Friday, June 24, 2011

एना फूसि के बयार बहत तं कोना बचत मैथिली?

मैथिलीक सुप्रसिद्ध लेखक डा० विभूति आनन्द आइ बहुत दुखी ' ' हमरा फोन केलनि। भाव-विह्वल छला ताहि संगे आक्रोशित जकां सेहो। हम पुछलियनि-- भाइ, की बात? बेर-बेर कहथि-- 'अहां कें एना नहि बजबाक-लिखबाक चाही।' हम चकित रही जे आखिर एहन कोन बात हम बजलहुं वा लिखलहुं जाहि सं हमर आदरणीय लेखक एहि तरहें दुखी छथि।

बात जे कहलनि, ताहि सं हम बुझलहुं जे हुनकर क्यो अपेक्षित हुनका कहलकनि जे तारानन्द वियोगी 'विदेह' (मैथिली इन्टरनेट पत्रिका एवं फेसबुक-ग्रुप) मे कहलखिन जे विभूति आनन्द कें जे साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटलनि, से बेटाक मृत्युक सान्वना-स्वरूप। हमर देह सिहरि गेल जे हे भगवती, लीला। एहि बात सं तं हम निश्चिन्त रहबे करी जे एहि तरहक घटिया बात हम आइ तं की जे कहियो बाजिये नहि सकै छी। मोन मे यैह आएल जे गजेन्द्र ठाकुर हमरा सं दुश्मनी निमाहैत-निमाहैत की आब एते पतित ' गेला? पछिला तीस बरस सं साहित्य मे हमर बहुत दुश्मन भ' चुकलाह अछि। हमरा खिलाफ मे जते लिखल गेल अछि, तकरा जं पुस्तकाकार छपाओल जाय तं पांच सौ पृष्ठक विशाल ग्रन्थ ' जेतै। एकरा हम कहियो बेजाय नै मानलियै, उनटे अपन सौभाग्य मानलहुं जे जीबन्त-जागन्त लोक छी तं वैचारिक विरोध तं हेबे करत। तकरा सब कें पढबाको फुरसत हमरा नै रहैए। अपन काज करी कि घून-सून लेने घुरी? मुदा कहलनि तं हम कने ताक-झांक केलहुं।

एतबा बात तं प्रायः सब गोटे कें बूझल हएत जे इन्टरनेट पर वा फेसबुक मे सैकडोक संख्या मे फरजी एकाउन्ट छै, जे साइबर-युद्ध मे नकली सेनाक काज करै छै। कतेक बेर तं डिसाइड करब कठिन ' जाइ छै जे के असली के नकली। जे किछु। एहने एक कोनो बन्धु बहुत उद्दंड भाषा मे लिखलनि अछि जे बात हम तहिया कहने रही, जहिया विभूति जी कें अकादमी पुरस्कार भेटल रहनि साक्ष्य के तौर पर 'समय-साल' पत्रिका के उल्लेख कएल गेल छै। गजेन्द्र जी एहि कथन कें अपन स्वीकृति प्रदान केलनि अछि।

हम विभूति जी कें सब बात कहलियनि। पुछलियनि---'की अहां कें मोन पडैए जे हम तहिया बात कहने रहियै?' मुदा, हुनको बात अविश्वसनीय लगलनि। अन्त मे 'समय-साल' निकाललनि। सरिया ' देखलनि। अन्त मे फेर वैह हमरा फोन ' ' सूचित केलनि जे अहांक बात कहबाक तं कतहु कोनो जिक्र नहि अछि। हमरा पर दुखी भेल छला, ताहि लेल अपसोच प्रकट केलनि। फेर गप भेल जे हमरा एहि बातक खंडन प्रकाशित करबाक चाही।

हम भारी छगुन्ता मे छी जे की खंडन प्रकाशित करी? अनजान मे गलती हो तं आदमी सुधरि सकैए। एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।

खंडन केने सं की हएत? हम पहिनो खंडन ' चुकल छी। मुदा सब अपन खुट्टा ठामे पर गाडने रहला। उनटे बकथोथनि करए लगलाह।

तैयो, विभूति जीक सम्मानार्थ हम इन्टरनेट सं जुडल मैथिलीक पाठक-लेखक-एक्टिविस्ट लोकनि कें सावधान करै छियनि जे 'विदेह' मे छपल कोनो बातक विश्वसनीयता अत्यन्त संदिग्ध होइ छै। छौडा-मारडि के खेती छिऐक, नै उपजल तं अथी सती..... जं कोनो कारण सं विश्वास करब बहुत जरूरी हो तं साक्ष्य के परीक्षण स्वयं ' लेथि (19.6.11)

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