Saturday, November 24, 2007

कहबाक कला होइ छई

कहबाक कला होइ छई
हिसाब-दौड़ी कहियो ने भेल
आंगुरक बीच मे भूर अछि
जे अरजल सभटा राइ-छित्ती भेल
छिपली मे बांचल कनखूर अछि

हमर गाम मे छल एकटा चौंसठ
कहैत छल,
अरजबाक कला होइ छई

जेना बिदापति मंच सं कहय छथिन कमलाकांत
कहबाक कला होइ छई

कलाजीवी झाजी आ कलाजीवी कर्णजी!
कलाजीवी हुकुमदेव आ कलाजीवी फातमी!

बाढ़ि मे दहा गेलनि जिनकर गाम
सुन्न छैन्ह जिनकर कपार
गुम्म छैन्ह मुह मे बकार

नचारी मे नहि ल' पओता आनंद

केओ उद्-घाटन बाती जरओता
केओ देता अध्यक्षीय भाखन
जाड़-बसात मे चमक चांदनी देखि
दुखित जन पीयर पुरान कागत पर लिखबे टा करत,
मुह के सी'बाक कला होइ छई

कतबो कहथु कमलाकांत
सुनबाक कला होइ छई
हल्ला-गुल्ला जुनि मचाउ बाउ
छी संस्कारी लोक

कहबाक कला होइ छई!

1 comment:

Gajendra Thakur said...

बाढ़िमे दहा गेलनि जिनकर गाम
;;;
गुम्म छैन्ह मुँहमे बकार

अहा