Wednesday, August 26, 2026

कथाकार राजमोहन झा : किछु प्रश्नसँ टकराइत


 डाॅ. भीमनाथ झा   


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       राजमोहन झा मूल रूपसँ कथाकार छथि– से सिद्धहस्त। हिनक कथासाहित्यक विवेचनाक पृष्ठभूमि तैयार करबा लेल हम निम्नांकित चारि प्रश्न चुनल अछि। प्रश्न आर ठाढ कयल जा सकैछ, किन्तु से नहि क’ एही प्रश्नसभसँ टकराक’ बैसि रहब।


प्रश्न– 1.

       राजमोहन झा अपन कुलक तेसर पीढीक कथाकार थिका, ताहूमे ओहेन कुलक जे मैथिलीकेँ आद्यकथा देलक, आ बादमे कथाकेँ, आ ओहि माध्यमे मैथिली भाषाकेँ, लोकप्रियताक शिखरपर पहुँचौलक। ई संयोग हिनक कथाकारकेँ लाभमे रखलक की हानिमे?


उत्तर –

      पं. जनार्दन झा जनसीदनक सुपुत्र होयबाक लाभ प्रो. हरिमोहन झाकेँ मैथिली साहित्यमे स्थापित होयबामे भेटल होयतनि, से नहि बुझि पड़ैत अछि। हरिमोहन बाबूक रचना जनसीदनजीक शिफारिशी पत्रक मुखापेक्षी नहि रहल होयत। हमर तँ अनुमान अछि, आ किछु-किछु संकेत सेहो, जे जनसीदनजी हरिमोहन बाबूक अधिक रचनाक विरोधी रहथिन। ओ नहि चाहैत रहथि जे हुनका सन सनातनी पण्डितक पुत्र सनातनी पण्डितकेँ, मैथिल आचार-विचारकेँ, परम्परा-पद्धतिकेँ एना भ’क’ खिधांस करथि। गुरुवर सुमनजी प्रसंगात् कहने रहथि जे जनसीदनजी हरिमोहन बाबूक संस्कृति-विरोधी रचनाकेँ ‘मिहिर’ आ ‘स्वदेश’मे बेसी प्रश्रय नहि देबा लेल अनुरोध कयने छलथिन।

       राजमोहनजीकेँ अपन पिताक तेहन विरोधक सामना नहि कर’ पड़लनि, जेहन हिनक पिताकेँ अपन पिताक विरोधक सामना कर’ पड़ल छलनि। ‘तेहन विरोध’ की– कोनो तरहक विरोध हरिमोहन बाबू नहि कयने होयथिन, अपितु राजमोहनजीक साहित्यिक रुझान देखि प्रसन्ने भेल छलथिन। मुदा, रचना-प्रकाशन लेल कोनो सम्पादककेँ नहि लिखने होयथिन। राजमोहनजीक कथा, आ कविता सेहो, जाहि पत्र-पत्रिकामे छपैत छलनि, ताहि लेल हिनका हरिमोहन बाबूक लेबुलक काज नहि पड़ैत छलनि। मुदा, आरम्भमे, वैदैही आ मिहिर-सम्पादककेँ हिनक रचना भेटलापर ‘हरिमोहन बाबूक बालक’ अवश्य ध्यानपर आबि जाइत छलथिन। एहिसँ हिनक रचना-प्रकाशनमे आ परिचित होयबामे परोक्षत: आरम्भिक लाभ भेटलनि। ई हिनक रचनाकारक परिचिति लेल अनुकूल स्थिति छलनि। मुदा, एहि अनुकूलतामे प्रतिकूलता सेहो नुकायल छल। ई अपना आगाँमे एक टा बड़का पहाड़ ठाढ देखलनि। ओहि पहाड़क समक्ष एहि नवगछुलीकेँ के पुछैत? ‘हरिमोहन बाबूक बालक’वला छवि स्वतन्त्र व्यक्तित्वक विकासमे बाधक बनैत। नवगछुली कतबो फड़कझार गाछ भ’ जाइत तैयो ओहि पहाड़क विशालताक आगाँमे के ध्यान दैत एहिपर? आ किएक ध्यान दैत? हरिमोहन झाक कथाक समक्ष ताहि शिल्प-शैलीमे लिखिक’ आन क्यो कतबो माथ-कपार पीटैत, ओकरा के पुछितैक? राजमोहन झा लगले ई भाँफि गेलाह आ अपन आगाँक पहाड़केँ ठामहि छोड़ि कनछियाक’ बाट बदलि लेलनि। जाहि दिसक बाट ई धयलनि, हिनक सौभाग्य कही जे से सपाट छलैक। ई निधोख दौड़’ लगला। ऊर्जा छलनिहेँ, तेँ थकलाह नहि, आ अपन वेगसँ, धमकसँ, चमकसँ सभक आकर्षणक केन्द्र बनि गेला।

       हरिमोहन झाक अछैतहुँ कथामे राजमोहन झाक जे स्वतंत्र आ विशिष्ट व्यक्तित्व बनि सकलनि, से सहज-स्वाभाविक प्रक्रिया नहि छल। कथासम्राट् हरिमोहन झाक कथाकार-बालककेँ हुनक छाया पर्यन्त नहि पड़य, से बड़ दुरूह आ जटिल छल, रिस्की सेहो। रिस्क लेबामे तँ राजमोहनजीक जोड़ा नहि। हिनक कथातन्तु जे जटिल आ कखनोक’ दुरूह बुझना जाइछ तँ से हिनक अपन कथामार्गक तेहन चुनावेक कारण भ’ गेल अछि। ई चुनाव हिनक एक प्रकारक विवशता छलनि। यैह चुनाव हिनका मैथिली कथाक भीड़मेसँ उठाक’ फराक ठाढ क’ देलक। हरिमोहन बाबू अपन कथाक पात्र ओ परिस्थितिकेँ ऊपरक खाढीसँ चुनलनि, जकर छेँट हुनको खाढीमे आबि गेल छलनि। राजमोहन झा अपन जेनरेशनसँ शुरू क’ आगाँ बढला। तेँ, दुनूक कथा-देश फराक-फराक भ’ गेलनि। सीमो एक नहि रहलनि। यैह राजमोहन झाक कथाकारक भारी सफलता थिकनि।


प्रश्न– 2.

       राजमोहन झा अपन समकालीन कथाकार समूहमे वृहत्त्रयीमे नहि गनल गेला। खासक’ पंचकक एक वृत्त बनाओल गेल, जकर पाँच फाँटमे एक घर हिनको देल गेलनि। ने हिनक पीढीसँ पहिने आ ने बादमे फेर एहन वृत्त बनल अछि। ई वृत्त हिनक श्रेष्ठताकेँ रेखांकित करबाक हेतु बनब अनिवार्य छल की हिनक परितोषार्थ बना देल गेल?


उत्तर –

       वृहत्त्रयीक चर्चा कवि लेल बेसी प्रशस्त अछि। मैथिलीमे पहिल बेर, हमर जनतबक हिसाबेँ, आचार्य रमानाथ झा आधुनिक कालक कविवृहत्त्रयीक स्थापना कयने छथि। कथामे तेना भ’क’ बाजाप्ता उल्लेख नहि भेटैत अछि, मुदा अनायासहिँ ललित-राजकमल-मायानन्दक त्रिक बनि गेल आ समीक्षामे चलि गेल। ई त्रिक तते सहजोर आ ततेक प्रभावी भेल जे अपन पीढीक वृहत्त्रयीक अभिधानो एकरापर छजि गेलै। एकर निकटवर्ती पीढी सेहो एहने ऊर्जासम्पन्न कथाकारक अपेक्षाकृत वृहत् समूहकेँ जन्म देलक, तकर विशेष श्रेय छै साप्ताहिक ‘मिथिला मिहिर’केँ। ‘मिहिर’क सम्पादक सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी अपनो नीक कथाकार रहथि आ समीक्षा-दृष्टि सेहो स्फीत रहनि। प्रभास, गुंजन, जीवकान्तक प्रति प्रशंसा-भाव बेसी राखथि। हुनका लोकनिक सम्बन्धमे मौखिक-लिखित जखन अवसर भेटैत छलनि, खुलिक’ बाजथि-लिखथि। अभिभावकत्वक भाव सेहो रहनि। उक्त त्रिमूर्तिक प्रशंसामे हुनक आलोचना-दृष्टिसँ अधिक वैह भाव काज करनि जे ई लोकनि हुनक क्रियेशन छथिन। प्रतिभाकेँ चिन्हबाक आ मजबाक श्रेय, उचितो, ओ अपनापर लैत रहथि। शेखरजीकेँ उक्त त्रिमूर्तिकेँ वृहत्त्रयी वा सर्वश्रेष्ठ त्रयी घोषित करबामे बाहरसँ दू टा नाम बेर-बेर हुनक कण्ठमे जाक’ अँटकि जाइन। ओ दुनू नाम छल राजमोहन झा आ धूमकेतुक। शेखरजी रमानाथ बाबू जकाँ जँ अगबे आलोचक रहितथि तँ ई दुनू नामकेँ घोँटि सकै छला, मुदा रहथि तँ सम्पादको, कहब’ चाहथि नवका सभक गार्जियनो, अपनाकेँ मानथि मास्टरो। तेँ ओ से नहि कयलनि आ एहि दूनू नामकेँ ओहि तीनूक संग शामिल क’ लेलनि। एहि बेर पंचक बनि गेल, आ से बढियाँ जकाँ चलि गेल।

       एक दिन हम सम्पादकजीसँ एहि प्रसंग गप करबाक साहस कयने रही। ‘साहस’ कने बेसी कहा गेल, अन्तरंग गप करबाक ‘छूटि’ जे हमरा देने रहथि, तकर उपयोग कयने रही। गपक विवरण बेसी फैल भ’ जायत, आ अन्तरंगतो खण्डित होयबाक आशंका रहत, तेँ एत’ निष्कर्ष मात्र द’ रहल छी। यद्यपि कहने रहथि ओ– एखनुका गपक निष्कर्ष तँ ई भेल, मुदा एकरा फाइनल नहि मानब।

       प्रभास आ जीवकान्तक कथाभूमि लगभग समाने, शिल्प-शैलीमे सेहो कोनो ततेक भेद नहि। प्रभावोक दृष्टिएँ एकरङाहे। तखन, दू टा भिन्न शिखर मानब उचित कोना? समकालीन मैथिली कथाक सामर्थ्य ओ दुनू छथि, से ठीक। मुदा, दुनू सामर्थ्य दू शिखर नहि, एके शिखरक दू फाँड़ी थिक। तेँ, एहि दुनूमेसँ एके गोटेक नाम लेबाक चाही, से जनिकर ली। नाम सम्पादकजी लेने रहथि।

       धूमकेतुक अगुरबाने टा नहि, आनो कथासभ जे अबैत छलनि, सभमे तीव्र दंश रहिते छलै। ओ अपन ढंगक एकसर कथाकार छला। कथाक प्रत्येक स्तरपर जे सफाइ, जे छटा ओ देखौलनि, से ओहेन वैह टा देखा सकै छला। समकालीन मैथिली कथाकेँ स्पृहणीय उँचाइ ओ देलनि। सम्पादकोजी से स्वीकार कयने रहथि।

       ‘परिचायिका’मे राजमोहन झापर हमर टिप्पणी सम्पादकजीकेँ नीक लागल छलनि, से ओ कहलनि। विशेषत: एहि अंशसँ ओ शतप्रतिशत सहमत बुझयला–”हिनक कथा देहातक कथा नहि कहैछ, देहातीक कथा नहि कहैछ, शहरमे बसल मध्यम आ निम्नमध्यवर्गक परिवारक कथा कहैछ। कथा कहैछ– खिस्सा नहि। हिनक कथामे खिस्सा नहि भेटैछ। तेँ, एकर अर्थ ई नहि जे कथ्य नहि रहैछ। जे कथ्य ककरो कखनो हँसबामे रहैछ, ककरो कखनो खौँझयबामे रहैछ, ककरो कखनो उद्विग्नतामे रहैछ, ककरो कखनो सन्देहमे रहैछ, सन्देह-भग्नमे रहैछ, ककरो कखनो आबेसमे रहैछ, रूसब-बौँसबमे रहैछ, ककरो कखनो किछु सोचबमे रहैछ– तही कथ्यकेँ लैत,ओकर रहस्यक जालीकेँ फाड़ैत, किन्तु ओकर छितरायल तागकेँ अपन विशिष्ट शिल्पमे बुनैत– हिनक कथा बढैत अछि। तेँ, हिनक कथा मनुक्खक बहरिया हलचलक कथा ओते नहि अछि, जते ओकर मनमे चलैत विचारक ट्रेनक धमक आ लचकक कथा अछि। किन्तु, ओहि ट्रेनकेँ हिनक कथा स्टेशन पहुँचा दै अछि, पाठककेँ चलैत ट्रेनक पाछाँ दौड़ैत नहि छोड़ि दै अछि। हिनक पात्रक तनाव पाठकक तनाव भ’ जाइ अछि आ हिनक पात्रक तनावमुक्तिसँ पाठको आश्वस्तिक साँस लैत अछि– पाठकक संग एते सघन आत्मीयता स्थापित करब कथाकारक विशिष्ट सामर्थ्यक द्योतक थिक– सामर्थ्य कथ्योक, शिल्पोक आ भाषाक सेहो।”

       राजमोहनजीक कथ्यक बुनावटि सम्पादकजीकेँ सभसँ अधिक आकृष्ट करनि। अपन कथाक मन:संसारमे जतेक कौशलसँ ओ रमा दैत छथि, जतेक बारीकीमे ओ जाइत छथि, आधुनिक शहरोन्मुखी जीवनक, मानवीय सम्बन्धक जेहन त्रासदी हुनकामे भेटैत अछि, से मैथिली कथाक नवीन क्षितिजक उद्घाटन करैत अछि। शेखरजीक एहि मान्यतासँ क्यो कोना असहमत भ’ सकैछ?

       शेखरजी जँ अगबे आलोचक रहितथि तँ एकरा फाइनल मानि लेने रहितथि आ घोषणो क’ दितथि आ से चलियो जाइत। मुदा, हुनका तँ अपन सभ क्रियेशनक प्रति ‘मोह’ छलनि। से, राजमोहन झा लेल आरम्भमे ‘फाँस’ बनि गेलनि।


प्रश्न–3.

       हिनक निकटपूर्वक त्रयी तथा हिनक समकालीन पंचकमे केवल यैह एहन कथाकार छथि जे उपन्यास नहि लिखलनि। से एना किए भेल? एहि कारणे हिनक कथाकार आर पुष्ट भेल आ की अपन सीमाकेँ देखार कयलक?


उत्तर – 

       घोषित त्रिक आ अपन पंचकमे एकमात्र यैह थिका जे उपन्यास नहि लिखलनि। कतेको गोटेकेँ हिनकामे ई अभाव खटकतनि। मुदा, हमर से मत नहि अछि। जँ ठाँहि-पठाँहि कही तँ कहब जे नहि लिखलनि से ठीक कयलनि। एहूसँ कने टपि उचितवक्ता जकाँ बाजी तँ कहब जे से ई लिखियो ने सकैत छथि।

       तीन आ पाँच आठ। हिनका छोड़ि सातो गोटे कलम चलबैत छथि, ई छेनी- हथौड़ी ल’ क’ पाथरक सिल्लसँ मूर्ति खोधैत छथि। एक गोटे एके विषयवस्तुपर हजार पन्ना लिखि तँ सकै अछि, मुदा एके गोटे सम्पूर्ण पहाड़केँ काटि एक्के बेर काट-काटक मीना बजार नहि लगा सकै अछि।

       प्रभासजीकेँ लिखैत देखने छियनि। ओ कलमकेँ कागतपर खड़रैत छला। सम्पूर्ण कथा दिमागमे पहिने तैयार क’ लै छला, तखन तकरा धाइँ-धाइँ उतारि लै छला। रफ-फेयर जे बुझी वैह। गुंजनजीकेँ लिखैत नहि देखने छियनि, मुदा कागतक फर्द कहैत छलनि जे ओहो सरदर लिखने जाइत रहल होयता। जीवकान्तजी, बुझि पड़ैत अछि, रफ तँ करैत होयता, मुदा रफ भ’ गेल कि फेयर भेले बुझू। उक्त तीनू गोटेक स्पीड– एक वा दू सिटिंगमे एक कथा। धूमकेतुजीकेँ समय हिनकासभसँ बेसी लगै छलनि, रफकेँ मजै छला। मुदा, राजमोहनजी? हिनका तँ एक कथामे दू मास, तीन मास धरि चाहियनि। बड़ हड़बड़यबनि, तैयो मास दिनसँ पहिने कोनो उपाय नहि। हम तँ मित्रसभक बीच हिनका सुनाक’ बजितो रही– ‘भाइ साहेब आइ राति अपन कथामे सात पाँती जोड़लनि अछि, एगारह पाँती कटलनि अछि!’ भाइ साहेब पहिने मानसमे कथाकेँ मथैत छथि, फेर ओकर तह-तहकेँ खोलैत छथि, एक-एक टा भावकेँ, भंगिमाकेँ शब्दमे रूपान्तरित करैत छथि, ओकर प्रत्येक विकल्पपर विचार करैत छथि, फेर तकरा जँचैत छथि, बदलैत छथि, ठोकि- ठठाक’ आश्वस्त भ’ लैत छथि, तखन अगिला पाँती दिस बढैत छथि। जे कारीगर एक-एक टा कथापर एक-एक टा उपन्यासवला मेहनति झोँकैत अछि, ओ उपन्यास कोना लिखि सकै अछि?

       ई ओते कथो कोना लिखि लेलनि, हमरा तँ तकरे छगुनता अछि। संख्यामे हिनकासँ बेसी कथा जीवकान्तजी टा लिखने छथि, जनिका लेल लिखब बामा हाथक खेल थिकनि। तकर बाद, आठोमे यैह छथि। ई नब्बेसँ किछु अधिक, जँ हमर जानकारी ठीक अछि तँ आइ धरि एकानबे गोट कथा लिखलनि अछि। जाहि ढंगक हिनक कथा रहैत छनि, ताहिमे रिपीटीशनक खतरा सभसँ बेसी रहै छै। एते लिखलाक बादो ताहिसँ बचल रहब, एहू टा बिन्दुपर हिनक श्रेष्ठता सिद्ध अछि। ठीकसँ देखबै तँ ई स्पष्ट भ’ जायत जे छेनी-हथौड़ीक काज कते बारीकीसँ भेल छै, आँखिक एक-एक टा पिपनी बिकछायल छै।

       जे कथामे उपन्यासे लिखैत अछि, ओकरासँ फराकसँ उपन्यासक अपेक्षा रखब अनुचित थिक। उपन्यास नहि लिखबकेँ ओकर दुर्बलता मानि लेब सरासरि अन्याय थिक ओकरा लेल। भाइ साहेब जँ उपन्यासक फेरमे पड़ि गेल रहितथि तँ हमरा लोकनि हिनक दर्जनो कथासँ वंचित भ’ गेल रहितहुँ। आ तैयो, उपन्यास पूरा भ’ सकितनि, हमरा तँ पूरा सन्देह अछि ताहिमे।


प्रश्न – 4.

       हिनक उत्थान कालमे मैथिलीक बेसी कथाकार हिन्दी मानियाँसँ ग्रस्त छला– त्रयी आ पंचक समेत, एकाध अपवादकेँ छोड़ि। ई ओहि जालमे कतेक ओझरयला? ताहिसँ हिनक कथाक स्वास्थ्यपर केहन प्रभाव पड़ल?


उत्तर –

       मैथिली कथापर तकर प्रभाव तँ ओना नहि पड़ैत छै, मुदा कथाकारक मानसिकतापर तँ तकर जबर्दस्त प्रभाव पड़िते टा छै। ताहिसँ मैथिलीकेँ की लाभ भेलै से तँ नहि जानि, कथाकारकेँ की लाभ भेलनि से तँ वैह कहता, मुदा हमरा तँ वृहत्तर परिप्रेक्ष्यमे मैथिलीक हानिएँ देखाइ पड़ै अछि। एहि ठाम ई साफ क’ दी जे मैथिली लेखकक हिन्दी लेखनसँ हमरा विरोध नहि अछि। हम तँ केवल ओहेन लेखनक समर्थक नहि छी जे मैथिलीमे लिखल वस्तुकेँ हिन्दीमे मौलिक रचना कहि छपाओल जाइत अछि।

       मानियाँवला बात राजकमलपर नहि लागू होइछ। ओ हिन्दियोक तेहने जबर्दस्त साहित्यकार रहथि। ललितकेँ हिन्दी कहियो आकृष्ट नहि कयलकनि। से जँ कयने रहितनि तँ राजकमलक हिन्दी कथाक मैथिलीकरण नहि कयने रहितथिन। मायानन्दजीमे हिन्दी-मोह आखिरी छलनि। एम्हर किछु नामो भेलनि अछि, मुदा ओते नाम आ आदर कत’सँ भ’ सकतनि जते मैथिलीमे छनि। मोह तँ आन्हर होइत अछि। ‘मंत्रपुत्र’ हिन्दीमे जँ ‘मैथिली उपन्यास’ कहि छपल रहैत तँ ताहिसँ मैथिलीक प्रतिष्ठा बढितैक, मायानन्दजीक प्रतिष्ठा घटितनि नहि। मुदा से नहि भेलै। ई तँ भेल त्रयीक बात। आब पंचक। पंचकमे क्यो नहि छथि जनिक हिन्दी साहित्यक इतिहासमे भरिसक उल्लेख छनि। तात्कालिक वाहवाहीक भिन्नो कारण भ’ सकै छै।                           

       प्रभासजी आ गुंजनजी एहि मोहसँ बेसी ग्रस्त। धूमकेतुजीकेँ हिन्दी लेखन दिस रुझान नहि देखियनि। रुझान जीवकान्तजीकेँ छलनि, एम्हर तँ बहुत बेसी भ’ गेलनि अछि, मुदा मैथिली कथा आ कविताक लेबुल हँटाक’ नहि। तँ ई बहुत नीक बात थिक आ एहिसँ मैथिलीक बड़का उपकार होयतै।

.      ई मोह शुरू-शुरूमे राजमोहनोजीकेँ छलनि। मुदा, एहिसँ ई अपनाकेँ जल्दिए उबारि लेलनि, से हम बुझै छी, मैथिली लेल बड़का काज कयलनि। एहि मोहसँ ओ मुक्त नहि भ’ जैतथि तँ ताहिसँ हिनक मैथिली कथाक क्वालिटीपर तँ प्रभाव नहि पड़ैत, क्वांटिटीपर अवश्य प्रभाव पड़ि जाइत। आ, मैथिली कथाक प्रति हिनक सम्पूर्ण समर्पणमे बाधा आबि जाइत। सौभाग्यसँ से नहि भेल आ ई हमरा लोकनि मैथिलीवला लेल अतिरिक्त आह्लादक विषय थिक।

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