Saturday, October 28, 2023

यात्री नागार्जुनक मैथिली उपन्यास

 तारानंद वियोगी


मैथिली मे यात्री तीन टा उपन्यास लिखलनि-- पारो, नवतुरिया आ बलचनमा। हुनकर तीनू उपन्यास अलग-अलग प्रकाशन सं प्रकाशित छनि। पहिल उपन्यास 'पारो'क रचना ओ कोन परिस्थिति मे कयने छला, एकर किछु विवरण अन्यत्र आबि चुकल अछि। एकर प्रकाशक-- ग्रन्थमाला कार्यालय -- जे मैथिलीक प्रकाशक नहि छल, आ ने पारोक बाद संभवत: फेर कहियो मैथिलीक कोनो पोथी प्रकाशित केलक। ग्रन्थमाला हिन्दीक देशप्रसिद्ध प्रकाशक छल आ बहुतो महत्वपूर्ण प्रकाशन लेल जानल जाइत छल। ओतय सं 'पारिजात' पत्रिका बहराइत छल जाहि मे नागार्जुन एक ख्यात आ लोकप्रिय लेखक छला। तहिना, एतय सं छप' बला बाल-पत्रिका 'किशोर' मे तं नागार्जुन तते लोकप्रिय रहथि जे थोड़बे समय मे हिन्दीक एक प्रशस्त गद्यकारक रूप मे ओ प्रसिद्ध भ' गेल रहथि। हुनकर लोकप्रिया कें देखैत प्रकाशनक स्वामी रामदहिन मिश्र सोचैत छला जे नागार्जुन जं उपन्यास लिखथि तं बाजार मे रिकार्डतोड़ बिक्री भ' सकैत अछि। ओ बारंबार यात्री पर उपन्यास लिखबाक दबाव देब' लगला। हुनकर बहुत आग्रह पर यात्री तैयार तं भेला मुदा एक विचित्र शर्त राखि देलखिन जे उपन्यास ओ मैथिली मे लिखता। असल मे, जाहि परिवेश, वातावरण आ कथानक ल' क' ओ उपन्यास लिखय चाहैत रहथि, हुनकर समझ रहनि जे ओकरा संग न्याय केवल मैथिली मे लिखने भ' सकैत अछि। अन्तत: ओ 'पारो' लिखलनि आ से ग्रन्थमाला सं 1946 मे प्रकाशित भेलैक। मैथिलीक परंपरित साहित्य-समाज कें ई उपन्यास हिला क' राखि देलकैक। एहि सं पहिने 'कन्यादान'(1933) आ 'द्विरागमन'(1943) मात्र मैथिली मे छपल छल जकरा आधुनिक अर्थ मे औपन्यासिक कलेवरक रचना कहल जा सकैक। 'कन्यादान' जाहि तरहें परंपरावादी लोकनिक आस्था पर चोट कयने रहनि, 'पारो' एलाक बाद मानू ओ सकनाचूर भ' गेलैक। मिथिलामिहिर मे पं. त्रिलोकनाथ मिश्र एहि दुनू उपन्यासक समीक्षा एहि शब्द मे कयने छला-- 'स्वच्छन्द प्रोफेसर पहिनहि टांग-हाथ दन्तावलि तोड़ि देल/ दुर्भाग्य सम्प्रति मैथिलीक 'पारो' कपारो फोड़ि देल।' अर्थात, पारोक प्रकाशन कें ओ लोकनि मैथिलीक हत्या करबाक तुल्य मानने छला। दोसर दिस, एकर सबटा प्रति छव मासक भितर बीकि गेल आ प्रकाशक आगां संस्करण पर संस्करण छपैत रहला। उपन्यास भने मैथिली मे छल, मुदा एकर प्रशस्ति कें देखैत कवि नागार्जुन बिहारक उदीयमान उपन्यासकारक रूप मे सौंसे देश मे प्रसिद्ध भ' गेला।

          नवतुरिया(1954) आ बलचनमा (1967) यात्रीक एहन उपन्यास छलनि जकरा ओ मैथिली आ हिन्दी, दुनू भाषा मे मौलिक रूप सं लिखने छला। एहि प्रसंग पहिनहि कहल जा चुकल अछि जे बलचनमाक नायक बालचन राउत ने केवल स्वयं शूद्र छला, अपितु आत्मकथात्मक शैलीक ई उपन्यास जाहि मैथिली मे लिखल गेल छल से शिष्ट समाजक भाषा सं सर्वथा भिन्न छल जकरा स्वयं यात्री 'शूद्र मैथिली' कहने छथि। एहन प्रतीत होइत अछि जे मैथिलीसेवी व्यक्ति आ संस्थाक संकीर्ण मनोवृत्तिक शिकार एहि उपन्यास कें हुअ' पड़लैक। 1967 मे प्रकाशित एहि उपन्यासक मूल लेखक नागार्जुन कें बताओल गेल छल। एकर अर्थ शोभाकान्त ई लगौलनि जे मूल मैथिली बलचनमाक पांडुलिपि नष्ट हेबाक बाद संस्था दबाववश हिन्दी-पाठक मैथिली अनुवाद प्रकाशित क' कहुना पिंड छोड़ेलक। यात्री मूल मैथिली मे बलचनमा लिखने छला, तकर अनेको साक्ष्य अछि। किन्तु, प्रकाशित पाठ ओहि सं भिन्न अछि, से ओकर भाषा-वितान कें देखनहि सं स्पष्ट भ' जाइछ, एहि आधार पर शोभाकान्त बलचनमाक उपलब्ध पाठ कें मूल मैथिली नहि मानैत 'यात्री समग्र' मे एकरा संकलित नहि केलनि। मोहन भारद्वाजक मान्यता एहि सं भिन्न छलनि। हुनका मतें, हिन्दी लेखक नागार्जुनक बहुव्यापक प्रसिद्धि सं आक्रान्त मैथिल लोकनि केवल हीनतावश मूल लेखक नागार्जुन कें बता देलनि। भाषागत पार्थक्यक सम्बन्ध मे हुनकर कहब भेलनि जे प्रूफ सही तरीका सं नहि देखल गेल छल, ई तकरे परिणाम छल। यद्यपि मोहन भारद्वाजक मान्यता मे अनेको प्रतिप्रश्नक गुंजाइश बनैत छल, किन्तु एहि कृति कें मूल मैथिली उपन्यास मानैत ओ अपन प्रसिद्ध आलोचना-पुस्तक 'बलचनमा: पृष्ठभूमि आ प्रस्थान' लिखलनि, जे कदाचित हुनकर सब सं नीक आलोचनात्मक कृति छियनि।

        हिन्दी-मैथिली दुनू कें मिला क' देखी तं यात्री पन्द्रह गोट उपन्यास लिखलनि। एहि सभक अतिरिक्त एतबे संख्या मे हुनका लग अलिखित उपन्यास छलनि। ओ चाहितथि तं एहि उपन्यास सभक खिस्सा च तु क' क' आद्योपान्त सुना सकै छला। एकटा उपन्यास 'निराश्रित' नामक छल जकरा शरणार्थी-समस्या पर केन्द्रित हेबाक छलै। 'विशाखा-मृगा'(एहि नाम सं हिन्दी मे हुनकर कथा छनि) सेहो वस्तुत: एक उपन्यासे छल जकर बीस अध्याय हेबाक छलै। एक आर उपन्यास हिन्दी मे होइतैक जकर नाम 'ठूंठ और कोपलें' राखय बला छला। अपन एक उपन्यासक संपूर्ण कथा तं ओ स्वयं हमरा सुनौने रहथि। ई संपूर्ण कथा हम 'तुमि चिर सारथि' मे लिखनहु छी। ई सब उपन्यास लिखल नहि जा सकल। उपन्यास-लेखनक लेल जे निविड़ एकान्त आ तल्लीनता चाही, तकर हुनका जीवन मे सर्वथा अभाव छलनि। कारण छल हुनकर यायावरी स्वभाव आ मिलनसारिता। सौंसे भारत हुनकर घर छल आ लाखो लोक हुनकर परिवारी-जन। एहि सभक बीचे रहि क' ओ अपना कें स्वस्थ आ सहज अनुभव करथि। पचपन-छप्पनक उमेर सं हुनकर एक्टीविज्म आरो अधिक बढ़ि गेल आ ओ सामाजिक-राजनीतिक कतेको मोर्चा पर अधिकाधिक सक्रिय होइत गेला। तें हमसब देखैत छी जे 1967क बाद कायदा सं ओ कोनो उपन्यास नहि लिखि सकला, यद्यपि कि योजना सब दिन बनबैत रहला जे ओ उपन्यास लिखता।  हुनकर स्वभाव छलनि जे उपन्यास ओ निरंतरता मे लिखथि, बीच मे जं लिखब बाधित भेल तं हुनकर उपन्यास अधूरा रहि जाइत छलनि। अपन समस्त उपन्यास ओ तीस सं चालीस दिन मे पूरा क' लेलनि। बलचनमा आ कुंभीपाक, यैह दू उपन्यास छनि जाहि मे क्रम टुटलाक बादो पुन: पुन: आसन जमा क' एकरा ओ पूर्ण केलनि। अपन अंतिम उपन्यास 'गरीबदास' ओ एनसीईआरटी के लेल 1979 मे बहुत जतन कयला पर लिखि सकल रहथि।

           उपन्यास-लेखनक जे कसौटी यात्रीक छलनि,ताहि पर बात भ' चुकल अछि। पहिल तं हुनकर आग्रह रहनि जे उपन्यास सदा स्वयं अनुभूत प्रसंगे पर लिखबाक चाही। दोसर, उपन्यासक भाषा आ शिल्प एहन हेबाक चाही जे अठमा क्लास पास व्यक्ति आराम सं ओकरा पढ़बाक आनंद उठा सकय। तेसर, उपन्यास कें सदा छोट हेबाक चाही जाहि सं अल्प दाम पर साधारणो पाठक ओकरा कीनि क' पढ़ि सकथि। हुनकर तीनू मैथिली उपन्यास हुनकर एहि तीनू शर्त कें पूरा करैत छनि। तीनू उपन्यासक विषय-वस्तु हुनकर भोगल, आंखिक देखल छल। 'पारो' मे जे कथा आयल छैक से ताहि समयक थिक जखन ओ एक तरुण छला आ गोनौली मे रहि क' मध्यमाक पढाइ क' रहल रहथि। एहि उपन्यासक तीक्ष्णता सं हमसब अनुमान क' सकै छी जे ओहि घटना सं ओ कतेक आहत भेल छला आ स्त्री-मुक्ति आगुओ हुनकर औपन्यासिक लेखनक एक प्रधान यत्नक रूप मे मौजूद रहल। 'नवतुरिया'क कथा यात्रीक सासुर हरिपुर बक्शीटोल मे घटित एक घटना पर लिखल गेल अछि, जाहि मे स्वयं यात्रियोक अपन योगदान छलनि। हरिपुर बक्शीटोलक एक आरो प्रसिद्ध मैथिली लेखक उपेन्द्रनाथ झा व्यास भ' गेला अछि। ओहि गाम मे घटित ई घटना ततेक चर्चित भेल रहय जे स्वयं व्यास जी अपन एक कथा 'वाग्दान' एही घटना कें आधार बना क' लिखने छला। तहिना,  हमरा लोकनि अवगत छी जे लंका सं घुरलाक बाद यात्री क्रांतिकारी भ' गेल छला आ किसान सभाक मजगूत संगठन तैयार करबाक वास्ते स्वामी सहजानंद हुनका चंपारण पठौने छलखिन। 'बलचनमा' मे जे कथा आयल अछि, से स्वयं यात्रीक अनुभव छनि। एहि उपन्यास मे आयल कतेको घटनाक विवरण स्वामी सहजानंदक आत्मकथा 'मेरा जीवनसंघर्ष' सं हूबहू मिलैत अछि।



काया मे छोट मुदा प्रभाव मे बेस घनगर आ गँहीर 'पारो' यात्रीक पहिल उपन्यास थिक। ई मूलत: पिसियौत-ममियौत भाइ-बहीनक कथा थिक, जे अनेक घुमान विन्दु कें पार करैत अन्तत: पार्वती उर्फ पारोक विवाह आ तकर तेसरे वर्ष ओकर मृत्युक खिस्सा थिक। उपन्यासक कथावाचक बिरजू थिक जे पारोक ममियौत भाइ थिक। दुनू भाइ-बहीन एक नेनपन सं एक-दोसरक संग तेना जुड़ल रहल अछि जे अद्भुत स्नेह-सम्बन्ध दुनूक बीच कायम छैक। नेनपन मे ओ दुनू खेल-खेल मे विवाह सेहो कयने छल जाहि मे माटिक सिन्दूर व्यवहार कयल गेल रहैक। पारो बेस बुझनुक आ विवेकशील अछि। पिता पंडित छलखिन मुदा बेस होशगर। ओ गार्गी-मैत्रेयीक स्त्री-परंपरा पर गौरव केनिहार लोक रहथि आ एकमात्र संतान पारो कें गार्गी-मैत्रेयी सन पंडिता बनेबाक ख्वाब राखथि। मुदा, परंपरित मैथिल समाजक अस्सल प्रतिनिधि रहथि पारोक माय, जे पंडितजीक एक नहि चल' देलकनि। पंडितक असमय देहान्त भेलनि। विधवा माय गरीब नहि रहथि मुदा वैवाहिक दलाल लूच झाक फंदा मे फँसि क' पैंतालिस वर्षक चुल्हाइ चौधरिक संग पारोक विवाह करबा देलखिन। चौधरि जातिये टा मे नहि धनो संपति मे पैघ लोक छला। ओ रामराज्यक स्वप्न देखनिहार लोक रहथि जे देखबे टा मे मनुक्ख रहथि, बांकी पारोएक शब्द मे कही तं राक्षस रहथि। तेरह वर्षक कन्या, पैंतालिस वर्षक वर। एहि सम्बन्ध कें नहि निमहबाक कारण दू टा। एकटा तं स्वयं पारो, जे अपन बुद्धि-विवेकवश स्त्री-चेतना सँ भरल रहथि आ हुनका मैथिलक ई विवाह संस्था भारी नापसंद। बिरजू भने हुनक भाइ लगतथिन, मुदा अपन नेह-नाताक कारण ओ कुमारिये मे बिरजू कें कहने रहथिन-- 'भाइये बहिन मे जँ बिआह-दान होइतैक तँ केहन दीब होइतै। कत' कहांदनक अनठिया कें जे लोक उठा क' ल' अबैए से कोन बुधियारी?' दोसर कारण, स्वयं चौधरि, जिनका लेल स्त्री केवल भोग-विलासक एकटा वस्तु होइत अछि, ओकरा प्रति कोनो संवेदना, कोनो सहमति, कोनो प्रेम-रसायनक दूर-दूर धरि कोनो लसि नहि। एहि प्रकारें ई विवाह केवल उमेरे टाक संदर्भ मे अनमेल नहि रहैक, बौद्धिकता आ मानसिकता धरि अलग-अलग छल। मन मारि क' चौधरि संग जीवन गुदस्त करैत पारो कहियो सहज नहि रहि सकली आ हुनकर मृत्यु मानू विद्रोहक कोनो बाट नहि भेटने एक आत्मघात छल। मुदा, ताहि सँ पहिने मानू ज्वालामुखि फटैत छैक जखन पारो बिरजू कें कहैत अछि-- 'एहन असिरबाद ने हमरा तों देने जाह बिरजू भैया जे अगिला जन्म मे ई सांसत नहि उठब' पड़य... हमरा-तोरा बीच मे पिसियौत-ममियौतक सम्बन्ध नहि, ओहि जन्म मे हम आ तों...'

              इतिहासकार आ आलोचक लोकनि एहि उपन्यास कें कैक तरहें देखलनि अछि आ स्वयं ई उपन्यास एकर अवकाश दैत अछि जे एकरा आरो कैक तरहें देखल जा सकय। मैथिल पंडित लोकनि ठीक ओही बनैला पाड़ा जकां जकर प्रतीक-योजना उपन्यास मे एक ठाम कयल गेलैए, मानैत रहला जे ई सगोत्र सम्बन्धक अनैतिक प्रेमकथा थिक। जयकान्त मिश्रक लेल जतय यैह टा संतोषक बात रहलनि जे घटनावली 'मर्यादाक भीतरे अछि' तं श्रीश एकरे पैघ बात मानलनि जे ई 'अनुचित सीमा पर नहि पहुँचल' अछि। मुदा एकर बादो सुरेन्द्र झा सुमन कें पपारोक चरित्र निर्लज्ज आ वीभत्स लगलनि आ बिरजूक व्यवहार मे सेहो हुनका कालुष्य देखना गेलनि। ओ तँ एहि दुनू कें आर्य मानबा धरि लेल तैयार नहि भेलाह-- 'बूझि पड़ैछ जेना मैथिल युवक-युवतीक कलेवर मे सामाजिक संस्कार सँ सर्वथा अपरिचित कोनहु अनार्य जीव काया मे प्रवेश कयने हो।' एहि सब सँ थाहल जा सकैए जे पं. त्रिलोकनाथ मिश्र पारोक अवतरण कें मां मैथिलीक हत्या कोन आधार पर करार देने हेथिन।

           मिथिलाक समाजशास्त्रीय संदर्भ मे 'पारो' कें देखबाक चेष्टा करैत हेतुकर झा एहि रचना कें 'एहि ठामक सामाजिक ह्रासक विरुद्ध यात्रीक मुखर आक्रोश' कहलनि अछि। हुनकर दृढ़ मान्यता छनि जे मिथिलाक समाज पंजी-व्यवस्थाक बाद ह्रासोन्मुख भ' गेल। एहि सामाजिक ह्रास कें चिन्हबाक लेल ओ तीन गोट पैमाना देखैत छथि आ तकरा सब कें पारो मे मौजूद पाबै छथि। पहिल तँ जे मैथिल समाजक भीतरे-भीतर खंड-प्रखंडीकरण (Involution) भ' गेल, मैथिल ब्राह्मण लोकनि जाति-श्रेणीक आधार पर बँटि गेला, पहिने गौरवक स्थान विद्या कें प्राप्त रहैक आब जातीय श्रेष्ठता कें भ' गेल, एहि तरहें 'पंजी विद्याक मूल्य घटबाक अनुपम साक्षी अछि।' एहि उपन्यासो मे हमसब विद्या-विवेकक स्थान पर जाति-श्रेष्ठता कें वर्चस्व प्राप्त कयने देखैत छी। एकर निर्घिनतम रूप बिकौआ प्रथा थिक, जाहि अंतर्गत उच्च जाति-श्रेणीक ब्राह्मण लोकनि पचास-साठि विवाह करथि, आ एतबे नहि, हुनका लोकनि संग सम्बन्ध बनेबाक लेल समाज मे आतुरता छल। विगत तीन-चारि शताब्दी मे ई परंपरा ततेक जड़िया गेल छल जे ओकरा उखाड़ब कठिन काज छल। 'किछु गोटे अपन आक्रोश व्यक्त करबा मे अवश्य सफल भेला। एहि मे यात्री अग्रगण्य छथि।'

           दोसर जे पैमाना थिक, से लोकक क्षुद्र मनोभाव। अर्थात दूरदृष्टिक प्रति अनादर एवं समाजक वा व्यक्तिक हानिक चिन्ता कयने विना केवल अपन क्षणिक स्वार्थ-पूर्तिक लेल काज करब। ई प्रवृत्ति आइये नहि, अंग्रेजक अयबा सँ पहिनहि सँ मैथिल समाज कें ग्रसने छल, आ जमीन्दारी प्रथा एवं अंग्रजक गुलामीक अवधि मे जेना-जेना पाइ वा धनक कीमत बढ़ल, तेना-तेना समाजक एहि कुसंस्कार मे सेहो वृद्धि होइत गेल। 'पारो' मे पं. फुद्दी चौधरी आ भगिनमान लूच झाक प्रवृत्ति मे एकरा स्पष्टतापूर्वक देखल जा सकैत अछि। एहने एक दलाल 'नवतुरिया' मे मटुकधारी पाठक आयल अछि। पारोक दलाली मे जतय लूच झा कें पन्द्रह टाका, एक जोड़ धोती आ दू मन चाउर भेटल छलनि ओतहि बिसेसरीक दलाली मे पाठक कें पचास टाका सुतरल रहनि। सामाजिक ह्रासक तेसर द्योतक सामाजिक स्तर पर व्यावहारिक असभ्यता (cudeness)। समाज 'बड़का लोक' आ 'छोटका लोक' मे तँ विभाजित रहबे कयल, सब वर्गक स्त्रीगण एकर चपेट मे पड़ल रहली। बात-बात मे गारि, आ अनादरसूचक शब्दक बौछार एकर उदाहरण थिक। 'पारो' मे मामा ठकबा खवास कें कहै छथिन--'दुर बैटचोद, तों की जान' गेलही ई सब।' तहिना चित्रण आयल अछि जे लूच झा अपन दुनू पत्नी(हुनक दू विवाह छलनि) कें कोनो अदना सन बात पर जखन दू-दू डांग मारलखिन तं प्रतिक्रिया मे ओहो दुनू अपन हाक्रोश सँ सौंसे गाम कें मुखरित क' देल। एहना स्थिति मे मिथिलाक नारी लेल दुइये टा रस्ता छलनि-- ओ लूच झाक स्त्री जकां थेत्थर भ' क' समझौता क' लेथि, अथवा पारो जकाँ घुटि-घुटि क' विना समझौता कयने अपन प्राण उत्सर्ग क' देथि। अकारण नहि थिक प्रसिद्ध हिन्दी आलोचक मैनेजर पांडेय लिखलनि जे 'पारो एक मार्मिक उपन्यास से अधिक पुरुषसत्ता की क्रूरता की शिकार एक किशोरी की मृत्यु पर लिखा गया लम्बा शोकगीत है।' तहिना, 'पारो'क हिन्दी अनुवाद जखन प्रकाशित भेल तँ दिनमान मे एकर समीक्षा करैत सर्वेश्वरदयाल सक्सेना लिखने छला जे 'पारो अपनी लड़ाई में अकेली है, और यह लड़ाई--सामाजिक अन्याय की लड़ाई--अन्तत: उसे ही खा जाती है, लेकिन वह मरकर सबसे जीत जाती है और सबसे बदला ले लेती है।'(1976)

             एक उपन्यासकारक रूप मे यात्रीक स्वभाव छलनि, हरिमोहने झा जकाँ, जे अपन एक उपन्यास पूरा करबाक बाद ने मात्र पाठकक आग्रह, अपितु अपनो मनक समाधान लेल एही विषयवस्तुक अगिला चरणक वास्ते नवीन उपन्यासक रचना केलनि अछि। जेना 'कन्यादान'क अगिला चरण 'द्विरागमन' थिक तँ ठीक तहिना 'पारो'क अगिला चरण 'नवतुरिया' थिक। जे स्त्री पारो मे असमर्थनक मारलि एसकर छली, तकर समर्थन मे एतय नवतुरिया लोकनिक विशाल समूह आबि जाइत छैक। पारो तँ हारि गेल छली, मुदा एतय बिसेसरी कें हमसब जितैत देखैत छी। प्राचीन आ नवीन युगक नैतिकताक प्रसंग पछिला अध्याय मे हम म. म. गंगानाथ झाक अभिमत उद्धृत कयने रही। तकर यथार्थ दर्शन हमसब 'नवतुरिया' मे क' सकै छी। यात्रीक दृढ़ विश्वास रहनि जे पुरातन लोकनि मिथिलाक सामाजिक ह्रास कें जाहि तरहें उच्च स्तर धरि बढ़ा देने छथि, तकर काट अपन चेतना आ संघर्ष सँ नबका पीढ़ी अवश्ये निकालत। दोसर बात एक इहो देखबा योग्य अछि जे 'पारो'क रचनाकाल(1946) मे देश गुलाम छल आ सामंती मूल्य बेखौफ राज करैत छला, ओतहि 'नवतुरिया'क रचनाकाल (1954) मे देश आजाद भ' गेल रहय आ भारतीय स्वतंत्रता-संघर्षक आदर्श मिथिला-समाज कें सेहो कोन तरहें अनुप्राणित क' रहल छल, तकर अवलोकन हमसब एहि उपन्यास मे क' सकै छी। आगू जखन यात्री 'बलचनमा', 1954 मे मैथिली मे लिखलनि तँ बहुतो दिन धरि एकर अगिला चरणक उपन्यास लेल सोचैत आ चिन्तित होइत रहला। एकर साक्ष्य हुनकर अनेको इन्टरव्यू मे हमरा लोकनि कें भेटैत अछि। एकर विवरण 'युगों का यात्री' मे देखल जा सकैत अछि। ओ उपन्यास तँ नहि लिखि सकला मुदा तकर अगिला चरणक कथा-विस्तार हमसब हुनकर आगामी हिन्दी उपन्यास सब मे पाबि सकै छी।

           पारो-नवतुरिया पर गप करैत स्त्रीक पीड़ा आ स्त्रीक चेतनाक बीच मौजूद फरक दिस सेहो देखबाक जरूरति छैक। मैथिलियेक नहि अपितु सम्पूर्ण भारतीय भाषा सभक उपन्यासक आरंभ स्त्री-पीड़ाक संग भेल अछि। अर्थात स्त्री-पीड़ा आरंभिक उपन्यास सभक विषय बनल। से नीक जकाँ मैथिली मे सेहो भेल। जेना कि एखने कहल गेल, लिंग वा वर्णक असमानताक आधार पर मनुक्ख-मनुक्ख मे विभेद करब, वा एही आधार पर असभ्यता आ क्रूरताक व्यवहार करब स्वयं अपना मे मनुष्यताक हनन थिक। एहन केनिहार जँ स्वयं मनुष्यता सँ हीन अछि, तँ सामाजिक ह्रासक बदला सामाजिक प्रगतिक उम्मेदे कोना कयल जा सकैए। आधुनिकताक प्रवृत्ति थिक जे वंचित समुदायक प्रति करुणाक भाव राखय। मैथिली उपन्यासक आरभ एही प्रकारक आधुनिकताक संग भेल अछि। मुदा, चेतना एहि सँ भिन्न वस्तु थिक। कोनो पीड़ा तीन चरण मे आगू बढ़ैत चेतनाक रूप धारण करैत अछि। पहिल तँ वस्तु-विषय-व्यवहारक वास्तविक ज्ञान, दोसर ओहि पीड़ाक कारण-तत्वक पहचान। चाही तँ एकरा उत्पीड़कक पहचान कहि सकैत छियैक। तेसर, ओहि परिस्थिति, ओहि पीड़ा सँ बहरेबाक संकल्प। एहि संकल्प कें मजगूत एहि लेल होयब जरूरी जे निर्णयानुसार डेग सेहो आगां उठाओल जा सकय। ई तीनू मिऐत अछि तँ ओकर पहचान हमसब चेतनाक रूप मे करैत छी। 'पारो'क विशेषता थिक जे ई मैथिलीक पहिल उपन्यास थिक जाहि मे स्त्रीक पीड़ा मात्रक नहि, ओकर चेतनाक अभिव्यक्ति भेलैक अछि। किछु आलोचक तँ एहि विशिष्ट चेतनाक लेल 'पारो-चेतना' शब्दक प्रयोग करैत छथि। कमलानन्द झा कहलनि अछि जे 'हम के छी, हमर की आवश्यकता,हमर की पहिचान? पारो कें अपन शोषणक अनुमाने नहि, पूर्वानुमान तक छैक। अपन शोषण आ दमनक। ओ खूब नीक जकाँ बुझैत छली जे एहि परम्पराक पृष्ठभूमि मे पुरुष जातिक हाथ छैक।' कोन विधि खेपब राति/ निट्ठुर पुरुषक जाति/ कोन विधि काटब काल/ हैत हमर की हाल-- ई पारोक अपन जोड़ल पांती सब छलैक जे ओ रामायणक हाशिया पर लिखने छली। मुदा, पारो एसकर पड़ि जाइत अछि। चेतनासंपन्न हेबाक बादो। कारण, जे ओकर सर्वाधिक प्रिय छैक-- बिरजू, सेहो तक ओकर संग नहि दैत अछि। तकरा पाछू मुख्यत: ओकर सांस्कारिक गतिहीनता कारण थिक, जखन कि चेतना स्वभाग होइत छैक गतिशीलता, प्रवाह। ई दुनू उपन्यास साक्ष्य दैत अछि जे जगैत अछि पहिने स्त्रिये, बाद मे ओकर संग नवपीढ़ी दैत छैक, जकर जीवन-चिन्तन मे गति आ प्रवाह छैक। श्रीधरम लिखलनि अछि जे 'नवतुरिया मे आबि क' स्त्री-चेतना विद्रोहक रूप धारण क' लैत छैक। एत' नवतुरिया पुरुषवर्ग सेहो परिवर्तनक आकांक्षी बनि जाइत अछि। एकरा पाछां यात्रीक स्त्री आ सर्वहारा वर्गक प्रति प्रतिबद्धता छनि। पारो मे स्त्रीक नजरि सँ स्त्री-समस्या कें देखल गेल अछि त' नवतुरिया मे स्त्रीक संग पुरुषवर्गक सहयोग भेटैत अछि।' ध्यान देबाक बात थिक जे कमजोर वर्गक प्रि जाहि असभ्यता आ अवमाननाक व्यवहार हमसब 'पारो' मे देखैत छी, 'नवतुरिया'क विद्रोही-दल मे एहि सोल्हकन युवा लोकनि कें सेहो स्त्री-मुक्ति अभियान मे बराबर-बराबर के अभियानी रूप देखाइत छैक। संकेत छै जे जखन चेतनाक प्रवाह बढ़तै, तँ स्वाभाविक रूपें सामाजिक ह्रास के लक्षण सब मे कमी औतैक।

      मुदा, मान' पड़त जे 'पारो' मात्र एकटा उपन्यासे टा नहि, मैथिली साहित्यक अनुपम कलाकृति थिक, जे अनेक तरहें अपन व्याप्ति खोलैत अछि। एखन धरि लिखल गेल उपन्यास सब मे कला-समायोजनक दृष्टियें संभवत: ई सर्वश्रेष्ठ कृति थिक। समाज अध्ययन आ इतिहासक दृष्टि सँ जँ ई अपन व्यापक अर्थच्छवि रखैत अछि तँ मनोवैज्ञानिक दृष्टि सँ तँ ई मैथिलीक प्रथम आ सर्वाधिक सफल उपन्यास थिक। उपन्यासक मूल मे अछि लिबिडो(यौनभावना)। फ्रायडक सत्यापित कयल छनि जे ई लिविडो ततेक शक्तिशाली होइत अछि जे समाज, संस्कृति, मनुष्यनिर्मित कृत्रिम सम्बन्ध, सब कथूक धज्जी उड़ा देबाक ताकति रखैत अछि। प्रदत्त सम्बन्ध पर एतय स्वनिर्मित सम्बन्ध भारी पड़ैत छैक। ई सब चीज हमसब 'पारो' मे होइत देखैत छी। जे बात पारो अपन माइयो कें नहि, सखियो कें नहि कहि सकैत अछि, से ओ सहज भाव सँ बिरजू लग अभिव्यक्त करैत अछि। तहिना, पारोक साधारणो सन पत्र कें बिरजू तेना गोपनीय बना क' बारंबार पड़ैत अछि, उल्लसित होइत अछि, जे ओकर सांस्कारिक गतिहीनता पर ई दृश्य भारी पड़ैत छैक। प्रो. मनमोहन झा लिखलनि अछि जे 'दुनूक हृदय मे भाइ-बहिनक स्नेह नहि छैक, जुआन हृदयक कोमल ओ सूक्ष्म तरंग छैक। दुनू कें अपन हृदयकतरंगक ज्ञान छै, मुदा सामाजिक निषेधक ज्ञान सेहो चैक। दुनू भीतरे-भीतर सुनगैत रहैत अछि, किन्तु वाह्य प्रकाशक भय सेहो होइत छैक। दुनूक मध्य प्रेमक स्थायी ओ गँहीर भावना निहित अछि जे स्वयं सँ बेसी दोसरक लेल होइत छैक। तिक्त जीवनक विषपान करितहुँ पारो पारो भीतरे-भीतर दग्ध होइत अछिल, घुलैत रहैत अछि, मुदा बिरजू कें जिआब' चाहैत अछि। मन मे एकटा सपना जियौने रखैत अछि जे एहि जन्म मे नहि तँ अगिला जन्म मे ओकर मनोकामना पूर्ण होइक।' ध्यान देबाक बात थिक जे ई उपन्यासकार यात्रीक सीमा नहि छियनि,ओहि युगक स्त्री-चेतनाक सीमा थिक, जे हुनके अगिला उपन्यास सब मे सकनाचूर भेल अछि। एहितरहें हमसब देखैत छी जे पारो एकटा जटिल संवेदनाक कथा थिक, जकरा सोझरायल तरहें अभिव्यक्त क' देब उपन्यासकारक पैघ सफलता छियनि। एतय हमरा इहो लगैत अछि जे जे युवा आलोचक लोकनि एहि उपन्यासक विषय भाइ-बहिनक बीच यौन आकर्षण कें नहि मानैत छथि, हुनका सब सँ बेसी नीक तरहें एहि उपन्यास कें प्राचीन पंडित लोकनि बुझलनि, आ एकरा लेल यात्रीक ढेरी-ढाकी गंजन केलनि। 'पारोक मनोविश्लेषण-पक्ष बहुत समृद्ध अछि। व्यक्ति-मनक सूक्ष्म सँ सूक्ष्म अनुभव कें, अन्तर्द्वन्द्व कें, वाह्यजगतक प्रति प्रतिक्रिया कें, अचेतन स्थित ओझरायल संवेदना कें बहुत मार्मिकता सँ अंकित कयल गेल अछि। पारो आ बिरजूक मध्य नैतिक दम्भक शालीन वस्त्र नहि राखि प्रेमक हल्लुक सन आवरण पहिरौलनि अछि, किन्तु नग्न कत्तहु नहि कयलनि अछि।'(प्रो. मनमोहन झा) मुदा, जीवकान्त एक भिन्न दृष्टि उपस्थापित करैत लिखलनि जे 'पारोक आधार-भूमि ने प्रेमकथा थिक, आ ने इनसेस्ट (सगोत्रीय यौनसम्बन्ध) थिक। 'पारो'क आधार-भूमि थिक नारीक शोषण, नारी-शोषणक विरुद्ध जोर सँ बाजल असहमतिक स्वर।' 

              'पारो' कें मूलत: अनमेल विवाहक कथा गछबाक पक्ष मे सेहो कम तर्क नहि छैक। एकरा इनसेस्ट (सगोत्रीय यौनसम्बन्ध)क कथा सेहो कहल गेल अछि। विद्यानंद झा तँ मानैत छथि जे जँ बूढ़ वरक बदला मे पारोक विवाह कोनो नवजुआन लोकक संग होइतै तैयो पारो-बिरजूक बीचक ई प्रेम समस्याग्रस्ते बनल रहितय। तें यात्री स्वयं एहि तरहक सम्बन्धक कोनो निराकरण नहि देखि सकला। मुदा, चेतनाक प्रश्न अपना ठाम पर अछि। पारो कें हमसब एतय ई प्रश्न उठबैत देखि सकै छियैक जे विवाहक बाद स्त्री कें अपन देह पर कोनो अधिकार रहैत छैक कि नहि। साहित्य मे आब जा क' ई प्रश्न उठान लेलक अछि, एहि सँ हमरा लोकनि यात्रीक पक्षधरता आ दूरदर्शिताक नीक जकाँ अनुमान क' सकै छी। 'पारो' आ 'नवतुरिया'क बीच जे परिदृश्यगत फरक देखैत छियैक तकरा व्यक्तिवाद सँ संगठनबद्धता दिस अग्रसर हेबाक विकास-यात्राक रूप मे देखल जा सकैत अछि। जहाँ धरि पारो मे यात्रीक नियतिवादक प्रशन अछि, कतेक गोटे एकरा हुनक असफलताक रूप मे चिह्नित करैत छथि, मुदा एहू पक्ष मे कम तर्क नहि छैक जे एतय हुनकर नियतिवाद हुनका कमजोर नहि करैत छनि अपितु विश्वसनीय बनबैत छनि। मैथिल समाज धर्म, परंपरा, अन्याय आ अन्धविश्वास सँ ततेक जकड़ल अछि जे एहि नियतिवाद कें मैथिल जीवन-परंपराक विरोध मे स्पष्ट असहमतिक स्वर मानबे उचित थिक।

        चर्चा भ' चुकल अछि जे भारतीय उपन्यासक आरंभ स्त्री आ किसानक पीड़ा कें अभिव्यक्ति प्रदान करैत भेल छल। मैथिली मे स्त्री-पीड़ा टा विषय पकड़ल गेल, जकर केन्द्र मे विवाह-संस्था मे व्याप्त अनीति छल। किसान कें एतय प्रकट हेबा मे चालीस-पचास वर्षक देरी भेल। एकर पर्याप्त साक्ष्य भेटैत अछि जे 'बलचनमा' उपन्यास यात्री मैथिलिये मे पहिने लिखब शुरू कयने रहथि-- 1951-52 मे। किन्तु, जाहि तरहक आर्थिक संकट मे ओ ओहि समय पड़ल छला-- संग मे पाइ नहि आ बीमार बालकक तुरंत आपरेशन करायब अपरिहार्य-- हुनका लग एक्के टा रस्ता रहनि जे जल्दी सँ हिन्दी मे लिखि छपबाबथि जाहि सँ पाइ भेटनि। 1952 मे हिन्दी बलचनमा छपि गेलाक बाद ओ मैथिली बलचनमा पर काज करब शुरू केलनि, जे 1954 मे पूर्ण भेलनि। कैक अर्थ मे यात्रीक ई बहुत महत्वाकांक्षी कृति छल। मैथिली उपन्यास मे पहिल बेर किसानक पीड़ा आ चेतना आबितय, ततबे टा नहि, बालचन तँ बोनिहार मजदूर छला, अर्थात किसानक जे अर्थ-व्याप्ति स्थापित रहै, तकरो बदलबाक रहय। आ ततबे किएक, बटाइदार-भूमिहीन-कमार-मलाह आदि-आदि पेशाक लोक जिनका तकनीकी आधार पर किसानक मान्यता नहि छलै, तकरो सभक एतय सुरता लेल जेबाक छल। ई मार्क्सवादक सैद्धान्तिकी मे एक जबरदस्त दखल होइत। आ, सब सँ तँ पैघ जे एहि उपन्यास कें आत्मकथात्मक शैली मे लिखल जेबाक रहय। बालचन जें कि 'छोटका लोक' छलै जकरा अपन मालिकक भाषा नहि बजबाक अधिकार रहै, ओकर पुरखाक क्रमागत एक भिन्न मैथिली चलि आबि रहल छल, शूद्र मैथिली, यात्री कें अपन उपन्यास ओही भाषा मे लिखबाक रहनि। मैथिलीक जतेक परती एखन धरिक अपन कृति सँ ओ तोड़ि चुकल रहथि, आब हुनका समक्ष यैह एक बचल चुनौती छलनि। तें, एकरा लिखने विना हुनका चैन नहि छलनि। अन्तत: जखन ई उपन्यास हुनका परिकल्पनाक एनमेन मुताबिक कागज पर उतरि अयलै, 15 फरबरी 1955 कें ओ हरिनारायण मिश्र कें लिखलनि: 'हौ हरि, मैथिली बलचनमा हिन्दी बला सं नि:सन्देह सुंदर भ' गेलैक अछि। अनावश्यक विस्तार आ बन्धुरतो एतय नहि छैक। ओकर धड़कन कैक गुना अइ मे बढ़ि गेलैक अछि, की कहियह!'

              जेना कि पहिनहु कहल गेल, 'बलचनमा' यात्रीक किसान-सभाक अपन कार्यानुभव पर आधारित अछि। जकरा हमसब भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम कहै छियै, से अपन आरंभिक दौर मे बाबू-भैयाक राजनीति छल। एहि उपन्यास मे सेहो देखै छिऐक जे कांग्रेस पर बाबू-भैयाक वर्चस्व छैक। जखन एहि संग्राम मे किसान-मजदूरक प्रवेश भेल, तखनहि जा क' ई गाम-गाम मे पसरल आ संपूर्ण भारत एहि संग अपना कें ठाढ़ क' लेलक। बिहार किसान सभाक स्थापना 1931 मे भेल छल आ एकर पहिल अधिवेशन 1933 मे मधुबनी मे भेल। एहि तरहें मिथिला शुरुहे सँ एकरा संग जुड़ल रहल। यात्री जखन 1938 मे किसान सभाक राजनीति मे सक्रिय भेला, पहिने तँ राहुल सांकृत्यायनक संग अमवारी किसान आन्दोलन मे, ओतय गिरफ्तार भेला पर सीवान जेल, पश्चात स्वामी सहजानंद हुनका चंपारण मे संगठन आ विस्तार लेल पठौलकनि। अमवारी आन्दोलन मे किसान आ जमीन्दारक बीच लड़ाइ कुसियारक एक खेत लेल भेल छल। बलचनमा मे जे संघर्ष भेल छैक, ओकरो कारण कुसियारक एक खेत थिक। जमीन्दारक लठैत अमवारी मे राहुल जीक कपाड़ फोड़ि देने रहनि। महपुरा मे से घटना बलचनमाक संग होइत अछि। स्वामी सहजानंद अपन आत्मकथा मे चंपारणक एक घटनाक उल्लेख कयने छथि, जे यथावत रूप मे बलचनमा मे आयल अछि। जखन स्वामी जीक मीटिंगक लेल 400 किसानक संग स्थल पर पहुँचला तँ जमीन्दार अपन लठैत ठाढ़ क' देलक जे अपना जमीन पर हम मीटिंग नहि करय देब। जमीन्दारक दबौट पर किसान सब तँ चुप्पी लदने रहल, मुदा नूर मोहम्मद नामक एक किसान, जकर खेत मे केराव लागल रहै, अपन फसिल उखाड़ि जमीन तैयार केलक, ओतहि मीटिंग भेल। स्वामी जी अपन आत्मकथा मे लिखने छथि-- 'सभी के साथ मैं उस खेत पर गया और उसकी मिट्टी सिर पर लगाकर कहा कि किसान सभा के इतिहास मे यह खेत और यह मुसलमान जवान अमर रहेंगे। ऐसे लोग ही इसकी जड़ दृढ़ करेंगे।' ई मूल घटना भितिहरबा के थिक, जकरा बलचनमा मे महपुरा मे होइत देखाओल गेल अछि आ नूर मोहम्मद एहि ठाम लतीफ बनि गेला अछि। उपन्यास मे लतीफक खेत मे मड़ुआ लागल छलै।

           एहन दबौटक कारण की छल? 'बलचनमा' मे हमसब देखै छी जे जमीन्दार आ किसानक संघर्ष जखन सामने आयल, जमीन्दारक लठैत-गुंडा नारा लगबैत अछि-- महत्मा गांधी की जय, भारत माता की जय। किसान सभक नारा छै-- कमाय बला खाएत/ एकरा चलते जे किछु होइ। जमीन ककर/ जोतय-बोअय तकर, अंग्रेजीराज नाश हो, जमीन्दारी प्रथा नाश हो। आदि-आदि। एकर की मतलब? की महात्मा गांधी आ भारतमाता जमीन्दारक समर्थन मे छल? निश्चिते। ई बात बलचनमा मे कतेको जगह पर आयल छैक। जखन किसान सभाक मूवमेन्ट सत्याग्रहक कठिन हठ ठानै छल, तँ हमसब देखै छी जे 'गाँधी जीक चेला'कांग्रेसी लोकनि उपवास तोड़ेबाक छल-छद्म करय लगैत छल आ कोनहुना तोड़बाइए दैत छल। गांधीजी सँ सहजानंद के मोहभंग दरभंगाक जमीन्दारे ल' क' भेल छलनि। ई सब भयंकर शोषण करै छलखिन किसानक, 88% तक उपजा कोनो-ने-कोनो बहन्नें जमीन्दारे हड़पि लैक, एहन अनीति समुच्चा भारत मे कतहु अन्यत्र नहि छल। सहजानंद जमीन्दारक विरुद्ध सीधा कार्रवाई चाहै छला, जखन कि गाँधीजी जमीन्दार कें आंच नहि आब' देबाक हिमायती रहथि। उपन्यास मे एकठाम बलचनमा कांग्रेस आ सोशलिस्टक विचारधारा कें फरिछबैत गांधीजीक बारे मे कहैत अछि-- 'अंग्रेजराज ने कांग्रेसे चाहै अछि आ ने सोसलिस्टे। मुदा गांधी महतमा कल-कारखानाक विरुद्ध छथि। ओ एकरो खिलाफ छथि जे सेठ जमीन्दार, राजा महराजा सँ जमीन-जायदाद, धन-संपत्ति छिन क' आन लोक मे बांटि देल जाय।' तें, ई वाजिब नारा छल। जमीनी हालात ठीक एहने रहैक। तें, सहजानंदक संघर्ष बहुगुणित छलनि-- अंग्रेज, कांग्रेस, जमीन्दार, प्रशासन-- सब खिलाफ। तें, जाहि चेतनाशील बालचन कें हमसब पहिने कांग्रेस मे जाइत देखै छियै, वैह मोहभंगक बाद सोशलिस्ट पुन: किसान सभाइ कम्युनिस्ट बनि जाइत अछि। मोन रखबाक चाही जे नक्सल नाम पर जाहि सशस्त्र किसानसंघर्ष कें हमसब आगू जारी होइत देखैत छी, तकर आदिम पुरखा सहजानंद, यात्रीक राजनीतिक गुरु, छला। 'बलचनमा' कें आखिर मे हमसब लगभग हारैत देखैत छियैक। यात्रीक वामपंथी प्रतिबद्धताक हिसाब सँ देखी तँ ओकरा हारबाक नहि छलै। मुदा, एक तँ वास्तविक यथार्थ एकर अनुमति नहि दैत छल, दोसर कलात्मक संयम सेहो एकरा पक्ष मे नहि रहैक जे बलचनमा सन-सन अबल-दुबल किसान-मोर्चा जीति जाइतैक।

बोनिहार-किसानक असल दुश्मन छल जमीन्दार, रक्तबीजक संतान जकाँ जकर अमला-फैला चहुँदिस पसरल छल, महपुरा इलाकाक जमीन्दारक ताकति के बारे मे बलचनमा एकठाम बतबैत अछि-- 'ओहि जालिम जमीन्दारक मोकाबला असगरे तँ कियो क' नहि सकै छलै। ओकरा पीठ पर थानाक दरोगा साहेब छलखिन, दरभंगाक कलक्टर साहेब छलखिन, इलाका भरि के जमीन्दार, पंडित आ मौलवी सब-- खान बहादुरक पच्छ मे छलखिन। पच्छिमक दस लठैत जवान, नेपालक पांच खुखरी बहादुर...'

                अमवारी मे जेना घटना घटल रहैक, जमीन्दार किसानक जमीन हड़पि लेने छल। खेत मे कुसियारक फसल लागल। जमीन्दारक दिस सँ हाकिम-हुकुम, पुलिस-दरोगा सब हाजिर। गुंडा-लठैत सब तत्पर। मुदा, किसान मे जोरदार प्रतिरोध जे हक ल' क' रहब। नेता छला राहुल सांकृत्ययन आ भिक्षु नागार्जुन। दू हजारक करीब किसान खेत लग मे डेरा डालने। राहुल जीक कपार फोड़ि देने रहनि, मने लक्ष्य जान मारबाक रहै। सामंतवादी-साम्राज्यवादी गठजोड़क यैह तरीका छलै। एकजुट जँ किसान हुअय लागय तँ नेताक जान मारि दियौ, भय सँ किसान फील्ड छोड़ि देत। 'बलचनमा' मे नेताक रूप मे पांच व्यक्ति कें चिह्नित कयल जाइत अछि-- बालचन, अब्दुल, रामखेलावन, बम्भोल आ बच्चू। दुनू ठाम हमसब देखै छियै जे किसान संग इंसाफ करबा लेल, कोनो समझौता करबा लेल ने जमीन्दार तैयार अछि ने प्रशासन। यैह अंग्रेजी राजक तरीका रहैक जे आइयो लागू छैक। अमवारी मे नेता पर हमला कयलाक बाद हुनका सब कें जेल ढुकाओल गेलनि, मुदा ताहि सँ आन्दोलन खतम नहि भेल। स्वामी सहजानंद एहि उपन्यासक सेहो एक पात्र छथि। ओ किसान सब कें संबोधित करैत कहै छथिन-- 'बाहरी लीडर के भरोसे नहि रहू, अपन नेता अपने बनू। जे अहाँक आदमी हैत वैह अहाँक तकलीफ कें बूझत। अहाँ सब किछु उपजबै छी तँ अपन लीडर सेहो अपने ओइठाम पैदा करू।' ई बात किसान सभक मोन मे बैसि गेल रहैक। सन् चौंतीस के भूकम्प मे ओ सब काँग्रेसी नेताक बैमान नेत कें नीक जकाँ चीन्हि गेल रहय। आगू जखन किसान आन्दोलन शुरू भेलै तँ तखनहु किसान कें ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलैक जे कांग्रेसी सब किसानक नहि, जमीन्दारक हितचिन्तक थिका। तें, अपना बीच सँ नेता पैदा क' क' लड़ाइ कें अनवरत जारी रखलक आ जीति सकल। कोनहु कालखंडक घटना कें जखन इतिहासक बदला उपन्यास मे व्यक्त कयल जाइत छैक तँ ओहि औपन्यासिक यथार्थक मतलब ने केवल ओहि खास घटना, अपितु ओहि समस्त कालखंडक परिणति आ इंगित कें अभिव्यक्त करबाक बेगरता रहै छै। से नीक जकाँ भ' सकय तखनहि बात बनैत अछि। 'बलचनमा' मे हमसब देखैत छी जे बालचन पर जमीन्दारक गुंडा सब जानलेवा हमला करै छै। लड़ाइ ओही कुसियारक खेतक छियै। अमवारी राहुलजी वा भिक्षु नागार्जुनक अपन गाम नहि छलनि। महपुरा सेहो बालचनक अपन गाम नहि छियै। दस के लड़ाइ ई लोकनि लड़ि रहल छला। तँ, उपन्यास मे होइत ई छै जे गुंडा सभक जानलेवा हमला मे बाचन बेहोश भ' जाइत अछि, आ ठीक एत्तहि उपन्यास समाप्त भ' जाइत अछि। बालचन मुइल नहि, ओकरा सन जनता कहियो मरि नहि सकैए, से यात्री कहैत छला आ उपन्यासो ई बात अपन अन्विति मे कहिते अछि। तखन, एत्तहि उपन्यास समाप्त हेबाक पाछू निहितार्थ ई छै जे किसान सभा सन संगठन एक नितान्त जरूरी काज कें हाथ मे लेलक, जनता कें जगेलक, संगठित केलक; मुदा ई जनता जे कि वास्तव मे अस्सल भारत छल, के हाथ मे स्वाधीनता संग्रामक नेतृत्व नहि आबि सकल। ओकर लड़ाइ मुख्यधाराक लड़ाइ नहि बनि सकलैक। सन् छत्तीस मे कांग्रेस अपन घोषणापत्र मे जमीन्दारी उन्मूलन कें शामिल कयने छल। एकर चर्चा 'बलचनमा' मे सेहो एलैए, एकरे भयवश जमीन्दार सब किसान कें बेदखल करब शुरू कयने छल। जे हमसब अमवारी वा भितिहरबा मे देखै छी, ठीक वैह चीज महपुरो मे देखै छी। बाद मे कांग्रेस पर जखन जमीन्दार लोकनि अपन दबौट कायम केलनि तँ कांग्रेस, सन् सैंतीस मे सरकार बनेलाक बादो, अपन एहि घोषणा सँ मुकरि गेल। महपुरा मे जखन ई संघर्ष भेल रहैक, कांग्रेसेक शासन छल। गाम-गाम मे लोक किसान सभाक मेम्बर बनय। दस मेम्बर तँ बालचन अपने बनौने छल। ताहि पर सँ जनसमर्थन एहन जे सदस्यताक लेल एक आना पाइ दैत, कुन्ती मसोमात बालचन कें कहने छलै-- 'बालो, देवताक प्रसादक हेत ई एक चुटकी भरि चिक्कस हमरो गरीबिन के!'

              जमीन्दारक गुंडा सब कें जखन हमसब 'महतमा गांधी की जय' के नारा लगबैत देखैत छियै तँ एकर असली अभिप्राय कें बुझबाक चाही। उपन्यास मे एलैए जे गुंडा सब हो-हल्ला मचा क' स्वामी जीक सभा कें भंग करबाक कोशिश केलक, तँ किसान लोकनि ओकरा सब कें डांटि-डपटि क' चुप करा देलक। किसान सभक एहन जुझारूपन रहैक जे गुंडा सब कें विफल हुअय पड़लैक, मने से। इहो मोन रखबाक चाही जे ओ गुंडा सब 'भारतमाता की जय' के सेहो नारा लगबैत छल, जकरा एखनो सुनल जा सकैए। स्वतंत्रताक बाद, जमीन्दारी उन्मूलन अवश्य भेल, मुदा भूमिसुधारक जे कानून लागू हेबाक छलै से आइयो लटकले अछि। राहुलजी लिखलनि अछि जे के अभागल हैत जे अपन हाथक कुड़हरि अपने पैर पर मारत। उपन्यास मे बलचनमा एकठाम कहैत अछि-- 'कांग्रेसक बारे मे सोच' लगलहुँ जे स्वराज भेलाक बाद बाबू-भैया सब अपना मे दही-माछ बँटताह, जे सब एखन मालिक बनल छथि सैह सब ने भितरिया माल उड़ौता। हमरा सभक हिस्सा मे तँ सिट्ठी पड़तै।'

                     'बलचनमा' मे जे मिथिला-समाज आयल छैक, से 'पारो' आ 'नवतुरिया' मे आयल समाज सँ सर्वथा भिन्न छै। ई मिथिला-समाजक एक एहन अंश थिक जे एतेक खुसफैल सँ मैथिली साहित्य मे कहियो नहि आयल छल। पं. गोविन्द झाक लिखल एक बात एतय हमरा मोन पड़ैत अछि। ओ कहने छथि जे मिथिला-समाज जकरा हमसब कहैत छिऐक से कोनो एकटा समाज नहि थिक, दूटा अलग-अलग समाज, जे मानू दू अलग-अलग ग्रह पर बसल हो, एक दोसरक हाल-सुरता सँ सर्वथा बेखबर। एहि मे सँ एक जँ अभिजात समाज थिक तँ दोसर अनभिजातक श्रमशील समाज, जकर रहन-सहन, आचार-विचार, नीति-धर्म बिलकुल अलग अछि। रोचक हैत ई देखब जे एहि समाजक विषय मे यात्री एतय की सब टिपलनि अछि।

                बलचनमा जाहि छोटका लोकक समाज सँ अबैत अछि, ओकरा लेल आदर्श जीवनक परिकल्पना की छैक देखल जाय-- 'झूठ किए कहू भैया! समांग नीकें रहय, काम-काज भेटैत रहय, परिवार छोट रहय, नीयत खराब नहि हो, मोन मे दस-बीस लेल जगह होइ, आओर की चाहिऐक?' प्रश्न अछि जे बड़का लोकक धिया-पिता एहि तरहें मनुक्ख किएक नहि बनि पबैत अछि? एक ठाम बालचन अपन तप्पत अनुभवक बात बतबैए जे एहि धिया-पुता सभक लेल मनुक्ख बनब किएक कठिन बनल रहै छै-- 'बड़का घरक धिया-पुता सब तुनकाह तँ होइते छै। घमंड, फरेब आ झूठ-- ई बड़ सहजता सँ हुनका सभक अंदर पैसि जाइ छनि। मचलनाइ, रुसनाइ, बिधुकनाइ, रंज भेनाइ-- ई सब तँ माइये-बाप सिखबै छथिन। बढ़ियां जँ किछु सिखैत छथि, ओइ मे बेसी हिस्सा नोकर-चाकर आ गरीब पड़ोसी सभक देल रहै छै।' एहि छोटका लोकक जे इमान-धरम होइ छै, खिस्सा आयल अछि जे किसानी एकता कें तोड़बाक लेल बाबू-भैया लोकनि मुसहर सब के नाम छोटका सभक जमीन लिखि देबाक प्रलोभन दैत छथि, तँ 'मुसहरक मुखिया (माइनजन) साफ कहलकनि-- नहि सरकार, दोसरक पेट काटि क' देब तँ नहि दिअ'। हँ, अपना खेत मे सँ देब' चाहै छी त ठीक छै।' दोसर दिस, नब्बे बीघा बला खेत जकर लड़ाइ उपन्यासक अंतभाग मे आयल छै, ओकर इतिहास बतबैत एकठाम बालचन कहैत अछि-- 'गामक पच्छिम, एकदम करीब, खेतक एकटा बढ़ियां टुकड़ा छलै नब्बे बीघा के। एहि जमीन मे सब किछु उपजै छलै। धन्, मड़ुआ, सरिसो, कुसियारो, तिसियो, राहड़ियो, जौ-गहूम सेहो, उड़ीद सेहो, कुरथी सेहो। ई जमीन तीसेक मुसलमान, गुआर आ मलाह सभक अधिकार मे रहै। मुदा (पछिला सर्वे मे) चलाकी सँ मालिकक परददा एकरा अपना नामें चढ़बा लेलखिन।' मुसहर लोकनि कें एही जमीन मे सँ देबाक प्रलोभन छलै।

              सन् चौंतीस के भूकंपक बाद जे रिलीफक पाइ बांटल गेल, ओहि मे कांग्रेसी बाबू-भैया लोकनि छुटि क' लूट मचौलनि। तकर पूरा विवरण उपन्यास मे आयल छैक। जुगल कामति के विधवा चुन्नी ओहि पर अपन प्रतिक्रिया दैत कहैत अछि-- 'ई सब जुलुम करै छथि बेटा। दैत छथि दू आ कागत पर चढ़बै छथिन दस। ईमान-धरम हिनका सब के डूबि गेलैन। पता लगबिहै बेटा, हमरा नाम कै रुपैया चढ़ल अछि।' ओकरा मात्र तीन टका भेटल रहैक। एहि बड़का लोकक समाज मे छोटका लोकक प्रति जे विभेद, अन्याय आ नृशंसता बरतल जाइत अछि, तकर विवरण सँ तँ ई उपन्यास भरल अछि। खाइ लेल अइंठ-कूठि देल जाइत छैक, मुदा बेसी खेला पर तखनहु दुर्वचन कहल जाइत छैक। मुदा, छोटका लोकक सोचब दोसर तरहक होइत अछि। बालचन जखन दुरागमन करा क' घुरि रहल अछि, कहारक महफा पर कनियां बैसलि छथि। बालचन कें बीड़ी पीबाक लत छै। ओहि कहार मे सँ सेहो किछु गोटे बीड़ी पिबैत छथि, से जखन-जखन बालचन अपने पिबैए, ओकरो पियाबैत अछि। एहि प्रसंग कें अपन दोस कें सुनबैत ओ कहैत अछि-- 'बिलकुल स्वार्थ सेहो कोन काजक भैया? सस्ता-महग आ खुसफैल-तंगी तँ जिनगी भरि चलतै। जीवन छै संग्राम बन्दे,जीवन छै संग्राम। सुनने छी कहियो?' सोशलिस्ट राधा बाबू जखन बालचन कें पढ़ब-लिखब सिखबैत छथि, हुनकर पत्नी कें से सख्त नापसंद। हुनकर साफ कहब छनि-- 'असल त मुसीबत छै जे नोकर-चाकर पढ़ि-लिखि क' अहांक हंडी माज' बैसत? तखन एकरा ओढ़ेला लिखेला सँ फैदा?' एक बेर राधा बाबूक सारि एली तँ हुनकर कहब तँ भिन्ने रहनि-- 'नोकर-चाकर जते नासमझ रहय, ततेक बढ़ियां रहत भौजी! हमर अजिया ससुरक कहब छलनि कि जे छोट जाति बला कें एको आखरक ज्ञान दै छथिन त हुनकर अपने तेज घटै छनि, आ जे शूद्र कें समुच्चा पोथी पढ़बै छथिन हुनकर पितर सब स्वर्ग छोड़ि नरक मेरहक हेतु लचार भ' जाइ छथिन।' छोटका लोक मे शिक्षाक अभाव किएक छैक, बूझल जा सकैत अछि। मुदा, बालचनक विचार बिलकुल स्पष्ट अछि। सभक लेल ओ शिक्षाक पैरोकार तँ अछिये, बाबुओ भैया लोकनि जे स्त्री-शिक्षाक महत्व नहि बूझि रहल छला, तकरा बारे मे ओकर कहब अछि-- 'जहन कन्यो सब लड़के जकाँ पढ़ल-लिखल होअ' लगतै तखने अइ देसक उद्धार हेतै।'

           विना श्रम कयने खायब, आ श्रम क' क' खायब-- यैह तात्विक भिन्नता छलै जे मिथिला कें दू भाग मे बँटैत छल। बलचनमा कर्मठ अछि। ओ अपना बारे मे बतबैत अछि-- 'हमरा द' ई सोरहा छलै जे बलचनमा खूब मन सँ काज करैत अछि। एक जनक सवा जन अछि ओ। कते लोक उपराग दीत, गदहा अछि, अकिलक छूति नइ छै। ओइ जन्म मे तेलीक बड़द छल हैत। अच्छा भाइ, हम बड़द रही, गदहा रही, तोरा जकाँ बैमान तँ नै छी। असल बात ई छै भैया, जाइ तरहे हम अपन काज करै छलहुँ तहिना दोसरक।' अपन आ आन के जे ई फरक छैक, सैह सब अनीतिक जड़ि थिक, निहितार्थ से। स्त्री-श्रमक विषय मे अभिजात वर्गक जे दृष्टिकोण छैक, 'हुनका ओइठाम स्त्रीगण बेकाज बैसल रहैत छै। जतेक पैघ खनदान हेतै तते बेसी बेकाज पेबहक। हमर स्त्रीगण सब मेहनत मजदूरीक दाना खाइत अछि। की हम फूसि कहै छी भैया?'

           यात्रीक उपन्यास सभक विशेषता छैक जे ओकर विषयवस्तु भने जे होइक, ओकरा भीतर सँ यात्रीक स्वप्नक समाज झलकैत छैक। से हिन्दी उपन्यासक संग छैक तँ एनमेन मैथिली उपन्यासक संग सेहो छैक। सब सँ साफ, सब सँ फड़िच्छ जकर समाज लगैत छैक से ई 'बलचनमा' थिक। जाति मे बँटल मिथिलाक कथा भने ई कहैत हो, मुदा यात्रीक स्वप्न छनि जातिमुक्त समाज। एहि लेल तँ सब सँ पहिने छोट-पैघक जे निर्धारक जाति कें सनातन सँ बनाओल गेल छैक तकरा बदलबाक हेतै। यात्रीक एहि उपन्यास मे एकरा हमसब बदलल देखैत छी। बालचन जे कोनो शिकाइत एहि ठाम केलक अछि, मोन रखबाक चाही से ओ विरोधक लहजा मे केलक अछि। अपने स्वयं कतहु ककरो सँ एहि आधार पर विभेद करैत नहि देखैत छिऐक। जाहि कुल सँ ओ अबैत अछि ओहि मे ई विभेद नहि कयल जाइत हो सेहो नहि। ओकरे अपन मामा कें ई विभेद करैत हमसब देखैत छिऐक। तहिना, ओ बहिया बनि क' मालिकक घर मे रहल, नोकर बनि क' फूलबाबूक संग रहल, वोलंटियर बनि क' राधाबाबूक संग रहल, सगरो सँ जे ओ निराश भेल तकर कारण चेतनाक विकसित होइत जायब आ हुनका लोकनिक सीमाक ज्ञान छल, ने कि ओकर अपन मनक मालिन्य। अंत मे ओ किसान सभाक कामरेड भेल तँ एहि दुआरे जे ओकरा स्वप्न आ सेहन्ताक जे समाज छल, तकर स्पर्श ओकरा एतहि भेटलैक। कहब जरूरी नहि जे ई यात्रीक स्वप्नक संसार रहैक आ बलचनमाक माध्यमें यात्री तँ सेहो अपन अनुभवेक आख्यान क' रहल छला। 

               मालिक लोकनिक जे अन्याय आ शोषण रहैक तकर शिकार केवल छोटके लोक नहि, बड़को लोक भ' रहल छला। तकर एक जीवन्त चरित्र फूदन मिसर आ हुनक विधवाक रूप मे एहि उपन्यास मे तेना गाढ़ भ' क' आयल अछि जे स्मृति-पटल पर बनल रहि जाइत अछि। चौंतीसक भूकंपक खरांत मे जे कांग्रेसी नेता सब निर्भय लूट मचौने छला तकरो शिकार केवल छोटके नहि भेल छला, आ ने जमीन्दारक बकाश्त आ बेदखलीक शिकारे केवल छोटका भेल छल। असल कारण छल गरीबी। केहन नृशंसताक बात थिक जे शोषण जहिया कहियो कयल गेलै, गरीबेक कयल गेलै। बड़का जँ हिन्दू होथि तँ राजाबहादुर आ मुसलमान होथि तँ खानबहादुर, विभेदक आधार ने धर्म रहैक ने जाति। एतय हमसब देखैत छी जे किसान सभाक जमीनी कार्रवाई मे जे सब कामरेड अपन जान-प्राण अड़पि देने छै, ओहि मे अछि-- बच्चू, बम्भोल झा, रामखेलावन, अब्दुल आ बालचन। गाम-गाम मे जे ई जमीनी संघर्ष भ' रहल छलै, एकर समाचार ने तँ कांग्रेसक अखबार मे छपै छलै ने सेठ-जमीन्दारक अखबार मे। स्वाभाविक जे एहि सब समाचारक लेल मिथिलामिहिर, आर्यावर्त वा इंडियन नेशन मे कोनो जगह नहि रहैक। पार्टी अपन साप्ताहिक अखबार 'क्रान्त' निकालै छल जे वृहस्पति कें एहि गाम अबैक। ओहि अखबार मे एहि गामक संघर्षक समाचार कतेको बेर छपि चुकल छल। एहि अखबारक समाचार सब कें सुनबाक लेल जे सब लोक बेकल भेल रहथि, क्रान्तिकारिये छला ओहो सब प्रकारान्तर सँ, से सब छला-- तारानन्द बाबू, बम्भोल झा, रामखेलावन, तीरी अमात, कपिलेसर मरर आदि। अपन पाइ खर्च क' क' 'पांती पांती सँ असंतोषक चिनगारी निकालैबला' ई अखबार जे जुवक मंगबैत छल, से छल बच्चू। समाज कोनो स्वप्ने टा मे थोड़े रहैक, ओ तँ आंखिक आगू जीवित सांस ल' रहल छल। किसान सभाक रसीद जे एहि गाम मे अनने छल, से बच्चुए रहय। आ से ककरा सँ? रहमान साहेब सँ। जमीन्दार छला खानबहादुर सदुल्ला खां, तकर विरोध मे क्रान्तिकारी सभक संगोर मे लागल छला डाक्टर रहमान, दुन्नू मुसलमाने।

              एकर अगिला प्रक्रम छैक-- जातिक बदला मे वर्गक आधार पर सम्बन्ध आ सहयोग। फूदन मिसरक ऊपर चर्चा भेल अछि। गरीब ब्राह्मण फूदनक जखन बान्हल बड़द मरि गेलनि, गामक पंडित बड़ मुश्किल सँ हुनका लेल पतिया लिखलनि आ ताहि लेल पचास टाका निर्दयतापूर्वक वसूल केलनि, जखन कि दू टाकाक तहिया एक मन धान वा गहूम होइत रहैक। फूदनक हाथ बिलकुल खाली। अपना जातिक भीतर क्यो मददगार नहि। तखन बलचनमाक बाप लालचन हुनकर मदति कयने रहनि, सौ टाका द' क'। एहि उपकार लेल फूदन सब दिन कृतज्ञ बनल रहला। एतय धरि जे फूदनक देहान्तक बाद मिसराइन सेहो। हुनके खेत पाबि क' बालचन बटाइ के खेती शुरू कयने छल, हुनके मरणोन्मुख बड़द पाबि क' बालचन बड़दबला भेल छल। एक तँ मालिकक घराना, ब्राह्मण होइतो, ओही प्रकारक छल-छद्म, ओही कोटिक शोषण फूदनोक करैत रहला जेना बलचनमाक। दोसर, कठिन समय एला पर बालचन आ मिसराइन एक-दोसरक सुहृद सहयोगी बनल रहल। जखन बालचन सोराज आश्रम मे रहैत अछि, ओतुक्का भनसिया एक ब्राह्मण थिका, मुदा सर्वाधिक विपन्न वैह। स्वराजक बात उठला पर बालचनक मोन मे यैह बात अबैत छैक जे स्वराज एला पर की एहि गरीब ब्राह्मणक दिन घुरतैक, मानू एही विषय कें ओ स्वराज नपबाक कसौटी बना लेने हो। तहिना, अपन बहिनक संग मालिक द्वारा बलात्कारक प्रयास केलाक बाद जखन बालचनक परिवार रेबनी कें ड्योढ़ी पठेबाक लेल नहि तैयार भेल तँ मालिक उनटे बलचनमे पर केस-फौदारी करबा देलखिन। लचार बालचन फूलबाबू लग पहुँचल जिनकर ओ घरेलू नोकर रहि चुकल छल, आ आब जे कांग्रसक एक पैघ नेता छला। मुदा, नहि। वर्गस्वार्थ बीच मे आबि गेल। बलात्कारक प्रयास आ जाली मोकदमा कें फूलबाबू जखन 'बहिया-महतो के आपसी लड़ाइ' करार देलखिन आ किछुओ मदति करबा सँ इनकार क' देलखिन तँ बालचन कें लगैत छैक-- 'सोराजी भ' गेल छला तें की, छला तँ आखिर बाबुए-भैया ने!' आ ओ निर्णय करैत अछि जे 'जेना अंगरेज बहादुर सँ सोराज लेबाक हेतु बाबू-भैया लोकनि एक भ' रहल छथि, हल्ला-गुल्ला आ झगड़ा-झंझट मचा रहल छथि, ओहिना जन-बनिहार, कुली-मजदूर आ बहिया-खबास कें अपना हकक लेल बाबू-भैया सँ लड़' पड़तैक।' तात्पर्य जे वर्गहित सब सँ पैघ सम्बन्ध-सेतु होइत छैक, जकरा कारणें एक्के जाति-धर्मक दू अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग वर्गक भ' सकैत छथि। जाति वा धर्म विभाजन आधार नहि, संपन्नता आ विपन्नता एहि वर्गविभाजनक आधार बनि क' आयल अछि।

        धर्मक विषय मे सेहो यात्री ठाम-ठाम पर प्रसंग उपस्थित करैत रहैत छथि जे धर्म असल मे गरीबक शोषणक सब सँ पैघ आधार थिक, आ धर्म अपन मूल मे सामंतवादक सहयोगी होइत अछि। पंडित आ पुरहित जी तँ उपन्यास मे आयले छथि जिनकर सीधा सिद्धान्त छनि जे 'राड़ं एड़ं पवित्रम्', मुदा सिद्धजी आदि सेहो आयल छथि जे नाना प्रकार सँ शोषण आ व्यभिचार करैत छथि।  हमसब देखैत छी जे संपन्न वर्गक अंतर्गत जतय उपनिवेशवादी प्रसासक, जमीन्दार आ धर्माचार्य अबैत छथि तँ विपन्न वर्ग मे मध्यवर्गीय  आ सीमान्त कृषक, भूमिहीन खेत-मजदूर, बटाइदार, काश्तकार, बढ़इ-मलाह आदि अबैत अछि। एहि लोकक शोषण केवल आर्थिके टा नहि, शारीरिक-धार्मिक-बौद्धिक, सब तरह सँ कयल जाइत अछि। यात्री एहि कूटयांत्रिकी कें एतय नीक जकां देखार कयने छथि।


यात्रीक उपन्यासेतर मैथिली गद्य-लेखन

            



            तारानंद वियोगी

 मिथिला मे अनेक भाषा एवं अनेक विधा मे लेखन केनिहार रचनाकारक परंपरा बहुत पहिनहि सँ रहल अछि।  एकर प्रत्यक्ष उदाहरण विद्यापति छथि जे अनेक भाषा एवं अनेक विधा मे लेखन केलनि। यात्री स्थायी रूप सँ कहियो कोनो नोकरी नहि केलनि आ ने कोनो आन व्यवसाये। हुनकर एकमात्र जे जीविका रहलनि से लेखन। मैथिली टा मे लिखला सँ जीविकाक समस्या नहि हल होइत, अत: ओ हिन्दी मे लिखलनि। हिन्दियो मे केवल कविता-लेखन सँ कोनो सुनिश्चित आय संभव नहि छलनि, तें प्राथमिकतापूर्वक गद्य लिखलनि। आर्थिक उपार्जन जें कि पत्र-पत्रिका मे नियमित लेखन कयनहि सँ संभव होइत छैक तें पत्र-पत्रिकाक मांगक अनुरूप लेखन जरूरी होइत छैक। यात्री लग मे एहन सोधल गद्य-भाषा रहनि जे ओ भने कोनहु विधा मे लिखथु, पाठक ओकरा रुचि सँ पढ़ैत छल। तें हमसब देखैत छी जे यात्री निबन्ध, संस्मरण, यात्रावृत्त, जीवनी, बालसाहित्य, स्थायी स्तम्भ, कथा, आख्यान आदि अनेक विधा मे लेखन केलनि। पाठ्यपुस्तकक लेल ओ खंडकाव्य सेहो लिखलनि आ प्रकाशक सभक अनुरोध पर विभिन्न भारतीय भाषा, संस्कृत, बंगला, गुजराती आदि सँ उपन्यास सभक अनुवाद सेहो केलनि। हुनकर ई सब लेखन मुख्यत: हिन्दी मे छनि। मुदा कथा, निबन्ध, संस्मरण आ स्थायी स्तम्भक किछु सामग्री ओ मैथिली पत्र-पत्रिका लेल सेहो समय-समय पर लिखलनि। ई सब सामग्री संख्या मे भने अल्प हुअय मुदा स्तर, प्रभाव आ संवेदनक्षमता मे बराबर महत्वपूर्ण अछि।

             यात्रीक जे पहिल निबन्ध मैथिली मे भेटैत अछि से थिक-- 1938 मे 'विभूति' मे छपल 'मैथिल महासभा: मैथिलत्वक मानदंड'। स्मरण रखबाक चाही जे 1938 ओ कालखंड छल जहिया यात्री बौद्धभिक्षु नागार्जुनक संन्यासी बाना मे भूमिगत रहि क' किसान सभाक क्रान्तिकारी राजनीति मे लागल छला। ओहि समयक लिखल मैथिली की, हिन्दियो रचना उपलब्ध नहि होइत अछि। जखन कि हमसब पबैत छी, 1938 मे एहि लेखक अतिरिक्त हुनकर आनो अनेक कविता मैथिली पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित भेल। एकर रहस्योद्घाटन काञ्चीनाथ झा किरण अपन एक लेख मे कयने छथि। भेल ई छलैक जे सन् 1932-34 मे जखन यात्री मैथिली लेखन मे बेस सक्रिय रहथि, हुनका सँ अनेको रचना लिखबाय किरण जी अपना लग राखि लेने छला। बाद मे जखन किरण जी काशी मे वैद्य नियुक्त भेला आ मिथिलामोदक पुनर्प्रकाशन शुरू भेलैक तँ अपना संग्रह मे सँ ई रचना सब निकालि-निकालि ओ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित करौलनि। 1939 मे जखन भिक्षु नागार्जुन हजारीबाग जेल मे बंद छला, मोद मे छपल एक रचनाबला अंक डाक सँ हुनका पठाय किरण जी मिथिला-मैथिली दिस हुनकर सुरता कें आकृष्ट कयने रहथिन। एकर प्रसंग विस्तार सँ किरण जी लिखने छथि। एहि सब कारणें, ई लेख छपल हो भने 1938 मे, एकरा 1933-34एक लिखल मानबाक चाही।

              अन्यत्र एहि बातक चर्चा भ' चुकल अछि जे 1933-34 मे जखन यात्री कलकत्ता सँ काव्यतीर्थ क' रहल छला, किरण जीक संग मिलि क' कलकत्ता-स्थित मैथिल लोकनिक पुरान संस्था 'शिक्षित मैथिल संघ'क पुनर्गठन कयने रहथि। एहि संस्थाक जे संविधान ई लोकनि तैयार कयने रहथि ताहि मे 'मैथिल' कें एहि तरहें परिभाषित कयल गेल रहैक-- 'मिथिलाक मूलनिवासी, मैथिली बाजनिहार समस्त जाति, धर्म आ संप्रदायक लोक मैथिल मानल जेताह।' एहि परिभाषाक निहितार्थ की छल, एकर मर्म बुझबाक लेल यात्रीक ई निबन्ध बेस मददगार भ' सकैत अछि। एहि लेख मे एक ठाम ओ लिखैत छथि जे मैथिल ब्राह्मण आ कर्णकायस्थ छोड़ि क' जँ क्यो आन अपना कें मैथिल कहबाक जुर्रत करैत अछि तँ 'जातीय महासभा नांगड़ि ठाढ़ क' क' हुनका दिस बिधुआइत मुँह बिजकाओत'। ध्यान दी जे नांगड़ि पशुवर्ग कें होइत छै, मनुक्ख कें नहि। स्पष्ट अछि जे एहि विचार कें ओ एतेक घटिया मानैत छला जे एहन सोच हुनका पशुतुल्य बुझाइत छलनि। एकर प्रतिकार मे जँ शिक्षित मैथिल संघ ठाढ़ कयल जाइछ तँ केवल पशुक बदला मे मनुष्येक नहि अपितु 'शिक्षित' मनुष्यक प्रतिमान ठाढ़ करब कहल जायत। ई लेख एहू बातक साक्ष्य थिक जे केवल वैचारिक वा बौद्धिक विमर्शे टा नहि, यात्री हेबाक अर्थ छलैक वैचारिकता कें क्रियात्मक स्तर धरि उतारि आनब। एहि लेख मे ओ महासभा कें ल' क' व्यंग्य करै छथि जे चन्दा झाक देल मिथिलाक परिभाषा कें आब बदलि देबाक चाही आ मिथिलाक अर्थ रांटी, मंगरौनी, कोइलख, ककरौड़ आ सोतिपुरा धरि सीमित करबाक चाही। ओ लिखै छथि-- ''हम मैथिल नहि, बिहारी थिकहुँ-- ई भावना हमरा लोकनि मे जाहि तेजी सँ पसरि रहल अछि, से देखि कोन मैथिल हृदय हैत जे आहत नहि भ' रहल हो?' ओ प्रसंगवश उड़ीसाक दृष्टान्त दैत कहै छथि-- 'उत्कलक प्रत्येक व्यक्ति-- उच्च श्रेणीक ब्राह्मण सँ ताड़ी उतारनिहार पासी आ तूर धुननिहार धुनिया पर्यन्त, उत्कलीय कहबैछ। उत्कलीय बन्धुलोकनिक दूरदर्शितापूर्ण एहि सिद्धान्तक प्रभाव सँ हुनका सभक साहित्यिक तथा राजनीतिक सामर्थ्य दिनानुदिन बढ़ल जा रहल छनि। एम्हर हमरा लोकनि दिन-दिन पाछुए घुसकल जाइत छी।' ई बात यात्री सक्रिय योगदानपूर्वक 1933-34 मे कहि रहल छला। तकर बाद बहुत किछु भेल। देश आजाद भेल। भाषाधार प्रान्त सभक निर्माण भेल। मिथिला पाछुए घुसकैत रहल। आइयो, एखनहु।

             यात्रीक एक निबन्ध 'कविता: युगक गीता' बहुत प्रसिद्ध अछि आ जानि नहि कतेको ठाम एकरा उद्धृत कयल जाइत रहलैक अछि। ई असल मे प्रथम अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन मे कविता-विभागक अध्यक्ष पद सँ देल गेल अभिभाषण लेल लिखल गेल छल। छव पृष्ठक एहि लेख मे ओ संपूर्ण मैथिली कविता-परंपराक अथ-उत उचारि गेला अछि। मैथिली काव्य-परंपराक आरंभ कहिया सँ मानल जाय, एहि विषय मे मैथिल विद्वान लोकनि मे घोर संकोच रहलनि अछि। यात्री निर्द्वन्द्व रूप सँ एकर आरम्भ आठम शताब्दी सँ मानैत छथि। हुनकर अभिमत छनि-- 'विद्यापति सँ पूर्व अपना लोकनिक काव्य कोन रूपक छल हैत, तकर अंदाज सिद्ध लोकनिक पदावली सँ लगा सकै छी।' तहिना 'आधुनिक मैथिली कविता'क आरम्भ कहिया सँ मानल जाय, एहि पर तुमुल मत-वैभिन्य देखल जाइत रहल अछि। वास्तविक रूप सँ 'आधुनिक चेतना' एवं एकर 'आधारभूमि' कें फरिछबैत यात्री कहैत छथि-- '1940क बाद हमरा लोकनिक कविता प्रबुद्ध एवं यथार्थोन्मुखी भ' गेलि। नव रचनाकार लोकनि मैथिली काव्यधारा मे बहुजनसमाजीय सामान्य धरातल दिस मोड़ अनलनि। हिनका लोकनिक प्रतापें परंपरागत बबुआनी चाटुकारिता सँ त्राण पबितहि कवि-भारती आब जन-भारती भ' रहल छथि।' एहि निबन्ध कें भविष्यक मैथिली काव्यधाराक मार्गदर्शक सेहो एहि ल' मानल जाइत रहल अछि जे आधुनिक संदर्भ मे एतय 'काव्य-प्रतिभा' कें परिभाषित करैत छथि। प्रतिभाक पांच वैशिष्ट्य मे एक कें चिह्नित करैत यात्री लिखलनि अछि-- 'परिस्थिति ओ प्रथाक बन्धन प्रतिभा कें स्वीकार नहि। सामाजिक रूढ़ि ओ मर्यादा कें तोड़ि-ताड़ि बढ़ि जेबाक सामर्थ्य प्रतिभा मे रहिते टा छै।' कहब जरूरी नहि जे मर्यादाक अर्थ एतय काव्यशास्त्रक ओ लघुसीमा सब सेहो अछि जे छन्द-रस-अलंकार आदि कें सामाजिक स्वीकृति पूर्वक अनिवार्य स्वीकार करबाक पक्षधर रहल अछि।

                 मैथिली मे यात्री तीन गोट संस्मरण सेहो लिखने छथि, जे अपन विषय,  देसिल कहन-शैली आ चलित भाषा कें ल' क' बेस प्रशंसित रहल अछि। 'चारि अहोरात्र आ एक दिन' सौराठ सभाक यात्रावृत्त थिक जे ओ 1954 मे लिखने छला। सौराठ तहियो धरि अपन वैवाहिक सभाक क्रमपात कें निमाहि रहल छल, यद्यपि कि उतार दिस अग्रसर छल। अनेक प्रकारक अव्यवस्थाक असुविधा सभैता लोकनि कें भोगय पडछैत छलनि, दहेजक छुपे रुस्तम खेल शुरू भ' गेल रहै आ ई सभा-परंपरा आब पर्यवसान दिस बढ़ि रहल छल। जाहि दिन यात्री पहुँचल रहथि, ओहि दिन पहुँचल सभैता लोकनिक संख्या ओ लगभग तीस हजार बतौने छथि। अव्यवस्थाक एक चित्र देखल जाय-- 'ओतेक पैघ मेला आ पानि पर्यन्त सुलभ नहि। चाह ओ शर्बतक नामे जेबकतरे सब मने दोकान फोलने रहय। हलुवइया सब गर्जे कचकूहे पूड़ी-कचौड़ी छनने जाइत छल। जाहि पोखरिक पानि कहियो केओ नहि पुछनिहार, ओ लोकनि ओही सँ अपन यावतो काज ससारय। पूड़ी सोझां मे पड़ल अछि आ तरकारी लेल गदह क' रहल छी, जल ले किकिया रहलहुँए। रौ लुचवा, आदमीक खगता रहौक तँ किए एते गोटे कें बैसा लेलही? किए सोर पाड़लें? किए घेरि-घारि क' अनलक हमरा लोकनि कें तोहर आदमी?' पोखरिक बारे मे-- 'सभागाछीक उतरबारि कात आ दछिनबारि कात बड़की-बड़की टा पोखरि अछि। परंच ओ दुनू दुर्दशाग्रस्त अछि।' मने स्नानो करबाक लेल अनुपयुक्त। एहना स्थिति मे आब गमैया लोकनि सभैता सब कें अपन दलान वा घर पर ठहरबाक लेल जँ भाड़ा ओसुलैत छथि तँ से यात्री कें अनुचित नहि लगैत छनि। कारण जे 'पहिने व्यवस्थाक रूपें पांच टा फूल वा पांच टा झिटुका गनि देल जाइत रहैक, कुलीनताक मर्यादा कें लोक भजबैत नहि छल। आ, आब जखन मध्यवित्त वा धनिक ब्राह्मणवर्ग पुष्ट क' टाका गनै छथि वा गनबै छथि तखन घौड़दौड़क एहि मैदानक काते-कात अनको जँ चारि कैंचा कमा लेबाक मोन भेलैक तँ ताहि मे क्षतिये की?' अव्यवस्था सभक बीच यात्री कें लगैत छनि जे जेना प्रयाग मे 'माघ मेला समिति' आदि गठित क' क' इंतजाम व्यवस्थित कयल जाइत छैक तहिना एतहु किएक नहि समाजपति लोकनि 'सौराठ सभा प्रबन्ध समिति' सन किछु गठन करै जाइ छथि? दोसर लगैत छनि जे कुम्भ, अर्द्धकुम्भ जकाँ आनो आन स्थान मे एहि महामेला कें घुसकाबक प्रयास किएक नहि होइ छै, जखन कि सहसौला(समस्तीपुर), सुखसेना (पूर्णिया), बनगांव (सहरसा), सझुआर (दरभंगा) आदि मे पहिने एहने सभा लगैत छल जे कि आब बन्न भ' चुकल छल, जे एहि परंपराक अवसान दिस बढ़बाक लक्षण थिक।  मुदा, समाजक चिन्ता यात्रीक चिन्ता सँ सर्वथा भिन्न छैक। लिखलनि अछि-- 'सभाक रुखि विचित्र बुझना गेल। बुझनुक उमेदवार कें गार्जियन पर खौंझाइत देखल। उच्च शिक्षा एवं पुष्ट जथाजाल दिस नजरि कें जे लोकनि केन्द्रित केने रहथि, ओहि कन्यावला सभक मनोरथ सभागाछी मे अइ खेप क्वचिते पूर्ण भेल हेतनि।' कारण, 'एहि बेर लोक घरकथे सँ बेसी काज कयने छल।' मुदा से किएक? 'अइबेर जे काज भेल छैक ताहि मे कन्या शुल्क स्वरूप सर्वाधिक टाका नव हजार गनल गेलैए।' ई दहेजक वास्तविक आंकड़ा थिक, मांग तँ तीस हजार धरि पहुँचल छलै।

                'पथ्वी ते पात्रं' छोट मुदा मार्मिक संस्मरण अछि जे 1954क थिक। खजांची रोडक एकटा गली मे तहिया किरायाक डेरा मे यात्री सपरिवार रहै छला। एक दिन पांच टा छात्र हुनका सँ भेंट करय एलनि। ई युवक सब पटना काॅलेज मे पढ़ै छला आ एक विषयक रूप मे मैथिली सेहो रखने रहथि। स्वाभाविके जे भाषाक मामला मे जागरूक रहथि आ यात्रीक महत्व सँ सेहो सुपरिचित रहथि। ओहि मे जे एक ओजस्वी युवक रहथि, सीधे अभियोगक स्वर मे पुछलकनि-- 'अपने कहिया धरि अनठौने रहबै?' हुनकर तात्पर्य रहनि-- 'हमरा लोकनि अपने सँ यैह निवेदन करय आयल छी जे अपना भाषा ओ अपना माटि दिस बेसी ध्यान दितियै, हिन्दी दिस जते मनोयोग अपनेक अछि, तकर दशांशो यदि मैथिली दिस...।' प्राय: ई पहिल अवसर छल जखन यात्री (एहि संस्मरणक माध्यमें) अपन आर्थिक दुरवस्था आ हिन्दी लिखबाक मजबूरी दिस अपन पाठक-समाजक ध्यान आकृष्ट कयने रहथिन। युवक लोकनि सुभितगर परिवार सँ अबैत छला, तें तँ पटना काॅलेज धरि पहुंचि सकल रहथि। स्वाभाविक जे अपने जकाँ सुभितगर घर सँ यात्रियोक हेबाक अनुमान हुनका सब कें रहल‌ हेतनि-- पचीस बीघा सँ कम खेत तँ हिनका नहिये हेतनि। यात्रीक मुँह सँ जखन ओ लोकनि सुनलनि-- 'हमरा तीनिये कट्ठा खेत अछि बौआ, धन्य हिन्दी जे पांच-छव गोटाक पेट चलैए। से हिन्दियो मे गद्य लिखै छी तें निमहैए ने तँ अगबे कविवर भेने चारियो दिनुका खोरिस की जुमैत? तैयो....' -- तँ ओ युवक लोकनि अवाक् रहि गेल रहथि। केवल लेखनक बलें परिवार चलेबाक जिम्मेदारी बला लेखक हुनका सभक कल्पना सँ बाहरक बात रहनि। ई तिनकठवा खेत सेहो भरना लागल छलनि जकरा यात्री छोड़ेलनि, बटाइ पर तँ एखनहु छनि मुदा हुनकर पत्नी कें एहि बात सँ बहुत सन्तोष छनि जे कम सँ कम नवान तँ आब बेसाहक अन्न सँ नहि करय पड़ैए।

            मैथिली मे यात्रीक छव गोट कथा सेहो उपलब्ध होइत अछि। पहिल कथा 'बउकन ठाकुर' तँ ओ तखन लिखने छला जखन 1950 मे स्वयं अपने निर्देशन मे, मैथिली मे एक पत्रिका 'किरण' नाम सँ बहार करब शुरू कयने छला। एहन प्रतीत होइत अछि जे अंक मे देबाक लेल हुनका लग कथाक अभाव रहल हेतनि, तकर पूर्ति हेतु स्वयं कथा लिखलनि। एहि सँ पहिने ओ हिन्दी मे बालकथा तँ ढेरी लिखि गेल रहथि, कहानी सेहो हुनकर पांच टा सँ ऊपर विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित भ' चुकल छल। 

               मैथिली मे जे हुनकर कथा सब छनि, से वस्तुत: मानव-जीवन आ लोक-प्रवृत्तिक हुनकर दुर्लभ निरीक्षण-प्रतिभाक प्रमाण थिक। कथाक जे विषय अछि तकर अवलोकन-दृष्टिये ओकरा मे अपूर्व कथात्मकता भरि दैत छैक। जेना, बउकन ठाकुर मे दू पात्र छथि-- बउकन आ दरजी। दुनू बेछप, समाजक दृष्टियें दुनू किछु अलग, असामान्य। बउकन अलबटाह, तहिना बाजितो छथि-- जेना झंझारपुर हुनका भाषा मे ढंढारपुर भेलनि। मुसलमान जे दरजी छथि-- देख' मे छौड़गरे, पातर मोछक कटगर रेख, ताहि पर सँ चुक्की दाढ़ी। ओ दरजी बउकन लेल महाग आकर्षणक विषय, से जखन कखनो ओम्हर जाथि बउकन, ओकरा देखिये टा लेथि। मानू बड़ सेहन्ता रहनि जे कहियो पाइ-कौड़ी हो तँ ओकरा सँ कपड़ा सियाबथि। जखन दरजी नाप लैत छला आ बउकन कें ताही काल लेर चूबि गेलनि, दरजी अपन देह-हाथ तँ छीपि बचौलनि, मुदा जखन बउकन कहलनि जे 'निच्चां ठसलै ठां साहेब, अहां टे नै लाडल'-- तखन ओ हिनक परिचय बुझलनि, केहन सुंदर देखबा मे, मुदा... दरजीक मुंह सँ बहरेलै-- 'या अल्लाह।' मने एहन सुंदर लोक मे ई अपाय! तखनहि सँ दरजियोक उत्सुकता बउकन मे भ' गेलनि। कथा एतबे अछि। बांकी जे अछि से बउकनक सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि थिक। एते-एते मामूली विषय पर लीखि ओकरा साहित्यक दरजा देलनि, यैह वस्तु यात्रीक कथा-संसार कें स्मरणीय बनबैत अछि। लगैत अछि जे हँ, एहि रचनाकर मे छै कूबत, जे चाहय तँ ताड़क गाछ, बांसक ओधि पर लिखि सकैए, चाहय तँ मादा सुग्गर पर।

           'बूढ़ बोको' मे एक तिब्बती भोटिया परिवारक संग रेलयात्राक प्रसंग अछि। कथावाचकक संग जे तीन आर मैथिल छथि, से अपन शुचिताबोध सँ ग्रस्त नाक मुनने मजबूरी मे बैसल छथि। जाननिहार जनै छथि जे यात्रीक बहुत समय तिब्बत मे, भोटिया सभक बीच बीतल रहनि, आ हुनकर रहन-सहन मे, खान-पीन मे तिब्बती प्रभाव देखनगर रूप मे सब दिन मौजूद रहलनि। संगी मैथिल लोकनिक लेल सब सँ घृष्णास्पद होइत छनि ई देखब जे एक ठाम ट्रेन रुकला पर बूढ़ बोको चट द' उतरल आ गाड़ीक बगल मे नदी फीरि विना छोंछ कयने सीधे आबि क' अपना सीट पर बैसि रहल।‌ कथावाचक कें खुशी होइ छनि जखन गाड़ी सँ उतरलाक बाद टुनाइ बजैत छथि जे 'बूढ़ भेला उत्तर अपनो बाप-पितामह कत्ते ने अलट-बिलट लोक कें बजै छै, प्रज्ञा वा तकर अभावहु मे ठाम-कुठाम लघी-नदी बूढ़ कें भैये जाइ छैक। लोक से सब सहैए, कहां नाक मूनि क' भरि गाम ढोलहो देने फिरैए जे हे-हे, हमर बाप-पित्ती एहन...।' अखिल विश्वक मानवक लेल, भने ओ कोनो सभ्यता सँ अबैत हो, समरूप मनुष्यता-बोध मुख्य प्रतिपाद्य छैक, जे कि ओना तँ यात्रीक समस्त रचना मे एलनि अछि मुदा एहि कथा मे तकरा विशेष रूप सँ देखल जा सकैए। तिब्बत-प्रवासक प्रसंग जे यात्री हिन्दी मे संस्मरण लिखने छथि आ अपन इन्टरव्यू सब मे चर्चा केलनि अछि, से सब पढ़बाक उत्सुकता ई कथा जगबैत छैक।

              'चितकबरी इजोरिया' एक महत्वपूर्ण कथा थिक, जे कि मैथिली कथासाहित्यक इतिहासो मे अपन विरल कथ्यक लेल अलग सँ चर्चाक अधिकारी अछि। मूलत: ई एकटा प्रेमकथा थिक, जे सम्मानजनक ढंग सँ अपन प्रेम-सम्बन्धक समापनक सरंजाम करैत अछि। मंगल आ मधुरी एक नेनपन सँ एक-दोसरक संग अथाह प्रेम करैत अछि, एहन जे एक-दोसरक बिनु चैन नहि। दू मास पहिने मंगलक दुरागमन भ' चुकलैक अछि मुदा ओ पत्नी सँ विमुख ओ मधुरीक चिन्ता मे अपस्यांत अछि। आब मधुरीक दुरागमन होइबला छै। एहि हिसाब सँ देखी तँ प्रेमी-प्रेमिकाक रूप मे ओकरा दुनूक ई आखिरी मिलन छैक। इजोरिया राति छै आ आमक गाछी मे किसुनभोग गाछक तर मे ई मिलन भ' रहलैए। मधुरी उमेर मे छोट अछि, मुदा जाहि तरहें ओ मंगल कें मनबैत अछि, शान्त करैत अछि, अद्भुत अछि-- 'माय-बाप, सासु-ससुरक इज्जति आ सुख जहिना तोरा हाथ मे, तहिना हमरो हाथ मे। हम कोना तोहर घर-आंगन चौपट क' दिअह? कोना एक बहुआसिनक सिन्नुर पर करिखा पोति दियौ? तोंही कहह!' जाननिहार जनैत छथि जे एक विचारकक रूप मे यात्री विवाह-संस्था सँ नाराज, आ प्रेम-विवाहे केवल नहि, लिव-इन-रिलेशन धरिक उदार समर्थक रहथि। मुदा, ई कथा प्रेम-सम्बन्धक औचित्यक विषय मे नहि, अपितु एहि विषयक अछि जे जाहि सम्बन्धक कोनो भवितव्य नहि हो, तकरा एक सम्मानजनक मोड़ द' क' समापन करबाक चाही। स्मरण कयल जाउ, एहि तरहक जखन घटना समाज मे होइए तँ एकर अंत आम तौर पर केहन होइ छै? दुश्मनी सँ, जे नितान्त अपन छल तकर घोर अनचीन्हपन सँ समापन होइए। मुदा, एतय मधुरी अंत मे कहै छै-- 'भइयन, हमरा माफ करिह... अइ अभागलि बहिन कें एक्के बेर बिसरि जुनि जैहक।' प्रश्न उठि सकैए जे 'बहिन' किएक? सामाजिक ताना-बाना एहन छैक जे जे मनुष्यताक रूप मे जँ आगुओ सम्बन्ध बनल रहय, टूटि-बिखड़ि क' दुश्मनी मे नहि परिणत भ' जाय, तँ ओहि सम्बन्ध कें कोनो ने कोनो परंपरित पहचान देबहिक हेतै। केवल तें। मिथिला-माटिक ई बनल-बनायल ढांचा थिक, केवल तें, अन्यथा मनुष्यताक सम्बन्धक कोनो नाम सेहो होइक से किन्नहु जरूरी नहि अछि। मिथिलाक तँ झंझटि छै जे पुरुख-स्त्रीक नैसर्गिक मैत्री-सम्बन्धक लेल एतय कोनहु शब्द, कोनो नामे नहि छैक।

             जेना कि पहिनहु चर्चा भेल, समय-समय पर यात्री मैथिलीक पत्रिका सब मे स्तम्भ लिखलनि। एकर आरंभ मइ 1957 मे 'वैदेही' मासिक पत्रिका सँ भेल, जतय ओ 'यत्र तत्र सर्वत्र' नामक स्तम्भ लिखब शुरू केलनि। एकर चारि टा किश्त छपल। अंतिम किश्त अक्टूबर 1957 मे छपलाक बाद आगां एकर क्रम टूटि गेल। 1959 मे कलकत्ता सँ प्रकाशित होइबला पत्रिका 'मिथिला दर्शन' मे ओ 'यत्किंचित' नाम सँ नव स्तम्भक आरंभ केलनि। मइ 1959 मे एकर पहिल किश्त छपल छल, फरबरी 1961 धरि क्रमभंगपूर्वक एकर लेखन चलैत रहल आ एकर कुल्लम आठ टा किश्त लिखल गेल। बाद मे, जुलाइ 1968 सँ दिसंबर 1968 धरि जखन एक हिन्दी पत्रिकाक दिस सँ हुनका स्तम्भ लिखबाक प्रस्ताव भेटलनि,  एही 'यत्किंचित्' नामक प्रयोग करैत ओ हिन्दी साप्ताहिक 'जनयुग' मे स्तम्भ लिखलनि। 1960 सँ पटना सँ साप्ताहिक 'मिथिला मिहिर'क प्रकाशन आरंभ भेल तँ एहि मे यात्री 'ओ ना मा सी धङ्' नाम सँ स्तम्भ-लेखनक आरंभ केलनि। एकर दू किश्त मात्र फरबरी 1961 मे प्रकाशित भ' सकल। हुनकर कोनो स्तम्भ नियमित रूप सँ चलि नहि सकल तकर कारण छल अव्यवस्थित जीवनक्रम। ओ यायावर रहथि। साहित्य-लेखनक संगहि सक्रिय सांस्कृतिक-राजनीतिक एक्टीविस्ट सेहो रहथि। हुनकर जीवन नदीक धारा जकां सतत प्रवहमान छलनि। तें, नियारियो क' नियमित स्तम्भ-लेखन हुनका बुतें संभव नहि भ' सकैत छलनि।

                 मैथिलीक रचनाकार लोकनि राजनीतिक प्रति निस्पृह होइत छथि, आ हुनका सभक कोनो स्पष्ट राजनीतिक अभिप्राय नहि होइत छनि, ई सामान्य सोच रहल अछि। एहिना होइतो आयल अछि। समकालीन वा वर्तमान, खास क' क' सत्ताधारी राजनीति पर क्यो ठांहि-प-ठांहि दू टूक लिखि जाय, एहन लेखनक परंपरा मैथिली मे नहियेक बरोबरि रहल अछि। यात्रीक‌ स्तम्भ एहि विचार-परंपराक सर्वथा विपरीत अछि। जतय कतहु, जाहि कोनो भाषा मे वा पत्रिका मे ओ स्तम्भ-लेखन केलनि, हुनकर प्रमुख विषय वर्तमान राजनीतिये रहल, खास तौर पर सत्ताकेन्द्रित राजनीति। ई तँ बिलकुल स्पष्ट अछि जे यात्रीक समस्त रचनावली अपन एक स्पष्ट राजनीतिक अभिप्राय रखैत अछि, मुदा कविता वा उपन्यास मे भेने ओकर प्रस्तुति मे कलात्मकताक छौंक देबाक रहैत छैक, तें ओ कथन एतेक डाइरेक्ट नहि होइत अछि। स्तम्भ-लेखन मे यात्री सब ठाम डाइरेक्ट छथि। राजनीतिक अतिरिक्त जनहित-जनसुविधा आ मातृभाषा मैथिली, यैह दू टा मुख्य विषय रहलैक अछि जकरा ओ अपन विचारक परिधि मे अनलनि।

              दृष्टान्तक लेल हुनकर पहिल स्तम्भ 'यत्र तत्र सर्वत्र' (1957)क पहिल किश्त के जँ देखी तँ पबैत छी जे मातृभाषा मैथिलीक विषय सँ ओ आरंभ केलनि अछि। 'हमरा विश्वस्त सूत्र सँ ज्ञात भेल अछि जे डाॅ. श्रीसुनीति कुमार चटर्जी सँ साहित्य अकादेमीक मंत्री (तात्पर्य सचिव सँ अछि) मैथिलीक मान्यता लए पुछने छथिन। आइ 12 मार्च थिक, 16 मार्च कें एतद्विषयक मीटिंग थिकै। ....एहि तीनू भाषाक ओ साहित्यक एकहक टा इतिहास तैयार करबा क' अकादेमी तकरा फेर प्रमुख भाखा सभहि मे अनूदित करा लेत। ई काज आगामी छओ मासक भीतर हेबा लए छै। ई भारी शुभ लक्षण थिक हमरा लोकनिक लेल।' हमसब अवगत छी जे साहित्य अकादेमीक स्थापना 1954 मे भेल रहैक आ अकादेमी द्वारा मैथिली कें मान्यता देल जेबाक बाद 1966 सँ मैथिली मे गतिविधि आरंभ भेलैक। यात्रीक एहि टिप्पणी सँ सूचना भेटैत अछि जे मैथिली कें मान्यता देल जेबाक जोरदार प्रयास 1957 सँ आरंभ भ' गेल छल। एही मे आगां ओ इहो सूचित करैत छथि जे बेनीपुरी द्वारा संपादित 'विद्यापति पदावली'क अनुवाद अकादेमी मराठी-गुजराती आदि भाषा मे करबा रहल अछि। दिल्ली मे ताधरि मैथिल लोकनिक कोनो संघ सक्रिय नहि छल, जाहि दिस प्रयासक आवश्यकता पर बल दैत ओहि समय दिल्ली मे बिहारी लोकनिक जे दूटा संस्था छल, तकर विस्तार सँ चर्चा केलनि अछि। अन्त हेबा धरि मुदा राजनीतिक प्रवेश भइये गेल अछि। 1957 मे लोकसभाक आम चुनाव भेल रहैक। यात्रीक हिस्सक रहनि जे पोलिंग के दिन ओ जतय कतहु रहथि, ओहि काल मे बूथ सभक माहौल देखबाक लेल जरूर बहराथि। दिल्लीक एकटा बूथ पर जे तमाशा ओ देखलनि तकर चर्चा केलनि अछि। भेल ई रहैक जे संपन्न घरक तीन टा फैशनपरस्त युवती वोट देब' आयल छली। बैलेट पेपर आदि लेलनि। मुदा जखनहि अँगुरीक नखमूल मे अमिट स्याही लगब' लगलनि, ओ सब इनकार क' देलि जे एहि सँ अँगुरीक शोभा खराब भ' जायत। फलत: विना वोट देने ओ सब घुरि गेली। फैशनक नाम पर भारतीय लोकतंत्र तीन वोट सँ वंचित रहि गेल, एहि कुंठित उच्चवर्गीय सोच कें यात्री एते घातक घटना मानने रहथिन जे एहि पर अलग सँ ओ 'जयति नखरंजनी' शीर्षक कविता सेहो लिखने छला।

               1957 भारतीय स्वतंत्रताक प्रथम संग्राम (1857)क शताब्दी-वर्ष छल। यत्र तत्र सर्वत्रक दोसर किश्त (वैदेही, जून1957) मे ओ लिखलनि-- 'समग्र भारत मे 1857क विप्लवी जन-आन्दोलनक स्मृति-पर्व समारोहपूर्वक प्रतिपालित भ' रहल अछि, से गौरवक विषय थिक। साम्राज्यवादी इतिहासकार लोकनि भारतीय जनताक ओहि वीरगाथा कें नाना प्रकारें दूरि करबाक चेष्टा कयने छथि। आब स्वाधीन भारतक इतिहासवेत्ता लोकनि ओहि विप्लवक मौलिक रूप कें देश-विदेशक समक्ष रखताह।' तहिना, ओहि साल जे देश-दशा रहैक-- 'दुष्कालक लक्षण एहि बर्ख व्यक्ति-व्यक्ति कें आतंकित क' रहल अछि। इनफ्लुएन्जाक सार्वभौम आक्रमण, अतिवृष्टि-अनावृष्टि-अवृष्टिक नग्न नृत्य, अन्नक महँगी...कोना अइ साल लोक काल यापन करत? देशक विधाता लोकनि असली हालति कें वक्तव्यक रंगीन रेशमी सँ झांपि-तोपि कहिया धरि एना कृतकृत्य होइत रहताह?' तहिना, बिनोवा जीक भूदान आन्दोलन 1951 मे शुरू भेल छल। 1961 धरि अबैत-अबैत हुनका पैंतालिस लाख एकड़ जमीन दान मे भेटि चुकल छलनि। 1957 मे बिनोवा केरल पहुँचल छला। केरल मे कम्युनिस्ट पार्टीक शासन रहैक। मुदा, देखल गेल जे ओतुक्का सरकार आ जनता दुनू दिस सँ बिनोवा कें समर्थन आ सहयोग भेटलनि। ई बात एतेक विशेष छल जे सौंसे दुनियाक मीडिया एकरा आश्चर्यक दृष्टि सँ देखि रहल छल। ब्रिटेनक प्रसिद्ध अखबार 'गार्जियन' तहिया 'मैनचेस्टर गार्जियन' नाम सँ छपै छल। ओहि मे एहि विषय पर जे लेख छपलै, तकर चर्चा  किश्त-3 मे करैत यात्री लिखलनि-- 'ओकरा मतें गांधीवाद एवं साम्यवादक ई सामंजस्य विश्वविकासक एकटा नबका दिशा-संकेत थिक... भारतीय जनता केर शान्तिकामी ओ उदार मनोवृत्तिक थाह पेबाक लेल अनठीयाक ई आतुरता!!' तहिना, भारत सरकारक अन्तर्राष्ट्रीय कर्जनीतिक मुखर प्रतिवाद करैत चारिम किश्त मे लिखलनि-- 'कर्ज...कर्ज...कर्ज। आओर ऋण, आओर पैंच, आओर उधार। करोड़क करोड़ डाॅलर चाही! अरबक अरब डाॅलर चाही। पाउंड सेहो चाही। रूबल सेहो। नेहरूजी, दोहाइ सरकार! आबहु भाभट समेटू। एना कहिया धरि खेपबै मालिक? अपना देश मे की सरिपहुँ की कोनो साधन छैहे नहि?' हुनकर ई तेवर 'यत्किंचित' मे सेहो यथावत बरकरार रहल। एकर दोसर किश्त मे लिखलनि-- 'राजगोपालाचारी (ताधरि ओ कांग्रेसक विरोधी भ' गेल छला) कतहु बाजल छथि-- ओ बाघ थिकाह!...तखन गाय के थिक? नेहरू नियन्त्रित केन्द्रीय सरकार?'

             विकासक बारे मे सरकारी सोचक विडंबना पर लिखलनि-- 'हमरा लोकनिक केन्द्रीय सरकार कें बड़का बिल्डिंग ठाढ़ करबाक सौख... कलकत्ता, बम्बइ, मद्रास, दिल्ली एहि चारू शहर मे स्वाधीनताक बाद 'विकट भूधराकार' कते ने मकान बनाओल गेल हैत। के बाजत जे ई देश गरीब अछि!... देहातक कथा छाड़ि दिय', ठामहि एही शहर(दिल्ली) मे सुगरक खोभाड़ सन-सन पौती मौनी धुथरी मार्का कोठरी दसे बीस टा हो, से नहि! असंख्याता सहस्राणि!! अन्न-वस्त्रक जे सौकर्य अछि से देखितहि छी... -- के बाजत जे ई देश धनिक अछि?' 1959क महँगीक विरोध केनिहार प्रजावर्गक समर्थन मे लिखलनि-- 'विकराल अन्नसंकट ओ महँगीक विरोध मे समग्र बिहार मे जनता सत्याग्रह कए रहल अछि। मिथिलाक दरभंगा-सहरसा आदि जिला-केन्द्र मे सत्याग्रही लोकनि नृशंसतापूर्वक लठियाओल गेल छथि... एखन की भेल अछि? कांग्रेसी शासकवर्ग एतावता फासिज्मक रिहर्सल मात्र कए रहल अछि। किछु बाजब तँ कम्युनिस्ट कहाएब, चुपचाप पेटकान देने रहब तँ भने छागर-पाठी जकाँ 'शिष्ट-सुशील' प्रमाणित होएब-- मुदा तैयो तँ चिबाबक लेल जिमड़क पात चाहबे करी!!'

             1960क मौसम मे आम नहि फड़ल रहैक, ताहि विषय पर लिखलनि-- 'आम नइ छै अहूबेर-- कतउ-कतउ ठाम-ठीम दोग-दाग मे फड़लैए-- सौराठ निवासी बन्धु कहलनि तँ हमरा तते विस्मय नहि भेल। किए हैत विस्मय? ...भदइ नहि, अगहनी नहि, रब्बी नहि, जामुन नहि, आम नहि, कटहर नहि... ई नहि, ओ नहि... निषेधक अष्टोत्तर शतनाम सुनैत-सुनैत कान थेथर भ' गेल अछि कि ने!'

             हमरा लोकनि देखैत छी जे गाम-घरक सुख-दुख सँ ल' क' अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति धरि समस्त विषय प्रसंगानुरूप हुनकर स्तम्भ मे एलनि अछि। आ से अपूर्व साहस आ बेधि दैबला व्यंग्यक संग। मिथिअ-मैथिली अवश्य हुनक केन्द्रबिन्दु सन बनल रहल। 1959 मे 'मिथिला' पत्रिकाक पुर्प्रकाशन आरंभ भेल तँ तकरा पर अपन आन्तरिक प्रसन्नता व्यक्त करैत चाटुकार पत्रकारिता पर प्रहार करब धरि नहि बिसरलाह-- 'धनकुबेर लोकनिक तरबा चटनिहार, महाप्रभु लोकनिक नांगड़ि महक अठौड़ी-स्फीतोदर ओ बैमान संपादक लोकनि! 'मिथिला'क झँसिगर टिप्पणी अहूँलोकनिक अपान-उदान कें दुरुस्त राखत...।' 1961 मे बेनीपट्टी मे कम्युनिस्ट पार्टीक जिला-सम्मेलन भेल रहैक, जाहि मे यात्री शामिल भेल रहथि। ओहि सम्मेलनक भाषणे टाक भाषा मैथिली नहि रहैक, अपितु पोस्टर, प्रचार-पत्र, नोटिस आदि जे छपाओल गेल रहैक तकरो सभक भाषा मैथिली छल। ई सब देखि मोन गदगद भेलनि तँ यत्किंचित-8 मे लिखलनि-- 'आब कांग्रेस, प्रजा समाजवादी, स्वतन्त्र आदि राजनीतिक पार्टी सभक नेता लोकनि सेहो अपन-अपन मुँह-कान मैथिली दिस घुराबथु।' मैथिलीक असल ताकत एकर रचनाशीलता छैक, से सब खन यात्री कें स्मरण रहलनि। रेलयात्राक क्रम मे एक बेर कोनो नवोदित कवि भेंट केलकनि, तँ कवि महोदय कें जे ओ सुझाव देने रहथिन, तकरा 'उपदेशक गंगाजली ओहि बेचाराक माथ पर सोझे उनटा देब' कहैत छनि। मने स्वयं अपनहि पर व्यंग्य, जे कि मैथिलीक दु:स्थिति पर चौबर व्यंग्य बनि क' उपस्थित होइत छैक। की उपदेश देने रहथिन? से सुनल जाय-- 'कविता कम्मे चाही... गीतो कम्मे... चाही की, तँ अगबे गद्य। गद्य-- नीक गद्य, भांगक गोला गीड़ि क' लिखि होयत? जाहि तत्परता सँ पूजा-पाठ पर बैसैत छी, ताही मोस्तैदी सँ आसन-बन्ध थीर क' क' गद्य लिखब तँ बढ़िया वस्तु तैयार होयत... अन्यथा...।'

              

Sunday, October 22, 2023

सुभाष चन्द्र यादवक कथा-संसार

 



निपट कोसिकन्हाक संघर्षभरल गाम मे सुभाषक जन्म भेलनि। देहातक स्कूल मे हुनकर अक्षरारंभ भेलनि। प्राथमिक शिक्षा मामा-गाम मे आ माध्यमिक शिक्षा सुपौल कस्बा मे भेलनि। घोर आर्थिक-सामाजिक संकट सभक मोकाबला करैत पटना काॅलेज सं बी.ए. आनर्स (हिन्दी) केलनि। आगू उच्चशिक्षा दिय' सोचब असंभव बूझि रोजगार लेल कलकत्ता चलि गेला। मुदा नहि। जेएनयू की छलै, तकरा बुझबा लेल हम अपन एहि विलक्षण कथाकारक जीवन-क्रम कें देखि सकै छी। क्यो खूब प्रतिभाशाली हो आ आगू बढ़य चाहैत हो तं ओकरा लेल जेएनयू मे जायब संभव रहै, भने ओ कतबो आर्थक अभाव मे किए ने हो। ओ जेएनयू पहुंचला आ ओतय सं हिन्दी मे एम.ए. आ पीएच.डी. केलनि। ओही साल नामवर सिंह नियुक्त भ' क' आयल छला। संभव रहै जे ओतहि हुनका नियुक्ति भेटि जैतनि, मुदा ताधरि विज्ञापन नहि बहरेलै आ जखन बहरेलै तं सुभाष गाम घुरि जीवनक ओही संघर्ष मे लागि चुकल छला जतय सं बहरायल रहथि, आ जतय सं बहरायब आसान नहि रहैक। कलकत्ता मे रहैत बंगला सीखि लेने रहथि आ दिल्ली-प्रवास मे स्पैनिश, फ्रेंच आ उर्दू। एक बेर तं पेरिस विश्वविद्यालय मे हिन्दीक प्राध्यापक लेल इन्टरव्यू धरि मे शामिल भेल रहथि। बस एक्केटा कारण सं नियुक्ति नहि भेटि सकल रहनि जे भारतीय बौद्धिकक द्विभाषिक स्वभावक अनुरूपे फ्रेंच बाजैत-बाजैत बीच-बीच मे अंग्रेजी बाजय लागथि। फ्रांसक भाषा-प्रतिबद्धताक अनुरूपे एकरा ओ लोकनि अधलाह मानलनि आ हुनकर नियुक्ति नहि भ' सकलनि। अन्तत: मिथिला विश्वविद्यालयक स्नातकोत्तर विभाग, सहरसा मे हुनकर नियुक्ति भेलनि आ ओतहि सं ओ सेवानिवृत्त भेला।

            मैथिली कथा-लेखनक क्षेत्र मे ओ कोना एला, तकरो कथा कम रोचक नहि अछि। विलियम्स स्कूल, सुपौल मे आठम कक्षाक विद्यार्थी रहथि जखन अपन शिक्षक रामकृष्ण झा किसुनक कविता-संग्रह 'आत्मनेपद' ओ पढ़ने रहथि। एही सं ओ पहिल बेर अवगत भेल छला जे जाहि भाषा मे हमसब बाजै छी ताहि मे लेखन सेहो कयल जाइत छै। दशम कक्षा मे ओ उच्च विद्यालय चकला निर्मलीक विद्यार्थी रहथि। स्कूल जेबाक जे रस्ता रहैक से सुपौल स्टेशन भ' क'। ओतय स्टेशन के बुकस्टाॅल पर रुकथि तं देखथि, मिथिलामिहिर बिका रहल अछि। दाम पचीस पाइ। सस्त। ओ एहि पत्रिका कें नियमित रूप सं कीनय लगला। एक बेर रमानंद रेणुक कथा ओहि मे पढ़लनि तं बहुत प्रभावित भेला आ सोचय लगला जे एहि तरहक कथा तं हमहू लिखि सकै छी। पहिल जे कथा ओ लिखलनि तकर शीर्षक रहै-- गजखेर आ गजमुंगर। बहुत दिन धरि तं ओकरा अपना लग राखने रहला बाद मे मिथिलामिहिर मे पठेलखिन तं ओ जनवरी 1968 मे छपि गेलै। हुनका दोसर-दोसर कथा लिखबाक उत्साह आ प्रेरणा भेलनि। कहि नहि, ओ कथा जं नहि छपल रहितै तं ई कथाकार मैथिली मे आबियो सकितथि कि नहि! हुनकर कथा सब पढ़ि क' पहिल प्रशंसात्मक पत्र जे हुनका लिखने रहथिन, ओ महाप्रकाश छला। बाद मे ई दुनू अभिन्न मित्र भेला। ई समय छल जखन ओ पटना काॅलेज सं बी.ए. क' रहल छला। 

              मैथिली कथा-साहित्यक इतिहास मे सुभाषक कथाक बहुत महत्वपूर्ण स्थान छनि। अपन कथा सब मे ओ एक एक एहन दुनिया ल' क' उपस्थित भेला जे हुनका सं पहिने मैथिली लेल अज्ञात रहै। ओ कोन दुनिया छल तकरा स्पष्ट करबा लेल हमरा पं. गोविन्द झाक लिखल एक बात मोन पड़ैत अछि। बहुत साहसपूर्वक ओ लिखने छथि जे जकरा हमसब मिथिला कहै छियै, से कोनो एकटा मिथिला नहि अछि, दू टा अलग-अलग मिथिला अछि। एक तं संभ्रान्त-सवर्ण लोकनिक मिथिला जकर विवरण हमसब मैथिली साहित्य सहित अन्यत्रो पबैत छी। दोसर, दलित-वंचित रैयत लोकनिक मिथिला जकरा बारे मे आम संभ्रान्त लोक कें किछुओ बूझल नहि छै, जेना ओकर संस्कृति, आचारशास्त्र, लोकाचार आदि-आदि। गोविन्द बाबू तं एतय धरि कहि जाइत छथि जे दुनू मिथिलाक लोक मानू अलग-अलग ग्रहक वासी होथि जिनका लोकनि कें एक दोसरक बारे मे किछुओ बूझल नहि छनि। सुभाष चन्द्र यादव ओही दोसर ग्रहक दुनियाक कथा लिखैत रहला अछि। बेधड़क कहने छथि प्रसिद्ध आलोचक कुलानंद मिश्र जे मैथिली कथाक क्षेत्र मे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक बादे आरंभ भेल। अपन बात कें आरो स्पष्ट करैत ओ अन्यत्र कहैत छथि-- 'सुभाष चन्द्र यादव मैथिली कथाक बहुतो रूढ़ि कें तोड़बाक संग मैथिलीकथा कें पुन: ओहि सुगन्धि सं सुवासित केलनि जकरा हमसब मैथिलत्वक सुगन्धिक रूप मे जनैत आयल छी। तखन ई बात भिन्न थीक जे प्रो. हरिमोहन झा कि उपेन्द्रनाथ झा व्यासक कथाक मैथिल-चेतना आ सुभाष चन्द्र यादवक मैथिल-संस्कारक बीच अभिजात-अनभिजातक एहन देवार ठाढ़ अछि जकरा तोड़ब अनिवार्य होइतो ओ आइधरि तोड़ल नहि गेल अछि। एहि लेल ओहन विचारक लोकनि अधिक उत्तरदायी छथि जे सब प्रो. हरिमोहन झाक कथा-संसार मे समस्त मिथिला कें समाहित देखैत अयला अछि। ओकर बाहरक दुनिया हुनका अपन सोचक स्थापना लेल अनावश्यक लगैत छनि।' (संधान-4)

              आलोचक मोहन भारद्वाजक कथन सं कुलानंद जीक कहल बात आरो अधिक स्पष्ट होइत छैक। ओ कहलनि अछि-- 'स्वतंत्रताक एतेक वर्षक बादो समाज मे एहन लोक अछि, एहन लोकक एहन जिनगी छैक जकरा लेल जीवनक रमणीयतम आ प्रियतम व्यापारो काल मे अपन चेहरा सं विपन्नताक छाप फराक क' राखब संभव नहि होइत छैक, किंवा फराक क' राखब ओकरा सब कें आवश्यक नहि लगैत छैक। सुभाष चन्द्र यादवक खूबी एहन जीवनक साक्षात्कारक अवसरे प्रदान करब धरि सीमित नहि अछि। ...एहि मे अछि आपकता। आत्मीयताक संस्पर्श। तें साक्षात्कार मे भेल अनुभव भीतर धरि बेधि दैत अछि। 'घरदेखिया'क कथाकार ओहि वर्गक संग ठाढ़ लगताह जकर ओ कथा कहैत छथि।' सुभाषक कथा-भूमिक परिचय दैत भारद्वाज जी एतय हुनकर शिल्पोक किछु संकेत देलनि अछि, जे वास्तविक रूप सं 'आपकता' आ 'आत्मीयताक संस्पर्श' के कारक थिक। हुनकर जे शिल्प छनि, ताहि पर भीमनाथ झा बहुत सटीक बात कहलनि अछि। ओ कहै छथि-- 'सुभाषक कथाक सब सं मुख्य बात ई थिक जे कथाकार अपना दिस सं किछु नहि दैत छथि, अपन शब्दो नहि, खाली अपन पात्र कें ओकर समस्त परिवेशक संग पाठकक सोझां प्रस्तुत टा क' दैत अछि, ओही रूप मे हू-ब-हू। अहां ओकर टोल मे ओकर घर-द्वारि पर अपना कें ठाढ़ पबैत छी। अहां ओहि समाज कें देखैत छी, ओकर जीवन-प्रणालीक आत्मीयता सं अनुभव करैत छी। तें सुभाषक कथा खिस्सा नहि थिक, यथार्थ थिक, सत्य थिक--नग्न सत्य।'(मैथिली कथाक विकास)

             सुभाषक कथा सब मे जे तटस्थता, यथादृश्यता आ आपकता छैक तकर जड़ि हुनकर अनुभव-जगत मे छै। ध्यान देबाक बात थिक जे सुभाष कें मैथिली मे कथा लिखबाक प्रेरणा रमानंद रेणुक कथा पढ़ि क' भेटल छलनि। जनिते छी जे रेणु जीक कथा-विषय अधिकांशत: वंचित समुदायक अनुभव-जगत सं लेल जाइत छल। संभ्रान्त कथाभूमि जं रहबो करय तं ओहि मे अन्तर्निहित गंहीर व्यंग्य देखबा जोग होइत छल। सुभाष ने केवल एहि कथा-जगत सं अपन तादात्म्य बैसैत अनुभव केलनि अपितु हुनका किशोर-मन मे इहो भावना एलनि जे इहो जीवन मैथिली कथाक विषय भ' सकैत अछि। स्थापित तथ्य अछि जे लेखक अपन लेखनक परिपाटी पूर्वागत सं पबैत अछि आ अपन मेधा आ परिश्रम द्वारा ओकरा मे यथावश्यक उनट-पुनट करैत ओकर एक विकसित रूप अपन भाषा कें सोपैंत अछि। सुभाष यैह केलनि अछि। हुनकर कथा सब मे जे हमसब एहन हू-ब-हू वर्णन देखै छी जे ओहि द्वारि पर ल' जा क' ठाढ़ क' देल गेल अनुभव करैत छी, ई लेखकक मेधा, निजी प्रतिभा छियै जे कि अपन अनुभव-जगत सं ओ विषय चुनलक अछि जकर ओकरा बेस अवगति छै, ओहि मे ओ बेस गंहीर डूबल अछि।

                   एकटा कहबी छै जे इंसान कें दोसरक कयल गलती सं सबक सिखबाक चाही, कारण जे अपनहि टा गलती सं यदि ओ सीखय तं पूरा गलती करबा मे ओकरा बहुतो जनम लागि जेतै। ठीक यैह बात लेखक पर सेहो लागू होइ छै। ओ अपने टा कयल अनुभव पर नहि लिखैत अछि। सभक अनुभव-संसार अन्तत: छोटे होइ छै। बहुतो लोकक अनुभव कें अपन ज्ञानात्मक संवेदना सं अपन अनुभव मे रूपान्तरित करय पड़ैत छैक। तें प्राय: चिन्तक लोकनि अदौ सं कहैत अयला अछि जे लेखक परकाया-प्रवेश करब जनैत अछि। सुभाष ई चीज कते नीक, सुंदर आ वस्तुनिष्ठ ढंग सं करब जनैत छथि, एहि तथ्य सं आब, हुनकर उपन्यास सब अयलाक बाद, मैथिली संसार नीक जकां अवगत अछि।

             मुदा, सुभाषक कथा-जगत मे जे संसार अयलैक अछि, से ततबे दूर धरि पसरल अछि जतबा ओ अपन अनुभव सं धांगने छथि। हुनका कथा मे एकटा गाम अबैत छैक। एहि गाम कें अहां 'परलय' कथा मे नीक जकां देखि सकै छियै। ई गाम कोशी नदीक पेट मे, दुनू तटबंधक भीतर घेरायल अछि। विपन्न, अस्तव्यस्त, अशिक्षा आ अविकास सं ग्रस्त गाम। मिथिला मे 100 सं बेसी एहन गाम छै जे विकासक बलि चढ़ि गेल, दुनू तटबंधक भीतर बन्द भ' गेल। ओहि गामक जे समाज छै, से वैह छियै जकरा हुनकर सर्वकालिक प्रशंसित कथा 'घरदेखिया' मे देखैत छियैक। अभाव सबतरि छै मुदा लोक संतोष आ सहयोग करब जनैत अछि। लेखक अपने तं गाम सं बहरा क' एक भिन्न जीवन-क्षेत्र मे आबि गेला, मुदा गाम एखनहु बहुत कम बदलल अछि, तकर पता हमसब हुनकर कथा 'हमर गाम' सं पाबि सकै छी।। 'काठक बनल लोक' मे विपन्नताक हद धरि पसरल परिवारक कथा अयलैक अछि, एहन परिवार भ' सकैए आब अन्यत्र नहि भेटय, मुदा एहि गाम सब मे एखनहु भेटि सकैए। 'फुकना' कथा मे एकटा दोसर गाम आयल छैक, जे कथावाचकक मामा-गाम छियैक। तहिना, 'कैनरी आइलैंडक लाॅरेल' मे एकटा तेसर गाम आयल छैक, ओ कथावाचकक दीदी-गाम छियनि। ओहि ठामक समस्या आ संकट थोड़ेक भिन्न छै, जे प्राय: तटबंधक बाहर हेबाक कारण छै। मुदा सुभाषक ग्राम-कथाक सीमा यैह अछि। एहि चौहद्दीक भीतर बसैत लोकक जीवन-क्रम, ओकर राग-विराग, हित-मुद्दइ, संकट-समस्या, स्वप्न-सेहन्ता सुभाषक कथा-संसार थिक।

            ई लोक वंचित, वंचनाक शिकार बनल लोकक समाज थिक। साधन आ सुविधा सं, शिक्षा आ आधुनिकता सं, समानता आ न्याय सं वंचित। 'परलय' कथा मे एकटा दृश्य अबै छै-- 'चूल्हि पर पलसिया मकइक खिचड़ी टभकाबैत रहै। घर मे धुइयां औनाइत रहै आ बाहर निकल' लेल अहुँछिया काटि रहल छल। बौकू कें बुझेलै जेना कोसी तर मे रहनिहारो धुइयां छियै जे बाढ़ि सं घेरायल चकभाउर दैत रहैत छैक आ रस्ता नहि भेटला पर पानि मे बिला जाइत छैक।' कोसीक जे ई बाढ़ि छै तकर एक वर्णन एही कथा मे एहि तरहें अयलैए-- 'धार हहाइत रहै। निसबद राति मे कोसीक गरजब विकराल आ डराओन लागि रहल छल।ओकर एकपरतार हहास मे एकटा दोसरे सुर-ताल छल। कखनो धैर्य आ कखनो बेचैनी संगे बौकू ई संगीत सुनि रहल छल। ओ तबाही आ मृत्युक संगीत रहै।' एहन ई गाम जखन बाढ़ि मे डूबि गेलैए, तेजी सं कटनियां भ' रहलैए, लोक कें हैजा भ' रहलैए-- मददगार वा डाक्टर-बैद तं नहिये छै, गामक कोनो घर मे एकटा नाह धरि नै छै जे उंचगर जगह पर पहुंचि क' लोक जीबि वा मरि सकय। शैक्षिक पिछड़ापनक स्थिति ई छैक जे 'कोनो पता पर'क नायिका कें एतबो बुझल नहि छैक जे कतहु चिट्ठी पठेबाक लेल ओहि पर पता सेहो लिखय पड़ैत छै। 'आतंक' कथाक नायक कें अपन वाजिब जमीनक दाखिल-खारिज नाजायज उगाहीक वास्ते सीओ आफिस मे लसकल छै। बीडीओ ओकर परिचित छै मुदा एक बेर उचित रिस्पान्स नहि भेटलाक बाद ओ तते आतंकित भ' गेल अछि जे अपना लेल न्याय मांगब नहि संभव रहि जाइत छैक। मुदा, एहू स्थिति मे, जखन कि ठक, क्रूर आ अन्यायी लोक भारी चलती मे छै, तखनो सुभाषक कथानायक कमजोर आ बेकसूर लोकक पक्ष मे ठाढ़ हेबाक स्वभाव राखै छै, भने एहि लेल खतरे मे किए ने पड़ि जाय पड़य, जेना कि 'बात' वा कि 'डर' कथा मे भेलैए। तहिना, कतबो विपन्नता आ संकट होइक, गामक लोक के स्वभाव मे करुणा, सहयोग, एहि सभक अतिरिक्त बेफिक्री आ बेलौसपन अक्सरहां पाओल जाइत अछि, तकर उदाहरण तमाम कथा सब मे अहां कें भरल भेटत। 'झालि' कथा मे जे सम्बन्ध-बन्धक अनौपचारिकता छैक तकरा सुभाषक आनो कथा सब मे महसूस कयल जा सकैत अछि।

            सुभाषक कथा सब मे जे समाज आयल अछि ओ पचपनिया समाज थिक। पचपनिया अर्थात सवर्णेतर पचपन जातिक समूह। पचपन सं तात्पर्य ठीक-ठीक पचपनेक होइ, से नहि। मने बहुतो जाति, जे एक सांस्कृतिक सूत्र संग जुड़ल अछि। गोविन्द बाबू जकरा 'मिथिलाक दोसर ग्रहक निवासी' कहलनि अछि, से यैह थिक। ई लोकनि लोकायत धर्मक अनुयायी छथि। बौद्धधर्मक समाप्तिक बाद, जखन कोनो सामूहिक धार्मिक पहचान हिनका लोकनिक नहि रहलनि, मध्यकालीन धर्मशास्त्री लोकनि हिनका सब कें ब्राह्मणधर्म (हिन्दूधर्म) मे समाहित क' लेलकनि। मुश्किल ई छल जे हिनका लोकनिक अपन अलग आचारशास्त्र, अलग देवी-देवता आ धार्मिक क्रियाकांड, अलग नैतिकता, अलग सामाजिक विधि-निषेध छलनि, जे ब्राह्मणधर्म मे समामेलनक बादो यथावत बनल रहल। किछु धार्मिक मान्यता सब कें तं ब्राह्मण धर्मशास्त्री लोकनि स्वीकार क' लेलनि, जेना नागपूजा जाहि पर विद्यापतिये व्याडिभक्तितरंगिणी लिखलनि, जेना कन्यादान प्रक्रिया मे सिन्दुरदान आदि। बांकी ई सब चीज ततेक अलग रहै जे धर्मशास्त्रीयो लोकनि निचिन्त भ' गेला जे ई सब हिन्दू भ' गेल, आ इहो लोकनि हिन्दू होइतो अपन पूर्वपरंपराक पालन करैत रहला। एक दोसर लेल जे ई दुनू संस्कृति अबूझ छै, से एही दुआरे छै।

           एकर किछु दृष्टान्त देखल जाय तं बात बेसी फड़िच्छ होयत। पचपनिया लोकनि मे विवाह सं पहिने घरदेखियाक बिध होइ छै, तकर बिलकुल सधल सटीक अंकन सुभाषक कथा 'घरदेखिया' मे भेल अछि। मैथिली साहित्यक लोक लेल ई एक अजगुत कथा रहै, कारण एहि विषय मे लोक कें सुनल भने रहनु बूझल किछुओ नहि छल। लड़कीक नाम बिमला छियै, ध्यान राखल जाय विमला नहि, बिमला। ओकरा बारे मे कथा मे चित्रण एलैए-- 'बिमला कें एहि साल सतरहम लागि गेलै। देखला सं तेहन कहां लगै छै? मुंह-कान सुखायल छै। एहि अगहनी मे धनकटनी करैत रहलै। दू कोस बान्हक ओहि पार सं नित्तह मथ-बोझाइ। कहियो लार, कहियो खढ़, कहियो चिलमिली। ओकरा मोन नहि छै बिमला कें कहियो हंसैत देखने छलै। बाजितो कम्मे छै। कोनो काज पड़ल तखने टा वा टोकले पर।' ई छियैक श्रमजीवी जीवन। आ, ओकर बाजब केहन? मेजमान सब ले उपेन चाह बनब' चाहैए तं बिमला कें पुछै छै-- 'की चढ़ेने छिही?' बिमलाक उतारा-- 'दालि छियै।' फेर प्रश्न-- 'हेंट केने खरापो हेतौ?' बिमलाक जवाब-- 'की बनेबहक से? चाह? बना नै ल' होइ छ'!' बना लैह, से नहि। उक्ति-भंगिमा एहन जेना कि चलन मे छै। सुभाषक बहुतो मेंही-मेंही खूबी सब एहि तरहक छनि। मुख्य जे बिध घरदेखिया(अर्थात कन्यागतक घर आबि क' लड़की देखब) संपन्न होइ छै-- बीड़ी-सुपारीबला तश्तरी घरदेखिया सभक आगू राखि क' बिमला ठाढ़ रहै छै। पहिल प्रश्न छै-- की नाम छी? दोसर-- बाबूक नाम। तेसर-- आइ कोन दिन छियै? आ अंतिम-- अहां कोन मुंहें ठाढ़ि छी? बस, एतबे। बांकी तं सब बुझले छै, समस्त विपन्नक सुख-दुख समाने होइ छै। दूटा प्रश्न किछु आनो भ' सकैत रहै। जेना, कोनो साधारण-सन चीज देखा क' पुछल जाइत, ई की छियै? जेबी सं कोनो सिक्का वा नोट निकालि क' देखाओल जाइत, ई कते पैसा छै? पचपनियां लोकनि मे घर-घर व्याप्त कहबी छै-- नहिरा जो बेटी, ससुरा जो/ बहियां डोला बेटी, सबतरि खो।' मने, कर्मठते असल गुण छियै। बांकी तं केवल एतबे बुझब शेष रहै छै जे लड़की बकलेल तं नहि छै, जे कि आम तौर पर नहिये रहै छै। मूल कथा एतबे छै, बांकी परिवेश, कथाक क्रमोपक्रम आदि। 

           मुदा, एहि कर्मठताक जे अपर पक्ष, परिणाम छै से भयानक। जखन स्त्री वा पुरुषे बूढ़ भ' जाइए, अथबल आ अकाजक, तखन भयंकर उपेक्षा आ अभेलाक दंश भोगबा लेल विवश होइछ। एत अहां कें यात्री जीक 'फेकनी' मोन पड़ि सकैए जे ओतेक बुढ़ारियो मे अपन जीवन-क्रम स्थगित नहि कयने छल। मुदा, ताहू सं बेसी उमेरक बाद, मृत्यून्मुखी रोगग्रस्तताक बाद? सुभाषक कथा छनि 'फँसरी'। बुढ़िया सौ वर्ष पार क' गेलीहे। अभेलाक दंश अनसम्हार छै। मुदा, बाहर सं जातु ओकरा देखय एलैए तं सब सं पहिने पुछै छै-- खेलह? तूं खेलही?-- से पुछला पर ओकर उतारा छै-- 'हमर कोन छै? हाय रे समांग दालि-भात! समांग नहि अछि, केयो कखनो द' दैत अछि तं खा लै छी।' बुढ़िया दू-दू बेर फँसरी लटकबाक कोशिश केलक, एक बेर माहुरो खेलक, तैयो नहि मरैत अछि। घरक लोक कें आब केवल, केवल ओकर मरबाक प्रतीक्षा छै। सुभाषक एक आर कथा छनि-- 'सुजाता'। जेना बुद्ध कें सुजाताक खीर खेलाक बाद ज्ञानक प्राप्ति भेल रहैक तहिना बेलही वाली कें दुबियाही वाली हाथक खीर खेलाक बाद परम शान्ति, मृत्युक प्राप्ति भेलैक। ओ तं एखन फेकनियो सं बेसी कर्मठ, नीरोग रहय, बेटा सब कुकुर-बानर निकलि गेलै, राति मे दारू पी क' दुनू झगड़ा आ मारि शुरू केलक, एक बेटा 'थ्री-नट्टा' रखै छै से बुढ़यो कें बूझल, अनिष्टक आशंका सं बेचारी झगड़ा छोड़बय गेल, बेटा ठेलि देलकै, खसल से जांघेक हड्डी टूटि गेल। ओकर बादक जे आठ-नौ मासक करुण कहानी छै! दुबियाहीवाली पुछै छै-- 'हड्डी-हड्डी किए भै गेलियै?' बुढ़या कहै कहै छै-- 'खाइये लए ने?' सांस्कृतिक आदान-प्रदान देखियौ मिथिलाक। अथबलक अभेला एम्हर सं गेलैए, व्यभिचार ओम्हर सं एलैए।

          सुभाषक एक कथा छनि-- 'एकटा दु:खान्त कथा'। एहि मे भौजाइ संग एक किशोरक यौन सम्बन्धक खिस्सा छै। सम्बन्धक आरम्भ बहुत दुख संग भेल रहैक। जखन सुगिया उपेनक प्रेम-अभ्यर्थना आ अनुनय दिस पहिल बेर आकर्षित होइत छै तं ओकरा लेल 'ई सब बहुत पीड़ादायक आ आकुल कर' बला छलैक।' एतबे नहि, जखन पहिल बेर सम्बन्ध बनलै तं 'कात मे शिथिल पड़ल उपेन सं ओकरा तीव्र घृणा भेलैक। ओकर कंठ अवरुद्ध भ' गेलैक। पति, धीयापुता, अपना ले ओकरा जोर-जोर सं विलाप करबाक मन भेलैक।' बाद मे तं ओ उपेन पर एतेक प्रचंड क्रोध करै छल जे 'ओकरा लगैक जे ओ नीच आ पतित भ' गेल छै।' आ कथाक अंत मे जखन ई सम्बन्ध बरोबरि लेल स्थापित भ' गेलैक तं कथाकार एकर शीर्षक देलनि 'एकटा दु:खान्त कथा'। किछु अलग जकां नहि लगैत अछि? कतेको कथा लिखल गेल होयत, एहू सं जटिल-ओझरायल यौन-सम्बन्ध पर राजकमलेक ढेर कथा छनि। एना तं कतहु नहि लगैत अछि। की छी ई? ई लोकायतक नैतिकता-बोध छी, जे पहिने तं आहत भेल, बाद मे टुटि गेल अछि। हमसब अवगत छी जे सवर्णादि संभ्रान्त समाज मे पुनर्विवाह निषिद्ध छै, जखन कि व्यभिचार मान्य छै। पचपनिया मे उनटा अछि। एतय पुनर्विवाहे मान्य छै मुदा व्यभिचार निषिद्ध छै। तें देखब जे संभ्रान्तक मैथिली साहित्य व्यभिचारक कथा सब सं भरल छै, मुदा सुभाष लग जं एकटा कथा छनि तं ओ एकरा दुखान्त कथा कहै छथि। एहि तरहक सांस्कृतिक भिन्नता सब अनेको ठाम हुनकर कथा मे आयल अछि। अपन कथा-स्वभावक अनुरूपे ओ अपने ओहि पर टिप्पणी करबा सं वा बीच मे अयबा सं बचैत रहल छथि। ई काज आलोचनाक छल जे करबा मे ओ असमर्थ रहल।

             तहिना, सुभाषक एक आर कथा छनि-- 'एकटा अन्त'। ककर वा कथीक अन्त, से नहि छै। ससुर मरि गेलखिन। कथावाचक सपत्नीक हुनकर श्राद्धकर्म मे गेला अछि। अपने ओ नास्तिक छथि, ब्राह्मणीय कर्मकाण्ड पर विश्वास नहि करैत छथि। से, नहकेश दिन सब क्यो मुंड मुड़बौलक, कथावाचक नहि। हुनकर भारी विरोध होइ छनि। पहिल विरोध तं पत्निये दिस सं-- 'आ गय, पापी छै, पापी। पता नहि बाप मरल रहै तबो केश कटेने रहै कि नहि!' कथाक अंतिम दृश्य मे छैक जे हुनकर पितिऔत सार कें क्यो हुलका देने छै। ओ डेन पकड़ि घिचने ठाकुर लग अनैत अछि-- ठाकुर, छिलह त'। कनहा मे लटकि क' जोर-जबरदस्ती बैसब' चाहैत अछि। कथावाचक क्रोध आ अपमान सं तिलमिलाइत कुरसी पर बैसय चाहैत अछि तं कुरसी घीचि लैत अछि। ओ धमकी दैत अछि-- 'इह रे बूड़ि, बुधियार बनै छथि! भोज परक पात छीन लेब सार।' बस, कथा एतबे छै। पहिनहु हम प्रश्न उठेने रही जे 'एकटा अन्त' जे एकरा कहल गेलैए से कथीक अन्त थिक? हम भारतरत्न पी.बी. काणेक विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ हिस्ट्री आफ धर्मशास्त्रक तेसर भाग मे श्राद्ध बला चैप्टर एक बेर फेर सं देखलहुं। धर्मशास्त्र कहैत अछि जे श्राद्धक आयोजन मे वैवाहिक सम्बन्ध बला परिवारक भाग लेब वर्जित छै। तहिना, ई छै जे जे श्रद्धावान नहि अछि, नास्तिक अछि, ओकरा एहि मे शामिल नहि कयल जाय। तहिना, इहो छै जे बलात मुंडी(मुंड मुड़ायल) व्यक्तिक आगमन वर्जित अछि। व्यवस्था तं इहो रहै जे श्राद्धान्न मे सब सं प्रशस्त गोमांस कें मानल जाइत रहै, जाहि सं मृतात्मा एक वर्ष धरि तृप्त रहै छल। काणे लिखै छथि जे तेरहम सदीक बाद मांस-भक्षण(श्राद्ध मे) केवल मिथिला आ बंगाल मे मान्य रहल, अन्यत्र उठाब भ' गेल। चैप्टरक अंत मे काणे मार्मिक बात लिखलनि अछि जे वर्षक कोनो दिन हम अपन पितर कें स्मरण करी, चाहे कोनो विधियें, ई हमरा अपन मौलिक परंपरा संग जोड़ैत अछि। एहि मे के अभागल हैत जे नहि कहतै? मुदा ई कट्टरता, जे कि एतय पितिऔत सार मे देखैत छी, कथी छियै? की अहां कें बुझलो अछि जे लोकायतक पितर-स्मरणक की विधान रहै? कोनो लोकगाथा मे, लोकमानसक कोनो विधा मे एहि बारे मे कोनो अवशेष छै? तखन तं बात यैह जे पचपनिया नहि संग छलै तं गांधी जीक हत्या एक नम्बूदिरी ब्राह्मण कें अपनहि हाथें करय पड़ल रहै। ओकर बाद कहियो सुनलियै? तहिया सं तं आइधरि लाखो जान हिन्दू धर्मक नाम पर लेल जा चुकल अछि। एही दस वर्षक भीतर, देखबै जे जतेक जतेक हत्यारा छल, सभक सब पचपनिया समुदायक लोक छल। धर्मशास्त्र मे जे असहमतिक प्रति स्वीकार-भाव छै, उदारता छै, से कतय गेलै? ककर अन्त भेलै? 

            ई बात पहिनहु कहने छी आ फेर मोन पाड़ब जे सुभाष अपन जीवन-क्रम मे अनेक शहर मे रहला। दोसर जे हुनकर हरेक खिस्सा अपन अनुभव सं समृद्ध आ तप्पत यथार्थ थिक। दू महानगर-- कलकत्ता आ दिल्ली-- मे ओ रहला। कलकत्ता मे निपट बेरोजगारीक दौर मे, जखन लोक एक-एक पाइक लेल झखैत छैक। एहि अनुभवक अनेक कथा हुनका लग छनि। 'संकेत' कथा मे ओहि युवकक मनोदशा देखल जा सकैत अछि जकरा लग एतबो साधन नहि छैक जे वर्किंगमैन्स हाॅस्टलक एक चौकीक ओ किराया चुका सकय। ओ अपन मित्रक कृपा पर कहुना समय खेपैत अछि। जाहि काल मे कोनो चौकी खाली भेल रहैछ, ततबे समय ओकरा लेटबाक भेटै छै-- 'सात बजे निन्न टुटिते अपना कें सीट पर सुरक्षित पाबि ओकरा आफियत भेलैक। इंजीनियर कखनो आबि सकैत छैक। ई सोचि ओ बेड समेटि चौकी तर राखि देलक।' 'पेट' कथा मे छैक जे भूख सं पेट दर्द करै छै, जखन कि बिनु पाइक ओकरा खाली पानि टा भेटि सकै छै, मोन कम सं कम चाह पीबाक छै। एतेक शक्तिहीन, अथबल अपना कें पबैत अछि जे रूमक ताला धरि खोलबा मे हाथ कंपैत छैक। 'सिकरेट' एहि अभावग्रस्तताक एक आर कथा थिक। 

            शहरक असली प्रतिफलन जे छैक से थिक डर। 'डर' नाम सं अलगो सं हुनकर कथा छनि जे एही विषय मे छनि। मुदा, शहरक स्थायिभाव-- डर-- हुनकर अनेक-अनेक कथा मे बीया जकां बाउग कयल भेटैत अछि, शहर चाहे कलकत्ता हो चाहे दिल्ली। जे लोकनि मैथिलीक पारंपरिक लोकगीतक अध्ययन कयने हेता ओ जनैत छथि जे मैथिली लोकगीत मे शहरक स्मृति कते खराब रूप‌ मे आयल अछि। एकटा गीत मे तं स्पष्टे आयल छैक जे 'संकट कुइयां विदेसक रस्ता' मने शहरक रस्ता संकट के कुइयां(इनार) थिक। एही गीत मे आगू ई पांती अबैत छैक-- 'जाहि शहर मे पियाजी नोकरिया, सेहो शहर जड़ि जाय हे, की कहबौ प्रीतम।' ठीक एहने स्मृति हमसब सुभाषक कथा मे पबैत छी। एतय डर शहरक स्थायी स्मृतिक रूप मे आयल अछि। 'डर' कथा मे एकर किछु कारण सब ताकल जा सकैए-- 'फुटपाथ पर चलैत रहब। लोक धकियौने आगू बढ़ि जायत आ हम डरें सभक पाछू-पाछू। कोनो होटल मे चाह पीबा ले जायब तं नोकरबा सब हमर वस्त्र देखि क' चीनी मंगबैक तं जोर सं बाजत। अथवा एहि बीच सूट-बूट मे केओ पहुंचि जयताह तं हमरा सीट छोड़ि क' दोसर ठाम बैसबा लेल कहत। हम डर सं उठि क' दोसर ठाम चलि जायब, नहि तं ओ हमर डेन ध' लेत। ...भरि दिन बौआइत राति कें घर अबैत काल रस्ता मे डरें देह सं घाम चुबैत रहत जे कोनो सांप नहि काटि लेअय आ कि कोनो भूत-प्रेत ने उठा क' पटकि देअय। ...जा धरि निन्द नहि पड़ब, चोरक डर होइत रहत। आ ई नहि तं ई सोचैत रहब जे कखनो कोनो अपन लोकक मृत्यु-सूचना भेटि सकैछ। ई सोचिते पियास लागि जायत। भूख-पियास सं कंठ सूखि जायत मुदा उठबाक साहस नहि होयत।' आदि-आदि। कहि सकै छियै जे ई सब मनोशारीरिक रोग छियनि तें कथावाचक कें डाक्टर लग जेबाक चाही। मुदा नहि। डर डाक्टरो सं छैक-- 'डाक्टर हमर प्राणरक्षक नहि, प्राणभक्षक बुझाइत अछि। कोनो छोट-छीन बिमारियो कें नहि चिन्हत आ किछु भयंकर रोगक नाम कहि देत। आब डाक्टरो लग नहि जाइत छी। दबाइ सेहो नहि किनैत छी। सुनैत छिऐक जे दबाइ मे चून-तून मिला दैत छैक। लोक मरि जाइछ।' असल मे ई शहरक आतंक थिक। सब किछु अपरिचित, अनभुआर। अज्ञातक डर। अपन देहाती हेबाक डर। अपन विपन्नताक डर। पैदलगामी हेबाक डर। शहर सभ्यताक कब्रगाह होइत छैक, से कोनो महान विचारकक कहल छनि। मुदा कोना, तकर जवाब हमसब सुभाषक एहि कथा सब मे पाबि सकै छी। शहर विपन्न लोकक लेल आदरशील नहि होइत छैक। गाम-घर मे अदौ सं ई कहबी प्रचलित छै जे दस चंगला पर एक बंगला। गरीब कें दाबिये क' क्यो अमीर बनि सकैए, तें गरीबक लेल, भने ओ कतबो काबिल किएक ने हो, ओकरा मन मे ममता कोना हेतै? 

            'टिप' कथा मे छै जे होटलक बेयरा ओकरा अपमानित नहि करय ताहि लेल अपन विपन्नतो मे कथावाचक ओकरा टिप देने चलि जाइत अछि। जखन कहियो हाथ खाली रहलै तं ओ सबटा पाइ मोन पड़ैत रहै छै जे ओ व्यर्थे बेयरा कें द' देने रहै। ओ आगू देब बन्द करैत अछि तं फेर वैह। एक दृश्य तं एलैए जे झंझट सं बचबा लेल घुरतीक डेढ़ टाका ओ प्लेट मे छोड़ि क' बहरा जाइत अछि मुदा, गेट पर एकटा दोसर बेयरा कें ठाढ़ देखि क' ओकरा डर होइत छैक जे ओकरा पकड़ि नहि लियय। ई डर असल मे अपमानक डर थिक। उपाय एक्के टा छैक जे आदमी अपना कें बदलि लियय। शहरुआ बनि जाय। आइ-काल्हि यैह होइत हमसब देखैत छी। गामक लोक थोड़बे दिन शहर रहल कि ओकर भाषा बदलि जाइछ, चालि-ढालि, ओढ़न-पहिरन, सभ्यता-संस्कृति, सब किछु बदलि जाइछ। एहि विषय पर मैथिली मे बहुतो रास कथा लिखल गेल अछि जकर स्वर आलोचनात्मक छैक। प्रश्न अछि जे आदमी अपना कें नहि बदलय तं की हेतै? वैह हेतै, जे हमसब सुभाषक कथा मे होइत देखै छी। मोन रखबाक चाही जे मिथिलाक हाशिया परक आखिरी आदमी मे सं एक जखन उच्च शिक्षाक लेल वा रोजगार लेल, आधुनिक युग मे, शहर गेल छलै तं ओकरा संग की बर्ताव कयल गेल छल! सुभाषक कथावाचक बदलय नहि जनैत अछि, जेहन अछि तेहने बनल रहय चाहैए, तकरे परिणाम एकरा बुझक चाही।

           मुदा, प्रश्न एहि सं कतहु बेसी जटिल अछि। देहातक आदमी अपन आदमीयत कें बरकरार राखय चाहैत अछि,‌ मुदा शहर कें सेहो मंजूर नहि छैक। नित नवीन वेग सं ओ गामक दिस घेंट नमरौने चलि अबैत अछि। आब तं शहर गामक लग धरि चलि आयल अछि। सुभाषक कथा मे तीन तरहक शहर छै। कलकत्ता-दिल्ली सन महानगर, पटना सन नगर, आ तखन सहरसा-सुपौल सन शहर। शहर दैत जे अछि से तं सब कें देखार पड़ैत अछि मुदा छिनैत की सब अछि, से अछोप बनल रहि जाइत अछि। एकरा सब कें सुभाषक कथा मे देखल जा सकैत अछि। दिल्लीक जेएनयू कैम्पस सं जुड़ल दूटा कथा अछि जतय एहि अपमानबोध-जनित डर कें मूर्त देखल जा सकैत अछि। 'लिफ्ट' कथा मे भयानक रौद आ गरमी मे यूनिवर्सिटी सं हाॅस्टल जेबाक छै मनोज कें। समय बहुत बीति गेलै, कोनो बस नहि आयल। आसमानी रंगक एक कार आबि रहल छल जकरा ओकर संगबे हाथ देलकै, कार रुकि गेल। संगबेक संग मनोजो चढ़ि गेल। कार एकटा महिला, मिसेज कपूर चला रहल छली जे कोनो विभागक प्रोफेसर रहल हेती। कपूरक डेरा धरि पहुंचि तं ओ गेल मुदा ओतय ओ महिला मनोज के बहुत गंजन केलकै-- 'ई कोनो भाड़ा-गाड़ी नहि छिऐ जे जतय मोन भेल रोकि लेलहुं आ चढ़ि गेलहुं।' बात की तं एतबे जे मनोज बिनु आज्ञा मांगने चढ़ि गेल छल। संगबे लेल गाड़ी रुकल छलै, कारण ओ प्रोफेसरक परिचित छल। बात की तं एतबे जे मनोज देहाती लगै छल, जखन कि अंग्रेजी ओहो बजै छल, स्वर मे ग्राम्यता आ रुच्छता रहै। मनोज क्षमा तं मांगि लेलक मुदा ओकरा लेल ई बात बहुत निराशाजनक रहै जे 'आज्ञा नहि मांगि क' मिसेज कपूरक महत्व आ स्वामित्व-बोध' कें ओ आहत क' देने छल। ओकर संस्कारक मोताबिक एक बेगरतूत कें ओकर गन्तव्य धरि पहुंचा देला पर मिसेज कपूर कें आत्मिक संतोष हेबाक चाही छल, एहि मे पुछनाइ नहि पुछनाइ महत्वहीन रहै। मुदा, गाम आ शहर मे यैह तं अन्तर छै। की लगैए, आब ओ फेर ककरो सं लिफ्ट मंगतै? डर के उत्पत्ति-स्थल थिक ई। 

          तहिना, 'ओ लड़की' कथा मे ई होइत छै जे जेएनयू कैम्पस मे ओ नवीन अपन हाॅस्टल सं बहरा चाह पीबय जा रहल अछि। रस्ता मे एकटा कार लागल छै जाहि मे लड़का-लड़की बैसल प्रेमालाप क' रहल अछि। लड़कीक हाथ मे दू टा अइंठ कप छै। ई तहियाक बात छी जहिया डिस्पोजेबल कप चलन मे नहि आयल रहै। लड़की बेधड़क नवीन कें पुछैए-- 'आर यू गोइंग दैट साइड?' नवीन पूरा माजरा बुझि जाइत अछि, अइंठ कप उठेबा जोग ओकरे मानल गेलै ताहि सं अपमानित महसूस करैत ओ जवाब दैत अछि-- 'नो', यद्यपि कि बाद मे ओ पछताइत रहल जे खाली नो ओ किऐ कहलकै, ओकरा तं कहबाक चाहैत छल-- 'हाउ डिड यू डेयर?' तं ओ सैह किऐ ने कहलक? कथाक पांती छै-- 'साइत निम्नवर्गीय दब्बूपनी आ संस्कार ओकरा रोकि लेलकै।' मोन पाड़ू, गाम-घर मे जं कोनो दिवाली वा होलीक समय गामक कोनो संभावनाशील युवकक अकालमिर्त भ' जाइक तं समुच्चा गामक कोनो घर होली-दिवाली नहि मनबै छल। एकरा अहां पिछड़ापन कहबै? मुदा, सैह कहल जाइ छै। गामक संस्कार अछि तं अहां दब्बू आ निम्न भेलियै। मुदा, संस्कार अछि कि छुटबाक नाम नहि लैए। एही नवीन कें देखियौ। जाइत छल चाह पीबय मुदा पहुंचि गेल पानक दोकान पर। किऐ? केवल ई साबित करै लेल जे हम ठीके चाहक दोकान पर नहि जाइ छलहुं। कथाक पांती छै-- 'मरजाद आ शालीनताक लेहाज नहि होइतै तं चाहक बदला ओ पानक दोकान पर किऐ ठाढ़ होइत?' भ' सकैए, अहां कें हंसियो लागय, मुदा जाहि वर्गक ई कथा थिक तकर मनोविज्ञान ठीक अहिना चलै छै। एहि मनोनिर्मितिक दोसर पक्ष सेहो कथा मे एलैए जे अपन एहि अपमान पर नवीन पूरा भड़कल अछि। कथा मे पांती आयल छै-- 'नवीन कें बुझेलै साइत संपन्नताक चिक्कन चाम आ रौद-बसातक सुक्खल चामक अंतर ओकरा भड़का देने होइ।'

           आब एकर की करबै जे तमाम अदगोइ-बदगोइक बादो शहर गाम ढुकल आबि रहल अछि। हमसब अरियाइत क' लाबि रहल छिऐ। गाम जे उजड़ल अछि ताहि मे कोनो एक्के-दू टा कारक होइ, से नहि। सुपौल-सहरसा सन अपनो शहर बदलल-बदलल लगैत अछि। 'असुरक्षित' कथा मे एकर पूरा खेरहा आयल छैक। आ, सुपौल-सहरसा कें तं छोड़ू, गाम मे जे हटिया लगै छै, ताहि ठाम की केहन माहौल रहै छै, तकरा 'बात' कथा मे देखल जा सकैत अछि।

           सुभाषक किछु कथा मे विरल जीवनानुभव सब व्यक्त भेल अछि। रेल-यात्रा हुनका प्रिय छनि आ तकर बयान हुनकर अनेको कथाक विषय बनल अछि। हुनकर कथावाचक तं बेटिकट यात्रा करैत जेलक सजाइ धरि भोगि आयल अछि। तहिना, स्त्रीक प्रति हुनकर अनुराग कैक कथा मे व्यक्त भेल अछि, से मुदा कने भिन्न ढंग सं। हुनकर 'तृष्णा' कथा मे ई पांती आयल छैक-- 'हमरा लागल, अखिलन कें श्रीलता नहियो भेटतै, तैयो ओकर स्नेहक स्मृति रहि जेतै आ अखिलनक आत्मा कें आलोकि करैत रहतैक।' एहि तरहक वचन हुनकर आनो अनेक कथा जेना 'नदि', 'रम्भा' आदि, मे भेटत। स्मृतिक महत्व हुनका लेल बहुत बेसी। सभ्यताक जाहि अन्हरमारि मे ई पृथ्वीग्रह फंसि गेल अछि, क्यो जं एकरा उबारि सकतैक तं से मनुष्यक स्मृतिये। मनुष्यक एहि दुआरे जे ई अन्हरमारि ओकरे शुरू कयल छै। श्रीलता सं तं फेर अखिलन के कहियो भेंट हेतै, तकरा असंभवे सन मानल जा सकैत अछि, यद्यपि कि इहो बात अछि जे एहि सृष्टि मे, वास्तव मे असंभव किछुओ होइत नहि छैक। अखिलन आ श्रीलताक भेंट एक रेलयात्राक क्रम मे भेल छल आ ओ दुनू संग-संग किछु स्टेशन धरिक यात्रा कयने रहैक, ने फोन नंबर, ने पता-ठेकान, तखन कोना भेंट हेतै? मुदा, प्रेमक स्मृति बहुत मूल्यवान। यैह कारण थिक जे हुनका कथा मे अहां कें नव पीढ़ीक युवा कें प्रेम करबाक लेल प्रोत्साहनक भावना भेटत। 'एकटा प्रेमकथा' एहने एक कथा थिक जे अनेक घुमान विन्दु पर पाठक कें ल' जा क' ठाढ़ क' दैत छैक।

        'बनैत बिगड़ैत', 'गति' आ 'आस' बिलकुल अलग तरहक कथा अछि। तीनू कथा परिवारक विषय मे अछि मुदा विशेषता छै जे परिवारे धरि सीमित नहि अछि। ई सुभाषक पुरान हिस्सक रहलनि अछि। जेना गाछ कें उखाड़ियौ तं ओकरा जड़ि लागल बहुत रास माटि आबि जाइत अछि, किछु तहिना। ई सब माटि, मने बात मिलि क' ओहि परिवेशक निर्माण करैए, जाहि मे सुभाषक चिन्ता जगजगार भ' क' कथा मे आओत। 'बनैत बिगड़ैत' मे कौआ आयल अछि। बात ई छै जे सत्तो आ माला(पति-पत्नी)क धिया-पुता परदेस रहै जाइए। एहि ठाम यैह दू बेकती। भेल ई छै जे बड़ी काल सं कारकौआ कर्रा रहल अछि। कारकौआक टाहि अपसगुन मानल जाइछ, से मालाक संस्कार मे बद्धमूल छै। सत्तो बौद्धिक आदमी अछि, लेकिन, मिथिलाक बौद्धिक लोकनिक सांस्कारिक बद्धमूलता पर कथा मे सत्तोक बहाने टिप्पणी आयल अछि -- 'कोनो अपसगुन भेला पर आशंकित भ' जाइत अछि। आशंका कें बुधि आ तर्क सं ठेल क' बाहर करैक कोशिश करैत अछि। कखनो संस्कारक फान मे लटपटाइत अछि। कखनो सम्हरैत अछि। फेर फँसैत अछि। फेर छुटैत अछि। ई सब बड़ी काल चलैत रहै छै।' यैह कारण छै जे मालाक आशंका कें निर्मूल करबाक लेल ओ तर्क करैत अछि तं माला खुखुआ उठै छै-- 'दुनियांक काबिल अहीं टा तं छी। अहां सन बुझक्कड़ और कोय छै?' खैर, रोड़ी उठा क' फेकला पर कौआ तं उड़ि गेल, मुदा कथा मे बात ई रहि गेल जे 'जे चीज पसिन नै पड़ै छै, तकरा प्रति लोग निष्ठुर आ अन्यायी भ' जाइत अछि। कारी रंग आ टांस आवाजक चलते कौआ कें अशुभ बना देलक।'

          कथाक बीच मे आरो कैकटा बात अबैत छैक जेना कुकुरक सामूहिक कानब। जेना, माला आइ जाहि धियापुता लेल आइ एते बेकल अछि, सैह सब जखन एतय आयल रहैत छैक तं कतोक बेर ओकरा बलाय लगैत छैक। अपन पुतोहु सं मालाक ई सेहन्ता कहियो पूर नहि भेलै जे परसि क' खाइ लेल दियय कि केशे बान्हि दियय कि हाथे-गोड़ दाबि दियय। अपन नौ मासक पोतीक बारे मे तखन ओकर ई कहब रहै छै जे मोटरी नीक, बच्चा नै नीक। मुदा, सत्तोक दिमाग मे एखन दोसर बात चलि रहल छै। नौ बरसक पोती मुनियां कें कौआ बड़ पसंद। ओ जखन खौंझाइ वा कनैत अछि तं कौए कें पुकारला पर शान्त होइत होइए-- 'कोन्ने गेलही रे कौआ! मुनियांक कौआ।' से कौवा गिद्धे जकां नहुं-नहुं विलुप्त भेल जा रहल छै। मुनियां कें जेना कौआ बड़ पसंद तहिना दादा सेहो बड़ पसंद। कथाक अंतिम पांती छै-- 'मुनियां कें बेर-बेर कौवा मोन पड़ैत रहतै, दादा मोन पड़ैत रहतै। ने ओ कौवा कें बिसरि सकैत अछि, ने दादा कें। मुनियां कौवा कें ताकैत रहत, दादा कें ताकैत रहत। कहियो ने कौवा रहतै, ने दादा रहतै।' कथा समाप्ति लग जा क' उदास करैए मुदा, सुभाष लग दोसर कोनो उपाय नहि छनि। सगुन-अपसगुनक सनातन अंधविश्वास एहि मुलुकक लोक सं की-की छीनि लेत, तकर कोनो पारावार नहि अछि। विद्रोह कयने तं एहि अंधविश्वासक किछु नहि बिगड़ल, साइत उदास कयने ठमकि क' सोचबाक विवेक जागैक। विवेक जागैक जे नौ मासक बच्चा अपन सहजबोध मे कोना सही, आ सियान कहाबैबला लोक अपन अंधकार मे कोना गलत भ' जाइत छैक।

            'आस' कथा पुत्रक संग माता-पिताक मुम्बइ रहवास पर आधारित अछि। पुत्र कोनो कारपोरेट आफिस मे काज करैए, जकरा भोरे आठ बजे आफिस जेबाक रहै छै, आ रातुक एगारह बजेक आसपास घर घुरैत अछि। माता-पिता कें संग राखने छैक। पिता अनंत प्रसाद भारी छगुन्ता मे पड़ल रहै छथि जे ई कोन नोकरी भेलै! सुविधा आ साधन तं कंपनी बहुत देने छै मुदा चैन-निन्न सब बिलायल छै। जीवनचर्या पर माता-पिता एक्को सुझाव बेटा गछबा लेल तैयार नहि अछि। पछिला एक सप्ताह सं अनंत बाबूक कान मे किछु फड़फड़ाइत छनि, जे कोनो उपायें ठीक नहि भ' रहल छनि। ओ एकटा मामूली सहायता चाहै छथि जे क्यो अँखिगर लोक देखितय जे कान मे किछु ढुकि तं नहि गेल छनि। पत्नीक आंखि कमजोर छनि, तें ओ पुत्रक समय चाहै छथि। पुत्र रोज भोरे जाइए, रोज देर राति मे घुरैए, अपने बेचारा पस्त रहैए-- ओकरा किछु कहब हुनका अत्याचार जकां लगै छनि। अन्तत: रवि दिनुका इंतजार होइए। पुत्रक रवि दिनका शेड्यूल आरो तते टाइट छै जे अन्तत: ओ निरास भ' जाइत छथि। एहि कथा मे देखल जा सकैए जे दू पीढ़ीक बीच कार्यसंस्कृति कते भयानक ढंग सं बदलि गेलैए, पुत्र कें आब ने अपना लेल सोचबाक समय छै ने परिवार लेल। एहन लोक भला अपन समाज लेल कि देश लेल की सोचि सकैए! गुलाम पीढ़ी, जकरा लग मनुष्य हेबाक कोनो भवितव्य बचल नहि रहि गेल छै, तैयार करबाक लेल जे एक वैश्विक षड्यंत्र जारी छै, तकर अहसास एतय असानी सं कयल जा सकैए। भारतक कारपोरेट-पीढ़ीक प्रामाणिक जानकारी एहि कथा मे भेटैत अछि। कथाक अंत मे अनंत बाबूक 'आस' कोना टुटैत छनि-- 'जेना-जेना समय हाथ सं निकलल जा रहल छल, हुनक बेचैनी ओतबे बढ़ल चल जाइत छलनि। कखनो होइन बेटा आबि जेतनि, कखनो होइन आब नहि। आब बाट ताकब खाली दुराशा अछि, आर किछु नहि।' निपट एकाकीपन कोना पुरान पीढ़ी कें निकाल बाहर केलकैए, सब सुख-सुविधाक अछैत, से एहि कथा मे देखल जा सकैत अछि।

             'गति' कथा एकर अगिला पड़ाव के कथा थिक, जतय पत्नी संग छोड़ि जाइत छनि। हुनका मुइना एक वर्ष हुअय जा रहल अछि। जेठ बेटा गंगाकात जा क' हुनकर अस्थ-विसर्जन क' देने छनि। मुदा भेल ई छै जे अस्थिक एकटा अवशेष राखि लेल गेल छै। योजना रहै जे हुनकर समाधि बनत आ ताहि ठाम ई स्थापित भेल। अवशेष कथावाचकक कोठलीक एक कोन मे राखल छै जे ओकरा पत्नी मौजूद रहबाक आश्वासन दैत रहलैए। आब जेठ पुत्रक ई फैसला भेलैए जे वर्ष बीतय जा रहल अछि, बेसी समय ओकरा घर मे राखब नहि ठीक, तें ओकरो प्रवाहित क' देल जाय। कथावाचक एहि लेल गंगाकात नहि बुहिलबा पोखरिक पाढ़ पर अवस्थित ओही श्मसानक पोखरि के चुनाव करैए, जतय पत्नीक अंतिम संस्कार भेल रहनि-- 'सब जल तं जले होइत अछि। गंगा के हो कि पोखरि के। जल तं जले अछि। प्राणदायी जल। हुनक अंश जलक्रीड़ा करैत रहतनि। ओ जलजीव मे मीलि जेती। नित नव रूप ग्रहण करती।' सांझक समय छै। मसानघाट छहरदेवाली सं घेरल छै आ लोहाक फाटक लागल छै। ओहि मे ढेर रास बकरी चरि रहल छै। सूर्यास्त भेलाक बाद श्मसान मे बंद बकरी सब गेट लग जमा भ' गेल अछि आ बाहर निकलै लेल आफन तोड़ि रहलैए, किलोल क' रहल अछि। कथावाचक कें लगै छै-- 'बकरी सभक कौलैत देखि हठात कश्मीर मोन पड़ैत अछि। होइए, कश्मीर के लोक अखन ठीक बकरिये सन हैत। तीन सौ सत्तर के फांस मे फड़फड़ाइत। लगैए जेना पत्नियो कहैत होथि-- हमरा एतय सं निकालू, घर ल' चलू।'  एवंप्रकारें अस्थि-विसर्जनक बाद कथावाचक कें 'एकाकी, असहाय, निरालंब हेबाक अनुभूति' गछाड़ि लैत छनि। ओहिठाम बड़क विशाल गाछ छै जाहि चिड़ै-चुनमुनी अनघोल मचेने अछि। एहनो लोक तं होइत रहय जे चिड़ै-चुनमुनीक बोली बुझि जाइत रहय, अँटकर लगबैत छथि जे ई सब की कहैए-- 'होइए, सब अपन-अपन समांग के खोज-खबरि लै खातिर एतेक घोल-फचक्का करैत हैत। भरिसक एहि हिंसक काल मे सुरक्षित घर घूरि अयबाक उत्सव मना रहल अछि।' कथा-समय घोर असुरक्षा, अन्याय आ अव्यवस्था सं भरल छैक, से स्पष्ट देखाब दैत अछि।

              

Thursday, September 7, 2023

शेष कथाक नायक :विभूति आनंद


 


तारानंद वियोगी

       जखन कखनो हम अपन समकालीन लेखक विभूति आनंदक स्मरण करैत छी, हुनकर छवि एक नायक रूप मे अभरैत अछि। एहि छविक भीतर अनेको प्रतिच्छवि समाहित छैक, मुदा हुनकर नायकत्व कतहु खंडित होइत नहि देखैत छी। एकर असली कारण तं स्वयं हमरा भीतर अछि। हुनका मोन पाड़ी तं 1982 मोन पड़ि जाइत अछि, जतय हुनकर नायकत्व हमरा भीतर आकार लेलक। हुनका संग-संग जाहि दोसर लेखकक नायकत्व अभरैत अछि, ओ केदार कानन छथि।
       1982 ओ समय छल जखन हमरा मैथिली मे लिखा-पढ़ी शुरू केना मात्र तीन वर्ष भेल रहय। अपना पीढ़ीक लेखक लोकनि मे हम सब सं कम आयुक रही। 1982 मे पटना मे एक बड़ भारी लेखक सम्मेलन भेल छलै-- नवतुरिया लेखक सम्मेलन। मैथिलीक एहन कोनो पैघ आयोजन, जाहि मे अपना समयक समस्त वरिष्ठ लेखक उपस्थित रहथि, ई हमर पहिल भागीदारी छल। एहि घटना कें भेना आब चालीस वर्षक करीब हुअय जा रहल अछि, एहि बीच सैकड़ो आयोजन भेल जाहि मे शामिल रहल छी। मुदा, हम बेधड़क कहि सकै छी जे ओहि आयोजनक जे गंभीरता आ बहुआयामिता, एकाग्रता रहै, आ जतेक उच्च कोटिक श्रोतावर्ग एकरा भेटल रहै, एहन कोनो दोसर आयोजन हमरा नहि देखल अछि। यैह अवसर छलै जहिया निर्विवाद रूप सं हमरा सभक नवतुरिया लेखन मैथिली साहित्य मे अपन नवता आ ओजस्विता कें ल' क' प्रतिष्ठापित भ' गेल रहै। एकर आयोजक रहथि-- विभूति आनंद आ केदार कानन। दुनू स्वयं नवतुरिया लेखक छला। हमरा दुख अछि जे एते भारी कार्यक्रमक डाक्यूमेन्टेशन  ढंग सं नहि भ' सकल। ओकर बाद कैकटा नव-नव पीढ़ी आयल, मुदा ओहि तरहक कोनो आयोजन आइ धरि कोनो पीढ़ी नहि क' सकल अछि। आब तं कदाचित ओहि तरहक आयोजनक बारे मे सोचनिहारो किनसाइते क्यो हेता। विभूति आ केदारक ई नायकत्व आइयो हमरा मोन मे बसल अछि।
           केदार मोन पाड़लनि तं स्मरण भेल, ई जे आइडिया रहय, नवतुरिया लेखक सम्मेलनक, से मौलिक रूप सं हमरे भीतर उपजल रहय। ई बात ओ कतहु लिखनहु छथि। अपना पीढ़ीक लोक सब आइयो हमरा आइडिया-मास्टर आ प्लानिंग-मास्टर के उपाधि दैत छथि। से बरु बेस। मुदा हम जनै छी, एहि जीवन मे जते योजना बनाओल, मुश्किल सं पांच प्रतिशत अमल भ' पाओल हैत। योजना महत्वपूर्ण नहि होइ छै, महत्व रहै छै ओकरा कार्यरूप देबाक। इतिहास साक्षी अछि, दुनिया कें ओ लोकनि बदललनि जे योजना कें कार्यरूप द' सकला, ओ नहि जे योजना मात्र बनबैत रहला। केदार संग हमर दोस्ती बड्ड प्राचीन। 1979-80 मे कहियो हम सुपौल मे अइ योजना पर गप केने रही। हुनका अवसर भेटलनि जखन ओ पटना यूनिवर्सिटी पहुंचला। आ, ई दुनू गोटे एकरा कार्यरूप द' सकला। ई हमरा लेल तहिया सं आइ धरि बहुत भारी बात अछि आ अपन एहि दुनू मित्र कें नायकत्व प्रदान करैत अछि।
       विभूति आनंदक लेखन मे विविधताक तत्व हमसब शुरुहे सं मौजूद देखैत छी। ई विविधता अनेक रूपक अछि। अनेक विधा, अनेक शैली, अनेक भाषा-वितान, अनेक विचार-सरणि। ई चीज आइयो हमसब हुनका मे अविकल देखि सकैत छी। हमरा सभक पीढ़ी मे आबि क' अनेको तरहक नवाचार मैथिली मे पनपब शुरू भेल छल। किछु प्रसंगक उल्लेख एतय करब। मैथिली मे गजल के फोरमेट मे काव्यरचना जीवन झा 1905 मे शुरू कयने छला। तीसक दशक मे यात्रीजीक सेहो एहि तरहक काव्य भेटैत अछि। मुदा, आश्चर्य लागत ई जानि क' जे 1980क दशक मे आबियो क' गजलक बारे मे मैथिलीक आचार्य सभक यैह मत रहनि जे गजल एक विजातीय वस्तु थिक जे मैथिली मे लिखले नहि जा सकैछ। ध्वनि एहना सन जे गजल जें कि मुसलमानी वस्तु थिक, मां मैथिली कें एकर छुतका सं दूरे राखल जेबाक चाही। सब कें बूझल हैत जे मायानंद मिश्र गजलक लेल जं थोड़ उदारता राखितो छला तं हुनकर अत्याग्रह एकर नाम बदलि क' गीतल कैल जेबा पर छलनि आ बाद मे ओ अपन गीतल-संग्रहो छपौलनि। प्रश्न रहै जे अपन मूल स्वभाव मे दू-दू पांतिक शेर मे जे एक अपूर्व चमक सं भरल मर्म कहि जेबाक सामर्थ्य फारसीक एहि काव्य-शैली मे रहै, से मैथिली मे सेहो संभव भ' सकैत अछि। नवतापूर्ण प्रयास सभक लेल हमरा लोकनिक पीढ़ी ख्यात छल। हमसब मैथिली गजल कें एक नवीन काव्यात्मक उपलब्धिक रूप मे उठेलहुं। आ देखल जाउ जे मैथिली मे गजलक जे पहिल-पहिल मुकम्मल संग्रह प्रकाशित भेलै, से विभूति आनंदक कृति 'उठा रहल घोघ तिमिर' छल।
       हमरा सभक पीढ़ीक अधिकांश लेखक आन-आन विधाक संग कथा-लेखन सेहो केलनि। विभूति एहि मे अव्वल रहला। सब सं कमाल जे चारि दशक सं बेसी समय सं लेखन केनिहार कैक गोट रचनाकार एहन भेला जिनकर कथा-लेखन बाद मे छुटि गेलनि मुदा, विभूति जतबे उर्वर अपन नौजवानी मे छला ततबे एखनो, रिटायरमेन्टक बादो छथि। हमरा लगैत अछि, हुनकर चारि दशकक कथा-लेखन कें एक संगे देखने मैथिली कथा-साहित्यक ने केवल विकास कें, अपितु समयक धुकधुकी कें पकड़ि पेबाक एकर उत्तरोत्तर बढ़ैत कौशल कें सेहो देखल जा सकैत अछि। विना कोनो दावेदारीक जतेक तरहक प्रयोग, से चाहे कथ्यक स्तर पर हो कि रूपक, भाषाक-- विभूतिक कथा-लेखन वैविध्यपूर्ण अछि, तकर दृष्टान्त अन्यत्र पायब कठिन अछि।
       एहि बात दिस बहुत कम अध्येताक ध्यान गेलनि अछि जे जकरा हमसब आधुनिक मैथिली कथा कहैत छी, तकर विकास एक धारा मे नहि, अलग-अलग दू धारा मे भेल अछि। एक धारा ललितक छनि, दोसर राजकमल चौधरीक। अन्तर तं अनेको छै मुदा सब सं देखनगर जे अंतर अछि से कथाभाषे मे देखाब द' दैत अछि। ललितक भाषा बेस गद्यात्मक। जं कहबै जे कथा गद्य थिक तं गद्यात्मक होयब तं ओकर अनिवार्ये गुण हेतै। मुदा से नहि। राजकमलक भाषा कें देखियनु। ओ गद्य काव्यात्मक छै। गद्य मे सब कथू कें सिरा सं कहि जायब आवश्यक होइछ, से ओकर यथार्थवादी चरित्रक कारण, मुदा काव्यात्मक भाषा मे बहुतो रास गैप छोड़ि देल जाइछ, तकर अपन प्रवाह होइछ आ पृथक प्रभाव सेहो, आ से करिते कथा अपन गमन-विन्दु दिस बढ़ैत अछि। राजमोहन झा, सुभाष चन्द्र यादव, अशोक आदि ललित धाराक कथाकार छथि। जखन कि साफ देखबै जे राजमोहन झा जाहि तरहें कथा लिखलनि, धूमकेतु ताहि सं एकदम्म भिन्न ढंग सं कथा लिखैत छला। धूमकेतु राजकमल-धाराक कथाकार छथि। स्वयं विभूति ललित-धाराक एहन कथाकार छथि जे बहुतो नव वस्तु ओ मैथिली कथा-लेखन मे जोड़लनि। जेना, सम्पूर्ण कथाक संवादात्मक होयब जे कि आम तौर पर नाटके मे होइत छल। मुदा तें हुनकर एहन कथा कें एकांकी कहि देबै, सेहो संभव नहि। कारण, ओहि मे कथा हेबाक जाबन्तो गुण झकझक देखार पड़ैत रहैत छैक। भाषा-वैविध्यक सेहो जतेक प्रयोग हुनका ओतय भेटैत अछि, तकर दृष्टान्त दुर्लभ अछि।
       विभूतिक विशेषता आरो कैकटा छनि। ललित हुनकर कथा-धाराक प्रवर्तक छलखिन। तहिया ललित जिबैत रहथि। ओ ललित सं संपर्क केलनि। ललित कें फेर सं कथा-लेखनक लेल राजी क' सकथि ताहि मे तं ओ सफल नहि भेला, बहुतो पैघ-पैघ लोक पहिनहु असफल भ' गेल रहथि। मुदा ई ओ अवश्य क' सकला जे ललितक साक्षात्कार आयल। हुनकर कथा-कला पर ओ एक सुंदर आ उपयोगी पुस्तक लिखलनि। एतबे नहि, आगू ओ ललितक समस्त संकलित-असंकलित रचना सब कें चूनि-बीछि 'ललित-समग्र'क प्रकाशन संभव केलनि। हमरा लोकनि देखल अछि, विभूति जाहि कोनो मुद्दा पर लगला अछि, ओकरा एक परिणति धरि पहुंचौलनि अछि।
       मैथिली आलोचनाक जे स्थिति छै, से सब गोटे देखि रहल छी। एहन नहि छै जे मैथिली लग गर्व करबा योग्य आलोचना बचले नहि छै। मुदा, मठाधीश सभक चेला-चाटी ई हालति बना देने छैक जे आइ जकरा मोन हो से मैथिली आलोचनाक नाम पर एक थुम्हा थूक फेकैत गरिया क' चलि जाइत अछि। एहि भवितव्यता कें तोड़बाक लेल सघन प्रयास नहि भेल हो, सेहो नहि। एखन हाल मे मोहन भारद्वाजक निधन भेल छनि। आचार्य रमानाथ झाक निरमाओल शैली आ भाषा-वितानक गछाड़ सं मैथिली आलोचना कें मुक्त केनिहार योद्धा छला मोहन भारद्वाज। मुदा, हमरा लोकनि देखैत छी जे हुनकर निधनक संगहि मैथिली मे पूर्णकालिक आलोचनाक परंपरा समाप्त भ' गेल। आब जे किछु बचल अछि से कि तं मात्र प्राध्यापकीय अर्थात छात्रोपयोगी आलोचना छैक, अथवा विचारविहीन तथ्य-संकलन। ई कोनो आइये शुरू भेल हो, सेहो नहि। स्वयं मोहन भारद्वाज एहि प्रवृत्तिक संग सब दिन जूझैत रहला। एकर सर्वाधिक मुखर प्रतिवाद हमरा लोकनि कें राज मोहन झाक आलोचना मे देखार पड़ैत अछि।
       आइये नहि, प्राय: दू दशक सं बेसी समय सं हमसब देखैत छी जे मैथिली मे सर्वश्रेष्ठ आलोचनात्मक अवदान ओहि लेखक सभक रहलनि, जे पूर्णकालिक आलोचक हेबाक बदला सृजनात्मक लेखनक व्यक्ति छला। हमरे सभक पीढ़ी मे देखी तं अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, केदार कानन, रमेश आदि कैकटा नाम देखाइत छथि। विभूति सेहो एहि मे सं एक प्रमुख छथि। एहि ठाम जतेक गोटेक हम नाम लेलहुं, सभक आलोचनाक एक विशिष्ट आभा छनि आ से एक दोसर सं सर्वथा भिन्न छनि। सभक अलग-अलग विशेषता कतहु आन ठाम, एतय हम विभूतिक आलोचना पर किछु बात करब।
       विभूतिक आलोचना अधिकतर व्यक्ति-परिचय सं आरंभ होइछ। व्यक्ति अर्थात आलोच्य रचनाकारक ओ परिचय जे स्वयं विभूति हुनका संगत मे रहि क' अथवा हुनका पढ़ैत-गुनैत प्राप्त कयने छथि। रमानाथ झाक ओ कथन एतय हमरा मोन पड़ि जाइत अछि जतय ओ टी एस इलियट कें कोट करैत कहने छथि जे रचनाकार-व्यक्तित्वक सम्यक स्फुटन आलोचनाक प्रथम धर्म थिक। से, विभूतिक आलोचना मे व्यक्तित्वक ई स्फुटन संस्मरणक माध्यमें चलैत छैक आ प्रसंगानुसार ओहि पर ओ अपन आलोचकीय अभिमत प्रकट कयने जाइत छथि। कहब आवश्यक नहि जे मैथिली आलोचनाक जे एक पैघ संकट थिक से पाठकीयताक अभाव थिक। एकर परिहार विभूतिक आलोचना एहि बाटें करैत अछि।
       विभूति जहिया सं पढ़ब-लिखब शुरू केलनि, कहियो हुनकर लेखन-यात्रा कें स्थगित होइत नहि देखल। ओ सब दिन किछु ने किछु लिखिते रहला। हुनकर जीवन मे विभिन्न पड़ाव आयल। कैक बेर एहन भेलै जे ओ भारी-भारी पीड़ा मे, संकट मे पड़ला। जं लेखन हुनका लेल जीवनक आवश्यकता नहि होइतनि तं ई कहिया ने छूटि गेल रहितनि। मुदा, लेखन हुनका जीवन मे, जीवन-शैली मे ताहि तरहें शामिल अछि जे कतबो संकट एला पर ओ एकरे सं संजीवनी शक्ति प्राप्त करैत रहला अछि।
       जेना कि हुनका जीवन कें देखने लगैछ, आ एकर किछु दृष्टान्त एहि लेखो मे आयल अछि, नव-नव वस्तु, प्रयोग, शिल्प हुनका सदैव आकृष्ट करैत रहलनि। विभूति मैथिली लेखकक ओहि समुदाय सं अबैत छथि जिनका लेल विचार वा विचारधाराक बन्धन वा प्रतिबद्धता किन्नहु स्वीकार्य नहि होइछ। तें, यदि अहां एहन अध्ययन करय लागी जे विभूति अपन लेखन मे कतय सं चलि क' कतय पहुंचला, तं कदाचित अहां कें निराशा हाथ लागि सकैत अछि। वस्तुत: ई हुनका देखबाक समुचित पद्धतिये नहि थिक। अपन बद्धमूल संस्कार कें यथावत रखैत क्यो कोना सदा चिर नवीन होइत यात्रा काटि सकैत छथि, विभूतिक लेखन-यात्रा तकर नीक उदाहरण भ' सकैत अछि। हमरा लोकनि देखैत छी, सोशल मीडियाक प्रादुर्भाव जखनहि भेल, विभूति कोना सुहृद मोनें एकर खूबी कें बुझलनि आ अपन अभिव्यक्तिक एक सुंदर माध्यम एकरा बनौलनि। देखि सकै छी जे पछिला दशक मे फेसबुक पर सर्वाधिक सक्रिय जं कोनो मैथिली लेखक रहला तं ओ विभूति आनंद छथि। हाल-साल मे छपल हुनकर लगभग एक दर्जन किताब प्राथमिक रूप सं फेसबुक पर लिखल गेल अछि।
       एहि लेखक आरंभ मे हम नवतुरिया लेखक सम्मेलनक चर्चा केने रही। आयोजनक ई प्रतिभा सेहो हुनका मे लगातार बनल रहलनि आ यथावत एखनहु बरकरार छनि। एकर एक अत्यन्त उपादेय परिणति हमरा लोकनि 'जखन तखन व्याख्यानमाला'क रूप मे देखि सकै छी। आइ एहि तरहक आयोजनक कते भारी खगता अछि तकरा बुझनिहार नीक जकां बुझि सकैत छथि। आइ मिथिला मे एक एहन नवपीढ़ीक आगमन भेल छैक जे जनबा लेल तं दुनिया भरिक जानकारी सं लैस अछि, मुदा मिथिलाक बारे मे अत्यन्त कम, नगण्य जनैत अछि। जतबा जनैत अछि सेहो बहुसंख्यकवाद आ अधिनायकवादक बिख सं दूषित छैक। एहना मे बेस मौजूं विषय पर आध दर्जन सं बेसी आयोजन एही 2023 मे संपन्न क' लेब एक विशिष्ट मिथिला-सेवा कहल जायत, जखन कि सत्यता छै जे प्रधान-अप्रधान सेवके जकां मिथिलाक सेवा लेल अपस्यांत हुजूम चारू दिस सक्रिय देखाइ छथि। बुझनिहार नीक जकां बुझि रहल छथि जे कोन सेवा मिथिलाक कते काजक भ' सकै छै। विभूतिक संकल्प छनि, एक दर्जन व्याख्यान पूरा भेला पर ओ एकर लिखित रूपक पुस्तक बहार करता। ओ अवश्ये बहार क' सकता, कारण से सब करैत रहबाक रिकार्ड हुनकर नीक रहलनि अछि।
       एहने एक काज सीता पर लिखल मैथिली कविता सभक संग्रह रूप प्रकाशन थिक जकरा ओ हालहि मे संपन्न केलनि अछि। एखन फेर ओ गोनू झा पर लगला अछि आ हमसब आशा करैत छी, गोनू झा पर एक निर्भ्रान्त पुस्तकक प्रकाशन जल्दिये देखि सकब। मुदा, हुनकर एहि प्रकारक काज सभक सर्वाधिक उपादेय संकलन जे हमरा देखाइत अछि से लोकगीतक हुनक संकलन 'गीतनाद' थिक। अणिमा सिंहक बाद एहि दिशा मे सर्वाधिक व्यापक काज विभूतिये कयने छथि। एहि संकलन मे ज्योत्स्ना जी हुनका संग छलखिन। हुनका दुनू गोटेक जोड़ी कें बिछड़ि जायब हमरा सदा एक मर्मान्तक घटना सन लागल अछि। मुदा, हमसब बड़भागी छी जे विभूति नीक जकां अपना कें सम्हारि सकला।
       हुनकर एक प्रवृत्ति देखैत छी जे जाहि कोनो काज मे ओ लगला, सदा अपना संग एक मित्र कें रखलनि। एखन अयोध्यानाथ जी कें हमसब हुनका संग सक्रिय देखै छी। 'जखन तखन' पत्रिकाक प्रकाशन मे हीरेन्द्र कुमार झा छलखिन। तहिना आनो, अनेक। सक्रियता ततेक मिलजुमला जे कोनो एक कें पुछियनु तं ओ दोसर कें अधिक श्रेय दैत देखार पड़ता। परंपरित मैथिल मनोवृत्तिक ई कते विपरीत बात थिक, तकरा अकानी तं विभूतिक व्यक्तित्वक किछु आर परत खुलैत अछि।
       कते खुशीक बात थिक जे हमर ई विशिष्ट लेखक सेवानिवृत्तिक बाद आरो बेसी त्वराक संग रचनाशील छथि।