Tuesday, January 6, 2026

हमरा लोकनिक भाइ साहेब: राज मोहन झा

                     पुण्य स्मरण

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--डाॅ. भीमनाथ झा

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       ई हमरा लोकनिक भाइ साहेब छला। उपेन्द्र दोषीक मुँहसँ हिनका प्रति अनायास बहरायल ई सम्बोधन मित्रमण्डलीमे लगले परिव्याप्त भ’ गेलनि। मैथिली साहित्यक पाठक आ प्रेमी लोकनि हिनका राज मोहन झाक नामसँ जनैत छथिन। मुदा, हिनक मूल नाम छलनि राम मोहन झा। ई नाम पितामहक राखल छलनि। एही नामसँ ई एम.ए. कयने रहथि एवं बिहार सरकारक श्रम एवं नियोजन विभागमे वरिष्ठ पदाधिकारी रहथि। राम मोहनकेँ राज मोहन पछाति ई स्वयं क’ लेने रहथि। ई हिनक साहित्यिक नाम थिकनि जाहिसँ ई विख्यात भेला। घर-परिवारमे पुकारक एक टा आर नाम रहनि, जेना अधिक गोटेकेँ रहै छै, हिनक रहनि– गोपालजी।

.     राज मोहन झा स्वनामधन्य छला। माने, हिनक परिचय लेल हिनक अपने कृतित्व पर्याप्त छलनि, पिता-पितामहक साहित्यिक यशस्विताक सोङरक प्रयोजन नहि छलनि। ओ अतिरिक्त गौरव छलनि हिनका लेल, जे कदाच कोनो विशिष्टे भाग्यशालीकेँ प्राप्त होइ छै।

.      भाग्यशाली तँ ई छलाहे। अपन समयक मैथिलीक शीर्षस्थ साहित्यकार पं. जनार्दन झा जनसीदनक पौत्र एवं आधुनिक युगक ‘गद्य-विद्यापति’ प्रो. हरिमोहन झाक ज्येष्ठ पुत्र होयब असाधारण भाग्यक बात थिकै। तकर हिनका गौरवो छलनि, ओहि प्रतिष्ठाक सुरक्षाक दायित्वबोधो छलनि, ओहि सम्पत्तिक संरक्षाक उद्योगो कयलनि, किन्तु अपन साहित्यिक व्यक्तित्वकेँ ओहि साम्राज्यक प्रभाव-क्षेत्रसँ आरम्भेमे मुक्त क’ लेलनि, बाहर आबि अपन रुचिक कलम लगौलनि, जकर फलकेँ ‘राजमोहन-खास’ कहि सकै छी। ओ कथा हो, निबन्ध समीक्षा हो, सामयिक टिप्पणी हो कि पत्र-सम्पादन हो, एत’ धरि जे चिट्ठी-पत्री वा वार्तालाप अथवा बहसे किए ने हो, सभमे ‘राजमोहन-खास’क भिन्ने सुवास भेटै छल। मैथिलीक पाठककेँ आगुओ ओ सुवास भेटैत रहत, जे आनसँ किछु फराक लगैत रहत।

.      हिनक व्यक्तित्व विरोधाभाससँ भरल छलनि। सामान्य लोक विरोधक अर्थमे विरोधाभासक प्रयोग करै छथि, जखन कि दुनूक अर्थ भिन्न-भिन्न थिक। विरोध थिक परस्पर विपरीत होयब– बातमे, विचारमे, स्वभावमे, उद्देश्यमे आदि-आदि। विरोधाभासमे विरोधक आभास टा होइ छै, वस्तुत: विरोध रहै नहि छै। होइ छै जे विरोध छै, मुदा वास्तवमे विरोध होइ नहि छै, अपितु पूर्वकथनक समर्थने होइ छै। तेँ साहित्यमे विरोधाभासकेँ अलंकार कहल गेलै अछि, उक्ति-चमत्कार मानल गेलै अछि।

.      भाइ साहेब एते श्रेष्ठ साहित्यिक परिवारक छला, अपनहुँ विशिष्ट लेखक रहथि, पैघ अफसर रहथि, बड़का-बड़का लोकसँ सम्पर्क रहनि, तथापि मामूलीसँ मामूली लोकसँ मित्रता राखथि, नवसँ नव लेखकसँ आत्मीयता जोड़थि, साहित्यमे नवप्रवेशियोक संग घंटा दू घंटा टहलि लेथि, संगहि जलपान-चाह करथि, ओकर जँ किछु नीक वस्तु लगनि तँ तकर व्यापक स्तरपर चर्चा करथि, नीक नहि लगनि तँ समक्षहुमे मिथ्या प्रशंसा नहि करथि, मार्गदर्शनो नहि करथि। अपन घनिष्ठ मण्डलीमे कदाच कखनो कटु भैयो जाथि, मुदा साहित्यिक कली लग हरदम मृदुले बनल रहथि। विषयकेँ कखनो हल्लुक ढंगे नहि लेथि, सभ खन अपेक्षित गम्भीरताक निर्वाह करथि। से गपोसपोमे, सामूहिक वार्तालापोमे, गोष्टी-संगोष्ठियोमे। युवातूरक संग तँ तते घुलि-मिलि जाथि जे ‘मान्य कथाकार राज मोहन झा’ लगले ‘भाइ साहेब’ भ’ जाथि, हिनक मित्र मण्डलीक ओ सदस्य बनि जाय। मुदा, जखन कखनो विषयपर लिखथि तँ ककरो ‘रोच’ नहि राखथि। उचित बात ने गोड़ि क’ राखथि, ने तोड़ि-मरोड़ि क’ बाजथि, साफ-साफ जोरसँ बाजथि, झिकझोड़ि देथि। तेँ कहलहुँ जे विरोधाभासी व्यक्तित्व रहनि। ई गुण विरल लोकमे पाओल जाइछ।

.      पटना बिहारक राजधानी रहलाक कारणे प्रदेशक राजनीतिक-सांस्कृतिक- साहित्यिक केन्द्र स्वत: भ’ गेल अछि। विश्वविद्यालय आ सचिवालय रहलासँ सभ दिन मिथिलोक बुद्धिजीवीक ओत’ जमघट रहल अछि। 1960 मे साप्ताहिक ‘मिथिला मिहिर’क पुन: प्रकाशन शुरू भेलाक बाद तँ मैथिली साहित्योक प्रधान केन्द्र मानल जाय लागल। उतार-चढावक दौड़ अस्वाभाविक नहि, ताहि हिसाबेँ 1970 आ 80क दशकक युवासाहित्यकारक जुटान आ सक्रियताक उठान-काल छल। प्रभासजी-गुंजनजी, प्रवासीजी-कुलानन्दजी, रमानन्द झा रमणजी-सुकान्तजी, मुखियाजी-बटुकभाइ (गौरीकान्त चौधरी कान्त- छत्रानन्द सिंह झा), शशिकान्तजी-पूर्णे्न्दुजी पहिनेसँ सक्रिय रहथि। राँचीसँ किछुए आगाँ-पाछाँ मोहन भारद्वाज आ उदयचन्द्र झा विनोद, राजमोहनजी (दिल्लीसँ, मुदा मानल जाथि ई राँचिए ग्रुपक) आ उपेन्द्र दोषी तथा हमहूँ पटना पहुँचि गेलहुँ। पटना क्रमश: अग्निपुष्प, विभूति आनन्द, केदार कानन आदिकेँ मैथिलीसँ जोड़ैत नव-नव परती तोड़ैत रहल।

.      भाइ साहेबक नोकरी बदलीवला रहनि। अस्सीक दशकमे ओ बोकारो, फेर दरभंगा गेला, पुन: पटनामे स्थापित भ’ गेला। ताहि सभसँ पहिने मुजफ्फरपुर, राँची, दिल्ली आदिमे सेहो पदस्थापित छला। भाइ साहेब जत’ रहला, सदा सक्रिय रहला, मैथिली लेल सोचैत रहला, चिन्तन करैत रहला, आन सभकेँ चरियबैत रहला, सभ टा गतिविधिक टटका जानकारी रखैत रहला, जत’ जरूरी बुझथि हस्तक्षेप करैत रहला। ओ जत’-कतहु रहला, अपन मित्रमण्डलीसँ पत्राचारक माध्यमे लगातार जुड़ल रहला, अपन गतिविधिक जानकारी दैत रहला, हुनक लैत रहला। जत’ आवश्यक बुझथि, टोकैत रहला। 

       भाइ साहेब आदर्श पत्रलेखक छला। हुनक पत्र बहुत आत्मीय, साफ-साफ, मैथिलीक अद्यतन गतिविधिक सूचनासँ सज्जित, प्राप्त जानकारीक संप्रेषण एवं नवीन जानकारी पयबाक उत्कंठासँ ओतप्रोत रहै छल। बहुतो मित्र लग हुनक बहुतो पत्र होयतनि। आब आवश्यक अछि जे हुनक उपलब्ध पत्रक संचय कयल जाय आ तकरा एक ठाम प्रकाशित क’ देल जाय। भाइ साहेबक बेछप व्यक्तित्व हुनक पत्रोमे साकार भ’ गेल अछि। हुनक पत्रक प्रकाशन ताहि समयक मैथिली जगतक सम्पर्क आ गतिविधिक ‘आँखि देखल’ विवरण तँ प्रस्तुत करबे करत, संगहि जकरा कहल जाइछ ‘पत्र-साहित्य’ (साहित्य पत्रमे), तकरो आदर्श रूप उपस्थित करत।


       हम राँची जीविकाक उदेसमे जहिया गेलहुँ, ताहिसँ किछु पहिनहि ई डेपुटेशनपर दिल्ली चल गेल रहथि। मुदा, राँचीक बसातमे हिनक व्यक्तित्वक सुवास गमगमाइत छ’ले। साहित्यकारक आन-जान पुस्तक भंडारक दोकानपर लगले रहै छल, उपेन्द्र दोषीक मुस्कानक संगहि ‘बचका’क जलपान, चाह-पान आ भाइ साहेबक कोनो-ने-कोनो आख्यान भेनहि। हमरो कान ताहि लेल लालायित रह’ लागल। किनको नाम हिनक पत्र अबनि तँ तकर वाचन होइ छलै, पुनि विश्लेषण चलै छलै। संभव थिक, क्यो जन बन्धु– दोषीजी कि विनोदजी कि मोहन भारद्वाजजी–  नवतुरिया मण्डलमे एक जन नवागन्तुकक प्रवेश द’ किछु लिखि देने छल होयथिन। तकर बादक हिनक पत्रसभमे हमरो विषयमे किछु जिज्ञासा, किछु उत्कंठा रह’ लगलनि। तथापि, हम अपनामे ई साहस नहि जुटा सकलहुँ जे हिनका पत्र लिखियनि, यद्यपि बन्धु लोकनि प्रेरित करथि। हमरा लोकनिक सहयोगी कविता-संकलन ‘धूरी’ राजमोहनेजीकेँ समर्पित भेल छनि।

       हम 1973 क आरम्भमे पटना ‘मिथिला मिहिर’मे आबि गेलहुँ। किछु नव करबाक उत्साहमे ‘मिहिर’मे एक विज्ञप्ति प्रकाशित भेलै, जाहिमे लेखक लोकनिसँ नव तरहेँ रचनाक आमन्त्रण कयल गेल छलनि। लगले दिल्लीसँ हमरा नामे राज मोहनजीक पत्र पहुँचल। पत्र लंबा छल, अनौपचारिक छल, आ जेना मन अछि, एना आरम्भ भेल छल–  जहिया सुनलहुँ जे अहाँ ‘मिथिला मिहिर’मे आबि गेलहुँ अछि, तहिया भेल जे आब मिहिरक स्वरूप बदलत, अहाँक अयने किछु नव बस्तु आओत, टटका स्वाद भेटत। आइ जखन अंक आयल अछि तँ ओहिमे एतबा परिवर्तन अवश्य देखलहुँ अछि जे लेखक लोकनिकेँ लिखबाक पाठ धरि नीक जकाँ पढ़ाओल गेलनि अछि। एना लिखू, एहन रचना लिखू, एतबाटा लिखू– माने सभ टा लेखके करय, सम्पादक किछु नहि करय! एकर अर्थ तँ ई भेल जे जँ हमर कहल नहि करब तँ मिहिर एहिना रहत! माने सम्पादक किछु नहि करता। एहिसँ स्पष्ट भ’ गेल जे अहूँ किछु नहि करब। मिहिर जहिना चलै अछि, तहिना चलैत रहत। आदि-आदि।

       एही आशयक छल हिनक पहिल पत्र। हमर तँ सिट्टी-पिट्टी गुम भ’ गेल। मुदा, एहिसँ एतबा तँ भेल जे धाख हमर छुटि गेल आ पत्र लिखबाक अवसर भेटि गेल। पत्राचारक क्रम चालू भ’ गेल। लगातार पत्र आब’ लागल। किछु मासक बाद स्वयं पटना आबि गेला। तकर प्राते मोहन भारद्वाजजीक डेरापर पहिल भेट भेल छल हिनकासँ।

                           (26. 4. 2016)

Monday, January 5, 2026

अपना-अपना ठाँव (मैथिली कहानी)


 मैथिली कहानी

तारानंद वियोगी

      

दुर्गापूजा की छुट्टी में मनोज गाँव आया था। पिछली रात को ही वह पहुँचा था। सुबह सोकर उठा तो घर-दुआर, बाड़ी-झाड़ी के मुआयने पर निकला। बाड़ी में काका ने गेन्दा और तीरा के फूल लगाये थे। पौधों की जड़ों में ढेर गंदगी जमा थी। सूखी-मुरझाई डाल-पत्तियाँ फूल के पौधों से लटकी पड़ी थीं। यह सब बगीचे के आकर्षण को कम करता था। मनोज ने खुरपी निकाली और पौधों की चौबगली सफाई करने लगा। कि तभी हड़बड़ाए हुए-से काका सामने आकर खड़े हो गये।

          'चलो-चलो, जरा दालान पर चलो।'-- काका बोले। काका बहुत घबराये हुए-से थे, जैसे कोई अनहोनी घटित हो गयी हो, इतने! मनोज समझ नहीं पाया कि आखिर बात क्या हो सकती है। काका से पूछा-- किसी को कुछ हुआ क्या? उसके स्वर में भी जैसे घबराहट भर आई थी।

            काका ने उसी घबराहट के साथ जवाब दिया-- 'नहीं नहीं, किसी को कुछ हुआ नहीं। वकील साहब आए हुए हैं।'

              यक-ब-यक मनोज समझ नहीं पाया कि कौन-से वकील साहब आए हैं कि काका इतनी घबराहट में हैं। गाँव में चार अलग-अलग वकील साहब थे। इनमें से एक से तो मनोज की दोस्ती भी थी। लेकिन वह अगर आये होते तो काका इस तरह घबराते क्यों? फिर भी मनोज ने पूछा-- सन्तू जी आए हैं क्या?

      -- 'नहीं नहीं, वो नहीं, पलिवार वाले वकील साहब आए हैं।'

            ओ....... लंबा खींचते हुए मनोज 'ओ' बोला। उसे भीतर कहीं से हँसी आई। फिर लगा कि नहीं, हँसने से काका को दुख हो सकता है। वह मुस्कुराकर रह गया।

            पलिवार वाले वकील साहब गाँव के नामी बेवकूफ, जिसे मिथिला में बूड़ि कहा जाता है, माने जाते थे, यानी हँसी के पात्र, बेढंगे। लोग उन्हें खिझाकर आनंद पाते। कभी वकील साहब रास्ते से गुजर रहे होते, गाँव के किसी लोफर की नजर उनपर पड़ी नहीं कि मामला उलझ जाता। कोई पूछ रहा होता-- 'आप अभी तक मरे नहीं वकील साहब?' वह कुछ जवाब देते कि इससे पहले दूसरा नौजवान टूट पड़ता-- 'अभी तक नहीं मरे, इससे क्या? अब नहीं बचेंगे, सो पक्का है। जाँच कर लो, जब ये चलते हैं तो टांगें आगे-पीछे आगे-पीछे होती रहती हैं! बोलिए न वकील साहब, ये सही बात है कि नहीं?'

                साक्षात यमराज सामने उपस्थित हों, तब भी वकील साहब शायद इतना नहीं डरते, जितना इन बेहूदों से डरते हैं। जान बचाने के लिए वह हारे हुए कुक्कुर के समान दांत चियार देते-- 'हां अओ! आपलोग उचित कहते हैं। देखा न जाए, भोजन करने के पश्चात मेरी भूख भी मर जा रही है। लक्षण तो स्वयं मुझको भी अच्छा नहीं दीखता। हें हें हें...'

           लेकिन वे बेहूदा लड़के वकील साहब की इस दांत-चियारी से बिलकुल भी न पसीजते। कोई उनकी आँखों का चश्मा छीन लेता। वकील साहब बड़े ऊँचे पावर का चश्मा पहनते थे। चश्मा के बगैर उन्हें कुछ दीखता नहीं। लड़के उनका चश्मा जमीन पर गिरा देते और उन्हें कहते कि खोज लें। रास्ते पर झुककर अपने दोनों हाथों से वह चश्मा ढूँढ़ने की कोशिश करते। वह रुआँसा हो जाते। लड़के फिर भी नहीं पसीजते। कोई उन्हें उँगलियां दिखाकर गिनने कहता तो कोई दूसरा पीछे से उनकी धोती का ढेका खोल देता। बहुत सारे लोग जमा हो जाते। सब मिलकर हुले हुले करते। सबको आनंद आता।

                तो, लुच्चे-लफंगों से वकील साहब बहुत दबकर रहते, बचकर निकलने की जुगत सोचा करते। लेकिन, ठीक यही महाशय जब भले आदमियों, पिछड़े-दलितों के सामने होते तो उन बेचारों पर हुकूमत चलाने के लाख-हजार गुर उन्हें मालूम थे। कमजोर वर्ग के लोग वकील साहब की नजरों से ठीक उसी तरह बचने की कोशिश करते, जैसा ये महाशय खुद लुच्चे-लफंगों से बचने के लिए करते थे। वकील साहब की खास विशेषता यही थी कि इस गाँव के मूल वाशिंदों के वंशधर थे। हरसिंहदेव के जमाने से आजतक उनका परिवार इसी गाँव में बना रहा, इसे बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। बाकी जो ब्राह्मण थे, अलग-अलग जमानों में वे अलग-अलग कारणों से अलग-अलग स्थानों पर जा बसे। इन निर्वासित हो चुके लोगों को वकील साहब बहुत गलियाते। इस गाँव के मूलवासी होने के कारण आज के जमाने में भी इस गाँव को वह अपनी जागीर समझते थे। कहा जाता था कि बीते जमाने में इस इलाके की जमीन्दारी भी इन्हीं लोगों के पास थी। मुगल बादशाह ने इस खान्दान की सेवा से प्रसन्न होकर 'चौधरी' की उपाधि प्रदान की थी। आज तक ये लोग चौधरी ही कहलाते हैं। वह कहा करते कि चाहे विद्या देखिये, या धन, या लाठी-- चौधरियों का परिवार ही आज भी विश्वविजयी है। यह अलग बात है कि उनका विश्व इस गाँव की चौहद्दी तक ही सीमित था।

               मनोज ने काका से पूछा-- 'किधर आए हैं वकील साहब?

            काका बोले-- 'चन्दा वसूलने।'

          -- किस बात का चन्दा?

           -- भगवती पूजा का।

     मनोज को बड़ा अचरज लगा। वह बोला-- भगवती पूजा का चन्दा? अपने लोगों से? अपने लोगों से तो कभी नहीं लिया जाता था।'

            -- हाँ, पहले तो कभी नहीं लिया गया। लेकिन, इस बार तो आए हैं!'

            बड़े ही पुराने जमाने से यह चलन चला आया था कि हरेक साल महाष्टमी की रात को भगवती मंदिर मे निशा-पूजा का विशाल आयोजन होता। गाँव के लोग इसे नशा-पूजा कहते। भगवती को दर्जन के दर्जन बोतल दारू का चढ़ावा चढ़ता। दारू के चखने चढ़ते। खस्सी, पाठा, भेड़, मुरगा, कबूतर, मछली, अंडा-- कुछ भी वहाँ चढ़ावे के लिए मना नहीं था। तांत्रिक पद्धति से देवी की पूजा होती, ऐसा जानकार लोग बताते थे। अगली सुबह महानवमी के रोज देवी के समक्ष पाठा, भेड़ और भैंसे की बलि चढ़ती। हजार की संख्या में छाग-बलि और दो-ढाई दर्जन के करीब महिष-बलि। दूर-दराज गांवों तक के श्रद्धालु मनौती करते। फल होता कि नवमी के दिन बलि-प्रदान के लिए मारा-मारी होती, घमासान मच जाता। लेकिन एक नियम सनातन से चला आता था। नियम यह कि सबसे पहली पूजा और बलि-प्रदान पलिवार की तरफ से होता। इस पूजा को लोग 'गमैया पूजा' कहते थे और बलिदान को गमैया छागर, गमैया पाड़ा। ऐसा लगता था मानो यहीं पर कहीं जागीरदारी की जड़ थी।

            अब चूँकि इतने बड़े आयोजन में खर्च भी बड़ा होता, तो सनातन से यह भी नियम चला आता था कि समूचा खर्च पलिवार के बाबू-भैया मिलकर वहन करते। जब कलियुग आया तो यह होने लगा कि पलिबार से बाहर के जो ब्राह्मण गाँव में निवास करते थे, उनसे चन्दा लिया जाने लगा। लेकिन, किसकी हिम्मत कि इस लिये जाने वाली चीज को चन्दा जैसे गंदे नाम से पुकारता? इसे 'बेहरी' कहते थे, जिसमें निमित्त खुद भगवती हो जाती थीं। पर इस बार तो अचंभा ही हो गया। कहाँ पलिवार का उज्ज्वल महावंश, और कहाँ इस दलित का दरवाजा! वकील साहब बेहरी मांगने स्वयं पहुँच गये थे।

              'समय परिवर्तनशील होता है'-- मनोज ने सोचा और जरा-सा मुस्कुराया। वह दालान पर आया। दालान की चौकी पर वकील साहब ओलड़ के बैठे थे, मतलब आधी चौकी भर जगह छेक कर। उनके साथ पलिवार के दो नौजवान भी थे। वकील साहब उन दोनों युवकों को सामाजिक पाठ पढ़ाने में व्यस्त थे। पाठ यह कि कैसे गाँव के मेन चौक पर कोई अनजान राहगीर इस गाँव के बारे में भद्दी बातें कर रहा था, और किस तरह वकील साहब ने उस राहगीर को मन-भर बेइज्जत किया था। असल में, वकील साहब-जैसे लोग अपने कुलशीलवान जीवन में कुल तीन ही काम के लायक होते हैं--- भोजन, विश्राम और गपसप। अभी वह गपसप कर रहे थे।

            मनोज आया और उसने बड़े ही व्यंग्यात्मक लहजे में कहा-- 'परनाम वकील साहब।' 'पर' बोलने के बाद एक लंबी तान भरते हुए 'नाम' कहा। इस तान का यही मतलब हो सकता था कि शब्द पर मत जाइये, भाव को पकड़िये कि अब आपका आदर नहीं किया जाएगा, अब लोग आपको प्रणाम नहीं करेंगे।

              लेकिन, वकील साहब मानो गहरे नशे में चूर थे। काहे को वह परनाम का जवाब देने या इसका भाव समझने की कोशिश करें, वह तो 'ही ही' करके हँसने लगे। उनकी इस पलिवारवादी हँसी को सुनकर मनोज सोचने लगा कि आखिर लोग इन्हें वकील साहब क्यों कहते हैं! वकालत तो इन्होंने कभी की नहीं। क्या सचमुच इन्होंने एल-एल.बी. की पढ़ाई की होगी?

             वकील साहब बोले-- 'की अओ विद्वान! बेहरी दियौ।'

            जिस टोन में वकील साहेब ने 'की अओ विद्वान' कहा था, उसकी स्पष्ट ध्वनि थी-- क्या रे शूद्र! बेकार ही लोग मानते हैं कि मैथिली एक मधुर भाषा है। इसके उच्चारण में जितने दाव-पेंच और जहर भरे होते हैं कि काहे को कोई दूसरी भाषा इसकी बराबरी कर सके। लेकिन, मनोज दूसरी बात सोच रहा था। सोच रहा था कि यह वकील साहब आखिर क्यों मनुष्य की भाषा नहीं बोल पाते! 'भ' जेतै', 'द'देतै' बोलेंगे। समूचे गाँव में एक इनकी भाखा बेछप होती है। क्यों? क्यों आम आदमी की तरह बात नहीं कर सकते? कौन इन्हें रोकता है?

            मनोज ने पूछा-- 'किस बात के लिए बेहरी?'

             इस मामूली-से प्रश्न से वकील साहब उत्तेजित हो गए-- 'ऐसी बात क्यों बोलते हैं अओ? मैंने तो पहले ही बालदेव को कह दिया कि बेहरी लगेगी।'

             पक्की बात है कि मनोज अगर सामने उपस्थित नहीं रहा होता, तो वकील साहब उनके सत्तर साल के पिता को बालदेव नहीं, बलदेबा बुलाते। मनोज को खयाल आया कि यह बात जो कही जाती है कि योग्य संतानें अपने पिता तक की प्रतिष्ठा को बढ़ाती हैं, यह बात यूँ ही नहीं कही जाती। लेकिन, तत्काल तो उसे यही दिखा कि ये महाशय अपने घमंड में कितने चूर हैं! 

             मनोज बोला-- 'एक बात पूछूँ वकील साहब?'

             वकील साहब चुप रहे। उन्होंने मनोज की ओर देखा।

             मनोज ने पूछा-- 'आप सिर्फ वकील साहब हैं या कि खुद आइपीसी हैं?'

                वकील साहब की समझ में कुछ भी नहीं आया। बोले-- ' पूछने का क्या तात्पर्य है? मैंने समझा नहीं।'

                  मनोज को गुस्सा आने लगा। बोला-- 'आप झूठ बोल रहे हैं। आप समझेंगे क्यों नहीं? खूब समझेंगे। और, अगर समझना ही नहीं चाहते, तो इसका तो कोई इलाज नहीं है।'

                 युवा मनोज की आवाज में उद्दंडता का भान होते ही पल भर के लिए वकील साहब भूल गये कि किसी दलित लड़के से बात कर रहे हैं। उन्हें भय हुआ। वह साकांक्ष हो गये और अपना चश्मा सँभालने लगे।

              मनोज बोला-- 'हम आपसे पूछते हैं कि क्या चीज की बेहरी, तो आप कहते हैं, हमने तो पहले ही कह दिया था,अब तो देना ही पड़ेगा। आप जरा ये बताइए कि वो सब बातें  जो आप पहले ही बोल चुके हैं, कानून हो गयी हैं क्या? अब लोगों को उसी के हिसाब से चलना पड़ेगा?'

                वकील साहब चुप हो गये। उनके साथ आए एक नवयुवक ने पूछा-- ' आप मास्सैब, बेहरी नहीं देना चाहते हैं क्या?'

                मनोज ने जवाब दिया-- ' बेहरी हम देंगे कि नहीं देंगे, ये तो आगे की बात हुई न बौआ? आप हमको पहले बताइएगा न कि क्या चीज की बेहरी मांगने आए हैं, या कि पहले ही फरमान जारी कर दीजिएगा?'

                 नवयुवक भी चुप हो गया।

                  फिर मनोज ही बोला-- 'बेहरी मांगने का काम कहीं पलिवार के लोगों से हो वकील साहब? यह तो एक सामाजिक काम है। इसके लिए तो पहले व्यक्ति को समाज बनना पड़ेगा न! खैर बताइए, क्या कह रहे थे?'

               वकील साहब फिर से ताल ठोककर खड़े हो गये-- 'हम स्वयं आपके दालान पर चलकर आए हैं, इसकी आपको  तनिक भी लाज नहीं? आप पलिवार को नहीं चीन्हते हैं?'

                 मनोज ने अपना सिर पीट लिया। वकील साहब पर उसे दया आई। लेकिन ऐसी दया की भी क्या जरूरत?-- उसने सोचा। बोला-- 'पलिवार को हम काहे नहीं चीन्हेंगे वकील साहब! और, जहाँ तक लाज लगने का सवाल है, लाज तो आप ही को लगनी चाहिए न, कि आपको हमारे दालान पर आना पड़ा। हमने तो आपको बुलाया नहीं था! पहले आप लोग पलिवार की तरफ से सब इन्तजाम करते थे। उससे नहीं हुआ तो दूसरे-दूसरे ब्राह्मणों से माँगना पड़ा। उससे भी नहीं हुआ तो अब सोलकन-दलित के दालान पर चढ़ना पड़ा। ये तो आप ही के लिए लाज लगनेवाली बात हुई।'

                 पलिवार के एक समझदार नवयुवक ने जवाब दिया-- 'नहीं, ऐसी बात नहीं है मास्सैब! हमलोगों का सिद्धान्त है कि सभी जाति के लोग समान हैं। गमैया पूजा है तो इसमें सभी ग्रामीणों का सहयोग होना चाहिए!'

             मनोज बोला-- 'यह जो बात आप बोले हैं, बहुत अच्छा बोले हैं बौआ! लेकिन एक बात बताइए, आपका तो यह सिद्धान्त है, ठीक बात है। लेकिन, मान लीजिए हमारा भी कोई सिद्धान्त हो तो इसको मानिएगा कि नहीं?'

              नवयुवक मुंडी हिलाने लगा-- 'हाँ-हाँ, क्यों नहीं? सबका अपना-अपना सिद्धान्त होता है।'

             मनोज कहने लगा-- 'आपको मालूम है बाबू? आठ-दस साल पहले की बात है, हमलोग भगवती-स्थान में धरना पर बैठे थे कि बलि-प्रथा बन्द होनी चाहिए। हमलोगों के लीडर थे विवेकानंद झा। मालूम है कि तब आपके पलिवार ने क्या किया था? हमीं लोगों को पकड़कर महिखा में बाँधने लगे कि इन्हीं लोगों का बलिदान दिया जाएगा। बड़ी मुश्किल से हम लोगों की जान बची थी। मालूम है?'

             नवयुवक चुप हो गया। मनोज ने आगे कहा-- 'आपलोगों का सिद्धान्त है तो हमलोगों का भी सिद्धान्त है। देखिये, इसी गाँव के बाहर एक और देवता हैं--कारू बाबा। नवमी को ही उनकी भी बड़ी पूजा होती है। जिस दिन कारूथान में दूध की नदी बहती रहती है, उसी दिन आपके मंदिर में खून की नदी बहती है। सिद्धान्त की अगर बात करिएगा तो यह भी सोचिएगा न कि ऐसा आखिर किस लिये होता है? किसने ऐसी प्रथा चलाई, और कौन इसे आज चला रहा है? इस मंदिर में तो भगवान बुद्ध की भी मूर्ति है न बौआ! बुद्ध के आगे खून की धार? छि: छि:।'

          मनोज उठकर खड़ा हो गया, और आँखों में पूरी कठोरता भरकर बोला-- 'बेहरी तो हम नहीं देंगे वकील साहब!'

        वकील साहब भी उठकर खड़े हो गये। बोले-- 'आपको भगवती का भी डर नहीं?'

          मनोज और भी कठोर हो गया। बोला-- 'नहीं, हमको किसी का भी डर नहीं।'

               इस बात पर वकील साहब क्या बोलते। वह चुपचाप उठे और वापस विदा हो गये।

            मनोज लौटकर आँगन गया। उसके हाथों में मिट्टी लगी हुई थी, कहीं गीली तो कहीं सूखी मिट्टी। उसने दोनों हाथ खोल लिये और देखने लगा। मुस्कुराया-- एह, यही मिट्टी है जो हमें और वकील साहेब को अलग करती है--उसने सोचा। और, यही मिट्टी है जो विवेका बाबू को हमारे साथ जोड़ती है और वकील साहब से अलग करती है-- उसने फिर सोचा।

               विवेका बाबू यानी विवेकानंद झा की याद आई तो वह दृश्य आँखों में नाच गया। धरने का नेतृत्व विवेका बाबू कर रहे थे। लेकिन उन दिनों रक्तबीजों की चलती मजबूत थी। पलिवार वालों ने हाथों हाथ उन्हें उठा लिया और महिखा (जमीन में गड़ा वह खंभा जिसमें पशुओं को बांधकर बलि दी जाती है) में बांधने लगे। एक कठमस्त युवक तलवार उठा लाया। बाप रे, ऐसा तो न कभी देखा था न सुना था। अपमानित होकर विवेका बाबू को अपना आन्दोलन बन्द करना पड़ा था। लेकिन, अभी-अभी जो घटना घटी थी, मनोज ने तय पाया कि रक्तबीजों का रुतबा अब कम पड़ा है। अभी अगर हो आन्दोलन, तो मजा आ जाएगा।

           मनोज ने अपने भीतर असीम जोश का अनुभव किया। उसने चापाकल पर जाकर हाथ धोया और कन्धे पर गमछा रखकर सीधे पुबारी टोले की ओर विदा हो गया। वह विवेका बाबू के घर जाएगा। जाकर उन्हें पूरा वाकया सुनाएगा और कहेगा कि सर, अब शुरू कीजिए संघर्ष। आन्दोलन का सही समय अब आया है।

              लेकिन, जब वह विवेका बाबू के घर पहुँचा तो पता लगा, वह कहीं बाहर निकले हैं।

             -- सर कहाँ गये हैं?-- विवेका बाबू की पत्नी से उसने पूछा।

             -- चमरटोली की तरफ गये हैं!

             --कब गये हैं?-- मनोज ने जानना चाहा कि कबतक लौटेंगे।

              विवेका बाबू की पत्नी बोलीं-- 'देखिये न, नवमी के दिन छाग-बलि की मनौती किए हुए हैं। अभी तक छागर का कोई इंतजाम ही नहीं हुआ है। छागर खरीदने ही निकले हैं। चमरटोली में नहीं मिला तो धनुकटोली की तरफ जाएंगे।'

             सुनकर मनोज को बड़ा अचंभा हुआ। वो विवेका बाबू! ये आठ-दस वर्ष का समय! और, आज वो खुद बलि का बकरा खरीदने गये हैं! वह चुप हो गया। चुप और उदास। लेकिन, क्षण भर बाद ही उसे खूब जोर से हँसने की इच्छा हुई। मगर वह हँस नहीं सकता था। उसकी हँसी सुनकर विवेका बाबू की पत्नी को दुख पहुँच सकता था।

(मैथिली से अनुवाद- स्वयं लेखक द्वारा)