए, मुझे गाली देने के लिए ये 'जमीन्दार' शब्द चुनते हैं।

मेरी पुरस्कृत किताब ' भेटल तं की भेटल' के बारे में बहुत अद्भुत जानकारी इसमें दी गई है। समझें, मेरा भी 'ज्ञान-वर्द्धन' हुआ, खुद अपने बारे में। लिखा है कि ये किताब मेरी हिन्दी किताब 'यह पाया तो क्या पाया' का मैथिली रूपान्तर है। अबे यार, पूछ तो लिया होता। 'यह पाया.....' १५० पृष्ठों का कहानी-संग्रह है जो २००५ में प्रेस गया पर प्रकाशक के महिमा-वश अब तक भी बाहर सका। इसलिए लिखनेवाले ने इस किताब को कहीं देखा भी होगा। पर, लिख दिया मजे से। और, इसी बिना पर मुझे गलियाये जा रहे हैं।

अरे पंडित, कुछ तो स्तर निभाना सीख। कुछ तो गहरा हो यार। कुछ तो खयाल कर कि 'साहित्य' के क्षेत्र में काम करने आए हो, और वो भी विद्यापति की भाषा में। क्या होगा कल तुम्हारी 'मां मैथिली' का?