पुण्य स्मरण
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--डाॅ. भीमनाथ झा
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ई हमरा लोकनिक भाइ साहेब छला। उपेन्द्र दोषीक मुँहसँ हिनका प्रति अनायास बहरायल ई सम्बोधन मित्रमण्डलीमे लगले परिव्याप्त भ’ गेलनि। मैथिली साहित्यक पाठक आ प्रेमी लोकनि हिनका राज मोहन झाक नामसँ जनैत छथिन। मुदा, हिनक मूल नाम छलनि राम मोहन झा। ई नाम पितामहक राखल छलनि। एही नामसँ ई एम.ए. कयने रहथि एवं बिहार सरकारक श्रम एवं नियोजन विभागमे वरिष्ठ पदाधिकारी रहथि। राम मोहनकेँ राज मोहन पछाति ई स्वयं क’ लेने रहथि। ई हिनक साहित्यिक नाम थिकनि जाहिसँ ई विख्यात भेला। घर-परिवारमे पुकारक एक टा आर नाम रहनि, जेना अधिक गोटेकेँ रहै छै, हिनक रहनि– गोपालजी।
. राज मोहन झा स्वनामधन्य छला। माने, हिनक परिचय लेल हिनक अपने कृतित्व पर्याप्त छलनि, पिता-पितामहक साहित्यिक यशस्विताक सोङरक प्रयोजन नहि छलनि। ओ अतिरिक्त गौरव छलनि हिनका लेल, जे कदाच कोनो विशिष्टे भाग्यशालीकेँ प्राप्त होइ छै।
. भाग्यशाली तँ ई छलाहे। अपन समयक मैथिलीक शीर्षस्थ साहित्यकार पं. जनार्दन झा जनसीदनक पौत्र एवं आधुनिक युगक ‘गद्य-विद्यापति’ प्रो. हरिमोहन झाक ज्येष्ठ पुत्र होयब असाधारण भाग्यक बात थिकै। तकर हिनका गौरवो छलनि, ओहि प्रतिष्ठाक सुरक्षाक दायित्वबोधो छलनि, ओहि सम्पत्तिक संरक्षाक उद्योगो कयलनि, किन्तु अपन साहित्यिक व्यक्तित्वकेँ ओहि साम्राज्यक प्रभाव-क्षेत्रसँ आरम्भेमे मुक्त क’ लेलनि, बाहर आबि अपन रुचिक कलम लगौलनि, जकर फलकेँ ‘राजमोहन-खास’ कहि सकै छी। ओ कथा हो, निबन्ध समीक्षा हो, सामयिक टिप्पणी हो कि पत्र-सम्पादन हो, एत’ धरि जे चिट्ठी-पत्री वा वार्तालाप अथवा बहसे किए ने हो, सभमे ‘राजमोहन-खास’क भिन्ने सुवास भेटै छल। मैथिलीक पाठककेँ आगुओ ओ सुवास भेटैत रहत, जे आनसँ किछु फराक लगैत रहत।
. हिनक व्यक्तित्व विरोधाभाससँ भरल छलनि। सामान्य लोक विरोधक अर्थमे विरोधाभासक प्रयोग करै छथि, जखन कि दुनूक अर्थ भिन्न-भिन्न थिक। विरोध थिक परस्पर विपरीत होयब– बातमे, विचारमे, स्वभावमे, उद्देश्यमे आदि-आदि। विरोधाभासमे विरोधक आभास टा होइ छै, वस्तुत: विरोध रहै नहि छै। होइ छै जे विरोध छै, मुदा वास्तवमे विरोध होइ नहि छै, अपितु पूर्वकथनक समर्थने होइ छै। तेँ साहित्यमे विरोधाभासकेँ अलंकार कहल गेलै अछि, उक्ति-चमत्कार मानल गेलै अछि।
. भाइ साहेब एते श्रेष्ठ साहित्यिक परिवारक छला, अपनहुँ विशिष्ट लेखक रहथि, पैघ अफसर रहथि, बड़का-बड़का लोकसँ सम्पर्क रहनि, तथापि मामूलीसँ मामूली लोकसँ मित्रता राखथि, नवसँ नव लेखकसँ आत्मीयता जोड़थि, साहित्यमे नवप्रवेशियोक संग घंटा दू घंटा टहलि लेथि, संगहि जलपान-चाह करथि, ओकर जँ किछु नीक वस्तु लगनि तँ तकर व्यापक स्तरपर चर्चा करथि, नीक नहि लगनि तँ समक्षहुमे मिथ्या प्रशंसा नहि करथि, मार्गदर्शनो नहि करथि। अपन घनिष्ठ मण्डलीमे कदाच कखनो कटु भैयो जाथि, मुदा साहित्यिक कली लग हरदम मृदुले बनल रहथि। विषयकेँ कखनो हल्लुक ढंगे नहि लेथि, सभ खन अपेक्षित गम्भीरताक निर्वाह करथि। से गपोसपोमे, सामूहिक वार्तालापोमे, गोष्टी-संगोष्ठियोमे। युवातूरक संग तँ तते घुलि-मिलि जाथि जे ‘मान्य कथाकार राज मोहन झा’ लगले ‘भाइ साहेब’ भ’ जाथि, हिनक मित्र मण्डलीक ओ सदस्य बनि जाय। मुदा, जखन कखनो विषयपर लिखथि तँ ककरो ‘रोच’ नहि राखथि। उचित बात ने गोड़ि क’ राखथि, ने तोड़ि-मरोड़ि क’ बाजथि, साफ-साफ जोरसँ बाजथि, झिकझोड़ि देथि। तेँ कहलहुँ जे विरोधाभासी व्यक्तित्व रहनि। ई गुण विरल लोकमे पाओल जाइछ।
. पटना बिहारक राजधानी रहलाक कारणे प्रदेशक राजनीतिक-सांस्कृतिक- साहित्यिक केन्द्र स्वत: भ’ गेल अछि। विश्वविद्यालय आ सचिवालय रहलासँ सभ दिन मिथिलोक बुद्धिजीवीक ओत’ जमघट रहल अछि। 1960 मे साप्ताहिक ‘मिथिला मिहिर’क पुन: प्रकाशन शुरू भेलाक बाद तँ मैथिली साहित्योक प्रधान केन्द्र मानल जाय लागल। उतार-चढावक दौड़ अस्वाभाविक नहि, ताहि हिसाबेँ 1970 आ 80क दशकक युवासाहित्यकारक जुटान आ सक्रियताक उठान-काल छल। प्रभासजी-गुंजनजी, प्रवासीजी-कुलानन्दजी, रमानन्द झा रमणजी-सुकान्तजी, मुखियाजी-बटुकभाइ (गौरीकान्त चौधरी कान्त- छत्रानन्द सिंह झा), शशिकान्तजी-पूर्णे्न्दुजी पहिनेसँ सक्रिय रहथि। राँचीसँ किछुए आगाँ-पाछाँ मोहन भारद्वाज आ उदयचन्द्र झा विनोद, राजमोहनजी (दिल्लीसँ, मुदा मानल जाथि ई राँचिए ग्रुपक) आ उपेन्द्र दोषी तथा हमहूँ पटना पहुँचि गेलहुँ। पटना क्रमश: अग्निपुष्प, विभूति आनन्द, केदार कानन आदिकेँ मैथिलीसँ जोड़ैत नव-नव परती तोड़ैत रहल।
. भाइ साहेबक नोकरी बदलीवला रहनि। अस्सीक दशकमे ओ बोकारो, फेर दरभंगा गेला, पुन: पटनामे स्थापित भ’ गेला। ताहि सभसँ पहिने मुजफ्फरपुर, राँची, दिल्ली आदिमे सेहो पदस्थापित छला। भाइ साहेब जत’ रहला, सदा सक्रिय रहला, मैथिली लेल सोचैत रहला, चिन्तन करैत रहला, आन सभकेँ चरियबैत रहला, सभ टा गतिविधिक टटका जानकारी रखैत रहला, जत’ जरूरी बुझथि हस्तक्षेप करैत रहला। ओ जत’-कतहु रहला, अपन मित्रमण्डलीसँ पत्राचारक माध्यमे लगातार जुड़ल रहला, अपन गतिविधिक जानकारी दैत रहला, हुनक लैत रहला। जत’ आवश्यक बुझथि, टोकैत रहला।
भाइ साहेब आदर्श पत्रलेखक छला। हुनक पत्र बहुत आत्मीय, साफ-साफ, मैथिलीक अद्यतन गतिविधिक सूचनासँ सज्जित, प्राप्त जानकारीक संप्रेषण एवं नवीन जानकारी पयबाक उत्कंठासँ ओतप्रोत रहै छल। बहुतो मित्र लग हुनक बहुतो पत्र होयतनि। आब आवश्यक अछि जे हुनक उपलब्ध पत्रक संचय कयल जाय आ तकरा एक ठाम प्रकाशित क’ देल जाय। भाइ साहेबक बेछप व्यक्तित्व हुनक पत्रोमे साकार भ’ गेल अछि। हुनक पत्रक प्रकाशन ताहि समयक मैथिली जगतक सम्पर्क आ गतिविधिक ‘आँखि देखल’ विवरण तँ प्रस्तुत करबे करत, संगहि जकरा कहल जाइछ ‘पत्र-साहित्य’ (साहित्य पत्रमे), तकरो आदर्श रूप उपस्थित करत।
हम राँची जीविकाक उदेसमे जहिया गेलहुँ, ताहिसँ किछु पहिनहि ई डेपुटेशनपर दिल्ली चल गेल रहथि। मुदा, राँचीक बसातमे हिनक व्यक्तित्वक सुवास गमगमाइत छ’ले। साहित्यकारक आन-जान पुस्तक भंडारक दोकानपर लगले रहै छल, उपेन्द्र दोषीक मुस्कानक संगहि ‘बचका’क जलपान, चाह-पान आ भाइ साहेबक कोनो-ने-कोनो आख्यान भेनहि। हमरो कान ताहि लेल लालायित रह’ लागल। किनको नाम हिनक पत्र अबनि तँ तकर वाचन होइ छलै, पुनि विश्लेषण चलै छलै। संभव थिक, क्यो जन बन्धु– दोषीजी कि विनोदजी कि मोहन भारद्वाजजी– नवतुरिया मण्डलमे एक जन नवागन्तुकक प्रवेश द’ किछु लिखि देने छल होयथिन। तकर बादक हिनक पत्रसभमे हमरो विषयमे किछु जिज्ञासा, किछु उत्कंठा रह’ लगलनि। तथापि, हम अपनामे ई साहस नहि जुटा सकलहुँ जे हिनका पत्र लिखियनि, यद्यपि बन्धु लोकनि प्रेरित करथि। हमरा लोकनिक सहयोगी कविता-संकलन ‘धूरी’ राजमोहनेजीकेँ समर्पित भेल छनि।
हम 1973 क आरम्भमे पटना ‘मिथिला मिहिर’मे आबि गेलहुँ। किछु नव करबाक उत्साहमे ‘मिहिर’मे एक विज्ञप्ति प्रकाशित भेलै, जाहिमे लेखक लोकनिसँ नव तरहेँ रचनाक आमन्त्रण कयल गेल छलनि। लगले दिल्लीसँ हमरा नामे राज मोहनजीक पत्र पहुँचल। पत्र लंबा छल, अनौपचारिक छल, आ जेना मन अछि, एना आरम्भ भेल छल– जहिया सुनलहुँ जे अहाँ ‘मिथिला मिहिर’मे आबि गेलहुँ अछि, तहिया भेल जे आब मिहिरक स्वरूप बदलत, अहाँक अयने किछु नव बस्तु आओत, टटका स्वाद भेटत। आइ जखन अंक आयल अछि तँ ओहिमे एतबा परिवर्तन अवश्य देखलहुँ अछि जे लेखक लोकनिकेँ लिखबाक पाठ धरि नीक जकाँ पढ़ाओल गेलनि अछि। एना लिखू, एहन रचना लिखू, एतबाटा लिखू– माने सभ टा लेखके करय, सम्पादक किछु नहि करय! एकर अर्थ तँ ई भेल जे जँ हमर कहल नहि करब तँ मिहिर एहिना रहत! माने सम्पादक किछु नहि करता। एहिसँ स्पष्ट भ’ गेल जे अहूँ किछु नहि करब। मिहिर जहिना चलै अछि, तहिना चलैत रहत। आदि-आदि।
एही आशयक छल हिनक पहिल पत्र। हमर तँ सिट्टी-पिट्टी गुम भ’ गेल। मुदा, एहिसँ एतबा तँ भेल जे धाख हमर छुटि गेल आ पत्र लिखबाक अवसर भेटि गेल। पत्राचारक क्रम चालू भ’ गेल। लगातार पत्र आब’ लागल। किछु मासक बाद स्वयं पटना आबि गेला। तकर प्राते मोहन भारद्वाजजीक डेरापर पहिल भेट भेल छल हिनकासँ।
(26. 4. 2016)



