Sunday, September 6, 2026

स्मृति मणिपद्म


 जन्मदिनपर मणिपद्मक पुण्यस्मरण करैत

पुनरवलोकन

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           कौसरक कमल

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            डाॅ. भीमनाथ झा

       बहेड़ा सुन्न भ’ गेल। मैथिलीक तीर्थ– बहेड़ा। काव्यमालाक पवित्र रुद्राक्षक एक दाना– बहेड़ा। आधुनिक साहित्यक सर्वाधिक उजागर ग्रामरत्न– बहेड़ा। आइ से सुन्न भ’ गेल। मधुपजी, अणुजी पहिनहि ई गाम छोड़ि चुकल छला । बहेड़जी संसारे छोड़ि देने रहथि। मणिपद्मोजी आब बहेड़ाकेँ अन्तिम नमस्कार कैलनि । मानू ओहि गामक मैथिली ब्रह्मस्थानक पीपर अड़राक’ खसि पड़ल। वटबृक्ष उखड़ि गेल। बहेड़ा सुन्न भ’ गेल। ‘कौसर’क ‘कमल’ गलि गेल। शतदलक फेँच खसि पड़ल। नहि-नहि, कहाँ खसलै अछि फेँच? गलल कहाँ अछि कमल?  देखू तँ एखनहुँ कोना–

    दूर क्षितिज धरि पसरल-पसरल 

                   कमल फुलल अछि

    स्वर्ण  प्रात मे,  मधु  बसात  मे

                     झूमि रहल अछि

    अरुण किरणकेँ शत-शत शतदल

                     चूमि रहल अछि

    वृन्त - वृन्त पर   लोलुप  मधुकर

                    घूमि रहल अछि ।।

       से, यावत धरि लोलुप मधुकर ओकर मधु लेल मड़राइत रहत, कमल खिलखिलाइत रहत! हँ-हँ, अकानू तँ ओ ठहक्का !

       मणिपद्मजीक ठहक्का कहयो मैथिलीक मुँह मलिन नहि होब’ देत।

       मुस्की, विहुँसी, हँसी– हँसनिहार दिस ताकब तँ देखब, तखन अनुभव करब। ठहक्का मुदा, अहाँ कतहु रहब, सुनबे करब। नहियोँ चाहब, गुँजबे करत। वातावरणकेँ हिलाइए देत। अन्यमनस्कता तोड़िए देत। ओकर गनगनीक उपेक्षा ककरहु बुते असम्भव।

       मणिपद्मजीक साहित्य ‘ठहक्का’ थिक। मैथिलीक वातावरणमे पहुँचब आ ठहक्का नहि सुनब– से असम्भव। आधुनिक मैथिलीक वातावरणकेँ गनगना देनिहारमे मणिपद्म अग्रगण्य छथि।

       ठहक्का के लगा सकैए? वैह– जे भीतर आ बाहरसँ उन्मुक्त हो, निश्चिन्त हो, निर्भय हो, अपन अस्तित्वक प्रति आस्थावान हो।

       साहित्यमे की एहि सभ बस्तुक प्रयोजन नहि? की साहित्य वैह टा थिक जे भीतरमे गुदगुदी लगा देअय, मुँहपर मुस्की, कि विहुँसी, कि हँसी आनि देअय– आ, जकरा चारि आङुरक चौपेतल रुमालसँ मुनि देल जा सकय?

       ई तँ लजकोटरक लक्षण थिक। जे कतहु-ने-कतहुसँ कुंठित अछि, दबाओल अछि, भयभीत अछि, चिन्तित अछि, विचलित अछि– ओ कोना उन्मुक्त ठहक्का लगा सकैछ? जकर हाथमे चारि आङुरक चौपेतल रुमाल हरदम ठोरपर जयबा लेल उछलैत रहैछ, ओकर मुँहपर ठहक्काक हिलकोर लहरि कोना ल’ सकैछ?

       हमर आशय एत’ हास्य साहित्यसँ नहि अछि, अपितु ओहि सम्पूर्ण साहित्यसँ अछि जे कुण्ठित नहि अछि, चिन्तित नहि अछि, धखाइत नहि अछि, लजाइत नहि अछि, आ जकर ध्वनि अनुखन साहित्य-पथिकक कानमे गुँजैत रहैत छैक आ जे कखनहुँ ओकरा अन्यमनस्क नहि होब’ दैत छैक।

       मणिपद्मजीक लोकगाथा उपन्यास सभ एही कोटिक कृति थिक। एकरा जे एक बेर पढ़ि लैछ, से कहियो बिसरि नहि सकैछ। ओकर ध्वनि पाठकक कान आ मन-प्राणमे अविराम गुंजायमान होइत रहैछ।

       गुंजायमान हिनक साहित्य सभ दिन रहत, मुदा आब हिनक मधुवाणीक मुसलाधार बरखाक झटकसँ अपना लोकनिक हौहटि-नोचनी कोना छूटत, कोना हँटत?

       हमरा लोकनिक न’ह अपने शरीरपर प्रहार करबा लेल भेल अछि भरिसक ! नोचैत रहै छी अपने देहकेँ– खौँझाइत। आ, ओहीमे दिनसँ राति आ रातिसँ दिन करैत रहै छी।

       ई हौहटि ओना छुटनिहार नहि। एहि लेल तँ देहपर हथियाक झटकक भीषण चोट चाही।

       मणिपद्मजीक वाणी हथियाक वैह भीषण चोट छल, मुदा– मधु-बोरल। हमरा लोकनिक देहक नोचनी भुस्सा भैए रहल छल कि वर्षा एकाएक बन्न भ’ गेल, बिच्चेमे। से तेना कि आब कहियो पुनि झहरत नहि।

       मणिपद्मजी मंचपर भाषण करैत-करैत कुदि उठै छलाह, छरपि उठै छलाह। हिनक वाणीक संग हिनक शरीरो नाच’ लगै छलनि। आ, हिनके संग सभास्थ समस्त श्रोतासमूह सेहो। मणिपद्मजीक भाषण चलैत रहय आ अहाँक मन कतहु आन ठाम भटकि जाय– ई भ’ नहि सकै छल। आ, अहाँ ओतहु क’ल-कुशल बैसल हिनक वचनक पान क’ रहल होइ– सेहो नहि। अहाँकेँ ई बैस’ कहाँ दैत छलाह? ई तँ अपना संगे उठाक’ आन्दोलनक संग्राम-भूमिमे अहूँकेँ राखि अबै छलाह, जत’ मानसिक स्तरपर बिना तरुआरि चमकौने कल्याण नहि। 

       मणिपद्मजी तंत्रसाधनामे पहुँचल फकीर छलाह। मुदा, ओहि बाटपर बहुत दूर धरि बढ़ियो गेला उत्तर ई साहित्य-रथपर आरूढ़े टा नहि रहलाह, अपितु एम्हरो तहिना अपन चमक-धमक कायम रखने रहलाह। दू विपरीत दिशाक मार्गपर एना एक्के बेर दुनू दिस दौड़ब– एहि असम्भवकेँ मणिपद्मेजीक सक सम्भव करब छल।

       कथाकार ललितकेँ एकबेर पूछने रहियनि– मैथिलीकेँ अपने साफ किए छोड़ि देलिऐ एम्हर?

       कहने रहथि ओ– एम्हर हम दोसर काजमे लागि गेल छी, कोनो विशिष्ट साधनामे। आ, ओहिमे रहैत आब एहन सन अनुभव होइत अछि जे साहित्य-ताहित्य क्षणभंगुर थिक। एकदम क्षणिक आनन्द देब’वला वस्तु। तन्त्र जे थिकै, से शाश्वत आनन्दप्रद। शाश्वतकेँ छोड़ि क्षणिक सुख दिस ध्यान दी– ई ठीक नहि।

       ठीक नहि लागल रहय ललितजीक ई बात। ललित अपन व्यक्तिगत सुख लेल हुनक मस्तिष्कमे निहित मैथिलीक असाधारण प्रतिभाक असमयेमे हत्या क’ देलनि, से नीक कयलनि, ई कोना कहबनि? आ, तन्त्रक प्रति हमर प्रतिक्रियाक बीज ताही दिन हृदयमे रोपा गेल। कोन एहन विद्या जे प्रतिभाकेँ साहित्यसँ विमुख क’ देअय?

       मुदा, मणिपद्मजी एकरा खण्डित क’ देलनि। तंत्रसाधनामे शिखरस्थ भैयोक’ साहित्य-शिखरसँ अपन आसन हँटौलनि नहि– अन्त धरि नहि। तन्त्र-साधनाकेँ शाश्वत सुख मानैत रहल होथि ईहो, मुदा साहित्य-साधनाकेँ क्षणिक आनन्द देब’वला वस्तु ई कहियो नहि मानलनि। हिनक दृष्टिमे ईहो शाश्वत, ओहो शाश्वत।

       ललितजीकेँ तंत्र अमर बनौतनि की साहित्य?-- उत्तर स्पष्ट अछि। मुदा, ई उत्तर ललितक मानसमे नहि छलनि, से छलनि मणिपद्मक मानसमे। मणिपद्मजी जनैत छलाह जे अमर ओ साहित्येसँ भ’ सकैत छथि। तेँ, एहि दिस कहियो ई निरपेक्ष नहि भेलाह, एकरा दोएम दर्जाक काज नहि बुझलनि। तंत्रोकेँ साहित्योन्मुख बना देलनि, साहित्योमे तंत्रक पाठ पढ़ौलनि।

       मैथिलीप्रेमीकेँ ई भाषा-सेवाक पाठ पढ़ौलनि, मैथिलीद्रोहीकेँ ओकर दुष्टताक सबक सिखौलनि। अनेक ठामक समारोह मन पड़ैत अछि, जखन केओ मैथिलीक प्रति कोनो आक्षेप, कि कोनो व्यंग्य, कि कोनो कटाक्ष क’ दैत छल आ तकर बाद मणिपद्मजी उठैत छलाह। ओकर एक-एक कुतर्ककेँ ई तर्कक कैँचीसँ कतरने जाइ छलाह, ओकर एक-एक व्यंग्यक काँटीकेँ ई प्रमाणक हथौड़ासँ थकुचने जाइ छलाह, फेकल गेल उपहासक एक बाकुट धूराकेँ ई अपन वाणीक विपरीत बसातक झोँकसँ ओकरे आँखिपर झोँकि दैत छलाह। मैथिलीक वेग, ओज, प्रवाह, प्रहार हिनक वाग्धारामे साकार भ’ जाइत छलनि। कहि चुकल छी, हिनक भाषण चलैत रहय आ अहाँ मानसिक स्तरपर बैसल रही– ई असम्भव छल।

       असम्भव छल मणिपद्मजीक मैथिली प्रेमसँ लबालब हृदय-सागरकेँ थाहब। मुदा, मणिपद्म-साहित्यकेँ चाहब , ओकर धारामे अवगाहब, नित नूतन रत्नकेँ उपरायब, ताहिसँ अपन मन-प्राणकेँ शीतल बनायब– बहुतोक लालसा छल, अछिओ आ आगुओ पीढ़ी-दर-पीढ़ी रहत।

       एहि पद्मक मधुपान करबा लेल लोलुप मधुकरक अन्तहीन सिलसिला अनन्त काल धरि जारी रहत। आ, जाधरि ई सिलसिला जारी रहत, कौसरक कमल गलत कोना? मुरझा कोना सकत?

       मणिपद्मक मैथिलीमे पहिल कविता थिकनि ‘कौसर’ आ हिनक जीवनकालक अन्तिम प्रकाशित कविता ‘हे हमर सरस्वती’ (जे ‘चिनगी’क जून 1986क  अंकमे छपल छलनि। ओ अंक मणिपद्मजीक निधनक केवल एक दिन पहिने बजारमे आयल छल।) कौसरक कमलपर पद्मासना सरस्वतीकेँ जखन आसीन क’ देलनि मणिपद्मजी, तखन स्वयं अन्तर्धान भ’ गेलाह मानू ! मानू स्वयंकेँ अन्त:सलिला बना लेलनि, शरीरकेँ साहित्यमे एकाकार क’ देलनि।

       सरस्वतीक धारा क्यो देखलक अछि आइ धरि? हुनक मन्दिर कतहु बनौलक अछि क्यो? तखन, की ओ छथि नहि? जन-जनक हृदये हुनक मन्दिर थिकनि, कोटि-कोटि जनताक वाग्धारेमे हुनक हिलकोर भेटैछ।

       सरस्वतीक मन्दिर कहियो ढहत नहि, हुनक धारा कहियो सटकत नहि। तहिना, ओहिमे उगल कौसरक कमल सेहो कहियो गलल नहि। मिथिला कखनहुँ सुन्न नहि होयत ।


(जुलाइ 1986)

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