Friday, April 8, 2022

की मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी? :: तारानंद वियोगी


 की मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी?


तारानंद वियोगी



कोनो भाषा ककर होइ छै, तकरा बुझबाक दूटा पैमाना भ' सकैत अछि। एक जे ओ कोन समूह छै जकर जीवनक समूचा अभिव्यक्तिक माध्यम वैह टा भाषा छै। मने ओइ भाषा कें छोड़ि क' दोसर भाषा बाजब ओकरा नै अबै छै। दोसर भाषा बाजै बला लोकक भाव भने संगतिवश ओ बूझियो जाय मुदा जखन उतारा देत तं अपने भाषा मे। एखनो गामघर मे हमसब एहन घनेरो लोक कें देखि सकै छियै, जखन कि कटु वास्तविकता ई अछि जे आइ समुच्चा मिथिला द्विभाषी(मैथिली आ हिन्दी) समुदाय मे परिणत भ' चुकल अछि।

           अइ पैमानाक आधार पर देखी तं मैथिली कोनो एक जातिक भाषा भइये नै सकैत अछि। भाषा नामक वस्तु कोनो एक जातिक अथवा एक धर्मक वा एक संप्रदायक किन्नहु नै भ' सकैत अछि। आइ काल्हिक विद्वानक बात तं छोड़ू, चौदहम शताब्दीक हमर महाकवि विद्यापतियो अइ सत्य सं वाकिफ रहथि जे भाषा कोनो जाति, धर्म, संप्रदाय सं बहुत ऊपरक वस्तु होइत अछि। मनुष्य सं मनुष्य कें जोड़बाक जे ताकत भाषा मे छै से जाति-धर्म-संप्रदाय मे नै भ' सकैत अछि। ई सत्य थिक मुदा सत्य कें देखबाक आंखि सब कें होइते हो, से कोनो युग मे नै रहल अछि। आजुक समय मे तं सत्यक जे दुर्दशा छै से सब गोटे देखिये रहल छी।

           तें, मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, ई बात सिरे सं गलत अछि। अइ कथन मे सत्यक लवलेशो मात्रा नै छै।

           दोसर पैमानाक बात करी। कोनो भाषा ककर छी, एकर निर्णय के आधार ई भ' सकैत अछि जे कोन समूहक धर्मक भाषा, धार्मिक अनुष्ठानक भाषा मैथिली छी। धर्मे किऐ? अइ दुआरे जे मनुष्य जकरा पवित्रतम बुझैत अछि तकरे अपन धार्मिक कृत्य संग जोड़ैत अछि। अपन समाज बीच देखू तं पता लागत जे बहुतो एहन जाति मिथिला मे बसैत अछि जकर धर्मक भाषा मैथिली छियै। अहां कोनो यादव के ओतय आयोजित धर्मराज-पूजा मे शामिल होउ। देखबै जे भजन आ मंत्र तं मैथिली मे रहिते छै, जखन भगताक भाव मे साक्षात धर्मराज वा कि कोनो आन देवता प्रकट होइ छथिन तं ओ देवता सेहो मैथिलिये बजैत छथिन। तहिना अहां डोम के ओतय देखियौ, मुसहर के ओतय देखियौ, धार्मिक कृत्य सहित हिनका लोकनिक देवता समेत के भाषा अहां कें मैथिली भेटत। अइ पैमानाक मोताबिक तं मैथिली हिनके सभक भाषा छी। अइ पैमानाक मोताबिक तं मैथिली आर भने कोन्नो जाति के भाषा हुअय, ई ब्राह्मणक भाषा नै छी, कारण ब्राह्मण लोकनि के धार्मिक कृत्यक भाषा तं आइयो संस्कृत छियनि।

           मुदा, सत्य एते सपाट हो सेहो बात नै अछि। आइ हम सब ब्राह्मणो लोकनि के घर मे गोसाउनिक पीड़ी पुजाइत देखै छी। ई पीड़ी की छी? ई छी चैत्य। सुदूर इतिहास मे जा क' देखब तं पता लागत जे विदेहक आर्य लोकनि चैत्यपूजक नै छला। वैशालीक लिच्छवि लोकनि चैत्यपूजक रहथि जे बुद्धक समर्थक छला। मिथिलाक पचपनिया समाज चैत्यपूजक छला जे सेहो बुद्धक समर्थक रहथि। पचपनिया लोकनिक घर मे जं पीड़ी(चैत्य) होइ छै तं से बुझबा योग्य होइत अछि। मुदा, ब्राह्मण लोकनिक घर मे पीड़ी कोना होइत छनि? महापंडित लोकनि कें जं एकर रहस्य पुछबनि तं 'लोकाचार' के नाम लेता। कते आश्चर्यक बात छी जे अखिल भारत मे धर्मतत्वक निर्णायक मिथिला  के अपन घरे मे 'लोकाचार' शास्त्राचार कें पराजित क' देने अछि। आइये नै, शताब्दियो सं। असल मे कट्टरपंथ आ उदारवादक उठा-पटक सब युग मे सदा सं चलैत आयल अछि। पंडित जी अपने तं संस्कृत कें गसिया क' धयनहि रहला मुदा पंडिताइन अपन घर अपना जूति सं चलबय लगली। लिच्छवि आ विदेहक परंपरा मिलि क' एक भ' गेल। ब्राह्मणक घर मे धर्मराज पूजित भेला, जे एक निर्गुण देवता थिका आ जिनकर पूजापद्धति बौद्ध लोकनिक पूजापद्धतिक जीवित अवशेष छियनि। आब धर्मराजक पूजाविधान तं मैथिलिये मे हो। चौदह देवान मे एक मीरा साहेब छथिन, ओ मुसलमान छथि, मुदा हमरा-अहांक घर मे ओ शताब्दियो सं पूजित छथि। हुनकर गाथाक भाषा मैथिली अछि। मैथिल संस्कृति कें अइ तरहें देखबाक चाही।

            दोसर दिस, मैथिली भाषा मे लिखित प्राचीनतम साहित्य जे उपलब्ध अछि से ब्राह्मणेतर वर्गक शूद्र, अतिशूद्र, महाशूद्र लोकनिक रचना छियनि। स्वयं महाकवि विद्यापति जाहि प्रकारक भाखा-रचना कें अपन आदर्श बनौलनि, से मूलत: शूद्र लोकनिक आविष्कार रहनि। ब्राह्मण लोकनि तं भाखा-रचना सं घृणा करै छला आ अइ दुआरे विद्यापतियो सं घृणे करैत रहथि, हुनकर उपेक्षा करैत रहला। आइ जे हमरा लोकनि विद्यापतिक एते चला-चलती देखै छी, मोन रखबाक चाही जे से अही डेढ़ सौ बरसक देन थिक।

           अइ सब तरहें तं ई कथन बेबुनियाद ठहरैत अछि जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा थिक। मुदा, तखन प्रश्न ई अछि जे ई बात बेर-बेर उठैत किए अछि? की एकरा पाछू कोनो इतिहास अछि? जी हं, इतिहास अछि आ से बहुत शर्मिन्दगी भरल इतिहास अछि।

           बीसम शताब्दीक पहिल दशक बिहार मे जातीय अस्मिताक उदयक समय छल। हमरा जेना कि मोन पड़ैत अछि, मैथिल महासभाक स्थापनाक आगुए पाछू गोप महासभाक स्थापना भेल छल। गोपे महासभा जकां मैथिल महासभा सेहो पूर्णत: एक जातीय संगठन छल। तखन एकर नाम ब्राह्मण महासभा किए ने भेलै? ब्राह्मण महासभा अलग सं एक स्वतंत्र संस्था छल। कायस्थ महासभा सेहो जखन अलग सं छल, आ इहो मोन रखबाक चाही जे तहिया कायस्थक गणना शूद्र वर्ण मे होइत छल। एहना मे कोनो जातीय महासभा दू गैरबराबर जाति कें शामिल क' क' जखन नै बनल छल तं एहन अजीबोगरीब संगठन मैथिले महासभा किए भेल जकर सदस्यताक लेल केवल आ केवल मैथिल ब्राह्मण आ कर्णकायस्थ योग्य मानल गेला? एहि पाछू जे राजनीति छल से स्पष्टत: राजभक्त लोकनिक कवच तैयार करब छल। दरभंगा राजक शोषणकारी व्यवस्था जगजाहिर अछि, आ स्वयं महाराजे एहि संस्थाक निर्माण करेने छला, वैह सर्वेसर्वा रहथि। इतिहास कहैत अछि जे 'मैथिल' शब्द अही ठाम अपन मिथिला-बोध सं भटकि गेल। असल मे कहल जाय तं अपन शोषणकारी सत्ता कें अनामति रखबाक हेतु समर्थक तैयार करबाक लेल एकरा पूरा रणनीतिपूर्वक मिथिला-बोध सं भटका देल गेलै।

           अइ संपूर्ण घटनाक्रम मे सब सं दुर्भाग्यपूर्ण ई भेल जे मैथिल महासभा 'अप्पन' भाषाक रूप मे मैथिली कें जोड़ि लेलक। मिथिला मे बसनिहार सब जातिक भाषा मैथिली छल, मुदा आब ई केवल दू जातिक भाषा बनय जा रहल छल। हमरा लोकनि कें आभारी हेबाक चाही गोप महासभाक ओहि महामना पूर्वज लोकनिक प्रति, जे लिखित रूप मे तहिया(1910 मे) ई घोषणा केलनि जे मैथिली तं हमरो अभक भाषा छी। आ, अही बात कें आधार बना क' ओ लोकनि दावा केलनि जे मैथिली जें कि हुनको सभक भाषा छियनि तें हुनको लोकनि कें मैथिल मानल जाय आ मैथिल महासभाक सदस्यता देल जाय। घृणा आ अवज्ञापूर्वक मैथिल महासभा अइ मांग कें अस्वीकार केलक। एकरे प्रतिक्रिया मे गोप सभा संगठित भेल छल आ लिखित घोषणा कयल गेल जे मैथिली हुनका सभक भाषा नै छियनि। जाधरि राजतंत्र आबाद रहल, तकर बादो कैक बरस धरि मैथिल महासभा जिंदा रहल। ओकर प्राय: हरेक अधिवेशन मे क्यो ने क्यो उदारवादी पंडित ई प्रस्ताव राखैत रहला जे मिथिला मे बसनिहार सब जाति कें मैथिल मानि लेल जाय, हुनकर भाषा मैथिली कबूल क' लेल जाय, मुदा नहि। मैथिल महासभा मरि जायब पसंद केलक मुदा ककरो आन के दावेदारी गछब स्वीकार नै केलक। मैथिली राजाक भाषा भ' क' रहि गेल, प्रजाक भाषा नहि बनि सकल। मैथिली शोषकक भाषा बनल, शोषितक नै। मैथिली राजभक्ति आ जी-हजूरीक भाषा बनल, संघर्ष आ विरोधक नहि। जं आगू चलि क' मैथिली साहित्य मे ई सब युगीन गुण पैदा क' क' एकर सामर्थ्य-वृद्धिक प्रयास कयलो गेल तं राजसंस्कारित मठाधीश लोकनिक द्वारा एहन प्रयास सब कें हतोत्साह कयल गेल, ओकर उपेक्षा कयल गेल।

           अहां कहि सकै छी जे अइ इतिहासक चर्चा करब बेमतलब के गाड़ल मुरदा कें उखाड़ब थिक। मुदा दुर्भाग्य सं अहांक ई कहब सही नै भ' सकत। एखन हाले (बस पछिला मास) मे हम सब देखने छी जे मैथिली अखबार मे दरभंगा राजक शोषणकारी व्यवस्थाक चर्चा भेला पर कोना 'मैथिल' भाइ लोकनि के खून खौलि उठल रहल रहनि। देश भने आजाद हो, संविधान भने लागू हो, मुदा 'मैथिल' लोकनि के आदर्श आइयो दरभंगे महराज छथिन। हुनकर शोषण पर लिखबाक हो तं अहां अंग्रेजी मे जा क' लिखू, हिन्दी मे जा क' लिखू, मुदा क्यो जल मे रहि क' मगर सं बैर करता, से चलै बला नहि अछि। आब कहू जे मैथिली ककर भाषा छी?

           सही बात छै जे दरभंगा नरेश ब्राह्मण रहथि, ब्राह्मणक उपकारार्थ बहुतो काज केलनि, ओ हुनका लोकनिक माथक मुकुट छथिन, हुनका लोकनिक शाश्वत स्मृति मे खचित छथिन। मुदा, बात अइ ठाम ब्राह्मणक नै, मैथिलीक भ' रहल अछि। हुनका लोकनिक शाश्वत स्मृति मे जं महराज खचित छथिन, तं की अहां सोचै छी जे यादव लोकनि कें, पचपनिया लोकनि कें कोनो स्मृति नै होइ छै? ओइ घृणा आ अवज्ञा कें ओ लोकनि बिसरि जेता आ अहांक स्मृति बला जयजयकार सबतरि निर्द्वन्द्व पसरि जायत? ताहू मे अइ स्थिति मे जखन कि बोलचाल मे मैथिली हुनके छियनि, धार्मिक कृत्य मे मैथिली हुनके छियनि, साहित्य-रचनाक आदि प्रेरणा हुनके पूर्वजक देन छियनि।

           मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, ई बात स्वयं ब्राह्मण लोकनि स्थापित केने छला। हुनकर उत्तराधिकारी लोकनि अपन रचना सं, अपन विचार सं, अपन निर्णय आ रणनीति सं, अपन वर्चस्व आ मनमानापन सं साबित करैत रहला अछि जे कि आइयो यथावत जारी अछि। यैह बिहार विधान सभा थिक जतय कहियो स्व. बी. पी. मंडल बाजल छला जे 'मैथिली हमारी माता नहीं, विमाता है।' विमाता सेहो तं अंतत: माते होइ छै। मुदा,ओ दोसर युग रहै। आइ समय बदलि चुकल अछि। संस्कार आ सुविधा दुनू परिवर्तित भ' गेल अछि। तें, अइ तरहक बात जं कतहु सुनी जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी तं हमरा लोकनि कें आत्मावलोकन आ आत्मालोचन करबाक चाही, ई नै जे एकरा 'सुनियोजित षड्यंत्र' कहि क' अपना वर्गक छुद्र मनोवृत्ति बला ठिकेदार 'विद्वान' सभक मनमानी कें नैतिक समर्थन प्रदान करय लागी। अइ मुद्दा पर नितान्त होश मे आबि क' सोचबाक बेगरता छै। 

(मिथिला आवाज, पाक्षिक सं साभार)


Thursday, March 24, 2022

युगों का यात्री: एक जीवनीकार की मुश्किलें


युगों का यात्री

------------------

एक जीवनीकार की मुश्किलें


तारानंद वियोगी


देशव्यापी इस लाकडाउन के दौरान, जब सभी प्रकार के सम्मिलन और गोष्ठियों पर रोक थी, वर्चुअल माध्यमों ने एक नये विकल्प की ओर हिन्दी संसार का ध्यान आकृष्ट किया। यह सोशल साइट के पेज पर लेखक का लाइव आना था। दुनिया भर के पाठक यहां अपने लेखक को न केवल देख और सुन सकते थे, बल्कि उनसे सवाल भी कर सकते थे। यह दौर अभी जारी है और उम्मीद की जाती है कि साहित्य के सिकुड़ते  प्रसार-माध्यमों के बीच यह नया माध्यम अपनी एक स्थायी जरूरत, स्थायी जगह बना लेगा।


बात लेकिन 'युगों का यात्री' पर करनी है, जिसकी रचना-प्रक्रिया पर चर्चा करने के लिए मुझे भी मेरे प्रकाशक, राजकमल प्रकाशन ने अपने पेज पर आमंत्रित किया। उस सीमित समय के भीतर जितनी बातें की जा सकती थीं, मैंने कीं। लेकिन अपने पाठकों की विविध जिज्ञासाओं ने इस ओर मेरा ध्यान आकृ्ष्ट किया है कि इस बारे में मुझे और भी बातें करनी चाहिए।


मेरे बहुत सारे पाठक इस बात पर आश्चर्य करते हैं कि तीन वर्ष के भीतर इस तरह की कोई किताब कैसे लिखी जा सकती है, जिसमें नागार्जुन का अपना बीहड़ जीवन तो खैर है ही, अपने देश भारत का पिछले सौ वर्षों का पूरा इतिहास है, आजादी के पहले और उसके बाद का। फिर स्वतंत्रता-संग्राम की अंतर्वर्ती धाराएं हैं, किसान आन्दोलन, सशस्त्र भूमिगत आन्दोलन, जमींदारी उन्मूलन के लिए किया गया दीर्घकालीन जनान्दोलन, सारा कुछ है। यह सब इसलिए है कि नागार्जुन इन सब में शामिल रहे थे। फिर मैथिल समाज और हिन्दीपट्टी का पूरा समाजशास्त्र है, वे तमाम उद्यम जिन्हें हमारी भूमि के महामना पुरखों ने शुरू किये मगर जो बाद को घोर अगति में जाकर निमज्जित हुए। बिहार का कम्युनिस्ट आन्दोलन, प्रगतिशील लेखक संघ और इसके समानधर्मा दूसरे लेखक-संघों की गति-कुगति। उन दुर्गम यात्राओं का वृत्तान्त जो नागार्जुन ने अपने शुद्ध यायावरी तेवर में किये। उन हजारों लोगों के अनुभव, जो नागार्जुन के संपर्क-सामीप्य में रहे। फिर उनका साहित्य, जिसे अपने कच्चे माल के लिए हमेशा नागार्जुन के जीवनानुभव और आत्मसंघर्ष पर निर्भर रहना पड़ता था। कोई रचना उन्होंने कब लिखी, उसके पीछे घटना क्या थी, सरकार उस बारे में क्या सोचती थी और खुद नागार्जुन सरकार से कहां जाकर असहमत होते थे। इस तरह की और भी न जाने कितनी चीजें जो लिखते समय तो आसानी से लिख दी गयीं मगर अब अपने लिखे जाने का हिसाब मांगती हैं। अशोक वाजपेयी ने इस पर यह टिप्पणी की है कि इस किताब से उनके साहित्य को भी कहीं बेहतर समझा जा सकेगा। जबकि मुझे मालूम था कि मैं उनके साहित्य पर किताब लिखने नहीं बैठा हूं, मेरा क्षेत्र सीमित है। मुझे तो केवल उनके जीवन पर बात करनी है। लेकिन, आप ही बताएं कि उस लेखक का आप क्या कर सकते हैं जिसके समूचे साहित्य में उसका जीवनानुभव घुसा हुआ हो! यह नागार्जुन थे, जिन्हें ढलती उमर में जब यह पूछा गया था कि क्या आप अपनी आत्मकथा लिखने की योजना रखते हैं, तो उन्होंने मानो नोटिस लेने से इनकार करते हुए जवाब दिया था कि मेरी सारी कविताओं को मिला दो, मेरी आत्मकथा हो जाएगी। अपनी रचना को लेकर इतना भरोसा रखनेवाला लेखक विरल होता है, जबकि दूसरा पक्ष यह भी उनके साथ था कि जिस किसी ने जब भी मांगा, कविता लिखी और वहीं उसको दे दी, छपी तो छपी वरना गयी। जाने कितनी बार की उनकी यात्राओं में उनकी कविता की डायरियां खो जाती थीं। उनके बारे में यह जुमला बहुत ही मशहूर था कि 'बाबा कविता बोते और खोते चलते हैं।'


तो, लोग प्रश्न करते हैं कि तीन ही वर्ष में आपने यह सब इतना कुछ कैसे कर लिया, जबकि आप पूर्णकालिक लेखक हैं भी नहीं। अपने पाठकों के इस प्रश्न का मैं सम्मान करता हूं और मानता हूं कि एक सार्थक रचना कई प्रकार के विस्मय रचती है। सच पूछें तो तीन वर्ष की अवधि केवल वह समय है जो मैंने इसे लिखने में लगाया। इसकी तैयारी के लिए जो समय लगा, निश्चय ही वह इसमें शामिल नहीं है। और, सच तो यह भी है कि उस तमाम लगे समय को आप वर्ष के मात्रक से तोल भी नहीं सकते। उसमें तो पूरा जीवन लगा होता है। कई बार जीवन की त्वरा वर्ष के मानक को ध्वस्त कर जाती है, सो अलग। साफ कहूं कि मेरी राय में लेखकों को सिर्फ उन्हीं विषयों पर अपनी किताब लिखनी चाहिए जो जीवन भर का उनका साथी रहा हो। ऊपरी तौर पर लगता है कि भइ, तब तो लेखक के पास लिखने को कुछ भी नहीं रहेगा। आखिर ऐसे विषय हो भी कितने सकते हैं जिनसे लेखक का जीवन भर का साथ रहा हो! लेकिन वास्तविक सच देखें तो ऐसा कतई नहीं है। एक संवेदनशील भाषिक प्राणी को आप इतना कम करके भी न आंके। और ज्यादा न भी हो तो कम-से-कम सौ चीजें तो हर लेखक के खाते में जरूर आएंगी, जिनसे उसकी जनम भर की संगत रहती है। 'जनम भर की संगत' कहना भी कोई निरापद काम नहीं है। मेरा मतलब है, इतनी पुरानी कि इस बीच जीवन में कई-कई मोड़ आ गये हों। जब आप पुरानी संगत के विषयों पर लिखते हैं तो सारा कुछ इस आश्वस्ति के साथ खुलता है कि जैसे उसमें लेखक का 'स्व' बसा हो। ऐसे में जो आन्तरिकता लेखक को, उन लेखन के दिनों में पूरी तरह डुबोए रहती है, वही चीजें जब किताब से होकर पाठक के पास पहुंचती हैं तो उसे भी निमज्जित किये बगैर नहीं रहतीं। पुरानी कहाबत है कि जो दिल से आता है, वही दिल तक जाता है। जिन रचनाओं में हमें प्रबल पठनीयता का गुण मिलता है, ध्यान दें तो इसकी वजह केवल शिल्प की जादूगरी भर नहीं होती। अंदर बहुत सारी  चीजें अन्तर्भुक्त रहती हैं। वहां 'जनम भर की संगत' जैसी चीज की गंध भी होती है। दिल से निकले होने की मन्द्र मधुर ध्वनियां वहां तैरती मिलती हैं।


लेखक को अपने गहन जीवनानुभव के विषयों पर ही लिखना चाहिए, मगर अधिकतर लेखक यह नहीं कर पाते, क्योंकि साहित्य की तत्कालीन रूढ़ियां और उसका बाजार उसे ऐसा करने की सुविधा नहीं देते। कुछ विधाएं अधिक सम्मानदायक मानी जाती हैं, कुछ का बाजार चमकीला होता है, कुछ तो तात्कालिकता की मांग तक से अनुप्रेरित होकर लिखी गयी रहती हैं। बाजार, पुरस्कार और लोकप्रियता की ओर लेखक साकांक्ष हो तो यह मुश्किल है कि वह अपने जीवनानुभव पर एकाग्र रह पाएगा। इसके कई कारण होते हैं।‌ हमारे कई अनुभव ऐसे हो सकते हैं जिनके लिए साहित्य के पास कोई लोकप्रिय विधा नहीं होती। फिर यह भी संभव है कि बाजार के पास, या 'समकाल' के पास ऐसी किसी रचना के लिए कोई परवाह ही न हो। यह गहन निस्संगता की स्थिति भी हो सकती है। पुराने जमाने के कवि स्वान्त:सुखाय की बात करते थे। लेकिन यह बात किसी भी जमाने के लिए बराबर की सच हो सकती है, जिसका अर्थ हमेशा सामाजिकता से, सामाजिक संदर्भों से कटना ही नहीं होता। यह भी हो सकता है कि लेखक ने कोई ऐसी रचना लिखी जो उस जमाने के फैशन में शामिल नहीं थी, उसका कोई सहृदय सामाजिक वर्ग तक नहीं था। कई बार हमें यह देखकर चकित होना पड़ता है कि भरपूर सामाजिकता से पगी कोई रचना किसी ऐसे लेखक ने लिखी जो स्वान्त:सुखाय लिख रहा था। यह और कुछ नहीं, अपने काल की रूढ़ियों, गतानुगतिकताओं का अतिक्रमण है। फिर यह भी है कि हर जीवनानुभव अपने लिए अलग-अलग शैली, अलग-अलग अनुशासन की मांग रखता है, और हमेशा यह जरूरी नही कि बाजार के पास उसके लिए जगह हो। या अगर हो भी तो चटकीला हो, प्रतिष्ठादायक हो। तो, स्थिति यह बनती है अभिव्यक्ति की आंतरिक जरूरत बाजार की उपलब्धताओं पर निर्भर नहीं रह सकती। 



जैसे, जीवनी विधा को ही लें। इस विधा में काम तो कई उच्च कोटि के हुए हैं, एक किताब के तौर पर उन रचनाओं की अपनी ख्याति भी है, बाजार भी। लेकिन यह सब ऐकान्तिक रूप से उस किताब की उपलब्धियां हैं, विधा की नहीं। वरना यह क्योंकर होता कि जिस विधा में 'कलम‌ का सिपाही' और 'आवारा मसीहा' जैसी कृतियां लिखी गयीं, उस जीवनी-लेखन विधा को क्रियेटिव लेखन का दरजा तक प्राप्त नहीं है। उपन्यास लिखने की तुलना में इसे एक दोयम लेखन की हैसियत हासिल है। फिर यह भी है कि जीवनी-लेखन और प्रकाशन की कोई व्यस्थित परंपरा भी नहीं है, न बाजार। राजनेताओं और सामाजिक सुधारकों, धार्मिक झंडाबरदारों की जीवनी का अपना पाठक-वर्ग है, जरूरी नहीं कि वह साहित्य का पाठक हो। लेकिन, साहित्यकारों और दूसरी कलाविधाओं के वरिष्ठों की जीवनियां लिखने की परंपरा क्यों नहीं है? पर, यह सारे सवाल अपनी जगह हैं। लेखक की अपने विषय के साथ अंतरंगता इन सभी झंझटों से बचाकर उसे आगे निकाल ले जाती है। यह उसकी चिन्ता की वजह नहीं बनता कि उसके लिखे को कौन-सा दरजा मिलने वाला है। वहां रचना की आंतरिक जरूरत ही मुख्य होती है। वह रचना, जो उसके जीवनानुभव से निकलकर आती है।


नागार्जुन से मेरी पहली मुलाकात, बहुत शुरूआती दिनों में, जब मैं मुश्किल से सतरह-अठारह का रहा होऊंगा, हुई थी। उनसे उस पहली मुलाकात में हुई बातचीत का उल्लेख मैंने 'तुमि चिर सारथि' में किया है कि कैसे जब मैंने उनसे कहा कि बाबा, आपने इतना समय, इतना मान मुझे दिया यह मेरा सौभाग्य है, तो उन्होंने तपाक से कहा था कि अरे, सौभाग्य तो हमेशा फिफ्टी-फिफ्टी होता है। उन दिनों वह अपनी प्रसिद्धि के शिखर पर थे, लेकिन एक अनजान नौजवान से मिलने की यह गर्मजोशी उनमें थी, जो निहायत विशेष थी। जाहिर है, ऐसे लोगों को आप‌ भूल नहीं सकते। वह बार-बार आपकी स्मृति में झांकते रहेंगे। हद यह थी कि इस स्मृति को उपस्थिति में बदल देने की पहल भी वही अपनी ओर से शुरू कर देते थे--पत्रों से, बुलावा देकर, खुद उपस्थित होकर। जबतक जिये, कमोबेश मैं उनकी संगत में बना रहा। यह इतना गहन था कि उनके निधन से बात खत्म नहीं हो सकती थी। अनेक रूपों में वह मेरे जीवन में रहे चले आए। 'तुमि चिर सारथि' उनके निधन पर लिखी गयी थी। और अब जबकि पचपन पार हूं, कई घाट-कुघाट भटक आया हूं उनकी संगत बरकरार रखते, अब जब उनकी जीवनी पर काम करता हूं तो स्वाभाविक है कि उनका व्यक्तित्व, या और भी तमाम बातें आन्तरिकता से मुखरित होंगी। उसमें मेरे जीवनानुभव को शामिल होने से आप नहीं रोक सकते।



मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल था कि इस किताब की रूपरेखा क्या होगी! नागार्जुन के जीने का, और लिखने का भी, ढंग ऐसा था कि वह किसी एक व्यक्ति की तरह लगते ही नहीं थे। खुद कहते थे कि 'व्यक्ति तो जरूर हूं वरना 'व्यक्त' कैसे होता! किसी भी हाल में लेकिन इकाई नहीं हूं, सामूहिक मन की दहाई, सैकड़ा, हजार... जो समझ लो।' वह उन लेखकों में से थे जिनके जीवन में उनके काल का इतिहास शामिल रहता है, और वह खुद इतिहास में। कमलेश्वर ने बड़ा अच्छा तो लिखा है कि आप भारत-भूमि पर कहीं भी चले जाएं, कोई-न-कोई आदमी आपको ऐसा दिख जाएगा जो ठीक-ठीक नागार्जुन जैसा लगेगा, जबकि मुक्तिबोध को छोड़कर और कोई दूसरा हिन्दी लेखक ऐसा नहीं हुआ जो आम जन की प्रतिच्छवि बनकर बराबर इस तरह खड़ा जाए। लेकिन, प्रतिभा और उद्यम आदमी को भीड़ से अलग करते चलते हैं। इसी की वजह से तो इतिहास में शामिल होना भी हो पाता है। जाहिर है, ऐसे आदमी की जब आप जीवन-कथा लिखेंगे तो उसकी वैयक्तिकता से बाहर जाकर दूर-दूर तक के इलाके आपको खंगालने होंगे। इधर वैयक्तिकता जो होगी, वह भी वैयक्तिक-सी नहीं दिखेगी। लेकिन, विषय के साथ जीवनीकार की अंतरंगता हो तो वह जहाज-भर की सारी रूई धुनने को तैयार हो जाता है।


एक छोटा-सा उदाहरण दूं तो बात ज्यादा साफ होगी। नागार्जुन से जब लोग पूछते थे कि राजनीति की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ, जबकि आप तो बौद्धमठ में निवास करने वाले एक भिक्षु थे, तो वह स्वामी सहजानंद का नाम लेते हुए उन्हें अपना राजनीतिक गुरु बताते थे, और कहते थे कि श्रीलंका से लौटकर भिक्षुवेश में ही उन्होंने स्वामी जी द्वारा आयोजित एक महीने तक चलनेवाले 'समर स्कूल आफ पालिटिक्स' में भाग लिया था, उसमें देश भर के तपे तपाए समाजवादी और साम्यवादी क्लास लेते थे। बस, इतना ही बताते थे। इस स्कूल के बारे में इससे ज्यादा न कहीं कुछ उन्होंने लिखा, या  किसी को बताया। वह स्वतंत्रता संग्राम का समय था। सहजानंद उग्र वामपंथ की राजनीति करते थे। वे उन दिनों किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, और बिहार का किसान आन्दोलन निर्णायक रूप से सक्रिय और उग्र हो रहा था। समूचे स्वतंत्रता संग्राम की या फिर किसान आन्दोलन की ही बात की जाए तो महीने भर चले इस स्कूल का कोई खास महत्व नहीं था। ऐसे स्कूल तो उन दिनों अक्सर चलते रहते थे, क्योंकि उस जमाने के अग्रणी नेताओं की यह समझ थी कि जनता को राजनीतिक रूप से शिक्षित और सचेत करने के लिए ऐसे स्कूल चलते रहने चाहिए। इसमें पर्याप्त जन-सहयोग मिलता था और यहां तक कि उन दिनों की कांग्रेस सरकार(1937) का भी सपोर्ट रहता था, इसलिए ऐसे स्कूल तो अक्सर यत्र-तत्र चलते रहते थे। इतने विशाल किसान आन्दोलन में, और उससे भी विशाल स्वतंत्रता संग्राम में भला ऐसे किसी एक स्कूल की क्या अहमियत हो सकती थी? इसलिए इतिहास की किताबों में, यहां तक कि राज्य के स्वतंत्रता संग्राम में बिहार की भागीदारी पर कई वोल्यूम में लिखे गये इतिहास-पुस्तकों में भी, इस स्कूल के बारे में कुछ भी लिखा हुआ नहीं मिलता था।  लेकिन, एक जीवनीकार की समस्या देखिये कि जिस स्कूल की कोई खास अहमियत नहीं मानी गयी, उसके लिए वही सबसे बड़ी घटना है क्योंकि उसके चरितनायक के राजनीतिक विचार वहीं निर्मित होते हैं। हर कोई जानता है कि नागार्जुन न केवल एक स्पष्ट और सचेत राजनीतिक नजरिया रखनेवाले लेखक थे, बल्कि पार्टी की सदस्यता लेकर, उसके अधिकारी बनकर उन्होंने सक्रिय राजनीति भी की थी। इस अनुमान के आधार पर कि क्रान्तिकारी राजनीति के प्रति ब्रिटिश सरकार का रवैया सख्त था तो जरूर ही उसने इन गतिविधियों के ऊपर अपने जासूस लगाये होंगे, मैं सरकारी अभिलेखागारों में सीआईडी रिपोर्ट्स की पुरानी फाइलें खंगालता था। अनुमान सच था। सहजानंद की हर गतिविधि पर खुफिया विभाग की नजर थी। और, जहां तक इस स्कूल का सवाल है, इसके बारे में तो खुफिया के डीआईजी की बीस पृष्ठों की भेजी एक रिपोर्ट मुझे मिली, जिसमें यहां तक अंकित था कि किस दिन के किस क्लास में किस आदमी ने क्या पढ़ाया, क्या आपत्तिजनक, विद्रोहात्मक, भड़कानेवाली बातें कीं। हां यह जरूर था कि कोर कमिटी की जो गुप्त बैठकें हर रोज होती थीं, वहां खुफिया का सूत्र बाधित था।  तो, यह सब करना होता है।


किसान सभा में जब नागार्जुन कार्यकर्ता नियुक्त हुए, उन्हें स्वामी जी ने उस चंपारण में काम बढ़ाने भेजा जो गांधीजी का 'बैनामा' जिला कहलाता था। यह चंपारण सत्याग्रह का असर था कि गांधी के खिलाफ वहां कोई भी कुछ सुनना नहीं चाहता था, जबकि सहजानंद की पूरी राजनीति गांधी के खिलाफ थी। खिलाफ तो असल में वह जमीन्दारों के थी, लेकिन गांधी का इस मुद्दे पर लगातार चुप रहना उन्हें भी इस जद में ले आता था। इसे नागार्जुन की संगठन-क्षमता के प्रमाण के तौर पर देखा जाना चाहिए कि सहजानंद ने उस कठिन जगह पर काम करने भेजा जहां लोग समाजवादियों की आमसभा करने के लिए अपनी जमीन तक देने के लिए तैयार नहीं होते थे। वहां नागार्जुन के साथ जो टीम थी, वह बिलकुल वही टीम थी जिन्होंने भगतसिंह और चन्द्रशेखर आजाद, बैकुंठ शुक्ल के साथ काम‌ किया था। बैकुंठ के भाई केदारमणि तो तमाम समय नागार्जुन के साथ बने रहे, यहां तक कि भागलपुर जेल में भी दोनों साथ ही बंद थे।


अब लेकिन मुश्किल यह कि इन सब चीजों के बारे में नागार्जुन का कहा हुआ या लिखा हुआ कुछ खास नहीं मिलता था। सहजानंद ने अपनी आत्मकथा में चंपारण की चुनौतियों और उसके निराकरण का वर्णन तो खूब किया है, यहां तक कि अपने अग्रगामी कार्यकर्ता दल की बड़ी तारीफ की है, लेकिन नागार्जुन का कहीं नाम नहीं लिया है, किसी का भी नहीं लिया है। इधर,नागार्जुन की एक प्रवृत्ति हम यह देखते हैं कि अपने जिन जीवनानुभवों को उन्होंने लेखन का विषय बनाया, उसपर या तो उपन्यास लिखे हैं या फिर कविताएं। इन सृजनात्मक विधाओं की अपनी सीमा है कि उन्हें आप निर्द्वन्द्व होकर इतिहास की तरह उपयोग नहीं कर सकते। कदम-कदम पर यथार्थ के बीच कल्पना के मिश्रित रहने का खतरा रहता है। और कुछ न करें तो नाम-गाम ही बदल देंगे।  ऐसे में कोई जीवनीकार क्या करे? आसान रास्ता तो यही है कि ऐसे मामलों को छोड़ ही दिया जाए, जैसा कि ज्यादातर लोग करते भी हैं। मैंने लेकिन कुछ आगे बढ़ने का फैसला किया। इस बीच आकर क्या हुआ है कि बिहार सरकार के अभिलेखागार ने किसान आन्दोलन से संबंधित मूल दस्तावेजों को लेकर कुछ किताबें प्रकाशित की हैं, बाकी चीजें, यदि अध्येता चाहे तो मूल रूप में या डिजीटल रूप में उन्हें देखने की सुविधा वे देते है। उन‌ दस्तावेजों को जब मैंने देखा, पाया कि सहजानंद की प्राय: हर मीटिंग पर खुफिया की निगरानी थी, और बराबर ही उसकी भेजी रिपोर्ट पाई जा सकती है। पाया कि उन सभाओं में जिन खतरनाक लोगों को उन्होंने चिह्नित किया हुआ होता था, उनमें एक भिक्षु नागार्जुन भी होते थे। इस तरह तमाम चीजों को मिलाएं तो एक संगति-सी बनती जाती थी।


नागार्जुन ने जो अपना प्रसिद्ध उपन्यास 'बलचनमा' लिखा, उसमें उनके किसान आन्दोलन दौर के जीवनानुभव वर्णित हैं। नागार्जुन के उपन्यासों में कल्पना और यथार्थ का संतुलन बिलकुल अलग ढंग का होता था। बहुत जरूरी हो तभी वह कल्पना का सहारा लेते वरना यथार्थ ही इतने भरपूर और सघन थे कि कल्पना की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। लेकिन मुश्किल यह कि वहां उन्होंने लोगों और जगहों और अवसरों और माध्यमों  के नाम बदल दिये होते थे। जैसा कि मैंने कहा,  इनका उपयोग आप इतिहास की तरह निर्द्वन्द्व नहीं कर सकते थे। पर, जब आप 'बलचनमा' और 'मेरा जीवनसंघर्ष' को साथ मिलाकर पढ़ते हैं तो तमाम औपन्यासिकता पर से परदा उठ जाता है। उन दिनों 'जनता' साप्ताहिक निकलती थी, जिसके संपादक रामवृक्ष बेनीपुरी थे। उपन्यास में इसका नाम 'क्रान्ति' दिया गया है। यह किसान आन्दोलन का लगभग मुखपत्र था। बहुत सारे संदर्भ दिये हैं कि वहां ऐसा छपा, उसने ऐसा लिखा आदि, तो इसका फैसला आप 'जनता' के उन अंकों को देखकर कर सकते हैं।


लगभग यही स्थिति हम उनके भिक्षु-जीवन के दिनों का पाते हैं, जहां के अनुभवों पर तो उनका उपन्यास भी नहीं आया। लंका के दिनों के बारे में उन्होंने अपने कुछ मित्रों से बात की थी। कुछ बातें मुझसे की थीं। मेरा यह निर्णय शुरू से ही था कि मौखिक बातों, घटनाओं का उपयोग यहां न करूंगा, केवल मुद्रित, तथ्यात्मक साक्ष्यों को ही आधार बनाया जाएगा। ऐसे में बहुत सारी बातें ऐसी थीं जो उन्होंने मुझे या मित्रों को बताई तो जरूर थीं लेकिन उसका कोई लिखित साक्ष्य मिलना मुश्किल था। वह सब कहीं लिखा, छपा हुआ नहीं मिलता था। इशारे तक में नहीं। सात साल पहले उसी मठ में राहुल सांकृत्यायन रहे थे। नायकपाद सहित सारे के सारे आचार्य वही थे जो तब थे, इसका पता विद्यालंकार परिवेण के इतिहास और परंपराओं को देखने से मिलता है। राहुल जी ने 'मेरी जीवन-यात्रा' में अपने उन दिनों का विस्तृत विवरण दिया है। उससे एक अन्विति बनती है, और चीजें और स्थितियां दृश्यात्मक होती हैं। इसका मैंने विवेकपूर्वक उपयोग किया। यानी कि उनकी बताई जिन बातों की पुष्टि मठ की परंपरा से या राहुल जी की जीवनयात्रा से होती हो तो उसे ग्रहण किया, वरना अपने अनुभव में संचित रखा। पर, गहरी आन्तरिकता से लिखी रचना का एक वैशिष्ट्य यह भी होता है कि लेखक ने जिन बातों को अपने अनुभव में संचित और सीमित कर लिया होता है, उसकी खुशबू भी लेखन में व्याप्त हो जाने से बच नहीं पाती।


ठीक यही  समस्या वहां आती है जब द्वितीय विश्वयुद्ध के ऐन शुरुआती दिनों वह तीसरी बार जेल जाते हैं। वह ट्रेन‌ से जा रहे थे। साधू भेस में। सामान नीचे सीट के नीचे बोरों में भरा। वह क्या था तो एक पैम्फलेट के बंडल, 'न एक पाई न एक भाई'। यह सुभाष बोस का दिया नारा था, ब्रिटिश सरकार जो द्वितीय विश्वयुद्ध के लाम‌ पर भेजने के लिए बड़ी संख्या में सिपाहियों की बहाली कर रही थी, और घर-घर से युद्ध फंड के लिए लोगों से दान और चंदा वसूल रही थी, यह उसके विरुद्ध था। नागार्जुन उन दिनों सुभाष बोस के साथ, उनके समर्थन में जनजागृति अभियान पर थे कि न किसी घर से कोई भाई सिपाही भरती में भेजा जाए, न एक पैसे का भी चंदा दिया जाए। उन्होंने बताया है कि रास्ते में सर्च हुआ तो भिक्षु के पास बोरे देखकर पुलिस ने पूछा क्या है, तो बताया आलू है, लेकिन सिपाही ने बोरा खोलकर देख लिया और नागार्जुन गिरफ्तार कर लिये गये। उन दिनों के कानूनी प्रावधान क्या थे, विद्रोही साहित्य को प्रतिबंधित करने के लिए खास प्रावधान क्या किये गये थे, जो साहित्य बरामद किया गया उसमें क्या-क्या चीजें थीं, उनकी भाषा, उनका कंटेन्ट, विधा-- बहुत सारे प्रश्न थे, जिनका उत्तर तलाशना था। सरकार के खुफिया‌ विभाग ने सरकार को भेजे अपने प्रतिवेदनों के साथ प्रतिबंधित साहित्य की प्रतियां भी संलग्न की होती थीं। विद्रोह लेकिन तगड़ा था और ऐसा साहित्य भी बहुत सारा था। मुझे पूरी उम्मीद थी कि उस पैम्फलेट की प्रति भी मुझे मिल जाएगी। बहुत सारी चीजें तो मिली, लेकिन वह नहीं मिल पाई। मैं समझता हूं कि यह काम भविष्य के जीवनीकारों के हिस्से रहेगा। जो कुछ प्रतिबंधित चीजें मुझे मिल सकीं उनका विवरण किताब में आया है।


नागार्जुन के जीवन के दो अलग अलग चरण हमें स्पष्ट दिखाई देते हैं। पहले चरण में गति है, जबरदस्त गति है, दूसरे चरण में इसे हम जैसे अचानक‌ घट जाती हुई देखते हैं। अब गति नहीं, स्थिति है। 'युगों का यात्री' के पहले अध्याय को आप ठीक इसी जगह पर आकर खत्म होता हुआ पाएंगे जहां गति रुकती है। लेकिन सब जानते हैं, गति अचानक से स्थिति पर नहीं पहुंचती। वह पहले धीरे-धीरे घटती है। नागार्जुन का लगभग समूचा कथालेखन इसी घटती गति का विन्यास बताता है। इसे आप दूसरे अध्याय में पाएंगे। इसलिए उस अध्याय की शैली भी आप थोड़ी बदली हुई पाएंगे। तीसरे अध्याय में आकर यह शैली बिलकुल ही बदल जाती है। यह दरअसल गति के स्थिति में निमज्जन की कथा है। पहले अध्याय की समाप्ति ठीक उस जगह आकर होती है जब नागार्जुन फैसला करते हैं कि उन्हें घर को साथ लेकर चलना है, शोभाकान्त जी ने इसे उनके 'सद्गृहस्थ' साबित होने की उनकी सदिच्छा का नाम दिया है, जिसमें कि अन्तत: वह सफल नहीं हो पाए। नागार्जुन के जीवन का यह दिलचस्प पहलू है कि उन्हें स्थिति को गति में स्वेच्छानुसार परिवर्तित करते रहने में महारत हासिल था। हजारों लोगों से एक साथ जुड़े रहने का जो उनका पक्ष था वह यही था। स्थिति को गति में परिवर्तित करने की यांत्रिकी। यात्रा और ठहराव साथ-साथ उनके जीवन में चलते रहते थे। चले, फिर कहीं रुक गये, जी भरकर महसूस किया, फिर चले, रुके, फिर चले। जिन्दगी भर उनके जीवन में यही चलता रहा था। ऐसा रुकना भी हुआ कि कई वर्षों तक रुके रह गये, अक्सर तो ऐसा अपने घर में ही हो जाता था। लेकिन यह शुरुआती दिनों में, जब बच्चे छोटे थे। तरौनी, पटना और दिल्ली। बाद के दिनों में तो रुकने के दिनों की आखिरी संख्या निर्धारित कर ली थी, पन्द्रह। बाद में तो ऐसे गिने चुने घर (शहर) ही रह गये जहां मास-दो मास उनका मन रमता था। अब ऐसे आदमी की जो जीवनी होगी वह सपाट, सरल रैखिक नहीं हो सकती। उसे सारे कुछ को साथ समेटकर चलना होगा, यदि चरितनायक को और उसके समय को मूर्त करना हो तो। लेकिन, यह हरेक जीवनीकार की चुनौती होती है कि वह इतनी सारी अक्ल लगाने के बावजूद अपनी एक शैली निर्मित कर सके, जिससे रचना अन्तत: पढ़ी जा सकने के लायक बची रह सके। वरना, बातें तो वहां आप तमाम लाकर भर देंगे लेकिन वह भराव ऐसा बियावान रच देगा कि किताब ही पढ़ने लायक नहीं बचेगी!

           घटनाबहुल दिनों के आख्यान की जो शैली होगी, ठीक वही शैली अल्प घटना, किंतु प्रबल 'स्थिति' के दिनों के लिए नहीं हो सकती। यह एक आसान-सी बात है जिसे हर कोई समझ सकता है। इस बात को कोई और कहे, इससे ज्यादा अच्छी तरह स्वयं नागार्जुन की कविताएं बयान करती हैं। इतनी सारी शैलियां उनके यहां हैं कि चकित करती हैं। वह खुद कहते थे कि कन्टेन्ट अगर सच्चा हो तो अपने लिए अपनी शैली लेकर ही प्रकट होता है, लेखक में तो बस उसे पकड़ पाने का हुनर होना चाहिए। तीसरे अध्याय में आप देखेंगे कि जहां घटना-बहुलता है वहां तो वृत्तान्त की शैली है, यद्यपि कि वह भी ठीक-ठीक पहले अध्याय की तरह नहीं, बल्कि विश्लेषण और पृष्ठभूमि-विवरण के तत्व भी वहां मिले-जुले हैं। लेकिन, जहां अल्पता है वहां की शैली बिलकुल ही बदल गयी है। अपने कुछ गुणों और दुर्गुणों के कारण नागार्जुन खासे चर्चित बने रहते थे। जैसे कि उनका क्रोध या ताजा से ताजा नयी पीढ़ी के साथ उनकी मौजमस्ती, या फिर न नहाने, न मुंह धोने, भोजन के मामले में चटोरेपन आदि-आदि। यहां आकर आप देखेंगे कि एक-एक मामले को उठाकर उसपर लोगों की राय, उनका कथन, उनकी आदतों आदि का मानो कोलाज तैयार कर दिया गया है। इस तरह कंटेन्ट ने खुद अपने लिए शैली इजाद कर ली है।

           नागार्जुन में एक बड़ी खूबी यह थी कि नितांत घटनाविहीन दिनों को भी घटनाबहुल बना लेने के सौ गुर उन्हें मालूम थे। वह लोगों से घिरे रहते। अलग-अलग जगहों की यात्रा करते रहते। अलग-अलग शैलियों में कविताएं लिखते रहते। उनसे जुड़ा हर आदमी अपने आपमें एक इतिहास होता था। इसके लिए यह जरूरी नहीं कि वह कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति ही हो। वह एक साधारण रिक्शेवाला, कोई किसान, कोई बेरोजगार युवक हो सकता था। सामने वाले की महत्ता नहीं, उसे महत्वपूर्ण बनाती थी खुद नागार्जुन की स्मृति, जहां पहली मुलाकात से लेकर पिछली मुलाकात तक के सारे किस्से जीवन्त और मूर्त बने रहते थे। साधारण की प्रतिष्ठा का जो रूपक हमें नागार्जुन के जीवन और साहित्य में मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। नागार्जुन की यायावरी प्रसिद्ध थी। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जो भी उनकी पसंदीदा जगहें थीं, और ऐसी जगह हजारों में थी, वहां कम-से-कम दो बार तो वह जरूर ही हो आए थे। लेकिन, आश्चर्य होता है यह देखकर कि स्थानवाची कविताएं‌ नागार्जुन के यहां बहुत ही कम हैं, और व्यक्तिवाची कविताएं तमाम भरी पड़ी है। यह एक महत्वपूर्ण सूत्र देता है कि भूगोल का महत्व उनके लिए जीवंत मनुष्य, और पर्यावरण में मनुष्य के तमाम साथियों से मिलकर ही बनता है-- गाछ-वृक्ष, पशु-पक्षी, यहां तक कि मादा सूअर, नेवला, बच्चा चिनार-- इन तमाम को नागार्जुन की कविता में मुकम्मल नागरिकता हासिल थी। स्थानों का महत्व उनके लिए अतीत, या उसके किसी माहात्म्य को लेकर नहीं, वहां रहनेवाले लोगों को लेकर था, जिनसे उनका जुड़ाव गहन था, उन लोगों तक से जो उन्हें पहचानते तक न थे जबकि नागार्जुन बखूबी उन्हें जानते थे। उनके पुराने मित्र केदारनाथ अग्रवाल ने कहीं लिखा है कि बांदा जब वह जाते थे, शहर के उन नितांत साधारण, मलिन मुहल्लों में भी पहुंचते, यहां तक कि ऐसी जगहों पर जहां स्वयं केदार जी भी कभी नहीं गये होते थे। और, यह भी नहीं कि एक बार हो आए, उन जगहों के बाशिन्दा कई उनके पुराने मित्र भी पाये जाते थे, जिनसे संपर्क कहीं और नहीं, बांदा आने पर ही पहली मुलाकात के दौरान हुई होती थी। तो, गतिहीनता इसे कोई कैसे कह सकता है? अपनी 'स्थिति' को भी गति प्रदान कर देने की जो उनकी यांत्रिकी थी, वह लाजवाब थी। इन सारे प्रसंगों को एक शैली में, जहां कि तमाम छूटे हुए किस्से भी अपना वाजिब प्रतिनिधित्व पहले से ही पा गये प्रतीत हों,में ही कायदे से ढाला जा सकता है। नागार्जुन के इतने संपर्क थे, इतना विस्तार था कि  430 पृ्ष्ठ की एक किताब में उसे पूरा का पूरा समेट पाना असंभव बात है। मैंने वहां स्वीकार भी किया है कि उनकी जीवनी के दसियों वर्सन संभव हो सकते हैं, जिनमें से एक यह है। बावजूद इस विनम्र स्वीकारोक्ति के, वहां किया यह गया है कि तमाम संभावित वर्सन के प्रतिनिधि तत्व यहां आपको दिख जाएंगे। यह चीज इस किताब को गहन और यादगार बनाती है। वैसी, जैसी कि मैं लिखना चाहता था।


लेकिन, सौ बात की एक बात यह है, जैसा कि मैंने किताब की भूमिका में लिखा भी है कि दो-चार साल यदि इस किताब के साथ और बने रहने का अवसर मुझे मिला होता तो यह और भी ज्यादा हू-ब-हू हो सकती थी! लेखक के इस 'किन्तु,परन्तु' का क्या जवाब हो सकता है? बस केवल हम यही याद कर सकते हैं कि पुराने जमाने के हमारे लेखक समूचा जीवन लगाकर भी बस एक किताब ही क्यों लिख पाते होंगे!



Friday, February 4, 2022

एम्हर जे पढ़लहुं-5. प्रणाम बाबा/ कीर्तिनारायण मिश्र


 

समयबोध सं लैस सरलताक कवि
तारानंद वियोगी

कीर्तिनारायण मिश्र मैथिलीक वरिष्ठतम कवि लोकनि मे अन्यतम छथि। पछिला साठि वर्ष सं बेसिये समय सं ओ मैथिली मे कविता लिखैत रहला अछि। एहि बीच अनेक युग, अनेक पीढ़ी, अनेक काव्यान्दोलन बीति चुकल अछि। हुनका सदैव साहित्यक गतिविधि मे आ काव्यलेखन मे सक्रिय देखल गेल। मैथिली मे यात्रीक प्रथम पीढ़ीक शिष्य लोकनि मे सं एक प्रमुख ओ छथि तं राजकमल चौधरीक घनिष्ठ मित्र लोकनि मे सं अन्यतम वैहटा छथि जे एखनहु सृजनशील छथि। एखन हाल मे जे हुनकर कवितासंग्रह 'प्रणाम बाबा' नवारंभ सं आएल अछि, से हुनकर कवित्व आ संवेदनाक एहि समुच्चा यात्राक अविस्मरणीय स्पंदन सब लेने प्रकट भेल अछि। अनेको ठाम एहि संग्रहक कविता सब सजग पाठक कें विस्मय सं भरि दैत छैक, आ ठोस कारण दैत छैक जे मैथिली कविताक विकासमानता पर किएक मुदित हेबाक चाही।
            संग्रह मे 37 गोट कविता संकलित छैक। ई कविता सब एक चूड़ान्त संवेदनशील वरिष्ठ नागरिकक अनुभूतिक संसार मे हमरा लोकनि कें ल' जाइत अछि। अद्भुत अछि एहि संसार कें देखब। वृद्धक जीवन के संपूर्ण सकार्थता एतय प्रकृति आ पर्यावरणक संग नव पीढ़ीक नेना सभक संग एकलयता आ एकतानता मे व्यक्त भेलैक अछि। फूल-पात, गाछ-वृक्ष, चिड़ै-चुनमुन, तरह-तरहक प्राणी-संसार जे मनुक्खक संग अपन सहअस्तित्व जारी रखबाक लेल लालायित अछि। मुदा, एम्हर मनुक्खक की मंशा छैक? किएक ओ गाछ सब कें काटने चलि जाइए आ कंक्रीटक जंगल पसारने जाइए? जे पृथ्वी प्रेमपूर्ण सहअस्तित्वक पुकार संग चौबीसो घंटा भयानक घूर्णनो मे अपन संतुलन बनौने नाचि रहल अछि, ओहि पृथ्वी पर किएक प्रेमक बदला घृणाक आबोहवा एते पसारि देल गेलैए जे एहू कवि कें कहय पड़ैत छनि-- 'नीक हो जं अहांक जन्म नहि होअए/ नहि देखू ओ संसार/ जकर हम क' रहल छी निर्माण/जकरा हम बना देने छी विषाक्त/ एहि विनाश-गृह मे तं होइत छैक/ मात्र घृणा केर संचार।'(अजात शिशुक नाम)
            एहि संग्रह मे आरो बहुत रास कविता सब अछि जे अपना देश-समाजक वर्तमान परिस्थिति सभक मादे अत्यन्त वेधकताक संग लिखल गेल अछि। बहुत रास विडंबना तं एहनो छै जाहि सं समुच्चा दुनिया प्रभावित अछि आ अपन देश-समाज सेहो। आजुक घृणामूलक ओछ राजनीति पर, आ एहि राजनीति के द्वारा बनाओल गेल विकासक माडेल पर तं कैकटा कविता अछि जे भीतर धरि बेधैत अछि। ई दुनिया स्वार्थान्ध मनुक्ख सभक द्वारा कते भीषण नरक बना देल गेल अछि, से बात कत्तहु नहि बिसराइत छैक-- 'बाज भाइ बाज/ एम्हर छउ नेता, ओम्हर दलाल/ बिचला रस्ता पर शोणित के थाल/ हत्या मे कटबें कि होयबें हलाल/ बाज भाइ बाज।'(चल भाइ चल)
            मुदा, एहि कवितासंग्रहक खूबी बहुत पैघ अछि जे ई सबटा अधलाह पक्ष पृष्ठभूमि मे रहैत छैक। सामने जे दृश्य देखाइत छैक ओ बहुत आनंददायक आ प्रेरक अछि। एकरा सब कें देखने बेर-बेर सेहन्ता जगैत छैक जे हं, जीवन कें एहने प्रेमपूर्ण, एहने सद्भावना आ निश्छलता सं भरल, एहने सुंदर सहअस्तित्वक आगार हेबाक चाही। ई एक एहन विशेषता अछि जकरा लेल एहि संग्रह के महत्व सदा बनल रहतैक। मुदा की एहन कविता लिखि सकब कोनो आसान बात थिक? नहि। आसान तं नहियें, बहुत कठिन बात थिक। कीर्तिनारायण मिश्र-सन क्यो सिद्ध कविये एहन कविता लिखि सकैत छथि।
             एना कोना संभव भ' सकल अछि ताहि पर जं एक नजरि दी तं बात किछु साफ भ' सकैत अछि। एहि कविता सभक मुख्य विषय थिक बच्चा, दोसर गाछ-वृक्ष, तेसर चिड़ै-चुनमुन। आ अंत मे एक वृद्ध जे बच्चा सभक पितामह-तुल्य छथि आ एहि समस्त विषय सभक प्रति नितान्त संवेदनशील, सद्भावपूर्ण छथि। बच्चा सब केहन? 'गिलसी भरि- भरि/ हुलसि-हुलसि/ गमला मे दइ छथि पानि/ फूल-पात सं की बतियाबथि/ कोना सकब हम जानि?'(तारा) आ, गाछ-वृक्ष केहन? सहअस्तित्व लेल सदा यत्नशील-- 'कखनहु फूल, कखनहु पात खसबैत अछि/ गाछ-वृक्ष खिड़की सं रोज बजबैत अछि।'(से सभ की जान' गेल)
             'गिल्लू' एकटा लुक्खीक बारे मे अछि जे झाड़ीक दोग सं हुलकी मारि जखन भागि जाइत अछि तं कवि कें आश्चर्य होइत छनि जे मैथिल कन्याबला ई कला ई कोना सिखलक? मुदा जखन दोस्ती भेलैक, बेसी काल लगे मे आबि खेलय लागल। आ कवि जखन ओहि परदेस सं विदा होअय लगला, घरबे कें कहैत छथिन-- 'छोड़ि क' जा छी अहां लग ई दुलारू बेटी/ हमरा सब जतय रहब अहां लोकनि मोन पड़ब/ संगहि मोन पड़त अहांक ई चंचल प्रतिवेशी।'(गिल्लू)
             तहिना, 'रुस्सा-फुल्ली' कविता एक बछरूक बारे मे अछि जे अपन माय सं रुसल अछि-- ' हमर-अहां के देखा-देखी/ मुंह लटकायब सीखि गेल अछि/ अप्पन बछरू/ माय थुथुन सं देह हंसोथइ, ओ नहि डोलय/ सींग सटा गुदगुदी लगाबइ आंखि ने फोलय/ चुम्मा लइ छै, नाक घसइ छइ/ हंफिया-हंफिया पुचकारै छइ/ किन्तु ने ओ कनियों टसकइ छइ/देखि-देखि ई रुस्सा-फुल्ली/ हम चिन्तित छी।' तहिना, एकटा कौआ अछि जे मनुक्खक जाबन्तो चलाकी कें पकड़ि लेलक अछि आ ओकरा भगाबक लेल जे बिजूखा खेत मे ठाढ़ कयल गेलैए ओकरे माथ पर बैसि क' 'पांखि खजुआबैत अछि, चोंच पिजबैत अछि/ फूल चोंचिआबैत अछि/ आ फड़ तोड़ि क' उड़ि जाइत अछि।' कते कहल जाय, चमौटीबला कुकूर अछि, निश्छल-निर्भीक छोटकी फुद्दी अछि, पड़बा आ मैना अछि, रंग-रंगक चिड़ै सब अछि।
             कोनो कोंढ़ी सं फूल बनबाक एक प्राकृतिक प्रक्रिया होइ छै जाहि पर कहियो ध्यान दी तं अहां आश्चर्य सं भरि सकै छी। प्रात:भ्रमण पर बहरायल वृद्धकवि कें एहि आश्चर्य संग मुलकात पार्कक बेंच पर बैसल-बैसल होइत छनि। गाछ मे तीनटा कली छै जकर अपन-अपन अवस्था आ मुद्रा छैक, एक स्मितिक संग अपन पुट खोलैत, दोसर अपन निद्रालस तोड़ैत, तेसर प्रत्येक सिहकी पर अनेरे डोलैत। तहिना समुद्र, जे कवि कें भरि-भरि राति सोर करैत रहै छैक आ भोरे जखन भेंट होअय तं कविक संग चिक्का-दरबड़ खेल खेलाइत अछि। बहुत किछु अछि पृथ्वीक पर्यावरण मे, जकरा दिस स्वार्थान्ध संसारक ध्यान तं रौरव हाहाकारक कारण नहि जाइत छैक मुदा जे सब मिलि क' एहि आतंकपूर्ण समयक परिपूर्ण विकल्प रचैत अछि।
             एहि संग्रहक सर्वाधिक रमणीय कविता ओ सब थिक जे नान्हि-नान्हिटा बेटी सब पर लिखल गेल अछि। ओ तेसर पीढ़ीक सदस्या सब थिकी जे वृद्धकवि कें बाबा कहैत छनि। संग्रहक पहिल कविता 'प्रणाम बाबा' हमरा बड़ पसंद। ओहि मे छैक जे नान्हि बेटी अपन माय-बापक संग विदेश मे रहैत अछि, एतनी टा उमेर मे एहि महादेश ओहि महादेशक भ्रमण करैत रहैत अछि आ साल-दूसाल पर कहियो एतहु चलि अबैत अछि। कविक मोन एहि बेटी पर टांगल रहैत छनि आ ओकर सुधिक एहि समूचा अवधि मे ओ 'सालो भरि तरेगन गनैत रहैत' छथि। पछिला कोनो बेर जे ओ एतय आयल छली, बहुतो रास गाछ हुनका हाथें रोपल गेल रहैक। ओहि गाछ सभक फूलपात हरेक साल झड़ि क' पल्लवित भ' जाइत छैक। अपत्र गुलमोहर फेर पुष्पित होइए, आ जखन वीडियो कौल पर ओ प्रणाम बाबा कहैत अछि, वृद्धकवि ओकरे हाथें लगाओल गुलमोहरक लालिमा कें निहारैत विचारमग्न भ' जाइत छथि। ई विचारमग्नता बहुत मोहक हेबाक संग-संग बहुत दारुण सेहो अछि। ग्लोबल दुनिया परिवार कें छिन्न-भिन्न क' देलकैक अछि। जाहि प्रियपात्र कें सदति समीप रहबाक चाही से सात समुद्र पार बसैत अछि। टेक्नोलोजी जरूर एहि दूरी कें कम केलकैए जे इच्छानुसार वीडियो कौल भ' सकैए। मुदा, नेह-छोहक खगता एक एहन विषय थिक जे टेक्नोलोजीक भीतर अटान नहि ल' सकैत अछि।
             नान्हि बेटी सिरीजक कैक टा कविता एहि संग्रह मे छैक जे अपन संवेदना आ शैली मे विरल अछि। पुकार नहि सुनबा पर बाबा कें ई कहब जे 'बाबा अहां आब बहीर भ' गेलहुं/ हमर बात तं सुनिते नहि छी', खेल-खेल मे दोड़ैत-दबाड़ैत, सब कें पराजित करैत, अपन जीत पर ओकर ठहक्का लगायब, फूल-कली कें देखि चकित हेबाक ओकर मुद्रा, ओकर आवेशक तौर-तरीका-- 'आंखि छुअइ छथि/ कान मलइ छथि/ नाक मे दइ छथि अंगुरि घुसिया/ हंफसि-हंफसि कए, चिहुकि-चिहुकि कए/ आंखि घुमा कए, बजा रहल छथि रानी बेटी', बाबा कें नहि छोड़बा लेल जिदियायल बेटीक नान्हि अंगुरी मे फंसल धोतीक खूट-- ई सब अनेको प्रसंग छैक जे वर्णनक परिधि कें पार करैत अविस्मरणीय दृश्य बनि गेल अछि।
             कवि कीर्तिनारायण अपन काव्यलेखनक शिखर-उच्चता पर पहुंचि गेल एतय देखाब दैत छथि। हुनकर भाषा बहुत सरल भ' गेलनि अछि, तहिना भाव अधिकाधिक गंभीर। तरल संवेदना सं डगडग। कविता मे छंदक बन्धन कें तोड़बा लेल प्रतिश्रुत कविपीढीक ओ एक मुख्य सदस्य रहला, मुदा आब हुनका कविता मे छंद आबि रहलनि अछि। नागरबोध, संत्रास आ अस्मितासंघर्षक बहुतो युगीन मैथिली कविता हुनका नाम पर इतिहास मे दर्ज अछि, मुदा आब हुनक दृष्टिपथ पर वैकल्पिक संसारक अव्याख्येय सुंदरता आबि रहलनि अछि। अपना सभक मैथिल समाज मे बुढ़बाक गूंह गीजब केवल मोहाबरे टा मे नहि, वास्तविको मे चहुंदिस देखबाक हमसब अभ्यस्त छी। स्वयं पं. गोविन्द झा लिखलनि अछि जे बुढ़ारी मे लोक कें पाछू दिस दू टा आंखि निकलि अबैत छैक। मने, अतीत टा देखाइत छैक, अनन्त बितलाहा प्रसंग सब। कीर्तिनारायण मिश्रक कविता मे हमरा लोकनि उनटा पबैत छी। पाछू दिस नहि, एक जोड़ी आओर आंखि आगुए दिस निकललैक अछि जे आगामी पीढ़ीक सौन्दर्य कें, ओकर चमत्कारभरल चिंतन कें, ओकर तर्कातीत कार्यव्यवहार कें अजस्र सद्भावनाक संग देखबा मे सक्षम अछि। बहुत आनंदक विषय थिक ई सब। नवतुरिया पीढ़ीक एहि आनंदोत्सव मे एहि तरहें लहालोट होइत एक यात्रिये कें देखलियनि कि एक जीवकान्ते कें।
             प्रसिद्ध कवि जीवकान्त अपन काव्ययात्राक आखिरी चरण मे अपूर्व बालकविता सब मैथिली मे लिखने छला। सरल भाषा आ सुरेबगर छांदस-शैलीक ओ कविता सब हिनका पढ़ैत सेहो मोन पड़ैत रहैए। तं की कीर्तिनारायण ई संग्रह बालकविता-संग्रह छी? किन्नहु नहि। जीवकान्तक विषय प्रकृति आ बच्चा छलनि आ टारगेट पाठक सेहो बच्चे। कीर्तिनारायणक कविता संवेदना मे गज्झिन, गंभीर अभिप्राय सं भरल, अपन समयबोध सं लैस, वैकल्पिक पथ तकबाक चेतना सं परिपूर्ण कविता सब थिक जकर टारगेट चेतन पाठक थिकाह। आधुनिक मैथिली कविताक इतिहास मे एहि संग्रहक छपब एक यादगार घटना जकां हमरा मोन रहत।
              



            

Tuesday, January 18, 2022

एम्हर जे पढ़लहुं-4. अक्ष पर नचैत/ केदार कानन

 


अक्ष पर नचैत जीवकान्त, जेना पृथ्वी
तारानंद वियोगी

ई किताब (अक्ष पर नचैत, लेखक केदार कानन) एक अद्भुत कृति थिक। ई संस्मरणक किताब छी, किएक तं एहि मे पुरान समयक घटनावलीक स्मरण छैक, जाहि मे कवि केदार काननक अपन जीवन, परिवेश आ पर्यावरणक पूरा सुगन्धि सेहो पसरल छै। मुदा ई किताब पत्र-साहित्य सेहो छी कारण एकर लिखल जेबाक मूल आधार मैथिलीक एक महान लेखक जीवकान्तक पत्र थिक। मुदा जखन हम एहि किताबक संरचना आ महत्व पर चैन सं सोचै छी तं स्पष्ट लगैत अछि जे ई मैथिली साहित्यक सृजनात्मक इतिहास के एकटा खंड थिक जकर विषयवस्तु बीसम सदीक आठम आ नवम दशक छै।
              मैथिली साहित्यक इतिहास सब जे एखन धरि लिखल गेल अछि से कोना संकीर्णता सं ग्रस्त, एकभग्गू, बकनायल अछि, आ ज्ञान देबाक बदला ज्ञानप्राप्ति कें कठिन बनबैत अछि, ताहि पर राजमोहन झा सं ल' क' विश्वेश्वर मिश्र धरि लिखि गेल छथि आ अन्यत्र हमहू लिखने छी। मोन पड़ैत अछि, राज मोहन झा बारंबार ई आशा करथि जे मैथिलीक वास्तविक इतिहास नवतुरिया लोकनि लिखता। मुदा से कोना लिखता, आ ओ केहन होयत एकर कोनो स्पष्ट स्वरूप किनसाइते किनको लग मे हेतनि। एहि किताब कें देखने ओ बात हमरा मोन पड़ि गेल अछि आ लागल अछि जे ओ इतिहास एहने हेतै। ताहि पर सं एकर खास विशेषता छै जे मैथिली साहित्य मे जं अहांक रुचि आ उत्सुकता हो तं एहि किताब कें एक सीटिंग मे शुरू क' क' समाप्त क' सकै छी, तते पठनीयता सं ई महमह करैत अछि।
              किताबक नाम देलनि अछि--अक्ष पर नचैत। ई शब्दावली जीवकान्तक लेल प्रयोग कयल गेल एक यथार्थ कथन छी। अक्ष पर पृथ्वी नचैत अछि। पृथ्वी कें चैन नहि छै, ने स्वार्थ। सर्वसहा आ अनंत धैर्यक प्रतीक तं ओकरा कहले जाइत अछि। ई सब गुण जीवकान्त मे छलनि। लक्ष्य रहनि मैथिली साहित्यक चतुर्दिक विकास, जेना पृथ्वीक लक्ष्य अपन नाचब सं अपना कें जीवनक वासयोग्य बना क' राखब थिक। मैथिली मे यात्री आ राजकमलक बाद जीवकान्त प्राय: पहिल लेखक भेला जे अपन लेखन सं पूर्ववर्ती-समवर्ती लोकनि कें सर्वाधिक असुविधा मे दैत रहला‌ मुदा अपन बादक पीढ़ीक लेल सर्वाधिक उपयोगी प्रेरणाकेन्द्र बनल रहला। तें जीवकान्तक निधनक बाद हुनका पर केन्द्रित एक सं एक सुंदर आ पठनीय किताब हम सब छपैत देखि रहल छी। संस्मरणकृतिक सुंदरता केवल लेखकक क्षमताक परिचायक नहि होइत अछि, चरितनायक के जीवन मे कतेक सुंदरता आ स्पृहनीयता छै, तकरो पर निर्भर करैत अछि। तें एहि किताब कें केदार आ जीवकान्त, दुनू गोटेक जीवनसौन्दर्यक उद्घाटक कृति कहल जेबाक चाही।
              किताब शुरू होइत छैक 1975क एकटा प्रसंग सं, जे केदारक तरुणाइ मे पहिल बेर कविताक प्रवेश कतय आ कोना भेल। हमसब देखैत छी जे एहि घटनाक लगले बाद हुनका जीवन मे जीवकान्तक प्रवेश भ' जाइत छनि। आ, किताबक समापन होइत अछि 1991क सितंबर मे लिखल जीवकान्तक एकटा पत्र सं।अर्थात 1975-91क समय थिक जे अपन भिन्न-भिन्न रूप आ तेवरक संग एहि किताब मे आयल अछि। जीवकान्तक निधन 2013 मे भेलनि, मुदा ताहि सं दस बरस पहिनहि 2003 मे केदार ई पुस्तक लिखि चुकल रहथि। एतय धरि जे एकर पांडुलिपिक अवलोकन जीवकान्त अपनहु कयने छलाह। तखन ओ जे अपन टिप्पणी केदार कें पठौने रहथिन, सैह एहि किताबक ब्लर्ब पर छापल गेल अछि। जीवकान्त लिखलनि-- 'एकटा नदी अछि। ओ बहैत अछि। गीत गबैत अछि। ओकर गीत सुनबा लेल कान चाही। से कान जकरा सुनत, से सुनत। यमुनाक एक हजार नाम छनि। एकटा नाम छनि-- नदी। तकर अर्थ छैक जे नाद करैत होअय, कदाचित गीत गबैत होअय। अहांक एहि रचना मे से गीत अछि। से एकरा पठनीय आ स्वागत-योग्य बनबैत अछि।'
              जीवकान्त मैथिलीक एक विराट लेखक छला, मुदा समुच्चा समय मैथिली साहित्य मे हुनकर विरोधे होइत रहलनि। कारण आर किछु नहि, बस एतबे जे ओ एक निधोख लेखक छला आ अपन प्रतीति कें, अपन विचार कें निर्द्वन्द्व रूपें लिखि जाइत रहथि। प्रतिदिन नियमित रूप सं लेखन केनिहार लेखक मैथिली मे नहिंयेक बराबर, जं क्यो हेबो करथि तं हुनका सब मे जीवकान्त सर्वोपरि। एहि कारण सं ओ अनेक-अनेक विधा मे लेखन केलनि। सब सं मारुख होइत छलनि हुनकर टिप्पणी जे कि ओ पांच सौक करीब लिखने हेता मुदा जकर कोनो संग्रह एखनो धरि नहि प्रकाशित भेल अछि। आशा करैत छी, 'जीवकान्त रचनावली' सं ई सब वस्तु फेर सं देखार पड़त। पत्र लिखबा मे तं जीवकान्तक क्यो जोड़े नहि छला। पत्रलेखन सेहो हुनका लेल साहित्यलेखने सन पवित्र आ सृजनात्मक काज छलनि। एहि पत्र सब कें पढ़ू तं पता लगैत अछि, अपन एहि मातृभाषा मैथिली मे केहन-केहन सदाशय ऋषि लोकनि काज क' चुकला अछि।
              कल्पना करू एकटा एहन समयक जखन मैथिली साहित्यक परिदृश्य मे हरिमोहन झा मौजूद रहथि, यात्री जीक सक्रियता अपन चरम पर छल, सुमन जी, मधुप जी, किरण जी, अमर जी, सब गोटे अपन सर्वोत्तम द' चुकलाक बादो रचनाशील रहथि। धूमकेतु, राजमोहन झा, प्रभास कुमार चौधरी, जीवकान्त, गंगेश गुंजन, उदयचंद्र झा विनोद सर्वोत्कृष्ट लिखबाक प्रक्रम मे नित नवीन तरहें सक्रिय छला। 'मिथिला मिहिर' साप्ताहिक छपैत छल आ ओकर प्रत्येक अंक एक उत्सुकता, एक विचारोत्तेजनाक संग पाठकक हाथ मे अबैत छल। एकर श्रेय छलनि संपादकीय टीम कें जाहि मे मैथिलीक दू प्रमुख रचनाकार सुधांशु शेखर चौधरी आ भीमनाथ झा छला। बादक  पीढ़ी जाहि मे महाप्रकाश, सुभाष चन्द्र यादव, सुकान्त सोम आदि छला, नव यथार्थ संगें सक्रिय रहथि। एहने मे एक नव पीढ़ीक आगमन भेल रहैक, जकरा 'नवतुरिया पीढ़ी' कहल गेल रहय। विभूति आनंद-केदार काननक संयोजकत्व मे 1982 मे, राजधानी पटना मे नवतुरिया लेखक सम्मेलन भेल छलैक। केहन अद्भुत समय छल ओ! केदारक लेखनीक विलक्षणता छनि जे ओहि समुच्चा कालखंड कें अपन किताब मे ओ मूर्तिमान क' देलनि अछि। किताब अछि तं जीवकान्तक विषय मे, मुदा एहि मे मैथिली-साहित्यक तमाम इतिहास-भूगोल, आर्थिकी आ सामाजिकी आबि गेल अछि, कारण जीवकान्त एहि समस्त चीज सं गहमागट्ट जुड़ल छला।
              संस्मरण आ आत्मकथा तं बहुतो गोटे लिखने छथि। मुदा, ओकरा बहन्ने मैथिली साहित्यक इतिहास के ओ कालखंड मूर्तिमान भ' उठल हो, एहन कम्मे भेल अछि। कहबे केलहुं जे एहन कृतिक सफलता एहि बात पर निर्भर करैत छैक जे चरितनायकक जीवन मे सौन्दर्य कतेक छैक! आशा करैत छी, नव पीढ़ीक संग-संग पुरानो लोकक लेल ई किताब उत्प्रेरकक काज करत। (प्रकाशक अंतिका प्रकाशन, दिल्ली। किताब अमेजन पर उपलब्ध अछि।)

Tuesday, December 28, 2021

एम्हर जे पढ़लहुं-2 दकचल समय पर रेख/कृष्णमोहन झा मोहन


दकचल समय पर कविक घीचल रेख

                            तारानंद वियोगी


 'ग्लोबल गाम सं अबैत हकार'क कवि कृष्णमोहन झा 'मोहन'क दोसर कविता-संग्रह बहराएल अछि। एहि संग्रहक ओ नाम रखलनि अछि-- दकचल समय पर रेख। संग्रह देखि पहिल तं ख्याल यैह आएल जे चारि-पांच साल पहिने जे हकार आएल छल तकरा स्वीकार क' लेल गेल। आ एतबी दिन मे हालत ई बनलै जे तमाम समय दकचा गेल अछि। मुदा, ई कवि हारि मानय बला जीव नहि छथि। एहि आशयक एकाधिक कविता एहि संग्रहो मे संगृहीत छै जतय ओ कहै छथि जे हारल नहि छी, वा कि संघर्षे हमर उत्कर्ष थिक। तें दकचलो समय पर अपन रेख घीचब हुनका जरूरी लगलनि अछि।

            मोहन जीक कविताक कैक गोट विशेषता सब अछि जे पहिलो संग्रह मे देखार पड़ल छल आ एहू मे देखाइत अछि। अपना कविताक लेल बिम्ब कि प्रतीक कि विडंबना ओ समकाल सं उठबैत छथि, आ एना करैत वाजिबे कविरूढ़ि सं बाहर निकलबाक चेष्टा रहैत छनि। तहिना, अप्पन अनुभव हुनका लेल सर्वाधिक मूल्यवान रहलनि अछि, आ एहि कारणें ओ समकालीन कविता कें कैकटा नब मोहाबरा प्रदान करबाक यश प्राप्त केलनि अछि। हुनक काव्यभाषा सुरुहे सं वर्णनात्मक रहलनि अछि, मुदा खूबी ई छनि जे कैक गोट दुर्लभ चित्र घीचि पबैत छथि जे पाठक कें बहुत दिन धरि मोन रहि जाइत अछि।

            अपन दकचल समयक पहचान लेल हम एहि संग्रह कें पढ़ैत छी। अपन काव्यलेखन-कर्म कें परिभाषित करैत एक ठाम लिखलनि अछि--'समयक मुंह पर साटल विज्ञापन सब कें ओदारि रहल छी।' वाजिबे। विज्ञापनक खगते एही लेल पड़ैत छैक जे कोनो झूठ प्रचारित करबाक रहै छै। बड़का-बड़का होर्डिंग सब जहां-तहां चमचमाइत देखायत, सब क्यो देखैत छी। मुदा कविक अनुभव की छनि? एक ठाम कहै छथि-- 'ओकरा होर्डिंगक छाह सं हमर चिनबार अन्हार होइत जा रहल अछि।' चिनबारक अन्हार होयब की थिक? अपन परंपराक, अपन मूल्यक ध्वस्त होयब। आम आदमीक पराभव मे कविक पराभव निहित छैक। विज्ञापन मे इजोत छैक जखन कि वास्तव मे अछि अन्हार। इजोतक एते विज्ञापन होइत देखि एकर असार-पसार पर कठोर व्यंग्य करैत छथि-- 'अन्हार गरीबक गंजी जकां गुदरी-गुदरी भ' गेल अछि।' एक ठाम विकल्पहीन लोक-समाजक दुर्दशा पर कहै छथि-- 'झूठ-सांचक जंगल मे औनाइत लोक पांगल गाछ जकां विकल्पहीन, मात्र छिप्पी परहक चतरल हरियरी कें अपन विकास मानि रहल अछि।' औनाइत लोक, ओहू मे झूठ-सांचक जंगल मे, ओकर नियतिये आर की भ' सकैत अछि? एक कविता मे कहै छथि-- 'बड़ कठिनाह लगै अछि एहि समय कें फटकब, झूठ-सांच कें झटकब-ओसायब, बिछब-बेरायब।'

            झूठ-सांचक ऐश्वर्यक प्रताप आ परिणाम अनेक कविता मे आएल छैक। एक ठाम कहै छथि-- 'एकरे सभक अट्टालिका पर ओंगठल अकास मे उड़िया रहल छै तूरक फाहा जकां समयक विश्वास, उधेसल सरोकार, आ जिनगी अपनहि गामक गाछी जकां डराओन, त कखनहु आन गामक पोखरि जकां भयाओन होइत जा रहल अछि।' मुदा मुश्किल ई छै जे समयक जे रूप कवि कें देखार पड़ै छनि, हुनकर समाज एकरा देखि पयबा मे असमर्थ अछि। किए? एक ठाम सेहो बतबै छथि-- 'समयक फरेब मे घुरमुड़िआएल जिनगी, सेहन्ताक कोनो खोप मे सुस्ता रहल अछि।' देश नहि, समाज नहि, मनुष्यता नहि, एकमात्र सत्य बचि गेल अछि निहित स्वार्थ, स्वार्थ सधि रहल अछि तं सब ठीक अछि आ अपने ओ सुस्ता रहल अछि, जहिया एकरा सिर पड़तै तहिया देखल जेतै। जकरा सिर पड़ि चुकलैए, एहि संग्रह मे तकरो प्रसंग कविता अछि-- 'अगिलग्गीबला घरक खाम्ह छलाह, जकरा पर फेर कहियो बड़ेरी नहि चढ़लै।'

            एकटा कविता छनि 'सींघबला लोक'। ओकर आरंभ एना केने छथि-- 'जखन-जखन कोनो धूर्त महानताक माथ पर देखैत छी हम प्रतिष्ठाक पाग, हमर चोखाएल घाओ फेर सं पिजुआ जाइत अछि, आ भीतर-भीतर फिनगय लगैत अछि।' केहन भयावह एकाकीपन छै विवेकी लोकक? 'धूर्त महानता' प्रतिष्ठित अछि तं विवेक के कोन काज? क्यो जं संवाद करितो अछि तं की संवाद करैत अछि? आ तकर परिणाम की बहराइत छैक? एक ठाम लिखलनि अछि-- 'ओहि अपरतीब समय मे जखन देमय लगै छल कियो भाग्यवादी उपदेश, कमठौनीक खियाएल खुरपी सं कोनो ने कोनो बीट कटि जाइत छल।' भयावहताक अनुमान करू। बीटक विकास लेल कमठौनी कयल जाइ छै। मुदा, वैह बीट ओही खुरपी सं मारल चलि जाइत अछि। एहना मे के ककरा सं संवाद करौ? मोहन जीक कविता सं पता लगैत अछि, एहि दकचल समय के जते संताप मिथिला पर पड़लैए, से अतत्तह भयानक अछि।

            'समय सं संवाद' कविता मे समयक चिन्हास बतबै छथि-- 'जेना कुरुक्षेत्र मे फेर सं शुरू भ' गेल हो महाभारत, जेना सिकंदर आबि गेल हो भारत विजय करै, जेना जलियांबाला बाग मे तड़तड़ा रहल हो अंग्रेजक बंदूक।' एक दोसर कविता मे कहै छथि-- 'जेना धर्म सं मनुष्यता कें कोनो सम्बन्ध नहि।' कवि पर जे एहि समयक प्रभाव प्रतिक्षेपित होइ छै, हुनकर बिम्बक टटकापन देखल जाय-- 'गोबर औंसल अंडी जकां, आ कि पाथर राखल पथारक खेरही जकां, हमर चानि चनचनाब' लगैत अछि।' यात्रीजी कहैत रहथिन, कवि जखन बहुत अधिक सीदित होइत अछि तं ओकर कविता श्राप मे परिणत भ' जाइछ। मोहन जीक श्राप देखू-- 'नोरक ई बुन्न सम्हारि क' राखि लिय', भविष्य मे काज देत सम्बन्धक दर्द पीबा लेल।'

            दकचल समयक आरो बहुत रास चिन्हास एहि संग्रह मे अनेक ठाम आएल अछि। एकठाम कहै छथि-- 'आइ चेहरा देखि क' आदमी कें आदमी कहब मोसकिल अछि।' तहिना, 'आइ घर शहर मे अछि, आ कि शहर घर मे, कहब मोसकिल अछि।' एक ठाम शहर कें परिभाषित करैत कहैत छथि-- 'शहर माने होइत छै सपनाक व्यापार।' शहर आ गाम के बीचक जे सम्बन्धशास्त्र छै, देशव्यापी तालाबंदीक स्मरण करैत छथि-- 'कतेको गोटे देशक भूगोल आ इतिहासक काते-कात, चलैत चलि जा रहल छल गाम।' जहां धरि कविक अपन स्थितिक प्रश्न अछि, एक कविता मे कहै छथि-- 'एहि बाजारू सुख-सपना सं जखन कखनहु भक खुजैत अछि, हम अपने भीतर बनैत मरुभूमि देखि डेरा जाइत छी, भविष्यक अंदेसा मे हेरा जाइत छी।'

            जहां धरि मोहन जीक काव्ययात्रा मे पड़ाव आ विकासक प्रश्न अछि, कवर-फ्लैप पर छपल कृष्णमोहन झाक एहि कथन सं हम अपना कें पूरा सहमत पबैत छी जे 'दोसर संग्रह हिनक पहिल संग्रहक विस्तार आ पूरक प्रतीत होइत अछि।'

            कवर पर वंदना तोमर के चित्र छापल गेल अछि, जे एक कलाकृतिक रूप मे अपन खास पहिचान बना पाबि रहल अछि। दकचल समय पर रेख घीचब सेहो कते मननीय आ सौन्दर्यपूर्ण भ' सकैत अछि, तकरा एतय देखल जा सकैत अछि। कवि, चित्रकार आ प्रकाशक तीनू कें बधाइ छनि।

            

Sunday, December 12, 2021

माछ मनुक्खक बीतल गाम राजकमल चौधरी



"माछ मनुक्खक बीतल गाम"

(भवानन्द मामा , लालजी, आ गुलो, 

–एहि तीन व्यक्तिक हेतु)

 *राजकमल चौधरी* 


प्रत्येक शब्दक एकटा विशेष अर्थ अछि, जेना एकटा सुतल गाम, आ मिझायल घूर पर सुतल कुकूर ....

कविता ककरा कही ? 

आ प्रेम ??

अन्हार पानिक अन्हार तल मे छह छह करैत दू-टा माछ (दुनू रोहू ?) 

ककरा ताकि रहल अपस्यांत ?

प्रत्येक शब्दक एकटा विशेष प्रयोजन अछि, जेना 

एकटा पाकल आम , एकटा टूटल मचान पर .....

      एकटा टूटल मचान ।

               (दू) 

अन्हार पानिक अन्हार तल मे छह छह करैत .....

हम (अर्थात हम्मर विशेष अर्थ )

एक युग सँ एक युगान्त धरि , 

ताकि रहल छलहुँ 

एकटा नीलमणि माछ

अर्थात एकटा माछ आ एकटा नीलमणि निन्न  आ इजोत 

दुन्नू हमरा ओहि वयस मे आँजर पाँजर छल ।

धेमुड़ा-नदीक धार हमरा बड्ड प्रिय ;

नाहयाबक,

 छेपी नाह सँ बाँसक छीप जकाँ 

कूदि जयबाक ,

सेहन्ता पूर नहि भेल

मुदा आँगन मे रोहू माछ आयल, त' सभसँ पहिने –

हमरे बाटी मे परसल गेल ,

तेल मे डूबल, लाल  भेल , गाभिन माछ 

पहिल अमाओट आ अचार 

धेमुरा नदीक पानि मे नचैत रहलीह कोसिका ;

घड़ी- घन्ट झनकैत रहल 

तारास्थान मे ;

भोर-साँझ शतरंजक पिहकारी सँ दलान,

घोक तरक मुस्कीक आँगन 

सह सह करैत ;

पावनि-तिहार आन-गाम-वाली गबैत छथि तिरहुत त हमरा चारूकात आम्रवन , 

मंजरिक मातल सुगन्ध सँ बताह 

ई प्रान ।

तारा स्थान मे घड़ी-घंट झनकैत रहल ,

आ हम तकैत रहलहुँ 

एकटा नीलमणि माछ 

– तिरहुत गीत मे 

अन्हार पानि मे ।

             (तीन)

श्री हरिमोहन झा कहिया लिखने छलाह "कन्यादान " ?

मुदा अप्पन अल्पवयसक ओहि निर्मम 

चपलता मे ,

कतेक बेर हमरा बुच्ची दाई सँ 

ममता आ अनुराग होइत छल ओहिना, अकारण ,

होइत छल –

पुरईनिक पात मे डूबल एहि पोखरिक भखराल घाट पर बैसल 

रहि जाई ―

राति भरि 

राति राति भरि ।

(चारि)

पृथ्वीक अंतिम देवता छलाह राजा सातवाहन ......

हम फुदन  चौधरीक पौत्र 

बुधवारे -मूल महिसी ग्रामक सन्तान 

पृथ्वीक अंतिम मनुक्ख रहि गेल छी ।

अंतिम देवता छलाह सातवाहन 

हमर वाहन थिक 

― हमर अर्थ ।

(पाँच)

आन कविता मे ई कहब आवश्यक नहि अछि, जे हम अपन अर्थ 

ताकि रहल छी अन्हार पानि मे ।

निन्न आ इजोत एखनहुँ 

आन कोनो सार्थकता सँ बेसि प्रिय  छथि 

हमरा हेतु ।

......हमर ओ महिसी-गाम बीति गेल अछि ;

हाट बाजार मे बिका गेल अछि 

एकटा नीलमणि माछ, 

कोसिका धेमुड़ा केँ  विखदन्त कारी डराडोरि मे नाथि देलक जनक्रोध,

छेपी नाह सँ कूदि जयबाक,

बड़ी काल धरि 

डूबल रहि जयबाक सेहन्ता नहि पूरल ।

मुदा,

एखनहुँ कोनो अधविसरल नाम 

हमर देह मे ,

हमरे आँखि मे ― 

'रोहू माछ जकाँ 

छह छह करैत अछि 

अन्हार अछि 

पानि " 

राजकमल चौधरी 

21 10 65 

      (एहिअप्रकाशित कविताक स्रोत-- डा. गंगेश गुंजन)

Saturday, December 11, 2021

एम्हर जे पढ़लहुं-1 जनम जुआ मति हारहु हो/हरिदास

 

धोखे काहे बिगाड़हु हो

तारानंद वियोगी


मैथिली मे अइ किताबक प्रकाशन एक घटना थिक, जकर असर बहुत दिन धरि कायम देखल जेतै। से बहुतो कारण सं। पाठक एकरा पढ़ता तं अपनहु बुझता, मुदा किछु बात एतय हमहू कहै छी।
        विधाक दृष्टियें देखी तं ई आत्मकथा, वा एकर संक्षिप्तता कें देखैत से कहब पसंद नै हो तं, संस्मरण विधाक किताब छी। मुदा एकर अस्सल महत्व एकर ऐतिहासिकता मे छै। सब गोटे जनै छी जे इतिहासक मामला मे मिथिला बड़ अभागल रहल अछि। जै बात सब कें सार्वजनिक रूपें जनाएल जेबाक चाही, तै बात सब कें एतय सब दिन झांपि-तोपि क' राखल गेल। मिथिलाक वास्तविक इतिहास सब दिन मौखिक रहल जे पीढ़ीक संग विलुप्त होइत चलि गेल। तखन इतिहासक नाम पर लिखल गेल कथी? मुकुंद झा बक्शी 'मिथिला भाषामय इतिहास' लिखलनि। 'मय' के अर्थ एतय 'मे' बुझबाक चाही। मने मैथिली भाषा मे मिथिलाक इतिहास। ई की छल? महामहोपाध्याय जी खंडबला वंशक कथा लिखने छला, एखन हाल मे अइ दुर्लभ किताब कें 'खंडबला राजवंश'क नाम सं प्रकाशितो कयल गेल अछि। मानू तं किताबक अशुद्ध नाम कें एकैसम सदी मे आबि क' शुद्ध क' देल गेलैए। एक राजवंशक इतिहास भेल मिथिलाक इतिहास। बाद मे जखन तकनीकी इतिहास-ज्ञान बला लोक सभक प्रवेश अइ क्षेत्र मे भेल तं ओ लोकनि खंडबलाक संग ओइनवार आ कर्णाट राजवंश कें सेहो जोड़ि लेलनि। एतद्धि रामायणम्। मिथिलाक जन-इतिहास लिखबाक बात तं बहुत दूरक गप भेलै, महाराजी सीमा सं बाहर जे प्रभावशालियो लोकनि छला, जेना महंथ लोकनि, आन-आन जमींदार लोकनि, नगरसेठ लोकनि, संत आ फकीर लोकनि, कते कहल जाय, हिनका सभक कोनो इतिहास नहि आएल। ई किताब यद्यपि साहित्यक किताब छी, ओहू मे आत्मकथा विधाक, तें एक व्यक्ति, ओकर समुदाय, ओकर अनुभव-व्याप्ति धरि स्वभावतया सीमित अछि। मुदा, एकर लेखकक जीवनक व्याप्तिये तते पैघ छनि जे एतय हम सब आधुनिक मिथिलाक जिबैत-जागैत. इतिहास-लीला देखि सकैत छी। ओइ किताब सब जकां ई मुरदा नै अछि जीवन्त अछि, तकर कारण ई जे मानवीय अनुभूतिक तप्पत-तप्पत ऊष्मा एतय सब ठाम छिड़ियाएल भेटत। दोसर जे तरुणावस्थे सं विशिष्ट वर्गक परवरिश मे पलनिहार एकर लेखक प्रयत्नपूर्वक विशिष्टताक चोला के बंधन कें तोड़ि मुक्त भेला आ साधारण गृहस्थ जन जकां अपन जीवन-पद्धति स्वयं अपना सं चुनलनि, विशिष्ट आ तें एकाकी जीवन कें जनसंकुल बनेलनि, तें अइ मे मिथिलाक जीव-जगतक बहुतो रास मौलिक तत्व आबि क' शामिल भ' गेल अछि। बहुतो एहन विषय अछि जकरा बारे मे हमरा लोकनि सुनिते टा रही, जेना जोगी-मुनीक पवित्र बाना मे राक्षस कोना रहैत अछि, कोना कोशीक मृत्यु-तांडव गामक गाम कें जनशून्य क' दैक, कोना जखन अपन रक्तसम्बन्धी जान मारबा लेल सबतरि जाल पसारि देने रहै छै तं छोट-छोट पराया लोक, आन जातिक, आन धर्मक लोक, प्राणरक्षक बनि क' ठाढ़ होइ छै। आदि-आदि।
        अइ किताबक लेखक हरि दास छथि। दास मने चमार नहि, ब्राह्मण, नीक कुल-मूलबला मैथिल ब्राह्मण। यद्यपि कि अइ किताबो मे प्रसंग आएल अछि जे घोर जातिवादी मैथिल ब्राह्मण हाकिम हरि दास जी कें कोना चमारे बुझने छला आ बरखो दिन धरि हुनकर कमाएल रोजी कें लसका क' रखने छला। बाद मे जखन बुझबा मे अयलनि जे चमार नै ब्राह्मण थिका तं मिनटो मे कोना भुगतान भ' गेलनि। मैथिल ब्राह्मण टाइटिल मे दास देखि क' हमरा गोविन्द दास मोन पड़ि जाइत छथि, मैथिलीक महान कवि गोविन्द दास। सोलहम शताब्दी मे बेचारे न्यायदर्शन पढ़य मिथिला सं बंगाल गेल छला। ओ समय छल जखन चैतन्य महाप्रभुक रागानुगा वैष्णवभक्ति अपन चरम जनप्रियताक दौर मे छल। गोविन्द दास वैष्णव भ' गेला आ ओम्हरे, बंगाल मे, कृष्णभक्ति मे लीन, राधाकृष्णक गीत लिखैत-गबैत अपन जिनगी गुदस्त क' देलनि। ओ समय छल जखन सौंसे बंगालक वैष्णव-संप्रदाय मैथिली लिखै छल जकरा ब्रजबुलि कहल जाइ। आधुनिक युग मे कोना मैथिल विद्वान लोकनि कें गोविन्द दासक पता लगलनि, आ ब्राह्मण हेबाक कारण कोना चक्रचालि रचि क' हुनका मे मैथिलत्व आरोपित कयल गेल, तकर बहुत लंबा खिस्सा अछि। मुइल महापुरुषक दुखो तं अनंत होइ छै, भला ओ कथू मे कोना इनकार करै लेल आबि सकितथि? एम्हर हम सब युग-युग सं देखैत आएल छी जे मैथिल लोकनि वैष्णवक अकारण शत्रु होइत छथि, से जगजानित तथ्य थिक। अकारण शत्रुता किएक, ताहि बारे मे इतिहासकार उपेन्द्र ठाकुर लिखने छथि जे वैष्णव धर्म मे वर्णाश्रमक शिथिलता छैक, जखन कि मैथिल लोकनि संकुचित मनोवृत्तिक छला। 'मैथिल समाजक एक शक्तिशाली वर्ग जे अपना कें धर्मक ठेकेदार बुझै छला, एकर कट्टर विरोधी रहथि, कारण वैष्णव मतक लोकप्रियताक परिणाम होइत--ओहि विशेष सुविधाप्राप्त वर्गक विनाश।'(मिथिलाक सारस्वत साधना)
        उपेन्द्र ठाकुरक अइ कथन मे भूतकालिक क्रियाक प्रयोग भेल अछि। पूर्व मे एहन छल, तं की वर्तमान किछु भिन्न भ' गेल अछि? एकैसम शताब्दीक बसात किछुओ मिथिला कें लगलैक अछि? जी नहि, ई घृणा आरो बढ़िये गेल अछि। जं विश्वास नै हो तं 2013 ई. मे छपल मायानंद मिश्रक इतिहास मे गोविन्द दास बला अध्याय देखि लेल जाय। ब्राह्मणे हेबाक दुआरे एक जबाना मे वैष्णव गोविन्द मिथिला मे स्वीकार कयल गेल छला, मुदा हुनक दुखक नहि ओर। मायानंद मिश्र हुनका आर तं छोड़ू, एक भक्तकवि धरि मानबा सं इनकार क' गेला आ पूर्णत: तहिना एक सुच्चा शृंगारिक कवि मानलनि, जेना हिन्दी मे केशव दास। विचारल जाय, कोनो भक्तकवि जे अपन भक्ति मे लीन भ' ने केवल अपन जीवन-सर्वस्व समर्पित क' देने हो, अपन गाम-घर, देस-कोस, अपन वंश-परंपरा धरि कें तिलांजलि द' देने हो, तकरा जं काल्हि भक्तकविये हेबा सं इनकार क' देल जाय, मात्र अइ आधार पर जे हुनकर भक्ति मे वर्णाश्रमक शिथिलता अछि, तं ई केहन भयंकर अन्याय कहल जायत! मुदा, आगू कहिया हुनका संग एतय, मिथिला मे की हेतनि, के कहि सकैत अछि? मिथिला की थिक? एक अगम्य जंगल थिक जकर जयगान तं खूब गाओल जा सकैए मुदा जंगली जीव सं इतर प्राणीक सहज जीवन एतय जारी नै रहि सकैत अछि।
        ई किताब मुदा, बाहरक मैथिलक आंखि सं नहि, भीतर विद्यमान मैथिलक आंखि सं देखल वैष्णवक कथा थिक। हरि दास जी स्वयं दीक्षित वैष्णव रहथि आ मिथिलाक वैष्णव बानाक भितरिया वृत्तान्त लिखलनि अछि। समुच्चा वृत्तान्तो नहि, वृत्तान्तक मात्र एक भाग। संयोग देखू जे अहू किताब मे एकटा गोविन्द दास छथि। चनौरागंज मठक महंथ राधाचरण दासक ओहो तहिना खास अपन भातिज छथिन जेना लेखक हरि दास छलखिन। हरि दास के सुपात्रता सं प्रभावित भ' महंथ हुनका अपन उत्ताधिकारी, मने करोड़ो टाकाक जमीन्दारी के वारिश चुनने छला, मुदा जेना कि एकटा इमानदार लोकक संग होइत छै, ओ अपन आत्माक आवाज सुनैत अछि, धन-वित्तक लालच मे अपन आत्मा कें नै मारि सकैत अछि, सैह हरि दासक संग भेलै। बैरागी जीवन हुनका संतुष्ट नै क' सकल आ ओ विद्रोह क' क' गृहस्थ भ' गेला, विवाह क' लेलनि, यद्यपि कि प्रेमविवाह टाइप के कोनो रोमांस ओतय नहि रहैक। महंथ हुनका निकालि तं देबे केलखिन, हुनकर जानी दुश्मन भ' गेला। आ, हरि दासक स्थान पर जाहि दोसर व्यक्ति कें उत्तराधिकारी चुनल गेल, ओ गोविन्द दास छला।
        महंथ राधाचरणक बारे मे हरि दास बतबै छथि--'आठ वर्षक अवस्था मे ओ तपस्वीक व्रत धारण केने छला आ मुंजक मेखला, सर्वांग भस्मलेप आ धुनीक सेवन कर' लागल छला। वैशाखक तपैत दुपहरिया मे ओ चौरासी धुनी रमबैत छला। वृंदावन मे कठोर चतुर्मासक व्रत करैत छला। एहन महान तपस्वी कें कहियो धनक कमी नइ भेलनि। ओ डालमिया जैन एयरवेजक शेयरधारक मे सं छला। आगां चलि क' चनौरागंजक मठाधीश जमीन्दार सेहो ओ बनि गेला। दरभंगाक लक्ष्मीसागर महावीर मंदिरक सेहो ओ मालिक भेला। एहि प्रकारें देखी तं ओ भाग्यक सिकंदर रहला। लक्ष्मी हुनका आगां-पाछां डोलैत रहलि। मुदा ई हमरा समझ सं बाहरक बात थिक जे एहि महान योगी-बैरागी कें संपत्ति सं एते व्यामोह किएक भ' गेलनि?' ठीके ई समझ सं बाहरक बात थिक जे एक तपस्वियो जखन जमीन्दार बनैत अछि तं ओकरा असले जमीन्दार जकां रैयत कें गरीब, बदहाल, रोगग्रस्त विपन्न देखबाक हिंस्र हिस्सक लगैत छैक। लक्ष्मी कें ओ अपन वंशक भीतर बान्हि क' राखय चाहैत अछि। अन्याय आ अनीति ओकरा लेल नीति आ न्याय होइ छै। अइ किताब मे खंडबलाक राजतंत्रोक चित्र आएल अछि आ आनो आन जमीन्दारक।  खंडबला जमींदारी-व्यस्थाक एक चित्र देखल जाय, जे 1940 ई.क कोशी-विभीषिकाक संदर्भ मे आएल छैक--'अंग्रेजी सत्ता कोशीक विभीषिका सं अपन ध्यान हटा लेने छल। गोरा-सरकार कोशी क्षेत्रक जनता कें अपन भाग्यक भरोसें मरैक लेल छोड़ि देने छल। लाखक लाख लोक मरैत रहल आ सरकार निसभेर भेल सूतल रहल। (किछु गोटे कें एतय कोरोना सेकंड फेजक मृ्त्युलीलाक दृश्य मोन पड़ि सकै छनि।) आ सैह रवैया दरभंगा राजघरानाक सेहो छल।  दरभंगा महाराजेक जमीन्दारी मे कोशी क्षेत्र अबैत छल। जमीन्दार सब अपन प्रजा पर भीषण अत्याचार करैत छल। बलजोरी जमीन्दारी टैक्स असूलैत छल। समय पर टैक्स नहि देबय बला लोक कें जरैत दुपहरिया मे सूर्य दिस मुंह क' क' दूटा इट्टा पर ठाढ़  क' देल जाइत रहै। दरभंगा महाराज सेहो कोशी क्षेत्रक उपेक्षा मे कोनो कोताही नइ छोड़लनि। राजा अपन प्रजाक सुधि नइ लेलक।‌ ओ पंडितक सभा मे 'धौत-परीक्षा'क संचालन करैत रहला। भोग-विलास मे डूबल रहला। अंग्रेज सरकारक हुनका आशीर्वाद प्राप्त छलनि। उच्च वर्ण दरभंगा महाराजक अपन रहलनि, एहि सं इतर लोकक कोनो टा सुधि नहि लेल गेल। शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार मे कोनो रुचि नहि लेल गेल। दरभंगा नरेशक उद्देश्य रहल अंग्रेजक खोसामद। बाद मे ओ कांग्रस सं सेहो जुड़ला मुदा उद्देश्य मात्र अपन रियासत बचेबाक छल, जनकल्याण आ देशप्रेमक कोनो भावना नहि। ताहि समय कोशीक डरें जं क्यो पलायन क' जाइत रहय, तकर डीह-खेत कें दरभंगा राज द्वारा नीलाम क' देल जाइत रहै आ ओकरे राजक अमला-खसला ओकरा खरीद लैत छल।' आइ जे हम सब अपना समाज मे पैघ-पैघ खान्दानी भूधारी सब कें देखैत छी, तकर रहस्य अइ सब ठाम अछि। प्रश्न अछि जे ई सब बात इतिहास मे किए नै आएल, साहित्ये मे किए आएल? अइ सं अकादमिक तबकाक सामंती संबद्धता आ आबद्धताक अनुमान कयल जा सकैत अछि। दोसर, जे आधुनिक साहित्य स्वयं मे एक स्वतंत्र आ स्वायत्त अनुशासन थिक, आ सदा इतिहास वा समाजशास्त्रक पिछलग्गू बनल रहबाक लेल विवश नै अछि। लेखक मे तकर बोध टा हेबाक चाही। से बोध हरि दास जी मे पूरा छनि, जखन कि ओ कोनो पेशेवर लेखक टाइप लोक नै छथि।
        अइ किताब मे, वैष्णव महंथ जमीन्दारक अत्याचार आख्यानक केन्द्र मे अछि जकर सामना हरि दास जी कें प्राय: सौंसे जीवन करय पड़लनि। बैरागियोक जखन पतन होइ छै तं आने लोक जकां कोनो भ' क' रुकि नइ जाइ छै, निरंतर होइत रहैत अछि। स्वयं ओइ महंथक अंत अंतत: कोना भेलनि, अइ किताब मे तकरो खिस्सा आएल अछि। मुदा, तै सं पहिने, जखन महंथ कें लगै छनि जे हुनकर संपत्तिक ठीक-ठीक रखबार हुनकर भातिज नै, भगिनी आ भगिनजमाइ भ' सकै छथि, तं ओइ बेचारे गोविन्द दास कें कोना कुटिल रूपें कलंकित क' क' बैला देल गेल, तकरो प्रसंग आएलअछि। इहो गोविन्द ओही गोविन्द जकां खेहारल गेला। लोक भने बाहरक होथि कि घरक, मिथिला मे गोविन्दक पराभवे पराभव। लंबा संघर्षक बाद, जखन साधारण देखाइत असाधारण योद्धा हरि दास महंथक सब दाव-पेंच कें निष्फल क' दैत छथि आ महंथ समझौता करै लेल विवश होइ छथि, तं हम सब देखै छी, हरि दासक एक शर्त इहो रहै छनि जे गोविन्द दास कें उत्तराधिकारी बहाल कयल जाय।
        प्रसंगवश चनौरागंज मठक स्थापनाक इतिहास के चर्चा सेहो अइ किताब मे आएल अछि। हरि दास जी लिखै छथि-- 'चनौरागंजक मठ विष्णुस्वामी संप्रदायक थिक। ई करीब 200 वर्ष पुरान मठ अछि। पश्चिम बंगालक मुर्शिदाबाद सं आयल कोनो घुमन्तू संत एत' आबि क' एकटा कुटी बनेलनि। एत' दरभंगा महाराजक खवासक हवेली छल। खवास शक्तिशाली छला। हुनकर दरबज्जा पर कतेको हाथी बान्हल रहैत छल। हवेलीक आगां‌ खरिहान छल। ओ संत ओइ खरिहान मे कुटी बना लेलनि आ समय पाबि क' राधाकृष्णक स्थापना क' देलनि। खवास गलैत गेला आ साधू मोटाइत गेला। यैह कुटी एक दिन बड़का मठ बनि गेल। आगां चलि क' ई मठ एकटा बड़का जमीन्दार सेहो बनल।' हम जे ऐतिहासिक महत्व बला बात ऊपर कहलहुं, हरि दास जीक एक-एक विवरण मे कोना इतिहासक आशय आ संकेत भरल छनि, से बुझबाक लेल अइ विवरण कें देखि सकै छी। धन कोना अबैत छल आ कोना चलि जाइत छल, तै बात कें अइठां स्पष्ट देखल जा सकैए। जे राजवंश एते अविवेकी छल जे एकटा खवास(वीरू खवास)क स्वातंत्र्य-चेष्टा सं कुपित भ' क' संपूर्ण मिथिला मे बसनिहार ओइ जाति(कुर्मी)क समुच्चा आबादीक संपत्ति जब्त क' देसनिकाला द' सकै छल, तकरे एक खवास केहन मोटाएल अछि, से एतय देखल जा सकैए। मुदा, ई रहस्य अछि आ रहस्ये बनल रहत जे खवासक भितरिया कनेक्शन महाराज संग की आ केहन रहल हेतनि। तें गुणी आ मर्मज्ञ मांगनलाल खवास धरि सेहो संपत्तिक किछु ढेला गुड़कि जैतय, तकर कल्पना करब अरण्यरोदने करब हैत। मिथिला मे वैष्णव मठक प्रवेशक एक आर ऐतिहासिक सूत्र सेहो एतय हमरा लोकनि कें भेटैत अछि जे पचपनियां लोकनि हुनका शरण देने छलखिन।
        अइ किताबक संग एकटा मजेदार बात इहो छै जे एकर नामकरण कबीरक एक मैथिली पदांश ल' क' कयल गेल अछि-- जनम जुआ मति हारहु। मिथिला मे कबीरक सैकड़ो मठ अछि। हुनकर हजार मैथिली पद चारि सय बरस सं मिथिला मे प्रचलन मे बनल अछि। एक जबाना मे आचार्य सुभद्र झा शोधपूर्वक ई प्रमाणित कयने रहथि जे कबीरक पैदाइश मिथिलाक छलनि। मुदा अइ तमाम सं दूर, ब्राह्मण-समाज मे कबीर कहियो उद्धृत कयल जाइ योग्य संत मे सं नै रहला। उनटे लक्ष्मीनाथ गोसांइयो सनक सिद्ध महात्मा घृणापूर्वक कबीर कें गरियबैत पाओल जाइत छथि। कारण आर किछु नइ, कबीरक ब्राह्मणेतर वैष्णव होयब आ वर्णव्यवस्थाक विरोधी होयब। मुदा, हरि दास जी माथ परहक मुकुट जकां कबीरक पद कें धारण कयने छथि। मनुखक जन्म आत्मपरिष्कारक लेल भेल छै, ओकरा समस्त भ्रम सं बाहर निकलबाक चाही, अइ दुर्लभ अवसर के पूरा उपयोग करबाक चाही, आ यत्नपूर्वक लागल रहबाक चाही जे ओ जुआ हारि क' नइ विदा हुअय, पुरुखार्थ कइये क' गुजरय-- 'मानुस जनम सुधारहु साधो, धोखे काहे बिगाड़हु हो/ अइसन समय बहुरि नहि पइहह, जनम जुआ मति हारहु हो।' कबीर पिंड आ ब्रह्माण्ड कें एकरूप मानैत छला, तें हुनका लेल ई कोना संभव भ' सकै छल जे जाति, धर्म, संप्रदाय आदिक आधार पर एक मनुख सं दोसर मनुख भिन्न हैत, तकरा स्वीकार करितथि! मिथिला मे बहुसंख्यक समाज एहन बसैत अछि जकरा वर्चस्ववादी लोकनि जन्मक आधार पर छोट मानैत छथि। अइ मे सत्यता तं भइये कोना सकैत अछि कारण ई प्रकृति आ अध्यात्म दुनू नियमक हिसाबें मिथ्या मान्यता थिक, मुदा अही बल पर बीस प्रतिशत लोक अस्सी प्रतिशत जन पर अपन दबौट कायम कयने रहल अछि। अइ तरहें देखी तं कोनो कुलीन लोकक जीवन मे कबीरक शामिल होयबे अपना आप मे एक क्रान्तिकारी कदम थिक। ई क्रान्तिकारिता हरि दास जी मे पदे-पदे हमरा लोकनि देखि सकैत। एतय अखिल मानवताक प्रति प्रेम आ संरक्षणक भाव छै। परंपरित चलन पर नहि, अपन जीवनानुभवक आधार पर दुनियादारीक पक्ष-निर्धारण कयल गेलैए। सांच कें सांच कहबाक दमखम छै, कारण आंतरिक निर्भयता अही तरहें लोक मे आबियो सकै छै। जेना मुसलमानेक मामला कें ली, तं मुसलमानक प्रति कतहु पड़ोसी-सम्मत, मनुष्यता-सम्मत नेहछोह छै तं कतहु इहो छै जे अवसर पड़ला पर मुस्तकीम कि रजी अहमद सेहो कोना एक ब्राह्मणे जकां हुनका संग धोखाबाजी केलकनि।
        मृत्यु, रोग आ दुश्मनी-- ई तीनू विषय कहल जाय तं अइ किताबक केन्द्रीय विषय थिक। कहल जाय तं ई विषये सब अइ बात पर प्रकाश देबाक लेल काफी अछि जे सामंती शासन आ समाज दुनिया कें कते कुरूप बना देलकै अछि। घरहंज के चरम सीमा धरि अकालमृत्युक प्रत्यक्ष कारण भने कोशी देखाइत हो, एकर असल कारण तं जमीन्दारी आ सरोकारविहीन सरकारे अछि। मिथिलाक जन-इतिहासक बानगी देखल जाय--'ताहि जबाना मे जमीन्दार सब नइ चाहैत छला जे हुनकर रैयत-रिआया स्वस्थ रहय, पढ़य-लिखय आ धनवान बनय। तें जखन कोनो बालक शरीर सं स्वस्थ रहय, पढ़य मे तेज निकलि जाइ तं ई जमीन्दार सब ओहि बालकक अभिभावक पर जोर द' क' पन्द्रह-सोलह वर्षक अवस्था मे ओकर विवाह करबा दैत छल जाहि सं नून-तेल मे उलझि क' ओकर शिक्षा चौपट भ' जाइ छलै। जं ककरो लग दूटा पैसा जमा भ' जाय तं ओकरा मर-मुकदमा मे फंसा देल जाइत छल। एवंप्रकारें अपन एकछत्र राज कायम रखैत छल ई जमीन्दार सब।' अइ मे संत-असंत के कोनो फरक नइ छल, बस ओकरा जमीन्दार अथवा ओकर आदमी, ओकर दलाल टा हेबाक जरूरी रहय। अखनहु मिथिलाक वर्चस्वी समाज, जे कि ओइ जमीन्दार लोकनि कें अपन आदर्श मानैत छथि, अही सब साधनक प्रयोग यथासाध्य खुलेआम करैत छथि, सफल नहियो होथि तं कोशिश जरूर सैह रहैत छनि। अइ किताब मे अइ तरहक ऐतिहासिक चरित्र सब अनेको ठाम आएल अछि जकरा आधार बना क' आइयो हम सब अपन गौआं, पड़ोसिया के नीयत के ठीक-ठीक पहचान क' सकै छी। आ, मैथिल समाजक समुचित वर्गीकरण क' सकै छी।
        मृत्युक सामुदायिक हाहाकार संग अइ किताबक शुरुआत होइत छै, अइ दुआरे जे स्वयं लेखकक स्मृति मे जे हुनकर नेनपन छनि से अही हाहाकार सं भरल अछि। 1940क कोशीक मृत्युलीलाक चर्चा ऊपर भ' चुकल अछि। ओतहि सं लेखकक जीवन शुरू होइत छनि आ ई किताब सेहो ओतहि सं शुरू होइत अछि। लेखकक माय कोना मुइलीह आ अंत्येष्टि क' क' घुरल ससुर सेहो लगले कोना मुइला जे सुनगले चिता पर हुनको संस्कार कयल गेलनि, आदि। ओ अनाथ बालक जखन वृन्दावन पहुंचल, छव-सात बर्षक उमर रहल हेतै। ओहि ठाम हुनकर परवरिश भेलनि, शिक्षा-दीक्षा भेलनि, मने हरि दास नामकरण सेहो। वृन्दावनक स्मरण करैत लिखैत छथि-- 'जखन हम वृन्दावन आएल रही हमर उम्र लगभग छव-सात वर्ष छल आ हम एतक भाषा नहि बुझैत छलहुं। स्कूल मे हम अपना कें अलग-थलग महसूस करैत छलहुं। शिक्षकक बात सेहो नहि बुझैत छलहुं। मुदा साल बितैत-बितैत हम ब्रजभाषा नीक जकां बूझ' आ बाज' लागल रही।' एहि क्रम मे हुनका वृन्दावनक जे सब चीज मोन पड़ै छनि, स्कूलक ओ रिफ्यूजी सिन्धी(भारत-विभाजन सं विस्थापित) सहपाठी जे हुनकर दबात सं मोसि बहार क' लैत छलनि, आ मोहल्लाक ओ माली परिवार जिनका ओतय बकरीक दूध पिबै छला आ रोज स्कूल जाइ सं पहिने आंखि मे काजर लगबबैत छला। भूमिका भाग मे श्रीधरम लिखलनि अछि, साठि वर्ष सं बेसी समय बितलाक बाद जखन हरि दास जी 2016 मे वृन्दावन गेल छला, नेनपनक अइ अनूप शहर मे ओ जरूर दू-तीन दिन रुकब पसंद करता से अनुमान छल, मुदा दुइये-तीन घंटा बितैत-बितैत पुत्र कें कहलखिन-- 'हौ, हमर वृन्दावन तं हेरा गेल। एहि पर बनियांक कब्जा भ' गेल छह। चलह, हमरा नहि रुकबाक अछि।' संयोग देखू जे ओहि वर्ष ओ दिवंगत भेला।
        मिथिला एहन अभागल भूमि हेबाक लेल अभिशप्त अछि जतय कुलीन लोकनिक समुदाय मे कुटिल, कामी, पाखंडी आदि लोक तं थोकक हिसाब सं भेटता मुदा स्वतंत्रचेता मनुख भेटब दुर्लभ छथि। जे अपन आत्माक पुकार पर, केवल अइ लेल जे बैराग्यक जीवनशैली ओकरा पसंद नै छै, ओ महंथीक करोड़ो के जमीन्दारी सं मुक्त करबाक नेहोरा करत, से तं जेना सोचबो असंभव अछि। हरि दास जी एहने असंभव लोक छला। महंथ जी कें जखन ओ साफ कहि देलखिन जे ओ विवाह करता तं महंथ जी कें स्वाभाविके एहन लगलनि जे ई बालक स्त्रीक भोग करय चाहैत अछि। ओ उतारा देलखिन जे अइ लेल विवाह करब जरूरी नै अछि, ओकरा ई सुविधा भेटैत रहतै। माथ पर हाथ द' क' सोचल जाय, एकर संकल्पनो नै छलै ओइ वर्ग मे, जे क्यो व्यक्ति बैराग्य पसंद नै हेबाक कारण गृहस्थाश्रमक जीवन व्यतीत करय चाहि सकैत अछि, करोड़ोक संपति कें लात मारि। महंथ संग हुनकर समुच्चा जीवन धरि चलै बला संघर्षक शुरुआत अही घटनाक बाद भ' गेल। हरि दास जी महालक्ष्मीक संग विवाह केलनि आ योग्यता बलें शिक्षकक नौकरी प्राप्त क' एकटा आम आदमी जकां जीवनक शुरुआत केलनि। अपन पत्नीक बारे मे ओ लिखैत छथि-- 'हम स्वेच्छा सं,निर्लोभ भ' क' एकटा गरीब ब्राह्मणक बेटी सं विवाह केने छलहुं। पत्नी महालक्ष्मीक जीवटता, सहृदयता आ सहनशीलता पर लिखय लागब पूरा उपन्यास बनि जायत। ओ साहस, दया, क्षमा आ त्यागक सद्य: प्रतिमूर्ति छथि जे हुनका भरिसक अपन पिता सं भेटल छनि।' मुदा, आगू चलि क' हुनकर पत्नी, डाक्टर आ चिकित्सा-व्यवस्थाक लचरपनक कारण, लापरवाहीक कारण रोगग्रस्त रहय लगली आ रोग संग लड़बाक ई कथा लगभग जीवन भरि चलैत रहलनि। 1976 मे एम्स, दिल्ली मे जखन पत्नीक जटिलतम आपरेशन भेल छलनि, दुर्दशापन्नताक स्थिति छल-- 'नीन हमर हराम भ' गेल छल। कखन भोर हुअय आ कखन सांझ, किछु पता नै चलि रहल छल। बेर-बेर डाक्टरक कथन मन पड़ि जाय जे दस दिन बहुत खतरा है। रहि-रहि क' पत्नी आ हम, दुनू कान' लगैत रही आ सोचि रहल छलहुं जे की जिन्दगी भरि एहिना कर' पड़त?' ओम्हर, महंथक दुश्मनीक आलम ई छल जे केस-फौदारी तं ढेर रास लादिये देने छला, समाज मे क्यो हिनकर सहायता नै करय से व्यवस्था केने रहथि, एकरो प्रसंग आएल अछि जे गामक पोस्टमास्टर हरि दासक नाम आयल चिट्ठी समेत हुनका धरि नै पहुंचय दै छला, ऊपर सं महंथ ई प्रचारित क' रहल छला जे हुनके देल श्रापक फल हिनकर पत्नीक बीमारी थिक। सोचि सकैत छी, ओहन संत केहन राक्षस भ' सकैत अछि, आ एहन आदमीक जीवन-संघर्ष कते जटिल भ' सकैत छै! मुदा, हरि दास जी अपन किताबक नाम रखने छथि जनम जुआ मति हारहु। हिम्मत नहि हारबाक छै, सब संघर्ष के सामना वीरतापूर्वक करबाक छै, अपन पुरुखार्थ सं समस्त संकट पर विजय प्राप्त करबाक छै। आ, हुनकर जीवनक साफल्य अही मे अछि जे, से ओ क' सकला। अनुमान क' सकै छी जे जीवन मे लक्ष्य आ पुरुखार्थ कें महत्व दैबला लोकक लेल ई किताब कते पठनीय हेतै। अद्भुत बात इहो अछि जे साहित्य मे कोनो पेशेवर पहचान नै राखनिहार हरि दास नामक अइ लेखकक अइ किताब मे पठनीयताक गुण तते प्रबल छै जे एक बेर जं पढ़ब शुरू करू तं खतम कइये क' चैन पड़ैत अछि। शैलीक ई कसावट हुनका कोना सिद्ध भेल हेतनि, हम सोचि नै पाबै छी। लगैत अछि जे ठीक कहल गेल अछि, एके साधे सब सधे। जकरा जीवन मे असल के संघर्ष-ताप हेतै से जं कहुना लिखैत चलि जाएत तं ओ ताप अपन अभिव्यक्तिक त्वरा प्राप्त कइये टा लेत।
        किताबक परिशिष्ट मे हरि दास जीक किछु पत्र संकलित छनि, ताहि सब सं हुनकर जीवन-संघर्ष पर बेस प्रकाश पड़ैत अछि। अपन विद्यार्थी जीवन मे ओ हिन्दी मे किछु कविता सेहो लिखने छला, उपलब्ध भेल कविता सब कें सेहो अंत मे द' देल गेल छै। कविता सब पुरान ढंगक अछि, मुदा एकरा सब कें देखने हमरा लोकनि हुनकर मानस-निर्माणक किछु पता पाबि सकै छी। अपन पहिले कविता 'अभिलाषा' मे ओ लिखने छथि-- 'करूं नहि जग मे कभी अनीति/ यही हो प्रभु, मेरा संगीत।' वर्चस्वी वर्गक अनीति पर हुनकर ई पांती आइयो कते प्रासंगिक अछि-- 'विद्या-धन से वंचित कर भारतपुत्रों को/ गिना क्षुद्रतर पर-पीड़क ने हम मित्रों को।' (भाग्य-चक्र) विद्यार्थी लोकनिक आह्वान करैत एकटा कविता लिखने छथि, तकर ई पांती आजुक हाइटेक विद्यार्थी सभक लेल आंखि मे अंगुरी भोंकि क' जगेबाक तुल्य अछि--  'क्या विद्या सिखलाती है केवल सुख करना?/ या मुक्ति देश की, बंधु-बांधवों की भी करना?'
        फेर कहब, मैथिली मे अइ किताबक प्रकाशन एकटा घटना छी, जकरा बहुत दिन धरि मोन राखल जेतै।