Wednesday, August 18, 2021

कृष्णमोहन झाक कविता अंग्रेजी अनुवाद सहित


 

बभनगामाबाली भौजीक जीवनक महत्वपूर्ण घटना सभक एकटा संक्षिप्त विवरणिका

कृष्णमोहन झा [Krishnamohan Jha]

आ से एहेन अहिबाती के हेती
जे बभनगामाबाली भौजीक सोहाग-भाग देखि जरि नइँ जेती

ओना मानलहुँ
जे हुनका
पोथी-पतराक दर्शन नइँ भेलनि
मानलहुँ जे पाबनि-तिहारे हुनका तेल-कूड भेटलनि
मानलहुँ जे चाभीक गुच्छा
ओ कहियो अपन आँचर मे नहि बान्हि सकलीह
ईहो मानलहुँ जे लाख कबुलाक बादो
आजीवन ओ दोसर पुत्र-रत्न प्राप्त नहि क' सकलीह
मुदा निस्संदेह
एक टा भरल-पुरल जीवन केँ छाँटैत-फटकैत
अपन 37 बरखक बयस मे ओ
38289 टा सोहारी पकेलीह
2173 डेकची भात पसेलीह
13000 बेर बर्तन-बासन माँजलीह
307 बेर आँगन निपलीह
47 टा साडी आ 92 टा ब्लाउज पहिरलीह
275 राति भूखल सुतलीह
हुनका 3 बेर भेटलनि संभोगक सुख आ 949 बेर भेलनि बलात्कार
बेटी जनमौलनि 4 टा आ 5 बेर
भेलनि गर्भपात

मुदा ई देखू सभ सँ मार्मिक बात
जे ठीक बरसातिक प्रात
जखन हुनक सीथ रहनि सिनूर सँ कहकह करैत
आ भरल रहनि लहठी सँ हाथ-
तखन अपन स्वामीक आगू
बिना अन्न-जल ग्रहण कयने ओ
भ' गेली विदा.

अंग्रेजी अनुवाद: शारदा झा [Sharda Jha]

A brief documentation of important events of my sister in law from Barhmin's village

There wouldn't be a single married woman
Who would not have envied the grace of my sister in law from the village of Brahmins

I accept she was uneducated

She received frugal things occasionally

She could never possess a significant place in her household

I also accept that despite endless prayers
She could never bear a second son

But certainly
While sifting through her wholesome life of 37 years
She baked 38289 breads
Cooked rice 2173 times
Cleaned vessels 13000 times
307 times daubed the courtyard
Wore 47 sarees and 92 pieces of bouses
Slept starving for 275 nights

She enjoyed copulation 3 times
And was raped 949 times
Gave birth to 4 girls and 5 times
Suffered abortion

But here is the most poignant thing
The very next morning of Barsait
When her forehead was glowing with vermilion
And her hands were full of bangels
In front of her husband
She passed away without having a morsel.

Friday, August 6, 2021

ग्लोबल चिन्ताक संग ठाढ़ मैथिली कविता अंग्रेजी एवं नेपाली अनुवाद सहित

 


1 अगस्त 2021 कें कवि-एक्टिविस्ट अजित आजादक संयोजकत्व मे मैथिली लेखक संघ एकटा विलक्षण कार्यक्रम सोशल मीडिया पर लाइव प्रसारित केलक। ई हुनक व्यापक कार्ययोजनाक तेसर कड़ी छल।कार्यक्रम छल मैथिली कवि तारानंद वियोगीक एकल काव्यपाठ। संयोजन एहन छल जे मैथिलीक एक कविता सुनेलाक तुरंत बाद ओकर अंग्रेजी अनुवाद कवि-अनुवादक अंशुमान सत्यकेतु सुनाबथि आ तकर लगले ओकर नेपाली अनुवाद कवि-पत्रकार विजेता चौधरी प्रस्तुत करथि। समूचा सत्र मैथिली कविताक अंतर्राष्ट्रीय प्रेमी लोकनि कें समर्पित छल। कविता सब सेहो एहन रहय जाहि सं साफ स्पष्ट होइ छलै जे ग्लोबल चिन्ताक संग कोन तरहें मैथिली कविता आइ विश्व-कविताक संग ठाढ़ अछि। कार्यक्रमक संचालन मैथिली-अंग्रेजी कवि भास्कर झा क' रहल छला आ स्ट्रीम यार्ड पर आयोजित एहि कार्यक्रमक सोशल मीडिया पर प्रसारण युवा कवि-एक्टिविस्ट गुंजनश्री क' रहल छला।

विजेता चौधरी काठमांडू सं एहि कार्यक्रम मे भाग ल' रहल छली। ओहि ठामक मौसम खराब हेबाक कारण नेटवर्क कमजोर रहने बेर-बेर लाइन कटल, तें नेपाली अनुवादक रसास्वादन श्रोता लोकनि नीक जकां नहि क' सकला। सभक आग्रह रहनि जे एहि कविता सभक लिखित रूप सोशल मीडिया पर प्रकाशित कयल जाय।

एहि ठाम मूल मैथिली कविता, ओकर अंग्रेजी अनुवाद तथा नेपाली अनुवाद अविकल प्रस्तुत कयल जा रहल अछि। नीचां मे मूल कार्यक्रमक वीडियो-लिंक सेहो द' देल गेलैए।

https://youtu.be/LXDQzisec6o


तारानंद वियोगी [Taranana Viyogi]क मैथिली कविता


।।सुन्न वीरान इलाका मे रेल इंजिन फेल भ' गेला पर।।


दूर क्षितिज धरि निहारैत छी

कत्तहु नहि अछि एको टा मनुक्ख

ने एक्को टा देबाल

ने कारखानाक चिमनी

कत्तहु सं नै उठि रहल अछि धुआं, ने रुदन

से--

ई विशाल क्षेत्र ककरा राज मे पड़ै छै?


गाड़ी सं उतरि क' देखलहुं

ने जानि कोन कोन चिड़ै, जनम जनम के मीत लगैत

कोन कोन लता-गुल्म

एह, कते सोझ सोझ गाछ!

हम मोन पाड़य लगलहुं

एहन हरियर कचोर वनस्पति-राज

की हम अपना जनम मे कतहु देखनहु छी?


गर्व सं माथ उठौने

नान्हि नान्हि दूभि

हमरा देखलक आ खिलखिला देलक

कि तखनहि कोनो चिड़ै बाजल चीं चीं

ओह, दिल के बाग बाग होयब की एकरे कहै छै!


एक झंखार मे पैसि

हम बहुत रास फूल तोड़ि अनलहुं

जानि ने कोन कोन फूल

एकर सभक गांथब एक माला

आ अपन कोठली मे राखल ग्लोब कें पहिरा देबैक


सुकुमारि स्पर्शातुर हवा

लटपटा गेली हमर अंग-अंग सं

रोमांचित हम

श्वास-रन्ध्र सं होइत

फेफड़ाक गह-गह धरि

समा लेलहुं कुमारि हवा,

ने जानि कते कते नश्वरता कें

पिटपिटा देलिऐ


पृथ्वी हमरा लेल कतबा टाक छथि?

एहि कुमारि हवा कें समा क'

जतेक फुला सकै छी हम अपन फेफड़ा!


बगल द' क' बहि रहल अछि एक तन्वंगी नदी

अहा, केहन सुडौल छरहर बेमत्त मन्दाक्रान्ता!

कालिदास रहितथि तं फेर लिखल जाइत

वेत्रवती-आख्यान


हम गाड़ी मे घुरि अयलहुं


अपन अपन बोगी मे बन्न लोक

अपस्यांत अछि, फिरिसान

कखन इंजिन औतै, कखन

कखन लोक पहुंचत अपन अपन कबुरगाह?

जुलुम भेल, जुलुम

अइ जंगल मे लाबि क' धोखा देलक रेलवे

आफद अछि, आफद

कखन धरि रहय पड़त वीरान मे, कखन धरि?


अपन अपन समस्याक अभियुक्त

कैद अछि सबटा मोसाफिर अपन अपन बोगी मे!


बाहर

सुन्न वीरान अइ इलाकाक निवासीगण

हंसि रहल छथि

बिलहि रहल छथि आशीष।


अंग्रेजी अनुवाद: अंशुमान सत्यकेतु[Anshuman Satyaketu]

On failure of rail engine in a desserted area


I look far and wide up to the horizon

But find not a single soul

Nor any wall

No smoke is coming out of

Any factory chimney

No body is crying either

Whose kingdom does this vast territory belong to? 


Getting down the train I see

Various kinds of

Ever-friendly but unknown birds

Unknown creepers

Tall trees

I began to recall

If I have ever seen

The viridity of vast vegetation


Tiny tender grass

Peeping out with pride

Chanced a glance at me and giggled

When a bird began chirping

Is it what is called overjoy


I gathered

Some unknown flowers

From a bush

I would thread them in a wreath

And place it round the globe kept in my room


I was thrilled 

When the soothing and eager- to-touch air

Cuddled my limbs

I inhaled it in

To fill my lungs

So as to smother transiency


How big is the earth for me? 

Definitely as large as

The soothing air can make my lungs expand


A river

Slender, long, svelte, gracile and delusional

Is flowing by

Had Kalidas been alive

Vetravati Akhyan would have been rewritten


I returned back to my compartment


People, in their respective compartment, are

Tired and pestered

Waiting relentlessly for

The replacement of engine

And reaching their destination

It is our bad luck that

Railway has played false on us

Now we don't know

For how long we would have to stick here


Accused of their own problems

Passengers are confined to their respective compartments


Meanwhile the dwellers of this locality are

Smiling and 

Sending blessings from outside.


नेपाली अनुवाद: विजेता चौधरी[Bijeta Chaudhary]

शुन्य-विरानाे इलाकामा रेल इन्जिन फेल भए पछि 


टाढा क्षितिज तिर नियाल्छु

कहि कतै छैन एउटै मान्छे 

न एउटै पर्खाल

न त कारखानाकाे चिम्नी

कतैबाट पनि उठि रहेकाे छैन धुँवा

न त राेदन

अहाे...

याे विशाल क्षेत्र कसकाे राज्यमा पर्छ?


गाडीबाट अाेर्लेर हेरे

कुन्नि कुन-कुन चरा

जन्म जन्मका मीत लाग्थे

कुन-कुन लता-फूल

अहाे कस्तो ठाडाे र सीधा रूख!

बिचार्न थाले म

यस्तो हरियाे कचाेर वनस्पति-राज्य 

के मैले अाफ्नाे जन्ममा देखेकाे थिएँ र?


गर्वले शीर ठाडाे पारेकाे 

मसिनाे मसिनाे दूबाे

मलाई हेर्दै मुसुक्क हाँसिन्

उतिबेलै कुनै चराले गरे चिरबिर-चिरबिर

अहा, दिल बागबाग हुनु के यसैलाई भनेकाे हाे?


एउटा झाडीमा पसेर

म‌ैले थुप्रै फूल टिपेर ल्याएँ

कुन्नि कुन-कुन फूल

यी सबैलाई उनेर बनाउँछु एक माला

अनि लगाइदिन्छु अाफ्नाे काेठामा राखेकाे ग्लाेबलाई


सुकुमारी स्पर्शातुर हावा

लुटपुटिन अाइपुग्छिन् मेराे अंग अंगमा

राेमाञ्चित म

श्र्वास-रन्ध्र हुँदै

फाेक्साेकाे कुना काप्चासम्म

समाहित गरे कुमारी हावा

थाहा छैन

कति कति नाश्वरतालाई

थपथपाएर गई


पृथ्वी मेरालागि कत्रो छिन्?

यी कुमारी हावालाई भरेर

जति फूलाउन सक्छु 

म अाफ्नाे फाेक्साे !


छेउबाटै बगि रहेकी छन् एक तन्वंगी नदी

अहा, कस्ताे सुडाैल, छरिताे, बेमत्त मन्दाक्रान्ता

कालिदास भएका भए फेरि 

लेखिन्थ्याे हाेला वेत्रवती अाख्यान 


म गाडीमा फर्केर अाएँ

आफ्नो-आफ्नाे बाेगीमा 

थुनिएका छन् मान्छे

आजित अनि दिग्दार छन्

कतिबेला इन्जिन आउँछ, कतिबेला 

कतिबेला मान्छे पुग्छन् 

अा-अाफ्नाे कब्रगाह?

के अचम्म हाे यस्तो 

यस्तो जंगलमा ल्याएर 

धाेखा दिए रेल्बेले

अापत रहेछन् अापत

कतिबेलासम्म बस्नुपर्ने हाे

यस निर्जनमा, कतिबेलासम्म?


अा-अाफ्नाे समस्याका अभियुक्त 

कैद छन् सबै यात्रु अा-अाफ्नाे बाेगीमा

बाहिर शुन्य निर्जन यस इलाकाका निवासीगण

हाँसि रहेका छन्

बाँटी रहेका छन्, अाशिष ।।।


2

मैथिली कविता

।।घरबे।।


--घरबे छी यौ?

डेढ़िया पर सं अबाज द' रहल छथि

हमर क्यो अपेक्षित


हम घरे मे छी

घरक भीतर चौकी पर बैसल

निहारि रहल छी अइ बगड़ा कें


बगड़ा चार मे लगेने अछि अपन खोता

खोता मे ओकर चारि-पांच बच्चा

आ तकरा सब सं 

बतिया रहल अछि एखन विभोर


आ हम विभोर

एकरा सब कें निहारै मे


हम अपन घर मे छी

आ बगड़ा सेहो अपन घरे मे अछि


--घरबे छी यौ?

फेर पुकार लगबै छथि अपेक्षित


एह

केहन हो

जे हमरा बदला ई बगड़ा दियय जवाब

--आउ आउ अपेक्षित, अहांक स्वागत।


अंग्रेजी अनुवाद: अंशुमान सत्यकेतु

The Resident


Is there the resident inside? 

One of my intimates

Is calling from the portal


I am inside the house

Sitting in my bed

Gazing at the sparrow


The sparrow

Nesting in the thatched roof

Is busy right now

Talking to its 

Four or five fledglings 

With great rapture


And 

I am engrossed gazing at them


I am inside my house

And so is the sparrow


Is there the resident inside? 

Again calls the intimate

Wow! 

How amusing it will be

If the sparrow replies and Welcomes the guest

Instead of me.


नेपाली अनुवाद: विजेता चौधरी

घराँ हुनुहुन्छ हजुर!


घराँ हुनुहुन्छ हजुर...?

डीलबाट साेधी रहेका छन्

मेराे कुनै अपेक्षित ले ।


म घरमै छु

घरभित्र खाटमा बसेर

नियाली रहेको छु यस भँगेरीलाई


भँगेरीले छानामा बनाएकी छे गुँड

गुँडमा छ उनको 

चार-पाँच वटा बचेराहरू

जाेसंग विभाेर भएर

बात मार्दै छिन् उनी ! 


अनि म विभाेर छु नियाल्नमा

म अाफ्नाे घरमा छु

अनि भँगेरी पनि अाफ्नै घरमा छे


घराँ हुनुहुन्छ हजुर...?

फेरि बाेलाउँछन् अपेक्षितले !


अहाे, 

कस्तो हुन्थ्यो हाेला

मेराे साटाे यी भँगेरीले दिन्थिन जवाफ 

अाउनुस् अाउनुस् अपेक्षित,

यहाँकाे स्वागत !!


3

मैथिली कविता

।।अजान।।


अजान पढ़ि रहल छथि मौलवी साहेब

जेना कोनो तिलस्मी बांसुरी बाजि रहल हुअय

धैवत धुन मे

धोइत पखारैत सौंसे संसारक कोहराम कें


शब्द सं बहराइ छथि अल्लाह

आ, उठैत उठैत नि:शब्द धरि ठेका देल जाइ छथि

मूर्त सन करुणा एगो 

ओइ आलाप मे गुंथाएल छै,

बीच बीच मे जखन लैत छथि विराम

मुखर सं मुखरतर मौन

बाउग भ' जाइत अछि अंतरिक्ष मे

अंतरिक्षक निच्चां मे ठाढ़ हम उबडुब करैत शाश्वत मे

निरभ्र प्रतीक्षा आतुर--

कखन मौलवी साहेब अगिला पद कहथिन


अइ अनभुआर ठेकान पर ठहरल छी संयोगात

की पता, शेष चारि बेरका नमाज लेल अजान के दैत हेथिन

ई बेचारे तं उदित होइ छथि नित्त अही बेर

रातुक आखिरी अजान काल मे

आ कि सब बेर यैह दैत होथि

हमही नहि सुनि पबैत होइ कोहराम मे

जे अइ दिनक सब सं बड़का सत्य बनल अछि



जानि नहि, अइ बेचारे मौलवी साहेब कें

की कहि क' पुकारैत हेतनि हुनकर समाज 

मुअज्जम हुजूर तं नहियें कहैत केतनि

नै जानि आर्थिक सखापात कोन तरहें मदतगार होइत हेतनि

आ कि नै होइत हेतनि?

कहि नै असंतुष्ट तं नै कदाच रहैत हेता

जं रहैत हेता असंतुष्ट तं मनुष्यताक लेल ई कते महाअनर्थ बात!

बुद्धक करुणा जाहि व्यक्तिक अबाज मे प्रत्यक्ष

ओह, ओकरा तं राजा हेबाक चाही

मुदा, नहि जानि ...


पच्चासो टा प्रश्न मोन मे उचरैए

एक ओइ आदमीक लेल

जकरा कि कहियो हम देखनो नै छी

चिन्है परजन्त नै छी

बस एतबे मे एतबे जे

ओ ओम्हर पढ़ै छथि अजान 

आ एम्हर हम सुनैत छी उबडुब उन्मेष मे


जा धरि खतम नै भ' जाइए अजान

कत्तहु दोसर दिस नै जाएत चित्त ने कान

ओह, क्यो हमरा मौलवी साहेबक संग कहियो बैसाबितय!


अंग्रेजी अनुवाद: अंशुमान सत्यकेतु

Azaan: The Prayer


A maulavi is saying his prayer

As if some magical flute is being played

On Dhaivat note

To end the chaos from the world


Allah comes out of the word

But

With the rise in scale he becomes wordless

A tangible pathos is entwined

In the form of alaap

When he breathes in between

A sonant taciturnity pervades

The universe

Skipping with perpetuity 

under it

I am eagerly waiting for him

To say his next verse


I have reached this unacquainted place

Coincidentally

This poor guy appears everyday

On his scheduled time

To say the last prayer of the day

No idea about

Who says the remaining prayers

May be he is assigned for the same

Which, unfortunately, 

I missed out on account of the hubbub around, 

And it became

The cogent truth of the day


I simply can't say

How is Maulvi Sahab known as in his society

Definitely not as Muazzam Huzur

Whether his kith and kins help him economically or not

Whether he is dissatisfied

If so

How inane it is for humanity

He ought to be a king

Whose voice has the pathos of Lord Buddha

But alas...! 


A lots of queries erupt in my brain

For the person

I have never seen

Or have no acquaintance what so ever

There is the sole connection

He says the prayer at one end and

I listen to it with great alacrity


I won't let myself

Deviate hither and thither

Till the prayer is being said

I wish he will let me 

Sit beside him someday.


नेपाली अनुवाद: विजेता चौधरी

अजान


अजान पढि रहेका छन् माैलवी साहेब

कुनै तिलस्मी मूरली बजिरहेकोजस्तै

धैवत धुनमा

धाेइ-पखाली सारा संसारका काेलाहललाई

शब्दबाट अवतरित हुन्छन् अल्लाह

अनि उठ्दा-उठ्दै निःशब्दसम्म पुर्याइन्छ

गाँसिएको छ मूर्त एउटा करूणा

त्याे अालापमा,

बीच बीचमा जब लिन्छन् विराम

मुखरदेखि मुखरित माैन

विलिन हुन्छ अान्तरिक्षमा

अान्तरिक्ष मुनि उभिएर म

डुबुल्की मार्दै शाश्वतमा

निरभ्र प्रतीक्षा अातुर

कतिबेला सुनाउछन् माैलवी साहेबले

अर्को पद


याे अनाैठाे ठेगानामा उभिएको छु संयाेगान्त

थाहा छैन शेष चार पटक नमाजका लागि कसले दिन्छ अजान

यिनी विचरा नित्य उदित हुन्छन् यतिबेलै

रातिकाे अन्तिम अजानकाे बेला

अथवा हरेक पटक यिनैले दिन्छन् हाेला

मैले नै सुन्न नसकेको हाे कि काेलाहलमा

जाे बनेकाे छ यतिबेला 

सैबैभन्दा ठूलो सत्य 


कुन्नि, यी बिचरा माैलवी साहेबलाई

के भनेर बाेलाउँदा हुन् उनका समाजले

मुअज्जम हजुर त पक्कै पनि भन्दैनन हाेला

अनि थाहा छैन अार्थिक जाेरजाम कसरी पुर्याउँछन् हाेला

अथवा हुँदैन पाे कि?


असन्तुष्ट त कदाचित रहदैनन हाेला

यदि असंतुष्ट भएमा

मनुष्यताकाेललागि कति ठूलो महाअनर्थकाे कुरा


बुद्धकाे करूणा प्रत्यक्ष छ 

जुन व्यक्तिको अाबाजमा

अाह, उनलाई त राजा हुनुपर्ने 

तर कठै,


पचासौं प्रश्न मनमा उठ्नथाल्छ

एउटा यस्तो व्यक्तिकोलागि

जसलाई मैले कहिल्यै देखेको छैन

चिनेको पनि त छैन

बस यतिमात्र कि

उनी उता पढ्छन अजान

अनि म यता सुन्छ, चुर्लुम्मम उन्मेषमा डुबेर


जबसम्म सकिदैन अजान

कत‌ै अन्ततिर जाँदैन मेराे चित्त अनि कान

अाह, कसैले कुनै दिन

मलाई माैलवी साहेबकाे छेउमा बस्न लगाउँथ्याे ।।।


4

मैथिली कविता

।।चिड़ै-चुनमुन उगबैए रौद।।

अनंत अजस्र ऊर्जा तहिना हमर काया मे नुकाओल

जेना नान्हि टाक बीज मे विशाल बटवृक्ष,

मुदा, से खाली कहबाक बात


सुटकल रहै छी बिछाउन पर

बड़ी बड़ी भोर धरि

ओम्हर, बहार मे चिड़ै-चुनमुन करैत रहैए किलोल

मचौने रहैए अट्ठाबज्जर

माथ धुनैए, देह पटकैए

जानि नै कते कते मोर्चा जीतैए

आ अन्तत:

उगाइये अनैत अछि रौद


अन्हरझोलीक अइ कालखंड मे

अन्हारक विरुद्ध निर्णायक अइ युद्ध मे

कते जरूरी अछि रौद हमरा खातिर

सब क्यो जनिते छी


मुदा, हम अपने रहै छी सुटकल बिछाउन मे

आ, चिड़ै-चुनमुन उगबैए रौद।


अंग्रेजी अनुवाद: अंशुमान सत्यकेतु

Birds beget Sunlight


It is nothing but a gossip to say that

My existence has immense energy

Similarly as there is a colossal banyan tree 

Inside a tiny seed


I hid myself inside the bed

Till late in the morning

But outside

Birds hop and chirp

Creates destruction

Fight with grand unity

To register a victory

And finally beget sunlight


Everybody knows

How important is light for me

For the ultimate battle against darkness

In this age of illusion


Even then

I hid myself inside the bed

And birds beget sunlight.


नेपाली अनुवाद: विजेता चौधरी

चराचुरुङ्गीले उदाउँछन् घाम


अनन्त अजस्र उर्जा त्यसैगरि छ 

मेराे कायामा लुकेको 

जसरी  मसिनाे बीउमा विशाल बटवृक्ष

तर, यी भन्ने कुरा मात्र हुन् 


गुटमुटिएकाे हुन्छु अाेच्छयानमा

एकाविहान भरि

उता बाहिर भने चराचुरुङ्गीले

डाकी रहेका हुन्छन्

मच्चाउने गर्छन् काेकाेहल

उफ्रिफाप्रि गर्दै

जित्छन् अनेकौं माेर्चा

र अन्ततः उदाउन करैलाग्छ घामलाई


निर्लिप्त अध्यारो यस कालखण्डमा 

अन्धकार विरूद्ध निर्णायक 

यस युद्धमा

घाम कति अावश्यक छ मेरालागि 

सबैले थाहा पाएकै हुन्


तर म अाफैं

टास्सिएकै छु अाेच्छयानमा

अनि चराचुरुङ्गीले

उदाइ सकेका छन् घाम ।।


5

मैथिली कविता

।।पृथ्वी-राग।।


सौरमंडल मे छलि एकटा पृथ्वी जतय जीवन छलै

कहथि वैज्ञानिक लोकनि जे दोसरो दोसर ग्रहक मनुख

भेस बदलि क' पृथ्वी पर उतरय

पाबय तते ऊष्मा, तते राग


बहुत उमर भ' गेल रहै पृथ्वीक

तें आगूक औरदा कम छल

ज्ञानी लोकनिक आंखि

अइ सं नम छल,

ओ लोकनि आर कइये की सकै छला

पृथ्वी छल नेता सभक कब्जा मे

जाहि ढहुरी कें मनुखतो धरिक पहचान नै

ने ज्ञानक लेल आदर

ने जीवनक लेल राग,

परमात्मा हेता तं अचरज करैत हेता जरूर

सैह, एहनो लोक रहल अइ लोक मे

जकरा लेल जीवन मने अपने टा जीवन

सुख माने अपने टा सुख

दुख माने अपने टा पार्टीक हारब


मरि रहल छलि पृथ्वी नहुं नहुं

मारि रहल छला नेता लोकनि

कुहरि रहल छल विदीर्ण हृदय

मुदा मनुखक भवितव्य देखियौ

नेतेक कब्जा मे छलि पृथ्वी

आ मनुख होइतो

लोक जीबि रहल छल नेतेक हजूरी मे


अइ बात पर आब

होथि तं कप्पार पीटथि परमात्मा

जे नेताक पैदाइश होइ छल अधिकतर वोट सं

आ वोट दियय के, तं मनुख!


अंग्रेजी अनुवाद: अंशुमान सत्यकेतु

 Affection for the Earth


There was an earth in the solar system

Where existed life

Scientists say that 

People from other planets

Used to visit the earth in disguise

To get some warmth and affection


The earth had gone very old 

And its end was quite near

Because of it

Wise men had tears in their eyes

What more could they do

The earth was taken over 

By the lewd leaders

Who didn't recognise humanity

Nor had the respect for knowledge

Not even affection for life

Almighty overhead

Would be wondering

If such people lived on this earth

Who only thought about their

Lives and welfare

And considered party's defeat

As their loss


Leaders were striking down the earth

Bit by bit

Which left our heart 

Shattered and moaning

But look at people's destiny

They still are the yes men of the leaders

Who has imprisoned the earth


If God exists somewhere

He must repent for

Votes create leaders and

People caste votes for them.


नेपाली अनुवाद: विजेता चौधरी

पृथ्वी-राग


साैर्य मण्डलमा थियाे एउटा पृथ्वी 

जहाँ जीवन थियाे

भन्थे वैज्ञानिकहरूले

अन्य अन्य ग्रहका मानिस

भेष बदलेर पृथ्वी माथि झर्थे

पाउथे अधिक उष्मा अनि राग


उमेर धेरै भएको थियाे पृथ्वीकाे

त्यै भएर कम थियाे बाँकी अायू

हाे यही कारण अाँखा रसाउँथ्याे ज्ञानीहरूकाे

तिनीहरू अरू के नै गर्न सक्थे र

पृथ्वी थियाे नेताकाे कब्जामा

जुन लठुवालाई मानवता धरिकाे पहिचान छैन


न ज्ञानको लागि अादर

न त जीवनकाे लागि राग

परमात्मा कतै छन् भने

अाश्चर्य मान्दैछन् हाेला पक्कै

यस्ता मानव पनि छन् यस लाेकमा

जसकाेलागि जीवन भनेको 

अाफ्नाे मात्रै जीवन

सुख भनेकाे अाफ्नाे मात्रै सुख

दुःख भनेकाे अाफ्नाे पार्टी मात्र हार्नु


मरिरहेकाे छ पृथ्वी विस्तारै विस्तारै 

मारिरहेका छन् नेताहरूले

कहारि रहेका छन् विदिर्ण हृदय

तर मानवकाे भविषय कठै!

नेताकाे कब्जामा छ पृथ्वी 

अनि मानव भएर पनि

मान्छे बाँचिरहेका छन् नेताकै हजुरीमा


यस्तो चाला देखेर

कतै छन् भने परमात्माले अाफ्नै खप्परमा हिर्काउथे 

जुन नेताकाे जन्म नै

अधिकांश भाेटले हुन्थ्यो 

ती भाेट दिने काे, त्य‌ै मानवले।।









Saturday, July 24, 2021

मैथिली आलोचना मे मोहन भारद्वाजक महत्व


 

मैथिली आलोचना मे मोहन भारद्वाजक महत्व

                
फोटो आ आलेख
तारानंद वियोगी

एक समय छल जखन हम अपन राय देने रही जे मैथिलीक मार्क्सवादी/प्रगतिशील आलोचना-पद्धतिक बात होयत आ एकर उद्गाता आ प्रतिष्ठापक पुरुषक प्रश्न उठत तं हमरा लोकनि लग मे दूटा नाम-- कुलानंद मिश्र आ मोहन भारद्वाज मे सं कुलानंदे मिश्र कें चुनबा योग्य पाओल जायत। मुदा जहिया हम ई बात कहने रही, ओ बड्ड पुरान समय छल। कुलानंद मिश्र अपन दूटूक आलोचकीय विवेक के शिखर उच्चता पर छला आ मोहन भारद्वाजक एक्कोटा संकलन वा किताब ताधरि नहि बहरायल रहनि। उपलब्धिक नाम पर हुनका लग मात्र किछु संपादित आ अनूदित किताब रहनि, जे गुणावगुण मे जते औसत छल ओकरा बारे मे ततबे किंबदन्ती सब प्रचलित रहैक। अस्सल मोहन भारद्वाजक पदार्पण एखन बांकी छल।
          साहित्यक बारे मे गपसप करैत ओ ततेक अक्खड़ आ रगड़ी भूमिका मे रहल करथि आ तेना हल्ला क' क' बाजथि जे कतोक बेर ताहि दिन मे हमरा ई ख्याल आएल हैत जे बालापन कि तरुणाइ मे हिनका बात कें साइत क्यो मोजर नै दैत छल होयत, तकर ई कंप्लेक्स थिक। राजनीतिशास्त्रक ओ विधिवत अध्ययन केने छलाह आ हुनकर सोच रहनि जे राजनीतिक रूप सं सचेत हरेक लोक कें अपन समानसोची लोक सभक गुट तैयार करबाक चाही, कोनो तथ्य कें ढकरि क'(विथ ए बैंग) कहबाक चाही। मैथिली गतिविधि मे जहिया ओ सर्वाधिक सक्रिय रहथि, अस्सीक दशक मे, अद्भुत छल मैथिली साहित्यिक पर्यावरण पर हुनकर पकड़ जे हुनका इग्नोर क' क', भने ओ कोन्नहु मंच हो, कोन्नहु विचारधाराक, किछु नहि कयल जा सकैत छल। ताहि पर सं हुनकर मान्यता रहनि जे मंच चाहे विरोधिए लोकनिक किएक ने हो, अपन बात जरूर कहबाक चाही, कारण एक्को टा क्यो श्रोता जं उचित विचार बला भेटि गेला तं बूझल जाय जे हमर एक समांग बढ़ला।
          बाद मे हुनकर एकक बाद एक अनेक पुस्तक आएल। ई पुस्तक सब अपन व्याख्या-विश्लेषण मे टूटूक तं छलहे, स्वर मे सकारात्मक आ प्रभाव मे नवोन्मेषी सेहो छल। अपन लेख सभक अनेक संकलन ओ प्रकाशित करौलनि। विविधविषयी सं ल' क' एकविधानिष्ठ धरि। ओकर कालावधि सेहो बहुत व्यापक। ज्योतिश्वर-विद्यापति सं ल' क' एकैसम सदी मे सद्य: लिखल जाइत साहित्य धरिक ओ सोह लेलनि।  हजार बरख मे चतरल-पसरल मैथिली साहित्यक सीमांकन करबाक हुनकर दृष्टि कतेक फरिच्छ छल से देखल तं एहि समस्त ठाम जा सकैत अछि, मुदा एकर मर्म बुझबाक लेल पुस्तक रूप मे लिखल हुनकर दूटा कृतिक विषये कें बूझि लेब सेहो कम पर्याप्त नहि होयत। हुनकर एकटा पुस्तक डाकवचन पर अछि। ई मैथिल रचनाशीलताक प्राचीनतम स्रोतक विषय मे अछि। आमजनक संवेदना, आमजनक भाषा, आमजनक बेगरता, एतय धरि कि रचनाशीलता सेहो आमजनेक। अपन दोसर पुस्तक ओ यात्री जीक उपन्यास 'बलचनमा' पर लिखलनि। ई मैथिल रचनाशीलताक उत्तर सीमा छल, जतय सं हम सब अपन साहित्य कें समकालीन साहित्य कहैत छिऐक। ई काल खासमखास ओ काल थिक जकर असर आ नुकसान सं हमर सभक वर्तमान ने मात्र प्रभावित अछि , कहबाक चाही जे गहमागट्ट डूबल अछि। एहू ठाम वैह सब बात। आमजनक संवेदना, आमजनक भाषा, आमजनक बेगरता, एतय धरि जे रचनाशीलता सेहो आमेजनक। जननिहार लोक सब ई बात जनैत छथि जे यात्री जी ई उपन्यास 'शूद्र मैथिली' मे लिखने छला। जे मिथिला एकैसम सदीक एहि दोसर दशक मे आबियो क' सुभाष चंद्र यादवक 'गुलो' कें बरदास्त करबा योग्य नहि भ' सकल अछि, ओ सत्तर बरख पहिने पचासक दशक मे कतय छल होयत, सहजे अनुमान क' सकै छी। मुदा मोहन भारद्वाज अपन सर्वश्रेष्ठ लेखन ओही उपन्यास कें समर्पित कयलनि।
          हुनकर आलोचना-यात्रा ठीक ओहिना शुरू भेल छल जेना कोनो आन आलोचकक शुरू होइत छैक। कथा-कहानी तं सुरुहे मे छूटि गेलनि। सुरुहे मे ओ अपन आत्मविस्तार कें प्राप्त कयलनि आ आनक लिखल वस्तु कें मोजर देबाक उदारता विकसित कयलनि। एक गंभीर आलोचनात्मक प्रयत्न अपना रचनाक स्थान पर आनक रचना कें वरीयता देबाक उपक्रम थिक। ई सर्वजानित बात थिक जे एक कविक तुलना मे एक आलोचकक काज बेसी भारी आ जटिल होइत छैक। मुदा, मैथिलीक पर्यावरण एहन रहल जतय आलोचकक लेल कोनो सम्मानजनक स्थान कहियो नहि रहलैक। जखन क्यो मैथिली आलोचनाक अखाड़ा मे उतरैत अछि तं कमोबेस ई अवधारिये क' उतरैत अछि जे ओकर काजक मूल्यांकनक कोनो निकष समाज लग नहि छैक, आ तें सम्मानो नहि छैक। मोहन भारद्वाज सब दिन एकतरफा चललाह। कोनो रचनाकार कें मूल्यांकित करबाक हुनकर निकष बहुत कठोर छलनि, ई बात सब क्यो जनैत छी। ओहिठाम मायानंद मिश्र आ जीवकान्तक लेल सेहो पासमार्क प्राप्त करब एक कठिन बात छल। मुदा, हुनकर दोसर पक्ष सेहो हमरा लोकनि नीक जकां जनैत छी। नवपीढ़ीक जे क्यो युवा हुनका संपर्क मे अयलनि, ओकरा ओ आंखि-पांखि देबाक जतन कयलनि, आगूक रस्ता बतौलनि, हरेक नीक-अधला प्रसंग मे ओकरा संग ठाढ़ भेला। हुनका लग देस-विदेसक मैथिली अध्येता सभक पहुंचब तते निरंतरतापूर्ण छल जे हुनकर शत्रु लोकनि हुनकर आवास कें 'अकालतख्त' कहल करथि।
          समकालीन साहित्यक आलोचना सं होइत ओ मैथिली साहित्यक पृ्ष्ठभूमि कें अनावृत्त करबाक दिशा मे बढ़ला। ओ बारंबार कहल करथि जे आजुक साहित्य कें परखबाक लेल अतीत आ परंपराक ठीक ठीक ज्ञान होयब जरूरी अछि। ई कतेक जरूरी बात छल, से मर्म कें बुझनिहार लोक अख्यास क' सकैत छथि। डाक आ यात्रीक बाद जे काज हुनका सब सं जरूरी लगैत छलनि से छला विद्यापति। ओ विद्यापति पर एक मुकम्मल किताब लिखय चाहैत रहथि। झंझटि ई जे एसकर विद्यापति पर एखन धरि कम सं कम पचीस हजार पृष्ठक आलोचना-साहित्य लिखल जा चुकल अछि। ई बात भिन्न जे एहि मे सं सब सं बेसी पृ्ष्ठ बंगला मे छैक आ सब सं कम मैथिली मे। मुदा तैयो एसकर रमानाथ झा पांच सय पेज विद्यापति पर लिखने छथिन। मुदा मोहन भारद्वाजक कहब छलनि जे विद्यापतिक ठीक ठीक मूल्यांकन एखनो धरि नहि भ' सकलनि अछि। एकटा खिस्सा ओ सुनाबथि जे कोना एक बेर सुरेन्द्र झा सुमन हुनका जखन पुछने रहथिन जे आइकालि की लिखि रहल छी आ ओ बतौने रहथिन जे विद्यापति पर लिखि रहल छी, तं सुमन जी कोना आश्चर्यसागर मे निमग्न भ' गेल छला जे यौ, विद्यापति पर आब की लिखि रहल छी? कहब जरूरी नहि जे हुनकर काजक महत्व सभक बुते, मने आचार्यो लोकनिक बुते बूझब आसान नहि छल। हुनकर भविष्यदृष्टि बहुत पुख्ता छलनि। एहि तरहक काज मानू ओ अनागत कालक लेल क' रहल छला। भविष्यक पीढ़ी कें विद्यापति कें, वा कि जीवजगतक कोनो आन विषयवस्तु कें कोना क' बुझबाक चाही, हुनकर ध्यान सदति एहि बात पर रहैत छलनि। अस्तु। विद्यापति पर अपन किताब ओ पूरा नहि क' सकला मुदा जतबे लिखि सकला से पछिला लिखलाहा पर कतेक भारी अछि तकर पता हमरा लोकनि युवा विद्वान लोकनिक आंखि मे पाबि सकैत छी। आंखिये टा मे किएक, आब तं ओकर लिखित रूप सेहो आबय लागल अछि। अरविंद कुमार मिश्रक पुस्तिका कें एकर एक दृष्टान्त मानबाक चाही।
          मोहन भारद्वाजक आलोचना-कर्मक महत्व कें बुझबाक लेल हमरा लोकनि कें मैथिली आलोचनाक इतिहास दिस एक नजरि देखय पड़त। परंपरागत रूप सं जकरा हमरा लोकनि मैथिली काव्यशास्त्र कहैत छिऐक, नहि बिसरबाक चाही जे असल मे ओ संस्कृत काव्यशास्त्र छिऐक। संस्कृतो मे कालान्तर मे गति-प्रगति भेने आलोचनाक अनेक संप्रदाय चलन मे आएल। मुदा एतय से सब नहि, प्राचीनतम जे रससम्प्रदाय छैक, तकरे सीमा मे मैथिली काव्यशास्त्र आबद्ध रहल। छव सय बरख पहिने विद्यापति कें चेतना भेल छलनि जे 'सक्कअ वाणी बहुअ न भावइ' मुदा आधुनिक युग मे आबि हमरा लोकनि ततेक दमित सीदित परबुद्धी बनल रहलहुं जे कहल 'भाषा सौन्दर्यक गति न आन', संस्कृतक शरणापन्न भेने विना मैथिली भाषाक कोनो आन गति नहि छैक। आचार्य रमानाथ झा आलोचना-समीक्षा पर एकाग्र भेला तं हुनक ध्यान मैथिली काव्यशास्त्रक एहि अपंगता दिस गेलनि आ एकर भरपाइ करबाक लेल अपना युगक श्रेष्ठ पाश्चात्य आलोचना-सिद्धान्त, जकर उद्भावक आ प्रतिष्ठाता टी एस इलियट छला, कें अपन कसौटी बनौलनि। तहिया सं आइधरि अंग्रेजीदां मैथिली आलोचना कें हमरा लोकनि ओत्तहि ठमकल देखि सकैत छी। अद्यतन उदाहरण ललितेश मिश्र छथि। एहि सिद्धान्तक आधार पर रमानाथ बाबू ई तं जरूर केलनि जे कविक व्यक्तित्व कें उद्घाटित केलनि जाहि सं कविताक मूल भाव स्फुट भेल, मुदा दू कारण भेल जे इहो सिद्धान्त मैथिली आलोचनाक सिद्धान्त नहि बनि सकल। इलियट अपन समकाल कें उद्घाटित करबाक लेल एकर प्रवर्तन कयने छला मुदा रमानाथ बाबू अपन अतीत कें सोझरेबाक लेल एकर प्रयोग कयलनि। हरेक प्रयोग अपना संग अपन सीमा सेहो नुकौने रहैत अछि। से हमरा लोकनि देखल जे अतीत कें सोझरेबा मे सफल रहलाक बादो ओ अपन समकाल कें स्फुट करबा मे असफल रहि गेला। एकर प्रमुख कारण छल जे संस्कारवश ओ अपने रुचि कें अंतिम प्रमाण मानि लेलनि, जखन कि हुनक पक्षपात अतीतक प्रति छलनि। दोसर जे कविताक समीक्षाक लेल तं ई सिद्धान्त ठीक छल कारण एही बेगरता कें ध्यान मे रखैत एकर प्रवर्तन भेल छल मुदा आन आन विधा जेना कथा, उपन्यास आदिक लेल ई अपर्याप्त साबित भेल। तहिना, कविव्यक्तित्वक स्फुटन लेल तं ई सक्षम छल मुदा पाठाधारित विवेचना एकरा बुतें कदाचित संभव नहि छलैक।
            कुलानंद मिश्र मैथिली आलोचना कें मार्क्सवादी नजरिया प्रदान कयलनि आ अपन अनेक लेख द्वारा एकर प्रतिष्ठापन कयलनि। रचनाक भौतिकतावादी पृष्ठभूमिक विश्वसनीय विश्लेषण तं हुनकर लेखन मे अवश्य आएल आ एहि आधारक पर्याप्त पुष्टि सेहो जे कोना एक रचनाकार अपन समाजार्थिक परिस्थितिक उपजा होइत अछि, से वस्तु स्वयं मोहन भारद्वाजक लेखन मे सेहो पूरा स्पष्टताक संग आएल। मुदा, मैथिलीक मार्क्सवादी आलोचनाक ई विकट सीमा रहल जे ई अपन सैद्धान्तिकी नहि तैयार क' सकल। तें हमरा लोकनि देखब जे मैथिलीक मार्क्सवादी आलोचना मे पहिने तं सैद्धान्तिकीक पैघ-पैघ देशी-विदेशी उद्धरण रहैत अछि जकर कोनो सम्बन्ध मिथिला वा मैथिली सं सामान्यत: नहि रहैछ आ ने ओ मिथिलाक ऐतिहासिक वा समाजार्थिक पृष्ठभूमि कें खोलबा मे किछु मददगार भ' पबैछ।
            मोहन भारद्वाजक आलोचनाक महत्व एही ठाम आबि क' हमरा लोकनि बूझि सकैत छी। मैथिलीक मार्क्सवादी आलोचना मे जे सैद्धान्तिकीक फांक रहैक तकरा ओ मिथिला-विमर्श ल' क' भरलनि आ से करबाक क्रम मे मिथिलाक जन इतिहास, लोकपरंपरा, प्राचीन प्रगतिशील लेखन, लोकवादी परंपरित व्यवहार आदि कें आलोचनाक मुख्यधारा मे आनि प्रतिष्ठित कयलनि। कहब आवश्यक नहि जे ई सब उपक्रम मैथिलीक ऐतिहासिक-समाजशास्त्रीय आलोचना-पद्धतिक विकास लेल उठाओल पहिल सुनिश्चित डेग छल। 1995 मे ओ 'अनवरत' नाम सं अपन आलोचनात्मक लेख सभक पहिल संकलन प्रकाशित करौलनि। ओहू संकलन मे हमरा लोकनि हुनकर एहि अभिनव दृष्टिक झलकी पाबि सकैत छी। जेना जेना ओ अगिला संकलन सभक प्रकाशन करबैत गेला उत्तरोत्तर हुनकर दृष्टि स्फीत आ समावेशी होइत गेलनि। एतय धरि जे निधनक एके वर्ष पूर्व अपन पचहत्तरिम जन्मदिन पर जे पुस्तक ओ लोकार्पित कयलनि, से स्वयं मैथिली आलोचनाक हालसूरति आ भवितव्य पर केन्द्रित छल आ ताहि मे एक वस्तुनिष्ठ साहित्यविमर्शक सुचिन्ता अन्तर्ग्रथित रहैक।
            आलोचनाक भाषा एक भिन्न पक्ष थिक जाहि मे मोहन भारद्वाजक कयल काज हमरा लोकनि कें गौरवान्वित करैत अछि। सब गोटे अवगत छी जे मानक भाषाक सम्बन्ध मे रमानाथ झाक अपन आग्रह रहनि। ई आग्रह ताहिखन तं अत्यधिक प्रबल भ' जाइत छल जखन ओ आलोचना लिखथि। अपन कैक लेख मे तं ओ विधिपूर्वक ई व्यवस्था देने छलाह जे आलोचना जखन कखनहु लिखल जाय निश्चित रूप सं अपन विहित भाषा आ शैलिये मे लिखल जाय। हुनक ई सिद्धान्त वचन कतेक प्रभावकारी भेल तकर पता हम सब एक एही उदाहरण सं पाबि सकैत छी जे जे कुलानंद मिश्र रमानाथ बाबूक आलोचना-सिद्धान्त सं पूरे अलग होइत एक प्रतिरूप रचि देबा मे सफल भेला, हुनको बुतें हुनक एहि विहित भाषा आ शैलीक अनुशासन कें तोड़ब संभव नहि भ' सकल छल। ई काज मोहन भारद्वाज क' सकला, से कदाचित मैथिली साहित्य कें देल गेल हुनक सब सं पैघ अवदान थिक। पहिने जे आलोचना विहित शैली मे होयबाक कारण पूर्वबोधापेक्षी छल, मने ओकरा नीक जकां बुझबाक लेल पंडित विद्वाने लोक सक्षम भ' सकैत छला, आब से आलोचना साधारणो पाठक अपन यथालब्ध बोधक संग बुझबा मे समर्थ भ' गेल। मुदा जं ई कही जे सामान्य जनक भाषा मे आलोचना कें प्रस्तुत क' सकब कोनो सामान्य काज थिक जकरा क्यो बुद्धिमान व्यक्ति अभ्यास सं सिद्ध क' सकैत अछि, तं सेहो कहब गलत होयत कारण भीतरक अन्तर्वस्तु मे जा धरि स्पष्टता आ पारदर्शिता नहि रहतैक केवल बाहरी भाषा मे ओकरा व्यक्त क' लेब एक प्राणहीन कवायद मात्र भ' क' रहि जायत। एकरा लेल समाज संग, इतिहास आ आर्थिकीक संग जे चयन-विवेक, अवगति आ आपकता चाही तकरा साधबाक लेल कोनो लेखक कें ओहिना अपन जीवन समर्पित करय पड़ि सकैत छनि जेना मोहन भारद्वाज कयलनि। एकर कोनो शार्टकट होयब संभावित नहि अछि। कहियो भैयो नहि सकैत अछि।
            आइ जखन ओ हमरा लोकनिक बीच सं परोक्ष भ' गेलाह अछि, हुनकर अनुपस्थिति एक एक मैथिली अध्येताक हृदय सालैत अछि। मानू तं हुनकर उपस्थिति पर हुनकर अनुपस्थिति भारी पड़ि रहल अछि। हमर ख्याल अछि, जेना जेना मैथिली विषयक अध्ययन मे परिपक्वता आ वस्तुपरकता अबैत जयतैक, हुनकर कद आरो आर विराट होइत जायत।

@पटना, 7.2.2020

Friday, July 2, 2021

मैथिली आलोचना: स्थिति आ अपेक्षा


 तारानंद वियोगी



मैथिली आलोचनाक आइ की स्थिति अछि आ एकरा सं लोकक की अपेक्षा छै, ताहि पर हम गप करी, एहि सं पहिने कने एक नजरि एहि दिस देखि लेबय चाहब जे एहि आलोचनाक बारे मे आम लोकक समझ केहन छनि। आम लोक माने आम साहित्यक लोक, कारण शुद्ध रूप सं जकरा आम लोक कहल जाय ओकर प्रवेश आलोचना धरि हेबाक प्रश्ने कहां, आम साहित्यिक लोक सेहो आलोचना सं कनछी कटैत, हांजी हांजी करैत कहुना आगूक बाट पकड़ि बढ़ि जाय चाहैत रहैत अछि। आलोचना ककरा चाही? पुरस्कार सब पर जिनकर नजरि छनि तिनका लेल आलोचना बेकार, कारण पुरस्कार कोनो आलोचना पढ़ि क' नहि देल जाइत अछि।  जे स्वान्त:सुखाय लिखै छथि हुनका आलोचना सं काजे की? जे पकिया लेखक छथि हुनको आलोचना सं बहुत मतलब नहि कारण अपन रचनाशीलता कें आलोचना सं दग्ध हेबाक अवकाश ओ नहि छोड़य चाहैत छथि। 

       कतेक लोक दोसरो बात कहै छथि। कहै छथि जे माटि सं जुड़ल भाषा-समाज सब मे आलोचनाक लेल स्पेस कम रहैत छैक। ओतय हृदयधर्मी आपकताक चलन पाओल जाइत छैक, जखन कि आलोचना एक बौद्धिक  उपक्रम थिक। एहि तरहक सोच रखनिहार लोक सब निश्चिते कोनो भाषा मे ओकर आलोचनाक विकास कें ओहि समाजक बौद्धिक विकास सं जोड़ि क देखबाक आग्रही छथि। हमरा मुदा, एहू आग्रह मे कोनो दोष नहि देखाइत अछि। मैथिली माटिक भाषा छी। माटिक भाषा मे लोकक प्रकृत संस्कार सब सं बेसी घनगर रहैत छैक। लोक शिक्षा आ युगीनता बाहर सं सिखैत अछि। साक्षर हेबाक बादो लोक युगीनता कें सिखबा सं इनकार क सकै छथि, सेहो होइ छै।

         अपन स्थिति देखैत छी तं मोन पड़ैत अछि जे मैथिली आलोचनाक संग हमर संबंध कते पुरान अछि। 1982 मे, जखन कि हम एक सद्य:नवागंतुक कवि रही, ओही साल पटना मे नवतुरिया लेखक सम्मेलन आयोजित भेल रहै, आ ओहि मे साहित्यक प्रमुख विधा कविता पर आलोचना-सत्र मे लेख पढ़बाक जिम्मा हमरे पर छल। ओहि प्रसंग छत्रानंद बटुक भाइक ओ बात मोन पड़ैत अछि। पुछने रहथि की करै छी? उत्साह सं उत्तर देने रहियनि, राजकमल कान्वेन्ट स्कूल मे प्रिंसिपल छी। बाजल रहथि, ऐं यौ, तखन तं अहां स्कूलक मास्टर सब एखन धरिये पहिरैत हेता!  मतलब, मैथिली आलोचना मे हमर रुचि अत्यन्त प्राचीन अछि। तें लगभग चालीस वर्षक आलोचना कें निकट सं देखलाक बाद हम आलोचना सं अपेक्षाक बारे मे दू-चारिटा गप कहब आ उम्मीद करब जे एकर जे स्थिति छै से स्वाभाविके रूप सं एहि मे आबि जाएत।

         मैथिली आलोचनाक बारे मे आम राय की अछि? राय अछि जे एकर विकास नहि भ सकल। कि मैथिली मे आलोचना एकदम अवनत दशा मे अछि। जकरा देखू सैह आलोचना पर थुम्हा भरि थूक फेकैत नजर एता जे धुह, ई कोनो जोगरक नहि भ सकल। जे मैथिली आलोचनाक विकास सं सर्वथा अनजान छथि सेहो एहन कहैत भेट जेता जे मैथिली मे आलोचना एखन अपन बाल्यकाल मे अछि। उचिते, एहि तरहक स्थापना देबाक लेल एकमात्र अज्ञानते सं आत्मविश्वास भेट सकैत अछि।

         मुदा प्रश्न अछि जे आम राय एहन किएक अछि? मिथिला-समाज कें अहो रूपं अहो ध्वनि: चाहिऐक, आलोचना नहि चाहिऐक, की बात एतबे अछि आ कि एहि मे मैथिली आलोचनाक अपनो किछु दोख अछि? निश्चिते अपनो दोख अछि। से जं नहि होइत तं कोनो कारण नहि छल जे जाहि भाषा मे रमानाथ झा सन अतंद्र विद्वान आद्य आलोचक भेला, काञ्चीनाथ झा किरण सन तत्वदर्शी विचारक भेला, किसुन जी आ रामानुग्रह झा सन अध्येता समीक्षक, कुलानंद मिश्र आ मोहन भारद्वाज सन पक्षधर विमर्शकार भेला, राजमोहन झा आ जीवकान्त सन दूटूक टिप्पणीकार काज केलनि, अवसर एला पर यात्री जी आ राजकमल चौधरी सन यशस्वी लेखक आलोचनाक पक्ष मे ठाढ़ भेला, कोनो कारण नहि छल जे से आलोचना थूक फेकबा जोग स्थिति मे मानल जाय। तें दोख तं एहि मे आलोचनाक अपनो अछि।

         रमानाथ झाक आलोचनाक एक अध्ययन हम वर्ष 2006 मे प्रकाशित करौने रही। ओहि ठाम हम देखौने रही जे आलोचनाक उच्च मानदंड रचितो रमानाथ बाबू मैथिली आलोचना कें ताहि रूपें प्रतिष्ठापित करबा मे किए असफल रहला, जखन कि हुनके सन स्थिति मे होइतो रामचंद्र शुक्ल हिन्दी आलोचना कें प्रतिष्ठापित करबा मे सफल भेला। असल मे रमानाथ बाबू अतीत गौरवक निस्सन पक्षपाती रहथि आ हुनका लेल प्रयुक्त शब्द 'हंसवृत्ति' अथवा 'नीरक्षीरविवेकी' आदि सनातन जुमलाबाजी सं बेसी महत्वक बात नहि छल। आश्चर्यक बात छल जे टी एस इलियट कें अपन आदर्श मानितो ओ अतीतमुखिये बनल रहला आ युगीन लेखन सं लगभग निरपेक्ष आ असहमत बनल रहला। मैथिली आलोचना कें एकटा स्वरूप द क ओ ठाढ़ तं जरूर केलनि मुदा आलोचना-पुरुषक आंखि ओकर पीठ दिस निरमाओल गेलै, जकर रूपक एखनहु पं गोविन्द झा अपन आत्मकथा मे व्यवहार करै छथि। रमानाथ बाबू आलोचक मे पाओल जाइ बला गुण आ ओकर कार्यप्रणालीक दमदार मार्गदर्शिका बनौलनि आ वैचारिक गद्यलेखन कें शोध आ आलोचनाक रूप मे दू अलग अलग अनुशासन मे विभक्त केलनि। देखय चाही तं हमरा लोकनि देखि सकै छी जे रमानाथ बाबूक आलोचकीय मानदंड तते उच्च छलनि जे हुनक विशाल शिष्यमंडलीक होइतहु हुनका परंपराक क्यो आलोचक नहि भ सकला, जे भेला से विद्वान आ शोधप्रज्ञे भेला। हुनकर सीमा पाठ्यपुस्तक, विश्वविद्यालय आ पुरस्कार-प्रतिष्ठान धरि घेरायल रहल। आइ विश्वविद्यालय सभक मैथिली शोध विभागक की हाल अछि से ककरो सं नुकाएल नहि अछि।

         आधुनिक अर्थ मे जकरा ठीक ठीक आलोचना कहल जाय, तकर शुरुआत मैथिली मे किरण जीक लेखनक संग होइत अछि। मुदा, किरण जीक आक्रोशी आ विद्रोही स्वर अंत अंत धरि हुनका मे बनल रहलनि, एतय धरि जे अपन एक कविता मे, मृत्यु पर्यन्त ई स्वर हुनकर बनल रहनि तकर ओ कामना करैत सेहो देखल गेला। विद्यापति, उमापति, चंदा झा, किरतनिञा नाच, लोकपरंपरा आदि कतेको विषय छल जाहि पर रमानाथ बाबू सं किरण जीक घोर मतभेद छल आ तकरा ओ साफ साफ धारदार भाषा मे लिखबो केलनि। मुदा ओहि जुगजबानाक नायक रमानाथ झा रहथि आ तें किरण जी कें खलनायकक हैसियत भेटलनि आ हुनकर काज कें परिभाषित करबाक लेल एकटा नब शब्द क्वाइन कयल गेल--प्रत्यालोचना। गंहीर नजरि सं देखू तं आश्चर्य लागत जे एते भारी लोक आ सिद्धान्तकार भेलाक बादो मिथिला आ मैथिली कें ल क रमानाथ बाबूक भविष्यदृष्टि किरण जी जकां साफ नहि छलनि। तकर कतेको उदाहरण अछि। मुदा, जाहि तरहें विद्वत्समाज किरण जीक जीताजी हुनकर मूल्यांकन केलनि, ई बात सामने आएल जे 'प्रत्यालोचना' संभ्रान्त समाजक मान्यता आ शास्त्रसम्मत साहित्यदृष्टि के विरोधी चीज थिक। कहब जरूरी नहि जे जकरा ओ लोकनि प्रत्यालोचना कहि रहल छला, वस्तुत: वैह मैथिली आलोचना छल।

         रमानाथ बाबू अपन प्रभावशाली धीर-गंभीर व्यक्तित्व  आ कर्मठ ज्ञानकुशलताक कारण, अनेक प्रभावी शिष्यमंडली सं सुशोभित हिमालयक कठिन शिखर जकां अलंघ्य मानल जाइत रहथि। हुनकर सघन प्रभाव मैथिली साहित्य पर पड़ब अवश्यंभावी छल। मैथिली आलोचना एहि सं दीर्घकालिक रूपें प्रभावित भेल। एहि प्रभाव कें हम आइयो धरि घनगर बनल देखि सकै छी। दूटा दृष्टान्त। मैथिली आलोचनाक मूलस्वभाव अतीतगामी अछि। जे बीति चुकल छै, मैथिली आलोचना कें तकरे चिन्ता करैत देखबै। ओना तं आलोचना विधे अपन स्वभाव मे साहित्यक पश्चगामी होइत अछि, मुदा ओकर पयर अपना जुगक जमीन पर ठाढ़ रहै छै। बुझनिहार बूझि सकै छथि जे अतीतगामी हेबाक बात जे हम कहि रहल छी से एहि सं भिन्न बात थिक। दोसर, मानक भाषाक बहुत आग्रही रमाथ बाबू छला। आलोचनाक अपन विशिष्ट भाषा होइक तकर ओ व्यवस्था देलनि आ एहि व्यवस्था मे आलोचना आबद्ध बनल रहल। हमरा लोकनि आगूक विकास कें देखि चकित भ सकै छी। कुलानंद मिश्र मैथिली आलोचनाक दोसर पैघ सिद्धान्तकार भेला। ओ रमानाथ बाबूक समानान्तर आलोचनाक एक प्रतिरूप ठाढ़ केलनि। ओतय वर्गविभाजित समाज मे साहित्य कें भौतिकताक नजरि सं देखबाक आग्रह छल। समाजार्थिक आधार कोना साहित्य आ साहित्यकार कें उपयोगी आ कालजयी बनबैत छैक, तकरा ओहि ठा देखल जा सकैत छल। आठम-नवम दशक मे कुलानंद जी काज क रहल छला मुदा हुनकर विचारक अवधि आजादी बादक पांचम-छठम दशकक साहित्य छल। मुश्किल तं ई छल जे मानदंड मे रमानाथ बाबूक प्रतिरूप रचितो कुलानंद जीक आलोचना-भाषा रमानाथ बाबूक अनुगामी छल। हुनकर भाषाक जादू सं ओ बाहर नहि निकलि सकलाह। एहि भाषाक जादू कें तोड़ैत हमरा लोकनि मोहन भारद्वाज कें देखै छियनि। कदाचित यैह हुनकर सब सं पैघ देन छनि, यद्यपि कि क्षेत्रीय इतिहास आ स्थानीय समाजशास्त्र कें आधार बना ओ साहित्यालोचनाक एक नव परिपाटी विकसित केलनि। मजा के बात छै जे कि राजमोहन झा आ जीवकान्त अपन आलोचनात्मक लेखन मे अतीतगामिता आ मानक भाषिकता--एहि दुनू अपाय सं कहिया ने बहरा गेल छला। मुदा, हिनका लोकनिक मूल स्वर असहमतिमूलक छल, जकर तात्र्य जे मुख्यधारा ओ कोनो आन पद्धति कें मानि रहल छला, आ एहि तरहें इज्जति उतारितो मानि ओ ओकरे द रहल रहल छला। फलस्वरूप कोनो प्रतिरूप नहि रचि पाबि रहल छला।



              मैथिलीक आम समुदाय मे आलोचक कें नीक नजरि सं नहि देखल जाइछ। प्रकारान्तर सं ईहो वैह बात थिक जे एतय आलोचना कें कोनो जोगरक नहि मानल जाइछ। सामाजिक छविक दृष्टि सं जं विचार करी तं देखब जे कविताक चलन भने सब सं बेसी होउक मुदा कविक छवि कोनो निरस्तुकी पोख्ता छवि नहि अछि। कुलानंद मिश्र सन नास्तिको कवि छथि आ प्रदीप मैथिलीपुत्र सन आस्तिको। कथाकार अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति मे छथि मुदा नितान्त प्रतिगामी सोच रखनिहारो अनेक अयुगीन लोकक प्रवेश कथा-क्षेत्र मे छैक। एहि समस्त लेखक समुदाय मे सं एक आलोचके छथि जिनकर पोखता सामाजिक छवि बनि सकल अछि। परंपरित मैथिल मानदंडक हिसाब सं आलोचक आधुनिक होइत छथि, जिनका साबिक मे अंग्रेजिया कहल जाइन लगभग तेहने। अधिक तं संभावना जे ओ नास्तिक होथि, आ जं से नहियो तं पूजापाठ, धर्मकर्म नुका क, एकान्त मे करैत छथि। धर्मक विचार ओकरा मे नहि पाओल जाइछ। आचार विचार सं अपवित्र, अभक्ष्य खेनिहार, अविहित बरतनिहार। ऊपर सं भारी दोख ई जे राजनीतिक विचार सेहो रखैत अछि। सेहो कोन तं अधिकतर वामपंथी। 'बुद्ध अ इसन अन्हार' रट'बला मैथिल समाज एहि आलोचक समुदाय पर कोना भरोस क सकैत अछि? तें लोक थूक फेकैत छथि आ बजै छथि जे आलोचना कोनो जोगरक नहि भ सकल।

              जं आलोचकक पोख्ता छवि छैक तं अकानबाक विषय थिक जे एकर मने आलोचनाक कोनो तेहन उपलब्धि छैक की नहि? एखन हाल मे हम फेसबुक पर मिथिला स्टुडेन्ट यूनियनक एक विद्यार्थी आदित्य मोहनक एक पोस्ट देखैत रही। कोनो मित्र हुनका हरिमोहन बाबूक पुस्तैनी घर के वीडियो पठौने रहनि। ओहि घरक उजड़ल-उपटल अवस्था देखि क आदित्य बहुत दुखी रहथि आ अपील केने रहथि जे एहि महान साहित्यकारक घर मिथिलाक तीर्थस्थान थिक आ तें आउ, हम सब सामाजिक सहयोग सं एकर पुनर्निर्माण करी। सत्य पूछी तं आदित्यक ई पोस्ट पढ़ि क हमरा मैथिली आलोचनाक ताकत के अनुमान भेल छल। जेठजन कें मोने हेतनि जे एखन हाल तक हरिमोहन बाबू कें 'हास्यरसावतार' कहल जाइत छलनि। हुनका संबंध मे विद्वान लोकनिक राय की रहनि? पहिलुका जुग मे एकवाक्यीय आलोचनाक चलन रहै। जेना उपमा कालिदासस्य,जेना मुरारेस्तृतीयो पन्था:, जेना सूर सूर्य तुलसी शशी। तहिना हरिमोहन बाबू आ यात्री जी पर रहनि-'स्वच्छंद प्रोफेसर टांग-हाथ, दंतावलि पूर्वहि तोड़ि देल। दुर्भाग्य सं संप्रति मैथिलीक 'पारो' कपारो फोड़ि देल।'  प्राचीन परंपराक एहि आलोचकीय स्थापना सं हमरा लोकनि बूझि सकैत छी आजुक युगक दू प्रमुख शलाकापुरुषक बारे मे हुनका लोकनिक राय की रहनि। आइ जे हिनका लोकनिक प्रति समाजक सहमति-भाव छैक, से मैथिली आलोचनाक एक देन थिक। किरण जीक थोड़-बहुत शिकायत कें छोड़ि देल जाय तं हम सब देखब जे मैथिली आलोचनाक समस्त उपक्रम हरिमोहन झा कें समर्थन देबा मे एकमत अछि। किरण जीक जे शिकायत रहनि सेहो हुनकर व्यंग्य पर नहि, हुनकर हास्य पर रहनि आ तकरा द्वारा हुनकर आरोप रहनि जे हरिमोहन बाबू मे करुणाक अभाव रहनि। किरण जीक शिकायत मे सेहो सार रहनि कारण हम सब देखल जे प्रतिपक्षी जखन हुनका रफा-दफा केलकनि तं हास्यरसावतारे कहि क केलकनि। स्वयं राजकमल चौधरीक प्रतिष्ठा सेहो एहने उपक्रमक प्रमाण थिक। आइ जे हमरा लोकनि पढ़ैत छी जे पचासक दशक मे ललित-राजकमल आदिक कथा-युग मैथिली साहित्य मे आधुनिक युगक श्रीगणेश छल, ने कि अंधकार-कालक आरंभ, मोन रखबाक चाही जे एहि मे आलोचनाक केहन भूमिका छैक। दोसर दिस, आलोचना जे नहि क सकल से काज हेबा सं कोना छुटले रहि गेल तकरो दर्जनो उदाहरण हमरा सब लग अछि। जेना महाप्रकाशक कथा-साहित्य। आलोचनाक नजरि एखनहु नहि पड़ल अछि। जहिया पड़त तं पता लागत जे विश्वसाहित्यक दुर्लभ दृष्टान्त कोना मिथिलामिहिरक पन्ना मे हेरायल छै। मैथिलीक  मैनेजर लोकनि जरूरे आलोचनाक एहि ताकत सं वाकिफ छथि तें हमरा लोकनि देखैत छी जे राजकमल चौधरी पर जखन लिखबाक अवसर अबैत छैक तं ओ लोकनि प्राचीन विश्वविद्यालयीय विद्वत्ताक मूर्ति दिनेश झा कें आगू अनैत छथि, जाहि सं नीक जकां राजकमलक श्राद्ध केल जा सकय। आ से ई कोनो दुर्घटना नहि थिक, सुनियोजित कार्यप्रणाली थिक। एहि सं आलोचना पर लगातार थूक फेकैत रहबाक सुविधा बरकरार रहै छै।

              प्राचीन परिपाटीक विद्वान आ आधुनिक आलोचकक दृष्टिकोण मे जे अंतर छै, प्रसंगवश ताहू बारे मे हमरा लोकनि कें किछु गप करबाक चाही। रमानाथ बाबू भने एकाध ठाम अपना कें आलोचक कहि गेल होथि, मुदा ओ मूलत: विद्वाने छला आ सैह कहबाएब हुनका पसंद रहनि। हुनकर जे लेखनशैली अछि सेहो विद्वाने बला अछि। ओहि ठाम लोकतांत्रिक ढंग सं विमर्शक गुंजाइस नहि छैक, एकर बदला ज्ञाता हेबाक ठसक छै आ ताहि कारणें लहजा उपदेशात्मक छै। निरुपाय भेने आधुनिक लोकनि अपन प्रथम आलोचक के रूप मे रमानाथ बाबूक नाम लैत छथि। आ प्राचीन लोकनि कें आधुनिकक सामना करैत जखन निरुपाय भ जाय पड़ैत छैक तं ओ लोकनि रमानाथ बाबू कें बीच मे ठेलि अनैत छथि। पछिला तमाम वर्ष मे यैह खेल चलैत रहल अछि। मुदा, दृष्टिकोण? रमानाथ बाबू पांच सय सं बेसी पृष्ठ मे अपन विद्यापति संबंधी अध्ययन प्रकाशित करौलनि। ओहि मे विद्यापतिक कुलगोत्र-देवता-गुरु-आश्रय दाता आदि समस्त विषयक विशाल अध्ययन छैक। विद्यापति पर किरण जी सेहो लिखलनि आ रमानाथ बाबूक  अध्ययन मे झोल सेहो देखौलनि। हुनक कहब भेलनि जे विद्यापति कें देखबा लेल मैथिल आंखि चाही। मने इहो जे रमानाथ बाबू मे तकर अभाव छनि। ई 'मैथिल आंखि' शब्द आगू आलोचनाक एक विशिष्ट पारिभाषिक शब्द बनि गेल। ई आंखिबला मैथिल निश्चये रमानाथ बाबूक मैथिल सं भिन्न छल। ओतय जूगल कामति, छीतन खबास कें प्रामाणिक मैथिल मानबाक आग्रह छल। रमानाथ बाबू विद्यापति संगीत पर सेहो काज केलनि। ओ समय छल जहिया मिथिला कें नब नब विद्यापति भेटल रहनि आ सौंसे दुनियां पसरबाक गहमागहमी सं मैथिली समाज भरल छल। पचगछिया घरानाक मांगनलाल खबास गायकीक क्षेत्र मे सौंसे देश मे धूम मचेने छला। मांगनलाल विद्यापति कें सेहो गाबथि, आ से बेस प्रशंसित भ रहल छल। ओ पहिल गायक रहथि जे विद्यापति-गीत कें सोलो गेबा जोग धुन मे बन्हने छला, ने तं एहि सं पहिने स्त्रीगण उत्सव आदि मे आ नटुआ नाच मे एकरा जखन गाबथि, कोरस गाबैत छला। मांगनलाल के देखादेखी रामचतुर मल्लिक सेहो गाबय लागल छला। ग्रामोफोन रेकर्ड पहिल पहिल शारदा सिन्हा के बहरेलनि, से मोन रखबाक चाही जे शारदा जी पचगछिया घरानाक शिष्या रहल छथि। अस्तु। एक विशेषज्ञ अध्येताक रूप मे जखन रमानाथ बाबू लग ई प्रश्न उपस्थित भेलनि जे विद्यापति-संगीतक संरक्षण कोना हो, ओ व्यवस्था देलखिन जे विद्यापतिक गीत कखनहु सोलो नहि गाओल जेबाक चाही आ सदति कोरसे गेबाक चाही। वैद्यनाथ धामक पंडा लोकनि किरतन मे जेना विद्यापति गीत गबै छला तकरा ओ आदर्श रूप मानलनि आ तकर संरक्षणक जरूरत बतेलनि। ऊपर हम रमानाथ बाबूक भविष्य-दृष्टिक बात केने रही। तकर हुनका मे कोना अभाव छलनि से एहि ठाम बूझल जा सकैत अछि। सामाजिक प्रोत्साहनक अभाव मे विदापत नाच लुप्त भ गेल आ स्त्रिगणक कोरस निमुन्न मे पतराइत गेल। वैदनाथ धामक गीत ओकर अपनो किरतन सं समयक अनुसार गायब होइत गेल। आइ विद्यापति संगीत जं बचल अछि तं सोलो गायके लोकनिक उद्यम पर बचल अछि। दोसर दिस 'मैथिल आंखि' के अवधारणा समयक संग भकरार होइत गेल अछि आ हरेक युगक मिथिला अपन आदर्श एहि आंखि ल क ताकि लेत, ततबा पर्याप्त अर्थव्यंजना एहि मे भरल छैक। 



          एहि साल मैथिलीक प्रमुख आलोचक लोकनि मे सं एक मोहन भारद्वाज निधन भेलनि, तं तहिया सं मैथिली आलोचनाक प्रति विवेकी जनक हृदय मे बहुत चिन्ता होइत हमरा लोकनि देखि रहल छी। भारद्वाज जी पूर्णकालिक आलोचक रहथि आ मैथिली आलोचनाक इतिहास मे कैकटा नब स्थापना आ नब आलोचना-भाषाक लेल जानल जाइत रहथि। प्राय: दू दशक पहिने ओ 'सांस्कृतिक चेतना'क अवधारणा निरूपित कयने रहथि, जाहि पर सुभाष चंद्र यादव हुनका पर कटु आलोचना लिखने रहथि। समय साबित केलक जे सांस्कृतिक चेतनावादक अवसान दक्षिणपंथी अधिनायकवादे पर जा क होइत अछि आ एहि तरहें सुभाष जीक चिन्ता बेसी सही साबित भेल। मुदा, ई एक सिद्धान्तक बात भेल। अपन दू प्रमुख आलोचना पुस्तक  मे सं दुनू ओ श्रमजीवी मैथिल संस्कृतिक प्रतिष्ठापन मे लिखलनि। हुनकर लेख सब नब समाजार्थिक संदर्भ मे साहित्य कें देखबाक दृष्टि दैत छल। तें चिन्ता स्वाभाविक अछि कारण ओहि तरहक क्यो आलोचक आइ उपलब्ध नहि छथि। मुदा, हियासि क हमरा लोकनि देखी तं पायब जे जेना भारद्वाज जीक अपन खास विशेषता, खास ध्वनि छलनि, तहिना आनो अनेक लोक अपन अपन खास विशेषताक संग मैथिली आलोचना मे सक्रिय रहल छथि। भीमनाथ झा पुरान परंपराक लोक छथि मुदा अपन खास अंदाज मे नब रचनाशीलता कें जाहि तरहें परिभाषित आ मूल्यांकित करबाक काज ओ केलनि अछि सेहो फेर आन ठाम दुर्लभ अछि। हरे कृष्ण झा आलोचनाक क्षेत्र मे लगभग निष्क्रिय छथि मुदा कहियो कदाल जे हुनकर लेख सब अबैत अछि जे तेहन पारंगामी पाठालोचनात्मकता सं लैस रहैत अछि जे तकरो अन्य उदाहरण दुर्लभ अछि। तहिना सुभाष चंद्र यादव। असल मे, आजादी बादक तमाम समय मे जहिया सं मैथिली साहित्य मे आधुनिकताक प्रतिष्ठापन भेलैक अछि, मैथिलीक तमाम विधा मे काज केनिहार काबिल लेखक सब मे आलोचनात्मक विवेक पूरा प्रस्फुटित भेल भेटैत अछि। कहब जरूरी नहि जे जाहि आलोचनात्मक विवेक कें ल क क्यो लेखक दुनियांक यथार्थ मे सं अपन रचनाक लेल वस्तु तकैत अछि, एक नीक आलोचना लिखबाक लेल सेहो ओही आलोचनात्मक विवेक के खगता रहैत छैक। तें हमरा लोकनि देखैत छी जे मूलतः जे कवि छथि जेना सुकान्त सोम, नारायण जी, वा मूलतः जे कथाकार छथि जेना अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, वा जे कवि-कथाकार छथि जेना विभूति आनंद, देवशंकर नवीन, हुनका लोकनिक आलोचना युगीन ऊष्मा सं  भरपूर तं रहिते अछि, आलोचनात्मक विवेक सेहो प्रखर रहैत अछि। जखन कि विश्वविद्यालयक पेशेवर विद्वान सब मे एहि चीजक सिरे सं अभाव भेटत।

          रमानंद झा रमण एहि सब गोटे मे सब सं अलग छथि। ओ एखनुक समय मे एकमात्र पूर्णकालिक सक्रिय आलोचक छथि। हुनकर विषय विस्तार बहुत व्यापक छनि। प्रमुख क्षेत्र मुदा अतीते छियनि। जेना रमानाथ बाबू मध्यकालक अनेक अज्ञात, अचर्चित कवि सभक उद्धार केलनि, रमण जी अनेक आधुनिक अचर्चित अल्पचर्चित रचनाकार सभक कृति आम पाठक धरि सुलभ केलनि। हुनकर काज मे निरंतरता सेहो रहल अछि जे हुनकर अवदान कें पैघ बनबैत अछि। अतीतोन्मुखताक बन्हन कें तोड़ि क ओ युगीन रचनाशीलता कें विश्लेषित करबाक प्रयास सेहो केलनि अछि जकरा हुनकर दर्जनो निबंध मे देखल जा सकैत अछि। मुदा रमण जीक दूटा सीमा छनि जाहि कारणें ओ बन्हन तोड़ि क' बहरा नहि पाओल छथि। एक तं नव रचनाशीलताक प्रति अधिक काल असहमतिक स्वर, दोसर अपन रुचि कें अंतिम प्रमाण मानि लेब। एहि पर विस्तार सं कहियो गप हो तं नीक।

          आइ स्थिति एहन देखाइत अछि जे पूर्णकालिक आलोचकक भरोसें मैथिली आलोचना कें तहिना नहि छोड़ल जा सकैत अछि जेना विश्वविद्यालयीय पेशेवर आलोचनाक भरोसें नहि छोड़ि सकैत छी। हम देखैत छी जे आलोचनाक रैखिक विकास तं खूब भेल अछि, क्षैतिज विकास मे अवश्य कमी अछि। आलोचना मे कोनो एक नवीन अवधारणा एलाक बाद अनेक दृष्टि सं, अनेक आयाम कें ल क ओकर बारंबार व्याख्याक जरूरत रहैत छैक। अक्सरहां असहमति आ विवादक विना कोनो अवधारणा अपन पूर्ण प्रस्फुटन पर नहि पहुंचि सकैत अछि। एहि सब काजक लेल अनेक व्यक्ति चाही। तकर अभाव अवश्य अछि। एक सं एक स्थापना अबैत छैक आ से किताबक, पत्रिकाक पन्ना मे दबल रहि जाइत छैक

           जे लोकनि हल्ला करैत छथि जे आलोचना एखनो नाबालिग अछि से जं हल्ला करबाक बदला ओहि स्थापनाक विरुद्ध एक टिप्पणी लिखि क प्रकाशित करौने  रहितथि आ सैह आनो लोक करतथि तं कहिया ने ई बालिग भ गेल रहैत। वैह बात अछि। हमही सब एकरा अपन अकर्मण्यता सं नाबालिग बनेने छियैक आ हमही सब भोकरै छी जे ई नाबालिग अछि।

           मैथिली आलोचना कोन तरहें अपन स्पष्ट छवि आ शाफ स्वरूप बना चुकल अछि तकर दृष्टान्त लेल हम नवतुरिया लोकनिक लेखन दिस संकेत करब। जाहि नवागंतुक लोकनिक दृष्टि एखन साफ नहि भेलनि अछि आ ने पक्ष मजगूत, ओहो  जखन वैचारिक गद्य लिखै छथि तं आधुनिक आवाज मे, आलोचनाक शैली आ शब्दावली अपनाबैत बजबाक कोशिश करैत छथि। ई अपना आप मे एकटा साक्ष्य थिक जे मैथिली आलोचनाक स्थिति ओते दुर्गत नहि अछि जते भाइ लोकनि प्रचारित करैत छथि।

           एतय हम एकटा सूची राखय चाहै छी जाहि मे आजुक समयक चुनौती कें उठा सकबा मे सक्षम किछु लोकक नाम छैक। पहिल पंचक मे रमानंद झा रमण छथि, जिनकर अतंद्र अन्वेषकता कैक बेर हमरा लोकनि कें रमानथ बाबूक स्मरण करा जाइत अछि। विभूति आनंद छथि जे एक नब तरहक आलोचना-भाषा, संस्मरणात्मक आलोचना-भाषाक अन्वेषक आ प्रयोक्ता छथि। संपूर्ण ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मे युगीन साहित्य कें बुझबाक हो तं अशोक छथि, जे मैथिल आंखिक व्यापकताक संधानी छथि। युगीन परिवेश कें रचना कोना अपना संग जज्ब केने रहैत छैक आ तकरा अपन अभिप्राय मे परिणत करै छै, ताहि पर देशंकर नवीनक काज देखबा जोग अछि। तहिना, रचनाक मूल पाठ अपना भीतर कोना हजारो तरहक सामाजिक संवेदना आ तकर अन्तर्कथा धारण केने रहैत छैक ताहि पर शिवशंकर श्रीनिवासक मूल्यवान काज अछि। मैथिलीक ओ पहिल आलोचक छथि जे मूलतः कथालोचकक पहचान बना सकल छथि। दोसर सूची मे पांचटा एहन युवा रचनाकार छथि जे आन आन विधा मे काज करितो समय समय पर अपन आलोचनात्मक लेखन सं आश्वस्त करै छथि। एहि मे छथि पंकज पराशर, श्रीधरम, कमलमोहन चुन्नू, रमण कुमार सिंह आ अजित आजाद। सारंग कुमार आदि सेहो एहि मे शामिल भ सकै छथि जे पहिनेक अपन लेखन सं अपन आलोचकीय क्षमताक प्रति आश्वस्त केने छथि। कहल जाय तं चुनौती उठेबाक असली जिम्मेवारी हिनके लोकनि पर छनि। तेसर सूची मे पांचटा एहन नाम छथि जे मैथिलीक नवागंतुक रचनाकार छथि, आन आन विधा मे लिखै छथि आ जिनकर आलोचकीय क्षमता दिस हमर ध्यान गेल अछि। एहि मे छथि अरुणाभ सौरभ, चंदन कुमार झा, रघुनाथ मुखिया, विकास वत्सनाभ आ ।  ई युवा लोकनि जं अपन आलोचनात्मक क्षमता संग जं जतन करथि तं अपना जे रचनात्मक लाभ हेतनि से तं हेबे करतनि, मैथिली आलोचनाक सेहो गहमागहमी बढ़तैक। 



         अपेक्षाक जहां धरि बात छै, से कोनो अलग सं होइत हो से हमरा नहि बुझाइत अछि। स्थिति जे अछि से सैह अपेक्षा दिस इशारा करैत रहैत छैक। जतय स्थिति कमजोर देखै छी, ओतय सब गोटें मिलि क जोर लगा दियैक, सैह भेल अपेक्षा। अपेक्षा तं हमर सब सं पहिल यैह अछि जे मैथिली आलोचनाक अतीतगामिताक स्वभाव कें हम सब बदली। किछु गोटे के अतीत मे गेनाइ सार्थक होइत छैक। जेना मोहन भारद्वाजक डाकवचन लग गेनाइ। मुदा, मात्र एही लेल हम अतीत मे जाइ जे आलोचनाक टूल्स तहियेक बनल छै, आगूक बनले नहि छै, एकरा हम पथभ्रष्टता बुझैत छी। यदि निकष(टूल्स) के नमूना उपलब्ध नहि छै, तं हमरा बनेबाक चाही। असगरे बनायब जं पार नहि लगैत हो तं जतबा बना सकै छी, बना क अगिला कें बढ़ा देबाक चाही। 

         दोसर बात जे हमरा सब कें ई अपसोच मोन सं निकालि देबाक चाही जे मैथिली मे पूर्णकालिक आलोचक नहि अछि। असल मे युग एहि हिसाब सं मोड़ लेलक अछि जे आगू पूर्णकालिक आलोचक होयबो मुश्किल अछि। क्रिएटिव राइटिंग बेसी चोख भेलैए आ से प्रतिभाशाली सब कें सिद्दत सं आकर्षित करै छनि। आलोचना के कोनो शिक्षा नहि छै। एते एते विश्वविद्यालय मे एते एते शिक्षक मैथिली पढ़ा रहल छथि मुदा ढंग के एकटा आलोचक नहि तैयार भ' सकल। जे अबैत छथि तिनकर साहित्यक समझ क्रिएटिव राइटक स्तर सं बहुते बहुत नीचां रहैत छनि। दोसर छै जे आलोचना लेखन मे लेखक कें बरक्कति नहि छैक। आलोचक कें नापसंद कयल जाइ छै। आलोचना विधा कें द्वितीय श्रेणीक विधा मानल जाइछ। ओहि मे सम्मान नहि छै। देखबे केलहुं जे मोहन भारद्वाज सन के आलोचक कें साहित्य अकादेमी अन्तो अन्त धरि पुरस्कार नहिये देलक आ अपन नकारापन के, नासमझी के सुंदर उदाहरण प्रस्तुत केलक। मोहन भारद्वाजक परोक्ष भेला सं चिन्तित तं सब क्यो छी, मुदा हमरा सभक भाषाई प्रबंधन कोन तरहें सुधरय से नहि क्यो क पाबि रहल छी।     

           ई एक बात। दोसर जे हरेक क्रिएटिव लेखक कें आलोचना सेहो जरूर लिखबाक चाही। नहि लिखबाक पाछू भय रहैत छैक अपना छुटि जयबाक। अपन नाम लिय' तं सेल्फ प्रोमोशन जकां, तुच्छ काज जकां लगै छै। नहि करियौ तं अपना प्रति अपने कयल अन्याय जकां लगै छै। तें ई भय बहुत वाजिब थिक। मुदा हम तैयो कहब जे लिखबाक चाही कारण आलोचना लिखबाक सुख एक अलग तरहक सुख होइत छैक। ई सुख छै जे हम अपन युग कें देखि रहल छी। द्रष्टा छी हम तं हमरा अपने ओहि दृश्य मे किएक हेबाक हेबाक चाही? ई सुख हमरा आलोचना द सकैए। बाकी आगूक लोक जखन देखता तं अपन सुधारि क देखता। ई हुनक टेन्सन छियनि। हमरा लिखबाक चाही।

           नब सं नबो लोक कें आलोचना लिखबाक चाही। बाधा जे पैदा करैत अछि से से छी अल्पज्ञताक भय। आलोचना लिखबा सं पहिने खूब पढ़ि लेबाक मोन करै छी। आब झंझट ई छै जे पढ़बाक आनंद एक अलगे संप्रदाय के आनंद थिक। ओकरा सामने मे लिखनाइ तुच्छ। एहि प्रकारें अल्पज्ञताक भय आलोचनाक उत्साह कें ध्वस्त क दैत छैक।  तें युवा कें अपना पीढ़ीक बारे मे लिखबाक चाही। ओतय अल्पज्ञताक खतरा न्यून रहै छै। एहि सं असली फैदा ई छै एहि सं आलोचनाक वातावरण सुरभित लगै छै। क्यो आइ पर लिखि रहलाहे, क्यो पछिला दशक पर, क्यो क्यो अतीतो मे आवाजाही बनौने छथि। एखन जे मुरदनी छाएल छै तकर एहि सं निस्तार होयत। 

           तहिना, पुरान प्रतिष्ठित कैक गोट रचनाकार एम्हर फेर सं सक्रिय भेल छथि जेना ललितेश मिश्र, महेन्द्र, गंगानाथ गंगेश आदि। हिनका लोकनिक आलोचकीय क्षमता अचूक छनि। रामदेव झा अपन लेखन आब स्थगित क चुकल छथि। मुदा, कतेक नीक होइत जे क्यो गोटे तैयारी क क हुनकर आ हुनका सन आनो लोकक इन्टरव्यू करितथि। हमरा सभक जबाना मे नब लेखक पुरान रचनाकार सब सं बराबर इन्टरव्यू लेथि, तकर प्रकाशन सं सबहक उपकार होइत छल। सुभाष चंद्र यादव, सुकान्त सोम आ हरे कृष्ण झा आइ लिखि नहि पाबि रहल छथि तं अपेक्षा अछि जतबे होइन लिखथु।

           मोहन भारद्वाज एक समय मे 'मैथिली आलोचना' नाम सं एक पत्रिका निकालब शुरू कयने रहथि, से मोन पड़ैत अछि तं होइत अछि जे एहि खगता कें सेहो क्यो गोटे उठाबथु।

           मैथिली आलोचना कें बेकार आ आलोचक कें पूर्वाग्रही कहब बहुत आसान छै। ततबे आसान जतबा गांधी जी कें बैमान कहब। क्यो उनटि क' उपराग देबय नहि आओत, ने गांधी जी दिस सं ने आलोचना दिस सं। मुदा, मोन राखल जाय, यैह समय होइ छै जखन विवेकी जन कें मूल जड़ि पकड़य पड़ैत छै आ अपन भूमिका तय करय पड़ैत छैक।

Tuesday, June 29, 2021

बाबा नागार्जुन का अपना शहर


 बाबा नागार्जुन का अपना शहर


तारानंद वियोगी


जेठ पूर्णिमा के दिन बाबा नागार्जुन का जन्म हुआ था। 1911 ईस्वी की यह पूर्णिमा 11 जून को पड़ी थी। लेकिन वह ताउम्र अपना जन्मदिन, 11 जून को नहीं, जेठ पूर्णिमा को ही मनाते। अलग-अलग वर्षों में यह अलग-अलग तारीखों को पड़ती थी। यायावर आदमी थे। भारत के कितने ही शहरों में उनके प्रेमियों ने उनका जन्मदिन उनकी संगत में मनाया होगा। सबसे ज्यादा बार अपने जन्मदिन पर यदि वह किसी एक शहर में उपलब्ध रहे भी, तो वह हिमालय का सुदूरवर्ती कस्बा जहरीखाल था, जहां उनके अत्यन्त प्रिय वाचस्पति रहते थे। लेकिन, वह भी उनका अपना शहर नहीं था। खास अपना जिसे कहा जा सके वह शहर दरभंगा भी नहीं था। दरभंगा से उन्हें कई शिकायतें थीं। महानगरों में उन्हें कलकत्ता पसंद था। लेकिन, अपना शहर जिसे कहा जाए वह तो पटना ही था।

               पटना का जुड़ाव नागार्जुन के जीवन की  लगभग समस्त मोड़ों से रहा है। जब वह एक बौद्धभिक्षु के भेस में आकर स्वतंत्रता-संग्राम की एक अपर धारा, किसान आन्दोलन से जुड़े, सहजानंद सरस्वती और राहुल सांकृत्यायन के साथ सक्रिय राजनीति में उतरे, तब भी इन सब कार्यों की आधारभूमि पटना शहर ही थी। यहीं से वह राहुल जी के साथ अमवारी भी गये थे, सुभाषचन्द्र बोस के साथ लगभग सारे बिहार घूमकर उनकी सभाएं करवाई थीं, यहां तक कि आजादी के बाद पहली बार जब गांधी जी की हत्या पर कविता-सिरीज लिखने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया तो पटना जेल में ही बंद किए गये। दूसरी ओर, बिहार का सर्वोच्च सम्मान राजेन्द्र शिखर सम्मान मुख्यमंत्री के हाथों जहां उन्हें प्रदान किया गया वह जगह भी पटना ही था।

               1940 के ही दशक में जब नागार्जुन ने सक्रिय राजनीति के स्थान पर साहित्य-लेखन को अपना प्रधान कार्य बनाया, उन्होंने अपने रहने की जगह इलाहाबाद चुनी। लेकिन परिवार गांव में रहता था जहां से इलाहाबाद दूर पड़ता था। उन्होंने व्यावहारिक निर्णय लिया कि ऐसी जगह रहें जहां से कुछ घंटों के सफर से गांव पहुंचा जा सके। वह जगह पटना था।  अक्सर वह भारत भर की यात्रा करते रहते थे, लेकिन अपना एक डेरा पटना में जरूर रखते। पटना के बारे में उनकी राय थी कि यहां समूचा बिहार बसता है। बिहार के सभी सांस्कृतिक क्षेत्रों की भाषाएं, रहन-सहन, खान-पान यहां एकाकार दिखता था। वह खुद भी जैसी भोजपुरी बोलते, वैसी ही मगही। जबकि उनकी मातृभाषा मैथिली थी। मैथिलों की प्रतिनिधि संस्था चेतना समिति की स्थापना उन्होंने पटना में की, जिसके लिए जाने कितने संघर्ष उन्हें करने पड़े। वह कहते थे-- पटना क्या है? बिहार का एक विशाल गांव है। 

               वह जमाना पटना के इतिहास में भी साहित्यिक सक्रियता का स्वर्णकाल था। राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाएं पटने से निकलती थीं। कई महारथी थे जिनके पास अपना सुविधासंपन्न प्रेस था और वे साहित्यिक पत्रिकाएं ही निकालते थे। 'बालक' समूचे देश में बाल-साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित पत्रिका थी, जिसके नागार्जुन आगे चलकर संपादक भी हुए थे। ऐसी ही एक पत्रिका 'अवंतिका' थी। इन सब में नागार्जुन नियमित लिखते जो उनकी आय का एकमात्र स्रोत होता था। ग्रन्थमाला कार्यालय यहां उनका ठिकाना बना और इसी के संचालक रामदहिन मिश्र ने पहली बार उनसे उपन्यास लिखवाया था। मिश्र जी हिन्दी के लेखक-प्रकाशक थे जबकि नागार्जुन अपना पहला उपन्यास मैथिली में लिखना चाहते थे। रामदहिन मिश्र नागार्जुन के भीतर छिपे एक बड़े उपन्यासकार को देख पा रहे थे। उन्होंने पहली बार उस मैथिली किताब को छापा जिसकी सारी प्रतियां चंद महीनों में बिक गयीं। उधर मिथिला में तो इस  उपन्यास ने हाहाकार ही मचा दिया था। वह 'पारो' था। 

               15 अगस्त 1947 को, आजादी के दिन नागार्जुन पटने में थे, और उस दिन उन्होंने एक यादगार कविता लिखी थे। अपने पार्टी-लाइन से अलग जाकर स्वतंत्रता दिवस के इस पहले सूर्योदय को उन्होंने बहुत उम्मीद से देखा था। दूसरे लोग जहां काला दिवस मना रहे थे, नागार्जुन ने इस अवसर को उत्सव की तरह लिया था, मिठाई बंटवाई थी। सत्ता के वह लगातार अतन्द्र आलोचक बने रहे। यही कारण है कि आगे जब लोकतंत्र को कुचलने का प्रयास हुआ, बिहार से ही संपूर्ण क्रान्ति का आह्वान किया गया। जयप्रकाश नारायण ने अपने आन्दोलन में बौद्धिकों और संस्कृतिकर्मियों, साहित्यिकों की भागीदारी मांगी। पार्टी-लाइन से बाहर जाकर नागार्जुन एक बार फिर से आन्दोलन में कूद पड़े थे। गांधी मैदान में आयोजित जेपी की वह जो ऐतिहासिक सभा थी, जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि उतने लोगों का एक साथ जुटान आज तक कभी गांधी मैदान में न हो सका, जेपी ने अपने भाषण की शुरुआत इन्हीं संबोधन शब्दों से की थी, 'आदरणीय नागार्जुन जी, फणीश्वरनाथ रेणु जी....'

               पटना की गली-गली को नागार्जुन पहचानते थे, और गलियां उन्हें पहचानती थीं। आज जब वह नहीं हैं और आधा पुराना आधा नया पटना अपनी नयी पहचान के लिए उतावला बना हुआ है, नागार्जुन की बातें शिद्दत से याद आती हैं।

Sunday, June 27, 2021

बंगट गवैया: मिथिला का एक अचीन्हा जीनियस



 बंगट गवैया: मिथिला का एक अचीन्हा जीनियस


तारानंद वियोगी


पिछले दिनों महिषी की एक विलक्षण विभूति का अवसान हो गया। उनका नाम ताराचरण मिश्र था लेकिन सदा से सब उन्हें बंगट गवैया कहते थे। गरीब ब्राह्मण थे, और उदार भी। अंत-अंत तक उनकी गरीबी और उदारता दोनों बनी रहीं। 

        तारास्थान परिसर के निवासी और संगीत-मंडलियों के समाजी होने के कारण बचपन से ही मुझे उनकी संगत मिली। बचपन से ही हम यह अचरज करना सीख गये थे कि उनके गले में सरस्वती का वास है। उनके पास जो गीतों का चयन था वह भी बहुत आश्चर्यजनक था। वह निराला, पंत, दिनकर, गोपाल सिंह नेपाली के दुर्लभ गीत गाते। दिनकर का यह गीत 'माया के मोहक वन की क्या कहूं कहानी परदेसी' या फिर नेपाली का यह गीत 'बदनाम रहे बटमार मगर घर को रखवालों ने लूटा' तो उनसे सुना कई लोगों के स्मरण में होगा। एक यह गजल भी वह बहुत ही जानदार गाते थे-- 'न आना बुरा है न जाना बुरा है\  फकत रोज दिल का लगाना बुरा है।' यह सब लेकिन, अधिकतर गुणिजनों की महफिल में होता जहां कई बार मुझे भी शरीक होने का अवसर मिला था। चन्दा झा की रामायण का गायन भी पहली बार मैंने उनसे ही सुना था। विद्यापति को तो इतनी तरह से गाते कि वह अलग ही चकित करता था। ठीक यही बात कबीर के पदों की गायकी के साथ थी। उनका जन्म 1940 के आसपास का रहा होगा। एक बार उनसे मैंने जानना भी चाहा था कि इस धुर देहात में ये सब गुण उन्होंने कहां सीखे? बताते थे कि बचपन में ही नाटक-मंडलियों के साथ लग गये थे और बाद में पंचगछिया घराने के कुछ संस्कारी गुरुओं की संगत में रहे थे। 

        विद्यापति के गीत 'पिया मोर बालक' को वह कुछ इस तरह गाते कि स्त्री की पीड़ा के नजरिये से देखें तो रुलाई आने लगती थी। द्रुत और विलंबित का एक ऐसा समीकरण बनाते कि मेरे पास उस अनुभव को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं। शायद संगीतशास्त्र के जानकार ही उसे व्यक्त कर पाएं। मैंने यह गीत कई गवैयों, यहां तक कि पं. रामचतुर मल्लिक से भी, सुना था। उनके और इनके गायन में मुझे गोचर होने योग्य अंतर दीखते। एक बार मैंने जिज्ञासा की कि काका, ये क्या है? बताया तो उन्होंने काफी देर तक, लेकिन मेरी स्मृति में बस यही है कि यह अंतर घराने (अमता और पंचगछिया) की गायकी-शैली के कारण है। विद्यापति संगीत के आधुनिक रूप को वह पंचगछिया घराने का अवदान मानते थे।

        एक बार पं. मांगनलाल खवास के बारे में बात चली तो पता चला कि मांगन जी के लड़के लड्डूलाल जी की संगत में रहे थे और उन्हें गुरुस्थानीय मानते थे। मांगनलाल का काफी यश सुना था और उनकी ढेर सारी कहानियां उनके पास थीं। बताने लगे-- गायक तो परमात्मा का दुलारा और अपना बादशाह आप होता है न! उसे क्या परवाह कि बड़े लोग उसे किस नजर से देखते हैं। वह दरअसल उस प्रसंग की ओर इशारा कर रहे थे कि लहेरियासराय की एक संगीतसभा में मांगनलाल जी ने आग्रह-दुराग्रह में पड़कर अपनी प्रस्तुति दे दी और यह बात उनके आश्रयदाता को इतनी बुरी लगी कि केवल इसी अपराध पर राजकुमार विश्वेश्वर सिंह ने उन्हें अपने दरबार से निकाल दिया था।

        गरीबी ने बंगट जी को समझौते के लिए बाध्य किया। बाद में वह राधेश्याम कथावाचक की रामायण गाने लगे जिसे हमारे इलाके में विषय-कीर्तन कहा जाता था। लेकिन इससे भी महिषी में उनका गुजारा संभव नहीं हुआ। उनका लगभग समूचा उत्तर-जीवन सिंहेश्वरस्थान, मधेपुरा में बीता जहां के लोगों में उदारता भी अधिक थी और वहां तीर्थयात्री भी अधिक आते थे। वह स्पष्ट बताते थे कि जितनी गुणग्राहकता और श्रद्धा उन्हें यादव और बनियों से मिली, उतनी ब्राह्मणों से नहीं। वह नाभिनाल बद्ध शाक्त थे। कहते-- शक्ति का उपासक वर्ण और लिंग का भेद नहीं जानता। उसके लिए क्या शौच, क्या अशौच, सब केवल महामाया की विविध छवियां हैं। तंत्रसाधक होने का गौरव भी उन्हें पूरा था, लेकिन मैथिलों की परंपराप्रियता पर कभी खीजते तो अपने को 'कुजात ब्राह्मण' बताते थे और उदाहरण के लिए राजकमल चौधरी का नाम ले आते थे, जिन्हें वह अपना आदर्श पुरुष बताते थे।।

         नवरात्र और होली के मौके पर वह गांव जरूर आते। यह मातृभूमि का प्रेम तो था ही, उनका परिवार भी हमेशा गांव में ही रहा। कभी आर्थिक जरूरत होती तो बेटा जाकर पैसे ले आता था। मूडी आदमी थे। कोई गाने का आग्रह कर दे और वह तुरंत गाने को तैयार हो जाएं, ऐसा कम ही होता था। हारमोनियम जब सम्हालते, तब भी अपनी रौ तक पहुंचने में उन्हें वक्त लगता था। लेकिन उनकी अपनी भी कुछ चाहतें थीं। हमारे गांव में होली के एक सप्ताह पहले से ही संगीत-गोष्ठियों का दौर शुरू हो जाता था। यह ज्यादातर किसी व्यक्तिविशेष के दालान पर होता था। वह गांव में होते तो इन गोष्ठियों में जरूर पहुंचा करते थे। कभी तो ऐसा होता था कि उन्हें आया देख गृहपति सकुचा जाता--अरे, गवैया जी। हमें तो पता ही नहीं था कि आप गांव में हैं। लेकिन वह तो अपनी चाहत के रौ में होते थे।

          महिषी की आज की जो युवापीढ़ी है, उसने कभी न कभी साधनालय में बंगट गवैया का विषय-कीर्तन जरूर सुना होगा। किसी में गुण हो तो वह उसके किये सभी कार्यों में प्रतिध्वनित होता है। वह आत्यन्तिक रूप से दीक्षित शाक्त थे, और वैष्णव किसी भी तरह नहीं। तांत्रिकों की गुरु-परंपरा के पूरे पालनकर्ता थे। रामकथा के साथ उनका कोई पुराना वास्ता भी नहीं था। लेकिन, एक बार जब इसे अपना लिया तो इतनी महीनी और हार्दिकता उसमें भर दी कि एक दिन कोई उन्हें सुन ले तो वर्षों तक उस अनुभव को भूलना कठिन रहता था। गायकी की उनकी गुणवत्ता अंत अंत तक बनी रही। छूटी तो गायकी ही छूट गयी, गुणवत्ता नहीं। कभी कभी हम जो चैती महोत्सव करते, या फिर युवा गायकों की गायन-प्रतियोगिता जिसमें उन्हें निर्णायक के रूप में बुलाते थे, वह खुशी खुशी शामिल होते थे। कभी-कभी अगर दबंग घरों के लड़के बेईमानी के लिए दबाव बना दिया करते, वह अड़ जाते थे। उनका अड़ना हमें बहुत ताकत देता था।

        राजकमल चौधरी जब अपने आखिरी दिनों में गांव में रहने आए, उनकी अत्यन्त विश्वस्त युवा-वाहिनी में बंगट गवैया भी एक थे। इन सबके बारे में अनेक लोगों ने जहां तहां लिखा है। हमारे मित्र देवशंकर नवीन तो उस किस्से को बहुत ही रोचक ढंग से सुनाते हैं कि कैसे जब एक बार बाहर के बहुत सारे लेखक राजकमल के मेहमान हुए तो उन्होंने शाम का कार्यक्रम बंगट गवैया का गायन तय किया था। लेकिन, ऐन मौके पर बंगट फरार। लाख खोजे जाने पर भी वह कहीं नहीं मिले तो लाचारी में प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ा। दूसरे दिन की सुबह बेंत लेकर राजकमल बंगट को खोजने निकले तो सबको यकीन था कि बंगट का हाल बेहाल होना आज तय है। लेकिन, खोजते खोजते जब वह तारास्थान परिसर में पाए गये, राजकमल ने उन्हें पकड़ लिया और बाबूजी बड़ई की दुकान पर आ धमके। कहा--आज इसे नाक तक दही-चूड़ा-पेड़ा खिलाइये। यही इस अभागे का दंड है। कभी बात उठे तो वह खुद भी राजकमल के एक से एक दुर्लभ प्रसंग बड़ी तल्लीनता से सुनाते थे। एक दिन मैंने पूछा था कि उस रोज आप कहां चले गये थे कि फूलबाबू को इतनी तरद्दुद उठानी पड़ी। कहने लगे-- असल में शाम के प्रोग्राम की बात ही हम भूल गये थे। कोशी इलाके में एक खास जगह पहुंचने का आग्रह बहुत दिन से हो रहा था, शाम को वहीं चले गये थे। उन्हें कहां मिलते?

        पिछले कई वर्षों से मैं उनकी गायकी पर एक डाक्यूमेन्ट्री के लिए उन्हें तैयार कर रहा था। लेकिन, काफी दिनों से उनका स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था। दुख है कि मेरी यह साध पूरी नहीं हुई।

        इस चित्र में उनकी गायकी की एक मुद्रा दिखेगी। गीत का अगला पद अब वह गानेवाले हैं। आंखें बंद कर ली हैं। भीतर कुछ जनम रहा हो जैसे, वह आभा चेहरे पर है। उन्हें सुन चुके लोग जानते हैं कि यह उनकी पसंदीदा मुद्रा थी। यह चित्र 2015 के चैती महोत्सव का है जो महिषी के पाठक बंगले पर आयोजित हुआ था।

Monday, January 11, 2021

धूमकेतुक नवोपलब्ध उपन्यास 'सरहद'


 


तारानंद वियोगी

बीसम शताब्दीक मिथिला मे किछु गनल-गुथल एहन लेखक भेलाह जे मातृभाषा मैथिली टा मे लिखितहु विश्व-स्तरक साहित्य-निर्माण क' सकलाह। एहने एक लेखक धूमकेतु(1932-2000) रहथि। हुनकर अविस्मरणीय ख्याति कथाकारक रूप मे छनि। हुनक निधनक बाद हुनकर एक महागाथात्मक उपन्यास 'मोड़ पर' नवंबर 2000 मे प्रकाशित भेल, मुदा ताधरि ओ अपने एहि संसार सं विदा भ' चुकल छलाह। एहि तरहें, हुनकर उपन्यासकारक रूप सं मैथिली पाठकक परिचय हुनकर निधनक बादे भ' सकलै। ओना, केदार काननक आग्रह पर 'सन्निपात' नामक उपन्यास 1998 सं ओ लिखब शुरू कयने छलाह। हुनका जिबैत जी एकर एकेटा अंश 'भारती मंडन' अंक चारि मे 1998 मे प्रकाशित भ' सकल रहनि। दोसर किश्त अंक सात मे जा जा प्रकाशित होइतनि, ओ विदा भ' चुकल छलाह। कुल मिला क' एकर ओ पांच अध्याय लिखि सकल रहथि। एखन धरि लोक हुनकर एही दुनू उपन्यास कें जनैत अछि।

हाल मे हुनकर तेसर उपन्यास 'सरहद' हुनकर पुरान डायरी मे लिखल भेटल अछि। इहो एक अपूर्ण उपन्यास थिक। 1989 इस्वीक डायरी मे एकरा ओ डिक्टेट क' क' लिखेने छला। जेना कि हुनकर पाठक अवगत छथिन, अनेको वर्ष सं धूमकेतु अपने लिखबा मे असुविधा महसूस करथि आ डिक्टेशन लेबाक काज हुनकर ज्येष्ठ पुत्री स्वर्णा सम्हारैत छली। मार्च सं जून 1989 मासक कुल  उनचालीस गोट डायरी-पेज मे ई उपन्यास लिखल भेटल अछि। मुदा, ई डायरिये टा 1989क थिक। एकर लेखन ओ बहुत बाद मे आबि क' कयलनि अछि, एहि सम्बन्ध मे एकटा सुस्पष्ट साक्ष्य अछि। वर्ष 1998-99 मे 'संधान'-संपादक कथाकार अशोकक द्वारा लेल गेल एक इन्टरव्यू मे, ई पुछला पर जे 'एहि बीच मे की सभ अहां पढि-लिखि रहल छी?', धूमकेतु उतारा देने छलखिन-- 'एकटा नेपाली जनजीवनक औपन्यासिक प्रयास मे लागल छी। रचबोक स्कोप तं अपना मातृभाषा मे कम्मे सम छै, आ कि नहि, भाइ?' हुनकर ई इन्टरव्यू संधान-4 मे 2000 ई. मे छपल, जाहि साल हुनकर निधन भेलनि।

'सरहद' अर्थात सिमान। मने कि भारत-नेपालक सिमान। नोमेन्स लैंड, जकरा धूमकेतु 'चालीसगज्जा' कहैत छथि, के अइ पार एकटा सभ्यता छैक जे ओइ पार धरि बहुत दूर तक पसरल छै, तें स्वाभाविक जे लोक-समाजक स्मृति मे 'पायाक अइ पार, ओइ पार' के कोनो खास महत्व नहि छैक, राजनीति मे भने होअओ। ओइ पारक जे सभ्यता छै जकरा सामान्यत: मधेसी कहल जाइत छैक, एकरा धूमकेतु मोगलानी कहैत छथि जे कि एकर परंपरागत प्राचीन नाम थिक। बहुत आगां जा क' एकटा आर सभ्यता शुरू होइछ जकरा ओ किराती कहलनि अछि।  ब्राह्मणधर्म संग पूर्णत: अनुकूलित सभ्यता मोगलक नाम पर मोगलानी किएक कहौलक आ इलाका मोगलान, तकर अलग वृत्तान्त भ' सकैत अछि। मुदा, मुख्य बात ई थिक जे दुनू सभ्यताक बीच धरती-अकासक अंतर छै। ततेक भिन्न जे देखने चकबिदोर लागत।

धूमकेतुक कथा-साहित्य सं जे क्यो अवगत छथि, नीक जकां जनै छथि जे हुनकर प्रिय कथा-विषय स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध छलनि। एकर व्याप्ति ओ तते पैघ देखै छला जे जनु एही एक बिन्दु कें फरियौने जीव-जगतक बहुतो रास रहस्य खुलि सकैत रहय। वर्जित क्षेत्र मे जा जा क' ओ कथा-प्रयोग कयलनि। स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध एहू उपन्यासक मूल वस्तु थिक। कुलीन आ संपन्न परिवार मे जनमलि शकुन मौसीक बियाह पन्द्रह बर्खक अवस्था मे एकटा प्रख्यात डाक्टरक संग भेल रहनि। बियाहक बादे ओ पतिक संग चलि गेल छली, जिनकर पोस्टिंग एक आदिवासी ग्रामीण अस्पताल मे छलनि। डाक्टर पत्नीक खूब ख्याल राखथि, मुदा ओ अपन मेडिकल रिसर्चक पाछू बेहाल छला आ शकुन अपना कें हुनका सामने अत्यन्त लघु, अत्यन्त तुच्छ अनुभव करथि। मनोवैज्ञानिक एकाकीपन सं घटनाक आरंभ भेल छल मुदा एकर परिणति बहुत पैघ, कदाचित भयावह भेल जे एक दिन शकुन डाक्टर कें छोड़ि क' ओइ नेपाली चपरासीक संग भागि गेली, जकर नियुक्ति डाक्टर साहेब हुनकर सेवा-टहल लेल कयने रहथि। ओहि कुलीन परिवार कें जे अपमान बोध भेल हेतनि तकर अनुमान कयल जा सकैत अछि। मुदा, समय सब सं पैघ चिकित्सक थिक। एहि घटना कें बारह बर्ख बीति गेलै आ शकुन मौसीक कुश-श्राद्ध क' देल गेलनि। सब क्यो हुनका नीक जकां बिसरि गेला।

मुदा, ई उपन्यासक कथावस्तु नहि थिक, मात्र एकर कथावस्तुक पृष्ठभूमि थिक। एहि उपन्यासक कथाभूमि नेपालक राजधानी काठमांडू थिक, जाहि मे दिलमाया, डम्मर आ नगीना राई एकर पात्र सब थिका, आ सहायक पात्र चन्द्रे दाइ(वा कि चन्द्रे भाइ) थिका जिनकर आवाजाही दुनू सभ्यता, मोगलानी आ किरातीक बीच छनि, कारण हुनका लोकनिक रोजगारे ताही तरहक छनि। ओ नेपालक सत्ताधारी राजनेता सभक पेशेवर दलाल थिका। चाहे कोनो पार्टीक सरकार हो, ने हुनकर धंधा मे मंदी अबै छनि ने ऐश मे कमी। हुनकर पुरान परिचय कथावाचकक संग छनि, जे कि काठमाडू मे प्रोफेसर नियुक्त भ' क' एलाह अछि। उपन्यास मे काठमांडूक इतिहास, संस्कृति, लोकाचार, स्थान आ लोक सभक तते मेंही डिटेल छैक जे निश्चिते आंखिक देखल तं जरूरे, सद्य: भोगल होयब सेहो संभाविते नहि, तर्कसंगतो लगैए।

नेपालक संग धूमकेतुक बहुत पुरान सम्बन्ध रहनि। अगस्त 1957 सं नवंबर 1973 धरि ओ जनकपुर मे अर्थशास्त्रक प्राध्यापक रहला आ एहि बीच रा. रा. ब. क्याम्पसक प्राचार्य सेहो भेलाह। हुनकर रचनाशीलताक ई स्वर्णकाल छलनि, अपन अधिकांश महत्वपूर्ण कथा ओ ओतहि लिखलनि आ अपन उपस्थिति सं जनकपुर कें सदा गुलजार कयने रहला। मुदा, आगू एहनो समय आएल जखन विचार सं मार्क्सवादी आ प्रवृत्ति सं नवाचारी धूमकेतु नेपाल सरकार कें असह्य भ' गेलखिन आ हुनका भारत घुरय पड़लनि। मुदा, थोड़बे दिन मे समय फेर बदलल आ 1980 मे हुनका त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू मे अर्थशास्त्रक एसोशिएट प्रोफेसरक पद पर नियुक्त क' लेल गेलनि। ई हुनकर दोसर नेपाल-प्रवास छल, मुदा जकर परिणाम नीक नहि रहल। काठमांडूक आबोहवा हुनका स्वास्थ्यक लेल सर्वथा विपरीत साबित भेलनि आ चारि वर्ष बितैत-बितैत ओ आस्टो-आर्थराइटिस रोग सं भयंकर प्रभावित भ' गेला। अन्तत: 1984 मे ओ फेर देश घुरि अयलाह। मुदा, नेपालक नेह जेना तखनहु कम नहि भेल होइक, 1997 मे, तेसर बेर फेर हुनका रा. रा. ब. क्याम्पस, जनकपुर मे सम्मानित विशिष्ट प्रोफेसर(मौद्रिक अर्थशास्त्र) मे नियुक्ति भेटलनि, जतय ओ जीवनक अंतिम समय धरि बनल रहला। हमरा लोकनि बूझि सकैत छी जे 'सरहद'क अनुभव हुनकर काठमांडू-प्रवास संग जुड़ल हेतनि, यद्यपि कि नेपालक गह-गह सं तं ओ सुरुहे सं परिचित छला। हमरा लोकनि बूझि सकैत छी जे एहि उपन्यासक यथार्थ सं हुनक टकराव दोसर नेपाल-प्रवासक अवधि मे भेल हेतनि। एकरा लिखलनि ओ बाद मे, जेना कि पहिनहि कहलहुं।

उपन्यास मे, होइत छैक एना जे एक दिन कथावाचक प्रोफेसर काठमांडूक असन चौक पर घुमय गेलाह अछि आ ओतय हठात हुनकर भेंट चन्द्रे दाइ(वा कि भाइ) सं भ' जाइत छनि। पुरान परिचित चन्द्रे बड़ पसन्न होइत हुनका अपना संग क' लैत छनि। संझुका पहर थिक जकरा बारे मे कहबी छैक जे सूर्य अस्त नेपाल मस्त। चन्द्रेक मस्तीक अड्डा 'भाउजो रेस्त्रां' थिक, जकर संचालिका थिकी दिलमाया। एही ठाम सं उपन्यास शुरू होइत छैक। दिलमाया कें देखितहि प्रोफेसर कें लगैत छनि जे अरे, ई तं शकुन मौसी थिकी। भारी उधेड़बुन मे ओ पड़ल रहैत छथि, नाना प्रकारक तर्क-वितर्क मे। तकर वर्णन सं उपन्यास भरल अछि। शकुन मौसी छली तं प्रोफेसरक मायक मामाक बेटी, मुदा बालविधवा हुनकर माइक संग हुनको प्रतिपाल हिनके कुलीनता-मर्यादित घर मे भेल भेल छलनि। दुनू संग-संग नेना सं जुआन भेल रहथि। उपन्यास मे प्रसंग आएल अछि जे नेनपन सं दुनू संग-संग खेलथि-धूपथि, मुदा जहिना कि शकुन मे कैशौर्यक चेन्ह सब प्रकट हुअय लागल छल, एहि खेलकूद सब पर प्रतिबन्ध लगा देल गेल छलैक। कुलीन घरक बालिकाक जाबन्तो शील-मर्यादा मे बान्हलि शकुन सब तरहें एक सुशीला कन्या रहथि। जखन कि ई दिलमाया किराती सभ्यता मे पूरे रंगलि, शराबखानाक संचालिका, खने खन घोंट-घोंट शराब सगरो दिन पिबैत रहयवाली, बड़का-बड़का मोंछबला सब कें अपन आंगुरक इशारा पर नचा सकबा मे दक्ष।

धूमकेतुक स्त्री-विमर्शक एकटा विशेषता छनि जे जाहि स्त्री संग पुरुषक शारीरिक वा भावनात्मक सम्बन्ध रहल होइक, बखत पड़ला पर पुरुष ओकर उपकारक लेल अपन सर्वस्व समर्पित क' सकैत अछि। 'मोड़ पर' मे हमरा लोकनि सदाशिव कें गुना लेल ई करैत देखि चुकल छी। एहि उपन्यासक जतबा अंश भेटल अछि, लगभग वैह स्थिति एतय शकुन मौसी लेल प्रोफेसरक छैक, जकर सम्बन्ध-सूत्र भावनात्मक छैक। प्रोफेसर एकठाम कहै छथि-- 'शकुन सं सम्बन्ध जे छल हो, मुदा भावनाक एक सम्बन्ध जरूर छल, जे लागल, हुनकर खोज अवश्य एकटा उपलब्धि होयत।'  की शकुने दिलमाया थिकी, की क्यो आन थिक-- एकर पता लगाएब प्रोफेसरक जीवनक उद्देश्य भ' गेलैक अछि। रहस्य जल्दिये खुलि जाइत अछि जे वास्तव मे शकुने दिलमाया छली। ई बात साफ भेलाक बादो बहुत पैघ समस्या छैक जे ओ शीलवती कन्या कोना एहि सार्वजनिक स्त्री मे आबि क' रूपान्तरित भेली। उचिते छै जे एकर खिस्सा बड़की टाक हेतैक-- 'जीवन सरिपौं खिस्सो पिहानी सं बेसी अद्भुत होइत अछि।'। हमर अनुमान अछि जे एहि उपन्यासक जे योजना धूमकेतुक मोन मे रहल हेतनि, ताहि मोताबिक एकरा तीन सौ मुद्रित पृष्ठक लकधक हेबाक छल। ततबा पैघ एहि रूपान्तरणक खिस्सा अछि। ई ठीक-ठीक कहल नहि जा सकैए जे एकरा ओ पूरा किएक नहि क' सकला। एहि बारे मे ओ अपनहु कतहु कोनो चर्च नहि कयने छथि। कोनो छोटो कारण भ' सकैत अछि, जेना स्वास्थ्य संग नहि देब जेना कि हुनका संग होइतो रहलनि, इहो संभव जे हुनकर निधन भ' गेने ई उपन्यास अधूरा रहि गेल हो। मुदा कोनो पैघो कारण भ' सकैत अछि, जेना नगीना राई के व्यक्तित्व मे कोनो एहन छोटपना हुनका देखार पड़ि गेल होइन जकर तर्कसंगत निस्तार हुनका अंतोअंत धरि ताकने नहि भेटल छल होइन, आ ओ तते इमानदार लेखक छला जे मोनक ओझरी कें नुका क' किछु लिखि जाथि से हुनका बुते संभव नहि छल।। दोसर दिस छलि दिलमाया, जकरा लेल नगीना राई एतेक महान पुरुष छल जेहन कि क्यो आन भइये नहि सकैत छल। के छल नगीना राई? डाक्टर साहेबक वैह चपरासी, जकरा संग शकुन भागल छलि। आब ओ संसार मे नहि अछि। बहुत बीहड़ जीवन रहलैक ओकर। एक दिस जं ओ सरहद पारक जायज-नजायज व्यवसाय सं अकूत धन कमेलक, तं दोसर दिस अंगरेज सरकार आ ओकर पिट्ठू देशी साहेबक खिलाफ सशस्त्र संघर्षो कयलक, क्रान्तिक दौरान, जाहि मे कि ओ मारलो गेल। नगीनाक बारे मे जनबाक प्रोफेसरक कौतूहल पर दिलमायाक कहब छैक-- 'ओ व्यक्ति सोलह आना हमर छल। नगीना एखनो हमरा मोनक नगीना भेल आत्मा मे जड़ल अछि। बिसरि जैतय तं नीक। मुदा जे हमरे टा ल' क' अइ दुनियां मे रहल ओकरा बारे मे मुंह खोलनाइ की? बहुत निजी, बहुत आत्मीय सम्बन्धक व्याख्यान दुनियां कें सुनाएब की?' नगीना मरि गेल, मुदा दिलमाया विधवा नहि छथि। तेसर पति छथिन डम्मर श्रेष्ठ, नगीना राईक संघर्षक दिनक एक साथी, जे गैंडा सन छथि, बहुत बूढ़ भ' गेला अछि, बीमार रहैत छथि आ दिलमाया कें कटु वचन कहैत रहै छनि। मुदा ओहि पुरुषक सौ खून माफ छै, ओकर सेवा-बरदास एखन दिलमायाक सब सं पैघ जीवन-लक्ष्य छैक। जखन कि दोसर दिस, अपना बल पर अरजल धन दिलमाया कें ततबा छैक जे एक बेर सजि-संवरि क' प्रोफेसर संग ओ दक्षिणकाली मंदिर जे गेल छलि तं ओकरा देह पर दू-अढाइ किलो सोनाक गहना लटकल रहै। तेसर समस्या ई अछि जे दिलमाया कें जे दूटा बेटा छनि, मने नगीना राई सं, एकटा तं क्लास वन आफिसर, इंजीनियर थिक मुदा दोसर बेरोजगार आ तेहन बहसल जे एक नमरी(सौ टाका)क लेल श्रेष्ठ जीक पिटाइ क' सकैत अछि आ सबटा संपति कें बेचि क' फिल्म-निर्माण करय चाहैत अछि। आ, क्रान्तिक एक नायक ई डम्मर जी केहन छथि जे छौंड़ाक पिटाइ के प्रतिकार करबाक प्रश्न पर कहै छथि--'बात छै जे धिया-पुता संगे भिरियो गेनाइ तं ठीक नै ने!' तखन, इहो एक बात अबैत छैक जे नगीना, जकरा ओ अपन वास्तविक पति परम गुरु मानैत छथि आ हुनकर बड़का फ्रेम कयल फोटो सदिखन अपन बेडरूम मे लगेने रहल अछि, हरेक संकट अयला पर ओकरे दिस टुकटुक तकैत समाधान पबैत अछि, वैह दिलमाया ओहि नगीना सं जनमल दुनू बेटा सं घोर घृणा करैत अछि।

मने, ओहू सभ्यताक जे पीढ़ीगत, कालगत, आदर्शगत विचलन सब, परिवर्तन सब घटित भेल छैक, से एहि उपन्यासक विषय बनल अछि। मुदा, लेखक लग जे सब सं ओझराएल प्रश्न रहलैक अछि, जकरा सोझरेबा मे ओ पूरे जतनशील लगैत छथि, से ई थिक जे एहि मरदे गैंडा डम्मर के जखन एते बरदास्त कइये रहल छथि शकुन, तं ओहि डाक्टरे मे की खराबी छलै? एते ई सब किए? मुदा, दिलमायाक कहब छनि-- 'स्त्री एक बेर अपना कें जाहि पुरुष कें समर्पित करैत अछि, पति वैह होइत छैक। आत्मा सं ओकरे सं सम्बन्ध होइत छैक। डाक्टर साहेबक उंचाइ धरि हमर समर्पण पहुंचिये नहि सकैत छल, तें हुनका प्रति हम कहियो समर्पित भेबे नहि केलियनि।' एहि हिसाब सं तं हुनकर पति भेलखिन नगीना राई, मुदा ई गैंडा, अथबल, दुर्वचन कहनिहार डम्मर? ई के थिक? बस, एकरा ओ पोसने छथि, अपन आश्रय देने छथि, एहि नारीत्वक जेना ई एक गरिमा, एक महिमा होइक, एक संतोष। डाक्टर ब्लड कैंसर सं मुइलाह, नगीना पुलिसक गोली सं, डम्मर अथबल अछि, मुदा दिलमाया? प्रोफेसर के सबटा केस, माथोक दाढ़ियोक, पाकि गेलनि, शकुन हुनका सं छव‌ मास-बरख दिन जेठे छलि, मुदा ई दिलमाया जखन फेंटा कसि क' रेस्त्रां चलबैत रहैत अछि तं लोक कें राजा रवि वर्माक स्त्री-चित्र(शकुन्तला) सन मोहक आ मनभावन लगै छथि। स्वयंसिद्धा आ आत्मदीप्ति सं भरपूर स्त्री थिकी दिलमाया, जे कि अपन अतल अन्तर्मन मे हरेक स्त्री हुअय चाहैत अछि। आ, दिलमायाक बौद्धिक स्तर? ओ प्रोफेसर कें एक ठाम कहै छनि-- 'दिलमाया मे शकुन कें नहि खोजी।'
-- असल मे हमरे टा आंखि ने दिलमाया मे शकुन कें देख' सकै छनि।
-- से देखितनि तं चन्द्रेक मारफत किएक दिलमायाक देह धरि अबितनि?
प्रोफेसर निर्वाक।
-- होइ की छै जे अहां त' जे होइत जाएब से पछिलाक परिणाम। अहां के छी, से बूझै लेल जे टोहियाब' लागब तं दिलमाया सं शकुन धरि जाय पड़त। एक सं दोसर कटि नै ने सकैए!
-- शकुन मौसी, ई आत्मज्ञान! आ तखनि अहांक भटकन?
-- भटकने सं ने आत्मज्ञान अबै छै! आ, भटकन तं अहां कहै छी। हमर तं ई सुख थिक, संतोष थिक।'

अपना देशक लगभग सब भाषा मे ई संस्कृत कहबी प्रचलित अछि जे 'स्त्रियाश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्य:।' एहि कहबी मे दिक्कत एतबी अछि जे एहि ठाम स्त्रीक चरित्र कें आथाह मानल गेल अछि जखन कि  पुरुषक भाग्य कें। पुरातनपंथी लोकनि कें ई कहबी बड़ प्रिय। एहि मे स्त्री कें संदिग्ध क' क' देखल गेल अछि तें पितृसत्तात्मक व्यवस्था लेल सेहो ई अत्यन्त सटीक। एहि शास्त्रीय कुतर्क सं स्त्रीक हीन दरजा सुनिश्चित कयल जाइत रहल अछि आ ओकर आत्मविश्वास कें तोड़बाक लेल एकरा एक हथियार जकां इस्तेमाल कयल जाइत रहल अछि। एक चिन्तक-विचारकक रूप मे धूमकेतु सदा एकर विरोधी रहला। हुनकर साहित्य मे लिंगक आधार पर विभेदीकरण के मुखर विरोध सबतरि व्यक्त भेल अछि। एहि उपन्यास मे तं मानू सुरुहे मे हुनकर प्रतिज्ञा-वाक्य सामने आबि गेल अछि। पन्द्रह बरखक उमेर मे शकुन मौसीक बियाह भेलनि, आ जखन ओ सासुर जाय लगली, अपन पिता तं छलखिन नहि, हुनको पालक पिता प्रोफेसरेक पिता छलखिन, कुलीन परिवारक कोनो पिता जतबा परंपरावादी भ' सकैत अछि, सैह ओहो छला। विदा होइ काल तं ओ शकुन कें कहने रहथिन-- 'जाउ। आब दुख अहांक दूर भेल। अहां सन भाग भगवान सब कें देथुन।' मुदा, शकुनक मोटर जखन विदा भ' गेल, कथावाचक कें पिताक कहल ओ बात स्मरण एलनि जे ओ निरंतर बजथिन, आ कदाचित ओहू क्षण बाजल हेता-- 'चरित्र आ भाग्य ने दैव जनै छथि ने मनुख। से एक गोटेक नहि, स्त्री-पुरुख, दुनूक।' एहि उपन्यास कें जेना एहि प्रतिज्ञा-वाक्यक संपुष्टि होयबाक छलैक। जीवन कोना कोनो खिस्सो सं बेसी आश्चर्यजनक भ' सकैत अछि, एहि वाक्य कें ओ एतय अलग अलग शब्द मे बेर-बेर दोहरबैत रहला अछि। ने केवल पुरुषक, स्त्रयोक ओतबे।

कुल्लम दस परिच्छेद मे लिखबाओल गेल ई उपन्यास असमाप्त अछि। वास्तविकता तं ई थिक जे एखन तं एकर केवल पेनिये छानल गेल छल। मुदा, ध्यान देब तं पायब जे जे मोटा-मोटी समुच्चा खिस्सा एहि मे आबि गेल छै। ई बात भिन्न जे एतबी खिस्सा लिखब हुनकर उद्देश्य ने छलनि ने भ' सकैत छलनि। संस्कृतिक नितान्त गंहीर प्रश्न सब धरि हुनका पहुंचबाक रहनि। मनुक्ख कोना अविजेय अछि आ ओकर इतिहास आ संस्कार कोना एक लघु सीमे धरि ओकर बाट छेकि पबैत छैक। आदि-आदि। अंत मे जा क' विस्तारपूर्वक सचित्र वर्णन शुरू भेलैक अछि जे आखिर कोना ई संभव भेल जे धीर-गंभीर कुलीन विवाहिता कें अपन पतिक मामूली चपरासी सं प्रेम भ' गेलैक! लगनशील डाक्टर एहि रहस्यक खोज क' रहल छथि जे आखिर आदिवासी सभक दांत एते मजगूत किएक होइत अछि? कोन वनस्पति ओकरा सभक दिनचर्या मे, भोजन-विधान मे शामिल छै जकरा कारण एहन मजगूत दांत संभव होइत अछि! ओ अपन रिसर्चक पाछू ठीकमठीक ओहिना भूत बनल अछि जेना किंवदन्ती मे हमरा लोकनि वृद्ध वाचस्पतिक मादे सुनैत छी। मुदा, शकुन भामती नहि थिकी, हुनकर भवितव्य दिलमाया थिक। उपन्यास बिच्चहि मे रुकि गेल अछि, हम सब सहज अनुमान क' सकै छी जे एहि खिस्सा कें एखन बहुत दूर धरि चलबाक छल हेतैक।

अपन जाहि विशिष्ट शैलीक कारण धूमकेतु 'कथाकारक कथाकार' कहल जाइत छथि, तकर भरपूर दरस हम सब एतय पाबि सकै छी। कस्सल-कस्सल वाक्यावली, प्रगाढ़ बिम्ब, विदग्ध कथनानुकथन, ललित गद्यक चिर स्मरणीय वितान, सब किछु। गद्यक गठन तते तथ्यात्मक जे बीच के दुइयो वाक्य मिस भेने अहांक कथा-बोध भसिया सकैत अछि। निस्सन्देह, एहि उपन्यासक प्रकाशन मैथिली कथा-साहित्यक लेल एकटा घटना थिक।

@पटना, 6.8.2020