Wednesday, March 24, 2010

बाल-कविता 
तारानंद वियोगी 

(हरेक आदमीक भीतर एकटा बच्चा होइ छै। आउ, ओइ बच्चा कें हमसब ताकी। अक्षर-कविता सिरीज मे 'क' सं 'ह' धरि कविता सब गोटे मिलि क' जोडी। मैथिली मे जे बाल-कविताक अकाल अछि तकर निराकरण एहिना हएत। सप्रेम आमंत्रण ।) 
क 
कम्मल ओढि क' सूतल बौआ
खोंता मे अछि नन्हकू कौआ 
जौं-जौं कौआ कारी हएत 
तौं-तौं बौआ और मोटाएत 

ख 

खा क' पी क' इसकुल जाउ 
सब बच्चा कें दोस बनाउ 
पढू लिखू आ गाबू गाना 
सब सं बढियां घर के खाना 

ग 

गाम गाम मे मचलै शोर 
कुकुर पकडलक दू टा चोर 
एक चोर छल नेता भाइ 
दोसर चोरबा हुनक जमाइ 

 ( एहि सं आगू अहांक हिस्सा मे..........)

Sunday, March 21, 2010

गाम कें हम बहुत मोन पडलियै फगुआक दिन

तारानन्द वियोगी

हमरा गाम मे फगुआ दिन होइ छै मस्त मस्त हुडदंग।
सब कथू सं बेसोह हुडदंगिया सब
एक दोसरक देह पर छडपै छै आ कहै छै 'रा़ रा'
अपन अपन छत पर सं लोक
दोलक दोल रंग हुडदंगिया पर उझलै छै
आ उतारा दै छै 'होरी है'
से, ओ हुडदंगिया सब आ ओ लोक सब
अइ बेर हमरा बहुत मोन पाडलकै
एकटा आनन्दमग्न दर्शकक घटी रहलै ओकरा सब कें अइ बेर

किरतनिञा सब तं बुझू आरो ताल करै जाइ छै
युग कें चीरि क' उठा अनैत अछि द्वापर, कौखन त्रेता
कृष्ण कें गोंति रहल छनि गोपी लोकनि ओम्हर
एम्हर सीता संग राम खेलथि मस्त-मस्त रंगीला होरी,
बसहा पर चढि क' श्मसान दिस विदा भेल शिव कें
पछाडि घेरै छथि गौरा
आ रंगारंग क' छोडै छथि बसहासमेत

जीयह हौ बाबू जीयह
ई दुआरि सदा आनन्दित रहौ जै पर आइ
मोहन होरी खेललथि
अइ बेरुका बिरहिन सब के अगिला होरि अवश्ये सोहाग भरल हो
जकर दर्द कें थाहैत लक्ष्मीनाथ गोसांइक नैना सं
एहू बेर नीर बहलनि!

से,
'जे जीबय से खेलय फागु' के आग्रही ओ किरतनिञा सब
अइ बेर हमरा बहुत मोन पाडलकै
कोन गीत हेतै जकरा एक तोड टाहि हम नै दै छलियै !


सडक पर द' क' बहराइए मस्ताना सभक टोली
बात बात पर ठिठियाइत
बात बात पर कलाकारी करैत
बात बात पर सबटा कुनारि पताल दिस जुमा क' फेकैत
त्यागैत गोत्र आ कुल के बन्हेज
एक दिन मे जमा क' लै जाइए एतबा ऊर्जा
जाहि भरोसें बरस दिन निमहत
से, ओ मस्ताना सब गौलक अइ बेर गाना—
'होरी का संग खेलब बालम गेल परदेस'
ततेक मोन पाडलक जे जनु हम ओकर बालम भेलियै...
ओकर सभक कलाकारी कें दार्शनिक आयाम दै बला मस्ताना हम होइ छलियै !

मोन पाडलनि भौजी लोकनि भाबहु लोकनि
कि जे गाना कहियो नै सुनने हेती
से सुनथि फगुआ दिन हमर सत्संग मे

मोन पाडलनि काकी लोकनि बाबी लोकनि,
अबीर सं अभिषिक्त जिनकर पएर
घर सं पूआ बहार करैत थाकनि नहि
ततेक आह्लाद सं मांगियनि,ततेक दुलार सं !

बाबा कें मोन पडलियनि बहुतो कि कोना परुकां
टोपी-अबीर सं सजा क' खाट पर बैसा क'
हुनकर शोभायात्रा बहराएल छलनि जबर्दस्त !
चारि वीर जे हमसब शुरू केने रही यात्रा
से भगवतीथान अबैत-अबैत
रैली सं रैला बनि गेल।
खाट पर कौखन बैसल हंसथि बाबा कौखन पडल,
एतय जं लागै नारा 'बोलो बोलो फगुआ महराज की'
तं 'ज.....य' कहैत ततेक लम्बा आलाप चलय ध्रुपद-गायकी जकां
जे 'ज' सं 'य' पर अबैत आधा किलोमीटर रस्ता पार भ' जाइ।
एहू फगुआ मे जीबैत रहला बाबा, धन्न भाग..
मुदा नहि खेलि सकला फागु
भरि दिन हम हुनका मोन पडैत रहलियनि !

रघुभाइ कें मोन पडलियनि
जे बड दिक भेलनि अइ बेर धियापुता कें नव वस्त्र दै मे अभाववश,
पंडित जी कें पडलियनि जे अइ बेर नहि भ' सकलनि हुनक धर्माधर्म शास्त्रार्थ...

एहना मे
नहि मोन पडल हेबनि तारा कें कि तारानाथ कें,
से के कहत !
देखने तं हेती ओहो अवश्ये जे भरल भरल आंगन मे एक कोन अछि जे सुन्न अछि...

ओह,
नोकरी दुआरे जा नहि सकलहुं गाम अइ बेर फगुओ मे
आ,जिबिते हम, अपन गाम कें बहुत मोन पडलियै...

Wednesday, August 20, 2008

दूटा छोटछीन कविता

पुरान गीत

दस पाइ मे रामदीन के आलूकट, दू टाका मे लाइटहाउस के फ्रंट टिकट
एमएलएकेडमीक गेट पर मात्र चवन्‍नी मे भेट जाइत छल गणेशीक भूजा
पांच पाइ मे यादवजी के झोरा सं बहराइत छल पाचक
अइ महगी के जमाना मे स्‍वादक ई पुरान गीत तहिना अछि
जेना ऑल इंडिया रेडिया के उर्दू सर्विस दुफरिया मे गबैत अछि
मेरे पिया गये रंगून वहां से किया है टेलीफून तुम्‍हारी याद सताती है

मल्‍टीप्‍लेक्‍स

अंगना मे एकटा क'ल गाड़ल छल
करगर हाथ सं पानि अबैत छल
नेनपन मे क'लक कात मे ठाढ़ हम पिछड़‍ि जाइत रही कतेको बेर
लबकी काकी घोघक कोर सं मुस्किया दैत छलीह
कमनाहरि 'बउआ बउआ' क' क' दौगैत आबैत छल
कहैत छल - पिच्‍छड़ दिस किएक जाइत छैं

पचीस बरखक बाद एकटा मल्‍टीप्‍लेक्‍स मे तहिना पिछड़‍ि गेलहुं
लोकबेद लबकी काकी जकां ठिठियाए लागल
एकसरि ठाढ़ भेलहुं अपना बलें
समुच्‍चा पिच्‍छड़ छल
ततेक चिक्‍कन जे मुंह देखि सकी अइ मे

भरि जुआनी मे हमरा जीबा मे असोकर्ज होइ-ए
गैरमैथिल कनिया कहय छथि -
तुम बूढ़ों की तरह बातें मत किया करो!

Wednesday, March 12, 2008

रतिया दिन दुरगतिया हे भोला!

1850-60क बीच अंग्रेजी राजक स्थिति और मिथिलाक सामंत लोकनिक दुर्व्‍यवस्‍था कें लक्ष्‍य करैत कवीश्‍वर चंदा झा ई पद लिखलनि।
गैया जगतक मैया हे भोला
कटय कसैया हाथ
हाकिम भेल निरदैया हे भोला
कतय लगायब माथ
बरसा नहि भेल सरसा हे भोला
अरसा कए गेल मेह
रतिया दिन दुरगतिया हे भोला
जन तन जिवन संदेह
मुखिया बड़ बड़ सुखिया हे भोला
अन्‍नक दुखिया डोल
के सह कान कनखिया हे भोला
सुखिया बिरना टोल

विशेष विवरणक लेल मिथिला मे नवजागरण विषय पर तारानंद वियोगी क लिखल लेख देखी। देखबाक लेल तारानंद वियोगी सं 09431413125 पर संपर्क करी।

Saturday, November 24, 2007

हम छी कमलाकांत

हम छी कमलाकांत
भरि राति खसल सीत
चंद्रमणि गबैत रहला गीत
केओ थोपड़ी केओ चुटकी सं दैत रहल जोश
मुदा जे देलक टिहकारी कनखिया क'
उ छल सभ सं फर्रोश

एमेलेकेडमी'क पंडाल मे पसरल अछि पुआर
मुदा जिनकर पैंसब छैन्ह प्रतिबंधित से छथि गुआर

तें जखन बदलल जमाना
बदलि गेल रामकथा ससि किरन समाना
आब अछि पासमानक भरनी दुसाधक ताना

संकल्पलोकक बैसि गेल भट्ठा
गुदड़ी मे बिका गेल सोन सन इतिहास कट्ठा पर कट्ठा

आब एमएलएसएम मे होइत अछि बिदापति समारोह
आह, की आरोह-अवरोह!
मंच सं बाजि रहला अछि संचालक,

'हारमोनियम पर छथि शिशकांत
तबला पर छथि चंद्रकांत
झालि बजओता उदयकांत
गओता हेमकांत
आ हम छी कमलाकांत!'

अहियो पर थोपड़ी!

मुदा सुनय बला सुनि रहल अछि
संस्कृतिक ओसारा पर बड़का लोकक कोरस
गांती मे केओ नहि अछि गुआर
चौबगली पसरल अछि पावन-पवित्र पुआर

मिथिलाक पोखरि बाभनक बंसी सं डेराएल
संस्कृति मे सामाजिक न्याय एखनो अछि हेराएल

तें कतबो कहथु संचालक, हम छी कमलाकांत
लोकबेद करबे टा करत टोंट जे अदौ सं अछि आक्रांत!
अदौ सं अछि श्रोताकांत!

कहबाक कला होइ छई

कहबाक कला होइ छई
हिसाब-दौड़ी कहियो ने भेल
आंगुरक बीच मे भूर अछि
जे अरजल सभटा राइ-छित्ती भेल
छिपली मे बांचल कनखूर अछि

हमर गाम मे छल एकटा चौंसठ
कहैत छल,
अरजबाक कला होइ छई

जेना बिदापति मंच सं कहय छथिन कमलाकांत
कहबाक कला होइ छई

कलाजीवी झाजी आ कलाजीवी कर्णजी!
कलाजीवी हुकुमदेव आ कलाजीवी फातमी!

बाढ़ि मे दहा गेलनि जिनकर गाम
सुन्न छैन्ह जिनकर कपार
गुम्म छैन्ह मुह मे बकार

नचारी मे नहि ल' पओता आनंद

केओ उद्-घाटन बाती जरओता
केओ देता अध्यक्षीय भाखन
जाड़-बसात मे चमक चांदनी देखि
दुखित जन पीयर पुरान कागत पर लिखबे टा करत,
मुह के सी'बाक कला होइ छई

कतबो कहथु कमलाकांत
सुनबाक कला होइ छई
हल्ला-गुल्ला जुनि मचाउ बाउ
छी संस्कारी लोक

कहबाक कला होइ छई!

Wednesday, May 9, 2007

नंदीग्राम पंचक



तारानंद वियोगी

एक

जनता जागल भूमि लए
बाजि रहल दू टूक
जनवादी के हाथ मे
एम्‍हर छैन्‍ह बंदूक

एम्‍हर छैन्‍ह बंदूक
दनादन गोली मारथि
टाटा बिड़ला के खड्ढा मे
जन के गाड़थि

जे छल जनता केर पहरुआ
सैह अधक्‍की भेल
सोभथि श्री बुशराज मुकुटमणि
देश भांड़ मे गेल

दो

जे जनता के गठित क'
बनल छलाह बदशाह
सएह कहै छथ‍ि कुपित भ'
जनता बड तमसाह

जनता बड तमसाह
सुनए नहि एको बतिया
बुश केर की छैन्‍ह दोख
एतुक लोके झंझटिया

छलहा मार्क्‍स के प्रबल प्रबंधक
आब बजाबथि झालि
आबह राजा तंत्र संभारह
गां मे रान्‍ह' दालि

तीन

गां मे लोकक खेत अछि
खेते थिक अवलंब
सएह कहै छथि बादशाह
छोड़ै जन अविलंब

छोड़ै जन अविलंब
कंपनीक बैरक आबै
अपन मजूरी पाबि
देस के मान बढाबै

एहन देस ओ बनत
जतक जनता होअए नि:स्‍वत्‍व
संसद बौक बनल अछि देखू
राजनीति के तत्‍व

चारिम

लोक छ‍लए चुप आइ धरि
देखि रहल छल खेल
जनता के जे रहए आप्‍त जन
सएह गिरह कट भेल

सएह गिरहकट भेल
आब ओ मैल छोड़ाओत
छोड़त ने क्‍यो खेत
भने सब प्राण गमाओत

टाटा बिड़ला के बस्‍ती मे
जनता ने क्‍यो हएत
जे बसतै से कुली कबाड़ी
देस बेच क' खएत

पांच

सएह कहै छी
सुनह वियोगी
बूझह की थिक 'सेज'
तों छह ककरा पक्ष मे
गांधी कि अंगरेज

गांधी आ अंगरेज दुनू मे
बाझल झगड़ा
निर्दय नइ झट हएत
बुझाइ-ए जोड़ा तगड़ा

बचत कोना क' लोक
भूमि, से सएह झकै छी
गांधी आ अंगरेज एतहु छथ‍ि
साफ देखय छी।

गद्यानुवाद
एक
जनता भूमि के लिए उठ खड़ी हुई है और दो टुक बोल रही है। इधर प्रतिरोध में जनवादी खड़े हैं, जिनके हाथों में बंदूक है। वे दनादन गोलियां चला रहे हैं। टाटा-बिड़ला ने जो गड्ढे खोदे हैं, उनमें वे अपने ही लोगों को गाड़ रहे हैं। जो जनअधिकारों के पहरुआ थे, उन्‍हीं की लिप्‍सा आज आसमान छू रही है। उनके सिर पर सम्राट बुश का मुकट शोभता है और उनके लिए देश भांड़ में जा चुका है।
दो
जनता को संगठित करके जिन्‍होंने सत्ता हासिल की थी, वे ही आज कुपित होकर कह रहे हैं कि जनता बड़ी गुस्‍सैल है। वह एक भी बात सुनना-समझना नहीं चाहती। बुश का भला क्‍या दोष्‍ा है। यहां की जनता ही झंझटपसंद है। (कैसा हादसा है यह कि) जो मार्क्‍सवाद के प्रबल प्रबंधक माने जाते थे, वे ही आज झाल बजा रहे हैं और कह रहे हैं कि आओ राजा आओ, तंत्र संभालो, और गांव में आकर दाल पकाओ।
तीन
इधर गांव में लोगों की अस्मिता है, खेत हैं। ये खेत ही उनका सहारा है। बादशाह का फरमान है कि ये खेत लोग फौरन खाली कर दें। कंपनी के बैरक से आकर बात करें। नौकरी बजाएं और अपनी मजदूरी पाकर देश का मान बढ़ाएं। सोचो, कैसा वह देश बनेगा, जहां की जनता का अपना कुछ भी न हो। न भूमि न संस्‍कृति। यह सवाल उठा, तो संसद गूंगा बन गया है। राजनीति का यह कैसा तत्‍व है, देखो।
चार
आजतक लोग चुप थे। सारा खेल चुपचाप देख रहे थे कि जनता की आवाज़ बंद करने वाले लोग ही गिरहकट हो गये हैं। अब जनता जगी है, तो बारी बारी से सबके मैल छुड़ाएगी। भले ही सब अपनी जान न्‍यौछावर कर दें, मगर ज़मीन कोई नहीं छोड़ेगा। (क्‍योंकि) ज़मीन लेकर टाटा-बिड़ला जो बस्‍ती बसाने वाले हैं, वहां कोई 'जनता' नहीं रहेगी। वहां तो जो भी होगा, वह कुली-कबाड़ी होगा, जो अपना देश बेच कर खाएगा।
पांच
मैं तुमसे कहता हूं वियोगी, कि समझो कि सेज़ क्‍या है और तय करो कि तुम किसके पक्ष में हो। एक ओर गांधी है, तो दूसरी ओर अंग्रेज़। दोनों में लड़ाई जारी है। जिसका फैसला भी जल्‍द होने वाला नहीं है। क्‍योंकि दोनों ही ज़बर्दस्‍त हैं। मैं तो इसी चिंता में पड़ा हूं कि यहां के लोगों की, भूमि की रक्षा कैसे होगी। क्‍योंकि साफ-साफ देख रहा हूं कि यहां भी गांधी और अंग्रेज़ विद्यमान हैं।