Tuesday, July 19, 2011

मैथिलीक बोली


मैथिलीक बोली

डा० एम०जे०वारसी (मोहम्मद जहांगीर वारसी) वाशिंगटन विश्वविद्यालय मे भाषाविज्ञानक प्राध्यापक छथि। ओ मैथिल छथि। कुशेश्वरस्थान(दरभंगा)क निवासी थिकाह। अपन मूल शिक्षण-कार्यक अतिरिक्त ओ विश्वविद्यालयक किछु आनो प्रोजेक्ट सब पर काज क' रहल छथि, जे भारतीय भाषा सभक अध्ययन सं संबंधित अछि। हुनकर कैकटा लेख नेट पर सेहो उपलब्ध अछि। एखन हाल मे हमरा हुनकर एकटा मुद्रित टिप्पणी पढबाक अवसर भेटल। ई टिप्पणी मिथिला मे बाजल जाइ बला एक बोलीक अध्ययनक संबंध मे अछि। हुनकर विश्लेषण आ संकल्प हमरा नीक लागल।

डा० वारसी कहै छथि जे मिथिलाक कैक जिला मे रहनिहार अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय एक एहन बोलीक प्रयोग करै छथि, जकर एखन धरि कोनो नाम नहि राखल गेल छै। एहि क्षेत्रक मूल भाषा आ संचारक मुख्य माध्यम मैथिली थिक। मुदा, एतुक्का मुस्लिम लोकनि जखन आपस मे एक दोसराक संग गप करै छथि तं मैथिली सं अलग एक बेनाम बोली बजै छथि, जकर वाक्य-संरचना मैथिली, उर्दू आ हिन्दी तीनू सं फराक अछि। एहि बोलीक अपन कोनो लिपि नहि छै आ ने लिखित साहित्य। तें एखन धरि भाषावैज्ञानिक लोकनिक ध्यान एहि दिस नहि गेलनि अछि।

डा० वारसीक नेनपन मिथिला मे बितलनि। ओ बाहर जा क' भाषाविज्ञानक उच्चतर अध्ययन केलनि। देश सं दूर रहि क' अपन क्षेत्रक बोली के भाषावैज्ञानिक अध्ययन करबाक खगता आ संकल्प हुनका भेलनि, ई बहुत नीक बात थिक। हमर समझ अछि जे मिथिला-क्षेत्रक बोली सभक व्यवस्थित अध्ययन सं हमर भाषा(मैथिली)क आयाम विस्तृत हएत, गरिमा बढत।

ठीक एही तरहें मैथिलीक एक आर बोली अछि जे दरभंगा-मधुबनीक पिछडा-अतिपिछडा समुदायक लोक सब आपसी संचार मे व्यवहार करै छथि। दरभंगा-मधुबनीक माछ बजार, तरकारी बजार मे अहां एहि बोली के विलक्षण ठाठ आ भंगिमा सं परिचित भ' सकै छी। एहि दुनू जिला मे तं देखल जाइए जे एके गाम मे जं दू टोल अछि तं एक टोलक लोक मैथिली भाषा बजै छथि जखन कि दोसर टोलक लोक ई बेनाम बोली। एकरो कोनो साहित्य नहि छै। मुदा, मैथिली साहित्य मे उपर्युक्त दुनू बोलीक घनेरो रोचक नमूना हमरा लोकनि कें भटैत अछि, उपन्यास मे, कथा मे आ नाटक मे। नाटककार महेन्द्र मलंगिया तं एहि दुनू बोलीक प्रयोग के मास्टर छथि--बोधक स्तर पर सेहो संवेदनाक स्तर पर सेहो। आरो अनेक लोक छथि। असल मे, ई आधुनिक मैथिली साहित्य के जमीन सं जुडल रहबाक आ सांस्कृतिक जागरूकता सेहो, उदाहरण थिक।

मुदा, बोलीक भाषावैज्ञानिक अध्ययन एहि सं सर्वथा फराक चीज थिक। एहि अध्ययन सं मिथिलाक कतेको अनछुअल समाजार्थिक रहस्य सभक उद्घाटन भ' सकैत अछि। एहि अध्ययनक बहुत आवश्यकता अछि। से बहुत जल्दी। कारण, संस्कृताइजेशन आ ग्लोबलाइजेशनक कारण ई बोली सब कालक गाल मे समाएल जा रहल अछि।

भाषाविज्ञानक युवा अध्येता लोकनि सं एहि दिस नजरि तकबाक अपेक्षा करै छी।

Thursday, June 30, 2011

चवन्नी


कुछ लोग मर तो जाते हैं बहुत पहले मगर दफनाए बहुत बाद में जाते हैं। जैसे चवन्नी। रघुवर को अचरज लग रहा था-- आज आकर मरी है चवन्नी? गजब करते हो साहब, मुझे तो पांच बरस से उसके दर्शन नहीं हुए। मैंने कहा--घबराओ मत रघू, ये अठन्नी और टकही भी जल्द ही जाएगी, क्योंकि राज तो ये सलामत रहना ही रहना है। दिक्कत न हनुमान जी को हुई है,न पंडित जी को। उनके लिए तो अच्छा हुआ कि सवा रुपये के पचडे से पिंड छूटा। दिक्कत गरीब को हुई है कि किफायत बरतने का एक स्वीकृति-प्राप्त जरिया उनसे छिन गया। दिक्कत मुझे हुई है कि अपनी गौरी की चवनियां मुस्कान के लिए कोई दूसरा शब्द खोजे से नहीं मिल रहा। तुम ही नहीं मरी हो चवन्नी, तुम्हारे साथ-साथ गरीब की औकात भी थोडी-थोडी मर गई है।

यात्री-स्मरण




काल्हिखन नामवर सिंह यात्री जीक बारे मे एकटा बड सुन्दर बात कहलखिन। ओ एकटा टी०वी० चैनल पर साहित्यिक कार्यक्रम मे बाजिो रहल छला। अवसर छल--केदारनाथ अग्रवाल जन्मशताब्दी-वर्ष। ओ कहलखिन जे चारिटा महान कविक ई जन्मशताब्दी-वर्ष थिक--अज्ञेय, शमशेर, केदार आ नागार्जुन। एहि चारूगोटे मे बहुत अन्तर। अज्ञेय शुरू मे छला जन-सरोकारी, लेकिन आगू चलि क' बडका लोकक लोक बनि गेला आ ज्ञानपीठ पौलनि। शमशेर जबर्दस्त कविता लिखलनि मुदा सब कें सदा प्रसन्न रखलनि आ ककरो दुश्मन नहि बना सकला। केदार तेहन विरल कवि भेला जे जिबिते-जी दुनियां हुनका बिसरि गेलनि। बचला नागार्जुन। ओ अपन ततेक बेसी, ततेक बेसी दुश्मन बनौलनि जे लोक हुनकर नाम नहि सुन' चाहैए। (लोक माने सत्ताधारी, साम्राज्यवादी, पाखंड-जीवी लोक) ओ तं धन्य अछि मिथिला, मैथिल आ मैथिली जे हिन्दी-पट्टी कें हुनका मोन पाडबाक लेल विवश करैत रहैत अछि।

हम सोच' लगलहुं जे वाह वाह, बाहर तं हमर सभक ई जस अछि, मुदा घर के हाल की अछि? जनिते छी जे मैथिलीक इन्टरनेट-पत्रिका जन्म-शताब्दीक वर्षो भरि अल्लड-बल्लड लिखि क' यात्री जीक कद छोट करबाक अभियान मे लागल रहल। अहां कें हंसी लागत मुदा हमरा दया लागैए। असल मे बाबू सब कें विश्वसे नहि भ' रहल चनि जे हाड-मासु के बनल एहनो क्यो चिर नवीन प्रोग्रेसिव मिथिला मे जनमि सकैए। हौ नुनू, फुच्ची ल' क' समुद्र नाप' जयबह तं आखिर कोन निष्कर्ष पर पहुंचबह?

लक्ष्मीनाथ गोसांइ के खोज


लक्ष्मीनाथ गोसांइ के खोज मे लागल छी। खोज माने ई जे ओ असल मे की छला। मिथिला मे हुनका देवता बना क', मंदिर मे स्थापित क' क' पूजल जाइ छनि। मिथिलाक सन्त-परंपराक ओ शिखर थिका। मुदा हम देखै छी जे ओ उनैसम शताब्दी मे व्यापल भारतीय नवजागरण मे मिथिलाक प्रतिनिधि रहथि। धार्मिक आ पंथगत समन्वय, तर्कसंगति, मातृभूमिक प्रति अनन्य प्रेम, एकजुटताक आह्वान, कम्पनी-राजक प्रति घोर घृणा आ आक्रोश आ विद्रोह, देश-वासी कें दुर्गत अवस्था सं बाहर निकालबाक दृढ संकल्प---सभ कथू छनि लक्ष्मीनाथ मे, जे हुनका नवजागरणक नायक साबित करै छनि। १८५७ के क्रान्ति मे ओ प्रत्यक्ष रूप सं भाग लेने रहथि। उत्तर बिहारक क्षेत्र मे ओ भूमिगत रूप सं ठीक ओहिना सक्रिय रहथि जेना अवध के इलाका मे स्वामी दयानन्द सरस्वती सक्रिय रहथि। दयानन्द सरस्वतीक काज आसान रहनि, कारण जे स्थानीय शासन दिस सं झमेला नहि रहनि। लक्षीनाथक काज बड कठिन रहनि, कारण दरभंगा-राज कम्पनी-सरकारक सपोर्ट मे रहए आ क्रान्ति कें कुचलैक वास्ते सैनिक, हाथी-घोडा आ नगदी ल' क' कम्पनीक संग ठाढ छल आ गारंटी केने छल जे मिथिला मे क्रान्ति के बसात नहि ढुक' देत। एहना स्थिति मे लक्षीनाथ कें पकडल गेल छल आ ओ जेल ढुकाओल गेल छला। सजा होइतनि तं कि तं फांसी लटकाओल जाइतथि अथवा कालापानी पठाओल जाइतथि। एहन प्रतीत होइत अछि जे अपन एक अंग्रेज शिष्य अब्राहम जॅानक उद्यम सं ओ रिहा भेला। जॅान जमींदार आ नील-फैक्टरीक मालिक रहथि। आध्यात्मिक रुझानक व्यक्ति ओ मैथिली मे भक्ति-पदक रचना सेहो केने छथि। लक्ष्मीनाथक चारि प्रधान शिष्य मे सं एक जॅान क्रिश्चियन, दोसर मोहम्मद गौस खां मुसलमान, तेसर राजाराम शास्त्री कान्यकुब्ज आ चारिम रघुवर गोसांइ मैथिल छला। लक्ष्मीनाथ कीर्तन-मंडली चलबथि। नेपाल सं ल' क' उत्तर भारतक कैक प्रान्त मे हुनक प्रभाव-क्षेत्र छलनि। हुनक यैह तरीका रहनि विद्रोह कें हवा देबाक। मुदा, मिथिला-राजक लेल ई भेल महापाप, घोर खिधांसक बात। तें एहि बात कैं झांपल-तोपल गेल।लक्ष्मीनाथक देहान्त १८७३ मे भेलनि। हुनक भक्ति-पद सब कें ध्यान सं पढू तं ई सब बात झक-झक देखार पडत। अपन एक पद मे ओ कहै छथि--'पामर राज करत एहि पुर पर' माने जे एहि देश पर दुष्ट शैतान सब राज क' रहल अछि। मिथिलाक बुद्धिजीवी लोकनि आइ दुख करै छथि जे नवजागरणक लहर मिथिला मे फोंक गेल, १८५७ मे हम सब किछु नहि क' सकलहुं। गलत बात अछि। मुदा, समझ मे आएत कोना? मंदिर मे बन्द क' क' हम सब अपन महापुरुष के खाली पूजा करैत रहबै तं अपन रीयल विरासत समझ मे आएत कोना?

Thursday, December 16, 2010

आत्म-गीत रवीन्द्रनाथ ठाकुर



































  सत् चितक मानि अनुरोध 
अपन अथ-उथ के कयल विरोध 
कयल अपनहि पर जमि क' शोध
 प्राप्त निष्कर्ष करौलक बोध 
अपन अवरोध थिकहुं हम अपने। 
अपन गतिरोध थिकहुं हम अपने।। 

 कुलबोड़न,भव-युग-ताड़न हम 
छी कारण तथा निवारण हम 
मुंहझांपन, देहउघाड़न हम 
हम अगिलह, आगि-पझाबन हम 
से जानि भेल उत्पन्न महाविक्षोभ 
तं आयल क्रोध, क्रोध पर क्रोध 
अपन जड़िखोध थिकहुं हम अपने।।

 कटु सत्यक तथ्य मथन कयलहुं 
शुभ जीवन हेतु जतन कयलहुं 
सब ओझराहटि सोझरा-सोझरा
संतुलनक विधिक चयन कयलहुं 
प्रतिशोधक कयल विरोध, 
मरल दुर्योध विना प्रतिरोध 
कयल सुख-बोध 
स्वयं हरिऔध थिकहुं हम अपने 
स्वयं हरिऔध थिकहुं अपने।। 

(प्रस्तुति--तारानंद वियोगी)

Wednesday, December 8, 2010

साहित्य अकादेमी के विशेष समारोह(१५.११.१०)में तारानन्द वियोगी का वक्तव्य


सन्दर्भ : साहित्य अकादेमीक बाल साहित्य पुरस्कार =============================== साहित्य अकादेमी के विशेष समारोह(१५.११.१०)में तारानन्द वियोगी का वक्तव्य =============================================== आदरणीय अध्यक्ष महोदय और मित्रो, साहित्य अकादेमी के इस विशेष समारोह में हम सभी यहां एकत्र हुए हैं। भारतीय साहित्य का जीता-जागता उपवन यहां मौजूद है, जिसमें रंग-रंग के, किस्म-किस्म के फूल खिले हुए हैं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहा करते थे कि मेरी भारत माता बीसियों भाषाओं में बोलती हैं। उस भारत माता को यहां जीवन्त महसूस किया जा सकता है। ऐसे अवसर पर अपने आपको यहां, आप सबके बीच पाकर मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। मैं साहित्य अकादेमी को, और हमारी मैथिली भाषा के प्रतिनिधि को, उनके सहयोगियों को हृदय से धन्यवाद देता हूं। मुझसे अनुरोध किया गया गया है कि इस अवसर पर मैं अपने कुछ अनुभव, अपनी चिन्ताएं आपके साथ शेयर करूं। यह जरूरी भी है। हमारा भारतीय साहित्य आज जिस दौर से गुजर रहा है,, जो संकट और चुनौतियां आज इसके सामने है,यह और भी जरूरी है। मित्रो, मैं कोशी क्षेत्र का रहने वाला हूं। आप शायद जानते हों कि कोशी बडी ही विकराल, बडी ही मनमौजी नदी है। जगह-जगह इसपर बांध बनाए गए हैं। अक्सर ऐसा होता है कि बरसात के दिनों में नदी बांध तोड देती है। पानी का बहुत भयावह रेला चल निकलता है। लोग जहां-तहां फंस जाते हैं। सरकारी-गैर सरकारी एजेंसियां तो बाद में पहुंचती हैं, पहले तो ये होता है कि लोग अपनी मदद आपस में मिल-जुल कर करते हैं। पानी के तेज बहाव में अगर अकेला आदमी पड जाए तो उसका बचना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में लोग क्या करते हैं कि हाथों में हाथ डालकर एक मानव-शृंखला बना लेते हैं, टेक के लिए हाथों में लाठियां थाम लेते हैं और इस तरह सुरक्षित स्थान तक पहुंच जाते हैं। आप भी शायद महसूस करते हों कि कुछ ऐसे ही हालात से आज हम भी गुजर रहे हैं। भूमंडलीकरण के इस दौर में छोटी-छोटी भाषाओं की नित्य प्रति मृत्यु हो रही है। साहित्य को निरन्तर अप्रासंगिक करार दिया जा रहा है। भावाभिव्यक्ति में एक जाहिल उताबलापन चारों तरफ दिख रहा है। इतनी तेजी से रोज-रोज दुनिया बदल रही है कि युग और काल की हमारी अवधारणा भी कई बार हमसे धोखा करती प्रतीत होती है। ये तो हुआ एक पहलू। दूसरी तरफ हम ये भी देख रहे हैं कि हमारी जो पीढी युवा होकर आज दुनिया का मुकाबला करने को तैयार हो रही है, उसमें अपनी आइडेन्टिटी, अपनी अस्मिता को लेकर एक सात्विक तडप भी साफ दिख रही है। एक व्यापक और परिपूर्ण भारतीयता की समझ उनकी आत्मा की मांग बन रही है। तो, ये ऐसा समय है कि समझ लें--थोडा खट्टा है थोडा मीठा है, थोडा धुंधला है थोडा उजला है। चुनौती हमारे सामने ये है कि ऐसे में हम, और हमारा साहित्य, इस पीढी के, आने वाली पीढियों के किस काम आ सकता है। एक जमाना था कि जब बडे-बडे लोग छोटे-छोटे ब्च्चों के लिखना गौरव का विषय समझते थे। पर, वह जमाना भी अब बीत चुका है। तो, ऐसे हालात में, मैं समझता हूं कि एक तो मिलजुलकर लगातार काम करने की जरूरत है, दूसरे युग की चुनौती को इस तरह स्वीकार करने की भी जरूरत है कि आनेवाली पीढियां हमपर ये इल्जाम न लगाए कि जब रोम जल रहा था तो नीरो बांसुरी बजा रहा था। मित्रो, आप बुरा न मानें, इस तरह मैं सोचता हूं तो घोर अंधेरी रात में बिजली की चमक-जैसी जो चीज मुझे दिखाई देती है, वह है--बाल साहित्य। सार्थक ढंग से लिखा गया बाल साहित्य ही ये कर सकता है कि आनेवाली पीढियों के लिए साहित्य भी एक प्रासंगिक चीज, उनके जीवन के काम आनेवाली चीज बनकर रह सके। पीढियों के भाषा-संस्कार को यह परिमार्जित कर सकता है। भावाभिव्यक्ति में पाए जानेवाले जाहिल उताबलेपन की जगह एक स्थैर्य, एक गहराई को उनकी जीवन-शैली का हिस्सा बना सकता है। बाजार की जीवन-पद्धति है--द्विआयामी, जिसमें वस्तु है और क्रिया है। त्रिआयामी जीवन-पद्धति, जिसमें वस्तु और क्रिया के साथ-साथ चिन्तन भी हो, इसका विकास बाल साहित्य कर सकता है। मुझे तो लगता है कि सार्थक और प्रासंगिक बाल साहित्य का प्रसार छोटी-छोटी भाषाओं की मृत्यु-दर को कम कर सकता है और हमारे उखडते हुए पांवों को एक ताजगी-भरी मजबूती दे सकता है। जो चिन्ता आज मेरी है, मेरा खयाल है कि यह आपकी भी चिन्ता है , सारे देश की, सारी दुनिया की चिन्ता है। ऐसे में, बडे ही आभार के साथ मैं साहित्य अकादेमी को और संस्कृति मंत्रालय को धन्यवाद देता हूं कि भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य के विकास के लिए नए ढंग से उन्होंने सोचना शुरू किया है। प्रायः चार साल हुए कि इन्हीं चिन्ताओं से जूझते हुए मैंने अपनी भाषा मैथिली में, इस दिशा में कुछ काम करने की शुरुआत की थी। मैथिली में बाल साहित्य की दशा अत्यन्त दुर्बल है। दूसरी बात यह कि हमारे यहां, मैथिली पुस्तक-प्रकाशन के मामले में यह जुमला बडा ही प्रसिद्ध है कि लेखकों की छपाई किताब बिकती नहीं है और पाठकों को उनकी पसन्द की किताब मिलती नहीं है। हमने कुछ नए ढंग से समाधान की कोशिश की। युवा लेखकों और साहित्यकर्मियों की हमने एक टीम बनाई। बाल साहित्य पर गंभीरता से काम करना शुरू किया। हमने सातवीं-आठवीं कक्षा के बालपाठकों को टारगेट किया। विषय हमने ऐसे चुने जो इक्कीसवीं सदी में वयस्क होनेवाले हमारे बालपाठकों के जीवन के काम आ सके। उपजीव्य ग्रन्थ ही अगर चुनना हो तब भी हमने लीक से हंटकर चलने का मन बनाया। हमारे यहां मुख्यतः दो उपजीव्य चलन में रहे हैं--रामायण और महाभारत। हमने उपनिषदों को लिया, जातक-कथाओं को लिया। आप देखेंगे कि महाभारत में जंगल को जलाया जाता है, जबकि उपनिषद में जंगल से दोस्ती की जाती है। किताबों को फारमेट भी हमने कुछ अलग ढंग से किया। भाषा, अभिव्यक्ति-शैली, कथन-भंगिमा-- इन सबके प्रति भी हम अत्यन्त सजग रहे। हमारे महाकवि विद्यापति ने कभी 'सुपुरुष' की अवधारणा प्रस्तुत की थी। हमारा लक्ष्य इक्कीसवीं सदी का 'सु-मानुस' ठहरा, जिसमें सुपुरुष के साथ 'सु-नारी' भी शामिल हैं, और जो एक ही साथ जितने मैथिल हैं, उतने ही भारतीय और ठीक-ठीक उतने ही वैश्विक। हमारी टीम के युवा साहित्य-कर्मी मध्य और उच्च विद्यालयों में पहुंचते, और सस्ते संस्करणों वाली ये पुस्तकें प्रत्यक्ष रूप से अपने पाठकों को सौंप आते। एक हजार प्रतियों का हमारा संस्करण महीनों में बिक जाता। जिस घर में किताब की एक प्रति पहुंचती, उसके परिवारी-जनों के साथ-साथ अडोसी-पडोसी मिलाकर औसतन हमें पन्द्रह पाठक मिल जाते। मित्रो, आपको लग सकता है कि मैं विषयान्तर हो रहा हूं, साहित्यकार के दायरे से बाहर जाकर एक्टीविज्म पर पहुंच रहा हूं। लेकिन यकीन कीजिए, मैं भी मूलतः एक साहित्यकार ही हूं। साहित्य-सृजन के लिए सघन एकान्त मुझे भी चाहिए। किन्तु, साहित्य के साथ जीते हुए कभी ऐसी भी स्थितियां बनती हैं, जब आपको टीम बनाने की जरूरत पडती है। यूं तो आप अदृश्य पाठकों के लिए लिखते हैं, पर वक्त आता है कि जब आपको उन्हें दृश्यमान करने की जरूरत पडती है। मैंने महसूस किया है कि ऐसे हालात में 'साहित्यकार' और 'साहित्यकर्मी' के बीच की दूरियां सिमट जाती हैं। मित्रो, हमारे संकट अथाह हैं। उत्तर आधुनिकता के इस दौर में आज जब हमारे लोग अपनी अस्मिता के प्रति साकांक्ष हुए हैं तो अपनी जड, अपनी भाषा से जुडना चाहते हैं। इधर विडम्बना यह कि दुनिया-भर की चीजें उन्हें पता है, मगर अपनी मातृभाषा पढ पाने का हुनर उन्हें नहीं है। एक दौर था, जब मातृभाषा को अयोग्य मानकर उन्होंने उसकी उपेक्षा की। मातृभाषा को उन्होंने कभी इस लायक माना ही नहीं कि उसमें बडी-बडी, ऊंची-ऊंची बातें की जा सकती हो। याद कीजिए कि इन्हीं लोगों की उपेक्षा ने अपनी-अपनी मातृभाषाओं को उजाडा। पर, आज वे आइडेन्टिटी ढूंढते हैं और मातृभाषा से जुडना चाहते हैं। हम तो दरअसल, उनके बच्चों के लिए लिखते हैं। लेकिन, बच्चों के लिखी गई किताब जब हमारे ये बन्धु पढते हैं तो खुद भी मातृभाषा पढने का हुनर सीखते हैं। हमें तो समझिए दोहरी खुशी मिलती है। भविष्य को ठीक करने की कोशिश में हमारा वर्तमान भी सुधरता जाता है। यह बाल साहित्य कर रहा है। बाल साहित्य ही यह कर भी सकता है। मित्रो, इतनी बातें मैंने इसलिए कहीं कि आपको सामने पाकर सुख-दुख बतियाने का एक अवसर मुझे मिला। इस अवसर के लिए पुनः धन्यवाद। अपनी भाषा के कर्णधारों, अपनी टीम के युवा साहित्यकर्मियों को भी धन्यवाद। इतने ध्यान-पूर्वक आप सबने मुझे सुना, इसके लिए पुनः धन्यवाद। तारानन्द वियोगी