Wednesday, April 13, 2011

कुछ तो गहरा हो यार

मिथिला के कुछ लडके इनदिनों फेसबुक पर मैथिली लेखकों से लड रहे हैं। मुझे तो पता भी नहीं था, देवेश ने आग्रह किया तो लडाई देखने मैं भी उनके आंगन गया था। मजा नहीं आया। लडके इस तरह विवस्त्र होकर लड रहे थे कि शामिल होने का मन भी नहीं किया।

लडाई की कुल जमा वजह यही दिखी कि लडके (और, उनके बुजुर्ग) मैथिली साहित्य में अपना स्थान चाहते हैं। यश और सम्मान। वाजिब बात है। यह उनको मिलना चाहिए। इसके लिए कई तरीके आजमाए जाते रहे हैं। एक पुराना तरीका है--सही-गलत मुद्दे खोज-खोजकर अपने सीनियर की कटु आलोचना करना और जहां तक बन पडे उन्हें गालियां देना। ये हर जगह होता है, हर पीढी में होता है।

लेकिन, इसके साथ-साथ अच्छा लिखना भी पडता है। ये लडके इन्टरनेट की विस्तृति और व्यापकता का गहरा ज्ञान रखते हैं। हथियार के तौर पर इसके उपयोग की समझ भी उनमें है। पर, ये अच्छा लिख नहीं पा रहे हैं। गहराई इनमें नहीं है। संवेदना के स्तर पर ज्ञान के स्तर पर। इसका जतन भी वे नहीं कर पा रहे हैं। पर, हडबडी है।............देखकर दुख होता है।

सीनियर के तौर पर गलियाने के लिए मुझे भी चुना गया है। खुशी हुई कि चलो, इस लायक समझा गया, 'नन-मैथिल' होने के बावजूद। मगर, दुख भी हुआ कि ये लडके ब्रह्म-वाक्य भाखने का दम्भ तो रखते हैं पर वास्तविक तथ्यों के बारे में कितना कम और अधूरा जानते हैं।देखिए, मुझे गाली देने के लिए ये 'जमीन्दार' शब्द चुनते हैं।

मेरी पुरस्कृत किताब ' भेटल तं की भेटल' के बारे में बहुत अद्भुत जानकारी इसमें दी गई है। समझें, मेरा भी 'ज्ञान-वर्द्धन' हुआ, खुद अपने बारे में। लिखा है कि ये किताब मेरी हिन्दी किताब 'यह पाया तो क्या पाया' का मैथिली रूपान्तर है। अबे यार, पूछ तो लिया होता। 'यह पाया.....' १५० पृष्ठों का कहानी-संग्रह है जो २००५ में प्रेस गया पर प्रकाशक के महिमा-वश अब तक भी बाहर सका। इसलिए लिखनेवाले ने इस किताब को कहीं देखा भी होगा। पर, लिख दिया मजे से। और, इसी बिना पर मुझे गलियाये जा रहे हैं।

अरे पंडित, कुछ तो स्तर निभाना सीख। कुछ तो गहरा हो यार। कुछ तो खयाल कर कि 'साहित्य' के क्षेत्र में काम करने आए हो, और वो भी विद्यापति की भाषा में। क्या होगा कल तुम्हारी 'मां मैथिली' का?

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